Translate

Showing posts with label स्मृति इरानी. Show all posts
Showing posts with label स्मृति इरानी. Show all posts

Saturday, June 15, 2024

अहंकार के छद्म विमर्श से राजनीति


अहंकार। लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद इस शब्द पर काफी चर्चा हो रही है लोकसभा चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान एरोगेंट शब्द की चर्चा थी। केंद्र सरकार के मंत्रियों की बात हो या फिर भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं की। आसानी से उनके स्वभाव के साथ एरोगेंट शब्द चिपका दिया जाता था। एरोगेंट से अगली कड़ी के रूप में अहंकार आया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक को अहंकारी कहा गया। अमेठी में स्मृति इरानी की चुनावी हार को उनके अहंकार से जोड़ा गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब संसद में एक अकेला सब पर भारी बोला था तभी से उनके साथ एरोगेंट शब्द चिपकाने का अभियान विपक्षी दलों और उनके इकोसिस्टम ने चलाया। एक प्रधानमंत्री के तौर पर जब वो अपने विकास कार्यों को गिनाते थे, अपने संबोधन में मैं का प्रयोग करते थे तो इस मैं को भी एरोगेंट के कोष्ठक में डाल दिया जाता था। इकोसिस्टम से जुड़े विश्लेषकों ने मोदी के भाषणों के चुनिंदा अंश को उठाकर उनके व्यक्तित्व के साथ एरोगेंट शब्द चिपकाने का खेल खेला। यह अभियान लंबे समय से चल रहा था। चुनाव के दौरान इसमें तेजी आई। इसी तरह स्मृति इरानी के व्यक्तित्व के साथ भी एरोगेंट शब्द चिपकाने का खेल चला। कभी किसी सरकारी अधिकारी को जनता के पक्ष में काम करने को लेकर उनके संवाद के अंश काटकर तो कभी किसी पत्रकार को उनके उत्तर को एरोगेंट कहा गया। चुनाव में जब अमेठी गया था तो वहां पता चला कि एक व्यक्ति की हत्या हो गई थी। उस इलाके के प्रभावशाली लोग हत्या के आरोपी को बचाने में लगे थे। स्मृति इरानी को जब पता चला तो वो पीड़ित के पक्ष में खड़ी हो गईं। हत्यारोपी के विरुद्ध कानून सम्मत कार्य करने के लिए पुलिस को कहा। तब उस इलाके के प्रभावशाली लोगों ने कहा कि स्मृति एरोगेंट हो गई है और किसी की नहीं सुनती। इसको इकोसिस्टम ने आगे बढ़ाया।

चुनाव परिणाम में जब भारतीय जनता पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सबसे बड़े दल और चुनाव पूर्व गठबंधन के तौर पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बहुमत मिला और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बन गई। मंत्रिमंडल का गठन हो गया। मंत्रिमंडल गठन के बाद राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कार्यकर्ता विकास वर्ग के अपने संबोधन में अपनी बातें रखीं। उसमें भी अहंकार शब्द का प्रयोग किया गया। फिर क्या था इकोसिस्टम को मसाला मिल गया। उसको नरेन्द्र मोदी को नसीहत के तौर पर पेश किया जाने लगा। पृष्ठभूमि बनाई ही जा चुकी थी। सरसंघचालक के बयान से निकलनेवाले संदेश को समझना है तो उसको समग्रता में देखना होगा। पहले बात कर लेते हैं अहंकार की। सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में कहा, जो सेवा करता है, जो वास्तविक सेवक है, जिसको वास्तविक सेवक कहा जा सकता है उसको कोई मर्यादा रहती है यानी वो मर्यादा से चलता है। काम सब लोग करते हैं, लेकिन कार्य करते समय मर्यादा का पालन करना। जैसा कि तथागत ने कहा है—कुशलस्य उपसंपदा, यानी अपनी आजीविका पेट भरने का काम सबको लगा ही है, करना ही चाहिए। अपने शरीर को भूखा नहीं रखना है, लेकिन कौशल पूर्वक जीविका कमानी है और कार्य करते समय दूसरों को धक्का नहीं लगना चाहिए। ये मर्यादा भी उसमें निहित है। ऐसी मर्यादा रखकर हम लोग काम करते हैं। काम करने वाला उस मर्यादा का ध्यान रखता है। वो मर्यादा ही अपना धर्म है, संस्कृति है। जो पूज्य महंत गुरुवर्य महंत रामगिरी जी महाराज जी ने अभी बहुत मार्मिक कथाओं से थोड़े में बताई, उस मर्यादा का पालन करके जो चलता है, कर्म करता है, कर्मों में लिप्त नहीं होता, उसमें अहंकार नहीं आता। वही सेवक कहलाने का अधिकारी रहता है।

उपर्युक्त वक्तव्य में से अगर सिर्फ अंतिम वाक्य को निकालकर उसको नरेन्द्र मोदी या उनकी सरकार के मंत्रियों के क्रियाकलापों और व्यवहार से जोड़ दिया गया। सरसंघचालक ने अपने वक्तव्य के इस हिस्से में सेवा और मर्यादा की बात की। इसके लिए उन्होंने तथागत और महंत रामगिरी जी को उद्धृत किया। इसमें राजनीति की बात तो कहीं है नहीं, समाज सेवा की बात है जो वो संघ शिक्षा वर्ग के प्रतिभागियों को समझा रहे हैं। इसी तरह से मणिपुर को लेकर उनकी चिंता भी समाज की चिंता है। जब वो कहते हैं कि समाज में जगह-जगह कलह नहीं चलता। एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। उससे पहले 10 साल शांत रहा। ऐसा लगा कि पुराना ‘गन कल्चर’ समाप्त हो गया। परन्तु अचानक जो कलह वहां पर उपज गई या उपजाई गई, उसकी आग में वह अभी तक जल रहा है, त्राहि-त्राहि कर रहा है। कौन उस पर ध्यान देगा? प्राथमिकता देकर उसका विचार करना हमारा कर्तव्य है। इकोसिस्टम के लोग इस अंश को लेकर भी मोदी पर हमलावर होने का प्रयास करते नजर आ हैं। कुछ लोग तो यहां तक कह जा रहे हैं कि संघ प्रमुख ने पहली बार मणिपुर की स्थिति पर अपनी बात रखी है। दरअसल ऐसे लोगों को संघ की कार्य करने की पद्धति का अल्पज्ञान है। मोहन भागवत ने 2023 के विजयदशमी के अपने भाषण में भी मणिपुर के हालात पर चिंता प्रकट की थी। इसके बाद संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने मणिपुर पर बयान जारी किया था। संघ निरंतरता में मणिपुर की स्थिति को लेकर चिंता प्रकट कर रहा है। इसको मोदी की आलोचना करार देना इकोसिस्टम की राजनीतिक चाल है।

