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Saturday, January 7, 2023

अनियमितताओं के भंवर में अकादमी


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वायत्त संस्था है, ललित कला अकादमी। इस संस्था का मुख्यालय नई दिल्ली में है। देशभर में इस संस्था के कई क्षेत्रीय केंद्र हैं। इसकी स्थापना 1954 में हुई थी। इसकी परिकल्पना राष्ट्रीय कला अकादमी के रूप में की गई थी। अकादमी के गठन का उद्देश्य सृजनात्मक दृश्य कलाओं के क्षेत्र में क्रियाकलापों को प्रोत्साहित और समन्वित करते हुए देश की सांस्कृतिक एकता का प्रोन्नयन करना है। अपने स्थापना के बाद के दशकों में ललित कला अकादमी ने काफी महत्वपूर्ण कार्य किया। अकादमी के संग्रह में कई अनमोल कलाकृतियां हैं। पिछले करीब तीन दशक से ललित कला अकादमी विवादों में घिरी रही है। कभी उसके संग्रह की कलाकृतियों के गायब होने की खबर आती रही तो कभी उचित रखरखाव के आभाव में कलाकृतियों के खराब होने की। नई दिल्ली के गढ़ी केंद्र में अवैध कब्जे के समाचार भी आए थे। इसके पूर्व अध्यक्ष और हिंदी के कवि अशोक वाजपेयी पर सीबीआई की जांच भी हुई थी या हो रही है। इस जांच का निष्कर्ष क्या रहा ये सार्वजनिक नहीं हो पाया है। अकादमी के सचिव रहे सुधाकर शर्मा भी विवाद में घिरे थे। अशोक वाजपेयी के कार्यकाल में पहले हटाए गए फिर बहाल किए गए। अशोक वाजपेयी के बाद के के चक्रवर्ती को ललित कला अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया था। इनका कार्यकाल भी बेहद विवादित रहा। विवाद इतना बढ़ा था कि मंत्रालय ने इनको बर्खास्त करके ललित कला अकादमी को अपने अधीन कर लिया था। उसके बाद मंत्रालय ने कृष्णा शेट्टी को ललित कला अकादमी का प्रशासक नियुक्त किया था। फिर मंत्रालय के संयुक्त सचिव प्रोटेम चेयरमैन बनाए गए। प्रोटेम चेयरमैन बनाए जाने को लेकर भी विवाद हुआ था। 

इन विवादों के बीच महाराष्ट्र के उत्तम पचारणे को ललित कला अकादमी का चेयरमैन नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति और उनके कार्यकाल में वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर विवाद उठा और पूरा मामला अदालत तक गया। जो अभी विचाराधीन है। इस बीच उत्तम पचारणे का कार्यकाल समाप्त हो गया। उनको छह महीने का सेवा विस्तार मिला था ताकि नए अद्यक्ष का चययन हो सके। लेकिन ऐसा नहीं हो सका तो संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव उमा नंदूरी को मंत्रालय ने ललित कला अकादमी की चेयरमैन का कार्यभार सौंप दिया। अकादमी की इस पृष्ठभूमि का बताने का आशय सिर्फ इतना है कि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध इस संस्था में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। उपरोक्त सारी बातें तो मीडिया में आईं थीं लेकिन अभी कुछ दिनों पहले भारत सरकार के लेखा परीक्षा के महानिदेशक कार्यालय ने ललित कला अकादमी की आडिट की थी। 14 अक्तूबर 2022 को ओबीएस 446867 के अंतर्गत लेखा परीक्षकों ने जो रिपोर्ट दी उसमें भारी वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितता की बात सामने आई है। 

लेखा परीक्षक ने अपने आडिट रिपोर्ट में वाहन किराए पर लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि बगैर किसी टेंडर के गाड़ियों को किराए पर लिया जाता रहा। जबकि नियमानुसार बगैर टेंडर के अकादमी वाहन किराए पर नहीं ले सकती है। कोविड के समय भी स्टाफ को लाने और छोड़ने के लिए जिन गाड़ियों को किराए पर लिया गया उसमें भी आडिट रिपोर्ट में खामियां पाई गई हैं। संस्कृति राज्य मंत्री के नाम पर ललित कला अकादमी ने एक गाड़ी किराए पर ली जिसका प्रतिमाह किराया 52 से 55 हजार रुपए भुगतान किया गया। लेखा परीक्षक के मुताबिक ये नियम विरुद्ध है। इस मद में अकादमी ने साढे छह लाख रुपए खर्च किए हैं। रिपोर्ट में इसको अविलंब रोकने की सलाह दी गई है। गाड़ियों के अलावा बिजली बिल के भुगतान में भी अनियमितता पाई गई है। लेखा परीक्षक की रिपोर्ट में जो सबसे बड़ी खामी पाई गई है वो ये है कि अकादमी ने सांस्कृतिक संस्थाओं को बगैर उपयोग प्रमाण पत्र के आर्थिक सहयोग दिया। नियम के मुताबिक जब किसी सांस्कृतिक संस्था को किसी प्रकार की आर्थिक मदद दी जाती है तो उसको अकादमी में उस धनराशि के उपयोग का प्रमाण पत्र जमा करना होता है । उसके बाद ही उसको फिर से आर्थिक सहायता दी जाती है लेकिन इस नियम की धज्जियां उड़ा दी गई। करीब 25 करोड़ की धनराशि का उपयोग प्रमाण पत्र अकादमी के रिकार्ड में नहीं है। 

वित्तीय अनियमितताओं की कहानी यही नहीं रुकती है। अकादमी अपने कर्मचारियों को किसी कार्य के लिए अग्रिम धनराशि देती है। नियम है कि बगैर इस राशि का हिसाब दिए दूसरी बार किसी को अग्रिम धनराशि नहीं दी जा सकती है। लेकिन अकादमी में 31.3.2022 तक 133 केस पेंडिंग है जिसका हिसाब नहीं दिया गया था। लेखा परीक्षकों ने इसपर प्रश्न उठाए हैं। पूर्व अध्यक्ष उत्तम पचारणे से लेकर क्षेत्रीय सचिवों और कई कर्मचारियों के नाम भी अग्रिम धनराशि पेंडिंग है जिसका हिसाब नहीं दिया गया है। लेखा परीक्षकों की इस रिपोर्ट में गड़बड़ियों की लंबी फेहरिश्त है जिसमें लैपटाप खरीद में गड़बड़ी, वकीलों की फीस में अनियमितता, बिना किसी अनुमति के मुख्यालय और गढ़ी केंद्र पर 173 सुरक्षा गार्डों को काम पर रखना, 12 लाख से अधिक के ओवरटाइम में गड़बड़ी, नियम विरुद्ध नियुक्तियां और वेतन निर्धारण, विज्ञापन पर एक करोड़ से अधिक खर्च आदि आदि। एक बड़ा ही गंभीर मसला इस रिपोर्ट में है। इस वक्त ललित कला अकादमी के प्रभारी सचिव रामकृष्ण वेडाला हैं। रिपोर्ट में है कि 2019 में ये बगैर मंत्रालय की अनुमति के मैक्सिको की यात्रा पर गए। जबकि मंत्रालय ने अकादमी को पत्र लिखकर निर्देश दिया था कि सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बगैर वो विदेश नहीं जाएं। लेकिन ललित कला अकादमी के प्रभारी सचिव ने भारत सरकार के दिशा निर्देश की अनदेखी की। इसका संज्ञान भी मंत्रालय को लेना चाहिए। अकादमी के स्टाक पर भी लेखा परीक्षकों ने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

केंद्रीय व्यय के महानिदेशक लेखा परीक्षक कार्यालय ने ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों में जो अनियमितताएं पाईं है वो बेहद गंभीर हैं। संस्कृति मंत्रालय को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। साहित्य, कला और संगीत के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाओं को स्वायत्ता दी जानी चाहिए लेकिन जब करदाताओं के पैसे का अपव्यय सामने आए या उसका दुरुपयोग दिखे तो सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। इस वक्त अकादमी के अध्यक्ष का कार्यभार संभाल रहीं संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव उमा नंदूरी से ये अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि लेखा परीक्षकों की रिपोर्ट में जिन अनियमितता और गड़बड़ियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है उनपर कार्रवाई करेंगी। बगैर उपयोग प्रमाण पत्र के आर्थिक मदद का हिसाब किताब लिया जाएगा। इन गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ भी नियमानुसार दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। 

संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध संस्थाओं में नियुक्ति की प्रक्रिया भी तेज करनी होगी। कई महीनों से ललित कला अकादमी में अध्यक्ष और सचिव का पद खाली है। इसको अविलंब भरने की आवश्यकता है। दरअसल इन संस्थाओं के नियमित चेयरमैन, सचिव या निदेशक के नहीं होने के कारण वहां अराजकता का माहौल बन जाता है। ललित कला अकादमी के अलावा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में नियमित निदेशक नहीं होने की वजह से अराजकता जैसा माहौल है। कुछ दिनों पहले प्रभारी निदेशक ने कुलसचिव को सेवामुक्त करने का आदेश दे दिया था जिसकों कुछ ही घंटों में वापस लेना पड़ा था। राष्ट्रीय महत्व के इस संस्थान में नियमित निदेशक नहीं होने के कारण नियमित शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। नुकसान छात्रों और संस्था का हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय के अधीन कई संस्थाएं ऐसी हैं जहां कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। संस्कृति मंत्री को स्वयं रुचि लेकर इन पदों को भरने का उपक्रम आरंभ करना चाहिए। 


Saturday, December 4, 2021

ललित कला अकादमी में विद्रोह


भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक स्वयायत्त संस्था है ललित कला अकादमी। इस संस्था का शुभारंभ 5 अगस्त 1954 को उस समय के शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने किया था। इसका उद्देश्य चित्रकला, मूर्तिकला आदि के क्षेत्र में अध्ययन और शोध को बढ़ावा देना है। इसके अलावा क्षेत्रीय कला और कलाकारों के बीच संवाद का मंच प्रदान करना भी एक उद्देश्य है। इस वक्त इस संस्था के प्रोटेम (अस्थायी) अध्यक्ष उत्तम पचारणे हैं। इनका तीन वर्ष का कार्यकाल खत्म होने के बाद इनको इस वर्ष जून में छह महीने के लिए अस्थाई अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। ललिता कला अकादमी के संविधान में छह महीने के अस्थाई अध्यक्ष का प्रावधान है ताकि वो नए अध्यक्ष के चयन की औपचारिकताएं पूरी करवा सकें। ललित कला अकादमी पिछले कई वर्षों से अपने उद्देश्यों से भटक गई प्रतीत होती है। पिछले कई वर्षों से अकादमी लगातार विवादों में रही है। अकादमी से एम एफ हुसैन की पेंटिंग गायब होने की घटना सुर्खियों में रही थीं। अकादमी से मूल्यवान पेंटिंग्स के गुम होने को लेकर आरोप प्रत्यारोप का लंबा सिलसिला चला। पूर्व के चेयरमैन पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। इस संस्था के अध्यक्ष रहे अशोक वाजपेयी के कार्यकाल के दौरान अनियमितताओं को लेकर सीबीआई जांच चल रही है। विवादों की इस शृंखला में इस संस्था का प्रशासन केंद्र सरकार ने अपने हाथ में भी लिया था। कुछ समय तक केंद्र से नियुक्त प्रशासक ने इसको चलाया। उस वक्त भी विवाद थम नहीं सका। 

ताजा विवाद अस्थाई अध्यक्ष के खिलाफ कार्यकारिणी के सदस्यों के विद्रोह का है। पिछले महीने की 25 तारीख को उपाध्यक्ष नंदलाल ठाकुर और कार्यकारिणी के सदस्यों ने संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव को एक पत्र लिखकर अध्यक्ष के असंवैधानिक कामों के बारे में उनका ध्यान आकृष्ट किया। अपने पत्र में इन लोगों में स्पष्ट रूप से अकादमी के अध्यक्ष उत्तम पचारणे पर ललित कला अकादमी के संविधान के हिसाब से काम नहीं करने का आरोप लगाया है। उस पत्र में आरोप है कि उत्तम पचारणे कार्यकारिणी के निर्णयों को बदलकर कार्यक्रम आयोजित करवा रहे हैं। कार्यकारिणी ने जिन कार्यक्रमों को तय किया है उसको नहीं करवा कर दूसरे कार्यक्रम करवा रहे हैं। उपाध्यक्ष और कार्यकारिणी के सदस्यों ने अपने पत्र में मंत्रालय को लिखा है कि उत्तम पाचरणे ने दिल्ली में आयोजित होनेवाले प्रिंट बिनाले को बगैर कार्यकारिणी की मंजूरी के मुंबई में कराने का आदेश जारी कर दिया है। अकादमी का संविधान उनको ऐसा करने की अनुमति नहीं देता है।  इसके अलावा स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर मुंबई में किए जानेवाले आर्ट कैंप का नाम बदलकर अनसंग हीरो-छत्रपति शिवाजी के नाम से कराने का फैसला किया है। कार्यकारिणी के सदस्यों ने छत्रपति शिवाजी को अनसंग हीरो कहे जाने का विरोध किया लेकिन अस्थाई अध्यक्ष सुनने को राजी नहीं थे।अस्थाई अध्यक्ष ने बैठक में घोषणा की कि वो इसको मुंबई के जे जे स्कूल आफ आर्ट में अपनी जिम्मेदारी पर आयोजित करवा रहे हैं। यह भी अकादमी के संविधान के खिलाफ निर्णय है। 

इस पत्र में ये आरोप भी लगाया गया है अस्थायी अध्यक्ष कार्यक्रमों के आयोजन में मनमानी करते हैं और कार्यकारिणी को विश्वास में नहीं लेते हैं। ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को लेकर मंत्रालय जांच करेगी या नहीं ये भविष्य में पता चलेगा। अगर जांच होती भी है तो संभव है कि जांच  आरंभ होने तक अस्थायी अध्यक्ष का छह महीने का कार्यकाल समाप्त हो जाए। उनका छह महीने का कार्यकाल इस महीने ही पूरा हो रहा है। जिस काम, नए अध्यक्ष के चुनाव, के लिए अस्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति की गई थी उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है। सर्च कमेटी बनी या नहीं इस बारे में भी अकादमी की बेवसाइट पर कोई जानकारी नहीं है। अगर दिसंबर में अस्थाई अध्यक्ष का कार्यकाल बगैर नए अध्यक्ष के चयन के खत्म हो जाता है तो क्या एक बार फिर से अस्थाई अध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी। क्या संस्कृति मंत्रालय फिर से उत्तम पचारणे के नाम की सिफारिश राष्ट्रपति से करेगी और राष्ट्रपति उसको मान लेंगे। अगर ऐसा होता है तो यह नियमों की खामियों की आड़ लेना होगा। तब सवाल ये भी उठेगा कि क्या उत्तम पचारणे तबतक ललित कला अकादमी के अस्थाई अध्यक्ष बने रहेंगे जबतक कि नए अध्यक्ष का चयन नहीं हो जाता है। नियमों की खामियों की आड़ लेकर ऐसा होता है तो फिर अस्थाई अध्यक्ष नए अध्यक्ष का चयन क्यों होने देगा। इसके पहले जब उत्तम पचारणे नियमित अध्यक्ष थे तब भी उन्होंने अपना कार्यकाल तीन साल से पांच साल करने का प्रस्ताव मंत्रालय को भेजा था जिसपर संस्कृति मंत्रालय की मुहर नहीं लग पाई थी। तब उत्तम पचारणे को पद छोड़ना पड़ा था लेकिन कुछ ही दिन बाद संस्कृति मंत्रालय ने अस्थाई अध्यक्ष के तौर पर उत्तम पचारणे के नाम का अनुमोदन कर राष्ट्रपति को भेज दिया था। 

