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Saturday, October 19, 2024

प्राचीन पुस्तकों-फिल्मों का नया दौर


बेहद चर्चित और सफल फिल्म निर्देशक सुभाष घई का एक दिन मैसेज आया। उसमें दिलचस्प सूचना थी। घई साहब ने लिखा था कि 1999 में रिलीज हुई उनकी फिल्म ताल देशभर में रिलीज की जा रही है। उनके इस मैसेज को पढ़कर पहले तो चौंका लेकिन फिर याद आया कि हाल के दिनों में कई पुरानी लेकिन हिट फिल्मों को फिर से प्रदर्शित किया गया। शोले, हम आपके हैं कौन, रहना है तेरे दिल में जैसी फिल्मों को फिर से प्रदर्शित किया गया। दर्शकों ने पसंद भी किया। अमिताभ बच्चन के 80 वर्ष पूरे होने पर भी उनकी कई फिल्मों का प्रदर्शन हुआ था। हिंदी फिल्मों के व्यवसाय को नजदीक से जानने वालों का मानना है कि फिल्मों का पुनर्प्रदर्शन दो कारणों से किया जाता है। एक तो क्लासिक फिल्मों के बारे में नई पीढ़ी को जानने समझने का अवसर मिलता है। कई बार जब फिल्मों पर चर्चा होती है तो क्लासिक फिल्मों के बारे में बातें होती हैं तो युवाओं में इनको देखने की ललक पैदा होती है। दूसरा कारण ये कि जब नई फिल्में नहीं चलती हैं तो उनको सिनेमा हाल से हटाना पड़ता है। जल्दी जल्दी नई फिल्में आती नहीं हैं। ऐसे में सिनेमा हाल को अपना कारोबार चलाने के लिए क्लासिक्स का सहारा लेना पड़ता है। हाल के दिनों में ये चलन बढ़ा है। हिंदी फिल्मों से जुड़े लोग ये नहीं चाहते हैं कि फिल्मों के नए दर्शक सिनेमा हाल पहुंचें और उनको निराशा हाथ लगे। विकल्प देकर वो दर्शकों को बांधे रखना चाहते हैं। 

फिल्मों के अलावा एक दूसरी बात पता चली जो साहित्य जगत से जुड़ी हुई है। हिंदी के एक प्रकाशन गृह सर्वभाषा ट्रस्ट के केशव मोहन पांडे और कवि आलोचक ओम निश्चल से भेंट हुई। चर्चा के क्रम में केशव जी ने एक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उनके प्रकाशन गृह से लाला लाजपत राय की 1928 में प्रकाशित पुस्तक दुखी भारत का पुनर्प्रकाशन हो रहा है। ये पुस्तक काफी चर्चित रही है। 1928 में इसका प्रकाशन इंडियन प्रेस, प्रयाग से हुआ था। अधिक चर्चा इस कारण भी हुई थी कि लाला लाजपत राय की ये पुस्तक कैथरीन मेयो की पुस्तक मदर इंडिया के उत्तर में लिखी गई थी। लाला लाजपत राय की पुस्तक के कवर पर ही इस बात का प्रमुखता से उल्लेख था। दुखी भारत के नीचे लिखा था, मिस कैथरीन मेयो की पुस्तक ‘मदर इंडिया’ का उत्तर। लाला लाजपत राय की इस पुस्तक की कहानी बेहद दिलचस्प है। अमेरिका की पत्रकार कैथरीन मेयो ने 1927 में मदर इंडिया के नाम से एक पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक में कथित तौर पर भारत के तत्कालीन समाज में स्त्रियों की स्थितियों के बारे में लिखा गया था। इनकी स्थिति को हिंदू समाज से जोड़कर आपत्तिजनक तरीके से व्याख्यायित किया गया था। पश्चिमी देशों में कैथरीन मेयो की ये पुस्तक काफी चर्चित हुई थी। यूरोप की कई भाषाओ में इसका अनुवाद हुआ था। पुस्तक के कई संस्करण प्रकाशित हुए थे। पराधीन भारत में कैथरीन मेयो की पुस्तक का काफी विरोध हुआ था। माना गया था कि अमेरिकी पत्रकार ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद वो उचित ठहराने के लिए ये पुस्तक लिखी थी। उसके लिए उनको विशेष रूप से भारत भेजा गया था। इस पुस्तक में कैथरीन मेयो ने ना केवल हिंदू समाज और संस्कृति की तीखी आलोचना की थी बल्कि स्वाधीनता आंदोलन के नायकों और उनके सोच पर भी प्रश्न उठाए थे। 

