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Saturday, March 10, 2018

भ्रम से साहित्य का भला नहीं


त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद वहां लेनिन की प्रतिभा को गिराए जाने को लेकर जमकर राजनीति हुई। राजनेताओं ने तमा तरह के बयान दिए, आरोप प्रत्यारोप की सियासत हुई। सहिष्णुता-असहिष्णुता का राग भी सुने को मिला। राजनीति में इस मसले पर जारी वाद-विवाद साहित्य जगत तक जा पहुंचा। लेनिन की प्रतिमा को गिराए जाने को लेकर साहित्य जगत में खूब हलचल देखने को मिली। साहित्य को राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल बताने की अवधारणा एक बार फिर से नेपथ्य में गई और कुछ साहित्यकार राजनीति के पीछे पीछे चलते दिखाई दिए। कुछ लेखकों ने इल मुद्दे पर जमकर राजनीति की। इस स्तंभ में पहले भी चर्चा की जा चुकी है कि हिंदी साहित्य के ज्यादातर मामले या वैचारिक बहसें अब फेसबुक पर होती हैं। लेनिन वाले मसले पर भी फेसबुक पर कई साहित्यकारों ने लेनिन को महान तो बताया ही उनको विश्व शांति के लिए उनके योगदान को भी याद किया। लेनिन महान को याद करने की और उसको स्थापित करने में जिस तरह की तुलनाएं की गईं वो हास्यास्पद थीं। इसपर आगे चर्चा होगी लेकिन पहले देख लेते हैं कि मार्क्सवादी लेखक और जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे अरुण माहेश्वरी ने कया लिखा। अरुण माहेश्वरी के मुताबिक- ‘स्तालिन ने दुनिया को तबाही से बचाया, लेनिन ने मजदूर वर्ग को बताया कि तुम अपने हाथ में विश्व की बागडोर थाम सकते हो। यह सिर्फ हवाई बातें नहीं है, इतिहास में दर्ज है।‘  ये तो दर्ज है ही लेकिन इसके अलावा लेनिन के बारे में इतिहास में और क्या क्या दर्ज है, इसके बारे में भी जानना आवश्यक है । रूस के महान लेखक मक्सिम गोर्की ने 23 अप्रैल 1917 को अपने अखबार ‘नोवाया जीज्न’ में लिखा- ‘अब जबकि हमें ईमानदारी से बहस करने और एक दूसरे से असहमत होने का अधिकार मिला हुआ है तो एक दूसरे को जान से मारना अपराध और पाप है। जो इसे नहीं जानते वे स्वतंत्र मनुष्य के रूप में सोचने और महसूस करने में असमर्थ हैं। हिंसा और हत्या निरंकुशता का तर्क है, वह नीचता का तर्क तो है ही शक्तिहीन भी है। क्योंकि किसी अन्य व्यक्ति की इच्छा और भावना का दमन करने या किसी को जान से मारने का यह अर्थ नहीं होता और नहीं हो सकता कि एक विचार को भी मार डाला गया है, या उस विचार को गलत या किसी मत को दोषपूर्ण साबित कर दिया गया है।‘  दरअस मक्सिम गोर्की इस बात से खफा थे कि लेनिन चंद समर्थकों की हिंसा के बल पर रूस की सत्ता पर कब्जा करने में जुटे हुए थे। कई उपलब्ध दस्तावेजों और पुस्तकों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि रूस की क्रांति तो फरवरी 1917 में हो गई थी जब जार की सत्ता को वहां की जनता ने उखाड़ फेंका था। उसके बाद रूस में मिली जुली सरकार बनी थी जिसका लक्ष्य वहां लोकतांत्रिक सरकार के गठन का था। इसी के मद्देनजर संविधान सभा का चुनाव करवाना तय किया गया था। इस बीच लेनिन अप्रैल 1917 में रूस लौटे थे और अपने सिद्धांतो को प्रतिपादित करते हुए सत्ता कायम करने का एलान किया।
दरअसल लेनिन रूस में साम्यवादी सत्ता कायम करना चाहते थे, लोकतांत्रिक राज्य नहीं। नवंबर,1917  में लेनिन की योजना सफल हुई थी और बोल्शेविकों ने हिंसक विद्रोह के बाद सत्ता पर कब्जा कर लिया था। लेनिन ने अपनी सत्ता को कायम करने के लिए लंबा हिंसक अभियान भी चलाया। बाद में भी लेनिन ने अपने विरोधियों को चुप कराने के लिए गोली बारूद और हिंसा का सहारा लिया। लोकतांत्रिक व्यवस्था को नहीं मानने की लेनिन की जिद ने सोवियत संघ में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की भ्रूण हत्या कर दी थी। बावजूद इसके लेनिन को महान क्रांतिकारी और गरीबों और मजदूरों का मसीहा बताया जाता रहा। आम जनता के सपनों को पूरा करनेवाला करार दिया गया।
