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Saturday, November 2, 2019

नए कवियों की चुनौतियां और कमजोरियां


सोशल मीडिया के इस यग में ये बात बहुधा सुनाई देती है कि पहले ब्लॉग ने फिर फेसबुक ने साहित्य का लोकतंत्रीकरण कर दिया। सुनाई तो यह भी देता है कि साहित्यिक पत्रिकाओं उसके संपादकों और आलोचकों के दंभपूर्ण एकाधिकार को फेसबुक आदि ने ध्वस्त कर दिया। इस तरह की कई बातें कही जाती हैं कि अब हिंदी में आलोचना की जरूरत नहीं रही, आलोचकों पर रचनाकारों की निर्भरता समाप्त हो गई आदि-आदि। ये सारी बातें इसी माध्यम पर सुनाई देती हैं, यहीं इसको लेकर बातें होती हैं, बहुधा हिकारत भरे स्वर में आलोचना को आलूचना आदि कहा जाता है। एक तरफ तो इस तरह की बातें और दूसरी तरफ हजारों कवियों की हजारों कविताएं फेसबुक पर हर रोज पढ़ने को मिलती हैं। इन कविताओं को लाइक और कमेंट्स भी मिल जाते हैं लेकिन इनमें कविता के तत्व कम तुकबंदी ज्यादा होती है। छोटी पंक्ति और बड़ी पंक्तिवाली कविताओं की भरमार होती है। इन कविताओं को देखने के बाद लगता है कि कविता लिखना दुनिया का सबसे आसान काम है। देखना जानबूझकर कह रहा हूं क्योंकि कई बार नजरों के सामने आने के बाद यहां कविताओं को ज्यादातर पाठक देखकर ही निकल जाते हैं, पढ़ते नहीं हैं।
निश्चित तौर पर तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन फेसबुक पर लिखी जा रही कविताओं को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि हिंदी कविता इस वक्त बहुत विपन्न है। किसी विद्वान ने कहा है कि कवियों का आकलन तीन कसौटियों पर किया जा सकता है, कवि की व्यक्तिगत कसौटी, जिस युग में वो जी और रच रहा है उस युग की कसौटी और इतिहास की कसौटी। इस वक्त रचनाकर्म में लीन कवियों का आकलन भी इन कसौटियों पर किया जाना चाहिए, खासतौर पर उन कवियों का जो बिल्कुल युवा है और तकनीक में दक्ष भी हैं। इन दक्ष कवियों में से ज्यादातर इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते हैं। खरे उतरना तो दूर की बात उनकी कविताओं में इन मानकों के संकेत भी कम ही मिल पाते हैं। कवियों के बारे में हिंदी के आलोचक कहा करते थे कि वो भविष्यद्रष्टा नहीं होता बल्कि उनकी रचनाओं में वर्तमान का प्रकटीकरण होता है । माना यह भी जाता था कि कवियों की वर्तमान को देखने की दृष्टि होती है जिसको वो अपनी रचनाओं में उतारते हैं, जिससे भविष्य की झलक दिखाई देती है। इस तरह के कवियों में जो वर्तमान बोध दिखाई देता था वो भविष्य की कल्पना का भी दृष्य खींचता था। आचार्य़ रामचंद्र शुक्ल ने भी कहा था कि कविता को परिवर्तित समाजिक स्थितियों से घनिष्ठ लगाव बनाकर चलना चाहिए। कविता से गतिरोध की स्थिति तभी समाप्त हो सकती है। लेकिन फेसबुक पर इन दिनों जिस तरह की कविताएं आ रही हैं उनमें से ज्यादातर को देखते हुए सामाजिक स्थितियों से घनिष्ठ लगाव जैसी बात करना बेमानी है। कुछ वरिष्ठ कवि भी राजनीतिक नारेबाजी करके अपनी विचारधारा के आकाओं को खुश करने की कोशिश करते नजर आते हैं।
