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Saturday, April 11, 2026

सांस्कृतिक संस्थाओं का हो पुनर्गठन


मार्च के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में साहित्य अकादेमी ने एक बड़ा साहित्य उत्सव का आयोजन किया। जानकारों के मुताबिक आयोजन पर करीब तीन करोड़ रुपए खर्च होते हैं। संगीत नाटक अकादेमी की बेवसाइट पर कई कार्यक्रमों की सूचना मिलती है। ये संस्था विभिन्न अवसरों पर झांकियों से लेकर परेड का आयोजन करती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय प्रतिवर्ष भारत रंग महोत्सव का आयोजन करता है। इसका बजट भी करीब पांच करोड़ के आसपास रहता है। इस आयोजन का उद्देश्य देश में नाट्य संस्कृति का विकास करना और रंगकर्मियों को एक राष्ट्रीय मंच उपलब्ध करना है। ललित कला अकादेमी की वेबसाइट पर अनेक प्रकार के हो चुके और होनेवाले इवेंट की जानकारी है। ये सभी संस्थान संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ध्यान से देखने पर ये प्रतीत होता है कि ये संस्थाएं इवेंट मैनजमेंट कंपनी बन गई हैं। संस्कृति मंत्रालय के कई इवेंट ये संस्थाएं करवाती हैं। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के समय साहित्य अकादेमी ने रंगोली प्रतियोगिता जैसे अखिल भारतीय आयोजन में सहयोग किया था। अगर अकादमियों से आगे बढ़कर देखें तो संस्कृति मंत्रालय की ही एक और संस्था है सांस्कृतिक स्त्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र। इस संस्था का मुख्यालय दिल्ली में है। इस संस्था के निदेशक का पद जनवरी 2024 से खाली बताया जाता है। इस संस्था को एक सोसाइटी चलाती है। संस्था की वेबसाइट के मुताबिक सोसाइटी के सदस्यों की जगह खाली है। पता नहीं कब से। मंत्रालय के एक अधिकारी प्रभारी निदेशक के तौर पर संस्था का कामकाज देख रहे हैं। साहित्य अकादेमी और ललित कला अकादेमी का कामकाज मंत्रालय के अधिकारी देख रहे हैं। ललित कला अकादेमी के चेयरमैन के अधिकारों को लेकर विवाद हुआ था। जिसके बाद मंत्रालय ने उनके अधिकार कम कर दिए थे। उन्होंने संस्था आना छोड़ दिया। ललित कला अकादेमी एक ऐसी संस्था है जिसके पास अमूल्य कलाकृतियों की धरोहर है लेकिन उनकी उचित देखभाल और सुरक्षा पर प्रश्न उठते रहे हैं।

संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत ही क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र भी आते हैं। भारत सरकार ने सात जोनल कल्चरल सेंटर का गठन किया था। इन संस्थाओं का मूल उद्देश्य स्थानीय लोककलाओं का संरक्षण और संवर्धन था। इन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों का मुख्यालय पटियाला, नागपुर, उदयपुर, प्रयागराज, कोलकाता, दीमापुर, और तंजावुर में है। 2024 में लोकसभा में अपने लिखित उत्तर में संस्कृति मंत्री ने बताया कि संस्कृति मंत्रालय इन क्षेत्रीय सांस्कृति केंद्रों के माध्यम से 14 राष्ट्रीय संस्कृति महोत्सव, चार क्षेत्रीय राष्ट्रीय महोत्सव का आयोजन करती है। इसके अलावा कला और संस्कृति के विकास के लिए कम से कम 42 क्षेत्रीय संस्कृति उत्सवों का आयोजन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्रों के द्वारा किया जाता है। इन केंद्रों के चेयरमैन उन राज्यों के राज्यपाल होते हैं जिस राज्य में क्षेत्रीय केंद्र का मुख्यालय होता है। अगर राज्यपाल की रुचि कला-संस्कृति में है तो कार्य सुचारू रूप से चलता है अन्यथा नहीं। पूर्वी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के चेयरमैन बंगाल के पूर्व राज्यपाल सी वी आनंद बोस थे। उनकी सांस्कृति संस्थाओं के कामकाज में  रुचि कम थी। आर एन रवि के राज्यपाल बनने से कला जगत आशान्वित है। इन सांस्कृतिक केंद्रों का उद्देश्य कला और संस्कृति का संवर्धन और संरक्षण था। आयोजनों से उद्देश्य की आंशिक पूर्ति हो सकती है लेकिन मूल उद्देश्य कैसे पूरा होगा, इसपर चर्चा होनी चाहिए। कुल मिलाकर अगर मोटे तौर पर देखा जाए तो इन केंद्रों ने कला-संस्कृति से जुड़े संस्कृति मंत्रालय के आयोजन किए। 

संस्कृति मंत्रालय से आगे बढ़ते हैं और शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत तीन संस्थानों को देखते हैं, ये संस्थाएं हैं, आगरा स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान, दिल्ली स्थित केंद्रीय हिंदी निदेशालय और मैसूर का केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान। केंद्रीय हिंदी संस्थान का उद्देश्य है हिंदी का विकास और प्रसार। कमोबेश यही उद्देश्य केंद्रीय हिंदी निदेशालय का भी है। केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान का उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं का संवर्धन और संरक्षण है। इसमें हिंदी भी शामिल है। तीनों संस्थान अलग अलग शहरों में हैं। तीनों का प्रशासनिक ढांचा है, तीनों के कर्मचारी और अधिकारी अलग हैं परंतु तीनों के उद्देश्य एक हैं। तीनों एक ही मंत्रालय के अधीन हैं लेकिन तीनों अलग अलग काम कर रही हैं और तीनों में समन्वय न्यूनतम है। इसी तरह संगीत नाटक अकादेमी और भारतीय नाट्य विद्यालय के कई कार्यों में समानता है। दिल्ली में कुछ ही मीटर की दूरी पर इनके कार्यालय हैं लेकिन दोनों संस्थाओं में समन्वय न्यूनतम है, जबकि दोनों संस्कृति मंत्रालय से संबद्ध हैं। ललिता कला अकादेमी और नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट के उद्देश्यों को देखें तो दोनों में कई समानताएं दिखाई देंगी। कामकाज भी एक जसा ही है लेकिन समन्वय न्यूनतम। ये दोनों संस्थाएं भी संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत हैं। कला और संस्कृति से जुड़ी संस्थाओं को देखें तो कई ऐसी संस्थाएं हैं जिनके उद्देश्य लगभग एक हैं लेकिन उनके बीच समन्वय का अभाव है। इन सबके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र भी है जो कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रही है।

