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Saturday, June 12, 2021

बचकानी गलतियों से बचें फिल्मकार


हाल में राजनीति की पृष्ठभूमि पर बनी दो वेबसीरीज, ‘महारानी’ और ‘द फैमिली मैन’ आई। ‘महारानी’ बिहार की राजनीति को केंद्र में रखती है। ये कहानी लालू यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी की कहानी से प्रेरित है। इसमें ये लिखा भी गया है कि कैसे एक अनपढ़ स्त्री एक राज्य को मुख्यमंत्री के तौर पर संभालती है। कहती भी है कि जो औरत घर संभाल सकती है कि वो राज्य भी और देश भी संभाल सकती हैं। इसमें चारा घोटाला से लेकर बिहार की राजनीति के खूनी दौर को भी रेखांकित किया गया है। रणवीर सेना और नक्सलियों के बीच खूनी खेल की कहानी भी साथ-साथ चलती है। इसके कुछ दिन पहले एक वेब सीरीज और आई थी जिसका नाम था ‘तांडव’। इस वेब सीरीज की कहानी भी राजनीति को केंद्र में रखती है। इसके कुछ दृश्यों को लेकर भारी विवाद हुआ था और मामला कोर्ट में भी पहुंचा था। इसी दौरान एक दलित महिला के जीवन के संघर्षों पर आधारित एक फिल्म आई थी ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ । इसकी कहानी एक दलित महिला के इर्द गिर्द घूमती है जो एक दिन उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनती हैं। उपरोक्त तीनों वेब सीरीज का अगर हम विश्लेषण करें तो एक बात स्पष्ट रूप से समझ में आती है कि राजनीतिक घटना को या राजनीतिक चरित्रों को केंद्र में रखकर फिल्म बनाना बेहद मुश्किल काम है। इसकी कहानी और संवाद लिखने से लेकर पात्रो के चयन और फिल्मांकन में बहुत सतर्कता की जरूरत होती है। लेखक और निर्देशक के लिए यह बहुत आवश्यक होता है कि उसको राजनीति की बारीकियों की समझ हो, संसदीय परंपरा का सामान्य ज्ञान हो, दलीय परंपरा और अफसरशाही की कार्यशैली के बारे में जानकारी हो। 

‘महारानी’ वेबसीरीज को देखें तो लेखक और निर्देशक दोनों एक पर एक बचकानी गलतियां करते चलते हैं। इस सीरीज में रानी भारती सरकार के खिलाफ चार-पांच महीने के अंदर ही दूसरा अविश्वास प्रस्ताव आ जाता है। ये छोटी सी बात लग सकती है लेकिन जो इस सीरीज को देख रहे होंगे उनके दिमाग में यह बात जरूर उठेगी कि हमारे देश की संसदीय व्यवस्था में किसी भी सरकार के खिलाफ दो अविश्वास प्रस्ताव के बीच का अंतराल छह महीने से कम नहीं हो सकता है। इसमें ही निर्देशक ये दिखाता है कि राज्य का वित्त सचिव अकेले ही छानबीन करने पहुंच जाता है। जिलाधिकारी जब दस्तावेज देने में बहानेबाजी करते हैं तो वो रात में अपने एक सहयोगी के साथ उनके आफिस पहुंच जाते हैं और चौकीदार को चकमा देकर कार्यालय का ताला तोड़कर उसमें घुसते हैं। वहां उनपर गोली चलती है, वित्त सचिव बच जाते हैं, लेकिन किसी को कानोंकान खबर नहीं होती। ये सारी घटनाएं इतनी बचकानी हैं कि इसको काल्पनिक कारर देकर भी जायज नहीं ठहराया जा सकता है। ये तो लेखक की कमियों को, उसके अज्ञान को उजागर करनेवाले प्रसंग या दृश्य हैं। महारानी में ऐसे कई प्रसंग हैं। 