दरअसल अगर देखा जाए तो उत्तम पचारणे की नियुक्ति के समय से ही विवाद आरंभ हो गया था। इनकी नियुक्ति में तय प्रक्रिया के पालन नहीं होने के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक केस चल रहा है। पर लंबी कानूनी प्रक्रिया की वजह से उसपर निर्णय कब आएगा इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है। ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को लेकर अन्य कई केस भी अदालत में लंबित हैं। करदाताओं के पैसे का जो सदुपयोग कला के विकास में होना चाहिए वो कानूनी पचड़ों में खर्च हो रहा है। नियुक्तियों में भी अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं। ललित कला अकादमी में काम रही एक महिला को बिना किसी आरोप पत्र के सस्पेंड कर दिया गया, वो केस भी अदालत में लंबित है। ललित कला अकादमी को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि अकादमी जितना धन मुकदमों की पैरवी में खर्च कर रही है उसमें तो कई कार्यक्रम या कार्यशाला आयोजित किए जा सकते हैं। 

ललित कला अकादमी में विवादों की शुरुआत एक तरह से नौकरशाह और कवि अशोक वाजपेयी के कार्यकाल से हुई। उन्होंने अपने कार्यकाल में कला के विकास के नाम पर कई ऐसे कार्यक्रम आरंभ किए जिसमें उन्होंने अपने मित्रों को बढ़ावा दिया। उनपर विदेशी कला प्रर्दर्शनियों में हिस्सा लेने को लेकर भी विवाद है। नियुक्तियों और गैलरी आवंटन को लेकर भी विवाद उठे थे। उसके बाद से तो जो भी इस पद पर आया उसमें से अधिकतर ने मनमानी की। ललित कला अकादमी का संविधान है. जिसके हिसाब से इसके अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों को काम करना होता है। दिक्कत तब होती है जब इस संविधान के हिसाब से काम नहीं होता है। उत्तम पचारणे का कार्यकाल खत्म होने के पहले ही संस्कृति मंत्रालय ने नए अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए सक्रियता क्यों नहीं दिखाई। क्यों इस बात का इंतजार करते रहे कि अस्थाई अध्यक्ष नियुक्त करने की नौबत आए। संस्कृति मंत्रालय के नौकरशाहों ने इस मंत्रालय से जुड़ी संस्थाओं का बेड़ा गर्क करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अगर इन संस्थाओं में सही समय पर नियमित नियुक्तियां हों जाएंगी तो अफसरों को मनमानी का अवसर नहीं मिलेगा।  रिटायरमेंट के बाद राघवेन्द्र सिंह को सालभर के लिए संस्कृति सचिव बनाया गया था। उनसे उम्मीद थी कि वो कुछ बेहतर करेंगे लेकिन उन्होंने अपने सालभर के कार्यकाल में इन स्वायत्त संस्थाओं में कोई नियुक्ति नहीं की या नहीं होने दी। अगर इन संस्थाओं को विवादों से दूर रखना है तो इसके लिए स्पष्ट नियम बनाने होंगे। मंत्रियों को यह देखना होगा कि सही समय पर नियुक्तियां हों। संसद के चालू सत्र में राज्यसभा में सोनल मानसिंह ने संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं के शीर्ष पदों के खाली रहने का विषय उठाया है, देखते हैं उसका क्या असर होता है। 

Saturday, June 5, 2021

कलाकार को ठोस मदद की दरकार


कोरोना संक्रमण के दौरान पूरे देश में कलाकारों के सामने बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। ये संकट आर्थिक है लेकिन इसका असर उनके मानस पर भी पड़ने लगा है। जाहिर सी बात है कि अगर कलाकारों का मन और मानस शांत नहीं होगा तो कला का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। कोरोना की पहली लहर के दौरान भी कलाकारों के सामने आयोजन बंद होने से जीविकोपार्जन का संकट आ गया था। उस समय भी इस बात पर चिंता प्रकट की गई थी और संबधित व्यक्तियों ने इस संकट को दूर करने के लिए विमर्श भी किया था। तब संस्कृति मंत्रालय की तरफ से ये आश्वासन दिया गया था कि क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की एक सूची तैयार की जाएगी और उस सूची के आधार पर उनकी मदद की जाएगी। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से किन कलाकारों की मदद की गई या कितने कलाकारों को आर्थिक मदद दी गई ये ज्ञात नहीं हो पाया है। इन केंद्रों के माध्यम से मदद हुई भी या नहीं ये भी सवालों के घेरे में है। अगर सरकार ने इन केंद्रों के माध्यम से कलाकारों की मदद की तो उस योजना का प्रचार कला जगत के लोगों के बीच इस तरह से किया जाना चाहिए कि ज्यादातर लोग उसका फायदा उठा सकें। ये इस वजह से क्योंकि सबसे अधिक परेशानी में वो कलाकार हैं जो बड़े कलाकारों के साथ संगत करते हैं और आयोजन नहीं होने से उनकी आय का स्त्रोत सूख गया है। बड़े गायकों के साथ तबले से लेकर अन्य वाद्य यंत्रों पर परफॉर्म करनेवाले कलाकारों के सामने आर्थिक समस्या विकराल है क्योंकि उनकी नियमित आय बंद हो गई है। नाटक में भी यही स्थिति है। बड़ा कालाकर तो अपनी आय से जीवन चला रहा है लेकिन जो तकनीशियन हैं, जो लाइटमैन हैं, जो साउंड के कर्मचारी हैं या इसी तरह से नेपथ्य में रहकर काम कर रहे हैं वो परेशान हैं। अनुमान ये है कि नाटक से जुड़े वैसे कलाकार जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं उनकी संख्या दो फीसदी है जबकि बाकी अट्ठानवे फीसदी लोग नाटकों के मंचन से होनेवाली नियमित आय पर निर्भर रहते हैं। सरकार प्रोडक्शन और रिपर्टरी ग्रांट तो दे रही है लेकिन नेशनल प्रजेंस वाली संस्थाएं अभी तक मदद की आस में हैं।

अभी कुछ दिनों पहले संस्कार भारती ने कलाकारों की मदद के उपायों पर विचार के एक गोष्ठी का आयोजन किया था, जिसमें देशभर के कला और संस्कृति से जुड़े लोगों ने भाग लिया था। उस बैठक का स्वर भी यही था कि कलाकारों को अपेक्षित मदद नहीं मिल पा रही है, लिहाजा संस्कार भारती को पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी आगे आना चाहिए। इसी तरह से अन्य संस्थाएं भी कलाकारों की मदद कर रही हैं पर ये नाकाफी है। संस्कृति मंत्रालय को संकट के समय कलाकारों की मदद के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए। संकट के समय संकट से निबटनेवाली योजनाएं बनाई जानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर नीतिगत बदलाव भी किए जाने चाहिए ताकि कोई नियम मदद में बाधा न बन सके। कोरोना की पहली लहर के आने से लेकर अबतक कलाकारों को केंद्र में रखकर कोई ठोस योजना नहीं बन सकी है। 

संस्कृति मंत्रालय के 2001-22 के बजट को देखें तो उसमें चार सौ पचपन करोड़ रुपए कला संस्कृति विकास योजना, संग्रहालय के विकास, जन्म शताब्दियों के आयोजन आदि के लिए आवंटित किए गए हैं। इसके अलावा पूर्वोत्तर में संस्कृति से जुड़ी विभिन्न योजनाओं के लिए एक सौ दो करोड़ आवंटित किए गए हैं। इन दोनों राशियों को मिलाकर देखें तो करीब साढे पांच सौ करोड़ से अधिक की राशि संस्कृति मंत्रालय के पास है जिसको प्रशासनिक फैसलों से कलाकारों की मदद की तरफ मोड़ा जा सकता है। इस आवंटन के तहत मंत्रालय को कोई ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे कि देशभर के विभिन्न हिस्सों में फैले रूपकंर कला के कलाकारों को मदद मिल सके। संस्कृति मंत्राल के अधीन राष्ट्रीय स्तर पर काम करनेवाली जो अकादमियां हैं उनको भी आगे आकर मदद की पहल करनी चाहिए। संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी, साहित्य अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय आदि जैसी संस्थाओं को एक साथ आकर समन्वय बनाकर कलाकारों और लेखकों की मदद करने के लिए कार्ययोजना बनाकर काम करना चाहिए। इन अकादमियों ने पूर्व में भी आकस्मिक परिस्थितियों में कलाकारों की आर्थिक मदद की है। जैसे जब चेन्नई में बाढ़ आई थी और कई कलाकारों के वाद्य यंत्र आदि पानी से नष्ट हो गए थे, तब संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन ने अपनी पहल पर उनकी मदद की थी। इस वक्त कोरोना काल में इन अकादमियों की गतिविधियां भी लगभग ठप हैं। उनका व्यय भी न्यूनतम हो रहा है। बचे हुए धन को कलाकारों की मदद में उपयोग में लाया जा सकता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इस दिशा में सोचा जाए और उसको क्रियान्वयित किया जाए। 

इस काम में एक ही बाधा आ सकती है कि वो ये कि इन अकादमियों में से ज्यादातर में शीर्ष पद खाली हैं। संगीत नाटक अकादमी के चेयरमैन शेखर सेन का कार्यकाल 27 जनवरी 2020 को समाप्त हो गया लेकिन अबतक उस पद पर नियुक्ति नहीं हो सकी है। इसका असर काम काज पर पड़ता ही है। संगीत नाटक अकादमी के प्रतिष्ठित पुरस्कार 2018 के बाद घोषित नहीं हो सके हैं। 2018 का पुरस्कार 2019 में घोषित हुआ था जो अबतक कलाकारों को प्रदान नहीं किए जा सके हैं। ललित कला अकादमी के चेयरमैन उत्तम पचारणे का कार्यकाल पिछले महीने की 21 तारीख को समाप्त हो गया। तीन साल का उनका कार्यकाल काफी विवादित रहा। उनके कार्यकाल के समाप्त होने के पहले नियुक्ति की प्रक्रिया आरंभ हो जानी चाहिए थी जो हो नहीं सकी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की वेब साइट के मुताबिक इसके निदेशक वामन केंद्रे का कार्यकाल सितंबर 2018 में समाप्त हो गया और उसके बाद कार्यकारी निदेशक सुरेश शर्मा संस्थान चला रहे हैं। यहां पिछले साल चेयरमैन के पद पर परेश रावल की नियुक्ति हुई लेकिन निदेशक का पद विज्ञापित होने के बाद भी अबतक भरा नहीं जा सका। कला संस्कृति और साहित्य से जुड़ी कई ऐसी संस्थाएं हैं जहां शीर्ष पद खाली है। इन पदों के खाली रहने का बड़ा नुकसान ये है कि बड़े फैसले नहीं हो पाते हैं क्योंकि उसके लिए शीर्ष स्तर की मंजूरी आवश्यक होती है।

कोरोना संक्रमण के इस दौर में देश के सांस्कृतिक परिदृश्य पर जो संकट दिखता है उसको दूर करने के लिए दूरगामी योजनाएँ बनानी होंगी। यह ठीक बात है कि इस वक्त देश की प्राथमिकता अपने नागरिकों की जान की रक्षा करना, वायरस को फैलने से रोकने के उपाय करना और आसन्न खतरे से निबटने की योजना बना है। अब संक्रमण की दर कम होने लगी है, टीकाकरण की रफ्तार तेज हो रही है और स्थितियां सामान्य होती दिख रही हैं तो केंद्र सरकार को ज्यादातर कलाकारों की चरमरा गई आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान देने की नीति पर काम करना चाहिए। स्थितियां इस कदर बिगड़ चुकी हैं कि इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दखल देकर एक ऐसी नीति निर्माण की दिशा में पहल करनी होगी जिससे कोरोना जैसे संकट में कलाकारों के सामने जीवन जीने का संकट पैदा नहीं हो सके। कला और संस्कृति किसी भी देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। अगर हम विश्व के इतिहास पर नजर डालें या फिर अपने ही देश के पौराणिक काल में सांस्कृतिक गतिविधियों पर विचार करें तो यह पाते हैं कि किसी भी राष्ट्र की प्रतिष्ठा वहां के कलाकारों के माध्यम से संस्कृति के आंगन में खिलखिलाती हैं। सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाए, नीतिया बनाएं और नियुक्तियां करें ताकि समेकित योजना बनाकर उसका क्रियान्वयन हो सके। 


