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Saturday, December 27, 2025

धर्म-परंपराओ को अपनाना आवश्यक


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जब भी हिंदू धर्म या हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं तो विपक्षी दल विशेषकर वामपंथी और उनका इकोसिस्टम उछलने लगता है। वो धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत करने लग जाते हैं। इसी तरह से जब प्रधानमंत्री मोदी हिंदू धर्म की बात करते हैं या हिंदू या सनातन धर्म के प्रतीकों को रेखांकित करते हैं तो कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल के नेता इसको धर्म और राजनीति का घालमेल बताने लग जाते हैं। संविधान और उसके अनुच्छेदों को उद्धृत करने लगते हैं। दुनिया के अन्य देशों का उदाहरण देने में प्राणपन से जुट जाते हैं। जहां तक मुझे स्मरण है कि कुछ वर्षों पूर्व जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो एक रिपोर्ट आई थी जिसमें भारत में धार्मिक असहिष्णुता की बात की गई थी। अब तो अमेरिका में भी बदलाव की बयार देखने को मिल रही है। वहां खुल कर ईसाई धर्म की और उसकी रक्षा की विस्तार से बातें की जा रही है। पिछले दिनों अमेरिका में चार्ली किर्क की फ्रीडम टी शर्ट पहनने वाली एक महिला जेनी को जब सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किया गया तो पूरे अमेरिका में उसके समर्थन की लहर दौड़ गई। देखते देखते जेनी के समर्थन में ढाई लाख डालर से अधिक की क्राउड फंडिंग हो गई। उनका अमेरिका फेस्ट के मंच पर अभिनंदन किया गया। चार्ली किर्क अमेरिका का दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता था जो अमेरिकी समाज की परंपराओं  को लेकर निरंतर मुखर रहता था। इस वर्ष उनकी हत्या कर दी गई थी। अमेरिका में चार्ली किर्क को परंपरावादी माना जाता था। राष्ट्रपति ट्रंप से उनके करीबी रिश्ते थे।

अभी क्रिसमस बीता है। क्रिसमस के पहले अमेरिका में कमला हैरिस का एक वक्तव्य खूब वायरल हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति की चुनावी रैली में कमला ने कहा था ‘हाउ डेयर यू विश क्रिसमस’। करीब 15 दिनों तक कमला हैरिस के इस वीडियो को चलाकर उनकी आलोचना की गई। प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य कमला हैरिस और उनकी पार्टी को धर्म विरोधी बताने का था। ऐसा इसलिए भी लगता है कि व्हाइट हाउस ने क्रिसमस के अवसर पर एक्स पर पोस्ट किया, वी आर सेइंग मेरी क्रिसमस अगेन। इसके बाद क्रिसमस ट्री की फोटो और अमेरिका का झंडा लगया गया है। इस पोस्ट में क्रिसमस ट्री के आगे डोनाल्ड ट्रंप की फोटो थी और उनके आफिशियल हैंडल को टैग किया गया। इस पोस्ट को कमला हैरिस के लिए संदेश के तौर पर देखा गया। इतना ही नहीं डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक्स हैंडल से जो पोस्ट किया वो और भी मारक है- ‘सभी को मेरी क्रिसमस। उन नीच रैडिकल लेफ्ट को भी जो अमेरिका को ध्वस्त करने के हर संभव प्रयास से जुड़े हुए हैं लेकिन बुरी तरह असफल हो रहे हैं। अब हमारी कोई सीमा खुली हुई नहीं है, पुरुष महिलाओं के वस्त्र में नहीं हैं और कानून का पालन करवाने वाली एजेंसियां कमजोर नहीं हैं। हमारा स्टाक मार्केट रिकार्ड स्तर पर है। महंगाई नहीं है। बीते कल हमारी जीडीपी 4.3 पर थी जो उम्मीद से दो प्वाइंट अधिक है। टैरिफ से खरबों डालर मिले जिससे हम समृद्ध हुए। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा उच्चतम स्तर पर है। पूरी दुनिया में हमारा सम्मान बढ़ा है। भगवान! अमेरिका पर कृपा बनाए रखें।‘ ट्रंप का ये एक्स पोस्ट पूरी तौर पर राजनीतिक है और क्रिसमस और भगवान को केंद्र में रखकर लिखा गया है। कल्पना कीजिए अगर हमारे देश में प्रधानमंत्री मोदी या राष्ट्रपति इस तरह की पोस्ट लिख दें तो कैसा बवाल मचता। 

