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Saturday, July 4, 2026

भारत की संप्रभुता पर हमले का मंसूबा


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 12 वर्षों के कार्यकाल में बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य किए। इन कार्यों में से दो कार्य ऐसे हैं जिसको ऐतिहासिक कार्य की कोष्ठक में रखा जा सकता है। पहला है अनुच्छेद 370 की समाप्ति। दूसरा है माओवाद का सफाया। ये दोनों कार्य इतिहास में इस तरह से दर्ज हो गए जिसको कभी भी मिटाया नहीं जा सकेगा। दोनों में गृहमंत्री अमित शाह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अनुच्छेद 370 की समाप्ति बहुत साहसिक कदम था। उसके लिए व्यापक प्रसासनिक तैयारी भी आवश्यकता थी। जो लोग कहते थे कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कश्मीर में खून की नदियां बहेंगी उन्होंने भी खामोशी के साथ इस बदलाव को स्वीकार किया। 370 के समाप्त होने के आसन्न खतरे से  निबटने के लिए तैयारियां की गई थीं। माओवादी आतंक को समाप्त करने के लिए एक जिस इच्छाशक्ति की आवश्यकता थी वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिखाई। परिणामस्वरूप गृहमंत्री को इस कार्य को करने में अपेक्षित शक्ति और भरोसा मिला। रणनीति बनाई गई। उसपर निश्चित समयावधि में कार्य हुआ। आज देश माओवादी आतंक से मुक्त है। जब माओवाद के आतंक के कारणों पर पर विचार कर रहा था तो एक्स पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण का एक अंश दिखा। उसमें वो कह रहे हैं कि अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेटस एजेंसी फार इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) 2024 के लोकसभा चुनाव के समय करीब 200 करोड़ रुपए भारत में भेजना चाहता था ताकि नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और को प्रधानमंत्री बनाया जा सके। यूएसएआईडी दुनिया के देशों को अलग अलग कारणों से आर्थिक मदद करता रहता है। ये आर्थिक मदद शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतंत्र को मजबूत करने आदि के नाम पर दी जाती है। अधिकतर मामलों में इस तरह की मदद स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से ही दी जाती है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस तरह का बयान पहले भी दे चुके हैं। उन्होंने दावा किया था कि 2024 में भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए धन भेजा गया था। प्रश्न उठ सकता है कि माओवादी आतंक की समाप्ति और ट्रंप के इस बयान में क्या संबंध है। इन दोनों बातों में गहरा संबंध है। इसको समझने के लिए समय समय पर विदेशी फंडिंग के नियमों को सख्त और पारदर्शी बनाने के लिए उठाए गए कदमों और उसपर मचे बवाल पर ध्यान देना होगा। इस वर्ष भी विदेशी फंडिंग को लेकर गृह मंत्रालय ने संशोधित नोटिफिकेशन जारी किया। अभी जारी नोटिफिकेशन के अनुसार गैर सरकारी संगठनों को जिस कार्य के लिए विदेश से पैसा मिलता है उस कार्य में ही खर्च करने की व्यवस्था के लिए नियम और सख्त किए गए। गैर सरकारी संगठनों के प्रशासनिक व्यय की सीमा भी तय की गई है। विदेश से मिले धन के उपयोग का प्रमाण देने के बाद ही फिर से मदद की मंजूरी मिलेगी। पहले होता ये था कि धन किसी अन्य कार्य के लिए आता था और उसका उपयोग किसी अन्य कार्य में होता था। लोकतंत्र को या सिविल सोसाइटी को मजबूत करने के लिए आनेवाले धन का उपयोग बहुधा सरकार के विरुद्ध आंदोलन में होता था। धर्मिक कार्यों या धर्म प्रचार के लिए मिलनेवाली राशि का उपयोग मतांतरण में किया जाता था। इस वर्ष के संशोधन में ये स्पष्ट किया गया है कि धार्मिक कार्यों के लिए विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का उपयोग किसी भी हाल में मतातंरण के लिए नहीं किया जा सकेगा। संविधान का अनुच्छेद 25 देश के नागरिकों को रिलीजस स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। अपने रिलीजन का अनुकरण करने और उसके प्रचार करने की भी अनुमति है। इसकी आड़ में ही मतांतरण के कार्य को अंजाम दिया जाता रहा है। इसमें विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का भरपूर उपयोग होता रहा है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में किए गए संशोधन के अनुसार अब धार्मिक प्रचार के लिए मिलनेवाले विदेशी धन से मतांतरण की अनुमति नहीं है। ऐसा पाए जानेपर लाइसेंस रद करने का अधिकार सरकार के पास होगा। 