संघ प्रमुख के बयान को आंशिक रूप से उद्धृत कर संघ और भाजपा में काल्पनिक टकराव बतानेवाले विश्लेषक यह भूल जा रहे हैं कि मोहन भागवत ने अपने भाषण में मोदी सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वो कहते हैं कि पिछले दस वर्षों में बहुत कुछ अच्छा हुआ। आधुनिक दुनिया जिन मानकों को मानती है, जिनके आधार पर आर्थिक की स्थिति का मापन किया जाता है उनके अनुसार भी हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो रही है। हमारी सामरिक स्थिति निश्चित रूप से पहले से अधिक अच्छी है। दुनियाभर में हमारे देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है। इतनी स्पष्टता के बावजूद अगर विपक्ष को उस बयान पर राजनीति ही करनी है तो उनको मोहन भागवत के भाषण का वो अंश देखना चाहिए जहां तकनीक के सहारे असत्य परोसने की बात उन्होंने कही और प्रश्न उठाया कि क्या शास्त्र का, विज्ञान का, विद्या का यह उपयोग है? इसके बाद अपना मत प्रकट किया कि सज्जन विद्या का ये उपयोग नहीं करते। दरअसल विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम चुनाव में अपनी हार की खीझ मिटाने के लिए वाराणसी, अमेठी और फैजाबाद लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों पर केंद्रित हो गया है। अमेठी में भारतीय जनता पार्टी की हार के अनेक कारण हैं जबकि स्मृति इरानी के अहंकार को एकमात्र कारण बताया जा रहा है। लोगों के साथ खड़े होने और शक्तिशाली लोगों के सामने निर्बल को प्राथमिकता देने को अहंकार कहकर प्रचारित किया गया। वाऱाणसी में भाजपा की जीत का अंतर कम होने को मोदी के अहंकार से जोड़ दिया गया। फैजाबाद की हार को प्रभु श्रीराम से जोड़ दिया गया। गजब है राजनीति का खेल और गजब है (कु) तर्क गढ़ने का हुनर।    

Saturday, May 18, 2024

अमेठी में भावना और विकास का संघर्ष


सोमवार को लोकसभा के पांचवें चरण के लिए मतदान होना है। उत्तर प्रदेश की कई अन्य सीटों के साथ रायबरेली और अमेठी में भी इस दिन वोट डाले जाएंगे। 2019 में अमेठी से पराजित होने के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी बगल की सीट रायबरेली से चुनाव लड़ रहे हैं। अबतक उनकी मां सोनिया गांधी रायबरेली से सांसद थीं। अमेठी से केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी के रूप में तीसरी बार चुनाव मैदान में हैं। उनके सामने लंबे समय से गांधी परिवार का कामकाज देखनेवाले किशोरी लाल शर्मा कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। अमेठी में कांग्रेस पार्टी की तरफ से प्रचार का जिम्मा प्रियंका गांधी वाड्रा ने ले रखा है। वो गली मोहल्लों में चुनावी सभा कर रही हैं। चुनाव को भावनात्मक रूप देने का भी प्रयत्न किया जा रहा है। वो निरंतर अपने पिता राजीव गांधी और उनके कार्यों के बारे में बोल रही हैं। तुलनात्मक रूप से अगर देखा जाए तो प्रियंका गांधी वाड्रा राहुल गांधी के अमेठी के सांसद के तौर पर 15 वर्षों के काम पर बहुत ही कम बोल रही हैं। लगभग हर सभा में गांधी परिवार और अमेठी के रिश्तों को रेखांकित करती हुई नजर आईं। इस रिश्ते पर अमेठी की जनता का कितना भरोसा था ये तो 2019 के चुनाव परिणाम में सामने आ गया था, जब स्मृति इरानी ने राहुल गांधी को 55 हजार से अधिक मतों से पराजित कर दिया था। गांधी परिवार के सदस्य की अमेठी से ये तीसरी हार थी। इसके पहले संजय गांधी भी 1977 का लोकसभा चुनाव वहां से हार चुके थे। बाद में मेनका गांधी भी राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़कर हारीं। राहुल गांधी की हार इस मायने में कांग्रेस की राजनीति का एक अहम मोड़ था क्योंकि वो तब पार्टी के अध्यक्ष थे। राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के पहले अध्यक्ष थे जो पद पर रहते हुए लोकसभा का चुनाव हारे थे। 

