Translate

Showing posts with label शशि थरूर. Show all posts
Showing posts with label शशि थरूर. Show all posts

Saturday, April 6, 2024

अभिव्यक्ति की सुविधाजनक व्याख्या


फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ के बीते शुक्रवार को दूरदर्शन पर दिखाने को लेकर केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन से लेकर कई अन्य नेताओं ने विरोध जताया। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर टिप्पणियों से लेकर मामला कोर्ट तक में पहुंचा। एक कवि ने केरल हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि इस फिल्म को आमचुनाव के संपन्न होने तक दूरदर्शन पर दिखाए जाने पर रोक लगाई जानी चाहिए। तर्क ये दिया गया था कि ये फिल्म धार्मिक आतंकवाद दिखाती है। यह एक एजेंडा फिल्म है जो चुनाव के समय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढावा देगी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी दूरदर्शन का दुरुपयोग कर रही है और दूरदर्शन के माध्यम से अपनी विचारधारा को बढ़ावा दे रही है। केरल हाईकोर्ट ने इस फिल्म को दूरदर्शन पर दिखाने के निर्णय पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग से लेकर दूरदर्शन के अधिकारियों को भी इस फिल्म के प्रसारण को रोकने के लिए ईमेल भेजी थी। केरल के मुख्यमंत्री विजयन ने लिखा कि राष्ट्रीय प्रसारणकर्ता दूरदर्शन को बीजेपी-आरएसएस का प्रोपेगैंडा मशीन बनने से बचना चाहिए। उनके मुताबिक ये फिल्म सांप्रदायिकता को बढ़ावा देनेवाली है और चुनाव के समय इसका प्रसारण अनुचित है। केरल से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे शशि थरूर ने भी कुछ इसी तरह की बातें कीं। उनके मुताबिक ‘इस समय ‘द केरला स्टोरी’ को दिखाना शर्मनाक है। जब ये फिल्म आई थी तो सभी ने कहा था कि ये केरल की स्टोरी नहीं है। केरल तो सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाना जाता है।‘ इस मसले पर वामदलों और कांग्रेस के नेता एक सुर में बोल रहे हैं। दोनों का मानना है कि दूरदर्शन पर इस फिल्म को दिखाने का निर्णय चुनाव को प्रभावित करने की मंशा से किया जा रहा है। ये सभी वो लोग हैं जो स्वयं को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चैंपियन बताते हैं। दिन रात संविधान को बचाने की कसमें खाते हैं। 

प्रश्न यही उठता है कि क्या संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वाधीनता कुछ चुनिंदा लोगों या विचारधारा को प्रदान की है। क्या ‘द केरला स्टोरी’ के निर्माताओं को संविधान अभिव्यक्ति की स्वाधीनता नहीं देता है। फिल्म का विरोध तब जबकि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इसको सार्वजनिक प्रदर्शन के उपयुक्त माना था। पिछले वर्ष इस फिल्म की रिलीज के समय भी इसी तरह का वैचारिक बवाल मचा था। जिन्होंने फिल्म देखी नहीं थी वो ट्रेलर को देखकर इसको एजेंडा फिल्म करार दे रहे थे। वाम दलों और कांग्रेस के नेताओं को अभिव्यक्ति की स्वाधीनता की इतनी ही चिंता होती तो वो इसके दूरदर्शन पर दिखाए जाने का विरोध नहीं करते। इस फिल्म को देखते या अपने समर्थकों को इसको देखने के लिए प्रेरित करते। फिल्म को देखने के बाद इसकी कमजोरियों को समाज के सामने प्रस्तुत करते। फिल्म देखे बिना उसका विरोध करना और उसको एजेंडा और प्रोपगैंडा बताना कानून समम्त तो नहीं ही कहा जा सकता है। आपको याद दिला दें कि जब ये फिल्म रिलीज होने वाली थी तब भी केरल हाईकोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दाखिल कर प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की गई थी। उस समय भी हाईकोर्ट ने फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने से मना कर दिया था। जब एकबार फिल्मों को प्रमाणपत्र देनेवाली संस्था केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इसको पास कर दिया था तो फिर से उसके प्रदर्शन को रोकने की मंशा सिर्फ और सिर्फ राजनीति प्रतीत होती है। क्या कोई विचारधारा इतनी कमजोर होती है कि वो एक फिल्म से हिल जाए या खतरे में आ जाए। विचार करना चाहिए। 

पिछले साल इस फिल्म को लेकर केरल हाईकोर्ट ने जो टिप्पणी की थी उसको एक बार फिर से याद दिलाने की आवश्यकता है। केरल हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के साथ फिल्म के ट्रेलर को कोर्ट में ही देखा था। देखने के बाद कहा था कि ये काल्पनिक है। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि इस फिक्शनल फिल्म का उद्देश्य मुसलमानों को खलनायक के रूप में पेश करना है। कोर्ट ने इससे भी असहमति जताते हुए कहा था कि फिल्मों में कई तरह की चीजें दिखाई जाती हैं। भूत और पिशाच भी नहीं होते हैं लेकिन फिल्मों में काल्पनिक रूप से उनको दिखाया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी न्यायमूर्ति नागरेश ने की थी और कहा था कि कई फिल्मों में हिंदू संन्यासियों को तस्कर और बलात्कारी दिखाया गया है लेकिन कभी भी किसी ने उसपर आपत्ति नहीं जताई। हिंदी और मलयालम में इस तरह की कई फिल्में देखी होगी। मलयालम में तो एक फिल्म में पुजारी को मूर्ति पर थूकते दिखाया गया था लेकिन उससे भी किसी प्रकार की कोई समस्या उत्पन्न नहीं हुई थी। आप कल्पना कर सकते हैं कि वो फिल्म पुरस्कृत भी हुई थी। न्यायमूर्ति की इस टिप्पणी ने भारतीय फिल्म जगत के उस एजेंडे को बेनकाब कर दिया था जो अबतक फिल्मों में चल रहा है। कोर्ट की ये टिप्पणी भी उल्लेखनीय रही कि ‘द केरला स्टोरी’ में इस्लाम के विरुद्ध कुछ नहीं है, इस्लाम पर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया गया है। इस फिल्म में आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के करतूतों को दिखाया गया है। बावजूद इसके फिल्म का विरोध तब भी हुआ था और अब भी हुआ। आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ना बिल्कुल गलत है। ‘द केरला स्टोरी’ में इस्लाम के विरुद्ध कुछ भी नहीं है। ऐसा अदालत ने भी माना था।

दरअसल वाम दल और कांग्रेस पार्टी के नेता इस फिल्म के जरिए अपनी राजनीति चमकाने की फिराक में दिखाई देते हैं। फिल्म आतंकवादी संगठन के विरोध में है और वो इसको सांप्रदायिक सद्भाव भड़कानेवाली फिल्म बता रहे हैं। यह तो युवा पीढ़ी को आतंकवाद के खतरे से आगाह करती हुई फिल्म है। इसमें उन खतरों को दिखाया गया है जिसके कारण युवक और युवतियों की जिंदगियां तबाह हो रही हैं। दरअसल द केरला स्टोरी, द कश्मीर फाइल्स या वैक्सीन वार ऐसी फिल्में हैं जो वाम दलों के विचार का पोषण नहीं करती हैं। ये फिल्में भारतीय विचार को आगे बढ़ाती हैं जिसके कारण कुछ लोगों को आपत्ति होती है। उनको लगता है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जिस तरह से मिशन कश्मीर और फना के माध्यम से आतंक और आतंकवादियों को लेकर एक रोमांटिसिज्म दिखाया जाता रहा है उसको चुनौती कैसे दी जा सकती है। जो लोग द केरला स्टोरी या द कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों का विरोध करते हैं वो सच से मुंह मोड़ते नजर आते हैं। हमारे समाज में इस तरह का जो कुछ भी घटित हो रहा है, जो युवा पीढ़ी को बरगलाती है, इतिहास के क्रूर पन्ने को छिपाती है, उसको दिखाने का अधिकार संविधान भारत के हर नागरिक को देता है। दिखाने की क्या सीमा हो उसको केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड तय करता है। संसद से पारित चलचित्र अधिनियम में सबकुछ स्पष्ट लिखा है कि किस तरह की फिल्मों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जा सकता है और किसका नहीं। संविधान बचाने की बात करनेवाले दल और नेता जब संविधान के अंतर्गत निर्मित संस्था के निर्णयों के विरुद्ध जाकर राजनीति करते हैं तो ऐसा लगता है कि संविधान बचाने की बात सिर्फ राजनीति है। उनकी आस्था संवैधानिक संस्थाओं में नहीं है। संविधान सभी नागरिकों को विरोध करने का अधिकार देता है लेकिन यह भी बताता है कि विरोध किसी की अभिव्यक्ति की स्वाधीनता को बाधित न करे। फिल्मों पर राजनीति बंद होने चाहिए। फिल्मों के कंटेंट पर बात होनी चाहिए, उनके ट्रीटमेंट के तरीके पर बात होनी चाहिए। उसके पक्ष-विपक्ष में लिखा जाना चाहिए लेकिन सिरे से किसी भी प्रमाणित फिल्म के प्रसारण को रोकने की मांग अनुचित है। अभिव्यक्ति की स्वाधीनता का चुनिंदा होना खतरनाक है।  