इसी तरह से ‘तांडव’ वेब सीरीज में एक प्रसंग है जहां एक ब्लैकमेलर बड़े आराम से नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक के इलाके में आता है और कूड़ेदान में कोई सामान रखकर चला जाता है। नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक दिल्ली का वो इलाका है जहां प्रधानमंत्री कार्यालय है, वित्त मंत्रालय, रक्षा और गृह मंत्री का दफ्तर है। ये इलाका बेहद सुरक्षित है जो चौबीस घंटे सुरक्षा बलों की निगरानी में रहता है और वहां आसानी से कोई सामान रखकर चला जाए ये आसान नहीं। इस तरह के कई प्रसंग ‘तांडव’ में हैं जो ये संकेत देते हैं कि लेखक को इन विषयों की बारीकियों की जानकारी नहीं है या उसने लापरवाही में वो सब प्रसंग लिखे या पर्याप्त शोध नहीं किया। अपेक्षाकृत ‘द फैमिली मैन’ की घटनाएं और प्रसंग यथार्थ के ज्यादा करीब प्रतीत होती हैं। इसमें लेखक ने दृश्यों को लिखने के पहले उस विषय के बारे में सूक्ष्मता से अध्ययन किया और फिर लिखा है। चाहे वो प्रधानमंत्री के साथ खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों की बैठक का संवाद हो या फिर सुरक्षा संबंधी तैयारियों का विवरण हो। 

दरअसल जब फिल्मों या वेब सीरीज का लेखन होता है तो इसके ज्यादातर लेखकों से एक चूक होती है कि वो पहले क्लाइमैक्स सीन सोच लेते हैं और फिर वहां तक पहुंचने का रास्ता तलाशते हैं। जैसे ‘तांडव’ में ये सोच लिया गया कि हमारी व्यवस्था एकदम खराब है, राजनीति में सबकुछ साजिशों पर ही चलता है, राजनीति में आनेवाली स्त्रियां हर तरह के समझौते करती हैं आदि आदि। अब इन सबको सही ठहराने के लिए कहानी में इससे जुड़े प्रसंग ठूंसे जाते हैं। ‘महारानी’ में भी ये दिखता है कि लेखक ने पहले ही तय कर लिया कि भीमा भारती को चारा घोटाले के लिए परिस्थिति और राज्यपाल ने मजबूर किया था। फिर उसके हिसाब से कहानी गढ़ी गई जो अविश्वसनीय हो गई। दरअसल कहानी लेखन की यह प्रविधि ही दोषपूर्ण है। कहानी का प्रवाह सहज होना चाहिए या किसी राजनीतिक घटना पर फिल्म या वेबसीरीज बना रहे हैं तो उस दौर में घटी घटनाओं के क्रम को ध्यान में रखकर कहानी का विकास करना चाहिए, दृश्यों की संरचना करनी चाहिए। इन राजनीतिक वेब सीरीज या हाल की फिल्मों को देखकर ये लगता है कि हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज के सभी वर्गों को न्याय मिल पाए ये संभव ही नहीं है। ज्यादातर अज्ञानतावश और कुछ एजेंडा के तहत देश की व्यवस्था और संसदीय प्रणाली को भी नकार दिया जाता है। इसके पहले भी इस स्तंभ में इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि कैसे समाज के एक वर्ग के मन में देश और पुलिस व्यवस्था के खिलाफ जहर भरने का काम इन वेब सीरीज के माध्यम से किया जाता रहा है। 