विदेश से मिलनेवाली आर्थिक मदद गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) शिक्षा के प्रसार के नाम पर भी लेते रहे हैं। इस तरह की बात सामने आती रही है कि अमुक एनजीओ ने शिक्षा के प्रसार के लिए विदेश से आर्थिक सहायता ली लेकिन उसका उपयोग विचारधारा विशेष के प्रचार प्रसार में किया गया। विशेषकर इस तरह के मामले छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे आदिवासी बहुल इलाकों से आते रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए मिलनेवाले धन के दुरुपयोग की खबरें आती रही हैं। इस तरह के समाचार भी आते रहे हैं कि विदेश से मिलनेवाले धन का उपयोग पहले नक्सलियों और बाद में माओवादियों को मदद के लिए किया जाता रहा। इस तरह की गतिविधियां भारत की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने रहे। इस कारण से जब विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में संशोधन हुआ तब केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने का प्रयास किया गया। जब भी एनजीओ को मिलनेवाले विदेशी धन को लेकर आर्थिक अनुशासन की बात गृह मंत्रालय से की जाती है तब भी विरोध के स्वर मुखर हो जाते हैं। इसका एकमात्र कारण है कि कई एनजीओ जिस कार्य के लिए धन लेते हैं उस कार्य के अलावा अन्य काम में पैसे खर्च किए जाते हैं। माओवादियों को विदेशी मदद का एक बड़ा स्त्रोत ये भी था। अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय ने इस स्त्रोत को खत्म किया जिससे माओवादियों को मिलनेवाली आर्थिक सहायता न्यून हो गई। 

देश में सत्ता परिवर्तन का मंसूबा पाले बैठे विदेशी ताकतों को भी इससे कमजोर किया गया। ये बात सिर्फ ट्रंप ही नहीं कह रहे हैं। 12 सितंबर 2011 को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने कुछ दस्तावेज डिक्सालीफाई किए। उन दस्तावेजों से ये राज खुला कि किस तरह से भारत की स्वतंत्रता के बाद से सोवियत संघ ने कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (सीपीआई) की पूर्ण स्वामित्व वाले प्रकाशन  गृह पीपल्स पब्लिशिंग हाउस को 65 प्रतिशत तक आर्थिक अनुदान देता था। इतना ही नहीं सीपीआई के प्रकाशनों को 1984 में करीब साठ हजार डालर तक का विज्ञापन दिया जाता था। सीपीआई और उसके अनुषांगिक संगठनों के लोगों को आर्थिक मदद और सोवियत संघ की यात्रा के लिए टिकट आदि दिए जाते थे। उसमें इस बात का भी उल्लेख है कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान करीब 40 प्रतिशत संसद सदस्यों को सोवियत रूस से पैसे मिलते थे। इसकी प्रामाणिकता ना तो कभी सिद्ध हो सकती है ना ही सच सामने आता है। लेकिन खुफिया क्लासीफाई दस्तावेजों के सामने आने से संकेत तो मिलते ही हैं। प्रश्न यही है कि जब नरेन्द्र मोदी की सरकार को बदलने के लिए आर्थिक मदद की बात अंतराष्ट्रीय मंचों पर होती है तो उसपर देश में विचार तो होना ही चाहिए। क्योंकि ये धनबल के आधार पर देश की संप्रभुता पर आक्रमण जैसा मामला है। केंद्र सरकार के संज्ञान में ये बातें हैं। वो देश की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध है, ये संतोष की बात है। बात तो उन एनजीओ और उन नेताओं पर भी होनी चाहिए जो विदेश में जाकर ऐसी ताकतों से मिलते हैं जो धनबल से देश की संप्रभुता को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।         

