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Tuesday, March 3, 2009

पचासी साल की जवानी

जॉर्ज बर्नाड शॉ ने अपने एक प्रसिद्ध लेख में लेख में आत्मकथाओं को झूठ का पुलिंदा बताया है । “ऑटोबॉयोग्राफिज़ आर लाइज़” में बर्नाड शा ने कई तर्कों और प्रस्थापनाओं से ये साबित करने की कोशिश की है कि आत्मकथा झूठ से भरे होते हैं । कुछ हद तक बर्नाड शॉ सही हो सकते हैं लेकिन ये कहना कि आत्मकथा तो झूठ का ही पुलिंदा होते हैं, पूरी तरह गले नहीं उतरती । बर्नाड शॉ के अपने तर्क हो सकते हैं लेकिन लेकिन कई ऐसे आत्मकथा हैं जिसमें कूट-कूट कर सच्चाई भरी होती है । लेकिन हमारे लेख का ये विषय नहीं है । हम तो भारतीय फिल्मों के सदबहार हीरो और बीते छब्बीस सितंबर को अपने जीवन का चौरासी बसंत देख चुके देवानंद की आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ - एन ऑटोबायोग्राफी’ के बहाने देवानंद की रूमानी छवि और उनकी फिल्मी जिंदगी को खंगालने की कोशिश कर रहे हैं । अपनी इस आत्मकथा में देवानंद साहब ने अपनी निजी जिंदगी और भारतीय फिल्म जगत के कई राज खोले हैं । देवानंद की छवि एक जबरदस्त रोमांटिक हीरो की रही है । अविभाजित भारत के गुरुदासपुर में जन्मे देवानंद ने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी (आनर्स) करने के बाद लंदन जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने की सोची थी । लेकिन पिता की मुफलिसी की वजह से ये संभव नहीं हो सका । परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर जब देवानंद ने रॉयल इंडियन नेवी में शामिल होने की कोशिश की तो वहां भी असफलता ही हाथ लगी । देवानंद के पिता की इच्छा थी की वो बैंक में क्लर्क की नौकरी कर ले लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और देवानंद फ्रंटियर मेल से बंबई आ गए । फिर शुरु हुआ संघर्ष- यहां भी बनना चाहते थे गायक लेकिन बन गए अभिनेता । इसके बाद जो हुआ वो इतिहास है और फिर देवानंद ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा । देवानंद की पहली फिल्म थी - हम एक हैं - इस फिल्म के रिलीज होते ही देवानंद के अभिय की न केवल नोटिस ली गई बल्कि जमकर तारीफ भी हुई । इसके बाद तो देवानंद, उस दौर के दो सबसे सफल हीरो, दिलीप कुमार और रादकपूर के साथ फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद बन गए और उस दौर की तमाम चोटी की अभिनेत्रियों के साथ फिलमों में तो काम किया ही, रोमांस भी कम नहीं किया । देवानंद और सुरैया के बीच के रोमांस और प्रेम की खूब चर्चा हुई और अब अपनी आत्मकथा – रोमांसिंग विद लाइफ - में देवानंद ने अपनी इस प्रेम कहानी का विस्तार से वर्णन किया है । देवानंद लिखते हैं - "हम दोस्त से गहरे दोस्त और फिर प्रेमी प्रेमिका बन गए, हमारी प्रेम कहानी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था । एक भी दिन ऐसा नहीं होता था जब मैं और सुरैया फोन पर बात नहीं करते थे, मुझे सुरैया से प्यार हो गया था लेकिन उस वक्त सुरैया के परिवार में उसकी दादी का जबरदस्त प्रभाव था और उनकी मर्जी के बिना उस परिवार में पत्ता तक नहीं हिलता था । मुझे लगने लगा कि हमारी इस प्रेम कहानी में सुरैया की दादी बाधा बन रही थी ।मेरा सुरैया के घर में अब पहले जैसा स्वागत नहीं होता था । लेकिन प्यार की तड़प बढ़ती ही जा रही थी । मैं सुरैया के लिए बेचैन होने लगा था । लेकिन उसके परिवार ने हमारे प्यार पर बंदिशें लगा थी मिलने जुलने पर रोक था । एक दिन हम चुपके से एक पानी टंकी के पास मिले और सुरैया ने मुझसे लिपटकर कहा - आई लव यू, आइ लव यू । इसके बाद मेरे पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे । मैंने जवेरी बाजार से सुरैया के लिए एक मंहगी अंगूठी खरीदी और उसे भिजवा दिया । मैं सातवें आसमान पर था लेकिन अपने परिवार के दवाब में सुरैया ने मेकी दी हुई अंगूठी समंदर में फेंक दी ।" देवानंद साहव ने इस प्रेम कहानी को बहुत ही बेहतरीन अंदाज में अपनी आत्मकथा में कलमबंद किया है । इस पूरी किताब से देवानंद की पर्दे पर की जो एक बेहद रूमानी छवि थी वो और भी पुष्ट होती है, प्रामाणिक भी, क्योंकि खुद देव साहब ने अपनी जुबानी अपनी कई प्रेम कहानी और आशिकी को दुनिया के सामने पेश किया है । सुरैया के अलावा देवानंद ने अपने स्कूली दिनों की प्रेमिका से लेकर अबतक की