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Saturday, November 22, 2025

सर्वोच्च शिखर पर धर्म-ध्वजा


भारतवासियों के आराध्य प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर अयोध्या में भव्य और दिव्य श्रीराम मंदिर परिसर का निर्माण कार्य पूरा होने को है। श्रीराम मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा तो 22 जनवरी 2024 को हुआ था लेकिन परिसर में अन्य मंदिरों और टीलों के निर्माण से पूरे परिसर को भव्यता मिल रही है। आगामी 25 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुख्य मंदिर का पताकारोहण करेंगे। मुख्य मंदिर का ध्वज  बाइस फीट और ग्यारह फीट आकार का  होगा। केसरिया रंग के ध्वज में रामायणकालीन कोविदार वृक्ष और इक्ष्वाकु वंश के प्रतीक सूर्यदेव, ओंकार के साथ अंकित होंगे। इसके अलावा परिसर में जो अन्य सात मंदिर हैं उन सभी के ध्वज का रंग केसरिया होगा जिसके केंद्र में सूर्यदेव ओंकार के साथ अंकित किए जाएंगे । इस विशाल और भव्य मंदिर के निर्माण की आधारशिला प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 5 अगस्त 2020 को विधि विधान के साथ रखी थी। मंदिर की आधारशिला के दौरान 1989 में विश्वभर से आई शिलाओं में से 9 शिलाओं की भी पूजा की गई थी और उन्हें मंदिर  की नींव में डाली गई । 1989 में श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान दुनिया भर से मंदिर निर्माण के लिए शिलाएं पूजित करके अयोध्या भेजी गई थीं। लगभग 5 वर्षों में नव्य मंदिर का परिसर पूर्ण हुआ। परिसर के मंदिरों के निर्माण में करीब 5 लाख बीस हजार घनफुट गुलाबी सैंड स्टोन का उपयोग किया गया है जो राजस्थान के बंसी पहाड़पुर से लाया गया। इससे मंदिर की भव्यता अलग ही दिखती है। 

मुख्य मंदिर में जहां से गर्भगृह आरंभ होता है वहां सफेद संगमरमर शिलाओं पर उकेरी गई चंद्रधारी गंगा यमुना की बहुत ही सुंदर मूर्तियां हैं। गर्भगृह की बाईं तरफ बड़े से मंडप में एक ताखे पर गणेश जी की मूर्ति है और उसके ऊपर रिद्धि सिद्धि और शुभ लाभ के चिन्ह बनाए गए हैं। एक ताखे में हनुमान जी की प्रणाम मुद्रा की मूर्ति के ऊपर अंगद, सुग्रीव और जामवंत की मूर्तियां बनाई गई हैं। गर्भगृह के मुख्यद्वार के ठीक ऊपर समस्त सृष्टि के पालक विष्णु भगवान की शेषनाग पर लेटी मुद्रा को पत्थर पर उकेरा गया है। उनके पांव के पास देवी लक्ष्मी जी बैठी हुई हैं। शेषशैया पर लेटे विष्णु भगवान के साथ ब्रह्माजी और शिवजी की मूर्तियां भी बनाई गई हैं। गर्भगगृह के ऊपर वाले तल पर श्रीराम दरबार है और उसके ऊपरी तल पर विशाल जगमोहन बनाया गया है जो अभी खाली है। इस जगह का क्या उपयोग होगा ये श्रीरामतीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट तय करेगा। मुख्य मंदिर के उत्तर-पूर्व में विशाल यज्ञमंडप का निर्माण किया गया है और उसके पास ही सीता कूप भी बनाया गया है।परिसर में भगवान गणेश, शंकर, सूर्य भगवान, हनुमान जी, मां दुर्गा और माता अन्नपूर्णा का मंदिर भी निर्मित किया गया है। मंदिर निर्माण से जुड़े लोगों ने बताया कि जहां पहले सीता रसोई हुआ करती थी उसी जगह या उसके पास ही माता अन्नपूर्णा का मंदिर बनाया गया है। इन मंदिरों के अलावा शेष रूप में लक्ष्मण जी की मूर्ति वाले शेषावतार मंदिर को भी नव्य स्वरूप प्रदान किया गया है। इन मंदिरों की मूर्तियों का स्केच पद्मश्री वासुदेव कामत ने तैयार किया और मूर्तियों का निर्माण जयपुर में करवाया गया। वहां से प्रतिमा को अयोध्या लाकर मंदिरों में स्थापित किया गया है।   

