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Saturday, September 12, 2026

विचारधारा की जकड़न में फिल्मकार


हिंदी फिल्मों के एक निर्देशक हैं तिग्मांशु धूलिया। उन्होंने कई फिल्में निर्देशित की हैं। कुछ में अभिनय भी किया है। लोग उनको फिल्म पान सिंह तोमर के निर्देशक के तौर पर जानते हैं। इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में उनका भाषण हुआ। तिग्मांशु ने करीब आधे घंटे के अपने उद्बोधन में दुनिया जहान की बातें की। पूंजीवाद के खतरे से लेकर इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) से जुड़े किस्से सुनाए। चूंकि वो फिल्मों से जुड़े हैं तो फिल्मी बातें अधिक हुईं। राजनीति पर भी गए। अपने अनुभव भी साझा किए। अपना मत भी रखा। उनका मानना था कि इन दिनों हिंदी फिल्मों से कहानी गायब हो गई है। फिल्म धुरंधर का उदाहरण देते हुए उपहास के अंदाज में उसकी कहानी पर प्रश्न खड़ा किया। बोले कि बस एक व्यक्ति है जो पाकिस्तान जाता है। वहां तबाही मचाता है। ऐसी टिप्पणी करनेवाले तिग्मांशु को ये बताना चाहिए था कि कहानी क्या होती है। क्या कहानी सिर्फ उन फिल्मों में ही होती है जो लेफ्ट इकोसिस्टम के निर्देशक बनाते हैं। फिल्म धुरंधर में अगर कहानी नहीं दिखाई देती है तो उनको कहानी की परिभाषा का फिर से अध्ययन करना चाहिए। हिंदी के कई आलोचकों ने कहानी की परिभाषा दी है। अगर तिग्मांशु उन परिभाषाओं को एक बार देख लेते तो बेहतर तरीके से अपनी बात रख पाते। 

तिग्मांशु ने ये भी कहा कि हिंदी फिल्मों में हिंसा बहुत हो गई है। समाज क्रोध में है। यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है लेकिन सामान्यीकरण भी है। फिल्मों में हिंसा दिखाई जा रही है पर कई ऐसी फिल्में बन रही हैं जिनमें हिंसा नहीं होती। हिंसा तो कहानी पर निर्भर करती है। पिछले दिनों कई बेहतर प्रेम कहानी आई हैं जिसको दर्शकों ने पसंद किया। फिल्म सैयारा इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। चूंकि उन्होंने कहा कि वो फिल्में नहीं देखते। संभव है कि इस कारण उनको हिंदी फिल्मों की दुनिया में क्या घट रहा है इसका अनुमान कम हो। तिग्मांशु धूलिया की बातों के आलोक में उनकी फिल्म घमासान को परख लेते हैं। बीते शुक्रवार को उनकी फिल्म घमासान रिलीज हुई। ये फिल्म 2006 के उत्तर प्रदेश की कहानी कहती है। उत्तर प्रदेश का एक दस्यु सम्राट जिसका बुंदेलखंड इलाके में खौफ है। राजनीति से उसका संबंध और चुनाव के बाद फिल्म के अंत में उसके एनकाउंटर पर कहानी समाप्त होती है। ये एक ऐसी कहानी है जो दर्जनों बार हिंदी फिल्मों में कही जा चुकी है। तिग्मांशु ने जिस तरह से इस फिल्म को बुना है वो भी पुरानी प्रविधि है। एक ही कहानी को बार बार दोहराने से कथा का मूल तत्त्व, उत्सुकता, समाप्त हो जाता है। उनकी शिकायत है कि हिंदी फिल्में हिंसा के एक विशेष टेंपलेट में फंस गई है। घमासान देखने के बाद तो यही लगता है कि तिग्मांशु स्वयं डकैतों की समस्या और उसके खात्मे के हिंदी फिल्मों के पुराने टेंपलेंट में फंसे हैं। अपनी ही फिल्म पान सिंह तोमर से एक इंच भी आगे नहीं जा पाए हैं। राजनीति का तड़का लगाने का प्रयास अवश्य किया है लेकिन वो फार्मूला भी बहुत ही पुराना हो चुका है। रही बात हिंसा की तो इस फिल्म में तिग्मांशु ने भी दस कटे हुए सर का सार्वजनिक प्रदर्शन किया है। क्लोज शाट भी दिखाया है। यहां वो हिंसा को कहानी की मांग बताकर उचित करार दे सकते हैं। यही बात अन्य फिल्मों पर भी लागू होगी। अपनी फिल्म में हिंसा दिखाना कहानी की मांग और कोई दूसरा दिखाए तो वो एक टेंपलेट। गजब विचार है। 