Saturday, December 12, 2020

प्रत्येक के लिए मातृभाषा,सबकी हिंदी


कोरोना संकट शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद शशि थरूर के साथ एक संवाद में हिस्सा लेने का अवसर मिला था। ये संवाद उनके लेखन से लेकर हिंदी को लेकर उनकी सोच पर केंद्रित हो गई थी। आयोजन प्रभा खेतान फाउंडेशन का था। उस कार्यक्रम में मैंने शशि थरूर से एक प्रश्न पूछा था कि गैर हिंदी भाषी विद्वानों ने कभी कहा था कि अंग्रेजी, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की साझा दुश्मन है। इस क्रम में मैंने भूदेव मुखर्जी और सी राजगोपालाचारी का नाम लिया था। तब शशि ने मेरी बात का प्रतिवाद किया था और कहा था कि राजगोपालाचारी जी ने ये नहीं कहा था, वो सबकुछ अंग्रेजी में करते थे। मैंने कहीं पढ़ा था कि राजगोपालाचारी जी ऐसा सोचते और कहते थे। अभी पिछले दिनों किसी शोध के क्रम में ये जानकारी मिली कि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार समिति को राजगोपालाचारी जी का संरक्षण प्राप्त था और उनके मार्गदर्शन में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार समिति को काफी विस्तार मिला था। वो बहुत रुचि लेकर हिंदी प्रचार समिति के काम को आगे बढ़ाते थे। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की एक पुस्तक है ‘वट पीपल’ जो उनके निबंधों का संग्रह है। उसमें इस बात का उल्लेख मिलता है कि किस तरह से राजगोपालाचारी हिंदी के विकास के लिए काम करते थे। 1928 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार समिति की एक पाठ्य पुस्तक की भूमिका में उन्होंने दक्षिण भारतीय लोगों को ये सलाह दी थी कि ’जनता की भाषा एक और शासन की भाषा दूसरी होने से जनता संसद तथा विधानसभा के सदस्यों पर समुचित नियंत्रण नहीं रख सकेगी, इसलिए उचित यही है कि हम अपनी सुविधा के लोभ में आकर अंग्रेजी के लिए दुराग्रह न करें। यदि अंग्रेजी शासन की भाषा बनी रही तो इससे देश का स्वराज्य अधूरा रहेगा।‘ 1937 में जब राजगोपालाचारी मद्रास प्रांत के मुख्यमंत्री बने तो उस समय भी वो हिंदी विरोधियों के साथ काफी कड़ाई से पेश आते थे। इसी तरह से राजगोपालाचारी ने प्रजातंत्र पर एक छोटी सी पुस्तिका निकाली थी, उसमें भी उन्होंने हिंदी की पैरोकारी की थी और इस बात की पुरजोर वकालत की थी कि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा हो कर रहेगी। हिंदी को लेकर राजगोपालाचारी की ये राय काफी लंबे समय तक रही थी। स्वतंत्रता मिलने तक तो थी ही। 

ये भी सत्य है कि जब देश को स्वतंत्रता मिली और संविधान को अपनाने के साथ ही हिंदी को देश की राजभाषा का दर्जा मिला तो दक्षिण भारत में एक बार फिर से हिंदी विरोधी आंदोलन शुरू हो गए। इस आंदोलन का भाषा से अधिक राजनीति से लेना देना था। बाद में तो हिंदी को अंग्रेजी जैसा ही विदेशी भाषा तक करार दे दिया था। अन्नादुरैई और पेरियार के साथ मिलकर राजगोपालाचारी ने हिंदी के खिलाफ आंदोलन किया। 1965 में जब एक बार फिर से हिंदी के विरोध में आंदोलन शुरू हुआ तो राजगोपालाचारी ने हिंदी का विरोध किया। ये सब दर्ज है लेकिन हिंदी को लेकर राजगोपालाचारी के विचारों में ये बदलाव या विचलन राजनीति की वजह से आई। हिंदी के प्रति उनके विरोध का ये अर्थ नहीं था कि उनका अंग्रेजी का विरोध कम हो गया था। मुझ लगता है शशि थरूर राजगोपालाचारी के बाद के स्टैंड पर बात कर रहे थे और मैं उनकी आरंभिक राय से भी भिज्ञ था। उस दौर के अन्य दस्तावेजों और पुस्तकों को खंगालने के बाद एक बात समझ आई कि इस देश में राजनीति ने भारतीय भाषाओं का बहुत नुकसान किया। हिंदी ने कभी भी अपने बड़े होने का दंभ नहीं भरा लेकिन ये बात सुनियोजित तरीके से फैलाई गई। 

हिंदी को लेकर जिस तरह की राजनीति इस देश में होती रही है और उसका फायदा जिस तरह से अंग्रेजी वाले उठाते रहे हैं, उसको रेखांकित करना बेहद जरूरी है। साहित्य अकादमी के एक वाकए का स्मरण होता है। विश्वनाथ तिवारी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे। यहां ये बताते चलें कि विश्वनाथ तिवारी साहित्य अकादमी के पहले हिंदी भाषी अध्यक्ष थे। तिवारी जी के कार्यकाल में एक बैठक के दौरान अंग्रेजी का एक प्रर्तिनिधि खड़ा हुआ और तमतमाते हुए कहा कि आपको अंग्रेजी में अपना भाषण देना चाहिए क्योंकि यहां हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के प्रतिनिधि बैठे हैं। तब भारतीय भाषाओं के लोगों ने अंग्रेजी के प्रतिनिधि को चुप करवा दिया था और तिवारी जी से हिंदी में अपना भाषण जारी रखने का अनुरोध किया था।  दरअसल अंग्रेजी के लोगों ने हमेशा से हिंदी और भारतीय भाषाओं के बीच खाई पैदा करने की कोशिश की। गैर-हिंदी भाषी लोगों के मन में ये बात बैठाई कि अगर हिंदी का फैलाव होता है तो वो अन्य भारतीय भाषाओं तो दबा देगी। अंग्रेजी वालों को ये डर हमेशा सताते रहता है कि उनको चुनौती सिर्फ हिंदी से ही मिल सकती है। अगर हिंदी को सभी भारतीय भाषाओं का साथ मिल गया तो उनका बोरिया बिस्तर बंध सकता है। इसलिए वो लगातार भ्रामक बातें फैलाते रहते हैं जबकि सचाई ये है कि अगर हिंदी का विकास होता है तो उसके साथ सभी भारतीय भाषाओं का विकास होगा। अंग्रेजी को अगर हटाया जाता है तो जो स्थान रिक्त होगा वो सारा स्थान हिंदी को तो मिलेगा नहीं बल्कि उस रिक्त स्थान की पूर्ति सभी भारतीय भाषाओं से होगी। गांधी भी हमेशा ये कहते थे कि हिंदी को अपनाने का यह अर्थ कतई नहीं है कि अपनी अन्य भाषाओं का तिरस्कार। एक बात और कही जाती है कि अंग्रेजी ज्ञान की भाषा है। होगी, लेकिन कोरोनाकाल में जिस तरह से भारतीय चिकित्सा पद्धति से लेकर भारतीय जीवन शैली की ओर पूरी दुनिया का ध्यान गया है उसमें अंग्रेजी कहां है, इसपर विचार करने की भी जरूरत है। आपदा ने इस बात का निषेध ही नहीं बल्कि स्थापित भी कर दिया कि सिर्फ अंग्रेजी ही ज्ञान की भाषा नहीं है।  