Saturday, December 7, 2019

संस्कृति को लेकर उदासीनता


हाल ही में एक सेमिनार में जाने का अवसर मिला जहां समाजशास्त्रियों को सुना। इस सेमिनार में संस्थाओं के बनाने और उसको सुचारू रूप से चलाने पर बात हो रही थी। सभी वक्ता अपनी-अपनी बात तर्कों के साथ रख रहे थे, ज्यादातर वक्ता नई संस्थाओं को बनाने के लिए तर्क दे रहे थे, कुछ तो मौजूदा संस्थाओं को कैसे अच्छे से चलाया जाए और उनको मजबूत किया जाए, इस बारे में दलीलें दे रहे थे, सलाह भी। लेकिन सबसे दिलचस्प तरीके से बात रखी एक एक बेहद अनुभवी समाजशास्त्री विद्वान ने, उन्होंने कहा कि संस्थाओं को बनाने को लेकर बहुत सारी बातें हुईं लेकिन वो इस बात को रेखांकित करना चाहते हैं कि संस्थाओं को कैसे कमजोर किया जा सकता है। संस्थाओं को कमजोर करने की बात करते-करते उन्होंने इसके दो प्रमुख अलिखित नियम बताए। उनका कहना था कि जब भी किसी संस्थान की भूमिका का समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाता है तो इसका बहुत ध्यान रखा जाता है। पहला अलिखित नियम ये कि संस्था के प्रमुख के पद पर किसी की नियुक्ति मत करो वो संस्था धीरे-धीरे इतनी कमजोर हो जाएगी कि अपने गौरवशाली अतीत को भी खो देगी और भविष्य में उसको अपने बनाए मानदंडों तक पहुंचने में भी लंबा वक्त लगेगा। दूसरा औजार ये है कि संस्था में ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करो जिसकी उस काम में रुचि नहीं है जो दायित्व उसको दिया गया हो। उनकी इन बातों को सुनते-सुनते मेरे दिमाग में उन संस्थाओं के नाम घुमड़ने लगे जो पिछले कई महीनों से खाली पड़े हैं और जिनको चलाने की जिम्मेदारी जिनपर है या जो उन संस्थाओं के प्रमुख कार्यकारी अधिकारी हैं।
ये माना जाता है कि मौजूदा सरकार शिक्षा और संस्कृति को लेकर बेहद संजीदा है और इन क्षेत्रों पर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान दिया जाता है। संस्कृति को लेकर बहुत बातें होती हैं लेकिन संस्कृति पर कितना ध्यान है इसपर आगे विचार किया जाएगा पर पहले हम समझ लें कि संस्तृति क्या है और उसका निर्माण कैसे होता है। कवि-लेखक रामधारी सिंह दिनकर ने संस्कृति पर बहुत गहराई से विचार किया है और उसपर काफी लिखा भी है। दिनकर ने लिखा है कि संस्कृति ऐसी चीज नहीं है जिसकी रचना दस बीस या सौ-पचास वर्षों में की जा सकती है। अनेत शताब्दियों तक एक समाज के लोग जिस तरह खाते-पीते, रहते-सहते, पढ़ते-लिखते, सोचते –समझते और राज-काज चलाते अथवा धर्म-कर्म करते हैं, उन सभी कार्यों से उनकी संस्कृति का उत्पन्न होती है। असल में संस्कृति जिन्दगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है जिसमें हम जन्म लेते हैं। संस्कृति वह चीज मानी जाती है जो हमारे सारे जीवन को व्यापे हुए है तथा जिसकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है। संस्कृति असल में शरीर का नहीं आत्मा का गुण है। सभ्यता की सामग्रियों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छूट जाता है तब भी हमाररी संस्कृति का प्रभाव हमी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है। दिनकर ने अपने इसी लेख में आगे लिखा है कि संस्कृति के उपकरण हमारे पुस्तकालय, संग्रहालय, नाटकशाला और सिनेमागृह ही नहीं, बल्कि हमारे राजनीतिक और आर्थिक संगठन भी होते हैं क्योंकि उन पर भी हमारी रुचि और चरित्र की छाप लगी होती है।
अब जरा हम इसपर ही विचार कर लें जिन उपकरणों की ओर दिनकर जी ने इशारा किया है। हमारे यहां राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय है, इसकी बहुत प्रतिष्ठा है, यहां से पढ़कर निकले बहुत सारे कलाकारों ने अपनी कला के माध्यम से ना केवल इस संस्थान का नाम रौशन किया बल्कि अभिनय कला को भी समृद्ध किया। ऐसे कलाकारों की बहुत लंबी सूची है और उनके नाम गिनाने का यहां कोई अर्थ नहीं है। अब इसपर विचार किया जाना चाहिए कि यहां निदेशक का पद दिसंबर 2018 से खाली है यानि संस्था को चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी जिसकी है वो व्यक्ति यहां लगभग ग्यारह महीने से नहीं है। इससे भी दिलचस्प कहानी है यहां के अध्यक्ष की। रतन थियम का कार्यकाल 2017 में समाप्त हो गया और तब से यहां नियमित अध्यक्ष नहीं है और संस्था के उपाध्यक्ष डॉ अर्जुनदेव चारण पर ही दायित्व संभाल रहे हैं। ये कहानी सिर्फ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की नहीं है। अब संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक और महत्वपूर्ण संस्था राष्ट्रीय अभिलेखागार पर विचार करते हैं। ये संस्था भारत सरकार के सभी अभिलेखों की संरक्षक है। इस संस्था में सालों से कोई नियमित महानिदेशक नहीं है, बीच में अल्प अवधि के लिए राघवेन्द्र सिंह को यहां का प्रभार मिला था लेकिन जल्द ही उनका भी तबादला हो गया। यहां का अतिरिक्त प्रभार संस्कृति मंत्रालय के अफसरों के पास रहा, अब भी है। एक और संस्था है राष्ट्रीय संग्रहालय। इस संस्था की जिम्मेदारी है ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और कलात्मक महत्व की पुरावस्तुओं एवं कलाकृतियों को प्रदर्शन, सुरक्षा और शोध के प्रयोजन से संग्रहीत करना। इस संस्था के मुख्य कार्यकारी का पद खाली है। एक और बेहद महत्वपूर्ण संस्था है जिसका नाम है नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय और इस संस्था के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं। 15 अक्तूबर 2019 को इसके निदेशक का प्रभार राघवेन्द्र सिंह को दिया गया है वो भी छह महीने के लिए या जबतक नए निदेशक की नियुक्ति नहीं हो जाती। राघवेन्द्र सिंह भारत सरकार में सचिव के पद से सेवानिवृत हो चुके हैं और सेवानिवृत्ति के बाद संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही सीईओ- डेवलपमेंट ऑफ म्यूजियम और कल्चरल स्पेस का पद संभाल रहे हैं। नियमित निदेशक नहीं होने से कामकाज पर असर पड़ रहा है इसकी छोटी सी झलक इसकी वेबसाइट को देखने से मिल सकती है जहां पुरानी जानकारी अबतक लगी हुई है।
संस्कृति मंत्रालय से इतर अगर बात करें तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय के कई संस्थाओं में भी उसके प्रमुख कार्यकारी नहीं हैं। एक संस्थान है राष्ट्रीय पुस्तक न्यास इसके निदेशक का पद भी रीता चौधरी का कार्यकाल खत्म होने के बाद से खाली पड़ा हुआ है। इस सरकार को हिंदी को प्रमुखता देने के लिए भी जाना जाता है लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय से संबद्ध संस्था है केंद्रीय हिंदी निदेशालय। इसमें वर्षों से नियमित निदेशक नहीं हैं और इसका काम अतिरिक्त प्रभार के जुगाड़ से ही चल रहा है। मैसूर में स्थित भारतीय भाषा संस्थान अपनी स्थापना के पचास साल मना रही लेकिन बगैर निदेशख के। इस महत्वपूर्ण संस्थान के निदेशक का पद खाली है। मानव संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत ही एक संस्थान है सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल तमिल। इसके निदेशक की जिम्मेदारी भी वहां के रजिस्ट्रार संभाल रहे हैं। दिनकर जी ने पुस्तकालय, संग्रहालय, नाटकशाला और सिनेमागृह को संस्कृति के उपकरण के तौर पर रेखांकित किया है। उनके इन औजारों के आधार पर इस विवेचन में सूचना और प्रसारण मंत्रालय की संस्थाओं पर नजर डालें तो वहां भी कई संस्थानों में प्रमुख के पद खाली हैं।
सबसे पहले अगर हम देखें तो फिल्म समारोह निदेशालय में नियमित निदेशक का पद महीनों से खाली पड़ा है। इस संस्था के पास अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आयोजन की जिम्मेदारी से लेकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के आयोजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। दूसरा संस्थान है, भारतीय जन संचार संस्थान जो आईआईएमसी के नाम से जाना जाता है, वहां के महानिदेशक का पद भी लंबे समय से खाली है। इस संस्थान की देश दुनिया में प्रतिष्ठा है लेकिन इसके भी महानिदेशक के पद पर प्रभारी हैं। इसके अलावा दूरदर्शन के निदेशक का पद खाली है, आकाशवाणी के निदेशक का पद इसी महीने के अंत में खाली हो जाएगा। हलांकि ये दोनों पद विज्ञापित हो गए हैं लेकिन अगर कुछ वक्त के लिए भी ये पद खाली रहते हैं तो संस्थान के काम-काज पर तो असर पड़ेगा। क्या इन संस्थानों में ये व्यवस्था नहीं है कि एक व्यक्ति के कार्यकाल खत्म होने के पहले ही दूसरे की नियुक्ति हो जाए, जैसा गृह सचिव या कैबिनेट सचिव के पद के लिए होता है। इस बात पर उच्चतम स्तर पर विचार किया जाना चाहिए कि इतने सारे संस्थानों के पद क्यों खाली हैं? क्या अफसर नहीं चाहते कि इन पदों को भरा जाए क्योंकि इनके नहीं भरे जाने का लाभ उनको अतिरिक्त प्रभार के रूप में मिलता है। या क्या मंत्रियों की रुचि नहीं है।
जिन मंत्रालयों के कामकाज से संस्कृति पर प्रभाव पड़ता है या यों कहें कि संस्कृति के निर्माण में जिनकी भूमिका है उनके प्रति इस तरह की उदासीनता का ये आलम प्रश्नाकुल कर देता है। अंग्रेजी में एक कहावत है कि अगर आप किसी को प्यार करते हैं तो उसको प्रदर्शित भी करें। इस कहावत को अगर हम अपनी संस्कृति से जोड़कर देखें और विचार करें तो यह कहा जा सकता है कि अगर हम अपनी संस्कृति से प्यार करते हैं तो हमें इसका प्रदर्शन भी करना चाहिए। ये प्रदर्शन कैसे होगा इसका सबसे बेहतर तरीका तो यही है कि हम संस्कृति के प्रति गंभीर रहें, गंभीर दिखें।

Saturday, September 21, 2019

संस्थाओं की चूलें कसने की कवायद


नरेन्द्र मोदी ने 2014 में जब प्रधानमंत्री के तौर पर देश की बागडोर संभाली तो संस्कृति मंत्रालय को लेकर खूब चर्चा होती रही। उनके पहले कार्यकाल के शुरुआती दो वर्षों में संस्कृति मंत्रालय के काम और उसके अधीन संस्थाओं में हुई नियुक्तियों को लेकर भी सवाल उठे। इस तरह की बातें भी हुईं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को इन संस्थाओं में बिठाया जा रहा है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में हुई नियुक्तियों पर तो सीताराम येचुरी तक ने सवाल खढ़े किए थे। लगातार सवाल उठते रहने का नतीजा यह हुआ कि मंत्रालय यथास्थितिवाद की राह पर चल पड़ा। फैसले लगभग बंद हो गए। जो जैसा चल रहा है चलने दो की प्रवृत्ति हावी हो गई। नियुक्तियां बहुत कम हो गईं। संस्कृति मंत्रालय के अधीन कई संस्थाओं के अध्यक्ष और निदेशकों की नियुक्तियां नहीं हुईं। तदर्थ व्यवस्था से संस्थाएं संचालित होती रहीं। पता नहीं कब से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में कार्यकारी चेयरमैन हैं। महीनों से इस संस्था में निदेशक का पद खाली है। दूसरे कार्यकाल में संस्कृति मंत्रालय में नए मंत्री आए, वो सक्रिय भी दिख रहे हैं लेकिन नई सरकार के गठन के साढे चार महीने बीतने के बाद भी उपरोक्त पध खाली पड़े हैं।
इस बीच कैबिनेट सचिवालय ने एक अधिसूचना जारी की जिसके मुताबिक पूर्व नौकरशाह राघवेन्द्र सिंह को संस्कृति से संबंधित महती जिम्मेदारी सौंपी गई । राघवेन्द्र सिंह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर हैं और संस्कृति मंत्रालय और वस्त्र मंत्रालय में सचिव रह चुके है। राघवेन्द्र सिंह को संस्कृति मंत्रालय में सीईओ-डीएमसीएस ( डेवलपमेंट ऑफ म्यूजियम और कल्चरल स्पेसेज) की जिम्मेदारी दी गई है। उनको भारत सरकार के सचिव के बराबर प्रशासनिक शक्तियां दी गई हैं और वो सीधे संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल को रिपोर्ट करेंगे। उनको राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अलावा उन सभी विषयों के अधिकार दिए गए हैं जो संग्रहालयों से संबंधित हैं। उनको राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक और राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान के कुलपति के तौर पर भी कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस अधिसूचना के पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को इंदिरा गांधी राष्ट्रय कला केंद्र और नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट का दौरा किया था। तब से ये उम्मीद जगी थी कि प्रधानमंत्री इन कलाओं के संरक्षण आदि को लेकर गंभीर हैं। फिर खबर आई कि लटियंस दिल्ली की सूरत बदलने की योजना पर काम हो रहा है और राघवेन्द्र सिंह को जिस कल्चरल स्पेसेज की जिम्मेदारी दी गई है उसमें नॉर्थ ब्लॉक और साउथ बल्क में बनने वाले म्यूजियम भी हैं।अब सवाल यह उठता है कि संस्कृति मंत्रालय के सचिव के अधिकारों में कटौती क्यों की गई। संस्कृति मंत्रालय में उपरोक्त संस्थानों का जिम्मेदार राघवेन्द्र सिंह को क्यों बनाया गया। कहते हैं ना कि कुछ तो वजहें रही होंगी कोई यूं ही वेबफा नहीं होता। संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों और जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय संस्कृति मंत्रालय के अफसरों के काम-काज से संतुष्ट नहीं थे। सस्कृति मंत्री भले नए आ गए हैं लेकिन अफसरों ने अबतक यथास्थितिवाद का रास्ता छोड़ा नहीं है। फैसलों में भी अब भी देरी हो ही रही है। सस्कृति मंत्रालय से जुड़ी कई संस्थाओं में तो इतनी अराजकता है कि अब उसपर सिर्फ चर्चा ही की जा सकती है क्योंकि कार्रवाई की उम्मीद लगभग खत्म सी होती जा रही है।
संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक संस्था है ललित कला अकादमी। ललित कला अकादमी में अव्यवस्थाओं का लंबा इतिहास है। केस मुकदमे भी खूब होते रहे हैं, अब भी चल रहे हैं। ललित कला अकादमी के दो पूर्व चेयरमैन अशोक वाजपेयी और के के चक्रवर्ती के खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है। बीच में यहां सी एस कृष्णा शेट्टी प्रशासक रहे। लेकिन बेहद दिलचस्प रहा मौजूदा चेयरमैन उत्तम पचारणे की चयन प्रक्रिया। जब चेयरमैन के लिए सर्च कमेटी बनी तो उसमें जे एस खांडेराव को प्रशासक ने नामांकित किया। सर्च कमेटी के दो अन्य सदस्यों का चयन राष्ट्रपति करते हैं संस्कृति मंत्री की सलाह पर। संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने 22 फरवरी 2018 को भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सदस्य और अंतराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे और प्रिंस ऑफ वेल्स, म्यूजियम के पूर्व निदेशक सदाशिव वी गोरक्षकर के नाम को राष्ट्रपति को भेजने की स्वीकृति दी जिसे राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया। सर्च कमेटी बन गई। सर्च कमेटी के सदस्य विनय सहस्त्रबुद्धे ने बगैर तिथि के एक पत्र संस्कृति मंत्रालय के तत्कालीन सचिव को भेजा जो मंत्रालय में 23 मार्च 2018 को प्राप्त हुआ। उस पत्र के माध्यम से विनय सहस्त्रबुद्धे ने संस्कृति मंत्रालय को सर्च कमेटी की तीन रिजोल्यूशन भेजे। रिजोल्यूशन पर विनय सहस्त्रबुद्धे के हस्ताक्षर हैं जिसमें 23 मार्च 2018 की तारीख है। दूसरे रिजोल्यूशन में विनय सहस्त्रबुद्धे और जे एस खांडेराव के हस्ताक्षर हैं और तीसरे रिजोल्यूशन में विनय और सदाशिव गोरक्षकर के हस्ताक्षर हैं। अब सवाल ये उठता है कि सर्च कमेटी की कोई बैठक हुई तो तीन रिजोल्यूशन क्यों बने? अगर सर्च कमेटी की बैठक नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई। इसके अलावा एक और प्रश्न और उठता है कि विनय सहस्त्रबुद्धे ने तीनों रिजोल्यूशन को अग्रसारित क्यों किया? सरकारी पत्र के मुताबिक चयन समिति के तीन सदस्य नियुक्त किए गए थे तो फिर इसके संयोजन की जिम्मेदारी तो मंत्रालय के किसी अधिकारी की होती या फिर ललित कला अकादमी के अफसर इसको आयोजित करते। 23 मार्च 2018 को ही मंत्रालय को नाम मिलता है और उसी दिन राष्ट्रपति को तीनों नाम भेज दिए जाते हैं। ये उस मंत्रालय में होता है जहां यथास्थितिवाद चरम पर है।  
इस सर्च कमेटी ने तीन नामों का पैनल भेजा था, सी एस कृष्णा शेट्टी, श्याम शर्मा और उत्तम पचारणे। कुछ वजहों से उस दौर में ललित कला अकादमी के लिए प्रोटेम चेयरमैन की नियुक्ति कर दी जाती है। फिर सस्कृति मंत्रालय की तत्कालीन अतिरिक्त सचिव सुजाता प्रसाद ने विनय सहस्त्रबुद्धे को पत्र लिखकर ललित कला अकादमी के अध्यक्ष पद के लिए ताजा पैनल भेजने का अनुरोध किया। यहां तो ठीक था कि मंत्रालय ने विनय सहस्त्रबुद्धे से अनुरोध किया तो उन्होंने पैनल का नाम भेजा। लेकिन इस बार दो नाम बदल गए थे। श्याम शर्मा और शेट्टी की जगह हर्षवर्धन शर्मा और सुभाष भुलकर का नाम आ गया था। उत्तम पचारणे सूची में बने रहे और उनका ही चयन भी हुआ। इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प है संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव (अकादमी) का 5 अगस्त 2018 को सर्च कमेटी के सदस्य एस वी गोरक्षकर के लिए एक ईमेल किया जिसमें उनसे अनुरोध किया गया कि जैसा कि फोन पर बात हुई है, रिजोल्यूशन की कॉपी, जो इस मेल के साथ संलग्न है, पर एस गोरक्षकर के हस्ताक्षर करवा दें। हस्ताक्षरित प्रति को वापसी मेल से भेजने की कृपा करें। इसको मोस्ट अर्जेंट समझें। अब ये किस रिजोल्यूशन की बात हो रही है क्योंकि पहले जो रिजोल्यूशन आए थे जिनमें तीन नाम सुझाए गए थे उसमें तो इनके हस्ताक्षर हैं।
यह अकेला मामला नहीं है। ललित कला अकादमी में स्थायी सचिव भी नहीं हैं। राजन श्रीपत फुलारी के सचिव पद छोड़ने के बाद से अस्थायी सचिव संस्थान का  कामकाज संभाल रहे हैं। इसके पहले एक प्रभारी सचिव विशालाक्षी निगम को इसी वर्ष मई में निलंबित कर दिया गया। 7 मई को निलंबन हुआ और 6 सितंबर को उनको ये बताया गया कि किन वजहों से उन्हें निलंबित किया गया है, यानि करीब चार महीने बाद। इतनी तरह की अराजकताएं वहां हैं जिसका असर ललित कलाओं पर भी पड़ रहा है। यह जानना भी दिलचस्प होगा कि पिछले सालों में ललित कला अकादमी में कितनी प्रदर्शनियां लगीं और उससे अकादमी को कितनी आय हुई। ललित कला अकादमी ने नया मेमोरेंडम ऑफ अडरस्टैंडिग को अंगीकार किया और उसके अनुसार गवर्निंग बॉडी और सामान्य परिषद का गठन होना था। लेकिन अकादमी की वेबसाइट के मुताबिक अबतक इन दोनों का गठन प्रक्रिया में है।
एक तरफ जहां प्रधानमंत्री कार्यालय संस्कृति को लेकर बेहद गंभीर हैं। राघवेन्द्र सिंह जैसे सक्षम अधिकारियों को जिम्मेदारी दी जा रही है वहीं दूसरी तरफ संस्कृति मंत्रालय के अधिकारी ललित कला अकादमी को लेकर इतनी लापरवाही बरत रहे हैं जिससे वहां अराजकता बढ़ती जा रही है। इस तरह की अराजकता सिर्फ ललित कला अकादमी में नहीं है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में भी स्थायी चेयरमैन और निदेशक नहीं होने से भी काम-काज पर असर पड़ रहा है और तदर्थवाद का बोलबाला है। राष्ट्रय महत्व की इन संस्थाओं को लेकर संस्कृति मंत्रालय के अफसरों की उदासीनता पर संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल को ध्यान देकर चूलें कसनी चाहिए। करदाताओं के पैसे की कहीं तो जवाबदेही होनी चाहिए।