अपनी नायिकाओं और प्रेमिकाओं के बारे में खुलकर लिखा है । चाहे वे टैक्सी ड्राइवर फिल्म की नायिका मोना जो बाद में देवसाहब की पत्नी भी बनी या फिर मुमताज हो या फिर जीनत अमान हो या टीना मुनीम । संजय दत्त की पत्नी ऋचा को फिल्मों में लाने का श्रेय भी देवानंद को ही है । जीनत अमान पर लिखते हुए देव साहब ने इमानदारी से स्वीकार किया है कि जब भी राज कपूर जीनत अमान से लिपटते चिपटते थे तो उनको जलन होती थी । देवानंद को लगता था कि जीनत अमान उनकी खोज है, उनकी नायिका है इसलिए सिर्फ उनकी अमानत है लेकिन जब एक पार्टी में राजकपूर ने जीनत अमान को जब अपने आलिंगन में लिया तो जीनत की जो प्रतिक्रिया थी, उसे देखकर देवानंद का दिल चकनाचूर हो गया ।
देवानंद जब एक नायक के रूप में फिल्मों में कामयाब हो गए तो नवकेतन नाम से अपना बैनर बनाकर फिल्म निर्माण में उतरे और कई नई प्रतिभाओं, टीना मुनीम, तब्बू से फिल्मी दुनिया का साक्षात्कार कराया । फिल्म निर्माण के बाद देवानंद फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे और फिल्म प्रेम पुजारी का निर्देशन किया । देवानंद की फिल्म गाइड, काला पानी, हरे रामा हरे कृष्णा, काला बाजार, जब प्यार किसी से होता है जैसी फिल्में हिंदी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में मील का पत्थर है ।कुछ लोगों का कहना है कि देवानंद ने बाद के दिनों में अपनी फिल्मों में काफी प्रयोग किए और अपने समय से आगे की फिल्में बनाई । बॉक्स ऑफिस पर भले ही बाद में देवानंद की कई फिल्मों को उतनी सफलता नहीं मिली जितनी पहले मिला करती थी लेकिन देवानंद ने अपने स्टाइल के साथ कोई समझौता नहीं किया ।
देवानंद के जमाने में लड़कियां उनपर जान छिड़कती थी । युवाओं में उनके स्टाइल से सिगरेट के कश लेना, गले में मफलर डालना, शर्ट के बड़े –बड़े कॉलर स्कार्फ आदि का जबरदस्त क्रेज था । देव आनंद की जो डॉयलॉग डिलीवरी थी, उनका जो अंदाज था वो अनूठा था, अपनी तरह का अकेला था । उनकी दिलकश अदा और होठों पर शरारती मुस्कराहट काफी कुछ कह जाती थी ।
देवानंद ने अपनी आत्मकथा में फिल्मी हस्तियों के अलावा राजनैतिक हस्तियों का भी जिक्र किया है । खासतौर से इंदिरा गांधी और उनके पुक्ष संजय गांधी का । इंदिरा गांधी के बार में देवानंद ने लिखा है कि वो बहुत ही कम बोलती थी जिसकी वजह से उनके विरोधी इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया कहते थे । देव साहब ने इंदिरा गांधी के साथ कई मुलाकातों का जिक्र किया है लेकिन हर बार उन्हें लगा कि श्रीमति गांधी, नकारात्मक या सकारात्मक किसी भी तरह की कोई प्रकिक्रिया देती ही नहीं है ।
देवानंद साहब को मैंने दो बार नजदीक से देखा है, मिला भी । एक बार तो दो साल पहले मुंबई में एक होटल में हम लोग एक कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, देव साहब भी उसी होटल में थे, हमलोगों को जब पता लगा तो उनसे मिलने चले गए । उनसे मिलकर बाहर निकलते वक्त हम चार लोग यही बात कर रहे थे कि बताओ यार अस्सी में ये हाल है तो तीस चालीस में क्या सितम ढाया होगा । मैंने अपने स्कूल के दिनों में देवानंद की फिल्म काला बाजार देखी थी और देवानंद की वही छवि थी मन पर । उस दिन जब मिलकर निकला तो लगा कि चौबीस पच्चीस साल पहले जिस देवानंद को पर्दे पर देखा था उसी देवानंद से मिलकर निकला हूं । पिधले साल छब्बीस सितंबर को उनकी किताब रिलीज होनी थी तो वो दिल्ली के प्रेस क्लब में वो पत्रकारों से मिले थे । वही जोश, वही जवानी, वही स्टाइल । उसी तरह सवालों के जवाब देने से पहले गले का स्कार्फ स्टाइल से झटकना । मानो कोई हसीना अपने चेहरे पर अनचाहे आए जुल्फ को झटक रही हो ।

2 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

देवानंद के बहाने उनकी आत्मकथा पर अच्छा आकलन प्रस्तुत किया है आपने।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

बड़ी मुश्किल स्थिति है. आपने बात शॉ से शुरू की है और जोड़ दिया है देवानन्द की आत्मकथा से. संयोग से ये दोनों ही मेरे बड़े प्रिय रचनाकार हैं. आपने देवानन्द के बेहद गोपन प्रसंग का उद्धरण भी दे दिया है और यूँ देवानन्द का जो सामाजिक-व्यावसायिक जीवन है, वह उनकी आत्मकथा के शीर्षक को सही भी साबित करता है. तो चलिए मान लेते हैं कि दुनिया में कुछ अपवाद तो होते ही हैं और अपवाद नियम नहीं होते हैं.