सोशल मीडिया पर कविता की इस स्थिति को देखते हुए साहित्य के लोकतंत्रीकरण वाले नारे और साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक और आलोचना से मुक्त होने जैसे नारों की याद आती है। फेसबुक पर भले ही इस तरह के नारे लगते हैं लेकिन जब गहराई से विचार किया जाए तो ऐसा लगता है कि इससे साहित्य में एक अलग किस्म की अराजकता पैदा हो गई। रचनात्मकता का नुकसान भी हुआ। अब किसी प्रकार की कोई छलनी नहीं रही जो रचनाओं को शुद्ध कर सके। फेसबुक पर लिखने और फौरन प्रसिद्ध होने की लालसा ने हिंदी कविता का इतना नुकसान किया है जिसका आकलन होना शेष है। प्रसिद्ध होने की इस आपाधापी में स्तरीयता से कितना समझौता हुआ इस बारे में विचार किया जाना चाहिए। पहले साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने के लिए आपको संपादक की कठोर दृष्टि से गुजरना पड़ता था। एक ऐसी दृष्टि जो कठोर तो होती थी लेकिन उसकी अपेक्षाओं पर खरे उतरने के बाद रचनाओं चमक जाती थीं। अब उस संपादकीय दृष्टि की जरूरत नहीं समझी जा रही है लिहाजा जिसके जो मन में आ रहा है वो कविता के नाम पर ठेले चला जा रहा है। फेसबुक पर सबके अपने अपने साथी-संगी हैं जो बिना पढ़े उसको लाइक और वाह वाह कर दे रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि औसत और औसत से नीचे लिखनेवाले कवि भी खुद को महाकवि निराला के समकक्ष मानने लगते हैं। संपादक के नहीं होने का एक और नुकसान है कि नवोदित कवियों और लेखकों को समझानेवाला नहीं रहा। कच्ची रचनाओं को पकाकर पाठकों के सामने पेश करने वाली कड़ी नहीं रही। यह स्थिति कवि और पाठक दोनों के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। पहले क्या होता था कि आप कविताएं भेजते थे, संपादक आपके साथ पत्र व्यवहार करता था, आपकी रचनाओं की कमी बताता था, उसको बेहतर करने के तरीके बताता था जिससे बेहतर कविताएं निकल कर सामने आती थीं। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने की कसौठी बहुत कठिन होती थी।
जब किसी साहित्यिक पत्रिका से कोई रचना वापस लौटती थी तो रचनाकारों के सामने एक चुनौतीपूर्ण स्थिति होती थी कि वो अपनी रचना का स्तर बढ़ाए, एक जिद होती थी कि अमुक पत्रिका में छपना ही है। चुनौती और जिद की वजह से बेहतर रचना और रचनाकार सामने आते थे। दो संपादक का तो मुझे अनुभव है जिनकी वजह से अपने लिखे पर कई कई बार काम करना पड़ता था। राजेन्द्र यादव और ज्ञानरंजन। ये दोनों नए लेखकों के साथ रचनाओं को लेकर गंभीर संवाद करते थे। ज्ञानरंजन के संवाद में बहुधा वैचारिकता हावी रहती थी और राजेन्द्र यादव खुले मन से रचना को बेहतर बनाने की बातें करते थे। फायदा तो लेखक का ही होता था। आज अगर आप देखें तो रचनाओं को बेहतर बनाने की ये पद्धति लगभग समाप्त हो गई है। आज के ज्यादातर युवा लेखक खुद को ही इतना बड़ा लेखक मानते हैं कि उनको इस तरह की पद्धति अपमानजनक लगती है। उनको लगता है कि जो उन्होंने लिख दिया है वो ही सबसे अच्छी रचना है और अगर कोई कमी बता दे या संशोधन सुझा दे तो वो और फेसबुक पर सक्रिय उनके गिरोह के साथी इतना हो हल्ला मचाना शुरू कर देते हैं कि अप्रिय स्थित उत्पन्न हो जाती है। कई बार तो बात गाली गलौच तक भी पहुंचते देखा गयी है। इससे सबसे अधिक नुकसान हिंदी साहित्य का हो रहा है।