स्वाधीनता के बाद देश में जब कला और संस्कृति से जुड़ी हुई संस्थाएं बनने लगीं तो अलग अलग विधाओं के लिए अलग अलग अकादमियों की स्थापना हुई। कालांतर में जब कांग्रेस सरकार ने कला और संस्कृति को वामपंथियों को आउटसोर्स कर दिया तो और संस्थाएं बनीं। अपने लोगों को स्थापित करने के लिए संस्थाएं बनाई जाने लगीं। परिणाम ये हुआ कि संस्थाएं बन गई और मनचाहे लोगों के हाथों में इनकी कमान सौंपी गईं। उद्देश्यों की ओवरलैपिंग के बारे में विचार नहीं किया जा सका। स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद जब भारत विकसित राष्ट्र की राह पर चल पड़ा है तो आवश्यकता इस बात की है कि इन संस्थाओं के क्रियाकलापों पर पुनर्विचार हो। इनके उद्देश्यों को लेकर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। जहां दो संस्थाओं के उद्देश्य एक हैं उनका विलय किया जाना चाहिए। बेहतर तो ये होगा कि कला और संस्कृति से जुड़ी सभी संस्थाओं का पुनर्गठन किया जाए और एक ऐसी संस्था बने जहां अंतराष्ट्रीय स्तर के कार्य हों, शोध हों और उसका प्रचार प्रसार हो। भाषा, संस्कृति और कला से जुड़े अलग-अलग विभाग उस बड़ी संस्था के प्रशासनिक नियंत्रण में हों ताकि समन्वय बेहतर हो सके और कार्यों में दुराव न हो। मंत्रालय आयोजनों से आगे जाकर नीति निर्माण के कार्य में जुटे। भारत की अपनी संस्कृति नीति बनाई जाए। इन संस्थाओं के पुनर्गठन के बाद जिस संस्था का निर्माण हो वो व्यापक स्तर पर कार्य करे। पुनर्गठन के बाद भारतीय संस्कृति के संवर्धन और विकास के लिए अगर एक बड़ी संस्था बनती है तो उसका काम भारत समेत दुनिया के अन्य देशों में भारतीय संस्कृति, कला और लेखन को लेकर जाने का हो। करीब दो वर्ष पहले जब गोविंद मोहन संस्कृति मंत्रालय के सचिव थे तब भारत की संस्कृति के वैश्विक प्रचार प्रसार के लिए नीति बनाने को लेकर दिल्ली के भारत मंडपम में देशभर के विद्वानों ने मंथन किया था। उसके बाद उस पहल का क्या हुआ पता नहीं चल पाया। आज इस बात की आवश्यकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखकर कला संस्कृति, भाषा के लिए काम करनेवाली संस्थाओं का परीक्षण और पुनर्गठन हो। 


Saturday, April 4, 2026

फिल्मों के सामाजिक सरोकार


इस वर्ष जनवरी के आखिर में जब रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी तब दिल्ली से लापता हो रही बच्चियों का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। एक रिपोर्ट के हवाले से ये समाचार चर्चा में आया था कि दिल्ली और आसपास के इलाकों से भारी संख्या में किशोरियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। उस समय आए आंकड़े बेहद डरानेवाले थे। तब भी ये भी कहा गया था कि जिस रिपोर्ट के हवाले से मुद्दा बनाया जा रहा था उसमें गायब हुई लड़कियों की बरामदगी के आंकड़े नहीं दिखाए गए थे। आंकड़ों को लेकर जब चर्चा बढ़ी को दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने एक्स पर एक पोस्ट किया। उसमें लिखा कि, चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया था कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संयोग ऐसा था कि मर्दानी 3 में भी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों से बच्चियों के गायब होने की कहानी थी। दिल्ली पुलिस के पेड प्रमोशन वाले पोस्ट के बाद चर्चा कम जरूर हुईं लेकिन समाचारपत्रों में लड़कियों के गायब होने के बारे में कुछ न कुछ सामग्री प्रकाशित होती रही। गुमशुदा होनेवाली लड़कियों की संख्या के साथ साथ बरामदगी की संख्या भी प्रकाशित हुई। इससे इंटरनेट मीडिया से बना भ्रम कुछ कम हुआ और राजधानी और इसके आसपास के क्षेत्रों के निवासियों में भय भी कम हुआ। 

फिल्म मर्दानी-3 में बच्चियों का अपहरण कर उनको विदेश भेजने और उनपर दवाओं के ट्रायल की बहुत मार्मिक और भयावह कहानी है। फिल्मकार ने ये दिखाने का प्रयास किया है कि मानव तस्करी सिर्फ देह व्यापार के लिए नहीं होती बल्कि इसके अनेक रूप होते हैं। इस फिल्म में बच्चियों का अपरहण किया जाता था और जिनका ब्लड ग्रुप खास किस्म का होता था उसको विदेश ले जाकर उसपर कैंसर की दवाई का टेस्ट किया जाता था। अगवा की गई जिन लड़कियों का ब्लड ग्रुप उस समूह का नहीं होता है उनसे भीख मंगवाने से लेकर अन्य गैरकानूनी कार्य करवाए जाते थे। कैंसर की दवाई का जिन लड़कियों पर टेस्ट किया जाता था उनकी हालत बहुत खराब हो जाती थी और कुछ समय बाद तड़प तड़प कर उनकी मृत्यु होते दिखाया गया। इस सिंडिकेट में लड़कियों के लिए काम करने वाली एक संस्था और उसके प्रमुख की संलिप्तता भी दिखाई गई थी। कहानी थोड़ी फिल्मी भी होती है। जांच कर रही पुलिस आफिसर को सस्पेंड कर दिया जाता है लेकिन वो विभाग के अपने साथियों का साथ श्रीलंका जाकर इस गैंग का खात्मा करती है। फिल्म में कई टर्न और ट्विस्ट हैं, जो फिल्म को रोचक बनाने और दर्शकों को बांधने के लिए किए गए हैं, पर मूल कहानी तो लड़कियों का गिनी पिग की तरह इस्तेमाल करने की ही है। फिल्म की कहानी, संभव है काल्पनिक हो लेकिन मानव तस्करी का जो पहलू इसमें दिखाया गया है उसको देखकर गायब होने वाली लड़कियों को लेकर समाज को चिंतित होना चाहिए। ये अपराध बेहद संगठित और समाज के इज्जतदार लोगों की सरपरस्ती में चलता हुआ दिखाया गया है। वैसे लोग जो पैसे की खातिर किसी की जान को बेचने या जान लेने में नहीं हिचकते हैं। 

फिल्म से वापस समाज में लौटते हैं। तीन चार दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों की तस्करी को लेकर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बेहद कठोर टिप्पणी की। अदालत ने कहा मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसिड्योर) और न्यायिक आदेशों के बावजूद दिल्ली बच्चों की तस्करी की मंडी बन चुकी है। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग से ये जानना चाहा कि बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने एक बेहद ही डराने और चौंकानेवाली बात कही। याचिकाकर्ता ने एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन से एक बच्ची को बचाकर पुलिस को सौंपा गया था। आरोप लगाया गया कि पुलिस ने बचाई गई बच्ची को बाल कल्याण समिति के सामने पेश करने की बजाए उसको वापस तस्करों को सौंप दिया। बाद में वही बच्ची फिर से तस्करों के पास से मिली। अगर ये आरोप सही हैं तो ये हमारे सिस्टम पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है। कोर्ट ने इस आरोप का संज्ञान लिया है। हलांकि इस सुनवाई के दौरान ये बात भी सामने आई कि 2018 से लेकर 2024 के बीच रेलवे सुरक्षा बल ने रेलवे परिसर से 84000 बच्चों को बचाया भी। इस तरह से कई अन्य आंकड़े भी कोर्ट के समझ रखे गए थे। आज जब हमारी पुलिस व्यवस्था अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों और सुविधाओं से युक्त है तब कोर्ट की तस्करी की मंडी बनने जैसी टिप्पणी भयावह है। आज भी अगर बच्चों की तस्करी हो रही है तो उसका किन अपराध में उपयोग हो रहा होगा इस बारे में सोचकर सिहरन होती है। 