हमारे देश में भी लंबे समय तक लेनिन और तमाम वामपंथी नायकों को स्थापित करने का काम हुआ। सिर्फ लेनिन ही क्या माओ और फिडेल कास्त्रो जैसे तानाशाहों को भी मसीहा के तौर पर पेश किया जाता रहा। हमारे देश के बुद्धिजीवियों ने उनके चुनिंदा भाषणों और कोट्स के आधार पर उनको गरीबों और मजदूरों के मसीहा के रूप में स्थापित किया। फिडेल कास्त्रो का ही उदाहरण लें तो उन्होंने मुक्ति संघर्ष की आड़ में क्यूबा में अपनी सत्ता कायम की। लंबे समय तक क्यूबा पर राज किया, मुक्ति संघर्ष की आड़ में वहां की जनता की आजादी छीन ली । सैंतालीस सालों तक वहां के सर्वेसर्वा रहे और बीमार होते ही अपने भाई राउल कास्त्रो को गद्दी सौंप दी । एक तरह से देखे तो राजतंत्र जैसी व्यवस्था कायम कर दी। क्यूबा की जनता के पास अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार नहीं था लेकिन फिर भी कम्युनिस्टों का प्रचार तंत्र ऐसा कि बुर्जुआ से लोहा लेने के नाम पर फिडेल को मुक्तियोद्धा बना कर पेश कर दिया गया। दरअसल कम्युनिस्टों के पास पूंजीवाद से लड़ाई का एक ऐसा सपना है जो वो मौका मिलते ही जनता को दिखाते हैं और फिर उसकी आड़ में तानाशाही स्थापित कर राज करते हैं। तमाम वामपंथी शासन वाले देशों में ये देखने को मिलता है कि समानता के अधिकार को हासिल करने के नाम पर व्यक्तिगत आजादी को सूली पर टांग दिया जाता रहा है ।
अब एक और तर्क पर विचार करते हैं। त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा गिराने की तुलना कई लोगों ने अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा बुद्ध की प्रतिमा तोड़ने से कर डाली। अब इन उत्साही लोगों को क्या कहा जाए, उनकी अज्ञानता या जानबूझकर गलत तुलना कर भ्रमित करने की कोशिश। वामपंथी विचारधारा वाले जो लोग लेनिन की प्रतिमा ढाहने की तुलना तालिबान से कर रहे हैं उनको क्या यह याद नहीं है कि जब नृपेन चक्रवर्ती त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बने थे तो बकायदा सरकारी सर्क्यूलर जारी कर दफ्तरों से गांधी की तस्वीरें हटवा दी गईं थी। नेहरू की भी। त्रिपुरा में इंदिरा गांधी की प्रतिमा भी तोड़ी गई थी। तब किसी ने उस घटना की तुलना तालिबान से की हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। राजनीति के फेर में जब लेखक फंसते हैं तो ऐसी ही गलतियां या गलत तुलना करने के दोष के शिकार हो जाते हैं। अब ये गलतियां हो जाती हैं या जानबूझकर की जाती हैं इसपर विचार करना होगा। 
त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा को तोड़ने को सही नहीं ठहराया जा सकता है। जिन्होंने भी ऐसा किया उनके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होगी, हो भी रही है, लेकिन उसकी आड़ में जब अचूक अवसरवादी विचारधारा के लोग साहित्य की दुनिया को दूषित करने लगते हैं तो उसका प्रतिकार आवश्यक है। प्रतिकार इसलिए भी किया जाना आवश्यक है कि साहित्य में भी इस विचारधारा को प्रतिपादित करने से देश में मौजूद वैकल्पिक विचारों को नुकसान होता है। हुआ यह कि मार्क्सवाद के अंध अनुयायियों ने मार्क्स के चिंतन को अंतिम सत्य मानने के दुराग्रह ने मार्क्सवाद को जड़ बना दिया। मार्क्सवाद पर बहस से बचने या फिर उसको इतना पवित्र माने जाने कि उसपर सवाल नहीं खड़े हो सकते की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का दुष्परिणाम यह हुआ कि यह विचारधारा फासीवादी के करीब चली गई। मार्क्स तो कम्युनिज्म को ‘मनुष्य मन की एक सुंदर कविता’ मानते थे लेकिन उनके अंध भक्तों ने इसको तर्क से परे करार दे दिया। ई एम एस नंबूदरीपाद बनाम टी नांबियार के एक मुकदमे में नंबूदरीपाद और उऩके वकीलों में मार्क्सवाद की जो व्याख्या सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रस्तुत की उसपर अदालत की टिप्पणी गौरतलब है- ‘हमें शंका है कि इन्होंने मार्क्सवादी साहित्य को ठीक से समझा है या कभी पढ़ा भी है।‘ आगे दो न्यायाधीशों ने अपने फैसले में कहा कि – ‘या तो ये मार्क्स के बारे में कुछ जानते नहीं अन्यथा जानबूझकर मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन की रचनाओं की अपव्याख्या कर रहे हैं।‘ सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी हमारे देश में इस विचारधारा को लेकर, उसके अंतर्विरोधों को लेकर बहुत कुछ कह जाती है।

ये भी हुआ कि ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ को एक ऐसे घर्मग्रंथ के रूप में स्थापित कर दिया गया कि उसपर सवाल करना यानि ईशनिंदा को दोषी होने जैसा हो गया। साहित्य में विचारधारा के घालमेल ने भी पाठकों को भ्रमित किया। विचार या दर्शन कभी साहित्य नहीं हो सकता है। साहित्य को सत्य और साहित्यकारों को सत्य के साथ खड़ा होना होगा तभी साहित्य की भी साख बनेगी और साहित्यकारों की प्रतिष्ठा।