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Saturday, March 12, 2016

हिंदी कहानी क्यों दूर पाठक ?

चंद दिनों पहले एक कहानीकार मित्र ने पूछा कि आज कैसी कहानी लिखी जानी चाहिए ताकि पाठकों को पसंद आए । पाठकों को ध्यान में रखकर कहानीकी बात पूछी गई तो मैं चौका क्योंकि हिंदी कहानीकारों ने लंबे अरसे तक पाठकों की रुचियों का ध्यान ही नहीं रखा । यथार्थ के नाम पर नारेबाजी आदि जैसा कुछ लिखकर उसको कहानी के तौर पर पेश ही नहीं किया बल्कि अपने कॉमरेड आलोचकों से प्रशंसा भी हासिल की । हिंदी कहानी के पाठकों से दूर होने की अन्य वजहें के साथ साथ ये भी एक वजह है । हिंदी कहानी में आज कई पीढ़ियां सक्रिय हैं एक छोर पर कृष्णा सोबती हैं तो दूसरे छोर पर उपासना जैसी एकदम नवोदित लेखिका है । इस लिहाज से देखें तो हिंदी कहानी का परिदृश्य एकदम से भरा पूरा लगता है । बावजूद इसके हिंदी कहानी से पाठकों का मोहभंग होने की चर्चा बहुधा होती रहती है । दपअसल कहानी और हिंदी दोनों उसी शास्त्रीयता का शिकार हो गई । समय बदल गया, समाज बदल गया, भाषा बदल गई, लोगों के मन मिजाज बदल गए लेकिन हिंदी उसके चाल में नहीं ढल पाई । जब मैं हिंदी के उस चाल में ढलने की बात करता हूं तो उसकी शुद्धता को लेकर कोई सवाल नहीं उठाता है लेकिन जिस तरह से परंपराएं बदलती हैं उसी तरह से शब्द भी अपना चोला उतारकर नया चोला धारण करते हैं । जैसे सरिता नदी हो गई, जल पानी हो गया, व्योम आकाश हो गया । अब भी हिंदी में एक प्रजाति मौजूद है जो कि इसकी शुद्धता और अपनी पुरातनता के साथ मौजूद रहने की जिद्द पाले बैठे हैं । वो गलत कर रहे हैं ऐसा नहीं कहा जा सकता है लेकिन समय के साथ नहीं बदलने की ये जिद उनकी संख्या को कम करती जा रही है । इसी तरह के कहानी ने आजमाए हुए सफलता के ढर्रे को नहीं छोडा । जब भी कहानी ने अलग राह बनाई तो लोगों ने उसको खासा पसंद किया और वो लोकप्रिय भी हुआ ।
दरअसल कहानी के साथ दिक्कत ये हुई कि वो प्रेमचंद और रेणु के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाई । खासकर बिहार के कहानीकार तो रेणु के ही ढर्रे पर चल रहे हैं । रेणु जिस जमाने में कहानियां लिख रहे थे उस दौर में वो अपने परिवेश को अपनी रचनाओं में उतार रहे थे । रेणु से अपने लेखन से कहानी की बनी बनाई लीक को छोडा भी था । रेणु की सफलता के बाद उनका अनुसरण करनेवालों को लगा कि कहानी लेखन का ये फॉर्मूला सफल है तो वो उसी राह पर चल पड़े । रेणु के अनुयायियों की एक बड़ी संख्या हिंदी कहानी में इस वक्त मौजूद है । इन अनुयायियों की भाषा भी रेणु के जमाने की है, उनके पात्र  भी लगभग वही बोली भाषा बोलते हैं जो रेणु के पात्र बोलते थे । आलोचकों को भी वही बोली भाषा सुहाती रही तो कहानीकारों का भी उत्साह बना रहा लेकिन वो इस बात को भांप नहीं पाए