लाला लाजपत राय ने इस पुस्तक का सिलसिलेवार उत्तर देते हुए दुखी भारत के नाम से पुस्तक लिखी। इसमें राय ने लिखा था कि प्रत्येक विद्यार्थी ये जानता है कि यूरोप शताब्दियों तक असभ्यता, मूर्खता और गुलामियों का शिकार रहा है। यूरोप से हमारा मतलब संसार की सब गोरी जातियों से है। अर्थात यूरोप और अमेरिका दोनों। अमेरिका तो अभी यूरोप का बच्चा ही है। इन गोरी जातियों ने एशिया से अपना धर्म पाया। मिस्त्र की कला और उद्योग का अनुसरण किया। भारत से सदाचार संबंधी आदर्श उधार लिए। संसार की आधुनिक उन्नत जातियों में इस समय जो कुछ भी वास्तविक खूबी और अच्छाई है वह अधिकांश में उनको पूर्व से मिली है।...मिस मेयो का मनोभाव एशिया की काली, भूरी और पीली सभी जातियों के विरुद्ध यूरोप की गोरी जातियों का ही मनोभाव है। पूरब को दबानेवालों के मुंह की वो पिपहरी मात्र ही है। पूर्व की जागृति ने अमेरिका और यूरोप दोनों को भयभीत कर दिया है। इसी से इतनी प्राचीन और सभ्य जाति के विरुद्ध इस पागलपने का प्रदर्शन हो रहा है और खूब अध्ययन के साथ तथा जानबूझकर यह आंदोलन खड़ा किया जा रहा है। लाला लाजपत राय इतने पर ही नहीं रुके उन्होंने कैथरीन मेयो पर और भी तीखा हमला बोला, मिस कैथरीन मेयो, जैसा कि उसके लेखों से जान पड़ता है, अमेरिका की जिंगो जाति का एक औजार है। ग्रंथकार होने का उसका दावा केवल इतना ही है कि उसकी लेखन शैली मनोरंजक है, सनसनी पैदा करनेवाले उड़ते हुए शब्दों का प्रयोग करना उसे आता है और संदेहपूर्ण कथाओं को मनोरंजक शैली में लिखने का उसे अभ्यास है। एक मामूली पाठक भी उसके इतिहास और राज-नीति-विज्ञान में उसकी अज्ञानता को दिखला सकता है। अपनी इस पुस्तक के विषय प्रवेश में ही लाला लाजपत राय ने काफी विस्तार से कैथरीन मेयो की स्थापनाओं को ध्वस्त कर दिया था।

दुखी भारत नाम की लाला लाजपत राय की ये पुस्तक खूब पढ़ी गई। इसपर काफी चर्चा हुई। लेकिन कालांतर में ये पुस्तक ना केवल चलन से बाहर हो गई या कर दी गई बल्कि नई पीढ़ी को इसके बारे में बताया भी नहीं गया। अब इसका पुनर्प्रकाशन एक सुखद घटना है। सिर्फ यही एक पुस्तक नहीं बल्कि हिंदी की कई कालजयी पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन हो रहा है। जैसे प्रेमचंद पर पहली आलोचनात्मक पुस्तक लिखनेवाले जनार्दन झा द्विज की अनुपलब्ध पुस्तक का प्रकाशन हुआ। निराला जी ने श्रीरामचरितमानस के कुछ अंशों का अवधी से हिंदी में अनुवाद किया था जिसका फिर से प्रकाशन रामायण विनय खंड के नाम से हुआ है। श्रेष्ठ हिंदी पुस्तकों के पुनर्प्रकाशन को कई तरह से देखा जा सकता है। एक तो अगर इसको फिल्मों के पुनर्प्रदर्शन से जोड़कर देखें तो इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि जब अच्छी पुस्तकें ना आ रही हों तो पूर्व प्रकाशित अच्छी और अनुपलब्ध पुस्तकों को खोजकर उसका प्रकाशन किया जाए। इसका एक लाभ ये होगा कि पाठकों का जुड़ाव हिंदी के साथ बना रहेगा और वो निराश नहीं होंगे। दूसरी अच्छी बात ये होगी कि स्वाधीनता के बाद जिस तरह का एकतरफा नैरेटिव बनाया गया उसका भी बहुत हद तक निषेध होगा। लाला लाजपत राय ने जिस तरह से अपनी पुस्तक दुखी भारत में हिंदू समाज और संस्कृति को लेकर कैथरीन मेयो के नैरेटिव को ध्वस्त किया था उसके बारे में आज की पीढ़ी को भी जानना चाहिए। आज भी हमारे समाज में कैथरीन मेयो की अवधारणा के लेकर कई लोग घूम रहे हैं। उनके निशाने पर भारत का हिंदू समाज होता है। अगर लाला लाजपत राय की इस पुस्तक का प्रचार प्रसार होगा तो हिंदू समाज को लेकर फैलाई जानेवाली भ्रांतियां दूर होंगी। 