अभी पिछले दिनों राष्ट्रीय शिक्षा नीति पेश की गई है। शिक्षा नीति का जो दस्तावेज बना है उसमें हिंदी का नामोल्लेख न होना अचरच में डालता है। क्या शिक्षा नीति बनानेवालों को या इसको ड्राफ्ट करनेवालों को भारतीय संविधान के भाषा संबंधी अनुच्छेदों का भान नहीं था या फिर वहां भी राजनीति घुस गई थी। क्या जानबूझकर एक रणनीति के तहत हिंदी का नामोल्लेख नहीं हुआ है? या फिर दक्षिण भारतीय राजनीतिक दल के आसन्न विरोध को ध्यान में रखते हुए शिक्षा नीति में एक बार भी हिंदी के नामोल्लेख से बचा गया। कई लोगों के तर्क हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जब भारतीय भाषा का जिक्र है तो अलग से हिंदी के उल्लेख का कोई औचित्य नहीं है। अगर ऐसा है तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के पहले संविधान को संशोधित किया जाना चाहिए, उसके निदेशों में बदलाव किया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि दक्षिण भारत के लोग हिंदी नहीं समझते हैं। इन प्रदेशों में रहनेवाले लोग अंग्रेजी से ज्यादा हिंदी समझते हैं। हिंदी की व्याप्ति बहुत बढ़ी है और इस वजह से संवाद की सुगमता भी। दरअसल हमें इस बारे में विचार करना चाहिए कि प्रत्येक के लिए मातृभाषा और सबके लिए हिंदी। इसमें किसी तरह का कोई बड़ा भाई छोटे भाई जैसा भाव नहीं है। हिंदी को देश की संपर्क भाषा के रूप में मजबूती देनी होगी क्योंकि संपर्क भाषा तो वो बन ही चुकी है। हिंदी के खिलाफ जिस तरह की राजनीति होती है उसको समझने के लिए सिर्फ इतना जानना जरूरी है कि तमिलनाडु के राजनीतिक दल भी चुनाव के दौरान मदुरै इलाके में हिंदी में पोस्टर लगाते हैं। उनका हिंदी विरोध सिर्फ भावनाओं को भड़काकर वोट बटोरना है। उनको ये समझना होगा कि सत्ता हासिल करने के लिए के लिए भाषा को औजार के तौर पर उपयोग करना अनुचित होगा। 

Saturday, December 21, 2019

पुरस्कार प्रक्रिया से बेनकाब प्रपंच


देशभर को साहित्य अकादमी पुरस्कारों का इंतजार रहता है। साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर हमेशा विवाद होते रहते हैं, कभी छिटपुट तो कभी बड़ा। इस वर्ष भी हुआ। पहले तो मैथिली भाषा के संयोजक प्रेम मोहन मिश्रा ने इस्तीफा का मेल भेजकर विवाद को हवा देने की कोशिश की। मिश्र को पुरस्कार की प्रक्रिया से ही परेशानी थी। खबरों के मुताबिक प्रेम मोहन मिश्र ने अकादमी को जो पत्र भेजा उसमें पुरस्कार देने की लिए जूरी के गठन पर सवाल उठाते हुए वहां एक ‘रैकेट’ के सक्रिय होने का आरोप जड़ा। उनका आरोप है कि इस बार जूरी के सदस्यों का नाम पहले ही सार्वजनिक हो गया और ये भी सबको पता था कि इस वर्ष का पुरस्कार किसको दिया जाएगा। उनकी मांग है कि जूरी के चयन और पुरस्कार की प्रक्रिया गोपनीय होनी चाहिए। अभी तक जो प्रक्रिया है उसके मुताबिक हर भाषा के जो प्रतिनिधि होते हैं वही जूरी के सदस्यों का नाम प्रस्तावित करते हैं। जब नई आम सभा का गठन होता है तो सभी सदस्यों को एक पत्र भेजा जाता है और उनसे, आधार सूची बनाने के लिए, प्राथमिक सूची पर विचार करने के लिए और फिर अंतिम जूरी के सदस्यों के लिए संभावित लोगों के नाम मांगे जाते हैं। सभी भाषा के सदस्यों के नाम जब आ जाते हैं तो उसको मिलाकर एक विस्तृत सूची तैयार की जाती है। इसी सूची से पांच साल तक हर प्रकार की जूरी का चयन किया जाता है। साहित्य अकादमी के चारों पुरस्कार के लिए इसी विस्तृत सूची से हर वर्ष नाम निकालकर अध्यक्ष के सामने रख दिया जाता है।
अध्यक्ष के सामने जूरी के सदस्यों का नाम रखने के पहले ये जांच लिया जाता है कि कोई भी नाम पिछले साल के दौरान तो जूरी का सदस्य नामित नहीं हुआ। नियम ये है कि एक बार जो व्यक्ति जूरी का सदस्य नामित हो जाता है वो अगले साल किसी स्तर पर जूरी का सदस्य नामित नहीं किया जाता है। इस जांच पड़ताल के बाद जो भी नाम अध्यक्ष के सामने आते हैं उसमें से वो तीन नाम का चयन करते हैं जो वर्ष और भाषा विशेष की जूरी में शामिल होते हैं। अगर साहित्य अकादमी में नियमानुसार जूरी के सदस्यों का चयन किया गया है तो प्रेम मोहन मिश्र भी उसके सहभागी माने जा सकते हैं क्योंकि नाम तो उन्होंने भी प्रस्तावित किया होगा। मिश्र जी के हवाले से जो खबर छपी है उसके मुताबिक उन्होंने दस दिसंबर को पहली बार आपत्ति की। दस दिसंबर को आपत्ति करने का अर्थ इस वजह से नहीं रह जाता है कि तबतक पुरस्कार का काम लगभग पूरा हो चुका था। अंतिम चयन पर विचार बाकी रह गया था।
मिश्र का एक आरोप पुरस्कार के रैकेट का भी है। इस तरह का रैकेट वामपंथियों के दबदबे वाले काल में सक्रिय रहता था लेकिन पिछले कई वर्षों से ऐसी बात सामने नहीं आई है। उस वक्त तो ये होता था कि महीनों पहले से साहित्य जगत को पता होता था कि साहित्य अकादमी का पुरस्कार किसको दिया जाना है। इस स्तंभ में कई बार इसकी चर्चा भी हो चुकी है और बता भी दिया गया था कि किसको पुरस्कार मिलनेवाला है, उसको ही मिलता भी था। गड़बड़ी तो यहां तक होती थी कि लंबी कहानी को उपन्यास मानकर उसी श्रेणी में पुरस्कार भी दे दिया जाता था।
राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के कई नेताओं के अलावा वामपंथी बुद्धिजीवी भी लगातार ये आरोप लगाते हैं कि मोदी सरकार संस्थाओं को नष्ट कर रही है। उसकी परंपराओं को भंग कर रही है और स्वयत्त संस्थाओं के कामकाज में हस्तक्षेप कर रही है। लेकिन इस बार साहित्य अकादमी में एक ऐसी घटना हुई जो कांग्रेस और वामपंथियों के इन आरोपों को नकारने के लिए काफी है। इस वर्ष अंग्रेजी के लिए कांग्रेस के तिरुवनंतपुरम से सांसद और लेखक शशि थरूर को उनकी पुस्तक ‘एन एरा ऑफ डार्कनेस’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। अगर साहित्य अकादमी की स्वायत्तता को बाधित करने या उसको कमजोर करने की कोशिश होती तो क्या शशि थरूर को पुरस्कार मिल पाता? क्या साहित्य अकादमी के फिछले छह दशक के इतिहास में कभी ऐसा हुआ है कि विरोधी विचारधारा ही नहीं प्रमुख विपक्षी दल के सांसद को पुरस्कृत किया गया हो। संभवत: नहीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लेखकों की तो छोड़िए भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों के नाम पर भी साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए विचार हुआ हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। नरेन्द्र कोहली के के नाम पर कभी विचार भी हुआ ऐसी चर्चा तक नहीं हुई। पाठकों को ये तय करना चाहिए कि असहिष्णु कौन है या अपनी विचारधारा को सृजनात्मकता पर थोपने की कोशिश किस विचारधारा के लोग करते हैं। प्रेम मोहन मिश्र को इस तरह की बातों पर भी प्रकाश डालना चाहिए था।
पिछले सप्ताह के स्तंभ में इस बात की चर्चा की गई थी कि दो हजार पंद्रह के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पुरस्कार वापसी का जो अभियान चला था उसमें शामिल उदय प्रकाश, मंगलेश, अशोक वाजपेयी जैसे लेखक किस तरह से अकादमी पुरस्कारों को अपने परिचय में शान से शामिल करते हैं। इस बार तो इस तरह के लेखक और बेनकाब हो गए और इस बात को और बल मिला कि पुरस्कार वापसी अभियान ना केवल मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए किया गया था बल्कि अपने राजनीतिक आकाओं के कहने पर उनके राजनीतिक लक्ष्य की पूर्ति के लिए साहित्य का इस्तेमाल किया गया। दरअसल लक्ष्य तो बिहार विधानसभा चुनाव के पहले भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ माहौल बनाना था। उनको अभिव्यक्ति की आजादी की ना तो चिंता थी और ना ही वो लेखकों पर हो रहे हमलों से व्यथित थे।
शशि थरूर को जिस जूरी ने पुरस्कार योग्य माना उसमें शामिल लेखकों के नाम देख लेते हैं। इससे कुछ और लोग बेनकाब होंगे। पहला नाम है जी एन देवी, दूसरा के सच्चिदानंदन और तीसरे हैं सुकांत चौधरी। जी एन देवी वही शख्स हैं जिन्होंने जोर-शोर से पुरस्कार वापस करने की घोषणा की थी और मोदी सरकार पर तमाम तरह के आरोप जड़े थे। दूसरे शख्स हैं के सच्चिदानंदन जिन्होंने पुरस्कार तो वापस नहीं किया था लेकिन उस वक्त अंग्रेजी की सलाहकार समिति से विरोधस्वरूप इस्तीफा दे दिया था। साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ तिवारी को एक ईमेल भेजकर विरोध जताया था और तिवारी को अहंकारी आदि कहा था। तब सच्चिदानंदन ने साहित्य अकादमी से भविष्य में किसी प्रकार का संबंध नहीं रखने का एलान भी किया था। बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद वो सब भूल गए और अकादमी से अपने संबंध बना लिया और इस वर्ष तो जूरी में भी शामिल रहे। अब ये बात समझ से परे है कि बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद अभिव्यक्ति की आजादी कैसे बहाल हो गई और किस तरह से लेखक सुरक्षित हो गए। अगर दोनों चीजें हो गईं तो स्वीकार की घोषणा भी होनी चाहिए।
ये बात सिर्फ इन दोनों तक सीमित नहीं है, हिंदी की जूरी में रहे नंद भारद्वाज ने भी अपना पुरस्कार वापस किया था लेकिन उनको भी अकादमी से कोई परहेज नहीं है। अकादमी के लोग बताते हैं कि नंद भारद्वाज ने चंद दिनों के बाद ही पुरस्कार वापसी का अपना फैसला चुपचाप वापस ले लिया था और अकादमी को भेजे चेक आदि भी वापस ले लिए थे। सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए सार्वजनिक घोषणा और सुर्खियां बटोर लेने के बाद अकादमी के कार्यक्रमों में चुपके से भागीदारी की ये कला पता नहीं कहां से सीखते हैं ये बौद्धिक। ऐसे ही कई और लेखक हैं जिनमें पंजाबी के सुरजीत पातर, अंग्रेजी के केकी एन दारूवाला, इन लोगों ने भी पुरस्कार वापस किया था लेकिन अब सक्रिय रूप से साहित्य अकादमी के कार्यक्रमों और क्रियाकलापों में भागीदार दिखते हैं। नैतिकता की मांग तो ये है कि इस तरह से सभी लेखक सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार करें कि मोदी सरकार के उस दौर में लेखकों को डर लगता था लेकिन अब मोदी सरकार के दौरान ही लेखकों का वो कथित डर समाप्त हो गया और अभिव्यक्ति की आजादी बहाल हो गई। क्या पुरस्कार वापसी करनेवाले इन लेखकों से इस नैतिकता की उम्मीद की जा सकती है। क्या इनमें इतना नैतिक साहस बचा है या ये मान लेना चाहिए कि लेखकों में जो नैतिक आभा होती है उसको स्वार्थ और लाभ-लोभ ने ढंक लिया। साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्थान है जो भारत सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में नहीं है और लेखक समुदाय के लिए ये आवश्यक है कि इसकी स्वायत्ता बरकरार रहे। ये तभी संभव है जब लेखक समुदाय इसको राजनीति का अखाड़ा न बनाएं और यहां सृजन की ऐसी जमीन तैयार करें जहां रचनात्मकता की फसल लहलहा सके।