Saturday, February 22, 2025

भारत और हिंदुत्व के विरुद्ध आर्थिक मदद


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक बयान ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। ट्रंप ने कहा कि भारत में लोकसभा चुनाव 2024 के समय मतदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए अमेरिका की तरफ से करोड़ों डालर दिए गए। उन्होंने ये भी प्रश्न उठाया कि क्या ये धन भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए भेजा गया था। राष्ट्रपति ट्रंप के बयान के बाद इस बात की फैक्ट चेकिंग भी आरंभ हो गई है कि अमेरिका से धन भारत भेजा गया या नहीं। दरअसल अमेरिका की एक एजेंसी है यूनाइटेड स्टेटस एजेंसी फार इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) जो दुनिया के देशों को अलग अलग कारणों से आर्थिक मदद करता है। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतंत्र को मजबूत करने आदि के नाम पर धन दिया जाता है। अधिकतर मामलों में ये आर्थिक मदद स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से की जाती है। कई बार सरकारों को भी धन दिया जाता है कि ताकि वो किसी विशेष कार्यक्रम को चला सकें। प्रश्न ये नहीं है कि अमेरिका से लोकसभा चुनाव के समय धन आया कि नहीं प्रश्न तो ये है कि भारत की जिन संस्थाओं को पूर्व में अमेरिका की एजेंसी यूएसएआईडी के माध्यम से धन मिला उनका इतिहास कैसा है। क्या वो भारत में किसी खास विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए काम करते रहे हैं। क्या वो किसी धर्म विशेष के प्रचार प्रसार में लगी संस्थाएं हैं। जिन गैर सरकारी संगठनों को अमेरिका से पूर्व में धन मिला था क्या उन संगठनों के कर्ताधर्ता किसी राजनीतिक दल से जुड़े हुए हैं। जब भारत में चुनाव के पहले मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा था और ये नैरेटिव गढा जा रहा था कि मोदी सरकार फासिस्ट है तो इस पूरी व्यवस्था के साथ जो लोग थे उनसे जुड़ी संस्थाओं को यूएसएआईडी से कितना धन मिला था। अगर इन बातों की पड़ताल करेंगे तो पूरी तस्वीर साफ हो जाएगी। 

भारतीय चुनव के फंडिंग के पहले हमें जरा वैश्विक राजनीति के विभिन्न कोणों को समझना होगा। 2024 में पूरी दुनिया के 60 देशों में चुनाव होनेवाले थे लेकिन मतदाताओं की संख्या के हिसाब से भारत में सबसे बड़ा चुनाव होने जा रहा था। वैश्विक मंच पर भारत एक शक्ति के रूप में उभर रहा है और भूरणनीति और भूराजनीति की परिधि से केंद्र की ओर बढ़ रहा है। रूस यूक्रेन युद्ध या इजरायल हमास संघर्ष के दौरान भारत ने जिस प्रकार का स्टैंड लिया उससे पूरी दुनिया की निगाहें भारत पर टिकीं। राजनीति में भारत के महत्व बढ़ने और आर्थिक रूप से संपन्न होने से वैश्विक समीकरणों पर असर पड़ा। भारत के लोकसभा चुनाव को लेकर दुनिया के देशों में उत्सुकता थी। भी जानना चाहते थे कि सरकार किसकी बनेगी। मोदी सरकार की विदेश नीति कई विकसित देशों को असहज कर रही थी। भारत ने अपने हितों को आगे रखना आरंभ कर दिया था। चुनाव में अगर जनता किसी अन्य दल को चुनती तो इसका असर वैश्विक भूरणनीति और भूराजनीति पर पड़ता। जी 20 सम्मेलन के दौरान जिस प्रकार से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत को मदर आप डेमोक्रेसी कहा और उसको वैश्विक मंच पर मजबूती से रखा उसने भी लोकतंत्र के रक्षक होने का दावा करनेवाले अमेरिका को असहज किया था। अमेरिका के कुछ धनकुबेर भारत में मोदी सरकार को हटाना चाहते थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से भी इस तरह का बयान भी दिया था। कई संस्थाएं इस कार्य में लग गई थीं। वैश्विक स्तर पर मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने में जुटी । आपको याद दिलाते चलें कि 2021 के सितंबर में अमेरिका में एक आनलाइन सम्मेलन हुआ था जिसको डिसमैंटलिंग हिदुत्व का नाम दिया गया था। इस सम्मेलन में भारत से जिन वक्ताओं का नाम था उनमें से अधिकतर 2015 में असहिष्णुता के मुद्दे पर पुरस्कार वापसी का षडयंत्र भी रचा था। इनमें से जुड़े कई लोगों की संस्थाओं या वो जिन संस्थाओं से जुड़े हैं उसको अमेरिका से फंडिंग मिलने की बात सामने आ रही है। इस तरह के कई कार्यक्रम वैश्विक स्तर पर चलाए जिसके उद्देश्य मोदी सरकार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाने पर लेना था। 