Saturday, May 7, 2022

विदेशी सिद्धांत से उथला विमर्श


हिंदी साहित्य में कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनपर नियमित अंतराल के बाद विमर्श होते रहते हैं। ऐसा ही एक मुद्दा है स्त्री विमर्श का। स्त्री विमर्श के मुद्दे पर हिंदी के छोटे-मंझोले से लेकर बड़े लेखक तक टिप्पणियां करके सुर्खियां बटोरते रहते हैं। जब इंटरनेट मीडिया के प्लेटफार्म्स नहीं थे तो राजेन्द्र यादव अपनी पत्रिका हंस के माध्यम से इस मुद्दे को हवा देते रहते थे। हंस में होनेवाली चर्चा की देखा-देखी अन्य साहित्यिक पत्रिकाएँ भी स्त्रियों के मुद्दे पर बहस करवाते थे। अब हिंदी साहित्य की चर्चा का मंच फेसबुक हो गया है। राजेन्द्र यादव ने जिस स्त्री विमर्श को हिंदी साहित्य में चर्चित किया था अब वो विमर्श उससे आगे निकल गया है। राजेन्द्र यादव ने जिस स्त्री गाथा को आरंभ किया था अब उसकी उत्तर गाथा या उत्तर आअधुनिक गाथा लिखी जा रही है। फ्रांसीसी लेखिका सीमोन द बोउवा की 1949 में प्रकाशित पुस्तक ‘द सेकेंड सेक्स’ से यादव बहुत प्रभावित थे। उसके आधार पर ही उन्होंने हिंदी में विमर्श चलाया। इसकी नकल पर बाद में हिंदी के कई लेखक स्त्री विमर्श का झंडा उठाकर चलने लगे। सीमोन विवाह संस्था का विरोध करती थीं। अल्जीरिया के मुक्ति संग्राम के समय कनाडा की सरकार ने उनके एक साक्षात्कार पर इस वजह से प्रतिबंध लगा दिया था कि वो विवाह संस्था का विरोध करती थीं। राजेन्द्र यादव ने सीमोन के लेख से स्त्री विमर्श के सूत्र निकाले और हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श को परोक्ष रूप से देह विमर्श में तब्दील कर दिया। वही देह विमर्श अब विद्रूप रूप में सर्वजनिक बहस का हिस्सा बनने लगा है। पश्चिमी समाज और सिद्धांत के अंधानुकरण से हिंदी में  स्त्री विमर्श भारतीय संदर्भों से कटता चला गया। 

भारतीय संस्कृति में स्त्री हमेशा से सबल रही हैं। उनको तमाम तरह के अधिकार प्राप्त रहे हैं। यहां की स्त्रियों की आदर्श तो सावित्री रही हैं। वो सावित्री जिनको मालूम होता है कि सत्यवान की आयु एक वर्ष ही बची है, बावजूद इसके उसने सत्यवान से ही विवाह किया। पति से उनके प्रेम के आगे यमराज को भी झुकना पड़ा था। हमारे यहां तो कुंती और द्रोपदी जैसी स्त्रियां हैं जिनके आचार और व्यवहार के आधार पर स्त्री विमर्श की बात की जानी चाहिए। प्राचीन काल से ये परंपरा रही है कि स्त्रियां अपना वर खुद चुनेंगी। स्वयंवरों की परंपरा लंबे समय तक चलती रही है। तमाम तरह की बाधाओं को झेलते हुए भी पिता और भाई भी अपने परिवार की स्त्री की इच्छा का मान रखते थे। हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस तरह की अनेक कहानियां मिलती हैं। जब हम भारतीय समाज और भारतीय स्त्रियों के व्यवहार को विदेशी समाज और विदेशी मान्यताओं और सिद्धांतों के आधार पर आकलन करने लगते हैं तो विमर्श का भटकना स्वाभाविक है। ये मानसिकता की बात है। इस संदर्भ में एक आधुनिक उदाहरण देना चाहूंगा। फिल्म मदर इंडिया का नामांकन आस्कर पुरस्कार हेतु हुआ था। ये फिल्म जूरी के सामने पहुंची और जूरी ने इसको देखकर इस फिल्म को पुरस्कार योग्य नहीं माना। उनका तर्क था कि कहानी बहुत हल्की और हास्यास्पद है। नायिका राधा, जिसकी भूमिका नर्गिस ने निभाई थी, अपने बेटों को खाना नहीं खिला पाने की वजह से परेशान थी। वो मदद के लिए सुखीलाला, जिसको कन्हैया लाल ने अभिनीत किया, के पास जाती है। सुखीलाला उसपर आसक्त है और उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करता है, नर्गिस उसकी पिटाई करके वहां से निकल जाती है। इस दृश्य को देखकर उस समय जूरी के सदस्य ने कहा था कि जब नायिका इतनी परेशान थी तो उसको लाला की सेक्सुअल फेवर की मांग मानने में दिक्कत क्या थी। जूरी के एक और सदस्य ने नर्गिस के अपने बेटे को गोली मार देने के दृश्य का उपहास उड़ाया था। उसने कहा था कि अगर किसी के बेटे ने किसी लड़की को छेड़ दिया तो उसको जान से मारने की क्या जरूरत थी, ये दृश्य हास्यास्पद हैं। जूरी के सदस्य नर्गिस के उस संवाद की गहराई या भारतीय समाज की मानसिकता को समझ ही नहीं पाए जहां वो कहती है कि बेटा दे सकती हूं, लाज नहीं। ये भारतीय समाज है, ये भारत की स्त्री है, ये भारतीय स्त्री का मन है, जिसको विदेशी कभी नहीं समझ पाएंगे। मदर इंडिया को आस्कर नहीं मिला।  