कई बार ये कहा जाता है कि फिल्में समाज के लिए संदेश देने का काम करती है। मर्दानी 3 में कम उम्र की लड़कियों का अपहरण करके विदेश भेजने की बात हो या वेबसीरीज डेल्ही क्राइम-3 में कम उम्र की लड़कियों को विदेश में बेचने की कहानी, एक संकेत तो समाज को दिया ही जा रहा है। इस तरह की कहानियां फिल्मों में आ रही हों और उसी समय इस तरह के केस कोर्ट में भी सुनवाई के लिए आ रहे हों तो ये प्रतीत होता है कि फिल्में कुछ तो कहने का प्रयास कर रही हैं। फिल्मों को बहुधा मनोरंजन कह कर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन कई बार उनसे निकलनेवाले संदेश को पकड़ने की आवश्यकता भी है। 1950 में व्ही शांताराम की एक फिल्म आई थी दहेज। स्वाधीन भारत में दहेज की समस्या को लेकर ये फिल्म बनी थी। इस बात की कई बार चर्चा होती है कि बिहार विधानसभा में दहेज की कुरीति पर चर्चा के दौरान इस फिल्म का नाम कई बार आया था। कहा तो यहां तक जाता है कि बिहार में दहेज उन्मूलन कानून बनने के पीछे इस फिल्म की प्रेरणा थी। इस बात में सचाई हो या ना हो लेकिन इतना तो तय है कि व्ही शांताराम ने अपने फिल्म के माध्यम से इस कुरीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया था। फिल्मों से ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। आज अगर मर्दानी-3 में बालिकाओं की तस्करी का मुद्दा उठा है तो समाज को इस घृणित अपराध के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। सरकार और पुलिस तो अपने स्तर पर प्रयास करेंगी, अदालतों में सुनवाई होगीं, आदेश पारित होंगे लेकिन जबतक हमारा समाज इस अपराध के खिलाफ सजग होकर नहीं उठेगा तबतक बेटियों की तस्करी पर लगाम लगा पाना संभव नहीं है। आज जब हमारा देश विकसित बनने की राह पर अग्रसर है तब इस तरह के अपराध की समाज में कोई जगह होनी नहीं चाहिए।    


Saturday, March 28, 2026

रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बेइमानी


इन दिनों पूरे देश में फिल्म धुरंधर, द रीवेंज की सफलता की चर्चा हो रही है। इस फिल्म के निर्देशक आदित्य धर के निर्देशन के साथ-साथ इस फिल्म के कलाकारों के अभिनय की प्रशंसा हो रही है। इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर कमाई का कीर्तिमान रच दिया है। करीब चार घंटे की इस फिल्म को देखने के लिए सिनेमा हाल में दर्शकों की भीड़ उमड़ रही है। फिल्म धुरंधर 2 की सफलता पर कवि-लेखक चेतन कश्यप से बात हो रही थी। धुरंधर के संवाद, पुराने फिल्मी गीतों का बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह उपयोग पर चर्चा हुई। निर्देशक रामगोपाल वर्मा की फिल्म धुरंधर पर की गई टिप्पणी और रणवीर सिंह और अमिताभ बच्चन के अभिनय की तुलना भी की गई। दीवार में अमिताभ बच्चन का दोनों पैर उठाकर टेबल पर रखनेवाले सीन और धुरंधर- 2 में ल्यारी पर कब्जे के बाद रणवीर सिंह का रहमान की कुर्सी पर बैठ कर सामने की टेबल पर दोनों पैर रखने के सीन की तुलना की गई। इसके बाद फिल्म के क्राफ्ट पर चर्चा चली। फिल्म के क्राफ्ट पर चर्चा होते-होते शैलेन्द्र की फिल्म
तीसरी कसम पर कैसे बात चली गई ठीक से याद नहीं। बात रेणु जी की कहानी और फिल्म की कहानी पर होने लगी। मूल कहानी का बड़ा हिस्सा फिल्म में नहीं है। इसी क्रम में चेतन ने बताया कि फिल्म तीसरी कसम की पटकथा तीसरी कसम के नाम से ही प्रकाशित हो चुकी है। तुरंत ही पटकथा की पुस्तक मंगवाई गई। जबतक फिल्म तीसरी कसम की पटकथा आती तबतक रेणु की संपूर्ण कहानियां से तीसरी कसम, अर्थात मारे गए गुलफाम निकालकर पढ़ी गई। चूंकि क्राफ्ट पर बात हुई थी इस कारण यूट्यूब पर उपलब्ध तीसरी कसम देखी। ये सब होने के बाद जब पटकथा वाली पुस्तक आई तो उसको भी पढ़ा। 

पटकथा वाली पुस्तक के पृष्ठ संख्या 96 पर एक दृष्य का वर्णन है। जिसमें नौटंकी देखने के क्रम में एक दर्शक, शिवरतन, हीरामन और लालमोहर के बीच नायिका हीराबाई को लेकर संवाद है। प्रकाशित पटकथा के अनुसार शिवरतन का एक दर्शक की हीराबाई पर टिप्पणी पर संवाद है अरे, पौडर से दांत धो लेती होगी...बड़ी चालाक रंडी है। हीरामन गुस्से में कहता है, ए! क्या बे-बात की बकते हो? कंपनी की औरत को रंडी कहते हो। शिवरतन- एक बार नहीं सौ बार कहेंगे। तुमको इससे क्या? हीरामन- मैं तुम्हारी जीभ खींच लूंगा...। शिवरतन लापरवाही से हंसता है- अरे-जा-जा रंडी के भड़ुए...! हीरामन- मारो साले को! लालमोहर- मारो!! लालमोहर हाथ की दुआली से हर आदमी को पटापट पीटता जाता है। हीरामन शिवरतन को पटककर छाती पर सवार है...आओ! एक-एक की गरदन उतार लूंगा! पलटदास घुस्सा लगाते हुए कहता है – साला! सिया सुकमारी को रंडी कहता है। सो भी हिंदू होकर! धुन्नीराम भाग खड़ा होता है। कलरव, कोलाहल—हल्ला...! हीराबाई पर्दे को हटाकर देखती है और अचरज से उसका मुंह खुल जाता है।...मारपीट जारी है।इस संवाद को पढ़ते ही कुछ खटका। लगा कि कहानी में तो कुछ और है। वापस कहानी पर गया। कहानी में रेणु ने लिखा है- पौडर से दांत धो लेती होगी। हरगिज नहीं। कौन आदमी है बात की बेबात करता है। कंपनी की औरत को पतुरिया कहता है। तुमको बात क्या लगी ? कौन है रंडी का भड़वा ? मारो साले को! मारो! तेरी..! लालमोहर दुआली से पटापट पीटता जा रहा है सामने के लोगों को। पलटदास एक आदमी की छाती पर सवार है- साला, सिया सुकुमारी को गाली देता है, सो भी मुसलमान होकर। रेणु की कहानी में जिस संवाद में मुसलमान कहा जाता है वो पटकथा तक पहुंचते पहुंचते हिंदू हो जाता है। 

लगा कि एक बार फिल्म देखनी चाहिए कि फिल्म के संवाद में क्या कहा गया है। यूट्यूब पर उपलब्ध फिल्म के क्रेडिट में स्क्रीनप्ले नवेंदु घोष का और कहानी-डायलाग फणीश्वरनाथ रेणु का है। फिल्म में गाना आता है, पान खाए सैंया हमार। उसके फौरन बाद ये सीन है। फिल्म के संवाद में न तो हिंदू है न मुसलमान। वहां हीराबाई के दांत पर टिप्पणी है, उसको अपशब्द कहे गए हैं लेकिन सिया सुकुमारी वाला संवाद नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि अगर कहानी में मुसलमान था तो उसको पटकथा में हिंदू क्यों और किसने कर दिया। जानकारों का मानना है कि ये काम संवाद या स्क्रीनप्ले लिखनेवाले कर सकते हैं। शाट लेते समय निर्देशक इंपर्वोवाइज करने के लिए बदलाव कर सकते हैं। रेणु जी ने जब कहानी में मुसलमान लिखा तो पटकथा में उसको हिंदू लिखने का कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आता है। संभव है कि नवेन्दु घोष ने स्क्रीनप्ले लिखते समय ये बदलाव कर दिया होगा क्योंकि वो कम्युनिस्ट थे। हिंदी फिल्मों में कम्युनिस्ट संवाद लेखकों ने इस तरह के कई कारनामे किए हैं। इस फिल्म के निर्माता शैलेन्द्र भी प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय जन नाट्य संघ में सक्रिय थे इस कारण संभव है कि इस बदलाव पर उनको आपत्ति ना हुई हो। अब प्रश्न उठता है कि अगर पटकथा में उक्त संवाद था तो फिल्म में क्यों नहीं है? दो बात हो सकती है, एक तो ये कि इस संवाद को शूट ही नहीं किया गया हो। मारपीट का दृष्य तो है, छाती पर चढ़कर पीटने का भी लकिन उसके बाद ही इतना हो-हल्ला हो जाता है कि थोड़ी देर तक संवाद की गुंजाइश ही नहीं बनती। उसके बाद निर्देशक ने पुलिस की एंट्री करवा दी। दृष्य बदला तो संवाद बदल गए। दूसरी बात ये कि मारपीट के दौरान ये दृष्य शूट किया गया। जब फिल्म सेंसर बोर्ड गई हो तो बोर्ड ने इस संवाद को हटाने के लिए कहा होगा। इस कारण ये संवाद फिल्म में नहीं है। क्योंकि एक हिंदू के मुंह से सिया को गाली दिलवाना आपत्तिजनक है। 