धर्म के नाम पर अमेरिका में इतना ही नहीं हो रहा है। व्हाइट हाउस ने 26 दिसंबर को राष्ट्रपति ट्रंप का एक वक्तव्य जारी किया जिसमें लिखा है कि आज रात को कमांडर इन चीफ के तौर पर मेरे निर्देश पर संयुक्त राज्य ने आई एस आई एस के नीच आतंकवादियों पर पूरी ताकत के साथ मारक हमला किया। ये वही आतंकवादी हैं जो पिछले कई दिनों से निर्दोष ईसाइयों पर हमला कर रहे हैं और उनकी जान ले रहे हैं। इस संदेश से ये स्पष्ट है कि पूरी दुनिया में अगर ईसाइयों पर कहीं हमला होगा तो अमेरिका उसमें प्रभावी हस्तक्षेप करेगा। इसकी एक पृष्ठभूमि है। दो नवंबर को ट्रंप ने नाइजीरिया सरकार को चेतावनी दी थी कि अगर वहां की सरकार इस्लामिक आतंकवादियों को ईसाई जनता को मारने से नहीं रोकेगी तो हर तरह के प्रतिबंध लगाए जाएंगे। ट्रंप ने अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया था। अगर नाइजीरिया सरकार अपने देश में निर्दोष और मासूम ईसाइयों की हत्या नहीं रोकती है तो हमलावरों पर उससे अधिक त्वरा से हमला होगा जैसे आतंकवादी वारदात को अंजाम देते हैं। ये वही दौर था जब ईसाई समुदाय के लोगों ने ट्रंप से नाइजीरिया में ईसाइयों की हत्या को रोकने की मांग की थी। अमेरिका के इस कदम को अगर कूटनीतिक स्तर पर देखा जाए तो जिस तरह से बंग्लादेश में हिंदूओं पर हमले हो रहे हैं वैसे में भारत को हिंदुओं की रक्षा का अधिकार मिलता है। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में कुटुंब प्रबोधन की बात कर रहा है। परिवार को जोड़ने और और परिवार की महत्ता पर बल देने का उपक्रम जारी है। इस कार्यक्रम से संघ विरोधियों के पेट में दर्द हो रहा है। कुछ लोग इसको आधुनिक सोच के विपरीत बताने में जुटे हैं। वो व्यक्तिगत अधिकारों और अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने के अधिकारों की बात करते हुए संविधान को बीच में लाते हैं। जबकि संविधान कहीं से भी कुटुंब का विरोधी नहीं है। कुछ दिनों पहले सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू दंपति को तीन बच्चा पैदा करने की सलाह दी थी। उस समय इसको लेकर खूब हंगामा हुआ । खुद को प्रगतिशील समझने और घोषित करनेवाले राजनीतिक विश्लेषकों ने मोहन भागवत की आलोचना की थी। अनेक प्रकार के तर्क दिए गए थे जबकि मोहन भागवत ने विशेषज्ञों की राय के आधार पर कहा था कि जिस समुदाय में जन्म दर तीन से कम होते हैं वो विलुप्त हो जाते हैं। प्रगतिशील और आधुनिकता का दंभ भरनेवालों को अमेरिका को देखना चाहिए। वहां परिवार, शादी, बच्चे की महत्ता पर खूब चर्चा हो रही है। एलान मस्क और अमेरिका के उफराष्ट्रपति जे डी वांस अपने बच्चों के साथ ओवल आफिस में देखे जाते हैं। गर्व से वो परिवार की बात करते हैं। प्रेस सेक्रेट्री कैरोलिन लेविट जब गर्भवती होती है तो इसकी घोषणा होती है। वहां समलैंगिक अधिकारों या लिवइन का हो हल्ला अब नहीं मच रहा है। अपनी जड़ों की ओर लौटने की बात हो रही है। अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुओं से तीन बच्चा पैदा करने की अपेक्षा कर रहा है तो न तो ये पुरातन सोच है और ना ही आधुनिकता विरोधी। आज वैश्विक स्तर पर अपनी परंपराओं और धर्म से जुड़ने का आग्रह बढ़ा है। इसको जो नहीं समझ पा रहे हैं वो हाशिए पर जा रहे हैं।    