यूएसएआईडी ने उन संस्थाओं को भी मदद की जो भारत में मतांतरण के कार्य में लगे हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़ और यहां तक कि मणिपुर में भी सक्रिय हैं। मणिपुर में जिस तरह हिंसा हुई और जिस तरह से वैश्विक स्तर पर भारत को बदनाम करने के लिए एक नैरेटिव बनाया गया उसके पीछे की मंशा को भी समझना चाहिए। ये सब लोकसभा चुनाव के आसपास हो रहा था। कांग्रेस से जुड़ी रहीं एक महिला ने महिलाओं के विकास के नाम पर संस्था बनाई। उनको पद्मभूषण से सम्मानित भी किया गया और कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा की सदस्यता भी दी गई। उस संस्था को यूएसएआईडी ने आर्थिक मदद की थी। बाद में उनको मैगासेसे सम्मान भी मिला। उस फाउंडेशन को भी मदद दी गई जो कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताता रहा है। इस नैरेटिव को वैश्विक मंच प्रदान करता रहा है। एशिया में काम करने के नाम पर इस फाउंडेशन को करोडो डालर की मदद दी गई। तरह तरह की संस्थाएं भी बनाई गईं। कोई भारत में चुनाव सुधार के नाम पर तो कोई मतदाताओं को बढ़ाने के नाम पर आर्थिक मदद लेते रहे। जार्जजटाउन विश्वविदयालय को भी मदद दी गई। ये विश्वविद्यालय भारत और हिंदुत्व के खिलाफ नैरेटिव बनाने में लगा रहा है। इस विश्वविद्यालय का ब्रिज इनेशिएटिव नाम से चलनेवाले कार्यक्रम को अगर ध्यान से देखा जाए तो आपको उस नैरेटिव की सचाई नजर आ जाएगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अर्धसैनिक संगठन बताने का नैरेटिव यहीं गढ़ा गया। इसको अमेरिकी थिंक टैंक और खुफिया एजेंसियों का समर्थन भी बताया जाता है। अब यहीं से संयोगों का आरंभ भी होता है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी अमेरिका जाते हैं तो इस विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्था ना सिर्फ उनका कार्यक्रम करवाती है बल्कि भारत में लोकतंत्र को लेकर विवादित बयान भी वहीं से आता है। ये विश्वविद्यालय घोषणा करता है कि उसके यहां से ग्रेजुएट करनेवाले छात्र अमेरिकी खुफिया एजेंसी के लिए काम करते हैं। अमेरिका में इसको स्पाई फैक्ट्री के नाम भी जाना जाता है। धर्मिक स्वतंत्रता के नाम पर इस विश्वविद्यालय से जुड़े प्रो नुरुद्दीन ने चुनाव के पहले मणिपुर और भारत में इस्लामोफोबिया के नाम से एक रिपोर्ट जारी की थी। इसके अलावा मोदी मिराज, न्यू स्टडी इंडीकेट्स डिक्लाइन इन इंडियाज ग्लोबल रेपुटशन अंडर बीजेपी नाम से एक रिपोर्ट का सहलेखन भी नुरुद्दीन ने किया। इस रिपोर्ट को लोकसभा चुनाव को प्रभावित करनेवाली रिपोर्ट के तौर पर देखा गया था। बताया जाता है कि इस रिपोर्ट को फ्रेंड्स आफ डेमोक्रेसी ने स्पांसर किया था। इस संस्था को भी यूएसएआईडी से आर्थिक मदद मिलती है। यूएसएआईडी की फंडिंग का ऐसा मकड़जाल है जिसको समझने और समझाने के लिए पूरी किताब लिखी जा सकती है। अब समय आ गया है कि भारत सरकार इस तरह के प्रकल्पों पर नजर रखे और समय समय पर उसको उजागर भी करते रहे। जिन व्यक्तियों या संस्थाओं को लोकतंत्र या धार्मिक सहिष्णुता के नाम पर मदद मिलती है उनपर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।