श्रीरामजन्मभूमि परिसर में बहुत ही सुंदर तरीके से सप्त मंदिर बनाया गया है। इन सात मंदिरों में आदिकवि महर्षि वाल्मीकि का मंदिर है। महर्षि वाल्मीकि ने ही भारतीय स्संकृति के जीवनदर्शों के दीपस्तंभ रूप रामायण की रचना की थी। इनके साथ ही सूर्यवंश के कुलगुरू महर्षि वसिष्ठ के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने तपोबल से रघुवंश के नरेशों को बल प्रदान किया और सनातन के सुयश का विस्तार किया। किशोर श्रीराम को शिक्षित करने के लिए अपने साथ ले गए और प्रशिक्षण के दौरान महादेव से प्राप्त विविध दिव्यास्त्र श्रीराम को प्रदान किए। इनके साथ ही देवी अहल्या का मंदिर बनाया गया है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार प्रभु श्रीराम के वंदन स्पर्श से पाषाण रूपी अहल्या शापमुक्त होकर स्त्री रूप में वापस आईं। महर्षि अगस्त्य को राष्ट्रसंरक्षक ऋषि कहा जाता है, इनका मंदिर भी जन्मभूमि परिसर में सप्त मंदिर में से एक है। माता शबरी और निषादराज गुह के मंदिर भी बनाए गए हैं। मंदिरों के अलावा इस परिसर में कई टीलों को भी भव्य स्वरूप प्रदान किया गया है। श्री कुबेर टीला इनमें से एक है। पार्वती-शंकर संवाद में जिन प्रमुख तीर्थों की चर्चा आती है उनमें श्रीरामकोट जैसे पवित्र स्थान पर जन्मभूमि समेत कई स्थानों की चर्चा है जिनमें से कुबेर टीला का उल्लेख भी है। मान्यता है कि धन-धान्य के प्रतीक स्वरूप कुबेर जी का यहां निवास है। रुद्रमयाल में इस बात का भी उल्लेख है कि कुबेर टीला के पूर्व में सुषेण जी और उत्तर में गवाक्ष जी स्थापित हैं। 1902 में एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का शिलालेख यहां स्थापित किया गया है। इसके अलावा अंगद टीला को भी नव्य स्वरूप प्रदान किया गया है। जटायु की बड़ी सी आकृति भी मंदिर परिसर में स्थापित की गई है। जनश्रुतियों में रामकथा में गिलहरी की खूब चर्चा होती है। रामसेतु के निर्माण में गिलहरी ने भी अपना योगदान किया था। लोक की इस मान्यता को भी परिसर में स्थापित किया गया है। स्थल का नाम है पावन गिलहरी। ये संदेश देती है कि सूक्ष्म जीव भी अपने प्रयास से किसी बड़े अभियान का हिस्सा हो सकते हैं। तीर्थयात्री सहायता केंद्र के बिल्कुल समीप तुलसीदास जी की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। 

