Translate

Showing posts with label स्टालिन. Show all posts
Showing posts with label स्टालिन. Show all posts

Sunday, March 23, 2025

तमिल को हिंदी नहीं अंग्रेजी से खतरा- शास्त्री


राष्ट्रीय शिक्षा नीति के त्रिभाषा फार्मूले को लेकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन निरंतर गैर हिंदी भाषी प्रदेशों पर हिंदी थोपने का आरोप लगा रहे हैं। संसद में भी इस आरोप पर हंगामा हुआ और गृहमंत्री अमित शाह ने पलटवार करते हुए स्टालिन की पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पर भाषा के नाम पर समाज में जहर घोलने का आरोप लगाया। शिक्षा मंत्रालय में एक भारतीय भाषा समिति कार्य करती है जो सभी भारतीय भाषाओं के प्रोन्नयन के लिए मंत्रालय को सुझाव देती है। हिंदी को लेकर उठ रहे विवादों के बीच शिक्षा मंत्रालय में भारतीय भाषा समिति के अध्यक्ष प्रो चमू कृष्ण शास्त्री से राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हिंदी और भारतीय भाषाओं की स्थिति, हिंदी थोपने के आरोप और त्रिभाषा फार्मूले के क्रियान्वयन पर एसोसिएट एडीटर अनंत विजय ने उनसे बातचीत की।  

प्रश्न- राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा फर्मूला क्या है जिसको लेकर इतना विवाद हो रहा है? 

त्रिभाषा सूत्र सबसे पहले 1968 में आया था। उसको ही वर्ष 1986 की शिक्षा नीति में दोहराया गया जो कि वर्ष 2019 तक चला। त्रिभाषा सूत्र में फर्स्ट लैंग्वेज यानी पहली भाषा मातृभाषा, दूसरी भाषा अंग्रेजी, तीसरी भाषा हिंदी राज्यों में अन्य किसी राज्य की भाषा और अन्य अहिंदी भाषी राज्यों में हिंदी भाषा होती थी। त्रिभाषा का सारांश यह था। वर्ष 2020 में पहली बार त्रिभाषा सूत्र के बारे में यह कहा गया कि यह आगे भी प्रचलित रहेगा। हालांकि उसमें राज्यों व छात्रों की आकांक्षाएं, प्रादेशिक आवश्यकताएं और संविधानसम्मत प्रविधान को ध्यान में रखते हुए सभी राज्य अपना त्रिभाषा सूत्र का क्रियान्वयन करेंगे। एक तरह से इसे इतना लचीला बनाया गया, जिसमें कोई प्रिस्क्रिप्शन नहीं है। यानी किसी भी भाषा विशेष के लिए कोई निर्देश नहीं दिया गया। शिक्षा की दृष्टि से देखें तो स्वाधीन भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। 

प्रश्न- आपकी बातों से तो ऐसा प्रतीत होता है कि त्रिभाषा फार्मूले में हिंदी की अनिवार्यता नहीं है? 

बिल्कुल नहीं। हिंदी की अनिवार्यता नहीं है परंतु साथ ही अंग्रेजी की अनिवार्यता भी नहीं है। यदि आप देखेंगे तो पाएंगें कि पूरे देश में हिंदी से ज्यादा यदि कोई एक भाषा पढ़ी जाती है तो वह अंग्रेजी है। दूसरी भाषा के रूप में पूरे देश में अंग्रेजी ही पढ़ाई जाती है। एक दृष्टि से अंग्रेजी की अनिवार्यता को भी खत्म किया गया। यह पहली बार हुआ। बेशक, त्रिभाषा फार्मूला नीति है, लेकिन इसके क्रियान्वयन के लिए तीन साल तक नेशनल या स्टेट एजुकेशन बोर्ड और अन्य भागीदारों की मदद से कैरिकुलम फ्रेम वर्क (पाठ्यक्रम) बनाया गया। इसे स्कीम आफ स्टडीज कहते हैं। इस पर फिर तीन साल काम किया गया। वर्ष 2023 में नेशनल कैरिकुलम फ्रेमर्वक बना। इस स्कीम आफ स्टडीज में किसी भाषा विशेष का उल्लेख न करते हुए उसे समभाव तरीके से परिभाषित किया गया। एक नए सोच को सामने रखते हुए पहली, दूसरी और तीसरी भाषा की जगह आर-1, आर-2 और आर-3 शब्द  का प्रयोग किया गया। साक्षरता की शुरूआत रीडिंग से होती है...यानी पढ़ने से।  आर-1 में मातृभाषा या राज्य की भाषा को स्थान दिया गया। इसमें मातृभाषा और राज्य दोनों को रखा गया क्योंकि यह जरूरी नहीं कि मातृभाषा और राज्य भाषा एक हो। दोनों अलग-अलग हो सकते हैं। आर-2 में आर-1 के अलावा कोई भी भाषा, आर-3 में आर-1 और आर-2 के अलावा कोई भारतीय भाषा। दरअसल, होता क्या था कि वर्ष 2020 से पहले बच्चे थर्ड लैंग्वेज के रूप में फ्रेंच, जर्मन या अंग्रेजी पढ़कर आगे निकल जाते थे। राज्यों में तो ऐसा नहीं हो पाता था, लेकिन  सीबीएएसई में इस तरह से किया जाता था। अब नई शिक्षा नीति के तहत ऐसा नहीं हो पाएगा। सबसे अहम यह है कि अब हर विद्यार्थी को दो भारतीय भाषा अनिवार्य रूप से सीखनी होगी। अब बताइए, कि इसमें हिंदी कहां थोपी गई है ? वर्तमान सरकार ने सर्वसमावेशक, सार्वभौमिक व सार्वदेशिक भाषा नीति अपनाई है।

