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Sunday, March 29, 2009

नन की आत्मकथा से उठा बवंडर

हाल के दिनों में हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श के नाम पर जो खेल खेला जा रहा है और देह मुक्ति के नाम पर श्रद्धेय के प्रति समर्पण का जो रूप सतह के नीचे दिखाई देता है उसे विमर्श के अलावा कोई और नाम दिया जा सकता है । आप चाहें तो व्यभिचार का विमर्श कह सकते हैं । ये व्यभिचार सिर्फ विमर्श के नाम पर नहीं हो रहा है । धर्म, आस्था, विश्वास, कर्म के नाम पर भी ये खेल खेला जा रहा है । चाहे वो बाल विधवा आश्रम हो या वो नारी निकेतन हो या जैन आश्रम हो या फिर चर्च या इससे जुड़ी संस्थाएं, हर जगह पर धर्म के आवरण में चकलाघर चलता है । हर जगह नारी मुक्ति के नाम पर, धर्म की आड़ लेकर यौन शोषण की खबरें बाहर निकलती रहती हैं । तमाम कानूनी बंदिशों के बावजूद दक्षिण भारत में देवदासी प्रथा अब भी बदस्तूर जारी है, जहां लड़कियों को मंदिर को समर्पित कर दिया जाता है, जहां भगवान के नाम पर उन लड़कियों का जमकर यौन शोषण किया जाता है । देश के कई इलाकों में आजादी के बाद वर्षों तक यह परंपरा रही कि जब लड़की का विवाह होता था तो उसे पहली रात विवाह करवाने वाले पंडित के साथ गुजारना होता था । पूजनीय पंडित जी धर्म और भगवान के नाम पर पहले उस कुंवारी कन्या को 'शुद्ध' कर आशीर्वाद देते थे । हद तो तब हो जाती थी जब एक पंडित एक साथ कई लड़कियों की शादी करवाता था, तो वह अलग अलग लड़कियों की शुद्धिकरण के लिए अपने कुनबे को इकट्ठा करता था और धर्म के नाम पर सब लोग मिलकर लड़कियों के अस्मत से खेलते थे ।
ऐसा नहीं है कि ये सब कुरीतियां सिर्फ हिंदू धर्म में ही मौजूद हैं । कुछ दिनों पहले कोलकाता की लेखिका मधु कांकरिया के उपन्यास- सेज पर संस्कृत- में जैन धर्म में संस्था और आस्था के नाम पर महलाओं के शोषण को साहसपूर्वक सामने लाया गया है । और अब मलयालम में प्रकाशित सिस्टर जेसमी की आत्मकथा ने चर्च और उससे जुड़ी संस्थाओं की पोल पट्टी खोलकर रख दी है । मलयाली भाषा में प्रकाशित इस उपन्यास के दो महीनों में ही तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और अब ये आत्मकथा हिंदी समेत कई भाषाओं में प्रकाशित होने की प्रक्रिया में है । लगभग पैंतीस साल कांग्रेगेशन में गुजारने के बाद सिस्टर जेसमी 2007 में वहां से बाहर निकलती है, गौरतलब है कि इन पैंतीस सालों में जेसमी ने 26 साल बतौर नन गुजारे । इस आत्मकथा के प्रकाशन के बाद कैथोलिक चर्च और उससे जुड़ी संस्थाओं में हड़कंप है ।
दरअसल ये आत्मकथा एक ऐसी लड़की की कहानी है जो एक ऐसे परिवार से आती है जहां बेटी की स्कूल फीस भरने के लिए उसकी मां को जबरदस्त संघर्ष करना पड़ता है । ये वो दौर होता है जब जेसमी बारहवीं की छात्रा थी । उस वक्त त्रिसूर के बिशप जोसेफ कुंडुकुलम, जेसमी की सहायता के लिए आगे आते हैं । जब भी फीस के लिए के लिए जेसमी को पैसे की जरूरत होती है तो वह बिशप हाउस जाती है । सेंट थॉमस कॉलेज के पास की तंग गलियों से बिशप हाउस तक जाने का भी बेहद दिलचस्प वर्णन है । किस तरह से कॉलेज के लड़के उसपर कागज की हवाई जहाज रूपी मिसाइल फेंका करते थे और किस तरह से चर्च के प्रीस्ट उसको खा जानेवाली नजरों से घूरा करते थे । इन घबराहट के बीच वो बिशप से पैसे तो ले लेती थी लेकिन बगैर धन्यवाद दिए भाग आती थी । तमाम घटनाओं के बीच जेसमी परिवार को सन्न कर देनेवाला फैसला लेती है और बारहवीं की परीक्षा के बाद यीशू को खुद को समर्पित कर देती है ।