जन्मभूमि परिसर के चार दरवाजे वैष्णव परंपरा के संतों के नाम पर रखे गए हैं। जगदगुरु श्रीरामानंदाचार्य जगदगुरु श्री माध्वाचार्य, जगदगुरु आद्य शंकराचार्य और जगदगुरु श्रीरामानुजाचार्य। इसके अलावा परिसर में 732 मीटर लंबा एक परकोटे का निर्माण किया गया है जिसपर भारत दर्शन और नीति व बोध कथाएं, ब्रॉन्ज पैनल के रूप में उकेरी गई हैं। इनकी संख्या 79 है। इसे गोविंद देव गिरी के निर्देशन में संस्कृतिकर्मी यतीन्द्र मिश्र ने चयनित किया है। इसकी ड्राइंग वासुदेव कामथ जी ने बनाई है, जिसे देश भर के अलग अलग कलाकारों ने तैयार किया है। मुख्य मंदिर के लोअर प्लिंथ पर वाल्मीकि रामायण की कथा के अनुरूप विविध विषयों के चित्र प्रख्यात चित्रकार वासुदेव कामथ ने बनाया है। इसका परिचयात्मक लेखन यतीन्द्र मिश्र ने तैयार किया है। पत्थर पर निर्मित ये थ्री डी कलात्मक संयोजन देश के पत्थर पर काम करने वाले विशिष्ट कलाकारों ने बनाया है। इनकी कुल संख्या 87 है। मंदिर परिसर में एक स्मृति स्तंभ का भी निर्माण किया गया है जिसपर उन सभी ज्ञात-अज्ञात लोगों के नाम अंकित हैं जिन्होंने श्रीराम मंदिर के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। पताकारोहण के साथ ही श्रीराम मंदिर विश्व भर के श्रद्धालुओं के लिए परम पूज्य पावन तीर्थ के नव्य स्वरूप का निर्माण पूर्णता प्राप्त कर लेगा । 


Saturday, August 28, 2021

विभाजन विभीषिका पर उदासीन साहित्य


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पहले एक ट्वीट किया। लिखा कि ‘देश के बंटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता। नफरत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गंवानी पड़ी। उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया है।‘  केंद्र सरकार के इस फैसले पर राजनीति आरंभ हो गई है। हम राजनीति से इतर साहित्य सृजन के आइने में विभाजन की विभीषिका को परखने की कोशिश करते हैं। 1947 में हमारे देश का बंटवारा हुआ। उसके बाद के हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर नजर डालें तो इस विषय को केंद्र में रखकर बहुत कम लेखन नजर आता है। ले-देकर यशपाल की औपन्यासिक कृति ‘झूठा सच’ का दो खंड और भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ का नाम याद पड़ता है। बदीउज्जमा के उपन्यास ‘छाको की वापसी’ के अलावा सच्चिदानंद हीरानंद  वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, मोहन राकेश और कृष्णा सोबती ने कुछ कहानियां लिखी हैं। बहुत बाद में आकर कमलेश्वर ने भी लिखा। भीष्म जी को भी तमस लिखने में बीस साल से अधिक लगे। कथा साहित्य में तो कुछ रचनाएं मिलती भी हैं लेकिन कवियों ने तो इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया, प्रतीत होता है। अज्ञेय की ही एक कविता ‘शरणार्थी’ का स्मरण होता है। वामपंथी लेखक जिन मुक्तिबोध को अपना सबसे बड़ा कवि मानते और प्रचारित करते हैं उनकी रचनाओं में भी विभाजन की विभीषिका नहीं दिखाई देती है। दूसरी तरफ गुरुदत्त जैसे राष्ट्रवादी लेखकों ने विभाजन पर कम से कम आधा दर्जन उपन्यास लिखे। लेकिन गुरुदत्त को इन कथित प्रगतिशील लेखकों और आलोचकों ने साहित्य के परिदृश्य से ओझल कर दिया। उनकी विभाजन पर लिखी रचनाओं पर न तो आलोचनात्मक लेख लिखे गए और न ही किसी विमर्श में उनका नामोल्लेख किया जाता है। बावजूद इसके जब भी हिंदी में विभाजन पर लिखे साहित्य की बात होगी तो गुरुदत्त का नाम लेना ही पड़ेगा।  