उन्होंने अपने व्याख्यान में दो उदाहरण दिए और बताया कि जवाहरलाल नेहरू कितने उदार थे। जब एक फिल्म सेंसर बोर्ड में अटक गई तो दिलीप कुमार ने नेहरू से गुहार लगाई। नेहरू ने फिल्म देखकर सेंसर बोर्ड को फिल्म रिलीज करने को कहा। तिग्मांशु को ये कदम उदारता लग सकती है। पर यह एक खतरनाक प्रवृत्ति थी कि एक वैधानिक संस्था के निर्णय को प्रधानमंत्री ने पलट दिया। आज अगर ऐसी कोई छोटी सी घटना हो जाए तो यही लोग आसमान सर पर उठा लेंगे। संविधान की दुहाई देने लगेंगे। उनकी एक और बात को रेखांकित करने की आवश्कता है कि 2017 तक सब ठीक था लेकिन पता नहीं क्यों उसके बाद फिल्मी दुनिया अचानक क्यों बदल गई। वो ये भी कह गए कि 2017 तक ‘इनको’ (वर्तमान सरकार को) फिल्मों की समझ नहीं थी। कैसा अजीब तर्क है। तिग्मांशु जैसे वामपंथी पता नहीं क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि देश का मूड बदल चुका है। दर्शकों की पसंद बदल गई है। दस्यु और उनके आतंक की कहानी अब दर्शक नहीं सुनना/देखना चाहते हैं। कई बार देख लेने के बाद उनको ये दोहराव लगता है। न कहानी अलग, न ही ट्रीटमेंट अलग न ही कोई चौंकानेवाली बात।

दरअसल तिग्मांशु और उन जैसे वामपंथी निर्देशकों की कठिनाई अलग है। अब उनकी फिल्में चल नहीं रही हैं तो वो दर्शकों के सर पर इसका ठीकरा फोड़ना चाहते हैं। इसी इकोसिस्टम के एक और निर्देशक हैं सुधीर मिश्रा। एकाध अच्छी फिल्में बनाईं हैं। जब उनकी फिल्म अफवाह रिलीज हुई तो वो दर्शकों को बांटने लगे थे। अफवाह और द केरल स्टोरी एक साथ रिलीज हुई थी। द केरल स्टोरी सुपर हिट रही और अफवाह बुरी तरह पिट गई। तब सुधीर ने एक्स पर लिखा था- ‘द कश्मीर फाइल्स के बारे में लिबरल्स को शिकायत रहती है। क्यों? विवेक अग्निहोत्री ने एक फिल्म बनाई और उसके दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए थिएटर में आए। लेकिन जब हम फिल्म बनाते हैं तो हमारे दर्शक, जो विवेक की आलोचना करते हैं, चुपचाप बैठे रहते हैं। वो फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल नहीं पहुंचते हैं।‘ ये टिप्पणी कुंठा की पराकाष्ठा है। तिग्मांशु उसी राह पर हैं। 