इस पूरे प्रसंग को देखने के बाद ये अनुमान कि.या जा सकता है कि हिंदी फिल्मों में कम्युनिस्ट और कथित प्रगतिशील लेखकों ने रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर जाने क्या-क्या किया। रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर बुरे पात्रों का धर्म बदल दिया जाता रहा। फिल्म की कहानी या दृष्य या संवाद बदल कर हिंदुओं को नीचा दिखाने प्रवत्ति उक्त प्रसंग से गाढ़ी होती है। पूर्व में भी कई फिल्मों के संवाद में हिंदुओं को नीचा दिखाने और मुसलमानों को बेहतर दिखाने की प्रवृत्ति को रेखांकित किया जाता रहा है। अधिकतर फिल्मों में हिंदू पात्रों के सामने मुस्लिम पात्रों को बेहतर दिखाया जाता है। किसी फिल्म में हिंदू पात्र मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ना नहीं चाहता और जब मजबूरी में उसको मंदिर जाना पड़ता है तो भगवान से उसकी खुश होने की बात करता है। किसी देवता की मूर्ति के पीछे खड़े होकर भगवान की आवाज में किसी लड़की से बात करने जैसे दृष्य तो हिंदी फिल्मों के दर्शकों ने देखा ही है। प्रश्न ये उठता है कि जो लोग गंगा-जमुनी तहजीब की बात करते हैं उनमें से अधिकतर इस तरह की हरकतों में क्यों लिप्त नजर आते हैं। स्वंय को तरक्कीपसंद और नास्तिक कहकर नैतिकता की मीनार पर खड़े होकर पूरे देश को भाषण पिलाने वाले लेखक भी इस तरह की रचनात्मक बेईमानी करते पाए जाते हैं। उनसे जब इस बाबत प्रश्न पूछो तो पलटवार करते हुए आपसे पूछेंगे कि क्या आप अपने मुल्क को सीरिया बनाना चाहते हैं। नहीं साहब! हम अपने मुल्क को सीरिया बिल्कुल नहीं बनाना चाहते हैं पर लेखकों से ईमानदार और वस्तुनिष्ठ होने की अपेक्षा अवश्य करते हैं।

Saturday, March 21, 2026

अकादेमी पुरस्कारों से उठते गंभीर प्रश्न


आखिरकार साहित्य अकादेमी ने अपने वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा कर ही दी। जैसी की साहित्य जगत में चर्चा थी उसी अनुसार अरुण कमल, अरविंदाक्षण और अनामिका की जूरी ने हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया को हिंदी के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार देने की घोषणा की। पिछले वर्ष दिसंबर में जब आखिरी समय में नाटकीय ढंग से साहित्य अकादेमी पुरस्कारों की घोषणा रोक दी गई थी तब इसको लेकर कई तरह के कयास लगाए गए थे। कुछ लोग इसको साहित्य अकादेमी की स्वयत्तता से जोड़कर देख रहे थे। कुछ इसको पुरस्कार के स्थगित होने की आशंका से व्यथित थे। घोषणा के समय के आसपास ही मंत्रालय ने साहित्य अकादेमी, ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और संगीत नाटक अकादमी को एक पत्र, फाइल संख्या एकेडी-18/27/2025 एकेएडी, दिनांक 18 दिसंबर 2025 भेजी। इस पत्र में इन संस्थाओं के प्रमुखों को संस्कृति मंत्रालय के साथ जुलाई 2025 में हुई करार (एमओयू) की याद दिलाई गई थी। कहा गया था कि एमओयू के मुताबिक सभी अकादमियां संस्कृति मंत्रालय से विमर्श करके अपने पुरस्कारों का पुनर्गठन करेगी। उसी पत्र में मंत्रालय ने ये भी सूचित किया था कि जबतक पुरस्कारों का पुनर्गठन नहीं हो जाता है, तबतक मंत्रालय की पूर्व अनुमति के बिना प्रकिया नहीं हो सकती। यहां यह प्रश्न उठता है कि इन तीन महीनों में क्या साहित्य अकादेमी की पुरस्कार प्रक्रिया का पुनर्गठन हो गया? 

दरअसल साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों को लेकर विवाद होते रहे हैं। 2024 में सरकार ने सभी अकादमियों के पुरस्कारों को पद्म पुरस्कारों की तरह पारदर्शी बनाए जाने को ध्यान में रखते हुए प्रक्रिया को बदलने को कहा था। जिसमें पाठकों की भी सहभागिता सुनिश्चित करने की बात थी। पहले व्यवस्था ये थी कि हर भाषा के दो विशेषज्ञ संबंधित भाषा की पुस्तकों की आधार सूची तैयार करते थे। इन विशेषज्ञों को भाषा की सलाहकार समिति के सदस्यों के सुझाए गए पैनल के आधार पर अध्यक्ष तय करते थे। अकादेमी ने इस नियम को बदलकर आधार सूची की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। अकादेमी ने 2025 में विज्ञापन प्रकाशित किया था। विज्ञापन के अनुसार लेखक, प्रकाशक या कोई भी व्यक्ति किसी पुस्तक को पुरस्कृत करने की अनुशंसा या सुझाव दे सकता था। विज्ञापन के बाद जब पुस्तकें आ जाती तो अकादेमी ने उनकी सूची संबंधिक भाषा की सलाहकार समिति के सभी सदस्यों को भेजा था। उनसे अनुरोध किया गया था कि उस सूची में से दो पुस्तकों की अनुशंसा करें। सलाहकार समिति के सदस्य स्वयं भी पुरस्कार के लिए सूची से बाहर की पुस्तक भी सुझा सकते हैं। सलाहकार समिति के सदस्यों से प्राप्त सूची को प्राथमिक पैनल को भेजा जाता है। प्राथमिक पैनल का गठन भाषा की सलाहकार समिति के सुझाए गए नामों के आधार पर तैयार पैनल में से अध्यक्ष चुनता है। ये पैनल हर भाषा में 10 लोगों का होता है जो गोपनीय रखा जाता है। प्राथमिक पैनल के सदस्यों से दो-दो पुस्तकों के नाम मांगे जाते हैं। किसी भी भाषा के लिए निर्णायक समिति के सामने प्रथामिक पैनल द्वारा भेजी गई सूची और पुस्तकें रखी जाती हैं। हिंदी में सलाहकार समिति के सदस्य अधिक हैं इस कारण अधिक पुस्तकें आती हैं। 