स्वाधीनता के बाद हिंदी साहित्य में प्रगतिशीलता का झंडा लेकर घूमनेवाले लेखकों का बोलबाला रहा है। कई तरह के साहित्यिक आंदोलन चले लेकिन उन आंदोलनों में कहीं भी विभाजन की विभीषिका के दर्द और संघर्ष को जगह नहीं मिल पाई है। लाखों लोगों की जान गई, उससे अधिक लोग विस्थापित हुए। मरनेवालों के परिवार और विस्थापित समूहों के दर्द को हिंदी साहित्य के लेखक पकड़ नहीं पाए। पिछले दिनों मार्क्सवादी लेखक जगदीश्वर चतुर्वेदी से बात हो रही थी तो उन्होंने एक बेहद चौंकानेवाला तथ्य बताया। 15 अगस्त 1947 में जब देश स्वाधीन हुआ तो उसके अगले महीने यानि सितंबर में प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में प्रगतिशील लेखक संघ की एक बैठक हुई। उस बैठक में उस वक्त के तमाम छोटे-बड़े लेखक शामिल हुए थे। सितंबर 1947 में हुए प्रगतिशील लेखक संघ की इस बैठक में 22 प्रस्ताव पास किए गए थे। इन 22 प्रस्तावों में कहीं भी विभाजन की चर्चा तो दूर की बात उसका उल्लेख तक नहीं था। ये वो दौर था जब पूरे देश में सिर्फ विभीषिका की चर्चा ही हो रही थी। यह तथाकथित प्रगतिशील लेखकों की अज्ञानता नहीं हो सकती है ये तो उदासीनता थी। बैठक के एक प्रस्ताव में एक या डेढ़ पंक्ति में सांप्रदायिकता की बात कही गई थी। ये चर्चा भी इस वजह से हुई कि प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक के एक दिन पहले शाम को प्रयागराज के मुस्लिम बहुल इलाके में छुरेबाजी की घटना हुई थी। जिसकी वजह से प्रस्ताव में सांप्रदायिकता का उल्लेख हुआ था। ये वही प्रगतिशील लेखक संघ है जिसने 1975 में इमरजेंसी लगाए जाने के बाद दिल्ली में हुई अपनी बैठक में उसका समर्थन किया था। इमरजेंसी के समर्थन में प्रस्ताव पास किया था। इसलिए यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि लेखक संघों की बैठक में राजनीतिक मसलों पर प्रस्ताव पास नहीं किए जाते थे। विभाजन का दर्द वैसे भी राजनीतिक मसला नहीं था बल्कि वो सामाजिक और मानवीय मसला था। मानवता के कलेजे पर भोंके गए इस खंजर का दर्द उस समनय के हिंदी के लेखक महसूस नहीं कर सके।  

दरअसल अगर हम समग्रता में विचार करें तो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि जिन लेखकों की आस्था कम्युनिस्ट पार्टियों में थीं वो विभाजन को लेकर उदासीन रहे, उसके दर्द को लेकर खामोश रहे। अपनी इस उदासीनता को उन्होंने बहुत करीने से दबाए रखा। वो लगातार ये नारा लगा रहे थे कि ‘ये आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी है’ । ये नारा नहीं कम्युनिस्टों की मानसिकता को दर्शा रहा था। स्वाधीनता का ये अस्वीकार क्यों था। ये एक अलग लेख की मांग करता है। जब एक संप्रभु राष्ट्र जन्म ले रहा था तो ये कम्युनिस्ट उसका स्वागत करने की बजाए उसपर प्रश्न खड़े कर रहे थे। जब देश में लोकतंत्र स्थापित हो रहा था तो ये भूख और गरीबी का नारा लगाकर लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे थे। इनको ये बुनियादी बात समझ नहीं आ रही थी कि अगर देश स्वतंत्र नहीं होगा तो भूख और गरीबी कैसे हटेगी। दरअसल ये कम्युनिस्ट मन से स्वाधीनता के विरोधी थे। ये अनायास नहीं था कि देश के स्वतंत्र होने के 74 साल बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने कार्यालय पर तिरंगा झंडा फहराया। जब मातृ संगठन की ये सोच होगी तो उससे संबद्ध लेखक संगठन और उन लेखक संगठनों से जुड़े लेखक भी तो इसी सोच के आधार पर सृजन करेंगे। हिंदी साहित्य में विभाजन की विभीषिका पर कहानी-कविता तो कम लिखी ही गईं कोई विमर्श भी नहीं हुआ। तो क्या ये माना जाए कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में ऐसा किया गया। 