दरअसल राजनीति पर फिल्म बनाना बेहद श्रमसाध्य कार्य है। रोमांटिक फिल्में बनाना, घटना प्रधान फिल्में बनाना, धार्मिक फिल्में बनाना अपेक्षाकृत आसान हैं। जब आप राजनीति पर फिल्म बनाते हैं तो आपकी कल्पनाशक्ति और यथार्थ को कहने की संवेदना की परीक्षा होती है। आपको दोनों के बीच संतुलन कायम रखना पड़ता है। इस संदर्भ में मुझे याद पड़ता है गुलजार की फिल्म ‘आंधी’ । आंधी की नायिका में इंदिरा गांधी की छवि देखी गई थी। उनकी वेशभूषा से फिल्मकार ने भी यही छवि गढ़ने की कोशिश भी की थी। इस फिल्म की नायिका मालती देवी का जो महात्वाकांक्षी चरित्र गुलजार ने गढ़ा वो यथार्थ के बहुत करीब दिखता है। वो चरित्र स्वार्थी और महात्वाकांक्षी तो है लेकिन अपने परिवार के साथ जब होती है तो उसकी संवेदना को भी फिल्मकार उभारते हैं। यह कौशल ही फिल्मकार को भीड़ से अलग करता है। इसी तरह फिल्म ‘आंधी’ में हमें संसदीय व्यवस्था के बारे में कोई गलती, बचकानी गलती नजर नहीं आती है। मालती देवी जब विपक्ष के नेता चंद्रसेन से या अपने चुनावी सलाहकार लल्लू बाबू से संवाद करती हैं तो उसमें कोई झोल नहीं है। बेहद सधा हुआ और तथ्यों से तालमेल के साथ संवाद और कहानी दोनों आगे बढ़ती है। ‘आंधी’ के अलावा पिछले दिनों प्रकाश झा ने कुछ अच्छी राजनीतिक फिल्में बनाई हैं। प्रकाश झा की फिल्मों में राजनीति या संसदीय व्यवस्थाओं की बारीकियों को लेकर कोई झोल नहीं होता है। प्रकाश झा व्यवस्था की खामियों पर चोट करते हैं लेकिन संसदीय व्यवस्था को नकारते नहीं हैं। फिल्मकारों और वेब सीरीज निर्माताओं को राजनीति या राजनीतिक घटनाओं पर फिल्म बनाते समय इसकी बारीकियों और घटनाओं का ध्यान रखना आवश्यक होता है अन्यथा उनका स्थायी महत्व नहीं बन पाता। वो बस आई गई फिल्म या वेब सीरीज की श्रेणी में बद्ध होकर रह जाते हैं।

Saturday, February 27, 2021

कलात्मक(?) अराजकता पर अंकुश


हाल के दिनों में दो तीन ऐसी खबरें आईं जो मनोरंजन की दुनिया की दशा और दिशा दोनों बदल सकती है। एक खबर है कि अमेजन प्राइम वीडियो से जुड़ीं अपर्णा पुरोहित का पुलिस ने बयान दर्ज करवाया। ये बयान वेब सीरीज ‘तांडव’ में आपत्तिजनक कटेंट को लेकर दर्ज कराए गए केस के संबंध में लिया गया है। साढे तीन घंटे तक अपर्णा पुरोहित से लखनऊ के हरतगंज कोतवाली में पुलिस ने पूछताछ की। इससे ही जुड़ी एक और खबर आई प्रयागराज से। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपर्णा पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से इंकार कर दिया। अपर्णा पुरोहित पर वेब सीरीज ‘तांडव’ तो लेकर नोएडा में भी केस दर्ज हुआ था, उस सिलसिले में वो हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत चाहती थीं। पिछले कई सालों से वीडियो स्ट्रीमिंग साइट, जिसको ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म भी कहते हैं, पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री को लेकर तो कई बार वहां दिखाई जानेवाली फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। पिछले तीन साल से इन वेब सीरीज पर दिखाए जानेवाली सामग्री में हिंसा, यौनाचार, मनोरंजन की आड़ में विचारधारा की पैरोकारी, हिंदू धर्म प्रतीकों का गलत चित्रण से लेकर अन्य कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। जब भी इन बातों को लेकर विवाद उठते थे तो सरकार से ये मांग भी की जाती थी कि ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के संदर्भ में विनियमन नीति लागू की जानी चाहिए। इस स्तंभ में भी लगातार इस बारे में चर्चा जाती रही है कि इस क्षेत्र में बढ़ रही अराजकता पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को दिशा निर्देश या कटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। सरकार के स्तर पर विनियमन लागू करने के लिए इस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ कई दौर के  संवाद भी हुए थे, लेकिन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका था। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर 2018 में सख्त टिप्पणी की थी, संसद में भी ये मामला कई बार उठा । इस पृष्ठभूमि में सरकार ने ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर अब एक दिशा निर्देश जारी कर दिया है।