हिंदी साहित्य में फेसबुक जैसे माध्यमों पर स्त्री विमर्श करने वाले अपने पौराणिक ग्रंथों को संदर्भ से काटकर उद्धृत करते रहे हैं। पिछले दिनों ये पढ़ने को मिला कि मनुस्मृति में ये उल्लिखित है कि वर पक्ष से धन देकर कन्या का विवाह किया जाता था। बलात्कारियों से शादी का प्रविधान भी मनुस्मृति में मिलता है, आदि आदि। अब ये बातें बिल्कुल संदर्भ से काटकर और अज्ञानतावश की जाती हैं। मनुस्मृति में आठ तरह के विवाह का उल्लेख मिलता है। ब्राह्मविवाह, दैव विवाह, आर्ष विवाह, प्रजापत्य विवाह, गांधर्व विवाह, असुर विवाह, राक्षस विवाह और पैशाच विवाह। फेसबुक पर जिन दो विवाहों की चर्चा की गई उसका नाम है असुर विवाह और पैशाच विवाह। वर पक्ष से धन लेकर कन्या को विवाह के लिए सौंपने को मनु संहिता में असुर विवाह कहा गया है। इसी तरह बलात्कारियों के साथ कन्या का विवाह का प्रस्ताव या विवाह करने को पैशाच विवाह कहा गया है। विवाह के लिए हत्या करने और उसके बाद होनेवाली शादी को राक्षस विवाह कहा गया है। बाकी पांचों प्रकार के विवाह में स्त्री का सम्मान होता है। कन्या का विवाह सुयोग्य वर से, माता पिता की इच्छा से, कन्यादान से और स्त्री पुरुष के व्यक्तिगत फैसले को समाजिक वैधता देना आदि रहा है। शकुंतला दुश्यंत, नल-दमयंती आदि की कहानियां हमारे सामने हैं। अज्ञानियों को तो बस नकारात्मक चीजें ही दिखती हैं। फेसबुक के स्त्री विमर्शकारों को भारतीय समाज और इसकी परंपराओं को पढ़ने और समझने की आवश्यकता है।

हमारे देश में वामपंथियों ने भी स्त्री विमर्श के नाम पर खूब नारेबाजी की लेकिन उनकी कथनी और करनी में अंतर रहा है। कम्यून में स्त्रियों पर किस तरह के अत्याचार होते रहे हैं इसको कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी ने अपने संस्मरणों में स्पष्ट किया है। यहां तक कि सीमोन ने भी माना था कि स्त्रियों की समस्याएं साम्यवाद से नहीं सुलझ सकती हैं। भारत में स्त्रियों को लेकर हमेशा से एक आदर और समानता का भाव रहा है लेकिन जब हम परतंत्र हुए और विदेशी आक्रांताओं ने अपनी संस्कृति को हमारे देश पर थोपी तब यहां की महिलाओं की स्थिति बदतर हुई। हमारे पौराणिक ग्रंथों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि महिलाओं के लिए समाज में खुलापन था। भारतीय राजाओं के दरबार में रानियों के अलग से बैठने की व्यवस्था होती थी और वो दरबार के दैनंदिन क्रियाकलापों में अपनी राय रख सकती थीं, अपनी असहमतियां प्रकट कर सकती थीं। मुगल सम्राज्य की स्थापना के बाद ये खुलापन खत्म हो गया। विदेशियों के राज में ये संभव नहीं रहा। स्त्री विमर्शकारों के साथ भी वही दिक्कत है जो हिंदी के कुछ फिल्मकारों के साथ है। वो जेम्स हेडली चेज या मिल्स एंड बून के उपन्यास पढ़कर रोमांस गढ़ते हैं। उनको कालिदास के ग्रंथों में वर्णित रोमांस का पता ही नहीं है। उनको विद्यापति की नायिकाओं के प्रणय प्रसंगों का उसके प्रभावों के बारे में जानकारी ही नहीं है। विदेशी उपन्यासों के आधार पर गढ़े गए रोमांटिक दृश्य जिस तरह से फूहड़ और अश्लील हो जाते हैं उसी तरह पश्चिमी स्त्री विमर्श की नकल के आधार पर भारतीय स्त्रियों को लेकर किया जाना वाला विमर्श भी फूहड़ और उथला होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय स्त्री की समस्याओं को भारतीय संदर्भों में समझने की कोशिश की जाए।

Monday, July 5, 2021

माहिम पुलिस थाने से 'मदर इंडिया'