Monday, November 12, 2018

किताबों से राजनीति की प्रवृत्ति


शशि थरूर, समकालीन राजनीति का एक ऐसा नेता जिनका विवाद के साथ चोली दामन का साथ है।कई बार विवाद हो जाता है,जबकि बहुधा वो विवादों को आमंत्रित करते हैं। पिछले दिनों उनकी किताब ‘द पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर’ आई थी जो नरेन्द्र मोदी पर केंद्रित है। पैराडॉक्सिकल का शाब्दिक अर्थ तो मिथ्याभासी होता है परंतु इस पुस्तक में पैराडॉक्सिकल को परोक्ष रूप से एक विशेषण की तरह केंद्र में रखा गया है जिसका अर्थ होता है लोक-विरुद्ध। इस विशेषण को व्याख्यायित और स्थापित करने के लिए शशि ने तर्क जुटाए और उसको किताब की शक्ल दे दी। अपनी इस किताब में थरूर ने अंग्रेजी के इस शब्द को इस तरह से इस्तेमाल किया जिससे कि ये पुस्तक और उसका शीर्षक दोनों उनकी और उनकी पार्टी कांग्रेस की राजनीति के लिए फायदेमंद हो और पार्टी में उनका भी कद बढ़े। इस पुस्तक के विमोचन पर जिस तरह से नेताओं का जमावड़ा लगा था वो भी इस बात को पुष्ट भी करता है। विमोचन के मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर पूर्व केंद्री मंत्री चिदंबरम, अरुण शौरी ने प्रधानमंत्री मोदी को कठघरे में खड़ा किया था। जमकर राजनीतिक बयानबाजी हुई थी। शशि का अंग्रेजी भाषा ज्ञान बहुत जबरदस्त है और वो अपनी इस प्रतिभा का उपयोग बहुधा ट्वीटर पर करते भी रहते हैं। उस भाषा ज्ञान का दर्शन यहां भी पाठकों को होता है।
किताब से सियासत की बात इस वजह से भी पुष्ट होती है कि थरूर अब नेहरू पर लिखी अपनी पुरानी किताब को भी राजनीति के औजार के तौर पर इस्तेमान करने जा रहे हैं। डेढ़ दशक पहले 2003 में थरूर ने जवाहरलाल नेहरू पर एक किताब लिखी थी, ‘नेहरू, द इंवेन्शन ऑफ इंडिया’। अब इस पुस्तक के नए संस्करण का विमोचन कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी 13 नवंबर को करेंगी। स्टैच्यू ऑफ यूनिटि को लेकर सरदार पटेल और उनके योगदान की पूरे देश में जमकर चर्चा हो रही है। ऐसे माहौल में नेहरू पर पंद्रह वर्ष पूर्व लिखी और प्रकाशित पुस्तक का विमोचन समारोह करना और उसमें सोनिया गांधी का आना साफ तौर पर एक राजनीति का संकेत कर रहा है। पुस्तक प्रकाशन जगत में इस तरह की कोई परंपरा नहीं रही है कि किसी किताब के नए संस्करण को समारोहपूर्वक जारी किया जाए। जिस तरह से शशि की किताब ‘द पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर’ में नेताओं का जमावड़ा लगा था उससे ये अंदाज लगाया जा सकता है कि नेहरू वाली किताब के विमोचन में भी विपक्षी दलों के नेताओं का जुटान होगा। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के बीच यहां राजनीतिक भाषण से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस तरह की राजनीति अमेरिका में जमकर होती रही है, वहां चुनाव के पहले नेताओं को केंद्र में रखकर पुस्तकें लिखी जाती रही हैं और फिर उसके आधार पर पक्ष और विपक्ष में माहौल बनाया जाता है। हमारे देश के लिए यह एक नई प्रवृत्ति है जिसमें ये देखना दिलचस्प होगा कि इसका असर चुनावी राजनीति पर कितना गहरा होता है।   


Monday, January 29, 2018

हिंदी में प्रकाशन महत्वपूर्ण- थरूर


शशि थरूर की राजनेता के अलावा एक विशिष्ट लेखक की भी पहचान है। उनकी अबतक 15 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अभी हाल ही में वाणी प्रकाशन से उनकी हिंदी में एक पुस्तक अंधकार काल, भारत में ब्रिटिश साम्राज्य प्रकाशित हुई है। एक और अन्य पुस्तक मैं हिंदू क्यों हूं, भी हिंदी में प्रकाशित होनेवाली है। हिंदी में पुस्तकों का प्रकाशन और संयुक्त राष्ट्र में हिंदी का आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने का विरोध। इन सारे मुद्दों पर डॉ शशि थरूर ने मुझसे खुलकर बातचीत की।  