रही बात प्रियंका गांधी वाड्रा की तो उत्तर प्रदेश का 2022 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने प्रियंका गांधी की अगुवाई में लड़ा था और पूरे प्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। पूरे प्रदेश में कांग्रेस का मत प्रतिशत भी दो ढाई प्रतिशत के करीब तक गिर गया था। राजनीतिक पंडित भी इस बात को मानते हैं कि अगर किसी पार्टी को चुनाव में छह प्रतिशत से कम वोट मिलते हैं तो उसको फिर से खड़ा होने में काफी समय लगता है। कांग्रेस इस समस्या से जूझ रही है। पिछले दिनों अमेठी और रायबरेली लोकसभा क्षेत्र में जाने और वहां के मतदाताओं से मिलने और बात करने का अवसर मिला था। वहां ये पता चला कि 2003 में जब प्रियंका गांधी अमेठी आई थीं तो उनके साथ उनके पति राबर्ट वाड्रा भी आए थे। उस समय राबर्ट और प्रियंका का अमेठी के लोगों ने स्वागत किया था। कई गांव में उनको ले जाया गया था। अमेठी में पोस्टर भी लगे थे कि दीदी जीजा जी आए हैं नई रोशनी लाए हैं। उसके बाद हर चुनाव के समय पहले दीदी, फिर जीजा जी आते रहे, चुनावी वादे होते रहे। उन वादों को जमीन पर उतरने का अमेठी के लोगों को इंतजार ही रहा। जब वादे पूरे नहीं हुए तो प्रियंका वाड्रा को अमेठी की जनता की उदासीनता का सामना भी करना पड़ा था। कुछ लोग किशोरी लाल शर्मा के क्षेत्र से जुड़े होने का दावा करते नजर आए लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में किशोरी लाल शर्मा को कांग्रेस ने ही कम तवज्जो दी थी। तब राहुल गांधी के प्रतिनिधि चंद्रकांत दुबे थे। प्रियंका के सहयोगी धीरज श्रीवास्तव और राहुल के करीबी साथी कनिष्क सिंह चुनाव में अहम भूमिका निभा रहे थे। जब राहुल गांधी ने अमेठी ने न लड़ने का निर्णय लिया तो पार्टी को किशोरी लाल शर्मा की याद आई। किशोरी लाल शर्मा अच्छे चुनावी मैनेजर हो सकते हैं लेकिन एक नेता के तौर पर उनके काम का सामने आना अभी शेष है। अमेठी के जिन वोटरों से मैं मिला उनमें किशोरी लाल शर्मा को लेकर एक संशय दिखा। 

2019 में जब अमेठी लोकसभा चुनाव हो रहे थे तब भी मैं उस क्षेत्र में गया था। चुनाव के बाद भी कई बार गया। इस बार अमेठी में जो बदलाव देखने का मिला वो कई मायनों में गेमचेंजर हो सकता है। चार पांच वर्ष पहले अमेठी के कई गांवों में छप्पर वाले घर दिखाई देते थे। अब कम गांवों में ही छप्पर वाले घर दिखाई देते हैं। गौरीगंज से जामों जानेवाली सड़क पर दुबे जलपान गृह में हमलोग कुछ देर के लिए रुके थे। वहां माधोपुर गांव के कुछ लोग बैठे थे। उनसे जब इस बारे मे बात की तो उनकी भी राय थी कि अमेठी लोकसभा क्षेत्र में छप्पर वाले घर बहुत कम हो गए हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना में लोगों के घर पक्के हो गए हैं। शौचालय बन गए हैं। वहां बैठे रामाधर सिंह ने बताया कि छप्पर कम होने से अमेठी में आग लगने की घटनाएं बहुत कम हो गई हैं। पहले अमेठी में आग लगने की काफी घटनाएं होती थीं। यह अनायस नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी स्मृति इरानी यह दावा करती हैं कि उनके क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत एक लाख चौदह हजार घर बने और चार लाख से अधिक शौचालय बने। वो ये भी बताती हैं कि इतना काम तीन वर्षों में ही हो पाया क्योंकि दो वर्ष कोरोना महामारी की भेंट चढ़ गए। इस जलपान गृह में काफी देर तक हमलोग अमेठी की राजनीति को समझने का प्रयत्न करते रहे। यहां कुछ कांग्रेस समर्थक भी आए। पहले तो उन्होंने आते ही प्रत्याशी किशोरी लाल की प्रशंसा आरंभ की। थोड़ी देर बाद वो खुले तो उनका दर्द झलक गया और कहने लगे कि राहुल गांधी अपने आसपास के लोगों से इतना घिरे रहते हैं कि जनता उनसे मिल ही नही पाती है। उनमे में से एक बुजुर्ग व्यक्ति ने बहुत मार्के की बात कही, राजीव गांधी और संजय गांधी अमेठी से भावनात्मक संबंध इस कारण बना पाए थे कि उनके पास सतीश शर्मा, जे एन मिश्रा और किशोर उपाध्याय जैसे समर्पित व्यक्ति थे, जो निरंतर क्षेत्र की जनता के साथ संवाद और संपर्क में रहते थे। अपने नेता और जनता के बीच दीवार नहीं बनते थे। 

यहां से गौरीगंज के कांग्रेस कार्यालय होते हुए हमलोग आलोक ढाबा पहुंचे। 2014 में इसी आलोक ढाबा से स्मृति इरानी ने अपना चुनाव लड़ा था। वहां चुनावी सरगर्मी बनी रहती है। इस ढावा के मालिक आलोक जी सह्दय व्यक्ति हैं। बोलते कम, सुनते और मुस्कुराते ज्यादा हैं। वहीं पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता मतदाता जागरूक रैली की तैयारी कर रहे थे। वो बहुत उत्साहित थे। वहां पर विद्यार्थी परिषद के सुल्तानपुर और अमेठी के संगठन मंत्री प्रिंस कुमार मिले। उनसे राजनीति की बहुत बातें होती रहीं। उनकी बातों में राजनीतिक परिपक्वता झलक रही थी। अमेठी चुनाव और कार्यकर्ताओं को लेकर उनकी टिप्पणी उचित प्रतीत हुई। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी परिषद से जुड़े कई कार्यकर्ताओं के घर के बड़े कांग्रेसी हैं, जिस कारण वो मुखर नहीं हो पा रहे हैं। जब हम वापस लौटने को हुए तो प्रिंस ने एक बेहद सधी हुई टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा कि अमेठी में कांग्रेस पार्टी नहीं, प्रथा है। किसी भी प्रथा को समाप्त करने में समय लगता है। बाल विवाह प्रथा को समाप्त करने के लिए समाज सुधारकों को काफी लंबा संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन अब भी पूरी तरह से ये प्रथाएं समाप्त नहीं हुईं कहीं न कहीं इसके अवशेष देखने को मिल ही जाते हैं। इस राजनीतिक आब्जर्वेशन से चौंका पर ट्रेनिंग तो विद्यार्थी परिषद की है। 