दूसरा तर्क ये हो सकता है कि विभाजन के समय सक्रिय हिंदी के लेखकों की सोच का दायरा बहुत छोटा रहा। उनकी संवेदना में विभाजन का दर्द या विस्थापन की पीड़ा आ ही नहीं सकी। वो जिस भौगोलिक क्षेत्र में रहते थे वहां का विभाजन नहीं हुआ तो वो स्वतंत्र भारत की इस घटना को महसूस नहीं कर सके। पंजाब का विभाजन हुआ तो पंजाबी साहित्य में विभाजन को लेकर, उसके अलग अलग पहलुओं को लेकर विपुल लेखन हुआ। बंगाल का विभाजन हुआ तो बंगला में विभाजन पर, उसके असर को लेकर कई उत्कृष्ट कृतियां हैं। ये सही है कि हिंदी प्रदेश का भौगोलिक विभाजन नहीं हुआ लेकिन हिंदी प्रदेशों ने विभाजन की विभीषिका को तो बहुत करीब से देखा तो था ही। हिंदी के लेखकों की संवेदना क्यों नहीं झंकृत हुईं, ये आश्चर्य की बात है। इसी भौगोलिक प्रदेश के इतिहासकारों ने विभाजन को लेकर बहुत लिखा। भारत विभाजन के राजनीतिक पक्ष भी बहुत लिखा गया लेकिन हिंदी के लेखक अलग अलग विषयों में उलझे रहे। कहानी कविता से इतर आकर अगर आलोचना पर भी विचार करें तो वहां भी देश के बंटवारे को लेकर कोई डिस्कोर्स नहीं दिखता। रामविलास जी से लेकर नामवर सिंह तक के लेखन में इस विषय को प्रमुखता नहीं मिलती है। नामवर सिंह तो उर्दू के भी जानकार माने जाते हैं, उनको बंगला का भी ज्ञान था लेकिन उनके लेखन में भी विभाजन की बात नहीं आना हैरत में डालता है। बात घूम फिरकर वहीं पहुंचती है कि कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रभाव में रहनेवाले लेखकों को विभाजन का दर्द या तो समझ नहीं आया या फिर वो जानबूझकर उस वक्त हुए नरसंहार और विस्थापन को लेकर आंखें मूंदे बैठे रहे। अब अगर विभाजन विभीषिका दिवस की घोषणा हुई है तो एक बार फिर से हिंदी के लेखकों को अपनी इस ऐतिहासिक भूल पर विचार करना चाहिए और उसको सुधारने का उपक्रम भी। 