प्रश्न- आर-1, आर-2,आर-3 उत्तर प्रदेश और बिहार में कैसे लागू होगा? कौन कौन सी भाषाएं छात्र चुन सकते हैं। 

सिर्फ उप्र ही नहीं बल्कि हिंदी भाषी 10 राज्यो में यह चुनौती है। बिहार- उत्तर प्रदेश में मगधी, अवधी, भोजपुरी जैसी भाषा है। दरअसल, नई शिक्षा नीति के तरह बहुभाषिता को बढ़ावा देना ही प्राथमिकता है। अन्य प्रदेश की एक भाषा सीखना है। अब सवाल यह है कि यह कैसे सीखेंगे? आनलाइन सीख सकते हैं। समर वेकेशन में अन्य राज्य में जाकर भाषा सीख सकते हैं। स्कूलों द्वारा 15 दिनों का क्रैश कोर्स शुरू किया जा सकता है। एक राज्य के स्कूल दूसरे राज्यों के स्कूलों से पेयरिंग कर सकते हैं। क्लस्टर बना सकते हैं। इसी तरह अंतरराज्यीय यानी कुछ दिनों के लिए वहां जाकर रहकर भी बच्चे एक भारतीय भाषा सीख सकते हैं। इससे आत्मीयता बढ़ेगी या एकता बढ़ेगी। 

प्रश्न- क्या यह व्यवहारिक है? संसाधन कहां से लाएंगे? उप्र, बिहार जैसे राज्यों में जहां शिक्षकों की भारी कमी है, वहां नई भाषा सीखाने के लिए शिक्षक कैसे मिलेंगे? 

ये सब हो जाएगा अगर इससे राजनीति निकल जाएगी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर जितनी भ्रांतियां हैं उसको पहले दूर करना होगा। इस शिक्षा नीति में सबकुछ सुझाव मात्र है, सजेस्टिव है, निर्णय तो राज्य सरकारों को ही करना है, क्रियान्वयन भी।

प्रश्न- फिर इतना विरोध क्यों हो रहा है? हिंदी थोपने की बात कहां से आई?राष्ट्रीय  शिक्षा नीति में तो कहीं भी हिंदी शब्द तक का उपयोग नहीं किया गया? वह भी चार साल बाद इसके विरोध का क्या औचित्य? 

देखिए, राजनीति मेरा विषय नहीं है। मैं भाषाविद् हूं। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषा नीति को लेकर जो सोच है और इसको उन्होंने प्रकट भी किया है कि सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं। तमिल संगमम जैसे कार्यक्रम के जरिये तमिल भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर लेकर आए। अब तक अलगाववादी ताकतों व विभाजनकारी सोच रखने वाले तत्वों द्वारा भाषा का उपयोग समाज और देश को तोड़ने के लिए किया जाता रहा है। प्रधानमंत्री ने इसी भाषा को समाज व देश को आपस में जोड़ने का साधन बनाया। भाषाओं के बीच में जो आत्मीयता है, उसका उपयोग किया। उनका कहना है भारत में अलग-अलग भाषा बोलने वालों के बीच जो आत्मीयता है, यह आत्मीयता ही एकता का निर्माण करती है। विविधता सौंदर्य है, एकता शक्ति है। विविधता का सौंदर्य एकता की शक्ति के आधार पर ही सुदीर्ष काल जीवंत और विकसित रह सकता है। एकता की शक्ति के बिना यह विविधता टिक नहीं सकती है। आत्मीयता, विविधता और एकता...यही भारतीयता है। इससे ही लाखों सालों से भारत एक राष्ट्र के नाते अडिग रहा। भारत राष्ट्र के नाते सब प्रकार के विदेशी आक्रमणों को झेलते हुए भी एक रहा। सभ्यता पर आक्रमण के साथ-साथ वैचारिक आक्रमण भी हुआ। अब जब प्रधानमंत्री की भाषा नीति से एकता का सूत्र और सुदृढ़ हो रहा है, तो कुछ अलगाववादी तत्व भाषा को साधन बना रहे हैं। आने वाले समय में चुनाव भी होने वाले वाले हैं। हो सकता है विरोध का यही कारण हो। 

प्रश्न- आपने अभी तमिल संगमम का नाम लिया...कहा जाता है कि ये कार्यक्रम आपका ब्रेन चाइल्ड है? 

(हंसते हुए) नहीं...नहीं। ऐसा नहीं है। 

प्रश्न-आपने प्रधानमंत्री का नाम जरूर लिया, लेकिन कहा जाता है कि प्रस्ताव आपका था। सच्चाई क्या है? 

सच्चाई यही है कि विचार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसे दिशा दिया और भारतीय भाषा समिति ने संयोजक के रूप में मैंने इसे क्रियान्वित किया। 

प्रश्न- क्या तमिल संगमम जैसे आयोजन से कोई फायदा हुआ? 

निश्चित रूप से लाभ हुआ। की के अलावा गुजरात के सौराष्ट्र में भी तमिल संगमम का आयोजन किया गया। दरअसल, लगभग 500 साल पहले गुजरात के जो लोग तमिलनाडु के जाकर बसे, वे सौराष्ट्री कहलाते हैं। उनके लिए आयोजन किया गया। 

प्रश्न- क्या श्रीनगर में भी भारतीय भाषाओं को लेकर आप लोगों ने कुछ किया था? 