कि आलोचकों को सुहाती कहानियां उनको वृहत्तर पाठक वर्ग से दूर करती चली गई । अब ये जमाना थ्री जी से फोर जी में जाने को तैयार बैठा है और हिंदी कहानी के नायक नायिका तार के जरिए एक दूसरे से संवाद करेंगे तो पाठकों को तो ये अभिलेखागार की चीज लगेगी । अभिलेखागार में रखी वस्तुएं हमको अपने गौरवशाली अतीत पर हमें गर्व करने का अवसर तो देती हैं लेकिन साथ ही ये चुनौती भी देती हैं कि हमसे आगे निकल कर दिखाओ । हिंदी कहानी ने उस चुनौती को स्वीकार करने के बजाए उसका अनुसरण करना उचित समझा ।हिंदी कहानी को अब ये समझना होगा कि उदारीकरण के दौर के बाद गांव के लोगों की आकांक्षाएं सातवें आसमान पर हैं । उनकी इलस आकांक्षा को इंटरनेट और मोबाइल के विस्तार ने और हवा दी है । अब ग्रामीण परिवेश का पाठक अपने आसपास की चीजों के अलावा शहरी जीवन को जानना पढ़ना चाहता है । वो अपनी दिक्कतों और अपने यथार्थ से उब चुका है लिहाजा वो शहरी कहानियों की ओर जाना चाहता है । लेकिन हम अब भी उनको गांवों की घुट्टी ही पिलाने पर उतारू हैं । इस बात को हमारे हिंदी के ज्यादातर कहानीकार पकड़ नहीं पा रहे हैं । इसको चेतन भगत, रविन्द सिंह और पंकज दूबे जैसे लेखकों ने पकड़ा और गांव से शहर पहुंचनेवालों की कहानी लिखकर शोहरत हासिल की ।   
बीच में कहानीकारों की एक पीढ़ी आई थी जिसने अपने नए अंदाज से पाठकों को अपनी ओर खींचा था । उसमें मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, संजीव, सृंजय, अरुण प्रकाश, शिवमूर्ति, उदय प्रकाश आदि तो थे ही संजय खाती ने भी उम्मीद जगाई थी । पर पता किन वजहों से उनमें से कई कहानीकारों ने लिखना ही छोड़ दिया । पर अब का परिवेश तो उपरोक्त कथाकारों के दौर से भी ईगे बढ़ गया है । हाल के दिनों में एक बार फिर से कुछ कहानीकारों ने अपनी कहानियों में रेणु की लीक से अलग हटने का साहस दिखाया है । समाज के बदलाव को अपनी कहानियों में पकड़ने की कोशिश की है । इन कहानीकारों मे गीताश्री का नाम अग्रणी है । उदय प्रकाश के बाद गीताश्री ने हिंदी कहानी को अपनी रचनाओं के माध्यम से झकझोरा है । गीताश्री की कहानी प्रार्थना के बाहर और गोरिल्ला प्यार दो ऐसी कहानियां हैं जिन्होंने हिंदी के पाठकों की रुचि के साथ कदमताल करने की कोशिश की है । जिस तरह से उदय प्रकाश ने पीली छतरीवाली लड़की में विश्वविद्यालय की राजनीति को उघाड़ा था उसी तरह से गीताश्री ने प्रार्थना के बाहर में महानगर में अपने सपनों को पूरा करनेवाली लड़की की आजादी की ख्वाहिश को उकेरा है । इसी तरह से अगर देखें तो गोरिल्ला प्यार में गीताश्री ने आज की पीढ़ी और समाज में आ रहे बदलाव और बेफिक्री को उजागर किया है । गीताश्री की कहानी में जिस तरह की भाषा को इस्तेमाल होता है वो हमें हमारी विरासत के साथ साथ आधुनिक होती हिन्दी की याद भी दिलाता