Monday, March 21, 2011

संगीन इल्जाम, लचर दलील

भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों से चौतरफा घिरी मनमोहन सरकार के लिए विकिलीक्स के खुलासे के बाद मुश्किलें और बढ़ गई हैं । मनमोहन सिंह की सरकार की साख पर लगातार लग रहे बट्टे ने प्रधानमंत्री की छवि को कमजोर किया है । यूपीए वन के दौरान जिस तरह से न्यूक्लियर डील पर सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त का खुलासा हुआ है, उसके बारे में उस वक्त भी काफी चर्चा हुई थी और जांच वगैरह भी हुई थी । लेकिन ताजा खुलासे ने विपक्ष को सरकार पर एक बार फिर हमला करने का मौका दे दिया । खुलासे पर फजीहत होते देख पहले सरकार के कद्दावर मंत्री और संकटमोचक प्रणब मुखर्जी ने मोर्चा संभाला । संसद में विपक्ष के हमलावर तेवर पर पलटवार करते हुए वित्त मंत्री ने यह कहकर विपक्ष के आरोपों की हवा निकालने की कोशिश की यह पूरा मामला चौदहवीं लोकसभा का है और पंद्रहवीं लोकसभा पिछली लोकसभा में हुई घटनाओं पर विचार नहीं कर सकती । इतने संगीन इल्जाम पर सरकार की ओर से वित्त मंत्री और कानून, संसदीय परंपरा और सरकारी नियमों के चलते फिरते इंसाइक्लोपीडिया माने जानेवाले प्रणब मुखर्जी ने बेहद हल्की बात करके पूरे देश को चौंका दिया । प्रणब मुखर्जी की याददाश्त का लोहा पूरा देश मानता है । क्या प्रणब मुखर्जी यह भूल गए कि जब इमरजेंसी के खत्म होने के बाद हुए चुनाव के बाद सातवीं लोकसभा का गठन हुआ थो तो सदन ने इंदिरा गांधी को उसके पहले के लोकसभा के दौरान उनके किए कार्यों पर कार्रवाई की थी । उस वक्त इंदिरा गांधी के निकट सहयोगी रहे प्रणब दा क्या यह भी भूल गए कि जब जनता सरकार के पतन के बाद उन्नीस सौ अस्सी में इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में आई और आठवीं लोकसभा का गठन हुआ तो उसने फिर से पिछली लोकसभा के इंदिरा गांधी के मुतल्लिक लिए गए फैसलों को पलट दिया था । इन दोनों उदाहरणों से यह साबित होता है कि सरकार के सबसे बड़े संकटमोचक से चूक हो गई । क्या प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस पार्टी कुछ ही दिन पहले लिए गए सरकार के निर्णय को ही भूल गई । कुछ ही दिन पहले सरकार ने टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय दल का गठन किया है जो पिछली लोकसभा के दौरान लिए गए निर्णयों को कसौटी पर कसेगा । इन आधारहीन तर्कों को खारिज करते हुए विपक्ष ने सरकार पर अपना हमला जारी रखा और प्रधानमंत्री से सदन में बयान देने का दबाव बढ़ा दिया । नतीजे में प्रधानमंत्री को संसद में बयान देना पड़ा ।
आक्रमण सबसे अच्छा बचाव की तर्ज पर प्रधानमंत्री ने संसद के दोनों सदनों में बयान दिया । अपनी सरकार और पार्टी का जोरदार बचाव करते हुए प्रधानमंत्री ने नोट के बदले वोट के आरोपों को खारिज करते हुए विपक्ष पर तीखा प्रहार किया । मनमोहन सिंह ने अपनी पिछली सरकार को बचाने के लिए सांसदों की खरीद फरोख्त के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए विपक्ष को यह कहते हुए आईना दिखाने की कोशिश की कि जनता ने आमचुनाव में विपक्ष के इन आरोपों को तवज्जो नहीं दी । कांग्रेस पार्टी को पिछले आमचुनाव में 2004 के चुनाव के मुकाबले ज्यादा सीटें मिली । प्रधानमंत्री मनमोहमन सिंह ने संसद में दिए अपने बयान में बीजेपी और वामदलों को चुनाव में