माहिम पुलिस स्टेशन में एक नौजवान पुलिस इंस्पेक्टर तैनात था। उसको फिल्मों में काम करने का बेहद शौक था। उसका दिन पुलिस की नौकरी से अधिक फिल्मों में लगता था। फिल्मी दुनिया में उसके कई दोस्त थे। पुलिस की नौकरी करते हुए उसके कई फिल्मों में छोटी मोदी भूमिकाएं कर भी ली थीं, जिसमें रंगीली, घमंड और लाखों में एक जैसी फिल्में थीं। उसने भले ही कई फिल्मों में काम किया लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उसकी खास पहचान नहीं बन पाई थी और वो माहिम पुलिस थाने में पुलिस की नौकरी ही कर रहा था, पर चाहत तो बड़े फिल्म में केंद्रीय भूमिका करने की थी। सबकी होती है। पुलिस इंसपेक्टर साहब अपनी इस हसरत को अपने मित्रों के साथ साझा किया करते थे। वक्त निकला जा रहा था लेकिन इंसपेक्टर साहब को फिल्मों में अच्छी भूमिका नहीं मिल पा रही थी। एक दिन वो माहिम थाने में बैठे थे, शाम हो चुकी थी। अचानक उनका एक मित्र थान पहुंचा और उनको कल सुबह महबूब खान से मिलने के लिए कहकर चला गया। उस वक्त तक महबूब खान बड़े निर्देशक के तौर पर जाने जाने लगे थे। अगले दिन अपने मित्र के बताए समय पर इंसपेक्टर साहब महबूब खान से मिलने पहुंच गए। वहां उनका वो दोस्त भी मिला। वो महबूब खान का सहायक था। इंसपेक्टर साहब का दोस्त उनको लेकर महबूब खान के पास पहुंचा और उनसे कहा कि ‘ये बहुत अच्छे कलाकार हैं और एक अच्छी फिल्म की तलाश में हैं। इनको मदर इंडिया में कोई रोल दे दीजिए’। उस समय महबूब खान अपनी फिल्म ‘मदर इंडिया’ की कास्टिंग कर रहे थे। महबूब खान ने इंसपेक्टर साहब को ऊपर से नीचे तक देखा और गहरी सांस लेकर पूछा कि क्या आप फिल्मों में शौकिया तौर पर काम करना चाहते हैं या फिर संजीदगी से फिल्मों को अपना करियर बनाना चाहते हैं। इंसपेक्टर साहब ने महबूब खान को कहा कि वो फिल्मों में अभिनय को ही अपना करियर बनाना चाहते हैं, इंसपेक्टर की नौकरी छोड़कर अभिनेता बनने के लिए भी तैयार हैं। इंसपेक्टर साहब ने अपने अंदाज में अपनी बात जारी रखी और अपने मित्र की ओर इशारा करते हुए कहा कि ‘इसने मुझे बताया कि आप एक बड़ी फिल्म बना रहे हैं और मुझे सलाह दी कि मैं आपसे बात करूं’। 

इस वक्त तक महबूब खान ‘मदर इंडिया’ के लिए नर्गिस, सुनील दत्त और राजेन्द्र कुमार को फाइनल कर चुके थे। उनको ‘शामू’ के रोल के लिए किसी अभिनेता की तलाश थी। उन्होंने फौरन अपने असिस्टेंट से कहा कि इंसपेक्टर साहब का शामू के चरित्र के हिसाब से मेकअप करो, हम इनका स्क्रीन टेस्ट लेना चाहते हैं। जब इंसपेक्टर साहब मेकअप के लिए गए तो उनके एक दूसरे सहायक ने महबूब खान से कहा कि ये शख्स शामू के रोल के लिए उपयुक्त नहीं होगा क्योंकि इसके चेहरे पर एक आक्रामकता है। अनीत पांध्ये ने अपनी पुस्तक में इस प्रसंग को विस्तार से लिखा है। थोड़ी देर बाद इंसपेक्टर साहब का स्क्रीन टेस्ट हुआ और वो पास हो गए। ये इंसपेक्टर साहब राज कुमार थे। ‘मदर इंडिया’ रिलीज होने के बाद की कहानी तो इतिहास बन गई है। शामू के रोल से राज कुमार को जो पहचान मिली उसने उनको काफी काम दिलवाया और वो कुछ ही समय बाद शीर्ष के अभिनेताओं में शुमार होने लगे। फिल्म ‘वक्त’ ने तो उनको बेहद लोकप्रिय बना दिया। बाद के दिनों में तो राज कुमार को लेकर अनेक तरह के किस्से फिल्मी दुनिया में मशहूर हुए। उनकी संवाद अदायगी से लेकर उनकी अभिनय कला अनूठी थी। सौदागर फिल्म में जब वो शूटिंग के लिए आते थे तो उनके साथ चार गाड़ियों का काफिला चला करता था। एक में राज कुमार बैठते थे, दूसरी गाड़ी में उनके सहायक और बाकी दो गाड़ियों में उनके कपड़े, जूते, हैट इत्यादि रखे जाते थे। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा ‘द सब्सटेंस एंड द शैडो’ में इस प्रसंग को बेहद रोचक तरीके से लिखा है। आज से पच्चीस साल पहले 3 जुलाई को ये बेहतरीन और स्टाइलिश अदाकार इस दुनिया को अलविदा कह गया।  

(https://www.jagran.com/entertainment/bollywood-vishesh-interesting-facts-about-legendary-actor-rajkumar-in-mother-india-movie-entry-21795172.html)