Saturday, May 4, 2024

अमेठी से जीत का नहीं था भरोसा


लोकसभा चुनाव के दौरान अमेठी और रायबरेली से कांग्रेस प्रत्याशी की घोषणा को लेकर अनिश्चितता नामांकन के अंतिम दिन दूर हुई। कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी रायबरेली से कांग्रेस के उम्मीदवार बने। प्रियंका गांधी वाड्रा के चुनाव लड़ने पर भी कयास लगाए जा रहे थे लेकिन चुनावी रण से दूर रहेंगी। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने राहुल गांधी पर अमेठी का रण छोड़ने का आरोप लगाया। प्रियंका गांधी वाड्रा के बारे में ये कहा गया कि वो कांग्रेस की स्टार प्रचारक हैं, पूरे देश में पार्टी का प्रचार करना है, इस कारण वो चुनाव नहीं लड़ रही हैं। इस पूरे प्रकरण के दौरान कई ऐसी बातें आईं जिनके बारे में विचार करना आवश्यक है। तथ्यों को देखना भी। निरंतर ये कहा जाता रहा है कि रायबरेली और अमेठी गांधी परिवार का गढ़ है। आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि रायबरेली कांग्रेस पार्टी का गढ़ तो हो सकता है लेकिन गांधी परिवार का नहीं। इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हारी थीं। उसके बाद के चुनाव में उन्होंने दक्षिण भारत की मेडक और रायबरेली सीट से चुनाव लड़कर जीत हासिल की। फइर रायबरेली सीट से इस्तीफा दे दिया। अब फिर से प्रश्न उठ रहा है कि अगर राहुल गांधी भी रायबरेली और वायनाड, दोनों क्षेत्र से चुनाव जीत जाते हैं, तो वायनाड को प्राथमिकता देंगे या रायबरेली को। केरल में दो वर्ष बाद विधानसभा का चुनाव होना है और अगर राहुल गांधी केरल के वायनाड की सीट से जीतने के बाद इस्तीफा दे देते हैं तो उसका असर उस चुनाव पर पड़ सकता है। कांग्रेस को लगातार दो बार केरल के विधानसभा चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा है। आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस को बड़ी उम्मीदें हैं। अगर वो वायनाड को प्राथमिकता देते हैं तो उसका असर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के भविष्य पर पड़ेगा। राहुल गांधी के सामने ये संकट है। देश का राजनीतिक इतिहास इस बात की पुष्टि करता है कि दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए उत्तर प्रदेश में बेहतरीन प्रदर्शन करना आवश्यक होता है। इसका कांग्रेस क्या उत्तर ढूंढती है ये देखना दिलचस्प होगा। 

अब बात अमेठी की। अमेठी से राहुल गांधी तीन बार सांसद निर्वाचित हुए। 2019 में स्मृति इरानी से पराजित हो गए। कई राजनीतिक पंडितों और कांग्रेस समर्थक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी ने अमेठी को छोड़कर स्मृति इरानी की महत्ता को कम कर दिया। अब यहीं से निष्कर्ष दोषपूर्ण हो जाता है। स्मृति इरानी दो दशक से अधिक समय से राजनीति में सक्रिय हैं। पिछले दस वर्षों से वो कैबिनेट मंत्री हैं। उसके पहले भाजपा की महिला मोर्चा की अध्यक्ष रह चुकी हैं। दो बार पार्टी की राष्ट्रीय सचिव रही हैं। उनका एक सफल करियर रहा है। राहुल गांधी को एक बार पराजित कर इतिहास बना चुकी हैं। 2019 में जब राहुल गांधी पराजित हुए थे तब वो कांग्रेस पार्टी के अखिल भारतीय अध्यक्ष थे। स्मृति इरानी को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष को हराने का गौरव भी हासिल है। राहुल गांधी के अमेठी से चुनाव नहीं लड़ने से उनकी अबतक बनी महत्ता कम नहीं होने वाली है। दोषपूर्ण निष्कर्षों से आगे जाकर हमें तथ्यों और आंकड़ों पर बात करनी चाहिए कि राहुल गांधी ने अमेठी का रण क्यों छोड़ा। राहुल गांधी पहली बार अमेठी से 2004 में सांसद बने। इस चुनाव में उनको दो लाख 90 हजार से अधिक वोटों से जीत मिली। 2009 में जीत का अंतर तीन लाख सत्तर हजार वोटों तक पहुंच गया। पर 2014 में जब स्मृति इरानी पहली बार अमेठी पहुंचीं तो उनके जीत का अंतर घटकर एक लाख सात हजार रह गया। जबकि स्मृति को करीब तीन सप्ताह का समय मिला था। 2019 में राहुल 55 हजार वोटों से हार गए। पिछले दो चुनावों में उनको मिलनेवाले मतों की संख्या कम हुई। इतना ही नहीं 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अमेठी संसदीय क्षेत्र के पांच विधानसभा क्षेत्रों में से कांग्रेस एक पर भी जीत हासिल नहीं कर पाई। चार सीटें भारतीय जनता पार्टी को और एक समाजवादी पार्टी को मिली। 2022 के विधानसभा चुनाव में अमेठी लोकसभा के पांच विधानसभा क्षेत्रों में तीन पर भारतीय जनता पार्टी और दो पर समाजवादी पार्टी को जीत मिली। समाजवादी पार्टी के एक विधायक अब भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं। इस विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश में कांग्रेस को मिले वोटों का प्रतिशत बहुत ही कम रहा, जबकि प्रियंका गांधी की देखरेख में वहां चुनाव हुए थे। 