जम्मू-कश्मीर सहित सभी राज्यों में भारतीय भाषा संगम कार्यक्रम किया था। इस आयोजन में उस राज्य में अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोग एक दिन एक मंच पर एकत्रित होते हैं और अपनी-अपनी बात रखते हैं। इसके अलावा मोदी सरकार ने भारतीय भाषा उत्सव शुरू किया। महाकवि सुब्रह्रमणयम भारती के जन्मदिवस (11 दिसंबर) पर भारतीय भाषा उत्सव के रूप में मनाना शुरू किया। काशी विश्वविद्यालय में कवि सुब्रह्रमणय भारती के नाम से एक चेयर की स्थापना भी की गई। 

प्रश्न- तमिलनाडु सरकार को फिर क्या परेशानी है, सभी जगह अगर ऐसा होगा तो वहां भी होगा। 

देखिए, तमिलनाडु में वर्ष 1965-1968 से कभी न कभी हिंदी विरोध की आवाज उठती रहती है। सही मायने में मैं इसे हिंदी विरोधी नहीं बल्कि यह हिंदू समाज विरोधी आंदोलन कहना चाहूंगा। वह द्रविड़ राज्य बनाने का आंदोलन था। द्रविड़ अलग है...आर्य अलग है। इसको बढ़ावा देने के लिए वहां टू लैंग्वेज यानी द्विभाषा फर्मूला रखा गया। इसके तहत वे तमिल और अंग्रेजी ही पढ़ाते हैं। तमिलनाडु में 12 प्रतिशत लोग गैर तमिलभाषी है। यह 14 अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं। इससे समस्या यह होती है कि तमिलनाडु के 12 प्रतिशत विद्यार्थी अपनी मातृभाषा नहीं सीख पाते हैं। यह  बड़ा अन्याय है। दूसरी, बड़ी परेशानी यह है कि एक और भारतीय भाषा नहीं जानने के कारण यहां के युवा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित प्रतियोगी परीक्षा और दूसरे राज्यों में नौकरी के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षाओं से वंचित रह जाते हैं। तीसरी परेशानी, तमिलनाडु से अलग-बगल के राज्यों में काम करनेवाले मजदूरों को भाषा की परेशानी होती है। वहीं, दूसरे राज्यों से यहां आने वाले कर्मचारियों व मजदूरों के बच्चे भी अपनी भाषा नहीं सीख पाते हैं। दरअसल, यह तमिलनाडु को देश के अन्य राज्यों से काटने का एक प्रयास है। भाषा के नाम पर अकारण विवाद खड़ा करके तमिनलाडु को एक अलग द्वीप बना रहे हैं। चेन्नई के 44 प्रतिशत गैर तमिलाभाषी हैं। उनके साथ अन्याय हो रहा है। केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र से सटे राज्यों की  सीमाओं पर सदियों से बसे गैर तमिलभाषी भी अपनी मातृभाषा पढ़ नहीं पा रहे हैं, सीख नहीं पा रहे हैं। 

प्रश्न - तो असली चुनौती क्या है? भारतीय भाषा समिति इसे कैसे देखती है?

देश में द्वि या त्रिभाषा फार्मूला से कहीं ज्यादा बड़ा व अहम मुद्दा है शिक्षा की 'माध्यम भाषा'। असली लड़ाई तो मातृभाषा माध्यम या भारतीय भाषा माध्यम और अंग्रेजी माध्यम के बीच है। वर्ष 2011 में तमिलनाडु में बारहवीं में 65 प्रतिशत विद्यार्थी तमिल माध्यम में पढते थे। वर्ष 2021 तक यह आंकड़ा 54 प्रतिशत तक आ गया। अब यह घटकर 47 प्रतिशत हो गया। तमिल का नुकसान हिंदी की वजह से नहीं बल्कि अंग्रेजी माध्यम की वजह से हो रहा है। यही हाल पूरे देश का है। देशभर के प्राइवेट स्कूलों में 65 प्रतिशत विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे हैं। सरकारी, अनुदान प्राप्त और निजी स्कूलों को मिला लें तो आंकड़ा निकाले तो 35 प्रतिशत विद्यार्थी अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रहे हैं। हर साल डेढ़ से दो करोड़ विद्यार्थी मातृभाषा या राज्यभाषा से आंग्रेजी माध्यम में 'माइग्रेट' हो रहे हैं। मैं अपने परिवार का उदाहरण देता हूं। मेरे परिवार में हम लोग नौ भाई-बहन हैं। दो को छोड़कर शेष सात भाई-बहन के परिवारों में उनके बच्चे मातृभाषा में पढ़-लिख नहीं सकते हैं क्योंकि वह अंग्रेजी भाषा में पढ़े हैं। उनका सोचना, लिखना-पढ़ना सबकुछ अंग्रेजी भाषा में हो रहा है। वह अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। अंग्रेजी भाषा का एक प्रवाह है। हायर एजुकेशन और आइआइएम, आइआइटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान अंग्रेजी माध्यम से है। यह क्यों है ? इसलिए, क्योंकि इकोसिस्टम अंग्रेजी माध्यम में है। कोर्ट, प्रशासन, व्यापार, उद्योग, साइंस-टेक्नोलाजी सब जगह अंग्रेजी माध्यम में ही काम हो रहा है। एक गांव का बच्चा यदि चिप्स का एक पैकेट भी खरीदता है तो उसके सामने पैकेट पर अंग्रेजी में लिखा शब्द आता है। पूरा इको सिस्टम ही अंग्रेजी माध्यम के नीचे दबता जा रहा है। स्थिति भयावह है। 

प्रश्न- तो आगे रास्ता क्या है, कैसे और क्या करना होगा? 

