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Saturday, September 16, 2023

एक राष्ट्र, एक पुस्तकालय की चुनौतियां


पिछले कुछ समय से भारत सरकार पुस्तकों को लेकर सक्रिय दिख रही है। अगस्त में संस्कृति मंत्रालय ने प्रगति मैदान में पुस्तकालय उत्सव का आयोजन किया। इसका शुभारंभ राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने किया। पुस्तकालय उत्सव स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के दूसरे चरण का हिस्सा है। इसका उद्देश्य देश में पुस्तकालय संस्कृति और डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना और पढ़ने की संस्कृति का विकास करना भी है। संस्कृति राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने उस दौरान बताया था कि पुस्तकालय इतिहास और असीमित भविष्य की खाई को पाटने का काम करता है। उन्होंने ये भी कहा था कि पुस्तकालयों का विकास सरकार की प्राथमिकता है और वन नेशन वन डिजीटल लाइब्रेरी पर भी कार्य होगा। उन्होंने भौतिक और डिजिटल पुस्तकालयों के संतुलन पर बल दिया था। इसके अलावा संस्कृति मंत्रालय के सचिव और संयुक्त सचिव ने भी पुस्तकालयों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कई नीतिगत बातें की थीं। पुस्तकालयों की रैंकिंग से लेकर जिला स्तर तक पुस्तकालयों को समृद्ध और साधन संपन्न करने की बात की गई थी। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु ने भी पुस्तकालय उत्सव के शुभारंभ के अवसर पर पुस्तकालयों को समाज संस्कृति के विकास को जोड़कर देखा था। उन्होंने पुस्तकालयों को सभ्यताओं के बीच का सेतु भी बताया था। राष्ट्रपति महोदया ने पुस्तकालयों को सामाजिक संवाद, अध्ययन और चिंतन का केंद्र बनाने पर बल दिया था। उत्सव हुआ। वहां पुस्तकालयों कि स्थिति और संसाधनों को लेकर मंथन हुआ। ग्राम और सामुदायिक स्तर पर पुस्तकालयों की चर्चा हुई। कई तरह के सुझाव भी आए। क्रियान्वयन कैसे होगा ये देखना होगा।  

संस्कृति मंत्रालय के इस आयोजन के बाद शिक्षा मंत्रालय ने 11 सितंबर को एक आदेश जारी किया। उसमें बताया गया कि देश में पढ़ने की आदत का विकास, स्तरीय प्रकाशन को प्रोत्साहन, प्रकाशन व्यवसाय को दिशा और देश में खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालय आंदोलन को पुनर्जीवित करने के लिए फरवरी 2010 में एक टास्क फोर्स का गठन किया गया था। इसको समग्रता में राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति तैयार करने का कार्य सौंपा गया था। टास्क फोर्स से इक्कसवीं सदी की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नीति तैयार करने की अपेक्षा की गई थी। अब राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के चेयरमैन मिलिंद सुधाकर मराठे की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक 14 सदस्यीय समिति का गठन किया गया है जो राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति का फाइनल ड्राफ्ट तैयार करने में मदद करेगी। इस समिति से ये अपेक्षा की गई है कि वो राष्ट्रीय शिक्षा नीति को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति तैयार करे। इस समिति में चामू शास्त्री, प्रो कुमुद शर्मा, रमेश मित्तल, गरुड़ प्रकाशन के सक्रांत सानु, प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार, प्रो गोविंद प्रसाद शर्मा के अलावा आईआईटी खड़गपुर के निदेशक, एनसीईआरटी के निदेशक के अलावा सरकारी अधिकारियों को शामिल किया गया है। राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के महानिदेशक भी इस समिति में रखे गए हैं। 

समिति से ये अपेक्षा भी की गई है कि वो एक महीने के अंदर राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति के ड्राफ्ट का अवलोकन करे और उसको राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप करते हुए संशोधित करे। उसमें स्तरीय अनुवाद पर बहुत जोर दिया गया है। पुस्तकों का सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो और उनको स्कूलों और अन्य पुस्तकालयों तक पहुंचाने के बारे में सुझाव दिए जाएं। ग्रामीण क्षेत्रों में पुस्तकालयों की स्थापना और डिजीटल पुस्तकालय को कैसे गांवों से जोड़ा जाए या गांवों में डिजीटल पुस्तकालयों की स्थापना के तरीकों पर भी विचार हो और ठोस सुझाव आए। इस समिति को हर तरह की सहायता देने के लिए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास को जिम्मेदारी दी गई है। यहां यह बताना आवश्यक है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास का उद्देश्य भी पुस्तकों की संस्कृति और पाठकों के बीच पढ़ने की आदत का विकास करना है। ये संस्था यह कार्य पिछले छह दशक से अधिक समय से कर भी रही है।   