एक और तथ्य की बात करना आवश्यक है जिसने अमेठी से राहुल की उम्मीदवारी टाली गई। जब 2019 के संसदीय चुनाव में राहुल गांधी अमेठी से पराजित हुए तो उसके बाद वो इस क्षेत्र के दौरे पर बहुत ही कम गए। चुनाव के समय वहां उनकी उपस्थिति पर मतदाताओँ के मन में स्वाभाविक तौर पर ये प्रश्न उठता कि इतने दिनों तक कहां थे। जबकि 2014 में पराजित होने के बाद स्मृति इरानी निरंतर अमेठी आती जाती रहीं। चुनाव हारने के 15 दिन के अंदर ही स्मृति इरानी अमेठी पहुंच गई थीं। राहुल गांधी अपने मतदाताओं के आसन्न प्रश्नों का उत्तर नहीं खोज पाने के कारण भी रायबरेली चले गए प्रतीत होता है। राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी कहना है कि कांग्रेस पार्टी ने जो आंतरिक सर्वे करवाया उसमें अमेठी से बहुत सकारात्मक रुझान कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में नहीं मिले। जबकि रायबरेली के मतदाता राहुल को लेकर उत्साहित होने का संकेत दे रहे थे। चर्चा तो ये भी रही थी कि प्रियंका गांधी वाड्रा को अमेठी से और राहुल को रायबरेली से प्रत्याशी बना दिया जाए। विश्लेषकों का आकलन है कि सोनिया गांधी की सीट से जो भी प्रत्याशी होता उसको सोनिया की राजनीति का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता। अगर रायबरेली से प्रियंका गांधी चुनाव लड़तीं तो संभव है कि ये संदेश जाता। सोनिया जी निरंतर राहुल गांधी के पक्ष में दिखती रही हैं। वो उनको ही आगे लाना चाहती हैं। अगर प्रियंका चुनावी राजनीति में आतीं तो पार्टी में एक और पावर सेंटर उभरने का खतरा था। दूसरे भारतीय जनता पार्टी का परिवारवाद का आरोप और गाढ़ा होता। रायबरेली से प्रियंका और वायनाड से राहुल गांधी जीत जाते तो परिवार के तीन लोग संसद के सदस्य होते। इन आरोपों से बचने के लिए भी प्रियंका को चुनाव नहीं लड़वाया गया। कुल मिलाकार अगर देखें तो राहुल के अमेठी से नहीं लड़ने के बहुत सारे कोण हैं। एक कोण जो बेहद महत्वपूर्ण है वो ये है कि स्मृति इरानी ने क्षेत्र में अपनी उपस्थिति से और वहां के मतदाताओं के साथ संवाद कायम करके अमेठी की जनता को गांधी परिवार के मोह से लगभग मुक्त कर दिया। अमेठी में ऐसे लोग अब कम ही हैं जो गांधी परिवार के साथ अपने रिश्तों को याद करते हुए आंख मूंदकर परिवार को वोट देते रहे हैं। राजीव गांधी के सांसद रहते तक तो क्षेत्र के लोगों से उनका मिलना जुलना था। राहुल गांधी के वहां आने के बाद से राजनीति को एक अलग ही तरह से चलाने का प्रयास हुआ। राजनीतिक संबंध रागात्मक न होकर प्रोफेशनल जैसे होने लगे। राजनीति कार्यकर्ताओं का स्थान प्रोफेशनल्स ने ले लिया। ऐसा प्रतीत होता है कि संजय गांधी ने 1976 में जिस राजनीतिक संबंध की नींव अमेठी में रखी थी उसका अंत हो गया। किशोरी लाल शर्मा को कांग्रेस का प्रत्याशी बनाने से स्मृति इरानी की राह आसान हो गई है। कांग्रेस के प्रत्याशी की छवि नेता की नहीं रही है। वो गांधी परिवार के सहयोगी के तौर पर जाने जाते हैं। व्यवस्थापक और राजनेता का अंतर तो मतदाता समझता ही है। 