लेकिन ईसा मसीह को समर्पित होने के बाद जब वो कंफेशन के लिए जाती है तो उसको अपने चारों ओर एक रहस्यमय चुप्पी नजर आती है । आसपास चल रही खुसफुसाहट को जब वो ध्यान से सुनती है तो उसके होश फाख्ता हो जाते हैं । उसकी साथी कुसुमम और मारिया ने बताया कि जो भी लड़की कंफेशन के वक्त अंदर कमरे में जाती है उसको वहां मौजूद प्रीस्ट किस करता है । जब जेसमी कंफेशन के लिए जाती है तो फादर उससे भी किस करने की इजाजत मांगता है, जिससे जेसफी साफ इंकार कर देती है। दूसरी बार जब उसे दबाव डालकर उसी प्रीस्ट के पास भेजा जाता है तो अंदर जाकर जेसमी फादर को आगाह करती है कंफेशन रूम में किस करने को लेकर कांग्रेगेशन की लड़कियों में बहुत रोष है । लेकिन डर से विरोध नहीं कर पा रही हैं । फादर का उत्तर बेहद दिलचस्प ही नहीं हैरान करनेवाला भी है - मैंने हर किसी से किस करने की इजाजत ली है और जिसने मना किया है उसको मैंने किस नहीं किया । और ये सब तो जीजस और बाइबिल की आत्मा के अनुरूप है ।" लेकिन इस घटना से फादर बेहद विचलित हो जाते हैं और एडोरेशन-कम हीलिंग सेशन को जल्द से खत्म करने का हुक्म सुना देते हैं वो भी एक हल्के से बहाने से । इस सेशन के बाद फादर के हुक्म से जेसमी को उनके कमरे में भेजा जाता है । वहां फादर बाइबिल के पन्ने खोलकर होली किस के कोट्स पढ़कर सुनाते हैं । आप भी एक देखिए - सेंट पॉल ने कहा कि - एक दूसरे का अभिवादन पवित्र चुंबन से करें । पीटर कहते हैं - एक दूसरो को प्यार के चुंबन से विश करो, आदि आदि ।
चर्च के शुरआती दिनों में जेसमी को सिर्फ फादर के किस का ही सामना नहीं करना पड़ता है, उसका वास्ता मलयालम पढानेवाली टीचर से भी पड़ता है, जो समलैंगिक है । उसने जैसे ही जेसमी को देखा उसका दिल बल्लियों उछलने लगा और हालात पहली नजर में प्यार वाला पैदा हो गया । विम्मी ने जेसमी को लंबे-लंबे प्रेम पत्र लिखकर अपने प्यार का इजहार किया । हैरान और परेशान जेसमी को तब तो करंट सा झटका लगा जब एक पत्र में विम्मी ने उसके साथ समलैंगिक रिश्ते बनाने की बात का इजहार किया । जब विम्मी को जेसफी की तरफ से सकारात्मक जबाव नहीं मिलता है तो वह जेसमी के खिलाफ षड़यंत्र रचने में जुट जाती है । जेसमी पर जब चौतरफा दबाव बढ़ा तो उसने विम्मी के आगे समर्पण कर दिया । रात में विम्मी उसके बिस्तर में घुस आती थी और उसके साथ लेस्बियन रिश्ता कायम करती थी । जब वो ये संबंध बना रही होती तो हमेशा जोसमी के कान में कहती गर्भ के झंझट से बचने का सबसे सुरक्षित तरीका यही संबंध है ।
जोसमी लंबे समय तक इस संबंध को झेलती रहती है लेकिन जब इंतहां होने लगती है तो वो मदर प्रोवेंशियल से दया की भीख मांगती है और किसी तरह वहां से अपना तबादला करवा लेती है । जब उसका ट्रांसफर ऑर्डर आता है तो विम्मी उसे बुरी तरह से धमकाती और प्रताड़ित करती है और कहती है कि वो उसे चैन से रहने नहीं रहने देगी । जो कालांतर में सच भी साबित होती है ।
नन के लिए सबसे बड़ी सजा ये होती है कि उसे कोई काम नहीं दिया जाए । तबादले के बाद ये खेल जोसफी के साथ शुरु होता है, पहले उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है और फिर उसे मानसिक तौर पर बीमार साबित करने के लिए तमाम दंद-फंद रचे जाते हैं । मदर प्रोवेंशियल क्लोडिया उसे पागल करार देना चाहती है । ये तमाम षडयंत्र चीख-चीखकर इस बात की गवाही देते हैं कि किस तरह से ननरी में कुछ लोग मिलकर एक सिंडिकेट की तरह ऑपरेट करते हैं और यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठानेवाले को पागल करार देकर नर्क में धकेल देते हैं ।