संस्कृति और शिक्षा मंत्रालय की पुस्तकालयों को लेकर पहल अच्छी है। उद्देश्य भी। शिक्षा मंत्रालय ने तो समिति का गठन कर दिया है और एक महीने का समय दिया है ताकि राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति को समग्रता में तैयार किया जा सके। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के पेश होने के तीन वर्ष बाद इस ओर मंत्रालय का ध्यान गया है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन तो एक संस्था पहले से बनी हुई है, राजा रामहोन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन। जिसका मुख्यालय कोलकाता में है। ये संस्था पुस्तकालयों के लिए पुस्तकों का खरीद करती है। राज्यों के पुस्तकालयों को पुस्तकों की खरीद के लिए अनुदान देती है। देश के अलग अलग इलाकों में पुस्तकालयों की स्थिति बेहतर करने के लिए अनुदान देती है। पुस्तकालयों के फर्नीचर से लेकर आधुनिकीकरण तक के लिए धन उपलब्ध करवाती है। जो पुस्तकें कापीराइट से मुक्त हो जाती हैं उनके डिजीटलीकरण के लिए भी संसाधन उपलब्ध करवाती है। पुस्तकालयों और पुस्तक व्यवसाय को केंद्र में रखकर अगर विचार किया जाए तो यह संस्था महत्वपूर्ण है। अब इस संस्था पर नजर डालते हैं। इस संस्था में पिछले दो वर्षों से अध्यक्ष नहीं है। कंचन गुप्ता को 2019 में अद्यक्ष बनाया गया था। दो वर्ष के बाद वो दूसरे दायित्व पर चले गए। उसके बाद से कोई अध्यक्ष नियुक्त नहीं हुआ। संस्कृति मंत्री जी किशन रेड्डी इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। उनके पास पर्यटन और पूर्वोत्तर विकास मंत्रालय भी है। वो तेलंगाना बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। उनकी व्यस्तता समझी जा सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी प्राथमिकता में राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन काफी नीचे है। परिणाम ये है कि 2020-21 के बाद पुस्तकों की खरीद नहीं हुई। इसके पहले भी दो वर्ष पुस्तकों की खरीद नहीं हुई। 

राजा रामहोन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में पुस्तकों की खरीद में काफी भ्रष्टाचार होता रहा है। सरकारी खरीद के लिए पुस्तकों को मूल्य को काफी बढ़ाकर रखा जाता है। एक कविता पुस्तक जो बाजार में दो सौ रुपए में उपलब्ध है उसको हजार रुपए में सरकारी खरीद में बेच दिया जाता था। इसको रोकने के लिए पुस्तक खरीद बंद करना उचित नहीं है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए ऐसे लोगों की समिति बनानी होगी जिनको पुस्तकों के बारे में पता हो, जो इस व्यवसाय को जानते हैं। ऐसे नियम बनाने होंगे जिसमे पारदर्शिता हो। संस्कृति मंत्री और मंत्रालय को समय निकालकर इसपर ध्यान देना होगा। उत्सव से माहौल बनेगा लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का पुस्तकालयों को लेकर जो विजन है उसको यथार्थ की भूमि पर उतारने के लिए गंभीरता से कार्य करना होगा। समय पर नियुक्तियां करनी होंगी। समय पर पुस्तकों की खरीद करनी होगी। प्रकाशकों को विश्वास में लेना होगा। पुस्तकालयों तक पुस्तक पहुंचे, इसकी व्यवस्था करनी होगी। राज्यों को जो अनुदान दिए जाते हैं उसमें स्तरीय पुस्तकों की खरीद हो इसके लिए नीति बनाकर क्रियान्वयित करनी होगी। तकनीक के बढ़ते प्रभाव को ध्यान में रखकर डिजीटल लाइब्रेरी बनानी होगी। अच्छी पुस्तकों के अधिकार खरीदकर उसको वहां उपलब्ध करवाना होगा। प्रकाशकों को इसके लिए प्रोत्साहन देना होगा। पुस्तक व्यवसाय से जुड़े कागज उद्योग, स्याही उद्योग, प्रकाशन संस्थानों के हितों का भी ध्यान रखना होगा। अगर देश में पढ़ने की आदत का विकास करना है तो स्कूली छात्रों की रुचियों तक पहुंचने का उपक्रम करना होगा। आज अगर देखा जाए तो पुस्तकालयों में जानेवालों की संख्या कम हो रही है उसको बढ़ाने के लिए रुचिकर कार्यक्रम करने होंगे। ई बुक्स और पुस्तक दोनों के बीच एक संतुलन स्थापित करना होगा ताकि हर व्यक्ति को अपनी सुविधानुससार पसंदीदा सामग्री पढ़ने को उपलब्ध हो सके। अगर ऐसा होता है तो पुस्तकालय महोत्सव और राष्ट्रीय पुस्तक प्रोन्नयन नीति आदि का लाभ हो सकेगा। अन्यथा ये रस्मी आयोजन बनकर रह जाएंगे।