Saturday, August 17, 2019

स्वायत्ता की आड़ में अराजकता


हाल ही में ललित कला अकादमी ने अपना स्थपना दिवस समारोहपूर्वक मनाया। दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में भारत सरकार के संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल समेत कला जगत के कई मूर्धन्य उपस्थित थे। अपने संबोधन में ललित कला अकादमी के अध्यक्ष और प्रतिष्ठित कलाकार उत्तम पचारणे ने संस्कृति मंत्रालय पर अकादमी के कामकाज में बाधा डालने की बात कही। मंत्री की मौजूदगी में कही गई उनकी इन बातों का मंत्री ने नोटिस तो लिया लेकिन बेहद संजीदगी से उन्होंने नसीहत दी कि इल तरह की बातें सार्वजनिक मंच से ना होकर आपसी संवाद के जरिए की जानी चाहिए। बात आई-गई हो गई लेकिन ललित कला अकादमी के अध्यक्ष की बातों से ऐसा लगा कि मंत्रालय और अकादमी के बीच सामंजस्य की कमी है। ये भी लगा कि कुछ तो है जिसकी परदादारी है और वो बाहर आने के लिए बेचैन है। दरअसल ललित कला अकादमी काफी समय से विवादों में रही है। अलग अलग समय पर अलग अलग कारणों से विवाद होते रहे हैं। अब तो अध्यक्ष ने साफ तौर पर कह दिया है कि मंत्रालय और अकादमी के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। तो ऐसे में मंत्रालय और अकादमी दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि संवादहीनता और कामकाज की बाधाओं को दूर किया जाए।
दिल्ली के रवीन्द्र भवन में तीन अकादमियां चलती हैं, संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी और साहित्य अकादमी। संगीत नाटक अकादमी अभी हाल में अपने पुरस्कारों को लेकर विवाद में रही। साहित्य अकादमी भी 2015 के बाद काफी चर्चा में रही है। पिछले दिनों इस तरह की खबरें आईं कि साहित्य अकादमी के प्रतिनिधिमंडल को चीन जाने की अनुमति संस्कृति मंत्रालय से नहीं मिली और इसकी वजह से लंबे समय से चीन के साथ चली आ रही विचार-विनिमय की परंपरा बाधित हुई। लेकिन ललित कला अकादमी का मामला इन दोनों अकादमियों से अलग है। इसके पूर्व सचिव सुधाकर शर्मा को लेकर भी काफी विवाद हुआ था। अशोक वाजपेयी जब ललित कला अकादमी के अध्यक्ष थे तो उन्होंने सुधाकर शर्मा को सचिव पद से हटा दिया था। फिर बहाली हुई, फिर हटाए गए। अशोक वाजपेयी का कार्यकाल भी विवादित रहा। उनपर भी कई तरह के आरोप लगे। इन आरोपों की सीबीआई जांच भी कर रही है। गवाहों के बयान आदि भी हो चुके हैं। सीबीआई चार्जशीट की प्रतीक्षा है। अशोक वाजपेयी के बाद के के चक्रवर्ती ललित कला अकादमी के अध्यक्ष बने। इनका कार्यकाल भी विवादित रहा, इनके समय में भी सुधाकर शर्मा को सस्पेंड किया गया। के के चक्रवर्ती भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और उनको बीच में ही हटाकर मंत्रालय ने ललित कला अकादमी को अपने अधीन कर लिया। ललित कला अकादमी के संविधान में ये प्रावधान है कि अगर मंत्रालय को ये लगता है कि वहां गड़बड़ियां हो रही हैं तो वो संस्थान के प्रशासन को अपने अधीन कर प्रशासक नियुक्त कर सकता है। मंत्रालय ने कृष्णा शेट्टी को अकादमी का प्रशासक नियुक्त कर दिया। प्रशासक का काम ललित कला अकादमी का चुनाव करवाकर महा-परिषद और कार्यकारी बोर्ड का गठन करवाना होता है। परंतु शेट्टी अपने कार्यकाल में इसका गठन नहीं करवा पाए। कृष्णा शेट्टी के बाद मंत्रालय ने अपने एक संयुक्त सचिव को प्रोटेम चेयरमैन नियुक्त कर दिया। ललित कला अकादमी के संविधान की किस धारा के अंतर्गत प्रोटेम चेयरमैन बनाए गए इसपर कलाकारों के बीच लंबे समय तक चर्चा होती रही थी। इन सबके बीच मामला कोर्ट में भी गया था लेकिन पता नहीं किन परिस्थितियों में महा-परिषद का चुनाव नहीं हो पाया। समय समय पर मंत्रालय के कई अधिकारियों को यहां का कामकाज देखने की जिम्मेदारी दी गई। थोड़ा वक्त और बीता और उत्तम पचारणे को यहां का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। अकादमी की बेवसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक अबतक महा-परिषद के सदस्यों का चुनाव नहीं हो पाया। जाहिर सी बात है कि जब महा-परिषद का गठन ही नहीं हो पाया तो कार्यकारी बोर्ड कैसे बनती, क्योंकि इसके कुछ सदस्य तो महा-परिषद के सदस्यों के बीच से ही चयनित होते हैं। महा-परिषद के नहीं होने से ललित कला अकादमी के कामकाज में पारदर्शिता नहीं दिखाई देती है। इनमें से ज्यादातर घटनाएं पूर्व संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के कार्यकाल में हुईं। सबसे दिलचस्प तो सुधाकर शर्मा का केस है। वो सचिव पद से कई बार हटाए और बहाल किए गए और आखिरकार जब वो रिटायर हुए तो सस्पेंड ही थे। स्वायत्ता के नाम पर अराजकता के उदाहरण के तौर पर ललित कला अकादमी के क्रियाकलापों को देखा जा सकता है।   
ललित कला अकादमी में इन तमाम विवादों को देखते हुए संसद में 17 दिसंबर 2013 को सस्कृति मंत्रालय से संबद्ध स्थायी समिति रिपोर्ट का स्मरण हो रहा है। संस्कृति संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपने 201वें प्रतिवेदन में अकादमियों के संबंध में कहा था, हमारे संस्थापकों ने संस्कृति को राजनीति से दूर रखने के लिए इन्हें स्वायत्ता दी थी, परंतु आज ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीति इसमें पिछले दरवाजे से गुपचुप तरीके से प्रवेश कर गई है। इन संस्थाओं के संस्थापकों को लेखकों और कलाकारों क समुदाय की एकता पर दृढ़ विश्वास था और आज वे इन संस्थाओं को बाधित करनेवाली समस्याओं का पूर्वानुमान नहीं लगा पाए। इसके परिणामस्वरूप प्रक्रिया में पारदर्शिता परिणाम से संबंध में जवाबदेही का अभाव है। वस्तुत: पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना उसकी स्वयत्ता एक दोधारी हथियार बन गई है जिसका कोई भी अरनी सुविधानुसार उपयोग कर सकता है। प्रशासनिक शब्दावली में जवाबदेही का अर्थ नियंत्रण नहीं है बल्कि वह जिम्मेदारी है जिसके लिए स्वयत्तता का प्रयोग किया जाना है।....संकट की यह स्थिति संस्कृति मंत्रालय की उदासीनता, ध्यान नहीं देने और कभी कभी असाहयता वाली भूमिका के कारण और भी गंभीर हो जाती है। मंत्रालय द्वारा उनके कार्यों में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोई तंत्र मौजूद नहीं है।संसद की इस समिति ने अध्यक्ष और सचिव के बीच कार्य विभाजन को स्पष्ट करने पर भी बल दिया था क्योंकि इनके गठन के दस्तावेजों इन दोनों के अधिकारों की सीमा अस्पष्ट थी। इसका नतीजा यह होता था कि कई बार अध्यक्ष ऐसी शक्तियों का उपयोग करने की चेष्टा करते थे जो उनको प्राप्त नहीं होती है और वो रोजमर्रा के कामकाज में सीधे हस्तक्षेप करने लगते थे। ललित कला अकादमी में तो स्थिति बहुत विषम है। वहां तो लंबे समय से महा-परिषद या कार्यकारी परिषद है ही नहीं लिहाजा अराजकता ज्यादा है। अध्यक्ष के निर्देशों के कार्यान्वयित करवाने में किसी प्रकार की चूक या नियमों के उल्लंघन के लिए सचिव जिम्मेदार होते हैं इस वजह से बहुधा दोनों के बीच तनातनी चलती रहती है। ललित कला अकादमी के सचिव के बार-बार सस्पेंड होने की वजह ये भी हो सकती है। संगीत नाटक अकादमी में भी सचिव पर गाज गिरी ही थी। वहां की सचिव रही हेलेन आचार्य का मामला तो कोर्ट-कचहरी तक गया था। इस समिति ने सरकार को इन अकादमियों के संविधान में स्पष्टता लाने के लिए एक हाई पॉवर समिति बनाने को कहा था। समिति बनी भी। उसने मई 2014 में अपनी रिपोर्ट भी दे दी। रिपोर्ट में ललित कला अकादमी के अध्यक्ष का कार्यकाल पांच वर्ष से तीन वर्ष तक करने की सिफारिश की गई। साथ ही अध्यक्ष को लगातार दो कार्यकाल देने पर भी आपत्ति जताई गई थी। हाई पवॉर समिति कि सिफारिशों के आधार पर ललित कला अकादमी के नए नियमों को मंत्रालय ने 26 अप्रैल 2018 को अधिसूचित कर दिया जिसका प्रकाशन भारत के राजपत्र में 27 अप्रैल को हो गया। इस बात को भी सालभर से ज्यादा हो गए लेकिन अबतक ललित कला अकादमी के महा-परिषद का गठन नहीं हो पाया है। चेयरमैन ही वहां के सर्वेसर्वा हैं और कोई नियमित सचिव भी नहीं हैं। एक सचिव नियुक्त भी हुए थे लेकिन वो कुछ ही दिनों में इस्तीफा देकर चले गए। जाहिऱ सी बात है कि इन सबकी अनुपस्थिति में चेयरमैन को असीमित शक्तियां मिली हुई हैं।
केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद संस्कृति के क्षेत्र में बड़ी चुनौती है। अकादमियों की वजह से जिस तरह से विवाद उठ रहे हैं उसके पीछे कई वजहें हैं। कुछ संस्थानों में निदेशक ऐऔर चेयरमैन नहीं हैं जैसे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में नियमित निदेशक का पद महीनों से खाली है और चेयरमैन भी नहीं है। अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार को एक ठोस संस्कृति नीति के बारे में विचार करना चाहिए। संस्कृति नीति के अभाव में इन सांस्कृतिक संस्थानों में तदर्थ आधार पर कामकाज हो रहा है। प्रह्लाद सिंह पटेल अनुभवी हैं और संस्कृति के क्षेत्र में रुचि लेते दिख भी रहे हैं तो उनसे ये अपेक्षा की जा सकती है कि वो देश की संस्कृति-नीति के निर्माण की दिशा में सकारात्मकता के साथ विचार करेंगे। इससे इन संस्थानों के काम-काज में तो पारदर्शिता आएगी ही भारतीय प्राच्य विद्या के संरक्षण और संवर्धन का काम भी गंभीरता से हो सकेगा।   