Saturday, March 7, 2020

असाधारण विद्रोह अब भी प्रासंगिक


इन दिनों फिल्म थप्पड की बहुत चर्चा हो रही है। निर्देशक अनुभव सिन्हा ने बेहतर फिल्म बनाई है। अनुभव सिन्हा से विचारधारा के स्तर पर असहमत लोग भी इस फिल्म की कथावस्तु को लेकर उनकी सराहना कर चुके हैं। केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति इरानी ने तो साफ तौर पर कहा भी और लिखा भी कि कितने लोगों ने सुना है कि औरत को ही एडजस्ट करना पड़ता है। कितने लोग सोचते हैं कि मार पिटाई सिर्फ गरीब औरतों के ही पति करते हैं। कितने लोगों को ये विश्वास होगा कि पढ़े लिखे लोग कभी हाथ नहीं उठाते। कितनी महिलाएं अपनी लड़कियों को या बहुओं को कहती हैं कि कोई बात नहीं बेटा ऐसा तो हमारे साथ भी हुआ लेकिन देखो आज कितने खुश हैं। इंस्टाग्राम पर अपनी पोस्ट में आगे स्मृति इरानी ने लिखा कि मैं निर्देशक की राजनीतिक विचारधारा को समर्थन नहीं करती हूं, कुछ कलाकारों से कुछ मुद्दों पर मेरी असहमति हो सकती है लेकिन ये ऐसी कहानी है जिसको देखूंगी और उम्मीद करती हूं कि लोग भी इसको देखेंगे। किसी भी महिला को मारना उचित नहीं है, एक भी थप्पड़। इस टिप्पणी के दो बिंदुओं पर ध्यान देना खास है।एक तो वो जब खुश रहने की बात कही जाती है और दूसरा तब जब महिलाओं के खिलाफ हिंसा की बात आती है।
आज विश्व महिला दिवस है और महिलाओं के खिलाफ होनेवाली हिंसा या उनकी पसंद को तवज्जो देने के मसले पर बात करने का उचित अवसर भी है। जब फिल्म थप्पड़ को लेकर बात हो रही थी तो ये बात भी जेहन में आई कि हमारे देश में कई महिलाएं ऐसी भी हुईं जिन्होंने हिंसा के अलावा भी अन्य मुद्दों पर पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ संघर्ष किया। अपने संघर्ष में उनको बहुधा अपमानित भी होना पड़ा लेकिन पुरुष प्रधान समाज में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पिछले दिनों सुधीर चंद्र की पुस्तक रख्माबाई, स्त्री अधिकार और कानून पढ़ रहा था। रख्माबाई की कहानी और उनके संघर्ष को सरसरी तौर पर सुन चुका था लेकिन उनके संघर्ष को पढ़ते हुए लगातार ये लग रहा था कि 1884 में जो मुकदमा चला था और उसको रख्माबाई ने जिस जिजीविषा से लड़ा वो अतुलनीय है। उस समय के हिसाब से रख्माबाई का विद्रोह एक असाधारण घटना थी, मेरे जानते इससे पहले किसी भारतीय स्त्री ने कानूनी तौर पर ग्यारह साल की उम्र में हुए विवाह को मानने से इंकार नहीं किया था। रख्माबाई ने किया। वो बाल विवाह के चक्रव्यूह से निकलना चाहती थी। दरअसल अन्य कारणों के अलावा जिस बात को लेकर रख्माबाई सबसे परेशान थी वो ये कि बाल विवाह के बाद उसका स्कूल जाना बंद हो गया था। वो पढ़ना चाहती थी लेकिन वो संभव नहीं हो रहा था। उन्होंने बाद में लिखा भी कि- मैं उन अभागी स्त्रियों में हूं जो बाल विवाह की प्रथा से जुड़े अवर्णनीय कष्टों को चुपचाप झेलते रहने के लिए विवश हैं। सामाजिक रूप से बेहद गलत इस प्रथा ने मेरे जीवन की खुशियों को समाप्त कर दिया। यह मेरे और उन चीजों के बीच आ खड़ी हुई है जिन्हें मैं सबसे ज्यादा मूल्यवान मानती हूं- अध्ययन और मानसिक विकास। मेरा कोई दोष न होते हुए भी मुझे समाज से अलग-थलग जीने का शाप झेलना पड़ रहा है। अपने अज्ञानी बहनों से ऊपर उठने की मेरी हर आकांक्षा को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
रख्माबाई ने बाल विवाह को ही चुनौती दे दी थी और अपने पति के घऱ जाने से इंकार कर दिया था। लगातार अपमानित होने, अदालतों में वकीलों के अपमानजनक प्रश्नों का सामने करने, सामाजिक दुत्कार को झेलने के बावजूद भी रख्माबाई ने हिम्मत नहीं हारी। वो पढ़ना चाहती थी, अपने तरीके से अपनी मर्जी की जिंदगी जीना चाहती थी। उसको ये मंजूर नहीं था कि वो अपने उस पति के लिए अपना सर्वस्व होम कर दे जिसकी नजर उसकी संपत्ति पर थी। जो उससे ज्यादा प्यार पच्चीस हजार रुपये कीमत की संपत्ति के साथ करता था जो रख्माबाई को विरासत में मिली थी। इसको हासिल करने के लिए रख्माबाई के पति ने अपने वैवाहिक अधिकारों के लिए केस किया। रख्माबाई ने जमकर केस लड़ा और पहला निर्णय उसके पक्ष में आया। लेकिन रख्माबाई के पति अपील में चले गए जहां से रख्माबाई को निर्देश मिला कि वो अपने पति के साथ रहने जाए या छह महीने जेल की सजा भुगते। रख्मबाई ने साहस के साथ छह महीने जेल की सजा भुगतने को चुना था। पर रख्माबाई ने हार नहीं मानी थी और अदालत के फैसले के खिलाफ क्वीन विक्टोरिया के पास अपील कर दी थी। क्वीन ने ना सिर्फ उनकी अपील को स्वीकार किया था बल्कि थोड़े समय विचार करने के बाद रख्माबाई के बाल विवाह को रद्द कर दिया था। लीं कानूनी लड़ाई के बाद रख्माबाई की जीत हुई थी।  दरअसल अगर हम देखें तो इस पूरे केस में इस बात पर बहस हुई थी कि एक महिला अपने पति से संबंध बनाने की सहमति या असहमति दे सकती है या नहीं। रख्माबाई ने अपने पति के साथ शारीरिक संबंध बनाने से इंकार कर दिया था। उधर पति इसको अपना अधिकार मानते हुए अदालत चला गया था। अलग अलग अदालतों ने अलग अलग फैसले दिए थे। सबसे पहले जिस अदालत में ये मुकदमा चला उसके जज पिनी ने अपने फैसले में साफ किया- कानून के अनुसार, मैं वादी को उसके द्वारा मांगी गई राहत प्रदान करने के लिए और इस बाइस वर्षीय युवा महिला को उसके साथ उसके घऱ में रहने का आदेश देने के लिए, ताकि वादी उक्त महिला के साथ उसके बचपन में हुए अपने विवाह को परिणति तक पहुंचा सके, बाध्य नहीं हूं।बाद में अपलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया था।
जब ये केस चल रहा था तो समाज में इसको लेकर व्यापक बहस हुई थी। हिंदू मान्यताओं, परंपराओं से लेकर कानून तक को आधार बनाकर पूरे देश के उस वक्त के समाचार पत्रों ने लेख छपे थे। पूरा समाज इस केस पर बंटा हुआ था। इस दौर में नैतिकता और कानून के जटिल संबंधों को लेकर भी वंदा-विदा हुआ था। उस दौर में भी रख्माबाई ने छद्म नाम और द हिंदू लेडी के नाम से अखबारों में लेख लिखकर उस बहस में हिस्सा लिया था। रख्माबाई के उस दौर में लिखे गए लेख इस महिला की क्रांतिकारी सोच को सामने लाते है। रख्माबाई के चरित्र के खिलाफ जब लेख छपा तो भी वो डिगी नहीं और उसने उसका भी लिखित जवाब दिया था।
उस समय के लिहाज से रख्माबाई का विद्रोह एक बहुत बड़ी सामाजिक घटना थी। इस केस के इर्द गिर्द कई रूढ़िवादियों ने इसमें धर्म को घुसाने का भी प्रयत्न किया। इसको हिंदू धर्म के खिलाफ, हिन्दू मान्यताओं और परंपराओं के खिलाफ बताने की कोशिश भी की गई। बावजूद इसके रख्माबाई दबाव में नहीं आई और अपने निश्चय पर दृढ़ रही। इस केस में रख्माबाई ने प्रत्यक्ष रूप से बाल विवाह को तो चुनौती दी ही, परोक्ष रूप से इस बात को भी सामने रखा कि महिला किसके साथ संबंध बनाए, कब बनाए. विवाह होने के बाद भी ये उसका अपना फैसला होगा। सहमति और असहमति के इस विमर्श पर ही फिल्म पिंक बनी। महिला अधिकारो या महिलाओं के संघर्ष पर कई फिल्में बनी हैं लेकिन अनुभव ने थप्पड़ में जिस तरह से एक मामूली घटना को महिला के स्वाभिमान से जोड़ दिया और उसके इर्द गिर्द पूरी कहानी बुन दी उसको रेखांकित किया जाना चाहिए। आज जब सौ करोड़, दो सौ करोड़ के मुनाफे की होड़ लगी हो तो ऐसे दौर में इस तरह की संवेदनशील फिल्मों का निर्माण एक तरह की आश्वस्ति भी देता है। आश्वस्ति कला की, आश्वस्ति क्राफ्ट की और आश्वस्ति सोच की भी।
रख्माबाई के संघर्ष को याद करने, समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ उस महिला के अदम्य साहस को रेखांकित करने और नई पीढ़ी को अपने समाज की ऐसी साहसी महिला के बारे में बताने के लिए महिला दिवस से बेहतर कोई अवसर हो नहीं सकता। रख्माबाई उस भारतीय नारी की प्रतीक हैं जो अपने अधिकारों के लिए तन कर खड़ी ही नहीं होती हैं बल्कि उसको हासिल करने तक डटीं भी रहती हैं। अपने अधिकारों को हासिल कर लेने के बाद दंभ नहीं करतीं,जयघोष नहीं करती बल्कि उस अधिकार को आधार बनाकर सामज को और देश को अपनी ओर देने का प्रयत्न भी करती हैं। रख्माबाई का विद्रोह भले ही सवा सौ साल पहले का हो लेकिन उससे निकली बहस अब भी प्रासंगिक है।