प्रश्न- सबसे पहले तो हिंदी में आपकी किताब प्रकाशित होने पर मेरी बधाई स्वीकारें। हिंदी में छपने का विचार कैसे आया
थरूर- धन्यवाद। मेरा मानना है कि गुलामी या परतंत्रता के जो हमारे अनुभव रहे हैं वो हमारे पाठकों तक उनकी अपनी भाषा में पहुंचे। हिंदी में मेरी पुस्तक के प्रकाशित होने से इस वजह से मैं बहुत खुश हूं। हलांकि मैंने इस पुस्तक को मूल रूप में अंग्रेजों की भाषा में ही लिखा है लेकिन अब तो अंग्रेजी भी भारतीय भाषा बन चुकी है। फिर भी लाखों लोग इस पुस्तक के संदेश को तबतक समझ नहीं सकते जबतक कि वो उनकी मातृभाषा में ना हो। इस लिहाज से हिंदी में इसका प्रकाशन मेरे लिए महत्वपूर्ण है ।
प्रश्न- संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने का आपने संसद में विरोध किया। अगर ऐसा होता है तो क्या इस पर भारतीयों को गर्व नहीं होगा?
थरूर- देखिए इस मसले पर मेरा रुख तीन तर्कों पर आधारित है। पहला तो ये कि अबतक अगर हिंदी संयुक्त राष्ट्र की भाषा की आधिकारिक भाषा नहीं बन पाई तो देश को क्या नुकसान हुआ? जब वाजपेयी जी, मोदी जी या सुषमा जी चाहती हैं कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दें तो वो ऐसा करते ही हैं। होता यह है कि उस वक्त कोई भारतीय राजनयिक उनके भाषण का अंग्रेजी अनुवाद करता है जो संबंधित देशों की भाषा में अनुदित हो जाती है। दूसरा ये कि संयुक्त राष्ट्र में बोलने का उद्देश्य पूरी दुनिया तक अपने विचारों को पहुंचाना होता है। जब एक भारत की एक आधिकारिक भाषा, अंग्रेजी, वहां समझी जा रही है तो फिर दूसरी को लाने का मतलब क्या है? मेरा मानना है कि जो भी भारतीय नेता संयुक्त राष्ट्र में हिंदी बोलता है वो अपने देश की जनता से बात कर रहा होता है, पूरी दुनिया से नहीं। मैं जानना चाहता हूं कि क्या अरुण जेटली विश्व बैंक की बैठकों में हिंदी में बात करते हैं? क्या वो हिंदी में बात करके उतने प्रभावी रह पाएंगें। तीसरी और अंतिम बात कि सुषमा जी के लिए ये सुविधाजनक है कि वो संसद में ये बयान दें कि सरकार हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए 400 करोड़ देने को तैयार है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारा देश बहुभाषी है और हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है। उस स्थिति की कल्पना कीजिए जब कोई गैर हिंदी भाषी देश का प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री बनेगा!
प्रश्न- हिंदी का विरोध करके क्या आप 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर भाषाई राजनीति करना चाहते हैं?
थरूर – 2019 का चुनाव लड़ने के लिए कई अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। मोदी सरकार की नाकामी, अर्थव्वस्था की पतली हालत, पेट्रोल, डीजल और गैस के दामों में इजाफा, युवाओं के सामने बेरोजगारी की समस्या आदि। पर आपको बता दूं कि हिंदी पर मेरा जो स्टैंड है वो दक्षिण भारत में बहुत लोकप्रिय है। सिर्फ वहीं नहीं बल्कि पूरे देश में जो लोग हिंदी, हिंदू और हिन्दुत्व की राजनीति के विरोधी हैं उन्होंने भी मेरे रुख का समर्थन किया है। मेरा मत बिल्कुल साफ है कि किसी पर कोई भाषा थोपी नहीं जानी चाहिए।
प्रश्न- अंधकार काल जैसी ऐतिहासिक किताब लिखने की योजना कैसे बनी और इसके लिए कितना रिसर्च करना पड़ा?
थरूर- देखिए आपको बताऊं कि 15 मिनट का भाषण देना एक बात है और करीब साढे तीन सौ पेज की किताब लिखना अलग। मेरे सामने जो सबसे बड़ी चुनाती थी वो ये कि मैंने जो बोला उसको विस्तार से तर्कों और तथ्यों के साथ प्रस्तुत करूं। इसके लिए गहन शोध की जरूरत थी।मैं चाहता था कि तिथियां सही हों, तथ्य ठोक बजाकर रखे जाएं, आंकड़े त्रुटिहीन हों। इस वक्त ये करना सत्तर के दशक की तुलना में आसान है जब मैंने पीएचडी की थी। अभी तो 18वीं और 19वीं शताब्दी के दस्तावेज से लेकर किताबें तक ई फॉर्मेट में उपलब्ध है । जब मैंने लिखना शुरू किया तो मुझे मालूम था कि क्या लिखना है लेकिन मुझे उसके समर्थन में अकाट्य तथ्यों को जुटाना था। पुरानी पुस्तकों के अलावा मैंने इस वक्त के विद्वानों के इस विषय के लेखन को खंगाला और उसको पढ़ा।
प्रश्न- आपकी 15 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, अंधकार काल और पूर्व की पुस्तकों को लिखने के दौरान क्या फर्क महसूस किया आपने?
थरूर- “अंधकार काल’ इस मायने में अलहदा है कि इसको लिखने की वजह मेरा एक भाषण बना। पूर्व की मेरी सारी पुस्तकें मेरी सोच और योजना का मूर्तरूप हैं। इस बार मैं अपने सार्वजनिक भाषण के समर्थन में पुस्तक लिखने बैठा था। हां और जैसा कि मैंने उपर कहा कि इस पुस्तक में मेरे शोध का स्तर मेरे पूर्ववर्ती शोध से काफी गहन रहा। अपनी पीएचडी थीसिस के बाद इतना गहन शोध मैंने नहीं किया था।