Saturday, June 5, 2021

सच्ची कहानी उस प्यार की


शाम ढल चुकी थी, समंदर की लहरें हिलोरें ले रही थीं, हवा में थोड़ी ठंडक थी, मुंबई(तब बांबे) की सड़क पर एक फिएट कार धीमी गति से चली जा रही थी। नई चमचमाती उस कार को अभिनेता सुनील दत्त चला रहे थे और उनकी बगल वाली सीट पर उस वक्त फिल्मों की सफल अभिनेत्री नर्गिस बैठी हुई थीं। शूटिंग खत्म होने के बाद सुनील दत्त, नर्गिस को छोड़ने उनके घर जा रहे थे। कार की खिड़की का शीशा थोड़ा खुला था और ठंडी हवा सुनील दत्त के गालों को छूकर निकल रही थी। पर सुनील दत्त के माथे पर पसीने की बूंदें थीं, वो बार-बार नर्गिस से कह रहे थे, ‘मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं’ जब नर्गिस ने बोला कहिए तो वो चुप हो गए। फिर सुनील दत्त ने कहा कि ‘मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूं’। नर्गिस ने फिर कहा फर्माएं। लेकिन वो फिर खामोश। इसी तरह से बातचीत चल रही थी और कार भी अपने रफ्तार से अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी। सुनील दत्त के दिल की बात जुबां पर आ नहीं पा रही थी। उनको लग रहा था कि अगर नर्गिस ने मना कर दिया तो उनका क्या होगा? इतने में नर्गिस का घर आ गया। सुनील दत्त ने गाड़ी रोकी तो नर्गिस ने उनकी तरफ इस तरह से देखा जैसे आंखें कोई पर्सनल सा सवाल करना चाह रही हों। लेकिन वो भी कुछ कह नहीं पाईं और कार का दरवाजा खोलकर उतरने लगीं। तब सुनील दत्त ने लंबी सांस लेकर कहा ‘मैं तुमको पसंद करता हूं और तुमसे शादी करना चाहता हूं’ । नर्गिस ने सुनील दत्त की बातें सुनीं और कार का दरवाजा बंद करके बगैर कोई उत्तर दिए अपने घर की ओर चल पड़ीं। अब सुनील दत्त परेशान। अपनी पसंदीदा फिएट कार लेकर वो वापस घर की ओर लौटे। किसी तरह बेचैनी में रात कटी। उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि अगर नर्गिस ने उनके प्रणय निवेदन को स्वीकार नहीं किया तो वो हरियाणा में अपनी मां के गांव लौट जाएंगे।

किसी तरह रात कटी, सुनील दत्त अगले दिन तैयार होकर शूटिंग पर चले गए। दिनभर बेचैन रहे। नर्गिस का कोई उत्तर या उनकी तरफ से कोई संकेत उनतक नहीं पहुंचा। शाम को काम खत्म करके वो अपनी फिएट से वापस घर लौट आए। बुझे बुझे से जब सुनील दत्त अपने घर में दाखिल हुए तो उऩकी बहन रानी खुशी से चहक रही थीं। उन्होंने सुनील दत्त का हाथ पकड़कर कहा ‘भाई मुबारक हो’। बेमन से सुनील दत्त ने पूछा ‘किस बात की बधाई’। तो उनकी बहन ने कहा कि ‘उन्होंने हां कर दी है’। सुनील दत्त कुछ देर के लिए समझ ही नहीं पाए कि किन्होंने हां कर दी है। वो कुछ पूछते तबतक रानी ने ही राड खोला, ‘नर्गिस जी आई थीं और उन्होंने रजामंदी दे दी है’। सुनील दत्त की खुशी का पारावार नहीं रहा। वो मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चले गए। ये किस्सा सुनील और नर्गिस की बेटी नम्रता दत्त ने अपनी किताब में विस्तार से लिखी है। लोकचर्चा इस बात की होती है कि ‘मदर इंडिया’ फिल्म में आग से बचाने की वजह से नर्गिस ने सुनील दत्त को प्रपोज किया था लेकिन सचाई ये है कि सुनील दत्त ने उनको अपनी फिएट कार में प्रपोज किया था। यही वजह है कि सुनील दत्त ने बहुत पुरानी हो जाने के बाद भी अपनी उस 1933 नंबर की फिएट कार को अपने पास रखे रखा था। ‘मदर इंडिया’ में आग की घटना के बाद दोनों के बीच प्यार और गहरा जरूर हुआ था।

अब नर्गिस ने हां तो कर दी थी लेकिन दोनों अपने प्यार की और शादी की बात सार्वजनिक नहीं कर पा रहे थे। फिल्म ‘मदर इंडिया’ के निर्माता निर्देशक महबूब खान नहीं चाहते थे कि उनकी फिल्म रिलीज के पहले इस प्यार की खबर बाहर निकले। उनका मानना था कि अगर नर्गिस और सुनील दत्त के प्यार और रोमांस की खबरें छपीं तो उनकी फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। उनकी सोच थी कि भारतीय दर्शक इस बात को स्वीकार नहीं कर पाएंगे कि फिल्मी पर्दे पर मां बेटा की भूमिका निभाने वाले कलाकार असल जीवन में शादी करने जा रहे हैं और रोमांस कर रहे हैं। उन्होंने दोनों पर दबाव बनाया कि वो अपने प्यार को छिपा कर रखें। दूसरी दिक्कत ये थी नर्गिस के बड़े भाई अख्तर इस विवाह के खिलाफ थे। खैर 11 मार्च 1958 को दोनों की शादी हो गई। तबतक मदर इंडिया रिलीज होकर हिट हो चुकी थी।  

Saturday, April 4, 2020

हिंदी फिल्मों से गायब होते गांव!

जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना संकट से निबटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की तो उसके दो दिन बाद ही लोग अपने अपने घर या यों कहें कि अपने अपने गांव जाने के लिए निकल पड़े। हर कोई संकट के इस समय अपने अपने स्थान पर लौट जाना चाहता था। बड़ी संख्या में लोगों के दिल्ली और अन्य जगहों से अपने अपने गांवों की ओर लौटने को विद्वान पत्रकार साथियों ने पलायन तक कह दिया। लेकिन समाजशास्त्रियों के मुताबिक इसको पूरी तरह से पलायन कहना उचित नहीं था। ये पलायन नहीं था ये तो सुरक्षा के लिए, अपने काम के लिए, सरकारी मदद पाने की आस में, संकट के वक्त अपनों या अपने परिवार के साथ रहने की इच्छापूर्ति के लिए अस्थायी तौर पर अपने गांव या अपने घऱ लौट जाने की चाहत थी। अपने घर की ओर लौटनेवाले इन लोगों में बड़ी संख्या में गांव जाने वाले थे। मुख्य रूप से इसमें गांवों में रहनेवाले वो लोग थे जो रोजगार, बेहतर शिक्षा और बेहतर आय के लिए शहरों में आकर रहते हैं। लोगों के अपने गांव लौटने के दौर में गांव एक बार फिर से वापस चर्चा में आ गया। उस घटना के दौरान जब गांव वापस जाने की खूब चर्चा होने लगी थी जब जेहन में एक विचार कौंधा था कि क्या हिंदी फिल्में भी गांव की ओर लौटेंगी? 
हिंदी फिल्मों के इतिहास पर विचार करें तो पातें हैं कि एक लंबे कालखंड में गांव और उसकी कहानी हिंदी फिल्मों का विषय हुआ करती थी। आजादी के पहले भी और आजादी के बाद भी हिंदी फिल्मों में गांवों की कहानियों प्रमुखता से चित्रित होती थीं। अगर हम राजकपूर की फिल्म ‘बरसात’ को याद करें तो इसकी कहानी भी गांव की पृष्ठभूमि पर है जिसमें फिल्म का नायक शहर से गांव जाता है वहां उसको एक लड़की से प्यार हो जाता है। इसी तरह से फिल्म का विलेन लड़कियों की तलाश में गांव जाता है। इस फिल्म में राज कपूर ने उस दौर के गांव और वहां रहनेवाले लोगों की मानसिकता के बेहतर चित्रण किया है। फिल्म ‘बरसात’ एक लव स्टोरी तो है लेकिन इसमें प्यार की कहानी के साथ-साथ गांव के परिवेश को भी सामने लाया गया है। गांव के लोगों का संघर्ष, उनकी दिक्कतें, उस दौर में डॉक्टरों की कमी और शहर से आए लोगों पर भरोसा कर लेने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया गया था। इसके बाद भी कई फिल्में बनीं। 1957 में नर्गिस की फिल्म ‘मदर इंडिया’ आई जिसकी बहुत तारीफ हुई। ये फिल्म तो भारत के गांवों की प्रतिनिधि तस्वीर के तौर पर स्थापित हुई। इसमें गांव, किसान, फसल, गरीबी, महाजनी व्यवस्था के बीच गांव के युवाओं में आदर्श की राह पर चलनेवाली बाधाओं को भी चित्रित किया गया है। इस फिल्म में नर्गिस के अभिनय ने इसको एक ऐसी ऊंचाई प्रदान जिसको छूने की हसरत हर अभिनेत्री की अब भी होती है। इसके बाद भी कई फिल्में आईं जिसके केंद्र में गांव रहा है। रोमांटिक फिल्मों से लेकर एंग्री यंग मैन के दौर में भी फिल्मों में गांव और उसकी पृष्ठभूमि बनी रही और दर्शकों ने इसको पसंद भी किया। 
इसके बाद आता है वर्ष 1998 जब फिल्म के एक नए निर्देशक का आगमन होता है जिसका नाम है करण जौहर। 1998 के अक्तूबर में इस निर्देशक की एक फिल्म रिलीज होती है जिसका नाम है ‘कुछ कुछ होता है’। करण जौहर की इस फिल्म में काजोल और शाहरुख खान की जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया। फिल्म जबरदस्त हिट रही। इस फिल्म की सफलता के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी फिल्में बनने लगीं जिसमें गांव की गोरी की जगह शहर की स्कर्ट वाली लड़की ने ले ली। दुष्ट जमींदार और उससे चुहल करनेवाली महिला की जगह शहरी डॉन टाइप गुंडे और उसकी वैंप टाइप महिला मित्र ने ले ली। गांव के भोले-भाले नायक की जगह शहरी जींस-टीशर्ट वाले लड़के ने ले ली। नायिका भी वेशभूषा में मॉडर्न हो गईं। ‘कुछ कुछ होता है’ के थोड़े समय पहले ही अनिल कपूर और पूजा बत्रा की फिल्म ‘विरासत’ और प्रकाश झा निर्देशित फिल्म ‘मृत्युदंड’ आई थी। इन दोनों फिल्मों में गांव को प्रमुखता से दिखाया गया था लेकिन अगर आप फिल्म ‘विरासत’ को याद करें तो इसका नायक शहर से आता है उसकी गर्लफ्रेंड भी शहरी होती है। तो इस फिल्म में गांव तो है लेकिन शहर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। ये ठीक वैसे ही है जैसे फिल्म ‘बरसात’ में भी नायिका गांव की होती है और नायक शहर से आता है, वो वायलिन बजाता है, वो क्लब में जाता है, डांस करता है लेकिन नायिका गांव की लड़कियों की तरह इन सबसे दूर रहती है।  