Saturday, August 31, 2019

बयान से बेनकाब होती विचारधारा


इन दिनों एक बार फिर से बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका अरुंधति राय चर्चा में हैं। 2011 में दिए उनके एक भाषण के अंश को पाकिस्तानी मीडिया ने भारत को बदनाम करने की नीयत से छाप दिया। पाकिस्तान के हुक्मरानों ने भी उसकी आड़ में भारत को घेरने की कोशिश की। अरुंझति के उस बयान के सामने आते ही सोशल मीडिया पर एक बवंडर सा उठा, जमकर चर्चा शुरू हो गई। भारत और बांग्लादेश के ट्वीटर उपभोक्ताओं ने उनकी लानत-मलामत शुरू की और डबलस्टैंडर्ड हैशटैग के साथ ये मसला ट्वीटर पर ट्रेंड करने लगा। दरअसल 2011 में अरुंधति राय ने एक चर्चा के दौरान घोर आपत्तिजनक बातें कही थीं। ये ऐसी बातें हैं जो सीधे सीधे राष्ट्र के खिलाफ हैं। उनका अंदाज ही भारत को अपमानित करने जैसा था और कहीं से भी ये नहीं लग रहा था कि एक भारतीय बोल रहा हो। भारत के बारे में अरुंधति ने कहा कि वो भारत जैसी जगह के बारे में बात कर रही हैं जहां कश्मीर, मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम में तब से युद्ध हो रहे हैं जब से भारत एक संप्रभु राष्ट्र बना। भारत जब गुलामी की बेड़ियों से आजाद हुआ तब से ही वो एक औपनिवेशिक राष्ट्र बन गया। तमाम झंझावातों के बीच हिन्दुस्तान का लोकतंत्र मजबूत और परिपक्व हुआ ये अरुंधति को ना तो दिखा और ना ही वो समझ पाई। अपने जहर बुझे बयान में अरुंधति ने कहा कि वि भारत में 1947 से ही कश्मीर, मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम, पंजाब, तेलंगाना, गोवा, हैदराबाद में निरंतर युद्ध जारी है और भारत ने अपने ही आवाम के खिलाफ सेना की तैनाती की और युद्ध किया। अरुंधति का पाकिस्तान प्रेम तब झलक उठा जब वो बोली कि पाकिस्तान ने अपनी सेना को उस तरह से अपने देश की जनता के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जिस तरह से लोकतांत्रिक भारत ने किया। उनका ये वीडियो सामने आते ही भारत और बांग्लादेश में तीखी प्रतिक्रिया हुई। बांग्लादेश के लोगों ने अरुंधति को 1971 के महीनों में पाकिस्तानी सेना के पूर्वी बंगाल में किए कुकृत्यों की याद दिलानी शुरू कर दी। एक के बाद एक अत्याचार की फेहरिश्त सामने आने लगी। दरअसल अरुंधति जैसे लोग भारत के खिलाफ बोलकर अंतराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरते हैं। अरुंधति की इस चर्चा को सुनते हुए मुझे 24 फरवरी 2016 को तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी का लोकसभा में दिया भाषण याद आ गया। स्मृति इरानी के भाषण के पहले तृणमूल कांग्रेस के सांसद डॉ सुगतो बोस ने भाषण दिया था और उनके भाषण पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी मुग्ध थे, तालियां बजा रहे थे। जब स्मृति इरानी के बोलने की बारी आई तो उन्होंने भी सुगतो बोस के भाषण की सराहना की लेकिन सोनिया और राहुल गांधी के सामने बोस की बहन शर्मिला बोस की किताब के कुछ पन्ने खोल दिए थे। जिस सुगतो बोस के भाषण पर कांग्रेसी लहालोट हो रहे थे उन्हीं की बहन इतिहासकार शर्मिला बोस ने एक किताब लिखी थी, द डेड रेकनिंग। उस किताब में शर्मिला बोस ने लिखा है कि बांग्लादेश मुक्ति संग्राम एक भ्रांति है, मिथ्या है, पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी बंगाल के लोगों पर किसी तरह का कोई अत्याचार किया ही नहीं था, जिसको बचाने के लिए इंदिरा गांधी गई थीं। दरअसल अरुंधति ने कोई नया राग नहीं छेड़ा है बल्कि इस तरह के जहर बुझे बयान या लेखन लंबे समय से होते रहे हैं। बहुधा पाकिस्तान के पक्ष में।
अरुंधति तो इतने पर ही नहीं रुकी उसने तो भारत की इस तरह की तस्वीर पेश की जैसे यहां दलितों और अल्पसंख्यकों को सेना की मदद से कुचला जा रहा हो, उनके खिलाफ सेना का उपयोग कर उनका दमन किया जा रहा हो। अरुंधति अपने भाषण में प्रश्न उठाती हैं कि ये कौन लोग हैं जिनके खिलाफ भारत ने युद्ध झेड़ रखा है या युद्ध करना तय किया है। फिर खुद ही उसका उत्तर देती है पूर्वोत्तर में आदिवासियों, कश्मीर और हैदराबाद में मुसलमानों, तेलंगाना में आदिवासियों, गोवा में क्रिश्चियन और पंजाब में सिखों के खिलाफ। इतना बोलते बोलते वो यह भी कह जाती हैं कि ये सब अपर कास्ट हिंदू स्टेट की तरफ से किया जा रहा है। अब इस अंतिम वाक्य से ही उनका एजेंडा साफ हो जाता