Saturday, June 2, 2018

संस्कृति को लेकर उदासीन सरकार


देश में जब जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी है तब-तब उसपर शिक्षा और संस्कृति के भगवाकरण के आरोप लगाए जाते रहे हैं। आरोप के साथ ये जरूर जोड़ा जाता है कि ये भगवाकरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कहने पर होता है। पाठ्यक्रम और स्कूली शिक्षा में बदलाव के आरोप भी आम रहे हैं। जब 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनी तो इन आरोपों की फेहरिश्त में एक इल्जाम और जुड़ गया। वो आरोप था शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं में दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों को बिठाने का यानि संस्थाओं को संघ से डुड़े लोगों के हवाले करने का। 2014 में जब स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया था तो उनपर भी इस तरह के आरोप लगे थे। अपने उपर लगे आरोपों पर स्मृति ईरानी ने संसद में उदाहरण समेत जोरदार तरीके से खंडन किया था और देश के सामने तथ्यों को सामने रख दिया था। दरअसल शिक्षा और संस्कृति को लेकर किसी भी तरह के सकारात्मक बदलाव को भी आरएसएस की चाल तक करार दिया जाता रहा है। मोदी सरकार के दौरान जब शैक्षणिक और सांस्कृति संस्थानों पर नियुक्तियां शुरू हुईं तो वामपंथी विचारधारा के लोगों को लगा कि इस क्षेत्र में उनका एकाधिकार खत्म होने लगा है तो वो और ज्यादा हमलावर होते चले गए। इमरजेंसी के समर्थन के एवज में इंदिरा गांधी ने शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थाओं को वामपंथी विचारधारा के लेखकों और कार्यकर्ताओं को अनौपचारिक रूप से सौंप दिया था। शिक्षा और संस्कृति को वामपंथियों को सौंपने का नतीजा यह रहा कि आज भारत में चिंतन परंपरा लगभग खत्म हो गई। इतिहासकारों ने नेहरू का महिमामंडन शुरू किया और उसके एवज में भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने अपने अनुवाद परियोजना में सीपीएण के महासचिव नम्बूदरीपाद की कृतियों का अनुवाद प्रकाशित किया। इसपर कभी हो हल्ला मचा हो, या पार्टी की विचारधारा को बढ़ाने के आरोप लगे हों, याद नहीं आता। इतने लंबे समय से जारी इस एकाधिकार को 2014 में जब चुनौती मिलने लगी तो विरोध स्वाभाविक था।
अगर हम वस्तुनिष्ठ होकर विचार करें तो 2014 के बाद मोदी सरकार ने इन संस्थाओं में जिन लोगों की नियुक्ति की उनकी मेधा और प्रतिभा पर किसी तरह का प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है, चाहे वो भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद में बी बी कुमार जी की नियुक्ति हो या इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में राम बहादुर राय और डॉ सच्चिदानंद जोशी की नियुक्ति हो, संगीत नाटक अकादमी में बेहतरीन कलाकार शेखर सेन को जिम्मेदारी दी गई हो या राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के चेयरमैन के तौर पर बल्देव भाई शर्मा की नियुक्ति। इन सब लोंगों ने अपने अपने क्षेत्र में लंबी लकीर खींची। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास में तो बल्देव भाई की अगुवाई में पूरे देश में पुस्तक संस्कृति के प्रोन्नयन के लिए इतना काम हुआ जो पहले शायद ही हुआ हो। गांवों तक पुस्तक मेले का आयोजन से लेकर संस्कृत के पुस्तकों का प्रकाशन तक हुआ। जहां इतनी सारी नियुक्तियां होती हैं वहां एकाध अपवाद भी होते हैं। यहां भी हुए।
यह आरोप भी पूरी तरह से गलत है कि आंख मूंदकूर सिर्फ उनकी ही नियुक्तियां की गईं जो भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के लोग थे। कई नियुक्तियां तो ऐसे विद्वानों की भी हुईं जो पूर्व में संघ और भारतीय जनता पार्टी के आलोचक रहे हैं। सरकार पर जिस तरह के हमले विरोधी विचारधारा के लोगों ने किए उसका एक नुकसान यह हुआ कि नियुक्तियों में सरकार धीमे चलने की नीति पर चलने लगी। अगर हम एक नजर डालें तो देख सकते हैं कि संस्कृति मंत्रालय के अधीन कई ऐसी स्वायत्त संस्थाएं हैं जिनमें काफी समय बीत जाने के बाद भी उनके प्रमुखों की और प्रशासकों की नियुक्ति नहीं हुई। ललित कला अकादमी इसका उदाहरण है जहां लंबे समय तक प्रशासक से काम चलाया गया। मंत्रालय के संयुक्त सचिव इसके कर्ताधर्ता रहे। इसकी गवर्निंग बॉडी को भारत सरकार ने भंग कर दिया और इस संस्था की बेवसाइट के मुताबिक अब तक इसका गठन नहीं हो सका है। अभी हाल में वरिष्ठ कलाकार उत्तम पचारने को इसका चेयरमैन नियुक्त किया गया है लेकिन अभी भी यहां स्थायी सचिव की नियुक्ति नहीं की जा सकी है। इसी तरह से अगर हम देखें तो सांस्कृतिक स्त्रोत और प्रशिक्षण केंद्र, जिसे सीसीआरटी के नाम से जाना जाता है, में चेयरमैन की नियुक्ति नहीं की जा सकी है। सीसीआरटी का काम शिक्षा को संस्कृति से जोड़ने का है। यह संस्कृति मंत्रालय संबद्ध एक स्वायत्त संस्था है। इस संस्था के बारे में उपलब्ध जानकारी है कि केन्द्र का मुख्य सैद्धांतिक उद्देश्य बच्चों को सात्विक शिक्षा प्रदान कर उनका भावात्मक व आध्यात्मिक विकास करना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सीसीआरटी संस्कृति पर आधारित शैक्षिक कार्यक्रमों का आयोजन करता है और उनमें विचारों की स्पष्टता, स्वतन्त्रता, सहिष्णुता तथा संवेदनाओं का समावेश किया जाता है।यह उद्देश्य तो संघ को अच्छा लग सकता है लेकिन एक वर्ष से ज्यादा समय से यहां कोई अध्यक्ष नहीं हैं। इतने महत्वपूर्ण संस्था का अध्यक्ष ना होना संस्कृति मंत्रालय के काम करने के तरीके पर प्रश्न खड़ा करता है और इस बात के संकेत भी देता है कि संघ इन नियुक्तियों में दखल नहीं देता है। इसी तरह से संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध एक और संस्था है राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, इसके चेयरमैन रतन थियम का कार्यकाल 2017 में खत्म हो गया लेकिन अबतक किसी की नियुक्ति नहीं हुई और संस्था बगैर अध्यक्ष के चल रही है। इस सूची में कई अन्य नाम और भी हैं। देश में पुस्तकों और पुस्तक संस्कृति के उन्नयन के लिए बनाई गई संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष ब्रज किशोर शर्मा का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है लेकिन उनकी जगह भी संस्कृति मंत्रालय ने किसी की नियुक्ति नहीं की है। नतीजा यह हो रहा है कि वहां लगभग अराजकता है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के दो ट्रस्टी फिल्मकार चंद्रप्रकाश द्विवेदी और पूर्व आईपीएस के अरविंद राव ने महीनों पहले इस्तीफा दे दिया लेकिन उनकी जगह संस्कृति मंत्रालय ने किसी को नियुक्त नहीं किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब पद संभाला था तो उन्होंने यह कहा था कि यथास्थितिवाद उनको किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है लेकिन कई मंत्रालयों को देखकर लगता है कि प्रधानमंत्री ने स्वयं वहां यथास्थितिवाद के देवताओं को स्थापित कर रखा है।
अब अगर एक नजर भाषा के विकास के लिए बनाई गई संस्थाओं पर डालते हैं तो वहां भी कई ऐसे संस्थान हैं जो बगैर अध्यक्ष या निदेशक के चल रहे हैं। हिंदी को लेकर ये सरकार बहुत संवेदनशील रही है। इसको संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने को लेकर भी सरकार ने इच्छाशक्ति दिखाई थी लेकिन केंद्रीय हिंदी निदेशालय में सालों से नियमित निदेशक नहीं हैं। पहले राष्ट्रीय सिंधी भाषा संवर्धन परिषद के निदेशक डॉ रवि टेकचंदानी इसका अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे थे और अब वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग के चेयरमैन अवनीश कुमार इसको संभाल रहे हैं। इसमें एक और दिलचस्प तथ्य है कि वो गणितज्ञ हैं लेकिन सरकार ने उनको वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली के अलावा हिंदी का जिम्मा भी सौंप रखा है। केंद्रीय हिंदी निदेशालय में स्थायी निदेशक की नियुक्ति नहीं होने से कई नुकसान हैं क्योंकि इस संस्था का उद्देश्य हिंदी को अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करना, हिंदी भाषा के माध्यम से जन-जन को जोड़ना और हिंदी को वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित करना है। इसमें कई सालों से निदेशक का नहीं होना सरकार की हिंदी को लेकर उदासीनता को दर्शाता है। इसी तरह से मानव संसाधन विकास मंत्रालय की एक और स्वायत्त संस्था है राष्ट्रीय सिंधी भाषा संवर्धन परिषद, उनके निदेशक का कार्यकाल भी खत्म हो गया है और उनको तीन महीने का विस्तार दिया गया है। यह कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो इंगित करते हैं कि सरकार भाषा और संस्कृति को लेकर कितनी गंभीर है। इसी वर्ष मार्च में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक से में भाषा को लेकर महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास किया गया था जिसमें भारतीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर जोर दिया गया। भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकारों, नीति निर्धारकों और स्वयंसेवी संगठनों से प्रयास करने की अपील की गई थी। संघ की अपील के बाद करीब तीन महीने तक ऐसा होना भी ये दर्शाता है कि संघ का सरकार में कितना दखल है। संस्कृति मंत्री और शिक्षा मंत्री को इस दिशा में व्यक्तिगत रुचि लेकर काम करना होगा ताकि इन संस्थाओं को बदहाली से बचाया जा सके। और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इन मंत्रियों को यथास्थितिवाद के मकड़जाले को भी तोड़ना होगा।



Saturday, May 13, 2017

सांस्कृतिक नीति की आवश्यकता

इन दिनों साहित्य कला जगत में सरकार के एक कदम को लेकर खासी चर्चा है। सरकार ने इन संस्थाओं को कहा है कि वो अपने बजट का तीस फीसदी अपने आंतरिक स्त्रोत से इकट्ठा करें। इस संबंध में साहित्य अकादमी और संस्कृति मंत्रालय के बीच सत्ताइस अप्रैल को एक करार हुआ है। इस करार के मुताबिक साहित्य अकादमी को इस बाबत कोशिश करनी होगी। इसी तरह का करार अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए प्रस्तावित है । माना जा रहा है कि निकट भविष्य में ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र जैसी संस्थाओं को भी अपनी बजट का तीस फीसदी हिस्सा अपने आंतरिक स्त्रोत से इकट्ठा करना होगा। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर गहन विचार-विमर्श के बाद फैसला किया जाना चाहिए था। इस फैसले के दो पक्ष हैं और दोनों पर विचार करते हुए अगर किसी नतीजे पर पहुंचते तो बेहतर होता। साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी और ललित कला अकादमी में पूर्व में कई तरह की गड़बड़ियां हुई हैं। कई साल पहले साहित्य अकादमी के और अब ललित कला अकादमी के सचिव को उनके पद से हटाया भी जा चुका है। संसदीय समितियों ने इनके कामकाज में भी कई गड़बड़ियां पाई थीं। उसके बाद बनी हाई पॉवर कमेटी ने भी कई तरह की सिफारिशें की थीं। बावजूद इसके इन संस्थानों के बजट में कटौती और उनको संसाधन जुटाने के लिए कहना उचित नहीं है।साहित्य,कला और संस्कृति हमेशा से राज्याश्रयी रही है। बगैर राज्याश्रय के कला-संगीत कभी फला-फूला नहीं है। साहित्य अकादमी ने जो करार संस्कृति मंत्रालय के साथ किया है वो उनकी बेवसाइट पर मौजूद है। उसको ध्यान से पढ़ने के बाद संस्कृति मंत्रालय के इस प्रस्ताव की विसंगतियां समझ में आती हैं। साहित्य अकादमी को सरकार से अलग अलग मदों के लिए अनुदान मिलता है। जैसे वेतन के लिए अलग, कार्यक्रमों के लिए अलग, लेखकों की यात्रा के लिए अलग और सलाना अकादमी पुरस्कारोंम के लिए अलग । अगर सूक्ष्मता से तीस फीसदी संसाधन जुटाने के प्रस्ताव को देखें तो यह प्रस्ताव हास्यास्पद लगता है। अकादमी अपने कर्मचारियों के वेतन का तीस फीसदी किस तरह से और कहां से जुटाएगी? सवाल उठता है कि करार बनानेवालों ने इस बात पर विचार किया या करार पर दस्तखत करनेवालों ने इस बाबत अपनी आपत्ति दर्ज की।
अकादमी लेखकों को हर साल दिए जानेवाले पुरस्कार की राशि का तीस प्रतिशत कहां से लाएगी इस बारे में सोचा जाना चाहिए था। इसका तो एक ही उपाय सूझता है कि ये अकादमियां अपने पुरस्कारों के लिए स्पांसरशिप ढूंढें। कुछ सालों पहले साहित्य अकादमी के पुरस्कार को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने स्पांसर करने का प्रस्ताव किया था, लेकिन लेखकों के विरोध आदि को देखते हुए वो जना परवान नहीं चढ़ सकी थी। साहित्य, कला और संस्कृति की इन संस्थाओं को बाजार की बुरी नजर से बचाकर रखने की कोशिश होनी चाहिए। अगर सरकार इन अकादमियों के खर्चे से अपने को अलग करना चाहती है तो उनको सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी फंड को इन अकादमियो को दिलवाने के लिए आदेश जारी करना चाहिए। निजी क्षेत्र का पैसा जैसे ही इन अकादमियों में लगेगा तो फिर उन कंपनियों की शर्तें भी लागू करनी पड़ेंगी।
दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी कला केंद्र की स्थिति इन अकादमियों से थोड़ी अलग है। दिल्ली के मध्य में इसके पास करीब बीस पचीस एकड़ का परिसर है। इस परिसर का व्यावसिक उपयोग होता रहा है। यहां साहित्यक मेलों से लेकर फूड फेस्टिवल तक आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों के लिए कला केंद्र अपने लॉन से लेकर हॉल तक किराए पर देती है। उनको इससे आमदनी होती है। बस इस तरह की बुकिंग को बढ़ाना होगा। इसी परिसर में राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन का दफ्तर भी है, जो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र को हर महीने लाखों रुपए किराया देती है। तो इंदिरा गांधी कला केंद्र के लिए सरकार से मिलनेवाले अनुदान का तीस प्रतिशत अपने स्त्रोतों से जुटाना मुश्किल काम नहीं है। इसके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के पास सौ करोड़ की संचित निधि भी है जिसका ब्याज भी सालों से उनको मिलता रहा है, जो सरकार से मिलने वाले अनुदान के अतिरिक्त होता है। लेकिन साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के परिसर ना तो बड़े हैं और ना ही उनको किराए आदि से भारी भरकम रकम मिलती है। कला प्रदर्शनी पर अगर टिकट लगाते हैं तो जो थोड़े दर्शक आते हैं वो भी इनसे मुंह मोड़ लेंगे। इसी तरह से संगीत नाटक अकादमी अगर टिकट लगाना शुरू कर देगी तो वहां भी दर्शकों, श्रोताओं को जमा करना बहुत मुश्किल होगा। साहित्य अकादमी अवश्य किताबों का प्रकाशन करती है, लेकिन वो किताबों का मूल्य बाजार के हिसाब से तय नहीं करती है बल्कि पाठकों की सहूलियत के हिसाब से तय की जाती है । इन अकादमियों का उद्देश्य देश में कला, साहित्य और संस्कृति के माहौल का निर्माण करना है और अगर ये व्यावसायिक गतिविधियों में लगकर धन इकट्ठा करने लगेंगी तो फिर मूल उद्देश्य से भटकने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
सरकार में बैठे संस्कृति के कर्ताधर्ताओं को इस पहलू पर विचार करना चाहिए। दरअसल होता यह है कि सरकार में बैठे आला अफसर साहित्य कला और संस्कृति को भी अन्य विभागों की तरह चलाना चाहते हैं। गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है। नीति बनाते समय इन संस्थाओं के उद्देश्यों को समझते हुए उसके असर का भी आंकलन करना आवश्यक होता है। यह सुनने देखने में बहुत अच्छा लगता है कि स्वायत्तशासी संस्थाओं को वित्तीय रूप से भी स्वायत्त होना चाहिए। जब इस सिद्धांत को साहित्य कला और सांस्कृतिक संगठनों पर लागू करने के बारे में फैसला लेने की घड़ी आती है तो भारत सरकार के लोक-कल्णकारी स्वरूप को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अगर हम देश के अन्य राज्यों की अकादमियों पर गौर करें तो राज्य सरकारों ने उनको लगभग पंगु बना दिया है । इन अकादमियों को राज्य सरकारों ने अपना प्रचार विभाग बना दिया है चाहे वो दिल्ली की हिंदी अकादमी हो या बिहार की संगीत नाटक अकादमी। बिहार की इस अकादमी को तो राज्य सरकार ने इवेंट मैनेजमेंट कंपनी बना दिया है। सरकार को जब कोई कार्यक्रम आदि करना होता है तो वो अकादमी को एक निश्चित राशि अनुदान के तौर पर दे ती है। इस अनुदान के साथ यह आदेश भी आता है कि अमुक कार्यक्रम, अमुक संस्था या अमुक व्यक्ति को दिया जाए। उदाहरण के लिए प्रकाश पर्व के वक्त अकादमी को करीब दो करोड़ रुपए का अनुदान मिला था, साथ ही ये आदेश भी आया था कि ये राशि दिल्ली के भाई बलदीप सिंह से जुड़े अनाद फाउंडेशन को दिया जाए जो कि उस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करेगी। । ऐसा ही हुआ भी । इसी तरह से आगामी सितंबर अक्तूबर में बिहार में विश्व कविता सम्मेलन का आयोजन किया जाना है। इस आयोजन का बजट तीन करोड़ का है और इसका आयोजन बहुत संभव है कि बिहार संगीत नाटक अकादमी के माध्यम से हो। इस आयोजन को करने का जिम्मा अशोक वाजपेयी या उनकी संस्था को दिया जाना भी लगभग तय है। ऐसी स्थिति में अकादमी के करने के लिए क्या बचता है। दरअसल बिहार सरकार ने ऐसी व्यवस्था बना दी है कि अगर किसी कार्यक्रम में किसी तरह की गड़बड़ी हो तो उसकी जिम्मेदारी अकादमी पर डाल कर निकल लिया जाए। अब अगर विश्व कविता सम्मेलन सफल होता है तो सेहरा अशोक वाजपेयी और बिहार सरकार के सर बंधेगा और अगर किसी तरह की गड़बड़ी होती है तो अकादमी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाएगा।
बिहार में संगीत नाटक अकादमी की दुर्दशा और स्वयत्ता को खत्म करने के खिलाफ किसी भी कोने अंतरे से आवाज नहीं उठती है। कोई जनवादी लेखक संघ, कोई प्रगतिशील लेखक संघ या कोई जन संस्कृति मंच इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाता है। इसके राजनीतिक कारण हैं जो बिल्कुल साफ हैं। यहां इनको संस्कृति पर कोई खतरा भी नजर नहीं आता है। बिहार के भी जो क्रांतिकारी लेखक आदि हैं वो भी खामोश हैं।