Friday, February 10, 2023

आक्रांताओं के कारण प्रवेश पर पाबंदी


पिछले दिनों दक्षिण भारत की यात्रा पर गया था। यात्रा के दौरान त्रिवेन्द्रम स्थित श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर में दर्शन करके परिसर के उत्तरी गेट से बाहर निकल रहा था। गेट पर पहुंचकर देखा कि एक विदेशी महिला और पुरुष गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मी से कुछ अनुरोध कर रहे थे। वो बार बार अंग्रेजी में कुछ कह रहे थे और सुरक्षाकर्मी सिर्फ नो नो (नहीं-नहीं) कह रहे थे। हम उनकी बात सुनने के लिए रुक गए। जिज्ञासा थी कि सुरक्षाकर्मी किस बात के लिए मना कर रहे हैं और विदेशी पर्यटक का आग्रह क्या है। जब हम रुके तो सुरक्षाकर्मी उनसे कह रहे थे ओनली हिंदू। ये सुनकर विदेशी पर्यटक ने कहा कि आई एम अ हिंदू, आई डू योगा। आई नो कृष्णा, आई नो रामा एंड आई विलीव इन गाड। (मैं हिंदू हूं, मैं योग करता हूं और राम और कृष्ण को जानता हूं। मैं भगवान में विश्वास करता हूं।) इतना सुनने के बाद भी सुरक्षाकर्मी सहमत नहीं हो रहे थे और बार बार उनसे कह रहे थे कि ओनली हिंदू कैन गो ( सिर्फ हिंदू ही मंदिर परिसर में जा सकते हैं)। विदेशी पर्यटक लगातार हिंदू धर्म के बारे में अपनी जानकारी सुरक्षाकर्मियों से साझा कर रहे थे। अब उसके साथ की महिला ने भी कहना आरंभ कर दिया था कि वो भी योग करती है इसलिए वो भी हिंदू है। हमने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया लेकिन सुरक्षाकर्मी टस से मस नहीं हो रहे थे। थोड़ी देर तक दोनों की बातें सुनने के बाद सुरक्षाकर्मियों ने उनको अपने उच्चाधिकारियों के पास भेज दिया। पता नहीं उनको श्रीपद्मनाभस्वामी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला या नहीं। जब हम कोच्चि के डच पैलेस के अंदर श्रीमहाविष्णु मंदिर पहुंचे तो मंदिर के बाहर बोर्ड लगा था, ओनली हिंदूज आर अलाउड इनसाइड द टैंपल (मंदिर में सिर्फ हिंदूओं के प्रवेश की अनुमति है)। वहां भी विदेशी पर्यटक मंदिर के गेट तक जा रहे थे और बोर्ड देखकर वापस हो रहे थे।