केंद्र सरकार के दिशा-निर्देश में ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री के लिए स्वनियमन की बात की गई है। स्वनियमन की बात तो की गई है लेकिन ये नियमन कैसे हो और इसका दायरा क्या हो इसको सरकार ने स्पष्ट कर दिया है। ये स्पष्ट कर दिया गया है कि कोई भी प्लेटऑर्म भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को आघात पहुंचानेवाले दृश्य और संवाद नहीं दिखाएंगें। कलात्मक स्वतंत्रता की आड़ में कोई भी ऐसी सामग्री दिखाने की अनुमति नहीं होगी जो कानून सम्मत नहीं है। लेकिन सरकार ने दिशा निर्देश जारी करते हुए सेवा प्रदताओं को इसका तंत्र विकसित करने को कहा है। अच्छी बात ये है कि सरकार ने जो व्यवस्था बनाई है उसमें कार्यक्रमों को दिखाने के पहले किसी से अनुमति लेने की बात नहीं है यानि की प्री सेंसरशिप का रास्ता सरकार ने नहीं अपनाया। उन्होंने सबकुछ इन प्लेटफॉर्म पर छोड़ दिया है। नए नियमों के अनुसार सेवा प्रदाता कंपनियों को खुद अपनी सामग्रियों का वर्गीकरण करना होगा। बच्चों के देखने लायक सामग्री से लेकर अलग अलग उम्र की मनोरंजन सामग्रियों का वर्गीकरण कर दिया गया है। सेवा प्रदाता कंपनियों को इसका पालन करना होगा। अगर किसी को शिकायत होती है या किसी प्रकार से इन नियमों का उल्लंघन होता है तो उससे निबटने के लिए तीन स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है। ये व्यवस्था लगभग उसी तर्ज पर है जिस तर्ज पर टेलीविजन के कार्यक्रमों का स्वनियमन होता है। 

सरकार के इस स्वनियम के दिशा निर्देशों को लेकर तमाम तरह की शंकाएं जताई जा रही हैं। फिल्म इंडस्ट्री के कुछ स्वयंभू निर्देशक इस कदम की आलोचना कर रहे हैं और इसको कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करनेवाला कदम बता रहे हैं। दरअसल जब वो कलात्मक स्वतंत्रता की बात करते हैं तो उनको इस बात का ध्यान नहीं रहता कि ये स्वतंत्रता असीमित नहीं है। भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाओं को भी स्पष्ट किया गया है। ऐसा भी नहीं है कि इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले इन मनोरंजन के माध्यमों के लिए दिशानिर्देश जारी करनेवाला भारत दुनिया का पहला देश है। कई देशों में ओटीटी के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश हैं। सिंगापुर में तो बकायदा इसके लिए एक प्राधिकरण है जिसको इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट अथॉरिटी कहते है। इसकी स्थापना ब्राडकास्टिंग एक्ट के तहत की गई थी। इसमें सभी सेवा प्रदताओं को ब्राडकास्टिंग एक्ट के अंतर्गत इस प्राधिकरण से लाइसेंस लेना पड़ता है। ओटीटी, वीडियो ऑन डिमांड और विशेष सेवाओं के लिए एक विशेष कंटेंट कोड है। इसमें सामग्रियों के वर्गीकरण की स्पष्ट व्यवस्था है। सिंगापुर की इंफोकॉम मीडिया डेवलपमेंट प्राधिकरण को अधिकार है कि वो ओटीटी प्लेटऑर्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री को अगर कानून सम्मत नहीं पाती है तो उसका प्रसारण रोक दे।इसके अलावा नियम विरुद्ध सामग्री दिखाने पर जुर्माना लगाने का भी प्रावधान है। सिर्फ सिंगापुर ही नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया में भी इस तरह के प्लेटऑर्म पर नजर रखने के लिए ई सेफ्टी कमिश्नर हैं। उनका दायित्व है वो डिजीटल मीडिया पर चलनेवाली सामग्रियों पर नजर रखें। वहां तो विनियमन इस हद तक है कि ई सेफ्टी कमिश्नर अगर पाते हैं कि किसी मनोरंजन सामग्री का वर्गीकरण अनुचित है या गलत तरीके से उसको किया गया है तो वो दंड के तौर पर उसको प्रतिबंधित भी कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में भी ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री की शिकायत मिलने पर उसके निस्तारण की एक तय प्रक्रिया है। इसके अलावा भी दुनिया के कई देशों में किसी न किसी तरह के दिशा निर्देश लागू हैं। हमारे देश में अबतक ओटीटी की सामग्री को लेकर किसी तरह का कोई नियमन नहीं था। इसका नतीजा यह था कि कई प्लेटफॉर्म पर तो बेहद अश्लील सीरीज भी परोसे जा रहे थे, बिना किसी वर्गीकरण के। कहीं किसी कोने में छोटा सा अठारह प्लस लिख दिया जाता था लेकिन किसी प्रकार की कोई रोक टोक नहीं थी। कोई भी उसको देख सकता था।