अब यहां से निर्णायक समिति की भूमिका आरंभ होती है जिसको फाइनल जूरी कहते हैं। इस जूरी के सदस्यों का चयन अध्यक्ष करता है। ये सूची भी संबंधित भाषा की सलाहकार समिति के सदस्य के सुझाए गए पैनल से ही होता है। हिंदी के चूंकि 22 सदस्य आमसभा में होते हैं इस कारण से वो सभी सलाहकार समिति के सदस्य होते हैं। अध्यक्ष अपनी मर्जी से पैनल से तीन सदस्यों का चयन करता है जो पुरस्कृत होनेवाले लेखक की कृति को चुनते हैं। पुरस्कृत कृति का चयन बहुमत से या सर्वसम्मति से होता है। हिंदी के लिए इस बार जो चयन समिति बनी उसमें अरुण कमल और अरविंदाक्षण की विचारधारा वामपंथी है। अनामिका का झुकाव घोषित तौर पर वामपंथ की तरफ नहीं है लेकिन वो बहुधा बहुमत के साथ रहती हैं। अरुण कमल तो लंबे समय तक प्रगतिशील लेखक संघ के पदाधिकारी रहे हैं।  जब दिसंबर 2025 में साहित्य अकादेमी के पुरस्कारों की घोषणा होनेवाली थी और उसको मंत्रालय ने रोका था तो यही दलील दी गई थी कि पुरस्कार प्रक्रिया का पुनर्गठन नहीं हुआ। जबकि उपरोक्त व्यवस्था पिछले वर्ष प्रकाशित विज्ञापन के साथ ही आरंभ हो गई थी। 31 अक्तूबर को अकादेमी के तत्कालीन सचिव सेवानिवृत्त हो गए। 1 नवंबर 2025 को उनकी जगह संस्कृति मंत्रालय की एक अधिकारी ने सचिव का कार्यभार संभाला। जब 2025 के पुरस्कार के लिए पैनल बन रहा था तो मंत्रालय की अधिकारी साहित्य अकादेमी में सचिव के तौर पर तैनात थीं। उनके सचिव रहते ही फाइनल जूरी के सदस्यों को अध्यक्ष ने मनोनीत किया। उनकी देखरेख में भी अकादमी के पुरस्कारों की प्रक्रिया चली। उन्होंने सब जगह हस्ताक्षर किए होंगे ऐसा माना जा सकता है। अकादेमी में मंत्रालय की प्रतिनिधि के तौर पर सचिव का कार्यभार संभाल रही अधिकारी के दस्तखत से एजेंडा बना होगा। उस एजेंडा पर कार्यकारिणी ने विचार किया। फिर पुरस्कारों को अंतिम स्वरूप दिया गया। उसके बाद पुरस्कार की घोषणा के लिए मीडिया के लोगों को आमंत्रण भी प्रभारी सचिव की तरफ से ही गया था। 

प्रश्न ये उठता है कि अगर अकादेमी मंत्रालय के साथ किए गए एमओयू को बगैर माने पुरस्कार की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही थी, तो मंत्रालय की जो अधिकारी सचिव का कार्यभार संभाल रही थीं, उन्होंने आपत्ति क्यों नहीं की। हर बैठक में सचिव की उपस्थिति होती है। अगर एमओयू का उल्लंघन हो रहा था तो सचिव ने मंत्रालय को अलर्ट क्यों नहीं किया?  कार्यकारिणी की बैठक में आपत्ति क्यों नहीं उठाई। एजेंडा पर हस्ताक्षर करते समय अध्यक्ष से प्रश्न क्यों नहीं किए गए। ठीक पुरस्कार घोषित होने के समय ही संस्कृति मंत्रालय को ये याद कैसे आया कि एमओयू का उल्लंघन हो रहा है। अब तीन महीने में ऐसा क्या बदल गया कि पुरस्कृत लेखकों की उसी सूची को जारी कर दिया गया जिसे रोका गया था। दरअसल हिंदी की जूरी का नाम और पुरस्कृत होनेवाली लेखिका ममता कालिया का नाम साहित्य के गलियारे में सबको पता था। कई इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म पर ममता कालिया के नाम की घोषणा भी हो चुकी थी। ममता कालिया की छवि कांग्रेस की पक्षधर और मोदी सरकार की विरोधी की रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय ममता जी के नाम की इतनी अधिक चर्चा हो गई कि मंत्रालय ने पुरस्कार की घोषणा को टालना उचित समझा। अन्यथा मंत्रालय को अब स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि दिसंबर में किस नियम का पालन साहित्य अकादेमी ने नहीं किया जिसका पालन तीन महीने में हो गया? एमओयू के करार के अंतर्गत पुनर्गठन हुआ या नहीं? अगर नहीं तो फिर पुरस्कारो की घोषणा क्यों ? 

दरअसल अगर हम साहित्य और संस्कृति से जुड़ी अकादमियों को देखें तो वहां ऐसे लोग बैठे हैं जो साहित्य से अधिक राजनीति करते हैं। अपने-अपने को पुरस्कार देने का खेल खेला जाता है। इस तरह के आरोप इस कारण भी उचित प्रतीत होते हैं कि हिंदी की सूची को देखने के बाद लगता है कि ममता कालिया की संस्मरणात्मक कृति ‘जीते जी इलाहाबाद’ अपेक्षाकृत कमजोर कृति है। इस सूची में कई ऐसी पुस्तकें थीं जो उनकी कृति से मजबूत हैं। साहित्य अकादेमी को चाहिए कि वो अब अपने नियम को बदलकर कृति के स्थान पर लेखक/लेखिका के समग्र लेखन पर पुरस्कार देना तय करे। पिछले वर्षों में कई बुजुर्ग लेखकों को उनकी कमजोर कृतियों पर पुरस्कार देकर उपकृत किया गया। विचारधारा का पोषण भी। साहित्य अकादेमी में वामपंथ की विचारधारा बहुत गहरे तक है उससे पार पाना मुश्किल है। उन वामपंथियों की पहचान मुश्लिल है जो इन दिनों रामनामी ओढ़कर अकादेमी में राजनीति कर रहे हैं। 


Saturday, March 14, 2026

हिंदी के विरुद्ध ‘पवित्र जिहाद’


कुछ दिनों पूर्व नागिरीप्रचारिणी सभा, बनारस की फेसबुक वाल पर एक रील देखी जिसमें कवि अशोक वाजपेयी के वक्तव्य का एक अंश था। उस रील में अशोक वाजपेयी ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कविता की समझ को रेखांकित किया था। रील देखने के बाद संदर्भ समझने के लिए अशोक वाजपेयी का पूरा भाषण ढूंढा। पता चला कि नागरीप्रचारिणी सभा के तीन प्रकाशनों पर दिल्ली में एक चर्चा का आयोजन था। मंच पर अशोक वाजपेयी और सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल इत्यादि थे। अपने भाषण में वाजपेयी कह रहे हैं कि  वो हिंदी साहित्य के वैध विद्यार्थी नहीं रहे हैं। एक जमाने जब सबलोग आचार्य राaमचंद्र शुक्ल इत्यादि को विधिवत पढ़ते थे वैसे उन्होंने नहीं पढ़ा। कुछ छुट्टा, इधर उधर पल्लवग्राही रूप में पढ़ा। उन्होंने शुक्ल जी के निबंध कविता क्या है की पंक्तियों को पढ़ उसपर टिप्पणी की। जब वो शुक्ल को उद्धृत करते थे तो उनके बगल में मंच पर बैठे व्योमेश दाद दे रहे थे। पूरे प्रसंग की चर्चा मैंने एक मित्र से की। मेरे मित्र काशीवासी और साहित्यिक अभिरुचि के हैं। उनसे अशोक वाजपेयी का कथन बताया कि उन्होंने शुक्ल को विधिवत नहीं पढ़ा है तो उन्होंने गंभीरता से एक प्रश्न पूछा कि ये किसका दुर्भाग्य है ? आचार्य का या अशोक वाजपेयी का। मैं तबतक समझ गया था कि वो ऐसा क्यों पूछ रहे हैं। मैंने छूटते ही कहा कि जाहिर तौर पर दुर्भाग्य तो शुक्ल जी का ही रहा। इतना सुनकर मेरे मित्र जोर से हंसे और बोले कि अगर शुक्ल जी को वो विधिवत और समग्रता में पढ़ लेते तो शुक्ल जी पर बोलने के लिए नहीं आते। ना ही उनके साथ वामपंथी लेखक संघ से जुड़े लोग मंच पर होते। अब मैं थोड़ा विनोद के भाव में आ गया था। मैंने मित्र से पूछा कि उनके कथन का आधार क्या है। उनके अनुसार अगर अशोक वाजपेयी शुक्ल जी के भाषा संबंधी लेखों को विधिवत पढ़ लेते तो शायद नागिरीप्रचारिणी सभा के प्रकाशनों पर बोलने नहीं आते।