नुकसान तो इस बात से भी हो रहा है कि हिंदी में इस वक्त कविता का कोई आलोचक नहीं है। जो दिग्गज वयोवृद्ध आलोचक हैं वो अब उतने सक्रिय रहे नहीं। आज कविता आलोचना के क्षेत्र में एक सन्नाटा दिखाई देता है। सोशल मीडिया पर लिखनेवाले कवि लाख कहें कि अब उनको आलोचकों की जरूरत नहीं है और वो सीधे अपने पाठकों तक पहुंच रहे हैं लेकिन आलोचकों की जरूरत तो साहित्य को है। रचना की स्तरीयता को पाठकों तक पहुंचाने और कविताओं के अर्थ को खोलकर पाठकों को बताने में आलोचकों की भूमिका रही है। इसको नकारा नहीं जा सकता है। आज के कवियों के पास न तो कोई रामविलास शर्मा हैं, न नामवर सिंह, न ही सुधीश पचौरी और न ही मैनेजन पांडे। इन आलोचकों की एक महती भूमिका रही है और उन्होंने अपने दौर के कवियों पर लिखकर उनको स्थापित किया। आज कोई रामविलास शर्मा नहीं दिखाई देते जो निराला की साहित्य साधना लिख सकें। कविता लिखनेवाली आज की पीढ़ी के सामने बड़ा संकट इस बात को लेकर है कि उनकी रचनाओं को मांजनेवाला और बेहतर करनेवाला संपादक नहीं है और उनकी रचनाओं को पाठकों के बीचच ले जाकर उसका अर्थ खोलनेवाला आलोचक भी नहीं है। इससे भी बड़ी चुनौती है इन कवियों द्वारा इन दोनों संस्थाओं के नकार और सीधे पाठक से जुड़ जाने के दंभ का। नतीजा क्या हो रहा है कि हिंदी कविता के परिदृष्य पर बुरी कविताओं ने अच्छी कविताओं को ढंक दिया है। फेसबुक पर छपनेवाली कविताओं के लेखकों को साहित्य जगत में गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है क्योंकि उनकी कविताओं को स्थापित करनेवाला आलोचक नहीं है। यह हिंदी साहित्य के लिए अच्छी स्थिति नहीं है। आज अगर हम कविता की ओर दृष्टि उठाकर देखें तो संजय कुंदन, बोधिसत्व, हेमंत कुकरेती, सुंदरचंद ठाकुर वाली पीढ़ी के बाद के कवि अभी भी वो प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर पा रहे हैं जो इस पीढ़ी को मिली। हिंदी साहित्य के लोगों को इसपर विचार करना चाहिए कि इन कमियों को कैसे पूरा किया जाए। किस तरह से साहित्य जगत में कविता और कथा के आलोचक सामने आ सकें। आलोचना कर्म बेहद श्रमसाध्य है, उसमें बहुत अध्ययन की जरूरत होती है लिहाजा इस ओर कम लोग प्रवृत्त होते हैं।    

Sunday, May 3, 2009

लेखकों का शोषण करते संपादक

चंद दिनों पहले की बात है , सुबह सुबह फोन की घंटी बजी । फोन उठाने पर आवाज आई कि मैं पुष्प बोल रहा हूं । चूंकि सोते- सोते फोन उठाया था इसलिए अनायास मुंह से निकला कौन पुष्प ? उलाहने भरे स्वर में पुष्प जी ने बताया कि वो ‘साहित्य केसरी’ के संपादक विनोद पुष्प बोल रहे हैं । तबतक मैं कुछ व्यवस्थित हो चुका था और उनके उलाहना भरे स्वर के बाद सचेत भी । इधर-उधर की बातचीत के बाद पुष्प जी कहा कि उनकी पत्रिका साहित्य केसरी के लिए मुझसे एक लेख चाहिए । मैंने छूटते ही पूछा कि लेख लिखने के कितने पैसे मिलेंगे । इतना सुनते ही पुष्प जी हत्थे से उखड़ गए और कहने लगे कि – “मेरी पत्रिका साहित्य केसरी एक आंदोलन है और मैं आपसे एक आंदोलन में भागीदारी चाहता हूं और आप हैं कि आंदोलन में भागीदारी