जहां तक कलात्मक स्वतंत्रता को बाधित करने की बात है उसको लेकर जो लोग प्रश्न खड़े कर रहे हैं वो यह भूल रहे हैं कि हमारे देश में फिल्मों को भी रिलीज के पहले प्रमाणन करवाना होता है। क्या इस प्रमाणन की व्यवस्था से हमारे देश में फिल्मों की कलात्मक स्वतंत्रता बाधित हुई? टीवी चैनलों को लेकर स्वनियमन लागू है क्या टीवी चैनलों पर दिखाई जानेवाली सामग्रियों में कलात्मक स्वतंत्रता बाधित दिखती है? दरअसल इस तरह के नियमनों से अराजकता पर रोक लगती है। ये कौन सी कलात्मक स्वतंत्रता है जिसमें वेब सीरीज की आड़ में राजनीति की जाती हो, भारतीय सेना की छवि को धूमिल किया जाता हो, कश्मीर में सेना के क्रियाकलापों को गलत तरीके से पेश किया जाता हो, हिंसा, गाली गलौच और यौनिकता के दृश्यों को प्रमुखता से दिखाया जाता हो। कोई भी माध्यम समाज सापेक्ष होना चाहिए, समाज से, संस्कृति से, निरपेक्ष होकर कला का विकास नहीं हो सकता है। समाज और संस्कृति को छोड़कर कोई भी कला अपने उच्च शिखर को प्राप्त नहीं कर सकती है। और इस मामले में तो सरकार ने बहुत लंबे समय तक प्रतीक्षा की कि ओटीटी प्लेटफॉर्म अपनी तरफ से कोई स्वनियमन की नीति बनाकर देंगे लेकिन जब उनके बीच सहमति नहीं बन सकी तो सरकार ने दिशा निर्देश जारी कर दिए। जो लोग इसको बाधा मान रहे हैं उनको ये पता होना चाहिए कि कला भी अनुशासन की मांग करती है। सरकार ने ओटीटी के लिए दिशा निर्देश जारी करने में थोड़ी देरी अवश्य की लेकिन अब जब ये जारी हो गा है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि ओटीटी पर हम वाक्य में गाली गलौच नहीं होगी और अश्लीलता की सीमाएं भी नहीं टूटेंगीं।  