इन दो मंदिरों को देखने के बाद मन में ये प्रश्न उठा कि मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित क्यों है। जबकि कहा ये जाता रहा है कि हिंदू धर्म, उपासना की पद्धति भर नहीं है, वह एक समग्र जीवन दर्शन और व्यवहार प्रक्रिया है। उसमें सकारात्मक स्वीकृतियों के साथ निषेधात्मक पक्षों के उन्नयन की गंभीर दृष्टि होती है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद से लेकर छांदोग्योपनिषद तक में धर्म के अर्थ को स्पष्ट किया गया है। ऋगवेद में तो धर्म का अर्थ निश्चित नियम या आचरण के तौर पर उल्लिखित है। ऋगवेद और अथर्ववेद में धर्मन् शब्द का उपयोग कई बार मिलता है। जैमिनी की परिभाषा के अनुसार वेदों में प्रयुक्त अनुशासनों के अनुसार चलना ही धर्म है। धर्म का संबंध उन क्रिया-संस्कारों से है, जिनसे आनंद मिलता है और जो वेदों द्वारा प्रशंसित और प्रेरित हैं। मनुस्मृति में भी कहा गया है आचार: परमो धर्म:। धर्म की परिभाषा को लेकर, इसको उपादानों को लेकर, इसके सूत्रों को लेकर, इसके सूत्रग्रंथों को लेकर विपुल सामग्री उपलब्ध है। लेकिन कहीं भी धर्म का अर्थ उपासना पद्धति नहीं मिलता है। धर्म को जीवन जीने की पद्धति के तौर पर ही देखा गया है। अगर हिंदू धर्म को जीवन जीने की पद्धति माना गया है तो उन विदेशियों का क्या किया जाए जो ये कहते हैं कि उनका तो हिंदू धर्म में विश्वास है, वो राम और कृष्ण में भी विश्वास रखते हैं। क्या वो मंदिरों में प्रवेश कर सकते हैं। इस बारे में व्यापक हिंदू समाज को विमर्श करना चाहिए। 

उससे भी महत्वपूर्ण ये जानना है कि हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश निषेध क्यों किया गया था। मंदिरों में केवल हिंदुओं को ही प्रवेश देने की व्यवस्था क्यों की गई थी। आज के संदर्भ में अगर इस प्रश्न को पूछा जाएगा तो जो खुद को कथित उदारवादी परंपरा के लेखक मानते हैं उनमें से अधिकतर इसका उत्तर जातिप्रथा और धर्मशास्त्रों में निर्दिष्ट जीवनपद्धतियों की एकांगी व्याख्या के आधार पर देंगे। कोई इसके लिए आर्य-अनार्य के सिद्धांत का सहारा लेगा तो कोई वर्ण या जाति व्यवस्था को इसका आधार बनाकर अपनी विद्वता का परिचय देने का प्रयास करेगा। क्या इस तरह के विचारों या तर्कों से सहमत हुआ जा सकता है। बिल्कुल नहीं। मंदिरों में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण रहा है विदेशी आक्रांताओं का मंदिरों पर हमला कर उसको तोड़ना, वहां संचित धन को लूटना और समाज के सांस्कृतिक केंद्र को तहस नहस करना। भारतीय संस्कृति में मंदिरों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। मंदिरों से नृत्य और कला का गहरा जुड़ाव रहा है। मुगल आक्रांताओं ने जब हमारे देश पर हमला किया और तो उनको मंदिरों की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता का अनुमान हो गया था। ये अकारण नहीं है कि मुगलकाल में मंदिरों पर हमले हुए, मंदिरों को तोड़ा गया। मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर सिर्फ हिंदुओं की आस्था को नहीं तोड़ा बल्कि उन्होंने भारतीय समाज के उस केंद्र को नष्ट करने का प्रयास किया जहां लोग संगठित होते थे। मुगलों ने मंदिरों के रूप में स्थापित सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्रों को तोड़कर भारतीय समाज को कमजोर करने का प्रयत्न किया था। समाज की ताकत पर प्रहार किया। भारतीय कला लोक के केंद्र मंदिर हुआ करते थे। जनता की आकांक्षाएं और उसके स्वप्न उन्हीं कलाओं में खुलते और खिलते थे। उत्तर भारत में मुगलों का प्रभाव रहा और वो सुदूर दक्षिण भारत तक अपना साम्राज्य स्थापित नहीं कर पाए थे तो इस कारण दक्षिण भारत के मंदिर उनसे सुरक्षित रहे। जब उत्तर भारत के मंदिरों को तोड़े जाने और उसको नष्ट करने की खबरें दक्षिण भारत तक पहुंची होंगी तो मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई होगी। इन बातों का प्रमाण को ढूंढे जाने की आवश्यकता है। दक्षिण भारत के मंदिर के पुजारियों या वहां पीढ़ियों से रह रहे सेवादारों से बात करने पर इस तरह की बातें सामने आती हैं। उत्तर और पश्चिम भारत के मंदिरों में भी गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने का प्रयास हुआ। कई मंदिरों में इस तरह की पाबंदी लगाई भी गई। उसके पीछे के कारण भी यही रहे कि मुगलों की सेना ने कई बार छलपूर्वक मंदिरों में प्रवेश करके उसको तोड़ने का कार्य किया। 