दरअसल अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार को एक ठोस सांस्कृतिक नीति बनानी चाहिए । जब इन अकादमियों का गठन हुआ था तब देश की स्थिति अलग थी, अब परिस्थियां काफी बदल गई हैं। बदलते वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए यह आवश्यक है कि एक नई सांस्कृतिक नीति बनाई जाए जिसमें इन अकादमियों के काम काज को बारीकी से तय किया जाए, उनके संसाधनों को भी। इस प्रस्तावित नीति पर राष्ट्रव्यापी बहस हो, विचार हो, मंथन हो और फिर किसी नतीजे पर पहुंचा जाए। सांस्कृतिक नीति बनाते वक्त अफसरशाही से ज्यादा इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की राय को तवज्जो दिया जाना चाहिए ताकि व्यावहारिकता का ध्यान रखा जाना चाहिए।               

Saturday, June 18, 2016

अकादमी सचिव की ‘ललित कला’

ललित कला अकादमी एक बार फिर से गलत वजहों से सुर्खियों में है । संस्कृति मंत्रालय ने ललित कला अकादमी के रिकॉर्ड रूम को सील कर दिया है । खबरों के मुताबिक जिस कमरे में फाइलें रखी जाती हैं उसमें सचिव सुधाकर शर्मा के सहयोगी को देखे जाने की शिकायत के बाद मंत्रालय ने ये कदम उठाया है ।अकादमी से मंत्रालय को शिकायत मिली थी कि सुधाकर शर्मा के सहयोगी रिकॉर्ड रूम में जाकर दस्तावेजों में छेड़छाड़ कर रहे हैं ।  दरअसल ललित कला अकादमी के विवादित सचिव सुधाकर शर्मा पर कई संगीन इल्जाम है और इनमें से कुछ मामले अदालत में चल रहे हैं । आरोप है कि इन्हीं केसों से जुड़े दस्तावेजों से छेड़छाड़ की जा रही थी । सुधाकर शर्मा को ललित कला अकादमी के दो पूर्व चैयरमैन ने अलग-अलग समय पर बर्खास्त कर दिया था, बावजूद इसके वो बार बार फिर से किसी ना किसी तरह अकादमी के सचिव पद पर आसीन हो जाते हैं । पहले अशोक वाजपेयी ने उनके खिलाफ फैसला लिया था और उनके बाद चेयरमैन बने के के चक्रवर्ती ने भी सचिव सुधाकर शर्मा को गड़बड़ियों के आरोप में बर्खास्त कर दिया था । चक्रवर्ती के फैसले के खिलाफ सुधाकर केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट में अपील में गए जिसने केंद्र सरकार को इस मामले पर विचार करने की सलाह दी ।जब ये मामला चल रहा था और कैट का फैसला आया तबतक केंद्र में सरकार बदल चुकी थी । नए बने संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के कार्यकाल में ललित कला अकादमी के सचिव सुधाकर शर्मा को दोबार बहाल कर दिया था । बेहद दिलचस्प घटनाक्रम में केंद्र सरकार ने के के चक्रवर्ती को चेयरमैन के पद से हटाते हुए ललित कला अकादमी का कंट्रोल अपने पास ले लिया था और संस्कृति मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव को उसका प्रभार सौंप दिया गया था । इस बीच खबर आई कि सीएजी ने भी सुधाकर शर्मा को दिए गए वेतनमान पर आपत्ति उठाई है और अपनी सिफारिश में कहा है कि सुधाकर शर्मा को दिए गए अतिरिक्त भुगतान को उनसे वसूला जाए । इन सब प्रसंगों और घटनाक्रमों के बीच ललित कला अकादमी से बेहद मंहगी पेंटिग्स गायब होने की जांच भी जारी थी ।
दरअसल ललित कला अकादमी को लेकर काफी समय से विवाद चल रहा है । इस वजह से आप अगर देखें तो जब केंद्र सरकार ने अकादमी की स्वायत्ता को खत्म कर उसका नियंत्रण अपने हाथ में लिया तो उसपर ज्यादा विवाद नहीं हुआ । बात-बात पर अभिव्यक्ति की आजादी के खतरे में होने और सांस्कृतिक संगठनों पर भगवा झंडा फहराने का आरोप लगानेवाले वीर भी लगभग खामोश ही रहे । उन्हें मालूम था कि ललित कला अकादमी में किस तरह के खेल खेले जा रहे हैं ।  दरअसल इन अकादमियों की स्वायत्ता की आड़ में अराजकता के खेल पर लगाम लगाने की जरूरत है । साहित्य और कला को लेकर जिस स्वायत्ता की कल्पना की गई थी उसको मूल रूप में स्थापित करने के प्रयास किए जाने चाहिए । अपने इस स्तंभ में मैंने अकादमियों के काम-काज पर कई बार टिप्पणी की है । इनके पुरस्कारों से लेकर विदेश यात्राओं तक में जिस तरह से बंदरबांट की जाती है उसपर अंकुश लगाए जाने की आवश्यकता है । अकादमियों के कामकाज का मूल्यांकन करने के लिए सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी की अध्यक्षता में वाली संसद की स्टैंडिंग समिति ने 17 अक्तूबर 2013 को राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के अध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट पेश की थी । इस रिपोर्ट को दोनों सदनों के पटल पर दो महीने बाद यानि 17 दिसबंर 2013 को पेश किया गया था । इस रिपोर्ट में अकादमियों के काम-काज को लेकर बेहद कठोर टिप्पणियां की गई थी । राष्ट्रीय अकादमियों और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं का कार्यकरण- मुद्दे और चुनौतियों के नाम से तैयार की गई इस रिपोर्ट में साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र  के काम-काज का लेखा-जोखा तो प्रस्तुत किया ही था, साथ ही इन संस्थानों में सुधारों के बारे में सिफारिश भी की थी । दिसंबर 2013 के बाद तो पूरा देश चुनाव के मोड में चला गया था और चुनावी कोलाहल के बीच किसी को कला और संस्कृति की सुध लेने की फुरसत नहीं थी । संसद की इस रिपोर्ट के बाद एक हाईलेवल कमेटी भी बनी थी जिसने भी कुछ सुझाव आदि दिए थे लेकिन लगता है कि उनपर अमल नहीं हो पाया है । हाईलेवल कमेटी के सुझावों पर देशभर में गंभीर बहस की जरूरत है ।
संसदीय समिति ने अपने प्रतिवेदन में माना था कि-  ये अकादमियां हमेशा से विवादग्रस्त रही हैं । हमारे संस्थापकों ने संस्कृति को राजनीति से दूर रखने के लिए इन्हें स्वायत्ता दी परंतु आज ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीति इनमें पिछले दरवाजे से गुपचुप तरीके से प्रवेश कर गई है । इन संस्थाओं के संस्थापकों को लेखकों और कलाकारों के समुदाय की एकता पर दृढ विश्वास था और वे आज इन संस्थाओं को बाधित करनेवाली समस्याओं का पूर्वानुमान नहीं लगा पाए । इसके परिणामस्वरूप प्रक्रिया में पारदर्शिता और परिणाम के संबंध में जवाबदेही का आभाव है । वस्तुत पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना उसकी स्वायत्ता एक दुधारी तलवार बन गई है जिसको कोई भी अपनी सुविधानुसार प्रयोग कर सकता है ।अब अगर हम इस टिप्पणी के आलोक में ललित कला अकादमी और उसके सचिव का मामला देखें तो साफ हो जाता है कि इस पूरे मामले में ना केवल जमकर राजनीति बुई बल्कि स्वायत्ता के नाम पर भी तमाम तरह की गड़बड़ियों को अंजाम दिया गया । स्वायत्ता के नाम पर हर नियम का सुविधानुसार उपयोग किया गया । यूपीए सरकार के दौरान बनाए गए ललित कला अकादमी अध्यक्ष के उस फैसले को बदल दिया गया जिसमें उन्होंने सचिव सुधाकर शर्मा को बर्खास्त करने का आदेश दिया था । तब मंत्रालय ने तर्क दिया था कि इस मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ । अब उसी सरकार ने फिर से ललिता कला अकादमी के सचिव सुधाकर शर्मा के कामकाज की जांच का एलान किया है । अकादमी के कमरे को सील कर दिया है ।
संसदीय समिति ने अपनी सिफारिश में कहा था कि अकादमियों और तमाम सांस्कृतिक संस्थानों के काम-काज पर नजर रखने के लिए एक नियंत्रक निकाय होना चाहिए । इस निकाय को यह सुनिश्चित करने का कार्य सौंपा जाना चाहिए कि सभी अकादमियों और संगठनों के प्रशासन उनके लिए निर्धारित नियमों तथा संविधानों के अनुसार कार्य संचालित कर रहे या नहीं । इस कमेटी ने कला के क्षेत्र में प्रेस परिषद की तरह की संस्था बनाने का सुझाव भी दिया था और उसके सदस्यों का चुनाव भी उसी की तर्ज पर करने की सिफारिश की थी । दरअसल कमेटी की इस सिफारिश के पीछे ये मंशा थी कि लेखक या कलाकार अगर अकादमियों में हो रही गड़बड़ियों की शिकायत करना चाहे तो उसके पास एक प्लेटफ़ॉर्म हो । लेकिन इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं हो पाया और ये अकादमियां गड़बड़ियों का जीता जागता उदाहरण बनकर शान से काम कर रही हैं । ललित कला अकादमी के सचिव पर तमाम तरह की गड़बड़ियों के आरोप लगे, कई बार सस्पेंडसे लेकर बर्खास्त तक कर दिए गए लेकिन फिर से वो बहाल होते रहे । इस पूरे प्रकरण से यह साफ है कि सिस्टम में कहीं ना कहीं कोई ना कोई गड़बड़ी है । इस गड़बड़ी को दूर किए बिना इन अकादमियों को दुरुस्त नहीं किया जा सकता है । ललित कला अकादमी देश में कला के उत्थान और उन्नयन के लिए काम करती है लेकिन उसके कामकाज का नियमित ऑडिट होना जरूरी है । इस बात का लेखा-जोखा लिया जाना चाहिए की जिस मूल उद्देश्य के लिए उसकी स्थापना कि गई थी उस दिशा में वो आगे बढ़ पा रही है या नहीं । ललित कला अकादमी में अध्यक्ष और सचिव के बीच बहुधा ठनी रहती है जिसका नुकसान कलाकारों से लेकर कला तक को हो रहा है ।
ललित कला अकादमी के अलावा साहित्य अकादमी की सालों से चली आ रही नियमों को अपडेट करने की जरूरत है । जैसे साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और साधारण सभा के सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया बेहद दोषपूर्ण है । वहां हाथ उठाकर प्रत्याशियों का चयन कर लिया जाता है और बहुधा हर भाषा के लोग एक अलिखित समझौते के तहत अपनी भाषा के प्रतिनिधि का चुनाव कर देते हैं । इसमें पारदर्शिता बिल्कुल नहीं होती है और एक खास गुट के लोगों का कब्जा बरकरार रहता है । गड़बड़ी यहीं से शुरू होती है । सरकार को इस दिशा में काम करने की जरूरत है । साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और उसकी साधारण सभा के सदस्यों का चुनाव या तो बैलेट से हो या फिर उसके लिए कोई ऐसी प्रक्रिया बनाई जाए जो पारदर्शी हो और उसमें मनमानी की गुंजाइश नहीं रहे । सवाल वही है कि क्या सरकार में इन संस्थाओं की स्वायत्ता को बरकार रखते हुए गड़बड़ियों को दूर करने की इच्छाशक्ति है ।     
  



Sunday, July 5, 2015

संगीत कला की दुर्दशा क्यों ?