Saturday, January 23, 2021

राजनीति का औजार बनते वेब सीरीज


वेब सीरीज ‘तांडव’ को लेकर पिछले दिनों खूब हंगामा हुआ। केस मुकदमा तक बात पहुंची। वेब सीरीज से जुड़े लोगों से पुलिस ने पूछताछ की। उनके बयान दर्ज हुए। पुलिस की पूछताछ के पहले हो रहे विरोध की वजह से निर्माताओं ने माफी भी मांगी। हर बार की तरह इस बार भी भावनाएं आहत होने की बात उठी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर कलात्मक स्वतंत्रता की बात भी की गई। इन तमाम विवादों और कोलाहल के बीच निर्माताओं ने वेब सीरीज में आपत्तिजनक प्रसंगों को हटाने की बात की और सूचना और प्रसारण मंत्रालय को उनके समर्थन और मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद भी दिया। हो सकता है कि इस वेब सीरीज में से कुछ अंश हटा दिए गए हों। लेकिन ‘तांडव’ पर उठे विवाद से जो प्रश्न उठे हैं वो अभी अनुत्तरित हैं। इन प्रश्नों पर कलाकारों को और कला से जुड़े लोगों को खुले दिल से बहस करनी चाहिए। वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू धर्म के देवी देवताओं के चित्रण पर आपत्ति उठी थी। धर्मिक भावनाएं आहत होने की बात की गई। जिन अंशों पर आपत्ति की गई थी उनको हटाने और निर्माताओं के माफी मांग लेने से मामला ठंडा पड़ता जा रहा है लेकिन इस औसत कहानी वाली वेब सीरीज में जिस तरह से खुले आम राजनीतिक टिप्पणियां की गईं हैं वो भावनाओं को आहत करने से अधिक गंभीर सवाल उठाते हैं। इसके आरंभिक एपिसोड में जो कुछ संवाद हैं या दृश्यों से जो कहने की कोशिश की गई है वो ये है कि ‘मुसलमानों को चिन्हित कर मारा’। सलीम और अयूब के संदर्भ में जो संवाद हैं उसमें एक वाक्य है, ‘हमलोगों को मारना बहुत आसान होता है। मेरा नाम भी किसी आतंकवादी संगठन से जोड़ देंगे’। इस तरह के संवाद बेहद गंभीर निहितार्थ लिए हुए होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह के संवादों के जरिए देश की एक बड़ी आबादी को भड़काने का उपक्रम किया गया है। इस वेब सीरीज पर तो राजद्रोह का केस दर्ज किया जाना चाहिए। भारतीय दंड संहिता की धारा 124(ए) के अनुसार ‘जब कोई व्यक्ति लिखित में या संकेतों में या प्रत्यक्ष प्रस्तुतिकरण या किसी अन्य विधि से भारत सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करने का प्रयास करता है तो वो राजद्रोह करता है।‘ 

वेब सीरीज तांडव के जिस संवाद का जिक्र ऊपर किया गया है उससे साफ तौर पर भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने की कोशिश नजर आती है। व्यवस्था के खिलाफ एक पूरे समुदाय को भड़काने की कोशिश भी नजर आती है। किसी समस्या की ओर ध्यान दिलाना और किसी समस्या को लेकर जजमेंटल होना दोनों अलग अलग बात हैं। ‘तांडव’ में ही ऐसा हुआ है ये भी नहीं है, इसके पहले के वेब सीरीज में भी और उसके पहले की कुछ फिल्मों में भी इस तरह के संवाद और दृश्य रखे हैं जो मुसलमानों के मन में भारत सरकार के खिलाफ घृणा के बीज बोने जैसे हैं। इसके पहले एक सीरीज आई थी जिसका नाम है ‘पाताल लोक’ । उस सीरीज में भी मुसलमानों को लेकर इसी तरह की बातें की गई थीं। उस सीरीज में पुलिसवालों के बीच की आपसी बातचीत में मुसलमानों के लिए जिस तरह के विश्लेषण गढ़े गए थे वो भी प्रत्यक्ष रूप से पुलिस और परोक्ष रूप से भारत सरकार के खिलाफ घृणा पैदा करने जैसा था। सीबीआई तक को मुसलमानों के खिलाफ चित्रित किया गया था। सिर्फ संवादों में ही नहीं बल्कि काल्पनिकता की आड़ में भी दृश्यों को इस तरह से चित्रित किया गया था कि इस नैरेटिव को मजबूती मिले कि सरकार मुसलमानों के खिलाफ है। इसके पहले ‘सेक्रेड गेम्स’ में भी दिखाया गया था कि कैसे पुलिस निर्दोष मुस्लिम लड़के को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराती है। इसके बाद संवाद के जरिए राजनीतिक बयान दिया जाता है और कहा जाता है कि उस मुस्लिम लड़के का परिवार धरने पर बैठा है और सिस्टम से उसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। इसी वेब सीरीज में बाबरी विध्वंस के फुटेज लंबे समय तक दिखाकर बैकग्राउंड से राजनीतिक टिप्पणियां आती रहती हैं। इसके पहले एक फिल्म आई थी ‘मुक्काबाज’, उसमें बगैर किसी संदर्भ के एक संवाद है कि ‘वो आएंगे तुमको मारेंगे और भारत माता की जय कहकर चले जाएंगे’। मंशा स्पष्ट है। किसी चरित्र को पहले की फिल्मों में भी सांप्रदायिक दिखाया जाता रहा है लेकिन पूरे सिस्टम को एक ही रंग में रंगने का प्रयास इन दिनों ज्यादा दिखाई देता है। खासतौर पर वेब सीरीज में। 

