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Saturday, October 22, 2016

पुरस्कार वापसी का पुरस्कार पार्ट-2

चंद दिनों पहले विश्व कविता समारोह के आयोजन के हवाले से पुरस्कार वापसी का पुरस्कार शीर्षक से इस स्तंभ में प्रकाशित लेख पर हिंदी साहित्य जगत में जमकर चर्चा हुई । अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता समारोह के आयोजन पर सफाई देते हुए लिखा कि आयोजन का प्रस्ताव वो काफी पहले नीतीश कुमार को दे चुके थे और कमोबेश ये साबित करने में लगे रहे कि पुरस्कार वापसी की मुहिम से विश्व कविता समारोह के आयोजन का कोई लेना देना नहीं है । अशोक जी देश की ब्यूरोक्रेसी में काफी ऊंचे पद पर रहे हैं, नेताओं के साथ काम करने और राजनीति को बेहद करीब से देखने और समझने का उनको मौका भी मिला है लिहाजा वो यह बात बेहतर समझते होंगे कि राजनीति में जो दिखता है दरअसल वो होता नहीं है और कई बार तो राजनीति में दो जमा दो चार भी नहीं होता है । विश्व कविता समारोह तो अब जब होगा तो बातें साफ होगी लेकिन इस बात से इंकार कोई नहीं कर रहा है कि विश्व कविता समारोह के लिए पहल शुरू हो चुकी है । खुद बिहार के संस्कृति मंत्री ने स्तंभकार से बातचीत में माना है कि अगले साल अप्रैल में इस आयोजन के लिए तैयारी की जा रही है । मंत्री ने तो ये भी कहा कि अशोक वाजपेयी की सलाह को भी आयोजन समिति गंभीरता से ले रही है । आयोजन समिति की बैठक हो चुकी हैं और वाजपेयी जी समेत ज्यादातर सदस्यों ने उसमें हिस्सा भी लिया था । इस बैकग्राउंड को बताने का मकदस ये था कि पुरस्कार वापसी के पुरस्कार की बात हवा में ना होकर तर्कों और तथ्यों के आधार पर की गई थी । अशोक वाजपेयी जी ने बिहार विधानसभा चुनाव के पहले शुरु हुई असहिष्णुता के मुद्दे को हवा दी थी और लगभग उसकी अगुवाई भी की थी । उस दौर में जिन लेखकों, कलाकारों और पत्रकारों ने असहिष्णुता का मुद्दा उठाकर बिहार चुनाव के वक्त माहौल बनाया था उनको अब पुरस्कृत करने का उपक्रम शुरू हो चुका है । जब देश में बढ़ती असहिष्णुता के मुद्दे पर लेखक, अभिनेता, कलाकार आदि पुरस्कार वापस कर रहे थे तो उस दौर में अशोक वाजपेयी ती अगुवाई में तीन सदस्यों का एक दल राष्ट्रपति प्रणब मुख्रजी से मिला था । वाजपेयी के अलावा इस दल के सदस्य थे मशहूर चित्रकार विवान सुंदरम और पत्रकार ओम थानवी ।  इन तीनों ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिलकर असहिष्णुता के मुद्दे पर अपना पक्ष रखा था । बिहार चुनाव के नतीजों के बाद असहिष्णुता का मुद्दा नेपथ्य में चला गया, पुरस्कार वापसी की मुहिम ठंडी पड़ गई और लेखकों कलाकारों का विरोध भी लगभग खत्म हो गया। अब वक्त आ गया है परोक्ष रूप से पुरस्कार वापसी ब्रिगेड के सदस्यों को पुरस्कृत करने का ।
बिहार सरकार हर साल कई तरह के पुरस्कार देती है । जिसमें कुछ राष्ट्रीय स्तर के तो कुछ स्थानीय कलाकारों को दिए जाते हैं । इन पुरस्कारों में पेंटिंग के लिए राष्ट्रीय चाक्षुष कला पुरस्कार औक परफॉर्मिंग आर्ट के लिए राष्ट्रीय प्रदर्श कला पुरस्कार दिए जाते हैं । पुरस्कार वापसी से जुड़े राष्ट्रीय स्तर के लेखकों,कलाकारों को इन पुरस्कारों से नवाजा सकता है । अब ये कहना तो मुश्किल है कि पुरस्कार वापसी समूह के कलाकारों का नाम बिहार सरकार को कौन सुझा रहा है लेकिन ये संयोग नहीं हो सकता है कि एक एक करके उस समूह के कलाकारों को पुरस्कृत किया जा सकता है । जैसे उदाहरण के तौर पर विवान सुंदरम को बिहार सरकार ने चाक्षुष कला के लिए राष्ट्रीय सम्मान से पुरस्कृत किया है । विवान सुंदरम को दिया गया ये पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर का है और उसमें एक लाख की पुरस्कार राशि के अलावा अंगवस्त्रम और स्मृति चिन्ह प्रदान किया गया है । वर्ष दो हजार पंद्रह सोलह के लिए विवान सुंदरम को और वर्ष सोलह सत्रह के लिए हिम्मत शाह को पुरस्कृत किया गया है । विवान सुंदरम इस पुरस्कार के योग्य है बल्कि मेरा तो मानना है कि उनका कद इस लखटकिया पुरस्कार से कहीं बड़ा है लेकिन सम्मान तो सम्मान होता है । विवान सुंदरम की प्रतिभा या उनके चयन पर सवाल नहीं खड़ाकिया जा सकता है लेकिन जिस तरह से पुरस्कार वापसी मुहिम से जुड़े लेखकों कलाकारों को बिहार सरकार उपकृत कर रही है उसपर तो प्रश्नचिन्ह लगता ही है ।