तिग्मांशु जब फिल्मकारों की लाचारगी की बात करते हुए कहते हैं कि जब अच्छी कहानी कहनेवाले फिल्मकारों पर संकट आता हो तो कोई बचाने नहीं आता। भाईचारा खत्म हो गया है। तिग्मांशु धूलिया जी इस भाईचारे को खत्म करने का आरंभ तो आप जैसे कलाकारों ने ही 2014 में किया था। जब लोकसभा चुनाव का प्रचार अपने अंतिम चरण में था तो इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, नंदिता दास, कबीर खान, महेश भट्ट जैसे लोगों ने परोक्ष रूप से कांग्रेस के पक्ष में और नरेन्द्र मोदी के विरोध में खुला पत्र लिखा था। आप जब नेहरू फैन होने की बात करते हैं तो 2014 की आपका बयान याद आता है कि मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखना दुखद होगा। आपकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है । आपलोगों को अगर राजनीति करनी है तो खुलकर राजनीति के मैदान में उतरिए। कला और फिल्मों को औजार मत बनाइए। दर्शक समझ चुके हैं आपलोग कब समझेंगे । जितनी जल्दी समझ जाएं वो फिल्मी दुनिया के लिए बेहतर होगा। और हां ! लोकतंत्र 1793 में फ्रांस में आरंभ नहीं हुआ था। उसके बहुत पहले से भारत में वैशाली में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली चल रही थी। अपने देश को, अपने अतीत को समझिए, उसपर गर्व करिए दर्शकों को समझ जाएंगे। 


Saturday, March 26, 2016

चला निर्देशक हीरो बनने !