इस आत्मकथा में जीसस और बाइबिल के नाम पर दैहिक शोषण और फादर और नन के बीच अवैध देह संबंध बनाने की कोशिशों का भी पर्दाफाश किया गया है । सिस्टर जेसमी की शीघ्र प्रकाश्य इस आत्मकथा ने कैथोलिक समुदाय के बीच एक सन्नाटे जैसी स्थिति पैदा दी है और चर्च को इसपर आधिकारिक प्रतिक्रिया देते नहीं बन रहा । शायद बाइबिल से कोई उद्धरण खोजा जा रहा होगा ताकि उसके आधार पर सिस्टर को माफ किया जा सके । वैसे क्रिश्चियनिटी में कई बिडंबनाएं हैं और सबसे बड़ी बिडंबना तो ये है कि अगर कोई कुंवारी लड़की मां बनती है और बच्चा पैदा करती है और उसके बाद शादी करना चाहती है तो उसकी शादी चर्च में नहीं हो सकती । यहां ये बताते चलें कि ईसा मसीह का जन्म मेरी नाम की कुंवारी कन्या से हुआ था ।
इन सबसे इतर अगर हम इस आत्मकथा को हिंदी में प्रकाशित और चर्चित आत्मकथाओं के बरक्स रखकर देखें तो एक बुनियादी फर्क नजर आता है । इसमें जो सेक्स प्रसंग है वो कथा के साथ सहजता से आते हैं और वास्तविकता का एहसास कराते हैं जबकि हिंदी की आत्मकताओं में जबरदस्ती ठूंसे गए प्रतीत होते हैं ।
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समीक्ष्य पुस्तक- अमीन, द स्टोरी ऑफ ए नन
लेखिका- सिस्टर dजेसमी

Tuesday, March 24, 2009

BORN TO WIN- AN INTERVIEW WITH DR SHYAMA CHONA

It was one chilly morning of 1991 of London when the late Princess of Great Britain, Lady Diana received a letter from India. More than a letter it was an invitation, very unique, from the children of special school ‘Tamanna’ with the thumbnail signatures of its special students. The late Princess was impressed by the very self-effacing style of invitation and she accepted it at the first instance. This visit of Lady Diana on February 12, 1992 albeit without any diplomatic initiatives hogged the maximum headlines in the newspapers. People came to know about ‘Tamanna’ and its founder Dr Shyama Chona with a different dimension to her academician profile. By this time Dr Shyama Chona had already earned herself a place in the glitterati of the national capital as the high profile Principal of DPS School. But she was not happy just being a Principal, academician and celebrity. She had the horizon of social service in the shape of spreading awareness in people for the cause of disabled children waiting with open arms for her.
She listened to her inner voice and answered the call of her undying spirit of social service. She went on to became the recipient of the highest national awards, the Padma Shri and Padma Bhushan, along with more than 55 other awards to her name. Her will and determination of doing something for the society still remains the same even after 40 years of her dedicated services. She is daughter of a bureaucrat and wife of a retired army officer (Major General).