बिहार सरकार के इस पुरस्कार के लिए चय़न समिति पर गौर करने से स्थिति और साफ हो जाती है । पुरस्कार की चयन समिति में बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग के सचिव, संस्कृति निदेशक, सहायक निदेशक के अलावा बिहार संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष और वरिष्ठ कवि आवोक धन्वा, बिहार ललित कला अकादमी के अध्यक्ष आनंदी प्रसाद बादल के अलावा चित्रकार अनिल बिहारी, नाटक के क्षेत्र से सुमन कुमार और लोकगाथा के करंट लाल नट थे । अब इस समिति के सदस्यों को देखने के बाद तो यही प्रतीत होता है कि इसमें सरकार की चली होगी । विवान सुंदरम और हिम्मत शाह की अशोक वाजपेयी से निकटता जग जाहिर है । और पुरस्कार वापसी की मुहिम के वक्त तो विवान सुंदरम फ्रंटफुट पर खेल रहे थे । उस वक्त के उनके बयानों को देखा जा सकता है । तो सवाल वही कि क्या पुरस्कार वापसी की मुहिम से जुड़नेवालों को नीतीश सरकार एक एक करके पुरस्कृत कर रही है । सवाल तो ये भी उठता है कि क्या पुरस्कार वापसी की मुहिम के पीछे कोई सोची समझी रणनीति थी । उस वक्त और उसके बाद तो यह बताने की कोशिश की गई कि पुरस्कार वापसी की मुहिम स्वत:स्फूर्त थी और एक एक करके लेखक, कलाकार, फिल्मकार उससे जुड़ते चले गए । लेकिन बाद में विश्लेषण और पुरस्कार वापसी के लिए पुरस्कार दिए जाने की खबरों से ये साफ हो गया कि उस वक्त एक सोची समझी रणनीति के तहत इस मुहिम को हवा दी गई थी ताकि केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार को बदनाम किया जा सके और बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की अगुवाई वाले महागठबंधन को फायदा हो सके । हुआ भी वही । दरअसल हिंदी समाज के कई लेखक सत्ता से दूर नहीं रह सकते हैं । केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद इस तरह के ज्यादातर लेखकों की दुकानदारी बंद हो गई । उनके हाथ से सुविधा आदि तो छिन ही गया, पुरस्कार आदि बांटकर लेखकों को उपकृत करने का अवसर भी चला गया । केंद्र में अपनी दुकानदारी बंद होते देख कुछ लेखकों ने नीतीश कुमार का दामन थामा तो कुछ लेखक दिल्ली में केजरीवाल सरकार के साथ हो लिए । नीतीश कुमार से तो बकायदा कुछ लेखकों ने देशभर के रचनाकर्मियों से उनकी मुलाकातें और बैठक आदि करवाने का ठेका भी लिया है । केजरीवाल से भी कई लेखकों को उम्मीदें हैं लेकिन वहां मैत्रेयी पुष्पा के आ जाने से कइयों की दाल नहीं गल पा रही है और वो बेचैनी से कभी कुमार विश्वास का दामन थामना चाहते हैं तो कभी कुछ और योजना बनाने में जुट जाते हैं । सवाल वही कि क्या इस तरह के कृत्यों से लेखकों की समाज में इज्जत या तटस्थता बनी रह सकती है । लेखकों के बाने में राजनीति करनेवालों की पहचान उजागर की जानी चाहिए । जो शख्स ऐलानिया इस या उस पार्टी या दल के साथ रहता है वो जनता को छल नहीं सकता है लेकिन जो शख्स लेखक के वेष में रहकर राजनीति करता हो वो जनता को भ्रमित कर सकता है । जिस तरह से पुरस्कार वापसी की आड़ में राजनीति की बिसात बिछाई गई थी उसने साहित्य का बड़ा नुकसान किया और साहित्यकारों की साख पर बट्टा लगाया । और अब जब एक एक करके उनको पुरस्कृत किया जा रहा है तो बची खुची विश्वसनीयता भी खत्म होती दिखाई दे रही है । भारतीय समाज लेखकों से हर मुद्दे पर तटस्थता की उम्द करता है और अपेक्षा ये रहती है कि वो सही को सही और गलत को गलत कहने का सार्वजनिक साहस दिखा सकें । लेकिन इन दिनों जो हो रहा है उसपर नजर डालने से साफ होता है कि  हमारे समाज के लेखक तटस्थ नहीं रह गए हैं । लेखकीय तटस्थता को सबसे पहले खत्म किया कम्युनिस्टों ने जब उन्होंने अपनी विचारधारा के लेखकों को पार्टी का वर्कर और सिद्धांतों का प्रचारक बनाया । कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन होते गए और हमारे लेखक भी आज्ञाकारी कार्यकर्ता की तरह विभाजित होते चले गए । कम्युनिस्टों के विरोध में बने लेखकों के संगठन भी इस या उस पार्टी के ध्वजवाहक बनकर अपने को साबित करने में लगे रहे चाहे वो परिमल हो या कोई और संगठन । समाज के मुद्दों पर हमारे लेखक अपनी पार्टी का मुंह जोहने लगे और पार्टी के स्टैंड को ही लेखकीय स्टैंड की तरह पेश करने लगे । बताते हैं कि इमरजेंसी के समर्थन के प्रस्ताव के लिए भीष्म साहनी तैयार नहीं थे लेकिन अनुशासित पार्टी वर्कर होने की वजह से उनको प्रस्ताव पास करवाना पड़ा । इस समस्या के बारे में हिंदी समाज को विशेष रूप से विचार करना होगा ।