अपने छात्र जीवन में या यों कहें कि स्कूल के दिनों में जैकी श्रॉफ और मीनाक्षी शेषाद्रि की फिल्म हीरो देखी थी । उस फिल्म में उसके निर्देशक सुभाष घई चंद पलों के लिए दिखाई दिए थे । तब सुभाष घई को फिल्म में देखकर सिनेमा हॉल में तालियां बजी थीं और थोड़ा शोर भी हुआ था । तब मुझे इस बात को लेकर बहुत जिज्ञासा हुई  कि निर्देशक फिल्म में क्या करने आया था । बाद में लोगों ने बताया कि सुभाष घई अपनी हर फिल्म के किसी ना किसीसीन के कुछ फ्रेम में अवश्य नजर आते हैं । फिल्म से जुड़े लोगों का मानना है कि सुभाष घई इसको अपनी फिल्मों के लिए शुभ मानते हैं । उनको लगता है कि वो जिस फिल्म में थोड़ी देर के लिए भी दिखाई देंगे वो फिल्म हिट हो जाएगी । उस वक्त मेरे लिए निर्देशक का पर्दे पर आना विसम्य था । तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि एक वक्त ऐसा भी आएगा कि फिल्मों के निर्देशक खुद नायकों की भूमिका में नजर आने लगेगे । अभी हाल ही में हिंदी फिल्मों के मशहूर निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म आई है – जय गंगाजल । अपनी इस फिल्म का निर्देशन भी प्रकाश झा ने ही किया है और उसमें मुख्य भूमिका में भी वही हैं । साठ साल के प्रकाश झा की एक्टिंग की चारो तरफ तारीफ अवश्य हुई । पुलिस अफसर की भूमिका में उनकी डॉयलॉग डिलीवरी से लेकर स्टंट आदि के सीन में भी उनके अभिनय की प्रशंसा हुई, बावजूद इसके फिल्म बुरी तरह से फ्लॉप रही । जय गंगाजल के फ्लॉप होने के बावजूद अभिनय को लेकर प्रकाश झा के हौसले बुलंद हैं । फिल्म के जानकारों के हवाले से खबर ये है कि प्रकाश झा अपनी अगली फिल्म में बतौर नायक काम करने जा रहे हैं । यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि प्रकाश झा को जिन दर्शकों ने निर्देशक के तौर पर भरपूर प्यार दिया वो उनको अभिनेता के तौर पर कितना पसंद करते हैं । लंबे वक्त से फिल्मों से जुड़े प्रकाश झा को अभिन की बारीकियों का तो पता है ही ।
ऐसा नहीं है कि प्रकाश झा इकलौते ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने फिल्म में अभिनय करना शुरू कर दिया है । इसके पहले अनुराग कश्यप की फिल्म बांबे वेलवेट में करण जौहर ने भी भूमिका निभाई थी । इस फिल्म में करन जौहर निगेटिव रोल में थे । छोटे पर्द पर अपनी सफलता से उत्साहित करन जौहर ने फिल्मों में काम करना शुरु किया लेकिन वो यहां कोई कमाल नहीं दिखा पाए । अनुराग कश्यप की ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी थी । जबकि इस फिल्म में करन जौहर के अलावा अनुष्का शर्मा और रणबीर कपूर भी थे । ये फिल्म लेखक ज्ञान प्रकाश के उपन्यास मुंबई फेबल्स पर बनी थी । सिर्फ करन जौहर और प्रकाश झा ही क्यों नए निर्देशक के तौर पर अपनी पहचान कायम करने वाले तिग्मांशु धूलिया ने भी कई फिल्मों में काम किया । अपनी फिल्म साहब बीबी और गैंगस्टर में भी तिग्मांशू ने अभिनय किया । जिमी शेरगिल, माही गिल और रणदीप हुडा के साथ तिग्मांशु भी इस फिल्म में थे । ये फिल्म भी कोई जोरदार बिजनेस नहीं कर पाई लेकिन सफलता के लिहाज से ठीक-ठाक रही, कहा गया था कि इसने अपनी लागत निकाल ली थी । तिग्मांशु ने तो अनुराग कश्यप की बहुचर्चित फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर में मुख्य विलेन का किरदार निभाया था । तिग्मांशु भी इस फिल्म में निगेटिव रोल में थे और इस फिल्म में उनके अभिनय की भी काफी तारीफ हुई थी और इसने को बिजनेस भी अच्छा किया था । इलस फिल्म को देश विदेश में कई पुरस्कार भी मिले थे । जहां तक मुझे याद पड़ता है कि अनुराग कश्यप ने भी किसी फिल्म में अभिनय किया है ।
नब्बे के दशक के एकदम शुरुआत में लमहे और उसके बाद फिल्म हिमालयपुत्र के साथ बतौर