As I entered her office at DPS RK Puram the sight of more than 35 honours on the wall was enticing. ‘Wow, this is greatness personified,’ were the words that instantly danced on my lips. There are very few persons who can boost of achieving what they desire. A twinkle in the eyes and the spirit of ‘miles to go before I sleep….’ defines her indomitable spirit.
Excerpts from a talk to her by preeti Prakash:
Q 1. At this juncture of a highly successful life what do you attribute to your childhood.
The peace in my mind, the strength of conviction, compassion for all, to be the best, sharing are all attributes of childhood that I cherish. I was a product of a happy childhood. My father being the financial Controller of Govt of India I grew up in Lodi Estate. With around 12 servant quarters I would go and play with their children, take food for them. I always had a soft corner for them in my heart. We had a tonga whose horse, I would talk to. I was always the brilliant one and topped studies. I was the youngest of the 5 children. I had a phenomenal memory. My homework copy was always stolen before my exams but I still got the best marks. I would say though we were not children of abundance but we were taught to use, finish and get more instead of get more and discard. My mother would always feed the cow and dog first before her children.My schooling was from Sophia Ajmer and MGD Jaipur where I learnt to swim, dance, walk, talk, dress all in style. I did my graduation from Maharani’s college Jaipur. When I topped my graduation I was immediately offered lecturership in MGD. I was President of University Students Council. I was the first Femina correspondent for Rajasthan. In 1965 war I worked for soldiers & their families.With all the achievements at that point of time I had never known who I am. I felt I wanted to do more and better. This desire and undying urge to work for humanity inspite of the composure within has surely gone a long way in moulding my personality.
Q 2. Biggest Challenges faced in life.
The biggest challenge in my life was my daughter Tamanna. Till she was nine she could not walk, talk and even swallow. She was like a doll given to me by god in the shape a half finished job, for me to finish the rest. It was an internal and external fight with my ownself. It was first a denial, then sorrow combined with anger. But there was a feeling of positive contribution. I desperately tried everything possible to see her behave like other children. This made me go to all kinds of saints and babas later to realise that nothing worked. I took her to America for treatment, tried all therapies and doctors. When in need you are ready to do anything. My tools were hope, inner strength and support from my family. I was reading and writing and teaching at that time too. My son was an equal partner with me in the days of struggle when my husband would go for exercises (he was in the army). It was sorrow combined with hope. She could not speak and I longed to hear ‘mumma’ from her. I knew that the language was in her mind and I waited for the day. She is now standing on her own, independent and can read and do her chores herself.
Q 3. With more than 55 awards and 96 nominations, one honour after another, year after year, were you lucky or was it love of labour.
I have always been a hard working person and enjoyed my work thoroughly. Whatever task I had in hand I did it with honesty and earnestly. That gave me immense satisfaction. It also gave me strength to work for greater benefit of society. With all the hardships, the challenge that I felt were like forts to be conquered. I don’t know where luck was but hope never died because of which I am what I am.
Q 4. What is Tamanna project. Other projects you are working on.
Three decades ago life stood still when I had my daughter Tamanna. When I needed to put her in school, there was no place to take her. The whole problem of disability should be looked at the other way. We expect everyone to be like us and have no patience if they aren't. They just need our shoulders and our hand, Tamana is a registered voluntary and non-profit making Society, working since 1984 for the upliftment of multiple-handicapped children. As its Founder Member, I have established 3 of its branches in the prime locality of Vasant Vihar, in South Delhi, namely : Tamana Special School, Nai Disha and the School of Hope, which educate approximately 500 mentally-challenged and autistic children. 40 per cent of the handicapped children in these institutions are from poor families. I also provide, from my own salary as the Principal of DPS R.K. Puram, for their education and maintenance. My main concern today, is to streamline the handicapped with the normal children, by providing them with special education, physiotherapy and occupational therapy. For the first time in the history of special education, the Tamana Special School is providing integrated facilities for the disabled. The ‘School of Hope’ is also the only institution which is educating autistic children, a symptom the detection of which is as difficult as its rehabilitation. Autism is a mental disability affecting one in every 10,000 children. I have taken the first step in setting up a school for slum children, This is called ‘DPS ANUBHAV SHIKSHA KENDRA and has become a role model for other schools to emulate. The school, with 1500 students on its roles. I am also running a free school in Ekta Basti, R.K. Puram for the poor, providing free educational services to children of the weaker sections of society, and I’m also training the mothers to cope with family situations. This school is run under the aegis of UNESCO and UNICEF. I have also been a regular columnist with the Hindustan Times and the 4th D Magazine, and have been writing on various issues concerning parenting. These appear in a weekly column entitled ‘Nurture Talk’. Some of these articles have been compiled and a book has been published bearing the same name.