प्रश्न- आपने अपनी किताब ‘अंधकार काल’ में विस्तार से इस बात का निषेध किया है कि लोकतंत्र और राजनीतिक एकता अंग्रेजों की देन है। दैनिक जागरण के पाठकों को इस बारे में बताइए।
थरूर- सबसे पहले मैं ये बात साफ कर दूं कि ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ की परिकल्पना ‘आइडिया ऑफ ब्रिटेन’ से काफी पहले का है। हमारे वेदों में भारतवर्ष की भौगोलिक सीमा हिमालय से लेकर समुद्र तक बताई गई है । हमारे जो भी शासक रहे हैं, चाहे वो 2400 साल पहले के चंद्रगुप्त मौर्य हों या 300 साल पहले के औरंगजेब, सभी की ख्वाहिश इस भूभाग पर राज करने की रही। भारतीय इतिहास में, चाहे वो मौर्य हों, गुप्त हों या मुगल हों, जिस तरह की राजनीतिक एकता की ललक दिखाई देती है उसके मद्देनजर ये कहा जा सकता है कि अगर अंग्रेज भारतीय उपमहाद्वीप को एक सूत्र में नहीं बाधते तो मराठा या कोई अन्य जोड़ता। मराठा और मुगलों के संबंध को देखकर हम ये कह सकते हैं कि बहुत संभव है कि हमारे यहां भी ब्रिटिशर्स की तरह संवैधानिक राजतंत्र होता। यहां हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजों ने ‘बांटो और राज करो’ की नीति के तहत योजनाबद्ध तरीके से हिंदुओं और मुस्लमानों के बीच नफरत के बीज बोए। 1857 की क्रांति के वक्त हिंदुओं और मुसलमानों को कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते देख अंग्रेजों को होश फाख्ता हो गए थे। उन्होंने उसी वक्त प्रण किया था कि ऐसा फिर नहीं होने देना है। लॉर्ड एलफिस्टन ने लिखा था ‘बांटो और राज करो’ के पुराने रोमन सिद्धांत को अपनाना चाहिए। इसी योजना के तहत मुसलमानों के लिए अलग वोटिंग की व्यवस्था की गई थी ताकि मुसलमान सिर्फ मुसलमानों को चुन सकें। आसन्न राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए विभाजन के बीज बोए गए थे।
प्रश्न- एक जगह आप कहते हैं कि महात्मा गांधी का अहिंसा का सिद्धांत अन्य औपनिवेशिक शासन में फल फूल नहीं सकता था, क्यों?
थरूर- भारत की स्वतंत्रता ने औपनिवेशिक काल के खात्मे की शुरुआत की थी लेकिन कई देशों में आजादी के लिए लोगों को बेतरह यातना सहनी पड़ी थी। आंदोलनकारी बूटों से कुचले गए थे, शासकों के कहर से बचने के लिए लोगों को घर बार छोड़कर भागना पड़ा था। खूनी संघर्ष हुए थे। अहिंसा उस तरह के माहौल के लिए उचित नहीं था। अहिंसा का सिद्धांत वहीं काम कर सकता है जहा के शासक नैतिकता की और राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय माहौल का लिहाज करते हों। अहिंसा का सिद्धांत हिटलर के खिलाफ नहीं चल सकता था। जहां गैस चैंबर जैसी यातना का प्रावधान हो वहां अहिंसा के सिद्धांत की सफलता संदिग्ध रहती है। स्टालिन और माओ के राज में गांधी का ये सिद्धांत कारगर नहीं हो सकता है। गांधी के अहिंसा का सिद्धांत वहीं चल सकता है जहां के शासकों की मानसिकता हो कि आप हमें हमारी गलती बताओ हम खुद को सजा देंगे। मुझे इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ था जब नेल्सन मंडेला को रंगभेद के खिलाफ अहिंसा का सिद्धांत अपनाते नहीं देखा जबकि उन्होंने खुद मुझसे कहा था कि गांधी जी उनके लिए हमेशा से विराट प्रेरणा के स्त्रोत रहे हैं। मुंबई पर आतंकी हमले के बाद गांधी का आतंक के खिलाफ एकमात्र विरोध होता उपवास, लेकिन इससे आतंकियों पर क्या कोई फर्क पड़ता । बावजूद इसके गांधी की महानता कम नहीं होती है। महात्मा ने हमें सत्य, अहिंसा और शांति की राह दिखाई। उन्होंने औपनिवेशक शक्तियों की साख पर प्रहार किया था। अहिंसा अन्य दुश्मनों के खिलाफ सफल नहीं हो सकती है ये तथ्य है, मेरी मंशा गांधी का अनादर करना नहीं है।
प्रश्न- आपने ये भी कहा है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री को 2019 में जालियांबाग नरसंहार के लिए माफी मांगनी चाहिए। इस प्रतीकात्मकता से क्या होगा?
थरूर- जालियांवाला बाग अंग्रेजों की बर्बरता का प्रतीक है। जालियांवाला बाग नरसंहार को अंजाम देने के पहले कोई चेतावनी नहीं दी गई। हजारों मासूम औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया।  ये कांड अंग्रेजों की स्वशासन देने की वादाखिलाफी को भी दर्शाता है, जिसका वादा उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के समर्थन के एवज में किया था। बावजूद उस वादे के रॉलेट एक्ट पास किया गया था। इतना ही नहीं इस नरसंहार को अंजाम देनेवाले जनरल डायर को पुरस्कृत किया गया। 13 अप्रैल 2019 को इस बर्बर नरसंहार के सौ साल पूरे हो रहे हैं। अंग्रेजों के पास अपनी बर्बरता पर माफी मांगने का इससे बेहतर अवसर क्या होगा।
प्रश्न- क्या आपको लगता है कि ब्रिटिश कभी भारतीयों से माफी मांगेगे?
थरूर- कुछ दिनों पहले तक मैं भी कहता था कि वो माफी नहीं मांगेंगे क्योंकि अगर वो भारत से माफी मांगेगें तो उनको 130 अन्य देशों से माफी मांगनी होगी। लेकिन वक्त बदलता दिख रहा है। जब मैंने पिछले साल ब्रिटेन में ये मांग उठाई तो आश्चर्यजनक रूप से मुझे सकारात्मक संकेत महसूस हुए। मैंने उनको  कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का उदाहरण दिया जिसमें उन्होंने कोमगाटा मारू की घटना के लिए माफी मांगी। लेबर पार्टी के सांसद वीरेन्द्र शर्मा ने हाउस ऑफ कामंस में भारत से माफी की मांग उठाई। अगर कोई ब्रिटिश प्रधानमंत्री भारत से माफी मांगने का साहस नहीं जुटा पाता है तो ब्रिटिश रॉयल परिवार को माफी मांगनी चाहिए क्योंकि सारी बर्बरता तो उनके ही नाम पर की गई।
प्रश्न- आपकी नई किताब व्हाई आई एम अ हिंदू अंग्रेजी में प्रकाशित हुई है, क्या इसको भी हिंदी में प्रकाशित करवाने की योजना है?
थरूर- जी, बिल्कुल। मुझे लगता है कि वाणी प्रकाशन इस पुस्तक को भी प्रकाशित करने के लिए उत्सुक है। लेकिन अनुवाद में तो वक्त लगेगा ।