अंग्रेजी के इकोसिस्टम को बदलकर भारतीय भाषाओं का इकोसिस्टम बनाना होगा।  

 प्रश्न- राष्ट्रीय शिक्षा नीति कब तक इम्प्लीमेंट हो सकेगा? पांच साल तो निकल गया है? 

कूरिकुलम फ्रेमवर्क बन रहा है। दो-तीन साल में क्रियान्वयन हो जाना चाहिए।   

 प्रश्न- क्या आपको नहीं लगता कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन धीमी गति से चल रहा है। 

देर इसलिए हो रही है क्योंकि सभी को लेकर काम करना है। कांग्रेस की सरकार के दौरान सबको लेकर चलना जरूरी नहीं होता था,लेकिन वर्तमान सरकार में सभी को साथ मिलाना जरूरी है। सिर्फ पाठ्यक्रम बदलना ही काम नहीं है बल्कि मानसिकता बदलना भी जरूरी है। इसमें भारतीय दृष्टिकोण और उस विषय में भारतीय इतिहास को जोड़ना है। इस पाठ्यक्रम के आधार पर जो पढ़कर आगे बढ़ेंगे, वह भारत की जड़ों से जुड़ेंगे। इसलिए समय लग रहा है। अभी तक समझाया गया कि भाषा और संस्कृति अलग-अलग है, लेकिन ऐसा नहीं है। भाषा और संस्कृति एक ही है। उनकी अभिव्यक्ति अलग-अलग है। मूल तत्व एक है। यह भी पढ़ाना है। अब तक जो-जो गलत सिखाया गया, उसे भी सुधारना है। 

प्रश्न-यानी भाषा के साथ-साथ संस्कृति से जोड़ना ही उद्देश्य है?   

बिलकुल। कर्नाटक के गांव में आज भी एक व्यवस्था है। वहां खाने से पहले व्यक्ति घर के सामने खड़े होकर कहते हैं कि गांव में कोई भूखा है तो वह हमारे घर पर आकर खाना खाएं। यह पंरपरा आज भी कुछ जगहों पर हैं। यह जीवन व्यवस्था में लाना है।   

प्रश्न- भाषा के विकास के लिए क्या करना चाहिए? 

इसके लिए सात चीजें जरूरी है। उस भाषा में बोलने वाले लोग हों, माध्यम भाषा के रूप में प्रयोग हो,.समकालीन शब्द निर्माण, एडाप्टेशन आफ टेक्नोलाजी, टीचींग-लर्निंग, सर्टिफिकेशन और पैट्रनेज (स्टेट या कार्पोरेट)। एडाप्टेशन आफ टेक्नोलाजी की जरूरत को इस तरह से समझा जा सकता है कि दुनिया में 6000 भाषाएं थीं, लेकिन जिनका उपयोग प्रिटिंग में नहीं हुआ, वह खत्म हो गए। सर्टिफिकेशन से आशय यह है कि अंग्रेजी की प्रोफेशिएंसी (योग्यता) परीक्षण के लिए टोफेल की परीक्षा होती है, लेकिन भारतीय भाषाओं के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं है। इन सात आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए हर राज्य में बहुभाषिता को बढ़ना देना चाहिए।  हिंदी राष्ट्रभाषा है ऐसा मानकर लड़ रहे हैं। जबकि प्रधानमंत्री बार-बार कह रहे हैं सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषा हैं। दरअसल, भाषाओं को अलग-अलग वर्गों में बांटकर बहुत नुकसान पहुंचाया गया।  

Saturday, March 15, 2025

हिंदी विरोधी छद्म नारों की राजनीति


अगले वर्ष तमिलनाडु में विधानसभा के चुनाव होनेवाले हैं। चुनाव की आहट से ही वहां के मुख्यमंत्री और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेता एम के स्टालिन को हिंदी की याद आ आई। उनको लगने लगा केंद्र सरकार तमिलनाडु पर हिंदी थोपने का षडयंत्र कर रही है। दरअसल तमिलनाडु में जब भी कोई चुनाव आता है तो वहां के स्थानीय दलों को भाषा की याद सताने लगती है। उनको लगता है कि तमिल को नीचा दिखाकर हिंदी को उच्च स्थान पर स्थापित करने का षडयंत्र किया जा रहा है। स्टालिन को करीब पांच साल बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति की याद आई। शिक्षा नीति के त्रिभाषा फार्मूले पर उनको आपत्ति है। उसके माध्यम से ही वो तमिल पर हिंदी के वर्चस्व की राजनीति को देखते हैं। यह एक राजनीतिक वातावरण बनाने की योजनाबद्ध चाल है जिसमें तथ्य का अभाव है। 105 पृष्ठों की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कहीं भी हिंदी शब्द तक का उल्लेख नहीं है। पहले भी इस स्तंभ में इस बात की चर्चा की जा चुकी है। संभवत: शिक्षा नीति बनाने वालों को भारतीय भाषाओं की भावनाओं का ख्याल रहा होगा। संभव है कि वो तमिल राजनीति से आशंकित रहे होंगे। इस कारण उन्होंने पूरे दस्तावेज में कहीं भी हिंदी शब्द नहीं हे। पता नहीं क्यों स्टालिन को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के किस प्रविधान के अंतर्गत हिंदी थोपने का उपक्रम नजर आ गया है। स्टालिन तमिलनाडु की जनता की संवेदनाओं को भड़काने का खेल खेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिसने भी तमिलनाडु पर हिंदी थोपने की कोशिश की वो या तो हार गए या बाद में अपना रुख बदलकर डीएमके के साथ हो गए। तमिलनाडु हिंदी उपनिवेशवाद को स्वीकार नहीं करेगा। कौन सा हिंदी उपनिवेशवाद और हिंदी थोपने की कौन सी कोशिश। स्टालिन इसको स्थापित नहीं कर पा रहे हैं तो हिंदी विरोध के नाम पर कभी तमिल अस्मिता की बात करने लग जाते हैं तो कभी कुछ अन्य। संभव है कि उनको तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में तात्कालिक लाभ मिले लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर उनकी स्थिति हास्यास्पद हो रही है। 