मिली कम सीटें भी गिना दीं । मनमोहन सिंह ने यह तर्क दिया कि विपक्ष जनता द्वारा नकारे गए आरोपों को फिर से हवा देकर बेवजह सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है । अपने वित्त मंत्री की राह पर चलते हुए प्रधानमंत्री ने भी बेहद लचर तर्कों का सहारा लिया । क्या चुनाव जीत जाने से सारे आरोप और जुर्म खारिज हो जाते हैं । क्या सही गलत का फैसला जनता की अदालत में ही हुआ करेगी, क्या अब जांच एजेंसी और जांच कमेटियां बेमानी हो जाएंगी ।
अगर प्रधानमंत्री के इन बयानों को मान लिया जाए तो तमाम अपराधी और गुंडे जो विधायक या सांसद बन जाते हैं उनके जुर्म चुनाव जीतते ही खत्म हो जाते हैं । इस तर्क के आधार पर बिहार के बाहुबली सांसद रहे शाहबुद्दीन के तमाम जुर्म गलत हैं क्योंकि अदालत द्वारा मुजरिम करार दिए जाने और कोर्ट से चुनाव लड़ने पर रोक लगाने के पहले तो शाहबुद्दीन को जनता लगातार चुनकर लोकसभा में भेजती रही थी । क्या अपने बयान से प्रधानमंत्री यह संदेश देना चाह रहे हैं कि आप चाहें जितना भी बड़ा अपराध करें अगर जनता ने आपको चुन लिया है तो आपके सारे पाप धुल जाते हैं । क्या प्रधानमंत्री अपने इस बयान से डीएमके के नेताओं को यह संदेश देना चाह रहे हैं कि ए राजा पर चाहे एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के टेलीकॉम घोटाले का आरोप लगा हो लेकिन अगर वो फिर से चुनाव जीत जाते हैं तो सारे आरोप खारिज हो जाएंगे । देश के शीर्ष पद पर बैठा एक जिम्मेदार व्यक्ति अगर देश की सबसे बड़ी पंचायत में इस तरह का गैर जिम्मेदाराना बयान देता है तो लोकतंत्र के लिए बेहद चिंता की बात है । चिंता इस बात को लेकर भी होती है कि जिसके हाथ में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चलाने और उसकी गरिमा को बचाने की जिम्मेदारी है वह लोकतंत्र और जनता के समर्थन को ही घोटालों से बचने की ढाल बना रहा है । संसद में प्रधानमंत्री के उक्त बयान को कांग्रेस के लोग बेहद आक्रामक और हमलावर बयान करार देकर खुद की पीठ थपथपा रहे हैं । आक्रामक दिखने वाले उक्त बयान में ना तो गंभीरता है और ना ही दम ।
जिस तरह की लचर दलील और जनता के समर्थन की आड़ लेकर प्रधनामंत्री मनमोहन सिंह ने नोट के बदले वोट के आरोपों को नकारनेवाला बयान दिया है उसी से मिलता जुलता बयान लंदन में भारत के हाई कमिश्नर रहे बी के नेहरू ने भी दिया था । जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनावी गड़बड़ियों के आधार पर खारिज कर दिया था, तब बी के नेहरू ने कहा था कि अदालत के इस फैसले से इंदिरा गांधी के राजनीतिक भविष्य पर कोई असर नहीं पड़नेवाला है । श्रीमती गांधी को अब भी देश की जनता का जबरदस्त समर्थन हासिल है और मुझे लगता है कि भारत के प्रधानमंत्री को उस वक्त तक अपने पद पर बने रहना चाहिए जब तक कि जनादेश उनके खिलाफ ना हो । उस वक्त इंदिरा गांधी के चमचों ने उन्हें देश में इमरजेंसी लगाने की सलाह दी थी और पद छोड़ने के भयानक दबाव में श्रीमती गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा थी । उसके बाद क्या हुआ यह इतिहास है । अब वक्त आ गया है कि सरकार देश को गुमराह करना छोड़े, जनता की आड़ लेकर लोकतंत्र को कमजोर करनेवालों लोगों की इमानदारी से पहचान की जाए और उन्हें सख्त सजा मिले ताकि भविष्य में इस तरह की हरकतें नहीं दुहारई जाएं ।