Q 5. But for your daughter Tamanna, would you have taken up this project with equal zeal.
I always had the zeal to work for the weaker sections of society and disabled children. As I said earlier life was much larger than we realized. One should think beyond oneself. The number of underprivileged in society are more than the privileged. I believe in the verdict “There is a destiny that makes us brothers, none goes his way alone. All that we send into the lives of others, comes back into our own.” The satisfaction derived after helping out the needy is much greater than anything desirable. She was surely the motivation and a light that took me to that higher goal.
Q 6. With your vast global experience how do you rate schools in India.
School education is India surely need lot of changes. There is no elasticity in school education which means that we have a system in which a child is either pass or fail. It is totally exam oriented. There is no value of social sciences. More practical changes are awaiting our education system. Stress should be laid on emphasizing vocational education aiming at employment opportunities. Today American and Japanese schools have 40% dropouts. In India every school policy differs. There is a great difference in government and private schools. Value education is missing. It's not a school's function to equip one to find jobs, points out the principal, and faith-based schools have no role to play in our education system. The most important thing for children is to accept discipline.
Q 7. Gap between past & present generation.
These days due to high degree of professionalism and materialism parents are not acting responsible. Young parents themselves seem confused. Consequently respect for parents is decreasing. We are planning to open a school for parents to provide them training. Then there is the influence of media on children, giving rise to frustration and competition. Children are not positively occupied. Children should be brought up under some rules and limits. Children now a days need time and space. However, spanking is not a part of the parenting process.
Q 8. What is the philosophy of your life.
My best moment of life is this moment. The now is important and most mindful. A book named, ‘I am ok, you are ok,’ says that life is a replay of childhood- the book is close to my heart and my inspirer too.
Q 9. What plans do you have for future.
Apart from Anubhav School I also am working on a school for parents named ‘Love and Logic school for Parents.’ But it is miles to go before I sleep, miles to go before I sleep. One birth is not enough to do what I want to do. There is lots that is to be done in social sector, education, disability.
Q 10. Message to children.
Respect elders. Be polite, work hard, discover yourself, any conflict with parents sort them out through communication. You are never alone in this world.

Tuesday, March 3, 2009

पचासी साल की जवानी