Saturday, January 6, 2018

हिंदी को देश में मिले उसका हक

लोकसभा के हाल में ही समाप्त हुए सत्र में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने को लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बयान का कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने जोरदार विरोध किया। उनका कहना था कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, वो अंग्रेजी के साथ-साथ राजकाज की भाषा है। उनका एक तर्क ये भी था कि अगर हिंदी को यूएन की आधिकारिक भाषाओं में शामिल करवा लिया जाता है तो भविष्य में गैर हिंदी भाषी प्रधानमंत्री या विदेशमंत्री को दिक्कत हो सकती है। इस बात को लेकर शशि थरूर के अपने तर्क हैं जो उन्होंने अपनी पुस्तक ‘अंधकार काल,भारत में ब्रिटिश साम्राज्य’ के विमोचन समारोह के दौरान भी रखे। बाद में एक साक्षात्कार में शशि ने कहा कि यूएन में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाना बगैर समस्या के उसका हल सुझाने जैसा है। उनकी मशहूर पुस्तक ‘एन एरा ऑफ डार्कनेस, द ब्रिटिश एंपायर इन इंडिया’ के हिंदी अनुवाद के विमोचन के दौरान मैंने जब उनसे हिंदी विरोध का कारण जानना चाहा। प्रश्न था कि अपने दो संसदीय काल में उन्होंने कभी भाषा का प्रश्न नहीं उठाया। अब क्यों? क्या उसके पीछे 2019 में होनेवाले लोकसभा चुनाव में भाषाई आधार पर अपने मतदाताओं को रिझाने की मंशा तो नहीं है? क्या वो अपने पड़ोसी राज्य तमिलनाडू के डीएमके नेताओं की राह पर तो नहीं चल रहे हैं जहां चुनाव के वक्त तो हिंदी में पोस्टर छपवाए जाते हैं और चुनाव खत्म होते ही हिंदी विरोध का झंडा थाम लेते हैं? शशि थरूर ने साफ किया कि वो हिंदी के विरोधी नहीं है लेकिन हिंदी को जबरन थोपे जाने का विरोध करते हैं।
शशि थरूर का जोर इस बात पर था कि हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा नहीं है। अबतक तो बिल्कुल नहीं है। वो यह भी कहते हैं कि हमारे संविधान मे  राष्ट्रभाषा जैसी कोई अवधारणा नहीं है। मैं बहुत विनम्रतापूर्व शशि थरूर जी को संविधान सभा में इस विषय पर हुई बहस की याद दिलाना चाहता हूं। देश की भाषा समस्या पर 12 सितंबर 1949 को बहस शुरू हुई थी जो तीन दिनों तक चली थी । 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में ये फैसला हुआ कि देवनागरी लिपि में लिखी जानेवाली हिंदी संघ-सरकार की भाषा होगी तथा उसमें हिंदी के अंकों के साथ-साथ अंतराष्ट्रीय अंकों का प्रयोग किया जाएगा। उस वक्त हिंदी को संविधान सभा ने राष्ट्रभाषा मान लिया था। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसके बाद बंबई से पत्र लिखकर पार्टी को इसके लिए बधाई भी दी थी। गौरतलब है कि यह प्रस्ताव तब पास हुआ था जब संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने भाषा समस्या पर विचार शुरू करने के पहले सदस्यों को चेताते हुए कहा था- ‘इस सभा का निर्णय सारे देश को स्वीकार्य होना चाहिए। इसलिए सदस्यों को इस बात का ध्यान रखना चहिए कि कोई खास बात हासिल करने के लिए बहस करना काफी नहीं है। बहुमत के बल पर अगर हमने कोई प्रस्ताव पारित करवा भी लिया जो उत्तर या दक्षिण में बहुत से लोगों को नापसंपद हो, तो संविधान को अमल में लाना भारी समस्या हो जाएगी।‘ संविधान सभा में हिंदी और हिन्दुस्तानी को लेकर भी लंबी चर्चा हुई थी। कांग्रेस पार्टी के अंदर भी हिंदी और हिन्दुस्तानी को लेकर मत विभाजन हुआ था जिसमें हिंदी को बहुमत मिला था।
लेकिन गांधी जी की इच्छा का सम्मान करते हुए संविधान की धारा 351 में हिन्दुस्तानी का उल्लेख कर दिया गया था । दरअसल गांधी हिन्दुस्तानी के पक्ष में थे। इस बावत 18 मार्च 1920 को वी एस श्रीनिवास शास्त्री को लिखा उनका खत देखा जा सकता है– ‘हिन्दी और उर्दू के मिश्रण से निकली हुई हिन्दुस्तानी को पारस्परिक संपर्क के लिए राष्ट्रभाषा के रूप में निकट भविष्य में स्वीकार कर लिया जाए। अतएव, भावी सदस्य इम्पीरियल कौंसिल में इस तरह काम करने को वचनबद्ध होंगे, जिससे वहां हिन्दुस्तानी का प्रयोग प्रारंभ हो सके और प्रांतीय कौंसिलों में भी वे इस तरह काम करने को प्रतिज्ञाबद्ध होंगे। (संपूर्ण गांधी वांग्मय खंड 17)। लेकिन गांधी जी जितनी मजबूती से हिन्दुस्तानी का साथ दे रहे थे, हिंदी साहित्य सम्मेलन के सदस्य उतनी ही ताकत से उनका विरोध कर रहे थे । ये विरोध इतना बढ़ा था कि गांधी जी को 28 मई 1945 को सम्मेलन से अपना इस्तीफा देना पड़ा था। इन सबका असर संविधान सभा में भी देखने को मिला था । जब संविधान की धारा 351 में हिन्दुस्तानी का उल्लेख हो गया तब कई लोग ये प्रचारित करने में जुट गए कि जिस हिन्दी की बात संविधान में है ये वो हिंदी नहीं है जो हिन्दीभाषी राज्यों में में बोली जाती है। इस बात को जमकर प्रचारित कर हिंदी विरोधी माहौल बनाया गया।
संविधान में यह प्रावधान रखा गया था कि इसके लागू होने के पंद्रह वर्षों तक अंग्रेजी चलती रहेगी और अगर पंद्रह वर्षों के बाद संसद को लगता है कि कुछ विषयों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग आवश्यक है तो कानून बनाकर उन विषयों में अंग्रेजी का प्रयोग जारी रखा जा सकता है। लेकिन इन पंद्र वर्षों तक हिंदी के प्रयोग पर प्रतिबंध नहीं था। इसको साफ करने के लिए 27 मई 1952 को राष्ट्रपति ने एक आदेश जारी किया था जिसमें उल्लिखित था कि राज्यपालों, सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति पत्रों में अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी और अंतराष्ट्रीय अंकों के साथ देवनागरी अंकों का भी प्रयोग किया जाएगा। इसके बाद 3 दिसंबर 1955 को राष्ट्रपति ने एक और आदेश जारी किया जिसमे जनता के साथ पत्रव्यवहार, संसद को दी जानेवाली रिपोर्ट, प्रशासनिक रिपोर्ट, सरकारी संकल्प और विधायी अधिनियम, संधियां, अन्य देशों के सरकारों के साथ पत्रव्यवहार, राजयनियों को जारी किए जानेवाले औपचारिक दस्तावेजों में अंग्रेजी के साथ हिन्दी का भी प्रयोग होगा।
बावजूद इसके संविधान के लागू होने के एक दशक बाद भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की दिशा में कोई काम नहीं हुआ। ऐसा प्रतीत होता है कि उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहलाल नेहरू गांधी जी के हिन्दुस्तानी की पक्षधरता के प्रभाव में थे। क्योंकि संविधान सभा ने जब संविधान की धारा 351 में हिन्दुस्तानी का उल्लेख किया था तब नेहरू ने कहा था कि ‘इस प्रस्ताव में कोई बात है जिसपर ज्यादा जोर पड़ना चाहिए था, फिर भी अगर वो चीज प्रस्ताव में नही रहती तो तो मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता था।‘ इससे यह बात स्पष्ट है कि हिंदी को लेकर नेहरू के मन में कोई उत्साह नहीं था। नेहरू ने संभवत: 1963 में संसद में ये घोषणा कर दी थी कि ‘जबतक अहिन्दी भाषी भारतीय अंग्रेजी को चलाना चाहेंगे तबतक हिंदी के साथ केंद्र में अंग्रेजी भी चलती रहेगी।‘ नतीजा यह हुआ कि जब 1963 में भाषा अधिनियम बना तो नेहरू की उपरोक्त भावना का ख्याल रखा गया। जिसमें ये फैसला हो गया कि हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी में काम-काज चलता रहेगा, जबकि संविधान में साफ तौर पर कहा गया था कि इसके लागू होने के 15 साल बाद सिर्फ जरूरी कामों ही अंग्रेजी का उपयोग हो सकेगा। इस तरह से अगर हम देखें तो 1963 का भाषा अधिनियम संविधान की मूल भावना के विरुद्ध थी। 1965 में हिंदी के विरोध में मद्रास में आंदोलन हुआ और नेहरू की घोषणा को कानून बनाने की मांग उठी जिसे लालबहादुर शास्त्री ने दबाव में मान लिया।

इस पृष्ठभूमि में यह बात साफ होती है कि संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात थी जिसे बाद में नहीं माना गया और कानूनी और राजनीतिक दांव-पेंच में फंसा कर इसको बेहद जटिल बना दिया गया। लोग ये भूल गए कि हिन्दी को बढ़ाने और उसको मजबूत करने का सबसे ज्यादा उपक्रम गैर हिंदी भाषी लोगों ने किया और उन सबका मानना था कि स्वाधीन भारत में एक ऐसी भाषा का विकास होना चाहिए जो अन्तर्प्रांतीय भाषा के तौर पर स्वीकार्य हो सके। बंगाल से इसकी शुरुआत हुई थी और माना जाना है कि सबसे पहले ये विचार बंकिम चंद्र के मन में आया था। भूदेव मुखर्जी ने अदालतों की भाषा के तौर पर हिंदी को मान्यता दिलाने के लिए बड़ा आंदोलन चलाया था। राजा जी ने दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार सभा का नेतृत्व किया था। ‘प्रजातंत्र’ नाम की एक पुस्तिका में उन्होंने विश्वास जताया था कि हिन्दी इस देश की राष्ट्रभाषा होकर रहेगी। इन परिस्थियों के आलोक में वर्तमान केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए और यूएन में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने जैसे प्रतीकात्मक कदम उठाने की बजाए उसको राष्ट्रभाषा बनाने की दिशा में विचार प्रारंभ करना चाहिए क्योंकि संविधान निर्माताओं की यही राय भी थी। सरकार को हिंदी के विकास के लिए बनाई गई संस्थाओं की चूलें भी कसनी चाहिए। वर्धा में महात्मा गांधी के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय में हिंदी के नाम पर जो हुआ वो दुखद है, सरकार को उसपर ध्यान देना चाहिए।