दरअसल शुक्ल जी ने हिंदी और उर्दू को लेकर जो लेख नागिरीप्रचारिणी पत्रिका और लीडर जैसी पत्रिकाओं में वर्ष 1908 से 1917 के कालखंड में लिखा उसको अगर वाजपेयी पढ़ लिए होते तो शुक्ल जी की प्रशंसा कर पाते, इसमें संदेह है। शुक्ल जी ने तो हिंदी के विरुद्ध उस समय के मुसलमान नेताओं के वक्तव्यों को पवित्र जिहाद कहा था। वो लिखते हैं कि हिंदी के विरुद्ध अपने पवित्र जिहाद में नवाब अब्दुल मजीद वह हर युक्ति अपनाते हैं, जिसमें उनकी तरह सोचनेवाले व्यक्ति विशेष रूप से निपुण कहे जाते हैं। क्या गलतबयानी, क्या भ्रांतव्याख्या, क्या धमकी, क्या शेखी, क्या स्तुति, क्या निंदा- वे सबका सहारा लेते हैं। यदि सहारा नहीं लेते हैं तो सिर्फ उचित तर्क देने का। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इतने पर नहीं रुकते हैं बल्कि यहां तक कहते हैं कि नवाब साहब जब हिंदुओं को ये याद दिलाते हैं कि पुराने समय में वो मुसलमानों के अधीन थे वहां भी वो ये तथ्य विस्मृत कर जाते हैं कि दिल्ली के मुसलमान बादशाह ब्रिटिश शुरक्षा में आने के पहले मराठों की सुरक्षा में थे। पुराने समय के मुसलमानी साम्राज्य की अपेक्षा सिख और मराठा सम्राज्य जनता की स्मृति में अधिक है। इसके लिए शुक्ल जी इंपीरियल गजेटियर खंड छह का उदाहरण देते हैं। अशोक वाजपेयी ने सही माना कि वो हिंदी के वैध विद्यार्थी नहीं रहे। जो वैध नहीं रहता है वो क्या होता है ये बताने की आवश्कता नहीं है। अशोक वाजपेयी जैसे लोग भारत की सामासिक संस्कृति की बहुत बातें करते हैं। बहुधा गंगा-जमुनी संस्कृति की भी और हिंदी की जगह पर हिंदुस्तानी को प्राथमिकता देने पर जोर देते रहे हैं। इस पर भी शुक्ल जी ने टिप्पणी की थी। वो लिखते हैं कि जो लोग राजनीतिक दृष्टि से हिंदू-मुस्लिम एकता अत्यंत आवश्यक समझते हैं वे एक बीच का रास्ता पकड़कर हिंदुस्तानी लेकर उठे हैं। इस हिंदुस्तानी का समर्थन कुछ उदार समझे जानेवाले मुसलमान और उर्दू की गोद में पले हिंदू भी कर रहे हैं। हम भोली-भाली जनता को उस हिंदुस्तानी से सावधान करना अत्यंत आवश्यक समझते हैं। जो हिंदुस्तानी इन लोगों के ध्यान में है वह थोड़ी छनी हुई उर्दू के सिवा कुछ और नहीं है। उर्दू के सब लक्षण जैसे वाक्य रचना की फारसी शैली, अरबी फारसी के अप्रचलित मुंशी-फहम शब्द अरबी-फारसी के कायदे के बहुवचन इसमें वर्तमान रहेंगे तब तो वह हिंदुस्तानी कहलाएगी अन्यथा नहीं।

आचार्य शुक्ल उर्दू को अलग भाषा मानते ही नहीं थे वो तो उसको हिंदी की ही एक शाखा मात्र मानते थे। इसको लेकर उनकी बहुत कठोर टिप्पणी है- हर विद्वान जानता है कि उर्दू कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है। यह पश्चिमी हिंदी की एक शाखा मात्र है, जिसे मुसलमानों द्वारा अपनी ऐकांतिक रुचियों और पूर्वग्रहों के अनुकूल एक निजी रूप दे दिया गया है। इस प्रकार हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं। ये बात तो गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी कही थी। शुक्ल जी ये भी कहते हैं कि उर्दू ईर्ष्यावश संस्कृत शब्दों से परहेज करती है और केवल अरबी और फारसी से शब्द उधार लेती है। शुक्ल जी उर्दू को सैन्य छावनी से निकलनेवाली भाषा नहीं मानते हैं।  इस तरह की बातों का उपहास करते थे। विचारणीय प्रश्न ये है कि किस तरह से सैयद अहमद ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर राजनीति आरंभ की और उसको एक समुदाय से जोड़ दिया जो विभाजन तक आते आते बहुत गहरा हो गया। शुक्ल जी ही क्यों उस कालखंड के तमाम लेखकों ने उर्दू को लेकर टिप्पणियां की। स्वाधीन भारत में जब गंगा-जमुनी तहजीब के ध्वजवाहकों ने राजनीति से लेकर सांस्कृतिक लैंडस्केप पर अपना अधिकार जमाना आरंभ किया तो उन्होंने रामचंद्र शुक्ल, प्रताप नाययण मिश्र, भारतेंदु, बालकृष्ण भट्ट और महावीर प्रसाद दिविदी जैसे दिग्गजों के हिंदी-उर्दू संबंधी लेखन को नेपथ्य में धकेलने का प्रयत्न किया। हिंदी-उर्दू के विवाद में ये बात भी उभर कर आई थी कि उर्दू को जमानेवाले लोग सायास अपनी लेखन में भारतीय इतिहास ग्रंथों और पुराणों से उदाहरण नहीं लेकर फारसी से लेने लगे थे। यहां ये भी देखा जाना चाहिए कि उस समय नागरी लिपि को लेकर भी एक बड़ा विमर्श हुआ था। नागिरीप्रचारिणी सभा की पत्रिका से लेकर अन्य पत्रिकाओं में भी इस पर चर्चा हुई थी। ये कैसे हो गया कि नागरी में नुक्ता का प्रयोग आरंभ हो गया। अभी प्रकाशित नागिरीप्रचारिणी सभा के मुखपत्र के लेखों में नुक्ता का उपयोग किया गया है। कैसे और क्यों ? विमर्श इस बात पर भी होना चाहिए कि हिंदी में नुक्ता का प्रयोग क्यों ? हिंदी वर्णमाला में तो नुक्ता का स्थान है ही नहीं।   

प्रश्न भाषा का तो है ही उससे अधिक बड़ा प्रश्न ये है कि किस तरह से भारतीय लेखन को ओझल किया गया। बाद की पीढ़ियों को अपने पूर्वज लेखकों के सोच से दूर किया गया। इस तरह की शिक्षा पद्धति बनाई गई कि भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों के लेखन को पीछे धकेला जा सके। इस संदर्भ में कुबेरनाथ राय का नाम लिया जा सकता है। कुबेरनाथ राय ने भारतीय पौराणिक ग्रंथों से उदाहरण लेकर विपुल लेखन किया। उनके लेखन को भी लंबे समय तक अनदेखा किया गया। अब जाकर उनके लेखन पर थोड़ी बहुत चर्चा होने लगी है। अकादमिक जगत में रामचंद्र शुक्ल के हिंदी साहित्य का इतिहास को प्रमुखता दी गई। भाषा संबंधी उनके विचार स्थान नहीं बना पाए। हिंदी को हिंदू और हिंदुस्तान से जोड़कर एक विमर्श खड़ा कर दिया गया। हिंदी राष्ट्रवाद तक की बात की गई और उसपर पुस्तकें प्रकाशित हुईं। जब हम भारतीय सभ्यता की पुनर्स्थापना की बात करते हैं तो साहित्य और भाषा पर पूर्व में हुए विचारों को समग्रता में देखना होगा। बिना उसके हिंदी की विकास यात्रा को नहीं समझा जा सकता है।