के एवज में पैसे मांग रहे हैं । मैं पिछले पच्चीस वर्षों से अनियतकालीन पत्रिका निकाल रहा हूं और आजतक किसी ने आप जैसी बेशर्मी से लेख लिखने के पैसे नहीं मांगे । चूंकि पुष्प जी मेरे पैतृक शहर से हैं और वरिष्ठ साहित्यकार भी इसलिए मैं उनकी सुनता रहा और वो मुझे तमाम सिद्धांतों की घुट्टी पिलाने में जुटे रहे, मेरे जमीर, मेरी प्रतिबद्धता आदि आदि को झकझोरने की नाकाम कोशिश करते रहे । जब वो थोड़ा रुके तो मैंने उनसे पूछा कि आप पत्रिका निकालने के लिए जो कागज खरीदते हैं उसका भुगतान करते हैं ? क्या छपाई के लिए प्रेस वाले को पैसे देते हैं ? क्या पैकिंग और पोस्टिंग पर खर्च करते हैं ? जब इन सवालों के जबाव मुझे सकारात्मक मिले, तो फिर मैंने उनसे पूछा कि लेखकों को पैसा क्यों नहीं देते ? मेरे इस सवाल का उनके पास कोई तर्कसंगत उत्तर नहीं था, जाहिर था उन्होंने फोन काट दिया । इस घटना ने मुझे विचलित कर दिया और मैं काफी देर तक इसपर विचार करता रहा कि कि क्या लेख लिखने के लिए पैसे मांगकर मैंने गलत किया । इस घटना ने मेरे सामने एक और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था वो सवाल जो हिंदी लेखकों की अस्मिता से जुड़ा था । मैं काफी देर तक हिंदी में निकल रहे सैकड़ों साहित्यिक पत्रिका के बारे में सोचता रहा और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि लेखकों को मानदेय तो सिर्फ दो तीन पत्रिकाएं ही देती हैं ।
आज जब कि साहित्य में कोई भी व्यावसायिक पत्रिका नहीं बची है, लेकिन लघु पत्रिकाएं धड़ाधड़ निकल रही हैं, तो इसके पीछे के गणित पर विचार करना बी जरूरी है । साहित्यिक रुझानवाला और एक लेखक के रूप में स्थापित ना होने की कुंठा मन में संजोए लोगों के बीच संपादक बनने की होड़ सी लगी है । संपादक बनने का गणित है भी बेहद आसान । व्यक्तिगत संपर्कों और मित्रों की मदद से किसी तरह एक अंक निकालिए और बन जाइए संपादक । चूंकि साहित्यिक पत्रिकाएं अनियतकालीन होती है इसलिए यहां भूतपूर्व होने का खतरा भी नहीं है ।
लघु पत्रिकाओं के ज्यादातर संपादक आज आर्थिक तंगी का रोना रोकर लेखकों को पैसे नहीं देते लेकिन पत्रिकाओं के संपादकों के ठाठ में कोई कमी नहीं दिखाई देती है । इन साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों के सरोकार भी बेहद संकुचित और व्यक्ति केंद्रित हो गए हैं । लेखकीय गरिमा या फिर साथी लेखकों की प्रतिष्ठा का उन्हें कोई ख्याल नहीं है । साथी लेखकों को ये साहित्यिक संपादक ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ समझते हैं । न तो उनकी मेहनत का ध्यान रखते हैं और ना ही उनके लेख लिखने के दौरान हुए खर्चे, मसलन- कागज, स्याही, कंप्यूटर, प्रिंटर- आदि का । संपादक नामक ये जीव अपने सहयोगी लेखकों को पहले तो इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं और जब उससे उनका स्वार्थ नहीं सधता तो फिर विचारधारा की धौंस देकर अपना काम निकालने की तिकड़म करते हैं ।