करण जौहर की फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ के बाद हिंदी फिल्मों का पात्र और परिवेश पूरी तरह से शहरी होने लगे। फिल्म के लोकेशन को लेकर निर्देशकों ने विदेशों की ओर रुख करना शुरू किया। लोकेशन की चमक दमक, बेहतरीन तकनीक, नायक नायिका के चमकते हुए आधुनिक परिधान ने हिंदी फिल्मों के चरित्र में बुनियादी परिवर्तन कर दिया। करण जौहर की फिल्म के ठीक पहले एक और फिल्म आई थी जिसको यश चोपड़ा ने निर्देशित किया था जिसका नाम था ‘दिल तो पागल है’। ये फिल्म भी जबरदस्त हिट रही थी। इसमें शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित और करिश्मा कपूर के बीच के प्रेम त्रिकोण को यश चोपड़ा ने बहुत शानदार तरीके से पेश किया है। इस फिल्म ने हिंदी फिल्मों के शहरीकरण की बुनियाद रखी जिसपर ‘कुछ कुछ होता है’ की सफलता ने एक मजबूत इमारत खड़ी कर दी। लगभग इसी कालखंड में कई फिल्में आईं जो दर्शकों को काफी पसंद आईं और वो अपने बिल्कुल शहरी थीं। फिल्मों में शहरी चमकक दमक को देखकर और गांवों के नेपथ्य में जानेपर मशहूर फिल्म निर्देशक गोविंद निहलाणी ने कहा था कि ‘गांव को हमारी कल्पना के आखिऱी छोर पर धकेल दिया गया, ग्रामीण परिवेश का चित्रण अपनी जड़ों की स्वीकारोक्ति भर है, सारा जोर चमक दमक पर है।‘ 
अगर हम देखें तो 1997-98 के बाद जिस तरह से दर्शकों ने शहरी पृष्ठभूमि की फिल्मों को पसंद करना शुरू कर दिया है वो दर्शकों की रुचि में एक बुनियादी बदलाव की ओर संकेत कर रहा था। एक के बाद एक धड़ाधड़ शहरी परिवेश पर बननेवाली फिल्मों की सफलता में सिंगल थिएटर का बंद होते जाना और शहरों में मल्टीप्लैक्स संस्कृति का विकास होना भी महत्वपूर्ण कारक रहा। हमारे देश के छोटे शहरों से, कस्बों से सिंगल थिएटर क्यों बंद होते चले गए ये गहन शोध का विषय है। एक जमाना था जब फिल्मों का अर्थशास्त्र बहुत हद तक इन एकल थिएटर पर निर्भर करता था। उस वक्त की ट्रेड पत्रिकाओँ को देखने पर ये पता चलता है कि किसी भी सफल फिल्मों में मुनाफा का चालीस से लेकर पैंतालीस प्रतिशत तक इन एकल सिनेमा हॉल से आता था। तब कहा भी जाता था कि हिंदी फिल्मों की सफलता ड्रेस सर्किल और बॉलकनी के दर्शकों की पसंद पर निर्भर करता है। ड्रेस सर्किल और बॉलकनी एकल थिएटर में उच्च टिकट दर वाली जगह होती थी जहां कस्बों और छोटे शहरों के उच्च आयवर्ग के लोग फिल्में देखते थे। जैसे-जैसे फिल्मों की प्रस्तुतिकरण का अंदाज शहरी होता गया तो ये शब्दावली भी बदलती चली गई। अब इसपर बात होने लगी कि अमुक फिल्म को मल्टीप्लैक्स के दर्शक पसंद करेंगे या नहीं। किसी फिल्म को कितने स्क्रीन मिले। मल्टीप्लैक्स के टिकटों की बिक्री ही किसी फिल्म को सफल और असफल करवाने लगे। फिल्मों के इस शहरी दौर में भी ग्रामीण पृष्ठभूमि पर कुछ फिल्में बनीं जैसे 2001 में आमिर खान अभिनीत फिल्म ‘लगान’ बनीं और वो जबरदस्त हिट रहीं। लेकिन आमिर अभिनीत फिल्म ‘मेला’ को उस तरह की सफलता नहीं मिली। 
आज जब पूरी दुनिया में अपनी परंपराओं और अपनी जड़ों की ओर जाने की बात होती है, नैरेटिव और विमर्श के केंद्र में परंपरा और पूर्व की स्थापनाएं होती हैं। ऐसे समय में हिंदी फिल्मों का शहरी होते चले जाना एक समाजशास्त्रीय अध्ययन की मांग भी करता है। अर्थशास्त्र तो साफ है कि वो अपने लक्षित दर्शक वर्ग को लेकर फिल्में बना रहा है। लेकिन ये जानना भी दिलचस्प होगा कि जब शहरों में रहनेवाले अधिकतर लोग गांवों से आ रहे हैं और वो फिल्में भी देख रहे हैं तो ऐसे में गांव की कहानियां उनको अधिक नॉस्टेल्जिक नहीं लगेंगी?