Sunday, March 8, 2026

रेडियो को दिए हिंदी के संस्कार


हिंदी साहित्य के इतिहास में डा नगेन्द्र की जब भी चर्चा होती है तो उनको या तो आलोचक के रूप में या दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के धाकड़ विभागाध्यक्ष के रूप में याद किया जाता है। आलोचक के रूप में रस सिद्धांत और कविता की प्रवृत्तियों पर उनके लिखे को हिंदी आलोचना में पर्याप्त प्रतिष्ठा प्राप्त है। उनके निबंधों की भी चर्चा होती है। दिलचस्प बात ये है कि अंग्रेजी में एमए करने के बाद नगेन्द्र ने हिंदी में भी एमए किया और जीवनपर्यंत हिंदी की सेवा में ही लगे रहे। शिक्षक-आलोचक के रूप में उनकी जो ख्याति है उसके सामने उनका हिंदी भाषा को लेकर किया गया कार्य बहुधा अलक्षित रह जाता है। स्वाधीनता के कुछ महीनों पूर्व 1947 के मई के तीसरे सप्ताह में डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो में नौकरी आरंभ की। अपनी आत्मकथा नें डा नगेन्द्र ने लिखा है कि जब उन्होंने आल इंडिया रेडियो में नौकरी आरंभ की तो वहां हिंदी की दुर्दशा थी। वार्ता, नाटक, संगीत सभी अनुभागों में उर्दू का बोलबाला था। नाम उसका हिंदुस्तानी था पर भाषा उर्दू थी। उत्तर भारत में उस समय अंग्रेजी के अलावा हिंदुस्तानी में समाचार प्रसारित होते थे। आल इंडिया रेडियो में उपयोग में आनेवाली भाषा हिंदुस्तानी शुद्ध उर्दू ही थी जिसमें क्रियाओं और विभक्तियों के अतिरिक्त, जो वस्तुत: हिंदी और उर्दू में समान होती है, हिंदी का कोई लक्षण नहीं था। अंतराष्ट्रीय के लिए वैनुलअकवामी, प्रधानमंत्री के लिए वजीरे आजम, गृहमंत्री और विदेश मंत्री के लिए वजीरे दाखिला और वजीरे खालिजा जैसे शब्दों का प्रयोग होता था। स्वागत और धन्यवाद जैसे शब्दों का प्रयोग आल इंडिया रेडियो में वर्जित था। उस समय आल इंडिया रेडियो के महानिदेशक एस ए बुखारी थे। 

देश स्वाधीन हुआ और सरदार पटेल को इस बात का भान था कि रेडियो शिक्षा और संस्कृति के प्रसार प्रचार का प्रभावी साधन है।। उन्होंने गृह मंत्रालय के साथ-साथ सूचना और प्रसारण मंत्रालय अपने पास रखा। आल इंडिया रेडियो के उस समय के महानिदेशक एस ए बुखारी विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए लेकिन बुखारीकालीन भाषा आल इंडिया रेडियो पर चलती रही। बुखारी के बाद राजर्षि टंडन के प्रयास के बाद पी सी चौधुरी की नियुक्ति रेडियो में महानिदेशक के पद पर हुई। उनको सरदार पटेल का पूर्ण समर्थन था। चौधुरी भारतीय संस्कृति और इतिहास के ज्ञाता ही नहीं थे बल्कि उसके अनुरागी भी थे। जब डा नगेन्द्र ने रोडियो में अपनी सेवा आरंभ की तो हिंदी को हिंदी बनाने का प्रयास आरंभ हुआ। डा नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो के उत्तर भारत के स्टेशनों में हिंदी के लेखकों और साहित्यकारों को सलाहकार के रूप में नामित कर जोड़ा। उनको कार्यक्रमों में बुलाया जाने लगा। चुनौती हिंदी समाचार की भाषा को हिंदी में प्रसारित करने की  थी। पहले तो हिंदी के साथ साथ उर्दू की पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग होना शुरू हुआ। जैसे कहा जाता था कि प्रधानमंत्री यानि वजीरे आजम, अंतराष्ट्रीय यानि वैनुलअकवामी। इस तरह के प्रयोग की आलोचना आरंभ हुई। उर्दू अखबारों के अलावा मुस्लिम विद्वानों ने इसका जोरदार विरोध किया। महानिदेशक चौधुरी को इन आलोचकों की मंशा का पता था इस कारण वो डटे रहे और डा नगेन्द्र को हिंदी के अधिकतम शब्दों के उपयोग की छूट दी। उसी दौर में डा नगेन्द्र पर उनके एक सहकर्मी ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि मौलाना अबुल कलाम आजाद के कार्यालय से फोन आया था और वो जानना चाहते थे कि क्या उनका महकमा बदल दिया गया है। दरअसल उस दिन के बुलेटिन में डा नगेन्द्र ने वजीरे तालीम की जगह शिक्षा मंत्री लिखा था जो प्रसारित हुआ था। इन आलोचनाओं और कटाक्षों से डा नगेन्द्र डिगे नहीं और हिंदी को आल इंडिया रेडियो में स्थापित करने का महती कार्य किया। 

डा नगेन्द्र ने चौधुरी के कहने पर सुमित्रानंदन पंत को रेडियो के लिए काम करने को तैयार किया। पंत जब रेडियो के लिए काम करने लगे तो साहित्य जगत के कुछ दिग्गजों ने उनके चयन पर प्रश्न उठाया था। नगेन्द्र अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, भारतीय प्रसारण का इतिहास इस बात का साक्षी है कि पंत जी की नियुक्ति को लेकर शंका सर्वथा निर्मूल थी। पंत जी के ज्योति-स्पर्श से रेडियो का वायुमंडल एक स्निग्ध-स्वर्णिम प्रकाश से दीपित हो उठा। उन्होंने अत्यंत परिश्रम के साथ आकाशवाणी( तबतक आल इंडिया रेडियो का हिंदी नाम आकाशवाणी हो चुका था) के कार्यक्रम का संस्कार-परिष्कार किया और उसे भारतीय संस्कृति का उपयुक्त माध्यम बनाने में अपूर्व योगदान किया। डा नगेन्द्र ने पंत को रेडियो पर प्रसारिक होनेवाले समाचार की भाषा को ठीक करने का श्रेय दिया है। ये उचित भी है लेकिन नगेन्द्र ने आल इंडिया रेडियो के हिंदी के समाचार प्रभाग में हिंदी को स्थापित करने के क्रम में अपमान और प्रताड़ना भी झेलकर डिगे नहीं ये भी उल्लेखनीय है। नेहरू जी का स्वाधीनता की अर्धरात्रि को दिए जानेवाले भाषण के हिंदी अवुवाद को लेकर भी डा नगेन्द्र को कठघरे में खड़ा किया गया था लेकिन उन्होंने उस भाषण के अंग्रजी से हिंदी अनुवाद में सिर्फ कुछ शब्द ठीक किए थे। यह पूरा प्रसंग काफी लंबा है लेकिन स्वाधीनता के बाद हिंदी भाषा को जनप्रिय बनाने में रेडियो और नगेन्द्र की भूमिका का स्मरण करना आवश्यक है।   