विगत दस वर्षों में तमिल और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रोन्नयन के लिए केंद्र सरकार के स्तर पर कई तरह के कार्यक्रम चलाए गए हैं। आज से करीब तीन वर्ष पहले काशी तमिल संगमम नाम से एक कार्यक्रम काशी में आरंभ किया गया था। इसका शुभारंभ स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। ये कार्यक्रम तमिलनाडु और काशी के ऐतिहासिक संबंधों को फिर से याद करने और समृद्ध करने के लिए आयोजित किया गया था। तमिल को लेकर महाराष्ट्र और कश्मीर में भी कार्यक्रम आयोजित किए गए। इससे पूर्व 2021 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तमिल के महान कवि सुब्रह्ण्य भारती के सौवीं पुण्यतिथि पर काशी हिंदी विश्वविद्यालय के कला विभाग में महाकवि के नाम पर सुब्रह्ण्य भारती चेयर आन तमिल स्टडीज स्थापित करने की घोषणा की थी। ऐसे प्रकल्पों की लंबी सूची है। सिर्फ तमिल ही क्यों, ओडिया, मराठी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय बढ़ाने को लेकर भी अनेक कार्य किए जा रहे है। इस पूरे प्रसंग को देखने के बाद हिंदी के अप्रतिम लेखक कुबेरनाथ राय का एक निबंध जम्बुक की कुछ पंक्तियों का स्मरण हो उठता है। कुबेरनाथ राय ने इस निबंघ में बंगला के श्रेष्ठ साहित्यकार ताराशंकर बनर्जी की एक पंक्ति उद्धत की है। उन्होंने लिखा है कि ताराशंकर बनर्जी ने बताया कि था कि बिना एक अखिल भारतीय जीवन-दृष्टि विकसित किए हम अपना अस्तित्व बचा नहीं पाएंगे। यहां पर कुबेरनाथ जी आशंकित होते हुए लिखते हैं कि बनर्जी बात तो ठीक कर रहे हैं परंतु क्षेत्रीय जीवन दृष्टि के बढ़ते जोर के सामने कोई अखिल भारतीय जीवन दर्शन की रचना करने में समर्थ हो सकेगा इसमें संदेह है। क्रांतियुग में तिलक ने एक अखिल भारतीय जीवन दर्शन ‘कर्मयोग’ को सामने रखा था। इसके बाद महात्मा गांधी ने चरखा ( स्वावलंबन और सर्वोदय) हिंदी (राष्ट्रीय एकता) और अध्यात्म का त्रिकोणात्मक जीवन दर्शन सामने रखा। परंतु राजपट्ट बांधकर उनके शिष्य ही उसे अस्वीकृत कर गए। इसके बाद लोहिया ने एक अखिल भारतीय जीवन दृष्टि विकसित करने की चेष्टा की। परंतु न तो उनके पास पर्याप्त साधन थे और न ही कोई सुयोग्य उत्तराधिकारी था जो उनके बोध को विकसित कर सके।

महात्मा गांधी हिंदी को राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक मानते थे। यह अकारण नहीं था कि उन्होंने स्वाधीनता के आंदोलन में बड़े अभियानों का नाम हिंदी में रखा था। सविनय अवज्ञा, अंग्रेजो भारत छोड़ो, नमक सत्याग्रह आदि। लेकिन स्वाधीनता के बाद जब भाषा के आधार पर प्रांतों का गठन आरंभ हुआ तब क्षेत्रीय जीवन दृष्टि को ना सिर्फ मजबूती मिली बल्कि वो राजनीति के एक औजार की तरह भी विकसित होने लगा। भाषा विवाद के बाद जिस तरह से केंद्र सरकार ने घुटने टेके थे उसपर कुबेरनाथ राय की टिप्पणी गौर करने लायक है। एक तरफ वो मुट्ठी भर तमिल उपद्रवियों को कोसते हैं तो दूसरी तरफ कहते हैं कि हिंदी प्रातों के कुछ राजनीति-व्यवसायी या कुछ किताबी बुद्धीजीवी जो मौज से हर एक बात पर वाम बनाम दक्षिण की शैली में सोचते हैं।...1947 से पूर्व ऐसे ही आंख मूंदकर ऐसे प्रगतिशील पाकिस्तान का समर्थन करते थे (देखिए श्री राहुल की कहानी सुमेरपण्डित) और फिर वैसे ही आंख मूंदकर सोचते हैं कि इस देश में वर्ग युद्ध तो संभव नहीं अत: संप्रदाय युद्ध, जाति युद्ध, भाषा युद्ध कराओ जिससे बंसी लगाने का मौका मिल सके। कुबेरनाथ राय भाषा विवाद के समय देश के नेतृत्व पर बहुत कठोर टिप्पणी भी करते हैं और कहते हैं कि वर्तमान धृतराष्ट्र इस बार केवल अंधा ही नहीं बल्कि बहरा भी है। कुबेरनाथ राय जब ऐसा कह रहे होंगे तो उनके मष्तिष्क में नेहरू रहे होंगे। ऐसा इस लेख के अन्य हिस्सों को पढ़कर प्रतीत होता है। 