है । एक तरफ तो उनके पात्र सोशल मीडिया की भाषा में संवाद करती है तो दूसरी तरफ बिंजली के फूल खिलने जैसे मुहावरे का प्रयोग भी करती हैं, जिसका सबसे पहले प्रयोग जयशंकर प्रसाद ने किया था लेकिन दोनों के संदर्भ अलग हैं और अलग अलग अर्थों में प्रयोग हुए हैं । गीताश्री अपनी कहानियों के माध्यम से शहर और ग्रामीण दोनों परिवेश में आवाजाही करती हैं लेकिन उनकी शहरी कहानियां पाठकों को ज्यादा पसंद आती हैं क्योंकि उसमे बदले हुए समय को पकड़ने की महीन कोशिश दिखाई देती है । इसी तरह से अगर हम देखें तो इंदिरा दांगी की कई कहानियों में भी समाज के बदलते हुए परिवेश को पकड़ने की कोशिश की गई है । इंदिरा दांगी की एक कहानी है –शहर की सुबह – उसमें भी शहरी जीवन और वहां रहनेवालों के मनोविज्ञान का बेहतर चित्रण है । जयश्री राय ने भी अपनी शुरुआती कहानियों से काफी उम्मीदें जगाईं थी । जयश्री राय की भाषा, कहानियों का प्लाट और नायिकाओं के साहसपूर्ण फैसले पाठकों को उन कहानियों की ओर आकर्षित कर रहे थे लेकिन जयश्री राय ने अपने लिए जो चौहद्दी बनाई उससे वो बाहर नहीं निकल पा रही हैं । उनमें संभावनाएं हैं लेकिन सफल कहानियों के फॉर्मूले से बाहर निकलकर आगे बढ़ना होगा । इसी तरह ये योगिता यादव ने भी अपनी कहानियों में नए प्रयोग किए हैं, भाषा के स्तर पर भी कथ्य के स्तर पर भी । योगिता यादव निरंतर लिख रही हैं और हिंदी कहानी को उनसे काफी उम्मीदें हैं । दो और कथाकारों ने अपनी काहनियों से मेरा ध्यान आकृष्ट किया – ये हैं राकेश तिवारी और पंकज सुबीर । राकेश तिवारी की कहानी मुकुटधारी चूहा गजब की कहानी है । वो इसके एक पात्र मुक्की के बहाने कथा का ऐसा वितान खड़ा करते हैं पाठक चकित रह जाता है । इसी तरह से महुआ घटवारिन लिखकर पंकज सुबीर ने हिंदी कहानी में अपनी उपस्थिति तो दर्ज कराई ही पाठकों के बीच भी उसको खासा पसंद किया गया । ये चंद नाम हैं हिंदी कहानी के जो अपने समय को पकड़ने में कामयाब हैं । हो सकता है कि इस तरह की कहानियां लिखनेवाले और लेखक होंगे । आवश्यकता इस बात की है कि आलोचकों और कहानी पर लिखनेवालों को भी इन कहानीकारों की पहचान कर उनको उत्साहित करना होगा । आलोचको को भी जंग लगे और भोथरा हो चुके मार्क्सवादी औजारों को अलग रखकर इन कहानियों पर विचार करना चाहिए । इससे भी ज्यादा जरूरी ये है कि आलोचकों को अपने लेखन में प्रगतिशील बेइमानी से बचना होगा क्योंकि ज्यादातर कहानीकारों ने उनकी वाहवाही हासिल करने के लिए ही विषयगत प्रयोग नहीं किए । जिस तरह से राजनीति में नरेन्द्र मोदी और संघ की आलोचना करते ही सेक्युलर होने का सर्टिफिकेट मिल जाता है उसी तरह से कहानीकारों को भी भोगे हुए यथार्थ के लिखते ही कहानीकार का सर्टिफिकेट मिल जाता रहा है । कहानी के हित में  इससे अलग हटने की आवश्यकता है ।
दपअसल