मुगलों के पराभव के बाद और अंग्रेजी राज के उदय के समय और कालांतर में उनके शासनकाल में भी मंदिरों का पौराणिक स्वरूप स्थापित नहीं हो सका। इसका कारण ये रहा कि मंदिरों पर अंग्रेज शासकों की लगातार नजर रहा करती थी। वहां होने वाली गतिविधियों पर, वहां होनेवाले धन संचय पर भी अंग्रेज नजर रखते थे। उनको लगता था कि मंदिर ही स्वाधीनता की गतिविधियों के केंद्र हो सकते हैं। अंग्रेजों ने मंदिरों के सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप को बदलने का प्रयत्न किया और मंदिरों को सिर्फ धार्मिक केंद्र के रूप में प्रचारित करना आरंभ कर दिया। उनके सांस्कृतिक स्वरूप और सामाजिक भूमिका पर पाबंदियां लगाई गईं। अंग्रेजी शासन वाले कालखंड में धर्म से जुड़ी बातों को तोड़ा मरोड़ा गया। आधुनिक और अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म की गलत व्याख्या करके उसको रिलीजन बनाकर आनेवाली पीढ़ियों के मानस में स्थापित कर दिया गया।

हिंदू समाज बहुत उदार रहा है और इसके अंदर से ही रूढ़ियों को खत्म करने को लेकर सुधारवादी पैदा होते रहे हैं। उन्होंने हिदू समाज में समय के साथ कई तरह के सुधार किए। इस तरह के कई मंदिर मिलेंगे जहां पहले गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित था लेकिन वहां अब इस नियम में ढील दे दी गई है और हर तरह के धर्मावलंबी उन मंदिरों में जा रहे हैं। ये उदारवादी दृष्टि समयानुसार व्यापक होती रहती है। 


Saturday, October 22, 2022

विकास और विचार से लौटेगा वैभव

 श्रीनगर के डल झील का किनारा, किनारे स्थित शेर-ए-कश्मीर क्नवेंशन सेंटर का विशाल परिसर, परिसर के लान में एक तरफ सजा मंच और सामने बैठे देश के विभिन्न हिस्सों से आए लेखक, साहित्यकार, फिल्मकार और कलाकार। ये सब मिलकर एक ऐसे वातावरण की निर्मिति कर रहे थे जो आज से तीन साल पहले सोचा भी नहीं जा सकता था। कुमांऊ लिटरेचर फेस्टिवल ने दो दिनों तक कश्मीर संस्करण का आयोजन करके एक ऐतिहासिक पहल की है। श्रीनगर में लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन और श्रीनगर और शोपियां में सिनेमा हाल का खुलना कश्मीर के सांस्कृतिक वैभव की पुनर्वापसी की ओर उठाया कदम कहा जा सकता है। पिछले कई दशकों से श्रीनगर में गोली-बारूद की गंध और निर्दोष नागरिकों की हत्या से आतंक का वातावरण बना था। इस वातावरण ने कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नेपथ्य में धकेल दिया था। कभी इसकी बात नहीं होती थी कि कश्मीर का शारदा पीठ, पूरी दुनिया में ज्ञान का ऐसा केंद्र था जिसके समांतर किसी और केंद्र का इतिहास में उल्लेख नहीं मिलता है।
साहित्योत्सव के दौरान प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबराय ने शारदा पीठ का न केवल उल्लेख किया बल्कि जोर देकर कहा कि शारदा पीठ दुनिया का पहला विश्वविद्यालय भी था। बिबेक देवराय की इस बात पर चर्चा होनी चाहिए और विद्वानों को इसपर अपना अपना मत रखना चाहिए। कश्मीर के शारदा पीठ की अपने समय में बड़ी प्रतिष्ठा थी। कई पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि पूरे देश के विद्वान जब किसी ग्रंथ की रचना करते थे तो वो उसकी स्तरीयता की परख के लिए शारदा पीठ आते थे। वहां के विद्वान उस ग्रंथ पर चर्चा करते थे और अगर उसमें मौलिक स्थापना होती थी तो उसको अपने तरीके से प्रमाणित करते थे। दुर्भाग्य से शारदा पीठ इस वक्त गुलाम कश्मीर का हिस्सा है।  