दरअसल काफी लंबे समय से इस बात को कहा जाता रहा है कि हिंदी, हिंदू हिन्दुस्तान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे पर रहा है। 1965 में अंग्रेजी पत्रिका क्वेस्ट में अन्नदाशंकर राय की टिप्पणी है कि, भाषा संदर्भ में हिंदी का वही स्थान है जो राजनीतिक संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेक संघ या जनसंघ का है। अत: धर्मनिरपेक्ष शासनतंत्र में दोनों के लिए कोई खास जगह नहीं है। उस टिप्पणी में अन्नदाशंकर राय के निष्कर्ष का आधार था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी हिंदी का प्रयोग करता है इस कारण हिंदी का संबंध हिंदू धर्म से है। विद्वान लोग भी कैसे भ्रमित होते हैं ये उसका उदाहरण है। तभी तो कुबेरनाथ राय को उस लेख के प्रतिकार में लिखना पड़ा- मुखौटा उतार लो, राय महाशय ! आज अगर स्टालिन तमिल को हिंदी के सामने खड़ा करके अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना चाहते हैं तो करें पर ये न तो देश हित में है और ना ही स्टालिन को राजनीति में किसी प्रकार से दीर्घकालीन लाभ होगा। संभव है कि वो हिंदी उपनिवेशवाद जैसे छद्म नारों के आधार पर कुछ सीटें जीत जाएं लेकिन ये तय है कि उनकी राजनीति एक न एक दिन हारेगी। जब तक उनको ये समझ आएगा तबतक बहुत देर हो चुकी होगी। वो तबतक तमिल का भी नुकसान कर चुके होंगे। ये समय भारतीय भाषाओं का स्वर्णकाल है, स्टालिन को समझना चाहिए।  


Saturday, July 13, 2024

हिटलर से बड़ा तानाशाह स्टालिन


लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से फेसबुक पर हिंदी साहित्य से जुड़े लोगों ने ऐसा स्तरहीन विवाद छेड़ा हुआ है जिससे साहित्य जगत शर्मसार हो रहा है। सतही, व्यक्तिगत और अश्लील टिप्पणियों की भरमार है। लोग एक दूसरे से अपनी खुंदक में किसी भी हद तक जा रहे हैं। हिंदी साहित्य से जुड़े युवा और नवोदित वृद्ध पीढ़ी के अनेक लेखक व्यक्तिगत कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हुए स्ततरहीन टिप्पणियां कर रहे हैं। इन टिप्पणियों से साहित्य जगत बजबजा रहा है। आभासी दुनिया के इस घटिया वातावरण में जनवादी लेखक संघ (जलेस) से जुड़े संजीव कुमार ने फेसबुक पर बहुत ही चतुराई से एक बहस को आरंभ करने का प्रयास किया। चतुराई इस कारण कि उन्होंने हिटलर और स्टालिन की तुलना करने के लिए एक पुस्तक के अनुदित अंश का हवाला दिया। हिटलर और स्टालिन को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर कई बार बहस हो चुकी है और हर बार निष्कर्ष यही निकला था कि दोनों क्रूर तानाशाह थे। परंतु यह माना जाता है कि वैचारिक मुद्दे बीस साल बाद हर पीढ़ी के सामने अपने अपने तरीके से रखे जाने चाहिए। इससे युवाओं के विचारों को प्रभावित करने और उसको गढ़ने में मदद मिलती है। कम्युनिस्ट प्रचारक बहुधा इस प्रविधि का उपयोग करते रहते हैं। अब भी कर रहे हैं। परंतु संजीव की इस बात के लिए प्रशंसा करनी चाहिए कि फेसबुक पर साहित्य को लेकर जिस तरह की गंदगी हो रही है उसमें उन्होंने एक वैचारिक मुद्दा तो उठाया। संजीव कुमार की इस टिप्पणी पर जिस प्रकार की प्रतिक्रिया आ रही है वो भी निराश ही करती है। वामपंथ से जुड़े छोटे और मंझोले लेखकों की उनकी पोस्ट पर टिप्पणियों को पढ़कर लगता है कि वो लहालोट हो रहे हैं 