Monday, August 18, 2014

छोटी पर अहम पहल

हिंदी के साहित्याकारों में आमतौर पर नई तकनीक के इस्तेमाल में एक खास किस्म की उदासीनता देखने को मिलती है । फेसबुक के अस्तित्व में आने के कई सालों बाद अब हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार इस मंच पर आने शुरू हुए हैं । शुरुआत में तो फेसबुक को लेकर हिंदी के साहित्यकार मजाक उडाया करते थे । उनके तर्क होते थे कि जब साथी लेखक आपस में फोन पर बात नहीं कर सकते तो आभासी दुनिया में क्या खाक कर पाएंगे । बदलते वक्त के साथ और युवा पीढ़ी के साथ चलने के लिए कई वरिष्ठ साहित्यकार इस आभासी मंच पर आए । अब भी कई वरिष्ठ साहित्यकार यहां नहीं है । कई वरिष्ठ साहित्यकारों का तो हाल और भी बुरा है वो अब भी हाथ से लिखकर अखबारों और पत्रिकाओं में अपनी रचनाएं भेजते हैं । फेसबुक ने धीरे-धीरे कॉफी हाउस की जगह ले ली है और यहां गंभीर विमर्श होने लगे हैं । फेसबुक पर अराजकता भी है लेकिन हमें इसके सकारात्मक पहलू को देखना चाहिए । फेसबुक के अलावा हिंदी के साहित्यकार तकनीक के मामले में अब भी पिछड़े हुए हैं । ज्यादातर लेखक अब भी ट्विटर और गूगल प्लस की तकनीक और उसकी पहुंच से अनभिज्ञ हैं । इसका नुकसान साहित्य को हो रहा है । किताबों की दुकानों के कम होते जाने से नई नई कृतियों के बारे में लेखक अपने पाठकों को सूचित नहीं कर पा रहे हैं । इन दिनों एक नई पहल शुरू हुई है । स्मार्टफोन की बढ़ती लोकप्रियता और इंटरनेट के फैलाव ने लेखकों को एक नया मंच दिया है । यह मंच है व्हाट्स ऐप । इसपर कई साहित्यक ग्रुप सक्रिय हैं । व्हाट्स ऐप पर मौजूद दो समूहों से मेरा परिचय है । एक का नाम है कथाकार और दूसरा है रचनाकार । और भी ऐसे समूह व्हाट्स ऐप पर चल रहे होंगे । कथाकार समूह को इंदौर के कहानीकार सत्य नारायण पटेल चलाते हैं । इस समूह के हर सदस्य की जिम्मेदारी है कि वो किसी खास दिन एक रचना पोस्ट करें और अन्य साथी उसपर अपनी राय दें और फिर बहस की शुरुआत हो । रचनाकार समूह को दिल्ली की कथाकार और पत्रकार गीताश्री चलाती हैं । रचनाकार समूह में लंदन और जापान के साहित्यकार जुडे हैं । कथाकार और रचनाकार समूह में बुनियादी फर्क यह है कि कथाकार जहां सिर्फ कृतियों पर चर्चा को प्रोत्साहित करता है वहीं रचनाकार समूह में कहानी कविता के अलावा कला, संस्कृति और संगीत पर भी बात होती है । इस ग्रुप में बहुत ही सार्थक चर्चा होती है । हिंदी में क्या नया लिखा पढ़ा जा रहा है वह साझा किया जाता है । साथी रचनाकारों की कृतियों पर बातचीत होती है । व्हाट्स ऐप पर बने समूह की एक खूबी यह है कि यहां फेसबुक वाली अराजकता नहीं है । मसेजिंग सर्विस पर चलनेवाले इन समूहों के एडमिनिस्ट्रेटर ही सदस्यों को जोड़ते हैं और वो चाहें तो सदस्यों को हटा सकते हैं । सदस्यों के पास भी विकल्प होता है कि वो जब चाहें समूह से अपने आप को अलग कर लें ।

हिंदी साहित्य से जुड़े लोगों के लिए यह एक बिल्कुल नई घटना है और तकनीक का साहित्य के फैलाव में इस्तेमाल करने की एक छोटी सी पहल है । मेरा मानना है कि साहित्य के विस्तार के लिए तकनीक क जमकर इस्तेमाल करना वक्त की मांग है । अंग्रेजी के तमाम लेखक अपनी रचनाओं का इंटरनेट के माध्यम से जमकर प्रचार करते हैं । इससे उन्हें फायदा भी होता है । इसका बेहतरीन उदाहरण ई एल जेम्स हैं । उनकी फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी पिछले छियासठ हफ्ते से न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलर की सूची में है । रचनाकार के माध्यम से गीताश्री और कथाकार के माध्यम से सत्यनाराय़ण पटेल ने अच्छी शुरुआत की है लेकिन अभी काफी लंबा रास्ता तय करना शेष है ।  