Tuesday, February 10, 2015

गंभीर विमर्शों का महोत्सव

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को मशहूर करने में विवादों की बड़ी भूमिका रही है । चाहे वो समाजशास्त्री आशीष नंदी के पिछड़ों पर दिए गए बयान और आशुतोष के प्रतिवाद से उपजा विवाद हो या फिर सलमान रश्दी के जयपुर आने को लेकर मचा घमासान हो । उत्तर प्रदेश मे जब विधानसभा चुनाव होनेवाले थे उसी वक्त जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सलमान रश्दी आमंत्रित थे । उस वक्त सियासी दलों ने सलमान रश्दी की भागीदारी और भारत आने को भुनाने की कोशिश की थी । मामला इतना तूल पकड़ गया था कि सलमान रश्दी का भारत दौरा रद्द करना पड़ा था । उस विवाद की छाया लंबे समय तक जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को प्रसिद्धि दिलाती रही । पिछले साल अमेरिकी उपन्यासकार जोनाथन फ्रेंजन ने यह कहकर आयोजकों को झटका दिया था कि - जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसी जगहें सच्चे लेखकों के लिए खतरनाक है, वे ऐसी जगहों से बीमार और लाचार होकर घर लौटते हैं । दरअसल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में साहित्य  के साथ साथ बहुधा राजनीतिक टिप्पणियां भी होती रही हैं । पिछले साल नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अमर्त्य सेन ने आम आदमी पार्टी के उभार को भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती के तौर पर पेश किया था । वहीं अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के नेत्रहीन लेखक वेद मेहता ने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि उनका पीएम बनना देश के लिए घातक हो सकता है । साहित्य से व्यावसायिकता की राह पर चल पड़े जयपुर साहित्य महोत्सव को तमाम लटके झटकों के बावजूद इस बात का श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए कि इसने पूरे देश में साहित्यक उत्सवों की एक संस्कृति विकसित की है जिससे देश में एक साहित्यक माहौल बनने में मदद मिली है ।
इस बार जयपुर लिटरेचर फस्टिवल बगैर किसी विवाद के खत्म हुआ । दो साल पहले इस फेस्टिवल की आयोजक नमिता गोखले ने मुझसे कहा था कि उनकी विवादों में कोई रुति नहीं है क्योंकि इससे गंभीर विमर्श नेपथ्य में चला जाता है । वो लगातार हो रहे विवादों से चिंतित भी थी । इस बार उनरी यह चिंता दूर हो गई और जनवरी में खत्म हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में साहित्य की कई विधाओं पर जमकर विमर्श हुआ और लेखकों और साहित्य प्रेमियों की भागीदारी रही । हिंदी को भी इस बार मेले में काफी प्रमुखता मिली । फेस्टिवल क पहले दिन हिंदी के वरिष्ठ लेखक विनोद कुमार शुक्ल का सत्र हुआ जिसमें कविता को लेकर गंभीर बातें हुई । वैसे भी इन दिनों हिंदी कविता को लेकर काफी सवाल खड़े हो रहे हैं । भारी मात्रा में लिखी जा रही हिंदी कविता की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि इस वक्त हिंदी में हजार से ज्यादा कवि सक्रिय हैं । कविता पर आलोचना की इस जाले को साफ करने में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में हुए विमर्श आनेवाले दिनों में मददगार साबित होंगे । हिंदी के वरिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल ने कहा कि कविता कुंए का पानी होती हैजिसकी ताजगी हमेशा बरकरार रहती है । उनका मानना था कि बेशक कुंए का पानी एक जगह जमा रहता है लेकिन जितनी बार उससे पानी बाहर निकालो तो वो पीने लायक और ताजा होता है । उन्हें कुंए के पानी की इसी ताजगी से कविता की तुलना करत हुए कहा कि वो भी हर वक्त नई ही रहती है । फिल्म गीतकार प्रसून जोशी ने भी कविता को लेकर अपनी राय प्रकट की । प्रसून के मुताबिक कविताएं मनोरंजन मात्र के लिए नहीं होती हैं । उसके अंदर हमेशा कोई ना कोई संदेश छुपा होता है जो समाज के लिए हितकारी होता है। उन्होंने कविता को सम्मान का हकदार भी बताया और कहा कि वो चाहे किसी भी जुबान में लिखी जाए उसको इज्जत बख्शनी चाहिए । इस सत्र में उन्होंने कविता ऐऔर संवाद के फर्क पर भी विस्तार से प्रकाश डाला । गीतकार जावेद अख्तर ने भी गीतों और उसके चित्रण पर अपनी बात रखी थी । उनका मानना था कि गीत और उसका चित्रण दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और एक के बगैर दूसरे की कल्पना भी बेमानी है । अगर गीतों का चित्रण प्रभावी नहीं है तो वो प्रभावोत्पादक नहीं हो सकता है । हिंदी कविता के बारे में ये बातें अच्छी लग सकती हैं लेकिन जिस तरह से कविता का स्तर लगातार गिर रहा है उसपर इन कवियों ने कोई बात वहीं की । कविता के जनता से दूर जाने को लेकर और उसके लगातार बदलते फॉर्म पर भी गहन विमर्श होना चाहिए ।
इसके अलावा एक बेहद दिलचस्प सत्र था स्त्री शक्ति पर । इसको संचालित कर रहे थे संपादक और लेखक ओम थानवी और प्रतिभागी थीं लता शर्मा, अंशु और मृदुला बिहारी । यह सत्र शुरुआत में थोड़ा उबाऊ था पर संचालक के सवालों और सत्र में हिस्सा ले रहे लोगों ने इसे दिलचस्प बना दिया । यह भी दिलचस्प संयोग था कि चर्चा में शामिल सभी का संबंध राजस्थान से था । इस चर्चा में हिस्सा लेते हुए मृदुला बिहारी ने साफ कहा कि इन दिनों स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श हो रहा है और कुथ नई लेखिकाएं अपनी रचनाओं में देह का वर्णन करती हैं जो कि काफी अश्लील होता है । इस चर्चा में ही स्वतंत्रता और स्वाधीनता पर भी बहस हुई लेकिन वहां मौजूद युवा साहित्यप्रेमियों ने लेखिकाओं को घेर लिया । बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहानीकार गीताश्री ने मृदुला बिहारी को कठघरे में खड़ा किया और उनसे अश्लील लेखन करनेवाली लेखिकाओं के नाम पूछे तो सभागार में सन्नाटा छा गया । मृदुला बिहारी सफाई देते इलके पहले ओम थानवी ने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया जो कि हिंदी के समूल महिला लेखन पर प्रश्नचिन्ह लगाता है । ओम थानवी ने कहा कि सती प्रथा राजस्थान के चेहरे पर एक दाग है लेकिन इस कुरीति पर स्त्री लेखन ने अबतक आपत्ति दर्ज क्यों नहीं करवाई । स्त्री विमर्श की दुंदुभि बजानेवाली लेखिकाओं को यह सवाल क्यों नहीं मथता है । यह हिंदी साहित्य के स्त्री विमर्श पर एक बड़ा सवाल है ।
इसी तरह से एक दिलचस्प सत्र था – सेवन डेडली सिन्स ऑफ ऑवर टाइम । सत्र में हिस्सा ले रहे थे अशोक वाजपेयी, इस्थर डेविड और एमियर मैकब्राइड । इस सत्र में होमी भाभा ने चर्चा में हिस्सा ले रहे लेखकों से उनके पापों के बारे में पूछ लिया । अपनी वाकपटुता के लिए मशहूर अशोक वाजपेयी ने साफ कहा कि दूसरों को पीड़ा पहुंचाने से बड़ा पाप कोई नहीं है । इस सत्र में कई मनोरंजक अवधारणाएं भी सामने आई । एक और सत्र में पौराणिक धर्मग्रंथों और पैराणिक मिथकीय चरित्रों पर लिखनेवाले देवदत्त पटनायक ने भी आम जीवन में मिथत की भूमिका पर अपने विचार रखे । सच क्या है जैसे विराटसवाल से मुठभेड़ करते हुए रचनायक ने कहा कि एक सच वो होता है जिसे देखा या नापा जा सकता है दूसरा वह होता है जिसे महसूस किया जाता है । उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि विज्ञान ये तो बता सकता है कि आप दुनिया में कैसे आए लेकिन आप क्यों आए इस सवाल के सामने जाकर विज्ञान बेबस हो जाता है । दरअसल सत्रहवीं अठारहवीं शताब्दी यानि बुद्धिवाद के आरंभिक युग में मिथकों को कपोल कल्पना माना जाता था परंतु बदलते समय के साथ इसको इतिहास या विज्ञान लेखन के पूरक के तौर पर देखा जाने लगा । साहित्य में कई बार ख्यात और अख्यात लोक मिथक का जबरदस्त प्रयोग हुआ है । डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी अपने लेखन में मिथकों और लोक ख्यात संकेतों का प्रयोग किया है ।

सोनिया गांधी की फिक्शनालाइज्ड जीवनी लेखक जेवियर मोरो, फ्लोरेंस नोविल और मधु त्रेहान का सत्र भी विचारोत्तेजक रहा । मोरो ने कहा कि उन्हें यह बहुत रहस्यमयी लगा था कि कैसे इटली की एक गांव की लड़की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे ताकतवर महिला बन गई । इस सत्र में जीवनी लेखन से लेकर मानवीय संबंधों की रचनाओं पर विमर्श हुआ जिसके केंद्र में नोविल की रचना अटैचमेंट रही । इस रचना में एक युवा लड़की और उसके प्रोफेसर के बीच के प्रेम संबंध को उकेरा गया है । एक और बेहद महत्वपूर्ण सत्र रहा पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर और मिहिर शर्मा की भागीदारी वाला जिसे अपनी विद्वतापूर्ण टिप्पणियों से युवा अंग्रेजी लेखिका अमृता त्रिपाठी ने नई ऊंचाई दी । विवादों की छाया से दूर इस बार का जयपुर साहित्य महोत्सव मीना बाजार सरीखा तो रहा लेकिन साहित्य पर गंभीर विमर्श ने इस मीना बाजार को एक बार फिर से नमिता गोखले के सपने को सच किया ।