शारदा पीठ सिर्फ ज्ञान का केंद्र ही नहीं था बल्कि इस पीठ के नाम से एक लिपि भी उस दौर में प्रचलन में थी, जिसको शारदा लिपि के नाम से जानते हैं। ये माना जाता है कि शारदा लिपि का आरंभ दसवीं शताब्दी में हुआ था। कश्मीरी विद्वानों ने शारदा लिपि में विपुल लेखन किया था। शारदा लिपि में बहुत अधिक लिखा गया था और वहां के विद्वान लेखक अपनी रचनाओं को लेकर देश के अलग अलग हिस्सों में विमर्श के लिए गए भी थे। इसके अलावा देशभर के अलग अलग हिस्सों के विद्वान भी शारदा पीठ जाकर शारदा लिपि सीखकर अपने अपने क्षेत्रों में लौटते थे। फिर वो अपनी रचनाएं शारदा लिपि में लिखते थे। देशभर में कई ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहां आज भी शारदा लिपि में लिखे गए ग्रंथ सहेजकर रखे हुए हैं। कश्मीर में सिर्फ शारदा लिपि ही नहीं बल्कि संस्कृत भाषा और उसमें रचना करनेवाले विद्वानों की लंबी सूची है। नीलमत पुराण में विस्तार इसकी चर्चा है कि कैसे कश्मीर में वहां की जनता उत्सवों के माध्यम से अपनी पंरपराओं को और अपनी ज्ञान परंपरा को जीवंत बनाए रखती थी। काव्यप्रकाश के रचयिता मम्मट भी कश्मीर की धरती के ही सपूत थे। काव्यप्रकाश एक ऐसा ग्रंथ है जो अब भी साहित्य के अध्येताओं के सामने चुनौती बनकर खड़ा है। अबतक इस पुस्तक की असंख्य टीकाएं लिखी जा चुकी हैं लेकिन अब भी कई विद्वान इसमें वर्णित उल्लास और कारिकाओं की व्याख्या करने में लगे रहते हैं। बिबेक देवराय ने एक ऐसे मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया जिसके बारे में लगातार चर्चा होती है। संस्कृत के आलोचकों का कहना है कि इस भाषा में व्यंग्य साहित्य की कमी है। संस्कृत की इस कथित कमी को आलोचक इस भाषा के रचनात्मक लेखन की कमजोरी के तौर पर रेखांकित करते हैं। बिबेक ने इस संबंध में कश्मीर के ही एक लेखक क्षेमेन्द्र का नाम लिया और कहा कि उनकी रचनाओं में पर्याप्त मात्रा में व्यंग्य उपस्थित है। 