पत्रिका निकालने के साथ ये साहित्यिक संपादक एक और खेल खलते हैं । अब उनपर भी एक नजर डाल लेते हैं । आजकल आपको साहित्यिक पत्रिकाओं के मोटे-मोटे विशेषांक दिख जाएंगें – कोई समकालीन कविता पर, कोई उपन्यास पर , कोई कहानियों पर, कोई आलोचना की वर्तमान दशा-दिशा पर, तो कोई फिल्म पर तो कोई किसी लेखक विशेष पर केंद्रित होता है ।
दरअसल इन विशेषांको के पीछे भी धन कमाने की जुगत होती है । विशेषांक की योजना बनाते समय ही किसी प्रकाशक को इसका सहभागी बना लिया जाता है और उनसे तय हो जाता है कि पत्रिका प्रकाशन के कुछ दिनों बाद उसे पुस्तकाकार छाप दिया जाए । प्रकाशक तय होते ही किसी विषय विशेष पर पत्रिका का अंक प्रकाशित होता है । मोटी पत्रिका के प्रकाशन में आने वाला खर्च प्रकाशक वहन करते हैं । पत्रिका का मूल्य इतना अधिक होता है या रखा जाता है कि पाठक उसको कम से कम खरीदें । बची हुई पत्रिका को पहले से तय सौदे के आधार पर प्रकाशक हार्ड कवर में डालकर पुस्तक का रूप दे देते हैं । जिसे उंचे दामों पर थोक सरकारी खरीद में खपा दिया जाता है । बिक्री से जो रॉयल्टी मिलती है उसे संपादक खुद डकार जाता है और अगर लेखक किस्मतवाला हुआ तो उसे पुस्तक की एक प्रति मिल जाती है । इस प्रवृति के लाभ भी हैं लेकिन लेखकों को ईमानदारी से रायल्टी में हिस्सा तो मिलना ही चाहिए ।
इस खेल में छोटे मोटे संपादकों के अलावा कई नामचीन लेखक/ संपादक भी सक्रिय हैं और साथी लेखकों का जमकर शोषण कर रहे हैं । खुद तो पत्रिका के नाम पर ऐश करते हैं और साथी लेखकों को उनका वाजिब हक भी देना गंवारा नहीं । मेरे जानते ऐसी साहित्यिक पत्रिकाओं की एक लंबी फेहरिस्त है जो अपने लेखकों को एकन्नी भी नहीं देते उल्टे उनसे ये अपेक्षा रखते हैं कि कुछ विज्ञापन का जुगाड़ कर दें या फिर कुछ प्रतियां बेचने का इंतजाम करें ।
ये एक ऐसा सवाल है जिसपर पूरी लेखक बिरादरी को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है । आज हिंदी के प्रकाशकों पर गाहे बगाहे लेखकों की रॉयल्टी हड़पने का आरोप लगता है । कुछ लेखक तो बकायदा लिखकर भी इसके खिलाफ अपनी आवाज उठा चुके हैं, कुछ विवाद मित्रों के बीचबचाव की वजह से सामने आने से रह जाते हैं । लेकिन मेरे जानते किसी ने भी साहित्यिक लघु पत्रिकाओं के संपादकों द्वारा लेखकों के शोषण को विषय बनाकर इसे किसी भी मंच पर उठाने की कोशिश नहीं की है । संपादकों के इस छलात्कार का जोरदार विरोध लेखकों को हर उपलब्ध मंच पर करना चाहिए ताकि शोषण के खिलाफ अपनी रचनाओं में आवाज उठानेवाले खुद के शोषण को बेनकाब कर सके । अंत में मुझे वरिष्ठ साहित्यकार उपेन्द्र नाथ अश्क से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग याद आ रहा है । अश्क जी को एक बार एक प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादक ने समीक्षा के लिए एक पुस्तक भिजवाई । पत्रिका के साथ लिखे पत्र में संपादक ने आग्रह किया कि पुस्तक प्राप्ति की सूचना दें । अश्क जी ने पुस्तक प्राप्ति की सूचना का जो पत्र लिखा वो कुछ यों था – प्रिय भाई समीक्षा के लिए आप द्वारा प्रेषित पुस्तक प्राप्त हुई, आभार । लेकिन पुस्तक के साथ यदि आप समीक्षा लेखन के मानदेय का चेक भी संलग्न कर देते तो मैं हुलसकर समीक्षा लिखता और उत्साह के साथ उसे आपको प्रेषित करता, सादर आपका, अश्क ।