हमारे यहां लंबे समय से कहा जाता है कि कलाएं सरकारी संरक्षण में ही फलती फूलती और विस्तार पाती है । हमारे देश में इसका एक लंबा इतिहास भी रहा है । कलाओं को राजा- रजवाड़ों ने ने खूब सहेजा । राजा के दरबार में कलाकार, संगीतज्ञ आदि को संरक्षण मिलता था । आजादी के बाद जब रजवाड़े खत्म हुए तो कलाकारों और कलाओं को संभालने का जिम्मा भारत सरकार पर आ गया । भारत सरकार में अलग से संस्कृति मंत्रालय का गठन हुआ । कला अकादमियां बनाईं गईं । हमारे देश का संस्कृति मंत्रालय हर साल कलाकारों को फेलोशिप देती है लेकिन वह राशि पर्याप्त नहीं है और ना ही पर्याप्त है फेलोशिप की संख्या । फिर उसमें जिस तरह से चयन होता है वह भी बहुधा सवालों के घेरे में आता रहता है । इतने विशाल देश में जिसकी इतनी समृद्ध विरासत हो वहां कलाओं को सहेजने का काम बहुत गंभीरता से हो नहीं रहा है । साहित्य और कला अकादमियों का हाल सबके सामने है । ये अकादमियां चंद अफसरों या फिर विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की जमींदारी बन गई है जहां कलाकारों के बजाए उन अफसरों और अकादमी के सदस्यों का भला होता है । ललित कला अकादमी में पिछले दिनों जिस तरह से भ्रष्टाचार के गंभीर मसले सामने आए उससे तो साफ हो गया है कि कला के विकास के नाम पर उस संस्था में लंबे वक्त से लूट चल रही थी । स्वायत्ता का ढोल पीटनेवालों ने उसकी आड़ में ललित कला अकादमी में जमकर मलाई काटी । कलाकार बेचारा गरीब रहा । अब जब भारत सरकार ने ललित कला अकादमी को अपने अंदर ले लिया है तो एक बार फिर से स्वायत्ता पर शोर मचना शुरू हो गया है । स्वायत्ता के नाम पर छाती कूटनेवालों ने कभी इस बात को लेकर हल्ला मचाया या कोई आंदोलन किया कि लेखकों को या फिर कलाकारों को इन अकादमियों से मदद नहीं मिलती हैं । ललित कला अकादमी से कई ऐतिहासिक पेंटिग्स गायब हो गईं उसपर तो कभी हो हल्ला नहीं मचा । हमें बेहद संजीदगी से ये सवाल उठाना चाहिए कि क्या स्वायत्तता की आड़ में लूट की इजाजत दी जा सकती है । साहित्य अकादमी का हाल भी सबके सामने है । अभी हाल ही में साहित्य अकादमी की आम सभा के सदस्यों की एक बैठक गुवाहाटी में हुई । लगभग आधे घंटे की बैठक के लिए देशभर से लोग जुटे लेकिन उस बैठक में क्या निकला ये शोध का विषय है । इस तरह की बैठकों पर जितना पैसा खर्च होता है उसमें कई लेखकों को आर्थिक सुरक्षा दी जा सकती है । लेखकों के हितों को लेकर कई सार्थक योजनाएं बनाईं जा सकती हैं ।  इस बात की गंभीरता से पड़ताल होनी चाहिए कि हमारे देश में कलाकारों और साहित्यकारों की आर्थिक स्थिति इतनी बुरी क्यों है । सरकार को भी इस दिशा में व्यापक विमर्श के बाद एक ठोस और नई सांस्कृतिक नीति बनानी चाहिए जिसमें कलाकारों और साहित्यकारों के आर्थिक सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए । इस वक्त तो हालात यह है कि कई कलाकार गुमनामी में अपनी जिंदगी शुरू करते हैं और गुमनामी में ही उनकी जिंदगी खत्म हो जाती है । भारत कला और संगीत को लेकर भी बहुत समृद्ध है लेकिन उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और फिर उसको बढ़ाने में हम लगभग नाकाम रहे हैं । जबतक किसी भी विधा में आर्थिक सुरक्षा नहीं होगी उस तरफ नए लोग अपना कदम नहीं बढ़ाएंगे और जबतक किसी भी विधा से नए लोग नहीं जुड़ेंगे तबतक उस विधा को लंबे वक्त तक जिलाए रखना मुश्किल होगा ।
संगीत हमारे समाज में बच्चे के जन्म से लेकर शवयात्रा तक का अंग है, अलग अलग रूप में , अलग अलग ध्वनियों के साथ। जीवन में संगीत की इस अहमियत को हम नहीं समझ पा रहे हैं, लिहाजा संगीतकारों को उचित सम्मान तो कभी कभार मिल भी जाता है लेकिन उनको आर्थिक सुरक्षा नहीं मिल पाती है । इन्हीं स्थितियों की अभिव्यक्ति बिस्मिल्ला खां और दिनकर के कथऩ में मिलती है । भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान को जब एक बार कोई पुरस्कार मिला था तो उन्होंने कहा था कि सम्मान और पुरस्कार से कोई फायदा नहीं होता है इसकी बजाए धन मिल जाता तो बेहतर होता । बाद में बिस्मिल्लाह खां को भारत रत्न मिला लेकिन उनकी और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति उनके जीवनकाल तक बहुत बेहतर नहीं हो पाई। बनारस में उनसे मिलने जानेवाले उनकी मृत्यु के कई साल बाद तक उनकी आर्थिक बदहाली और कला के इस महान साधक की पीड़ा के बारे में बातें करते रहते थे । देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान पानेवाले शहनाई के जादूगर की पीड़ा सबके सामने है लेकिन उसको लेकर क्या किया गया ये सोचनेवाली बात है । कुछ इसी तरह की बात रामधारी सिंह दिनकर के बारे में भी कही जाती है । उनको जब साहित्य के सबसे बड़े पुरस्कारों में से एक भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था तब उन्होंने संभवत : अपनी डायरी में लिखा था या किसी से कहा था कि चलो पुरस्कार की राशि से उनकी घर की एक लड़की का ब्याह हो जाएगा । भारत रत्न बिस्मिल्ला खां और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के बयान में शब्दों का हेरफेर हो सकता है लेकिन भाव लगभग समान हैं । एक पुरस्कार में धन की आकांक्षा कर रहा है तो दूसरा पुरस्कार में धन मिलने से इस वजह से खुश है कि घर की एक बेटी का ब्याह हो जाएगा । एक भारत रत्न से सम्मानित कलाकार और दूसरा ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी से सम्मानित राष्ट्रकवि । यह सोच कल्पना से परे है कि जब इतने बड़े कलाकार और लेखक की यह स्थिति है तो मंझोले और छोटे कलाकारों, लेखकों की आर्थिक स्थिति कैसी होगी । क्या हमारी भाषा, हमारी संस्कृति, हमारी कला, हमारे कलाकार इतने समर्थ नहीं हो पा रहे हैं कि वो अपने हुनर के बूते एक सम्मानित जिंदगी जी सकें । हम लाख अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की बात करें, हम लाख इस बात का ढिंढोरा पीटें कि हमारी संस्कृति हमारी भाषा, हमारी कला विश्व में श्रेष्ठ है लेकिन अगर ये श्रेष्ठ कला कलाकारों को सम्मान से जीने लायक माहौल और धन मुहैया नहीं करवा पाती है तो फिर उसका कोई अर्थ रह जाता है क्या, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ।
हाल के दिनों में संगीतकारों की मदद के लिए कुछ निजी प्रयास शुरू हुए हैं । इन्हीं प्रयासों में से एक है मुंबई की संगीतम संस्था का एक प्रयास रहमतें । इस कार्यक्रम में देशभर के पचास जरूरतमंद कलाकारों को एक लाख रुपए का जीवन बीमा करवा कर दिया जाता है । पिछले साल मुंबई में आयोजित इस कार्यक्रम में जितना पैसा इकट्ठा किया गया वो संगीतकार ख्य्याम और गजल गायक राजेन्द्र मेहता को दिया गया । इसके अलावा कई जरूरतमंद और युवा कलाकारों को भी संगीतम मदद करता है । अच्छी बात यह है कि युवा कवयित्री स्मिता पारिख और सोरभ दफ्तरी के इस प्रयास में गायक हरिहरन, भजन सम्राट अनूप जलोटा और गजल गायक तलत अजीज का सहयोग हासिल है । इस तरह के निजी प्रयासों को स्वागत किया जाना चाहिए । इस साल भी मुंबई में जगजीत सिंह की याद में आयोजित होनेवाले कार्यक्रम रहमतें से होनेवाली आय से कलाकारों की मदद की जाएगी । देशभर के जरूरतमंद कलाकारों की सूची विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाती है । स्मिता और सौरभ दफ्तरी के इस साझा प्रयास की तरह की इस मुहिम को देशभर में फैलाने की जरूरत है । अब अगर हमें बिहार की मधुबनी पेंटिंग को बचाना है तो उसके कलाकारों को आर्थिक मदद तो देनी होगी । अगर उस कला को वैश्विक मंच देना है तो उसके लिए राज्य सरकारों के अलावा निजी कारोबारी संस्थाओं को भी अपने सामाजिक दायित्व के निर्वाह के तहत आगे बढ़कर काम करना होगा । अगर भारत में संगीत और कला को आगे बढ़ाकर कलाकारों को आर्थिक रूप से मजबूत करना है तो इसके लिए सरकार, निजी संस्थाएं और कारोबारी समूहों को साझा तौर पर काम करना होगा । इसके अलावा ललित कला अकादमियों और साहित्य अकादमी को अफसरों और गैर साहित्यकारों कलाकारों के चंगुल से मुक्त करना होगा । संस्कृति मंत्रालय को निजी प्रयासों को प्रोत्साहित करना होगा, अकादमियों में जारी मनमानी पर रोक लगानी होगी । ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी को कलाकारों के हितों के लिए काम करनेवाली संस्था के तौर पर पुनर्स्थापित करना होगा । संस्कृति नीति को इस तरह से बनाना होगा कि नए कलाकारों को प्रोत्साहन मिले और पुराने कलाकारों को आर्थिक सुरक्षा मिल सके । अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो यह एक बेहतर स्थिति होगी वर्ना भारत रत्न से सम्मानित कलाकार भी मुफलिसी में जिंदगी बिताने और गरीबी में मर जाने को अभिशप्त रहेगा ।





Monday, July 14, 2014

साहित्य का विकेन्द्रीकरण ?