अब हिटलर और स्टालिन की तुलना पर आते हैं। संजीव ने अनुवाद का अंश लगाने के पहले एक टिप्पणी लिखी- एक ही सांस में हिटलर और स्टालिन दोनों का नाम लेना इन दिनों बहुत आम है। कई उदारपंथी बुद्धिजीवियों ने तो बीच में ठीक-ठाक कोशिश की कि नरेंद्र मोदी के प्रसंग में बार-बार याद किये जाने वाले हिटलर को स्टालिन से रिप्लेस कर दिया जाए। इसे देखते हुए आइजक डाटशर की किताब ‘स्टालिन: अ पोलिटिकल बायोग्राफी’ का एक हिस्सा बहुत दिनों से अनुवाद करके साझा करना चाहता था। टलते-टलते आज संयोग बना है। जो लोग आइजक डाटशर से परिचित न हों, उनके लिए इतना जानना काफी होगा कि वे एक पोलिश मार्क्सवादी थे जो 1932 में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी से निष्कासित हुए। 1939 में इंगलैंड चले गए और फिर आजीवन आत्मारोपित निर्वासन में ही रहे। वे ट्रोट्स्की के मुरीद थे और तीन खण्डों में उन्होंने ट्रोट्स्की की जो जीवनी लिखी है, वह आधुनिक क्लासिक मानी जाती है उससे पहले, 1949 में उन्होंने स्टालिन की जीवनी लिखी जो, जाहिर है, काफ़ी आलोचनात्मक है। यह अंश उसी के आखिरी अध्याय से है। अनुवाद का अंश लंबा है लेकिन संजीव उसके बहाने ये साबित करना चाहते हैं कि हिटलर की क्रूरता विध्वंस के लिए थी जबकि स्टालिन की निर्माण के लिए। अनुवाद में कहा गया है कि हिटलर जिस जर्मनी को छोड़कर गया वो दरिद्र और वहशी था। वहीं स्टालिन के शासनकाल में रूस का विकास हुआ। अब जरा इसकी पड़ताल करनी चाहिए। आगे बढ़ने से पहले ये देख लेते हैं कि हिटलर का कालखंड क्या था और स्टालिन का क्या था। हिटलर 1933-1939 तक सत्ता में रहा। जबकि स्टालिन ने 1924 से 1953 तक सोवियत रूस पर राज किया। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि संजीव स्टालिन के संबंध में एक मार्क्सवादी लेखक का ही उद्धरण दे रहे हैं। 

असली कहानी तो इसी कालखंड में है। स्टालिन और हिटलर में कोई दुश्मनी नहीं थी। बल्कि कहा तो ये जाता है कि हिटलर ने बर्बरता के बहुत से तरीके जोसेफ स्टालिन से सीखे। जब हिटलर जर्मनी का चासंलर बना तबतक स्टालिन ने रूस में अपनी सत्ता की जड़ें काफी मजबूत कर ली थीं। दोनों एक दूसरे से बर्बरता और अधिकनायकवाद सीख रहे थे। अगर होलोकास्ट ब्रिटानिका को देखें तो पता चलता है कि 23 अगस्त 1939 में हिटलर और स्टालिन ने एक समझौता किया। इस समझौते पर जर्मनी और सोवियत रूस के विदेश मंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। इस समझौते को हिटलर-स्टालिन समझौता कहा जाता है। हिटलर और स्टालिन के बीच हुए इस समझौते के दो भाग थे। एक भाग जो सार्वजनिक किया गया और दूसरे को गोपनीय रखा गया। जो भाग सार्वजनिक किया गया उसमें समझौता ये था कि दोनों देश एक दूसरे पर आक्रमण नहीं करेंगे। पर खतरनाक वो हिस्सा था जिसको उस समय गोपनीय रखा गया था। गोपनीय हिस्सा था पूर्वी यूरोप में दोनों देशों का दबदबा बनाना और पोलेंड का आपस में बंटवारा करना। ये समझौता दस वर्षों के लिए किया गया था और अगर दोनों में से किसी देश से आपत्ति नहीं आती तो अगले पांच वर्षों तक ये स्वत: बढ़ जाता । समझौते के एक ही सप्ताह बाद जर्मनी ने पोलैंड पर हमला कर दिया। युद्ध चल ही रहा था कि सोवियत रूस ने पूर्वी दिशा से पोलैंड पर हमला कर दिया। फिर दोनों ने गोपनीय समझौते के अनुसार पोलैंड को आपस में बांट लिया। कई इतिहासकार हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए जिम्मेदार मानते हैं लेकिन कुछ लोग हिटलर-स्टालिन समझौते को विश्वयुद्ध की जमीन तैयार करनेवाला बताते हैं क्योंकि इस समझौते के बाद ही सोवियत रूस ने फिनलैंड, लातिविया आदि पर कब्जा किया। इससे ये साबित होता है कि स्टालिन और हिटलर में सहमति थी। दोनों ने पूर्वी यूरोप को आपस में बांट लेने पर सहमति जताई थी और उसके लिए समझौता भी किया था। 

अब रही बात देश के निर्माण और विध्वंस की। जर्मनी के विश्वविद्यालयों और विज्ञानियों को खत्म करने की बात होती है और हिटलर को जिम्मेदार बताया जाता है। ये बताते हुए वामपंथी लेखक इस बात को सुविधानुसार तरीके से भुला देते हैं कि हिटलर यहूदियों को समाप्त कर रहा था। उस समय के जर्मनी में शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, मनोरंजन के क्षेत्र में यहूदियों का बोलबाला था। हिटलर को यहूदियों को मारना था तो जो उसके सामने आया मारा गया। इससे भी खतरनाक और बर्बर कार्रवाई तो स्टालिन ने की। 1937 में स्टालिन ने द ग्रेट पर्ज की आड़ में अपने राजनीतिक विरोधियों, किसानों का जो नरसंहार किया उसको नहीं भूलना चाहिए। स्टालिन इतने पर ही नहीं रुका था उसने तो जातीय नरसंहार किया जिसमें एक अनुमान के मुताबिक दस लाख से अधिक लोगों का कत्ल किया गया। देश के बाहर निर्वासित जीवन जी रहे लोगों को मरवाया गया। जब भी किसी दो व्यक्ति में तुलना होती है तो उसका पैमाना तय किया जाता है। किसी भी पैमाने पर स्टालिन जर्मन तानाशाह हिटलर से अधिक बर्बर, क्रूर, शातिर और वैश्विक समाज के लिए खतरनाक दिखाई देता है। स्टालिनवादी राजनीति मार्क्सवादियों से अधिक हिंसक है। बार बार इस बात का प्रयास किया जाता है कि हिटलर की तुलना में स्टालिन रचनात्मक दिखे। 25 जून को केंद्र सरकार ने संविधान हत्या दिवस घोषित किया है। उसके बाद से ही ये प्रयास दिखाई देने लगा है कि कैसे आपातकाल को उचित ठहराया जाए। ऐसे तर्क गढ़े जाएं जिससे ये लगे कि इंदिरा गांधी ने परिस्थियों से मजबूर होकर देश पर इमरजेंसी थोपी। 