Thursday, January 15, 2009

स्त्री आकांक्षा का नया चित्र

हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श की आंधी के बीच जब पत्रकार गीताश्री कि किताब – स्त्री आंकाक्षा के मानचित्र- प्रकाशित हुई तो उसके कवर ने पाठकों का खासा ध्यान अपनी ओर खींचा । दरअसल कवर पर एक लड़की गीले कपड़ों में एक कमरे की खिड़की से बाहर समुद्र को देख रही है । इस तस्वीर से किताब के मिजाज के बारे में संकेत मिल जाता है। कहावत भी है कि लिफाफा देखकर खत का मजमून पता चल जाता है । लेकिन जब मैंने किताब पढ़ना शुरु किया को कवर से ज्यादा आकर्षित पुस्तक में संकलित लेखों ने किया । अपनी इस पहली किताब की भूमिका में लेखिका कहती हैं कि आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में औरत की जिम्मेवारी और जवाबदेही तो तय है मगर आज भी उसके अधिकार और स्पेस तय नहीं हैं । गीताश्री की छवि एक बिंदास और खरी-खरी कहने और लिखनेवाली पत्रकार की है और भूमिका में भी इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि किताब में क्या होनेवाला है ।
गीताश्री की ये किताब स्त्री के अधिकार और स्पेस को तलाश करती है और इस तलाश में समाज के स्थापित मूल्यों से टकराती भी है । समीक्ष्य पुस्तक में इकत्तीस लेख हैं जो समाज, साहित्य, राजनीति, अपराध, फिल्म और ग्लैमर की दुनिया में स्त्री के सच से हमें रूबरू कराने की कोशिश करती है । यहां स्त्रियों के किस रूप में देखा जाता है या स्त्रियों को लेकर किस तरह की मानसिकता व्याप्त है, इसको अपने लेखों में गीताश्री ने संजीदगी से उठाया है ।
वेश्या और उसके समाज का चित्रण हिंदी साहित्य में ही नहीं, हर भाषा और देश के साहित्य में जरूरत से ज्यादा हुआ है । अधिकतर पुरुषों द्वारा, कुछ हद तक स्त्रियों द्वारा भी । पर इन वेस्याओं का चित्रण बहुआयामी जटिल इंसान के रूप में जरा कम ही हुआ है । लेकिन गीताश्री ने अपने लेख-अंधेरी गली के रोशन मकान- में कोलकाता की रेडलाइट एरिया की यौनकर्मियों की स्थिति और उनके संघर्ष को जिस तरह से उभारा है वो किसी को भी सोचने पर विवश कर देता है । सोनागाछी की यौनकर्मियां किस तरह से सरकार से मनोरंजनकर्मी का दर्जा देने को लेकर जूझ रही है और मनोरंजन कर देने के लिए सीना ठोक कर तैयार है वो एक नए बहस को जन्म देने के लिए काफी है । गीताश्री पत्रकार तो हैं ही साहित्य जगत में भी उनकी आवाजाही नियमित रही है । दिल्ली में बुजुर्ग साहित्यकार और संपादक किस तरह से भी किसी भी युवा लेखिका को हाथों-हाथ लेते हैं और उसको महान रचनाकार साबित करने पर तुल जाते हैं लेकिन उनकी मानसिकता क्या होती है इसको गीता ने अपने लेख – उठो कवियो, नी कवयित्री आई है – में बेनकाब किया है । एक और जो लेख इस किताब में अहम है वो है – लेस्बियन लोक की मानसिकता । अपने इस लेख में लेखिका ने स्त्रियों की समलैंगिकता को कोमलता से जोडा़ है । प्रचीन भारतीय समाज में लेस्बियनिज्म को ढूंढती लेखिका कामसूत्र तक पहुंच जाती है और गणिकाओं के बहाने से उस वक्त के सामज में समलैंगिकता को सामने लाती हैं । साथ ही विश्व साहित्य में सीमोन, अरस्तू के विचारों के आधार पर लेस्बियनिज्म को एक मानवीय चश्मे से देखने का प्रयास किया गया है । गीताश्री के विचारों से सहमति आवश्यक नहीं है लेकिन बहस का एक आधार और इल विषय पर नए सिरे से विमर्श की चुनौती तो देती ही है ।
कुल मिलाकर अगर स्त्री आकांक्षा के इस नए मानचित्र पर विचार करते हैं तो उपरी तौर पर पाते हैं कि इस मानचित्र में कई खांचे बेहद साधारण और सामान्य लगते हैं लेकिन गहराई से विचार करने पर ये बेहद गंभीर और विचारोत्तेजक हैं । गीताश्री अपने लेखों में कई अहम विषयों को सरसरी तौर पर छूकर निकल गई है जो कि गंभीर विश्लेषण और लेखिका के विचारों की मांग करते हैं लेकिन लेखिका की पहली किताब होने की वजह से इसको नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन इस किताब ने स्त्री आकांक्षा के नए बनने वाले चित्र का खाका तो खींच ही दिया है ।
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समीक्ष्य पुस्तक- स्त्री आकांक्षा के मानचित्र
लेखिका- गीताश्री
प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य- 200 रुपये