वेब सीरीज में इस तरह के प्रसंगों या दृष्यों को देखने के बाद साफ तौर पर एक पैटर्न नजर आता है जिसमें कि सीरीज के निर्माता मनोरंजन के इस माध्यम का उपयोग किसी खास विचारधारा को पुष्ट करने और किसी विचारधारा को बदनाम करने के लिए करते हैं। इस पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए कि इन वेब सीरीज के निर्माता हिंदू धर्म प्रतीकों को अपमानित क्यों करते हैं? अगर मुसलमानों को लेकर की गई टिप्पणियों और हिंदू धर्म प्रतीकों के अपमान के चित्रण को जोड़कर देखेंगे तो तस्वीर साफ नजर आती है। ये तस्वीर है राजनीति की, ये तस्वीर है इन वेब सीरीज के राजनीति का औजार बन जाने की। एक तरफ मुसलमानों के मन में मौजूदा सरकार के खिलाफ, उसकी संस्थाओं के खिलाफ जहर भरने का काम कर रहे हैं और दूसरी तरफ आप हिंदुओं के धार्मिक प्रतीकों का अपमान कर रहे हैं। जब आप हिंदू धर्म प्रतीकों का अपमान करते हैं तो मंशा ये हो सकती है कि आप एक समुदाय विशेष के मन में अपनी साख जमाना चाह रहे हों। ये तब और सही प्रतीत होता है जब इन वेब सीरीज को बनानेवाला एक निर्माता शाहीन बाग पहुंचता है और आंदोलन के दौरान मंच पर खढ़े होकर बिरयानी खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाता है। ये बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति की  का संकेत है। इस प्रवृत्ति के लिए ये वेब सीरीज इस वजह से भी सुविधाजनक है क्योंकि वीडियो स्ट्रीमिंग साइट्स के लिए या ओवर द टॉप प्लेटफॉर्म को लेकर हमारे देश में किसी प्रकार की कोई आचार संहिता नहीं है। 

देश में पिछले दो लोकसभा चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को बहुमत की स्वीकृति मिली। वामपंथी विचारधारा या उसकी तरफ झुकी हुई विचारधारा को जनता ने नकार दिया। लगातार दो नकार से वामपंथ के अनुयायी बौखला भी गए हैं और कुंठित भी होते नजर आ रहे हैं। अब जब उनको जनता के मध्य जाकर अपनी लोकप्रियता वापस प्राप्त करने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने मनोरंजन के इस अराजक माध्यम को अपनी राजनीति का औजार बनाया है। यह अनायास नहीं है कि ‘तांडव’ जैसी घटिया स्टोरी को बड़े कलाकार और बड़ा प्लेटफॉर्म मिलता है। ये एक ऐसी कहानी है जिसमें न तो निरंतरता है न ही रोचकता और न ही कहानी लेखक को भारतीय राजनीति की समझ। इस कहानी में सिर्फ एजेंडा भरा गया है और अखबारों से उठाकर घटनाओं का भोंडा कोलाज बनाने का प्रयास किया गया है। इस कहानी पर तो कायदे से चोरी का केस भी दर्ज होना चाहिए। ब्राहमण प्रोफेसर और उसके दलित प्रेमी के बीच का जो संवाद है वो हिंदी के कहानीकार उदय प्रकाश की कहानी ‘पीली छतरीवाली लड़की’ से जस का तस उठा लिया गया है। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय और केंद्र सरकार इस बात को समझे कि इन वेब सीरीज के बहाने राजनीति हो रही है। ये वेब सीरीज राजनीति के औजार से राजनीति का हथियार बनें उसके पहले ही एक सम्यक और व्यापक आचार संहिता बने जो इन सब बातों का ख्याल रख सके।