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने अपने एक प्रसिद्ध लेख में लेख में आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है । “ऑटोबॉयोग्राफिज़ आर लाइज़” में बर्नाड शा ने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं । कुछ हद तक बर्नाड शॉ सही हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होते हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरती । बर्नाड शॉ के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन लेकिन कई ऐसे आत्मकथा हैं जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है । लेकिन हमारे लेख का ये विषय नहीं है । हम तो भारतीय फिल्मों के सदबहार हीरो और बीते छब्बीस सितंबर को अपने जीवन का चौरासी बसंत देख चुके देवानंद की आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ - एन ऑटोबायोग्राफी’ के बहाने देवानंद की रूमानी छवि और उनकी फिल्मी जिंदगी को खंगालने की कोशिश कर रहे हैं । अपनी इस आत्मकथा में देवानंद साहब ने अपनी निजी जिंदगी और भारतीय फिल्म जगत के कई राज खोले हैं । देवानंद की छवि एक जबरदस्त रोमांटिक हीरो की रही है । अविभाजित भारत के गुरुदासपुर में जन्मे देवानंद ने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी (आनर्स) करने के बाद लंदन जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने की सोची थी । लेकिन पिता की मुफलिसी की वजह से ये संभव नहीं हो सका । परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर जब देवानंद ने रॉयल इंडियन नेवी में शामिल होने की कोशिश की तो वहां भी असफलता ही हाथ लगी । देवानंद के पिता की इच्छा थी की वो बैंक में क्लर्क की नौकरी कर ले लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और देवानंद फ्रंटियर मेल से बंबई आ गए । फिर शुरु हुआ संघर्ष- यहां भी बनना चाहते थे गायक लेकिन बन गए अभिनेता । इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है और फिर देवानंद ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा । देवानंद की पहली फिल्म थी - हम एक हैं - इस फिल्म के रिलीज होते ही देवानंद के अभिय की न केवल नोटिस ली गई बल्कि जमकर तारीफ भी हुई । इसके बाद तो देवानंद, उस दौर के दो सबसे सफल हीरो, दिलीप कुमार और रादकपूर के साथ फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद बन गए और उस दौर की तमाम चोटी की अभिनेत्रियों के साथ फिलमों में तो काम किया ही, रोमांस भी कम नहीं किया । देवानंद और सुरैया के बीच के रोमांस और प्रेम की खूब चर्चा हुई और अब अपनी आत्मकथा – रोमांसिंग विद लाइफ - में देवानंद ने अपनी इस प्रेम कहानी का विस्तार से वर्णन किया है । देवानंद लिखते हैं - "हम दोस्त से गहरे दोस्त और फिर प्रेमी प्रेमिका बन गए, हमारी प्रेम कहानी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था । एक भी दिन ऐसा नहीं होता था जब मैं और सुरैया फोन पर बात नहीं करते थे, मुझे सुरैया से प्यार हो गया था लेकिन उस वक्त सुरैया के परिवार में उसकी दादी का जबरदस्त प्रभाव था और उनकी मर्जी के बिना उस परिवार में पत्ता तक नहीं हिलता था । मुझे लगने लगा कि हमारी इस प्रेम कहानी में सुरैया की दादी बाधा बन रही थी ।मेरा सुरैया के घर में अब पहले जैसा स्वागत नहीं होता था । लेकिन प्यार की तड़प बढ़ती ही जा रही थी । मैं सुरैया के लिए बेचैन होने लगा था । लेकिन उसके परिवार ने हमारे प्यार पर बंदिशें लगा थी मिलने जुलने पर रोक था । एक दिन हम चुपके से एक पानी टंकी के पास मिले और सुरैया ने मुझसे लिपटकर कहा - आई लव यू, आइ लव यू । इसके बाद मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे । मैंने जवेरी बाजार से सुरैया के लिए एक मंहगी अंगूठी खरीदी और उसे भिजवा दिया । मैं सातवें आसमान पर था लेकिन अपने परिवार के दवाब में सुरैया ने मेकी दी हुई अंगूठी समंदर में फेंक दी ।" देवानंद साहव ने इस प्रेम कहानी को बहुत ही बेहतरीन अंदाज में अपनी आत्मकथा में कलमबंद किया है । इस पूरी किताब से देवानंद की पर्दे पर की जो एक बेहद रूमानी छवि थी वो और भी पुष्ट होती है, प्रामाणिक भी, क्योंकि खुद देव