मोदी सरकार के पहले बजट से साहित्य संस्कृति और कला क्षेत्र की अपेक्षाओं भी बढ़ी हुई थी । कला साहित्य और संस्कृति के प्रशासकों को उम्मीद थी कि इस बार उनके भी अच्छे दिन आएंगे । दिल्ली में मौजूद ऐतिहासिक दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी को भी अपनी बदहाली की दूर होने की उम्मीद थी तो जगह और धन की कमी से जूझ रहे राष्ट्रीय संग्रहालय को भी उम्मीद थी कि बजट में धन आवंटन से राहत मिलेगी। देशभर में सांस्कृतिक अड्डों और अखाड़ों की तरह चलनेवाली अकादमियों को भी उम्मीद थी कि सरकार इस बार उनके लिए बजट में ज्यादा धन का प्रावधान करेगी । साहित्यक और सांस्कृतिक माफिया की अपेक्षाओं पर यह बजट खरा नहीं उतरा । उन्हें इस बात की उम्मीद थी कि जिस तरह से शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए मानव संसाघन मंत्रालय का बजट काफी बढ़ा है उसी अनुपात में इन संस्थानों के धन का आवंटन भी बढ़ेगा । उनकी इन उम्मीदों और अपेक्षाओं पर मौजूदा बजट कितना खड़ा उतरा यह तो इन संस्थाओं के कर्ता-धर्ता जाने लेकिन मुझे लगता है कि सरकार ने बजट में धन आवंटन करते वक्त इन संस्थाओं में व्याप्त अनियमितताओं और साहित्यक माफियागीरी को ध्यान में रखा है । मार्कसवादी सांसद सीताराम येचुरी की अुवाई वाली कला और संस्कृति पर बनी संसदीय कमेटी ने संसद में पिछले साल पेश रिपोर्ट में इस बात के पर्याप्त संकेत दिए गए थे कि कला और साहित्य अकादमियों में काहिली और भाई भतीजावाद चरम पर है । इन अकादमियों के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े किए गए थे ।
हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय और उसकी प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए काम करनेवाली संस्था साहित्य अकादमी के बजट में इस बार कटौती कर दी गई है । पिछले वित्तीय वर्ष में साहित्य अकादमी के लिए बाइस करोड़ छियानवे लाख रुपए दिए गए थे जबकि इस साल उसे घटाकर बाइस करोड़ अठहत्तर लाख कर दिया गया है । ऐसे वक्त में जब सरकार हिंदी को बढ़ावा देने के अपने इरादों को सार्वजनिक कर चुकी है, तब साहित्य अकादमी का बजट कम होना चौंकाता है । ऐसे में जब सरकार का कौशल विकास पर जोर है तब साहित्य अकादमी का बजट कम होना हैरान करता है । क्या यह साहित्य अकादमी की सरकार की प्राथमिकता से बाहर होने का संकेत है । यह कहना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन अगर इसकी वजह की पड़ताल करें तो इसके लिए साहित्य अकादमी की स्थितियां और उसके प्रशासक जिम्मेदार रहे हैं । साहित्य अकादमी  के कामकाज में ढीलापन, किसी नए प्रयोग की बजाए पुरानी और बनी बनाई लीक पर चलने की जिद, नई प्रतिभाओं की बजाए बुजुर्गों और निष्क्रिय लोगों की अकादमी में नुमाइंदगी, अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियों का हिंदी और हिंदी की कृतियों का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद के काम में दशकों लगना, आदि ऐसे कर्म हैं जिनके बिनाह पर किसी भी संस्थान का सरकार से ज्यादा बजट की अपेक्षा करना गलत है । साहित्य अकादमी में लंबे समय तक वामपंथी रुझान के लेखकों का कब्जा रहा । इस विचारधारा के लोगों को खूब बढ़ावा दिया गया । प्रगतिशील लेखक संघ ने देश में इमरजेंसी लगाने के इंदिरा गांधी के फैसले का समर्थन किया था और इनाम के तौर पर इंदिरा गांधी ने साहित्यक और सांस्कृतिक संस्थाओं को वामपंथी लेखकों के हाथों सौप दिया था । तब से ही वहां भाई भतीजावाद और विचारधारा को मानने वाले लोगों को बढ़ाने का काम शुरू हुआ । नतीजा यह हुआ कि प्रतिभा पृष्ठभूमि में और अनुयायी आगे आते चले गए ।  
उन्नीस सौ चौवन में जब साहित्य अकादमी का गठन हुआ था तो कौशल विकास और शोध प्रमुख उद्देश्य थे । छह दशक तक भटकने के बाद अब इस संस्थान का उद्देश्य अपने लोगों के रेवड़ी बांटने तक सीमित हो गया है । पुरस्कार, विदेश यात्रा, देशभर में गोष्ठियों का नाम पर पसंदीदा लेखक-लेखिखाओं के साथ पिकनिक के अलावा साहित्य अकादमी के पास कोई उल्लेखनीय काम नहीं है । साहित्य अकादमी में व्याप्त खेल का बेहतरीन उदाहरण है एक बड़े लेखक के साथ हुआ पुरस्कार का सौदा । यह वाकया कुछ सालों पुराना है, साहित्य अकादमी के चुनाव के वक्त हिंदी के एक वरिष्ठ लेखक ने उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। अध्यक्ष पद के उम्मीदवार ने उनको बुलाया और समझाया कि अगर आप उपाध्यक्ष बनेंगे तो साहित्य अकादमी का पुरस्कार नहीं मिल पाएगा । यह बात उनको समझ में आ गई और फिर समझौते के तहत उन्होंने उपाध्यक्ष पद से अपना नाम वापस लिया और अगले ही साल उनको साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिल गया । दरअसल अब वक्त आ गया है कि साहित्य अकादमी के कामकाज की पुर्नसनीक्षा की जाए और उसके गठन की प्रक्रिया पर गहन विमर्श हो । साहित्य अकादमी की गठन प्रक्रिया ही बेहद दोषपूर्ण है और वहीं से अकादमी में औसत प्रतिभा का जुटान होता है जो प्रतिभाशाली लेखकों विचारकों को अकादमी में आने में बाधा उत्पन्न करती है । अभी कई लेखकों ने इस बारे में संस्कृति मंत्री को पत्र लिखकर साहित्य अकादमी में व्यवस्थागत दिक्कतों को दूर करने के लिए प्रयास किए जाने का अनुरोध किया है । साहित्य अकादमी की सामान्य सभा के सदस्यों का चुनाव की प्रणाली दोषपूर्ण है । राज्य सरकारों और सांस्कृतिक संगठन के प्रस्तावित नामों पर पिछली सामान्य सभा के सदस्य हाथ उठाकर और शोर मचाकर फैसला कर देते हैं । इसमें भी सेटिंग-गेटिंग का खेल खेला जाता है । साहित्य अकादमी का संविधान इस मसले पर खामोश है । जरूरत इस बात की है कि संविधान को उचित तरीके से व्याख्यायित किया जाए और सामान्य सभा के सदस्यों का चुनाव मतपत्र के आधार पर हो । अकादमियों की कार्यप्रणाली में सुधार की सख्त आवश्यकता है । दरअसल अब वक्त आ गया है कि स्वायत्ता के नाम पर साहित्य अकादमी और अन्य संस्थाऩों में जारी खेल का सरकार आकलन करे और धन आवंटन को कौशल विकास के साथ जोड़ दे । आखिर कबतक स्वायत्ता के नाम पर प्रतिभाहीनता को बढ़ावा दिया जाता रहेगा । नई सरकार अगर ऐसा कर पाती है तो देश की कला संस्कृति के क्षेत्र में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी ।
इसी तरह से दिल्ली के दिल में स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के बजट में भी इस बार कटौती की गई है । पूर्व प्रदानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर बने इस संस्थान की गतिविधियां क्या हैं यह वहां से जुड़े लोग ही जानते हैं । चंद लोगों के बीच ही इस कला केंद्र की गतिविधियां सीमित हैं । इतने बड़े उद्देश्य को लेकर स्थापित किए गए इस केंद्र को इस तरह से अफसरों की एशगाह में तब्दील हो जाना दुखद है । इसी तरह से कला को बढ़ावा देने की केंद्रीय संस्था ललित कला अकादमी का किस्सा बहुत पुराना नहीं है। भ्रष्टाचार के आरोप में कुछ दिनों पहले वहां बहुत बवाल मचा था । तीन सदस्यों की जांच कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी । साहित्य अकादमी से इतर कला अकादमी में अलग तरह की राजनीति चलती है । पिछले साल एक चित्रकार की प्रदर्शनी सिर्फ इस वजह से वहां नहीं लगने दी गई क्योंकि उसने चेयरमौन माओ पर चोट करते हुए एक चित्र बनाया था । स्वायत्ता और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर भगवा ब्रिगेड को कोसेनेवाले इन वामपंथी फासीवादियों के इस चेहरे को भी उजागर किया जाना चाहिए । तमाम भ्रष्टाचार और खेमेबंदी के आरोपों के बावजूद ललित कला अकादमी के बजट में मामूली बढ़ोतरी की गई है । बजट में सरकार सबसे ज्यादा मेहरबान संगीत नाटक अकादमी पर दिखी जिसके बजट आवंटन में करीब छह करोड़ की बढ़ोतरी की गई है।

अकादमियों के अलावा हमारे देश के संग्रहालयों की हालत खस्ता है । ऐतिहासिक महत्व की धरोहर स्थानाभाव के अभाव में या तो खुले में पड़े हैं या किसी धूल भरे गोदाम में सड़ रहे हैं । मोदी सरकार ने अपने बजट में इस ओर ध्यान दिया है और दिल्ली के नेशनल म्यूजियम को करीब सैंतीस करोड़ रुपए ज्यादा आवंटित किए गए हैं । यह धनराशि पिछले वर्ष की तुलना में चौदह करोड ज्यादा है । सरकार ने दिल्ली की बदहाल मगर एतिहासिक दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के बजट आवंटन में चार करोड़ का इजाफा किया है । संभव है कि इस राशि से दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी को सुधारने में मदद मिले । दरअसल साहित्य कला संस्कृति पर इस बार के बजट आवंटन से जो संकेत मिलता है वह है कि सरकार इन क्षेत्रों में विकेन्द्रीकरण की ओर बढ़ रही है । केंद्रीय संस्थाओं के बजट में कटौती या मामूली बढ़ोतरी की गई है वहीं क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रो के बजट में कई गुणा इजाफा किया गया है । इस बार के बजट में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रो के लिए एक सौ एक करोड़ पचास लाख का प्रावधान किया गया है जबकि पिछले वर्ष यह आवंटन सिर्फ उनतालीस करोड़ चालीस लाख था । अगर सरकार की मंशा सांस्कृतिक विकेन्द्रीकरण की है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए । 

Thursday, April 14, 2011

सवालों के घेरे में ललित कला अकादमी

क्रिकेट के विश्वकप के शोरगुल में एक अहम घटना दब कर रह गई । यह एक ऐसी घटना है जो सरकार पोषित संस्था के कार्यकलापों पर सवालिया निशान खड़ा करती है । मैं बात कर रहा हूं ललित कला अकादमी की जिसके अध्यक्ष हिंदी के वरिष्ठ कवि, आलोचक और कला प्रेमी अशोक वाजपेयी हैं । सवाल इस लिए खड़े हो रहे हैं कि एक मशहूर चित्रकार डॉक्टर प्रणब प्रकाश ने अकादमी पर मनमानी का आरोप लगाया है । प्रणब प्रकाश का आरोप है कि उसने अरुंधति की एक न्यूड पेंटिग बनाई जिसकी वजह से ललित कला अकादमी ने उसकी पेंटिंग प्रदर्शनी की इजाजत नहीं दी । प्रणब का कहना है कि ललित कला अकादमी के अधिकारियों ने उन्हें मौखिक रूप से इस प्रदर्शनी की इजाजत दे दी थी और दो मार्च को उन्हें अकादमी के दफ्तर में आकर पैसे जमाकर प्रदर्शनी लगाने का आदेश पत्र लेने के लिए बुलाया गया था । लेकिन जब वो दो मार्च को अकादमी के दफ्तर में पहुंचे तो उन्हें मना कर दिया गया । पहले तो यह बताया गया कि उन्हें प्रदर्शनी के लिए गैलरी नहीं मिल सकती है क्योंकि बांग्लादेश के कुछ कलाकार उन्हीं तारीख को अपनी पेंटिग्स की नुमाइश करना चाहते हैं । लेकिन प्रणब प्रकाश का आरोप है कि जब उन्होंने कहा कि अगर बांग्लादेश के चित्रकारों की प्रदर्शनी उन्हीं तारीखों में लगनी थी तो पहले ही अनुरोध आया होगा ऐसे में उन्हें क्यों बुलाया गया । इस बात पर अकादमी के उपसचिव ने गैलरी के एसी खराब होने की बात बताई, साथ ही उन्हें इशारों-इशारों में यह भी बता दिया गया कि सचिव और अकादमी के आला अफसर उनके अरुंधति के न्यूड पेंटिग से खफा हैं और इस वजह से उनको प्रदर्शनी की इजाजत नहीं दी जा सकती है । हलांकि ललित कला अकादमी के सचिव सुधाकर शर्मा का कहना है कि प्रणब प्रकाश को कभी प्रदर्शनी की इजाजत दी ही नहीं गई थी, लिहाजा मनमानी का कोई सवाल ही नहीं उठता है । उन्होंने तो यह भी कहा कि अगर प्रणब प्रकाश के पास ललित कला अकादमी से किसी भी तरह का कोई पत्र व्यवहार हुआ हो या अकादमी ने हामी भरी हो तो वो फैरन दिखाएं । अगर ऐसा होता है तो सुधाकर शर्मा अपने अधिकारियों के खिलाफ जांच की बात भी करते हैं । दरअसल यह पूरा विवाद है बड़ा ही दिलचस्प । पढ़ाई से डॉक्टर, पेशे से शिक्षक और अपनी पेंटिग्स के जरिए मशहूर हुए प्रणब प्रकाश ने एक बेहद ही विवादास्पद पेंटिग बनाई जिसका शीर्षक दिया – गॉडेस ऑफ फिफ्टीन मिनट्स ऑफ फेम । इस पेंटिंग का नाम भी अरुंधति की मशहूर किताब गॉड ऑफ स्माल थिंग्स से ही उठाया गया है । इस विवादास्पद पेंटिंग में प्रणब प्रकाश ने लेखिका अरुंधति राय को न्यूड तो पेंट किया ही साथ ही एक ही बिस्तर पर उन्हें दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी ओसामा बिन लादेन और चीन के नेता माओ के साथ दिखाया । प्रणब ने अपनी इस पेंटिग में बेहद चटख रंगों का इस्तेमाल करके अपने विरोध को मुखरता के साथ चित्रित किया है । प्रणब का कहना है कि अरुंधति एक बेहद प्रचार प्रिय लेखिका और तथाकथित समाजसेवी हैं जो प्रचार के लिए एक तरफ तो नक्सलियों के पक्ष में खड़ा होती हैं दूसरी तरफ कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ भी अपनी एकजुटता दिखाती हैं । प्रणब प्रकाश के इस पेंटिंग्स के बाद तो भूचाल आ गया । कई वामपंथी लेखकों और विचारकों और कलाकारों ने इसे घोर आपत्तिजनक माना और उसको प्रचार का हथकंडा करार दिया । अरुंधित के न्यूड पेंटिंग पर आपत्ति जताते हुए उक्त पेंटिग को वयक्ति विशेष की निजता का हनन और अभिवयक्ति की आजादी का दुरुपयोग करार दिया गया । उन्होंने इसे एक लेखक का अपमान बताते हुए इस तरह की चीजों को गैरजरूरी बताया । अभिवयक्ति की आजादी के बेजा इस्तेमाल पर शोर मचाने वाले यही लोग तब एम एफ हुसैन का समर्थन कर रहे थे जब उन्होंने सरस्वती, दुर्गा और सीता की आपत्तिजनक तस्वीरें बनाई थी । दरअसल मुझे लगता है कि प्रणब प्रकाश तो एस एफ हुसैन के दिखाए रास्ते पर ही चलने की कोशिश कर रहे हैं । एक बार हुसैन साहब ने भी आइंस्टीन, हिटलर और गांधी की तस्वीर बनाई थी जिसमें उन्होंने हिटलर को नंगा दिखाया था । जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने तीनों में सिर्फ हिटलर को उन्होंने नंगा पेंट किया तो एम एफ हुसैन ने जवाब दिया था कि किसी को अपमानित करने का यह उनका अपना तरीका है । और प्रणब प्रकाश बी यही कर रहे हैं । खैर यह एक अलग और अवांतर प्रसंग है जिसपर मैंने चौथी दुनिया के अपने इसी स्तंभ में कई लेख लिखे हैं । अब यहां सवाल यह उठता है कि प्रणब प्रकाश की पेंटिंग्स पर विवाद हो सकता है लेकिन क्या ललित कला अकादमी को किसी भी पेंटर के प्रदर्शनी को रोकने की इजाजत दी जा सकती है । ललित कला अकादमी देश की शीर्ष संस्था है जिसपर देश और विदेश में भारतीय कला को प्रोत्साहित करने और प्रचार प्रसार की महती जिम्मेदारी है । अगर यह संस्था किसी चित्रकार को उसके चित्रों के आधार पर दरकिनार करता है तो यह उसके घोषित उद्देश्य से भटकने जैसा होगा । ललित कला अकादमी पर इस तरह के आरोप पहले भी लग चुके हैं । कुछ दिनों पहले कार्टूनिस्ट इरफान ने भी अकादमी पर आखिरी वक्त पर प्रदर्शनी के लिए गैलरी देने से इंकार करने का इल्जाम लगाया था । उनका आरोप था कि चूंकि उनकी प्रदर्शनी का उद्घाटन बीजेपी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी को करना था इस वजह से उसको जगह देने से मना कर दिया गया । बाद में वह प्रदर्शनी प्रेस क्लब ऑप इंडिया में लगाई गई थी । तब भी अकादमी की तरफ से यही बताया गया था कि इरफान को इजाजत नहीं दी गई थी । अगर एक ही तरह के आरोप कई लोग लगाते हैं तो ललित कला अकादमी की कार्यप्रणाली के बारे में उसके कर्ताधर्ताओं को सोचना चाहिए । किसी विचारधारा विशे, से ताल्लुक रखनेवाले कलाकार पर पाबंदी लगाकर तो सिर्फ फासीवाद का उदाहरण ही प्रस्तुत किया जा सकता है । लोकतंत्र में इस तरह से विचारधारा पर पाबंदी लगाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है । इस तरह के काम वामपंथी प्रभाव वाले संस्थानों में जमकर हुआ है । जबतर वामपंथ का जोर रहा राष्ट्रवादी विचारधारा या फिर उनका विरोध करनेवाले को भगवा विचारधारा का पोषक करार देकर अछूत जैसा व्यवहार किया जाता रहा । इस बात को ललित कला अकादमी के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी से बेहतर कोई नहीं समझ सकता । अशोक वाजपेयी पर भी कलावादी कहकर जाने कितने हमले हुए । लेकिन अंतत बचता है तो लेखन और कला ही । अगर अशोक वाजपेयी के ललित कला अकादमी का अध्यक्ष रहते हुए कलाकारों के साथ उनकी विचारधारा के आधार पर भेदभाव किया जाता है, पावंदियां लगाई जाती हैं तो यह हिंदी जगत को किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा । ललित कला अकादमी पर इस तरह के आरोप से बचाने के महती जिम्मेदारी उसके अध्यक्ष अशोक वाजपेयी पर है और पूरे देश को उनसे वस्तुनिष्ठता की उम्मीद है ।