Saturday, April 22, 2017

हिंदी की बाधाएं

हाल के दिनों में दो खबरें ऐसे आईं जिसको लेकर भाषा के पैरोकारों की पेशानी पर बल पड़ने लगे। पहली खबर तो ये आई कि सीबीएसई के स्कूलों में दसवीं तक हिंदी की शिक्षा को अनिवार्य किया जा रहा है और दूसरी खबर ये आई कि हिंदी पर बनाई गई संसदीय समिति की कुछ सिफारिशों को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है । इन सिफारिशों में ये भी शामिल था कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री अपना भाषण हिंदी में देंगे, जिसको भी मंजूरी मिली, लेकिन शर्त के साथ। शर्त ये इनको हिंदी आती हो और वो इस भाषा में सहज हों। सीबीएसई ने हिंदी को अनिवार्य करने की खबरों से इंकार कर दिया और कहा कि भाषा को लेकर जो फॉर्मूला चल रहा है वही जारी रहेगा। लेकिन संसदीय समिति की सिफारिशों के खिलाफ एक माहौल बनाने की कोशिश की जाने लगी है। यह सत्य और तथ्य है कि भारत के लगभग साठ करोड़ लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। यह भी माना जाने लगा है कि हिंदी एक तरीके से पूरे देश में संपर्क भाषा के तौर पर विकसित हो चुकी है और कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से कोलकाता तक सबलोग हिंदी समझते हैं। तो फिर हिंदी का विरोध क्यों। इसका उत्तर एक शब्द का है, राजनीति।
अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए गैर हिंदी प्रदेश के कुछ नेता इसको मुद्दा बनाकर जनता की भावनाएं भड़काना चाहते हैं। इन भावनाओं को भड़काने के पीछे भाषा से कुछ लेना देना हो ऐसा प्रतीत नहीं होता है। बल्कि ये संकेत मिलते हैं कि इसके पीछे वोटबैंक की राजनीति है। डीएमके नेता एम के स्टालिन ने पिछले चुनाव के वक्त कई इलाकों में हिंदी में अपनी पार्टी के पोस्टर लगवाए थे। अब संसदीय समिति की सिफारिश के बाद वो भी हिंदी के विरोध का झंडा लेकर खड़े हो गए हैं । इसके पहले भी वो हाईवे पर बोर्ड में हिंदी में शहरों के नाम लिखवाने को मुद्दा बनाने की कोशिश में लगे थे जो परवान नहीं चढ़ सकी। इन विरोधों के बीच केंद्र की तरफ से बार-बार ये कहा गया है कि हिंदी किसी पर थोपी नहीं जाएगी ।
दरअसल हिंदी को सरकारी नोटिफिकेशन आदि से सर्वामान्य भाषा के तौर पर स्थापित किया भी नहीं जा सकता है। इसके लिए हिंदी अपना रास्ता खुद बना रही है। हिंदी के विकास में दो सबसे बड़ी बाधा है पहली तो अंग्रेजी के पैरोकार जो खुद औपनिवेशिक मानसिकता में जी रहे हैं। उनको लगता है कि हिंदी का अगर दबदबा कायम हुआ तो उनकी धमक कमजोर हो जाएगी । इसके लिए वो लगातार प्रयत्न करते हैं कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं एक दूसरे से झगड़ती रहें। जबकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में किसी तरह का कोई झगड़ा है नहीं। अन्य भारतीय भाषाओं की कृतियों का जितना अनुवाद हिंदी में होता है उतना किसी अन्य भाषा में नहीं होता है। हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं को यह समझना होगा कि हित इसी में हैं कि वो साथ साथ चलें। कहा भी गया है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं सहोदर हैं तो फिर झगड़ा कैसा और क्यों? हिंदी के विकास में दूसरी बाधा उसका अपना तंत्र है। हिंदी को सर्वमान्य बनाने के लिए भाषा में नए शब्दों के गढ़ने की जरूरत है। कई बार हिंदी में शब्दों की कमी नजर आती है और उसके लिए अंग्रेजी के वैकल्पिक शब्द का प्रयोग करना पड़ता है । जैसे हिंदी में रोमांस, डेट आदि के लिए शब्द गढ़ने की जरूरत है । हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए और युवाओं के बीच पैठ बनाने के लिए एक तरह का खुलापन भी लाना होगा। अतिशुद्धतावाद से बचना होगा और अगर अन्य भाषा के शब्द सहजता से आ रहे हैं तो उसका स्वागत भी करना होगा ।