सहायक निर्देशक जुड़े फरहान अख्तर इन दिनों बेहद कामयाब हीरो हैं । फरहान अख्तर ने सबसे पहले 1991 में फिल्म लमहे का सहायक निर्देशन किया लेकिन निर्देशक के तौर पर उनकी पहली फिल्म रही दिल चाहता है । इस फिल्म से फरहान अख्तर को एक नई पहचान तो मिली ही निर्देशक के तौर पर सम्मान भी मिला । इसके बाद फरहान अख्तर ने दो हजार चार में लक्ष्य फिल्म बनाई और उसी साल लीवुड में भी उनकी एंट्री हुई । उन्होंने ब्राइड एंड प्रीज्यूडिस के लिए गाने लिखे । फरहान बेहद प्रतिभाशाली हैं और अपने पिता जावेद अख्तर की तरह लेखन में भी सिद्धहस्त हैं । निर्देशक के तौर पर उन्होंने शाहरुख खान को हीरे लेकर फिल्म डॉन बनाई जो कारोबार के लिहाज से सुपर पर हिट रही थी । सहायक निर्देशक के तौर पर करियर शुरू करने के सत्रह साल बाद फरहान अख्तर ने दो हजार आठ में रॉक ऑन के साथ अपने अभिनय के करियर की शुरुआत की । इस फिल्म को दर्शकों ने काफी सराहा और जमकर पुरस्कार आदि मिले । इसके बाद फरहान अख्तर ने फिल्म  जिंदगी मिलेगी ना दोबारा में सह अभिनेता का रोल किया । जिंदगीना मिलेगीदोबारा में फरहानम के अभिनय की प्रशंसा हुई तो उनके हौसले बुलंद हो गए ।  उसके बाद को उन्होंने भाग मिल्खा भाग से अपने अभिनय के झंडे गाड़ दिए । अभी हाल ही में उनकी एक फिल्म आई है वजीर जिसमें उन्होंने सदी के महानायक अभिताभ बच्चन के साथ अभिनय किया है । फरहान ने निर्देशक और अभिनेता के मिश्रण का एक आदर्श प्रस्तुत किया जिसमें वो दोनों भूमिकाओं में सफल रहे हैं । उनके बाद ये फेहरिश्त लंबी होनी शुरू हो गई है ।  
अब सवाल यही है कि फिल्मों ने निर्देशकों ने अभिनय करना क्यों शुरू कर दिया है । जो सबसे पहली बात सतह पर दिखाई देती है वो है ग्लैमर और लोगों के बीच अपने को पहचाने जाने की चाहत । पर्दे के पीछे के प्रोड्यूसर के मन में कहीं ना कहीं ये आकांक्षा दबी होती है कि वो भी पर्दे पर दिखे और लोग उनको भी पहचानें। जैसे न्यूज चैनल में खबरों को बनाने वाले प्रोड्यूसर्स को कोई जानता नहीं है क्योंकि वो कभी टीवी स्क्रीन पर नजर नहीं आता है । उसी तरह फिल्मों में भी प्रोड्यूसरों और निर्देशकों को कोई जानता नहीं है । पोस्टरों पर उनका नाम अवश्य होता है लेकिन उनकी तस्वीर आदि कहीं नहीं छपती । प्रोड्यूसर निर्देशक को लगता होगा कि जो अभिनेता उनकी मर्जी से अभिनय करते हैं, उनके कहे अनुसार किरदार में ढलते हैं । फिर सफल होकर लाखों लोगों के दिलों पर राज करते हैं तो क्यों ना वो खुद भी इस भूमिका में आएं । न्यूज चैनल के प्रोड्यूसर्स पर तो पेशगत व्यस्तता भी होती है क्योंकि उनको कई और काम करने होते हैं ।  लेकिन जो खुद फिल्म बना रहा है या जो खुद फिल्मों में पैसे निवेश कर या करवा रहा है उसको अभिनय करने से कौन रोक सकता है । एक तो ये मानसिकता हो सकती है जो निर्देशकों को अभिनय की ओर खींच कर लेकर आती है । दूसरी बात ये हो सकती है कि कुछ निर्देशकों को लगता होगा कि अभिनेताओं को बताने के बाद भी अगर वो किरदार को पर्दे पर सही तरीके से उतार नहीं पा रहे हैं तो वो खुद उस किरदार में घुसकर उसको जीवंत कर सकते हैं । यह सोच भी निर्देशकों के अभिनेता बनने की राह तैयार करती है । एक और बात है वो ये कि जब से हिंदी फिल्मों में चॉकलेटी हीरो का दौर खत्म हुआ है और हर तरह के चेहरे मोहरे, काले गोरे हीरो हिट होने लगे हैं तो निर्देशकों के सामने भी सुंदर होने या दिखने की बाध्यता खत्म हो गई है । उनको लगता है कि दर्शक को बेहतर अभिनय के आधार पर किसी भी अभिनेता को पसंद या नापसंद करते हैं । लिहाजा वो खुद से ये अपेक्षा करते हैं या मान लेते हैं कि किसी खास किरदार के लिए वही सबसे फिट हैं । अब अगर जय गंगाजल की बात की जाए और उसमें डीएसपी की भूमिका में प्रकाश झा की बात हो तो ये लगता है कि वो इस किरदार के लिए सबसे ज्यादा सुटेबल थे । जिस तरह से उन्होंने लखीसराय के अधेड़ और घूसखोर सर्कल बाबू की भूमिका निभाई है उसमें वो फिट बैठते हैं । फिर अब तो कम उम्र हीरो के सफल होने की बात भी बीते दिनों की बात हो गई । अब तो लगभग सभी सुपर स्टार पचास पार के हैं ऐसे में निर्देशकों को भी लगता है कि किसी भी उम्र में वो अभिनय करने के लिए उतर सकते हैं और अपनी सफलता का परचम लहरा सकते हैं ।