है। ये सीधे-सीधे समाज को बांटनेवाला बयान है, देश के खिलाफ वहां की जनता को उकसानेवाला बयान है। जब वो ये बात कह रही थीं तब वो भूल गईं थीं कि उस वक्त देश को तीन अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ही चला रहे थे, मनमोहन सिंह जो उस वक्त देश के प्रधानमंत्री थे वो सिख समुदाय से आते हैं, सत्ताधारी दल कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी क्रिश्चियन और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल मुसलमान। क्या तब किसी कोने से ये आवाज आई थी कि बहुसंख्यक हिंदुओं के देश में तीन सबसे ताकतवर शख्सियत जो सत्ता चला रहे थे वो अल्पसंख्यक समुदाय के थे। नहीं। आज भी इस तथ्य को रेखांकित करना इस वजह से आवश्यक हो गया क्योंकि अरुंधति के बयान को पाकिस्तान अपने हक में प्रचारित करने में लगा है। अरुंधति जिन माओवादियों और अलगाववादियों को भारत की आवाम मान रही हैं उनकी आस्था भारत में कभी नहीं रही। वो भारत को तोड़ने का सपना देखते रहे और किसी भी संप्रभु राष्ट्र को अपने देश की संप्रुभता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने का अधिकार है। अब भी अरुंधति के पक्ष में लेख लिखे जा रहे हैं लेकिन उनके समर्थक ये भूल गए हैं कि भारत में कभी भी माओवादियों या नक्सलियों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं किया गया।
दरअसल अरुंधति जैसे लोगों की, उन जैसे लेखकों की बुनियाद ही भारत वोध पर टिकी है। वो वैश्विक मंचों पर जाकर भारत में हो रहे तमाम तरह के कथित अत्याचारों पर, कथित मानवाधिकार हनन पर भाषण देती रही हैं। उनके समर्थन में लेख लिखनेवाले कुछ लोग अभी हाल में प्रकाशित उनकी किताब मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस से उदाहरण देकर उनका बचाव करने की कोशिश करने में लगे हैं। जब ये पुस्तक प्रकाशित हुई थी तो इसको फिक्शन कहकर प्रचारित-प्रसारित किया गया था, बुकर प्राइज के लिए उसको फिक्शन कैटेगरी में ही नामित भी किया गया था। अब उनके समर्थक उस उपन्यास को ही तथ्य के तौर पर पेश कर रहे हैं। अगर हम अरुंधति के समर्थकों के तर्कों मान भी लें तो उस किताब में और भी बूहुत कुछ लिखा गया है। अरुंधति का उपन्यास द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ एक लड़के की कहानी से शुरू होता है। घटनाओं के बाद जैसे ही पात्रों के बीच संवाद शुरू होता है वैसे ही लेखक पर एक्टिविस्ट हावी हो जाता है और वो अपनी वैचारिकी का बोझ पाठकों पर लादने लग जाती है। फिक्शन की आड़ लेकर जब अरुंधति कश्मीर के परिवेश में घुसती हैं वो अपने पूर्वग्रहयुक्त नजरिए को सामने रखती नजर आती हैं। कश्मीर के परिवेश की भयावहता का वर्णन करते हुए वो लिखती हैं – ‘मौत हर जगह है, मौत ही सबकुछ है, करियर, इच्छा, कविता, प्यार मोहब्बत सब मौत है। मौत ही जीने की नई राह है । जैसे जैसे कश्मीर में जंग बढ़ रही है वैसे वैसे कब्रगाह भी उसी तरह से बढ़ रहे हैं जैसे महानगरों में मल्टी लेवल पार्किंग बढ़ते जा रहे हैं।‘ कश्मीर की समस्या में उनको जंग नजर आ रहा था। अपनी सैद्धांतिकी को फिक्शन की चाशनी में लपेटकर पेश कर रही हैं ताकि निकल गया तो ठीक है पाठकों के दिमाग में बात घर कर जाएगी और अगर ज्यादा आलोचना हुई तो उसको फिक्शन कहकर पल्ला झाड़ लिया जाएगा। उस उपन्यास का एक पात्र बिप्लब दासगुप्ता एक सरकारी मुलाजिम है, जो जमकर शराब पीता है, और कश्मीर में पदस्थापित है। उनकी हरकतों को भी अरुंधति ने विषय बनाया है। संकेत ये कि सरकारी मुलाजिम ठीक व्यवहार नहीं करते। उस उपन्यास में अरुंधति ने बताया है कि किस तरह परिस्थियों के चलते कश्मीरी युवक आतंकवादी बन जाता है, कहीं भी आतंक की असली वजह पर , उसकी जमीन तैयार करने में पाकिस्तान की भूमिका पर जोर डाला है, ऐसा याद नहीं पड़ता। अब भले ही अरुंधति ने अपने भारतीय सेना की तैनाती को लेकर दिए अपने बयान पर माफी मांग ली है लेकिन जो जहरीली सोच अंदर तक घुसी है उसका क्या किया जा सकता है, इसपर विचार करना चाहिए। मशहूर रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने लिखा था- कम्युनिस्ट विचारधारा एक ऐसा पाखंड है जिससे सब परिचित हैं, नाटक के उपकरणों की तरह उसका इस्तेमाल भाषण के मंचों पर होता है । तो क्या ये माना जाए कि अरुंधति वो पाखंड रच रही थीं और भाषण के मंच का इस्तेमाल कर रही थी।