साहब ने अपनी जुबानी अपनी कई प्रेम कहानी और आशिकी को दुनिया के सामने पेश किया है । सुरैया के अलावा देवानंद ने अपने स्कूली दिनों की प्रेमिका से लेकर अबतक की अपनी नायिकाओं और प्रेमिकाओं के बारे में खुलकर लिखा है । चाहे वे टैक्सी ड्राइवर फिल्म की नायिका मोना जो बाद में देवसाहब की पत्नी भी बनी या फिर मुमताज हो या फिर जीनत अमान हो या टीना मुनीम । संजय दत्त की पत्नी ऋचा को फिल्मों में लाने का श्रेय भी देवानंद को ही है । जीनत अमान पर लिखते हुए देव साहब ने इमानदारी से स्वीकार किया है कि जब भी राज कपूर जीनत अमान से लिपटते चिपटते थे तो उनको जलन होती थी । देवानंद को लगता था कि जीनत अमान उनकी खोज है, उनकी नायिका है इसलिए सिर्फ उनकी अमानत है लेकिन जब एक पार्टी में राजकपूर ने जीनत अमान को जब अपने आलिंगन में लिया तो जीनत की जो प्रतिक्रिया थी, उसे देखकर देवानंद का दिल चकनाचूर हो गया ।
देवानंद जब एक नायक के रूप में फिल्मों में कामयाब हो गए तो नवकेतन नाम से अपना बैनर बनाकर फिल्म निर्माण में उतरे और कई नई प्रतिभाओं, टीना मुनीम, तब्बू से फिल्मी दुनिया का साक्षात्कार कराया । फिल्म निर्माण के बाद देवानंद फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे और फिल्म प्रेम पुजारी का निर्देशन किया । देवानंद की फिल्म गाइड, काला पानी, हरे रामा हरे कृष्णा, काला बाजार, जब प्यार किसी से होता है जैसी फिल्में हिंदी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में मील का पत्थर है ।कुछ लोगों का कहना है कि देवानंद ने बाद के दिनों में अपनी फिल्मों में काफी प्रयोग किए और अपने समय से आगे की फिल्में बनाई । बॉक्स ऑफिस पर भले ही बाद में देवानंद की कई फिल्मों को उतनी सफलता नहीं मिली जितनी पहले मिला करती थी लेकिन देवानंद ने अपने स्टाइल के साथ कोई समझौता नहीं किया ।
देवानंद के जमाने में लड़कियां उनपर जान छिड़कती थी । युवाओं में उनके स्टाइल से सिगरेट के कश लेना, गले में मफलर डालना, शर्ट के बड़े –बड़े कॉलर स्कार्फ आदि का जबरदस्त क्रेज था । देव आनंद की जो डॉयलॉग डिलीवरी थी, उनका जो अंदाज था वो अनूठा था, अपनी तरह का अकेला था । उनकी दिलकश अदा और होठों पर शरारती मुस्कराहट काफी कुछ कह जाती थी ।
देवानंद ने अपनी आत्मकथा में फिल्मी हस्तियों के अलावा राजनैतिक हस्तियों का भी जिक्र किया है । खासतौर से इंदिरा गांधी और उनके पुक्ष संजय गांधी का । इंदिरा गांधी के बार में देवानंद ने लिखा है कि वो बहुत ही कम बोलती थी जिसकी वजह से उनके विरोधी इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहते थे । देव साहब ने इंदिरा गांधी के साथ कई मुलाकातों का जिक्र किया है लेकिन हर बार उन्हें लगा कि श्रीमति गांधी, नकारात्मक या सकारात्मक किसी भी तरह की कोई प्रकिक्रिया देती ही नहीं है ।
देवानंद साहब को मैंने दो बार नजदीक से देखा है, मिला भी । एक बार तो दो साल पहले मुंबई में एक होटल में हम लोग एक कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, देव साहब भी उसी होटल में थे, हमलोगों को जब पता लगा तो उनसे मिलने चले गए । उनसे मिलकर बाहर निकलते वक्त हम चार लोग यही बात कर रहे थे कि बताओ यार अस्सी में ये हाल है तो तीस चालीस में क्या सितम ढाया होगा । मैंने अपने स्कूल के दिनों में देवानंद की फिल्म काला बाजार देखी थी और देवानंद की वही छवि थी मन पर । उस दिन जब मिलकर निकला तो लगा कि चौबीस पच्चीस साल पहले जिस देवानंद को पर्दे पर देखा था उसी देवानंद से मिलकर निकला हूं । पिधले साल छब्बीस सितंबर को उनकी किताब रिलीज होनी थी तो वो दिल्ली के प्रेस क्लब में वो पत्रकारों से मिले थे । वही जोश, वही जवानी, वही स्टाइल । उसी तरह सवालों के जवाब देने से पहले गले का स्कार्फ स्टाइल से झटकना । मानो कोई हसीना अपने चेहरे पर अनचाहे आए जुल्फ को झटक रही हो ।