कश्मीर के इतिहास और उसकी परंपराओं पर पुस्तक लिखनेवाले निर्मलेंदु कुमार ने लिखा है कि भारत के प्रांतो में एकमात्र कश्मीर ही है जिसका मध्यकाल का पूरा प्रामाणिक इतिहास वहीं के विद्वानों द्वारा लिखा हुआ मिलता है। भारतवर्ष के अन्य प्रदेशवासियों की अपेक्षा कश्मीरियों में विशेष इतिहास-प्रेम रहा, जिससे उन्होंने अपने देश का शृंखलाबद्ध इतिहास लिख रखा है। कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की और उसके बाद जोनराज ने राजतरंगिणी का दूसरा खंड लिखा। आगे भी दो खंड लिखे गए। इस तरह से हम देखते हैं कि कश्मीर का साहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव अपने जमाने में शिखर पर था। भारत के स्वतंत्रता के कुछ समय पहले से और उसके कुछ दिनों के बाद से कश्मीर में जिस तरह की राजनीति की गई उसने भी यहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की विकास यात्रा को अवरुद्ध कर दिया। स्वाधीन भारत में कश्मीर एक ऐसा मुद्दा बना रहा जिसपर हमेशा से राजनीति होती रही। राजनीति भी ऐसी जिसको न तो प्रदेश की विकास की फिक्र थी और न ही विचारों के निर्बाध प्रवाह की। विकास और विचार दोनों बाधित हुए। विकास और विचार को बाधित करने के बाद वहां आतंक को केंद्र में लाने का कुत्सित प्रयास हुआ। आतंकवाद ने लंबे कालखंड तक न केवल कश्मीर की जनता को परेशान किया बल्कि उसको देश दुनिया से काटकर रखा। एक समय तो ऐसा भी आ गया था जब लगने लगा था कि कश्मीर हाथ से निकलने वाला है। वहां के हालात बेकाबू थे। कश्मीरी हिंदुओं की हत्या और उनके पलायन ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। जो धरती कभी शैव मत के दर्शन को शक्ति प्रदान करनेवाली रही, वो धरती जहां के लोग शिव और विष्णु के उपासक थे उसी धरती से हिंदू धर्म को माननेवालों को या तो मार डाला गया या उनको उस धरती को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया। इस तरह से कश्मीर की जनता को धर्म के आधार पर विभाजित करने का जो खेल स्वाधीनता के बाद से आरंभ हुआ था वो कश्मीरी हिंदुओं के पलायन के साथ अपने चरम पर पहुंचा। 

अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद से कश्मीर में जिस तरह से विकास के साथ साथ विचार का प्रवाह भी आरंभ हुआ है उसने एक उम्मीद जगाई है। कश्मीर में आयोजित कुमांऊ लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान स्थानीय कश्मीरी छात्रों की भागीदारी या स्थानीय लेखकों की उपस्थिति और सत्रों में हिस्सेदारी संतोषजनक रही। छात्रों में इस बात को जानने की उत्सुकता थी कि अन्य भाषाओं में क्या लिखा जा रहा है। अन्य प्रदेशों में किन बिंदुओं पर विमर्श होते हैं और उन विमर्शों से क्या निकलकर आता है। उनके अंदर सिनेमा की बारीकियों और उनसे जुड़े किस्सों को सुनने की भी ललक दिखाई पड़ रही थी। जब राज कपूर के सहायक निर्देशक रहे और बाद में ‘बेताब’ और ‘लव स्टोरी’ जैसी फिल्में बनाने वाले राहुल रवैल के सत्र में कश्मीरी युवकों की प्रश्नाकुलता देखते ही बनती थी। वो ये जानना चाहते थे कि जिस फिल्म के नाम पर कश्मीर में बेताब वैली है उसके निर्माता के उस वक्त के अनुभव क्या थे। जब राहुल रवैल ने बताया कि ‘बाबी’ फिल्म का कुछ हिस्सा डल झील के किनारे शूट हुआ था तो युवकों की जिज्ञासा और बढ़ गई। राहुल रवैल साहब ने भी विस्तार से अपनी बात रखकर उपस्थित श्रोताओं की जिज्ञासा शांत करने की कोशिश की। कश्मीर में इस तरह के आयोजनों से न केवल वहां के युवाओं के मन में उठ रहे प्रश्नों का शमन होगा बल्कि उनकी रचनात्मकता को विस्तार मिलेगा। भारत सरकार और कश्मीर प्रशासन दोनों को ये सोचना चाहिए कि विकास के साथ विचार का भी अगर प्रवाह होगा तो वो लोगों के मन मस्तिष्क को खोलेगा जो किसी समस्या के हल के लिए आवश्यक अवयव है।