Saturday, March 7, 2026

सिनेमा पर बचकानी समझ


लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का केरल में कालेज के छात्रों के साथ संवाद की खबर समाचारपत्रों में प्रकाशित है। राहुल गांधी कह रहे हैं कि फिल्म, टीवी और मीडिया का हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। केरल के कुट्टिक्कनम् में कालेज छात्रों से बातचीत के दौरान जब एक छात्र ने राहुल गांधी से जानना चाहा कि फिल्मों का उपयोग हथियार के रूप में कैसे हो रहा है तो उन्होंने विस्तार से अपनी बात रखी। प्रतिपक्ष के नेता ने फिल्म द केरला स्टोरी 2, गोज बियान्ड का उदाहरण दिया और बताया कि ये अच्छी बात है कि लोगों ने दे केरला स्टोरी 2 को नहीं देखा और सिनेमा हाल खाली रहे। राहुल के अनुसार इस तरह की फिल्में लोगों को बदनाम करने, उन्हें समाप्त करने और समाज में विभाजन पैदा करने जैसे उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है ताकि कुछ लोगों को इससे लाभ हो और दूसरों को नुकसान। राहुल गांधी ने आगे कहा कि भारत इस तरह का बन गया। अब राहुल गांधी जब ये कहते हैं कि फिल्मों का उपयोग हथियार के तौर पर किया जा रहा है और भारत इस तरह का बन गया है तो इससे ये ध्वनित होता है कि ये नई परिघटना है। प्रश्न उठता है कि क्या फिल्मों और वेब सीरीज का उपयोग राजनीतिक हथियार के रूप में नया ट्रेंड है। क्या जब देश केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार या उसकी अगुवाई वाली सरकार थी तो फिल्मों का राजनीतिक हथियार के तौर पर उपयोग नहीं किया जाता था। क्या जब से ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली वेब सीरीज बनने लगी हैं तब से उसमें राजनीतिक स्टेटमेंट नहीं होता है। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से वेब सीरीज में नियमित अंतराल पर वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की सरकार की आलोचना के स्वरों को लक्षित किया जा सकता है। कहना ना होगा कि वेब सीरीज को लेकर किसी प्रकार के प्रमाणन की व्यवस्था नहीं है इस कारण से वहां इस तरह के कंटेंट अधिक दिखाई देते हैं।

राहुल गांधी जब फिल्मों को हथियार के तौर पर उपयोग करने और समाज के विभाजन के उसके उद्देश्य पर बोलते हैं तो कई ऐसी फिल्में याद आती हैं जो कांग्रेस के शासन काल में बनीं और प्रदर्शित हुईं। तब क्या किसी ने कहा था कि वो फिल्में समाज में विभाजन पैदा करने के लिए बनाई जा रही हैं या उसका राजनीतिक उपयोग किया जा रहा है। स्वाधीनता के पहले और स्वाधीनता के बाद कई ऐसी फिल्में बनी जो सत्ता में बैठे लोगों के विचार को या सत्ता का समर्थन कर रही विचारधारा का समर्थन करती थी। नया दौर और मदर इंडिया में किस तरह से फिल्म कला की आड़ में वैचारिकी परोसी गई वो अब किसी से छुपी नहीं है। नया दौर में तो महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज और नेहरू की औद्योगिकीकरण की नीति के टकराव को चित्रित किया गया था। जिसका विश्लेषण बाद में कई फिल्म इतिहासकारों ने किया। ख्वाजा अहमद अब्बास तो घोषित रूप से वामपंथी थे। वामपंथी विचारधारा को पोषित और पल्लवित करनेवाली कहानियां लिखते और बनाते थे। नक्सवाद के कथित संघर्ष को चित्रित करती फिल्म द नक्सलाइट्स बनाई। उसका उद्देश्य क्या था? आमिर खान अभिनीत फिल्म फना आई थी जिसमें कश्मीर में जनमत संगह की बात की गई थी। भारत की जनता को अब भी याद है कि स्वाधीन भारत में किस भारतीय नेता ने सबसे पहले कश्मीर में जनमत संग्रह की बात की थी। अगर हम इतिहास में ना भी जाएं और इस शताब्दी में बनी फिल्मों पर ही नजर डालें तो एक विवादास्पद फिल्म का नाम स्मरण होता है - परजानियां। इस फिल्म को 2002 के गुजरात दंगे की सत्यकथा से प्रेरित बताकर पेश किया गया था। क्या उसमें समाज को बांटने की बातें नहीं थीं। क्या उसमें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को और गहरा करके नहीं दिखाया गया था। इस फिल्म के प्रदर्शन के समय तक तो राहुल गांधी राजनीति में आ चुके थे। फिल्म परजानियां को लेकर राहुल गांधी ने कभी इस तरह का बयान दिया हो, जैसा वो द केरला स्टोरी को लेकर दे रहे हैं, याद नहीं पड़ता है। परजानियां की रिलीज के समय कितना विवाद हुआ था ये अब भी फिल्मों में रुचि रखनेवाले लोगों को याद है। सिर्फ इतना ही क्यों आनंद पटवर्धन की फिल्मों को ही देख लीजिए अनुमान हो जाएगा कि वो किसके विरुद्ध हथियार का उपयोग कर रहे थे। उनकी फिल्मों का मुख्य स्वर हिंदू विरोध होता था। ये पूरा का पूरा कांग्रेस का इकोसिस्टम का हिस्सा था।

राहुल गांधी ने टीवी और मीडिया को भी अपने बयान के लपेटे में लिया है। आज भी अगर वेबसीरीज को देखा जाए तो कई ऐसी सीरीज हैं जिनमें समाज को बांटनेवाले दृश्य या हिंदू मुसलमान के बीच नफरत के संवाद होते हैं। कई बार तो सिस्टम को भी मुसलमानों के विरुद्ध बता दिया जाता है। पाताललोक नाम के वेबसीरीज को देखिए किस तरह से पुलिस को मुस्लिम विरोधी चित्रित किया गया है। इस कारण से जब राहुल गांधी इस तरह की बातें करते हैं तो वो खोखले लगते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वो सिनेमा और मनोरंजन की दुनिया में चलनेवाली राजनीति से अनजान हैं। आज भी कम से कम हिंदी फिल्मों में तो कांग्रेस इकोसिस्टम का ही बोलबाला है। मुक्काबाज जैसी फिल्म में बगैर किसी प्रसंग के संवाद होता है कि वो आएंगे और पीट-पीटकर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय के नारे लगाते हुए चले जाएंगे। संकेत स्पष्ट है कि फिल्मकार किस विचार को कठघरे में खड़ा कर रहा है। आज भी आईसी 814 कांधार हाईजैक जैसी वेबसीरीज बनती है जो पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को लगभग आरोप मुक्त करती है। राहुल गांधी जब फिल्म. टीवी और मीडिया की बात करते हैं तो उनको ये देखना चाहिए कि किस विचार ने कला के लिए कला के सिद्धांत को आगे बढ़ाया और किस विचारधारा ने कला में मैसेज होने की बात आरंभ की। चाहे वो चित्र हो, चलचित्र हो या फिर साहित्य ही क्यों न हो हर जगह सृजन में मैसेज की वकालत की गई थी। जब मैसेज होगा तो किसी न किसी के पक्ष में होगा या किसी के विरोध में। मैसेज तो सामाजिक भी हो सकता है और राजनीतिक भी।

आज राहुल गांधी को द केरला स्टोरी या द कश्मीर फाइल्स जैसी फिल्मों में विभाजनकारी मैसेज दिखता है क्योंकि वो उनकी राजनीति के अनुकूल नहीं है। उनकी और उनकी पार्टी की राजनीति परजानियां और फना जैसी फिल्मों के आधार पर चलती है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सूची को अगर देखा जाए तो ये बात और स्पष्ट हो जाती है। ये तो भला हो कि राहुल गांधी को धुरंधर की याद नहीं आई अन्यथा वो इसको भी नहीं छोड़ते। हिंदी फिल्मों में लंबे समय से हिंदू धर्म प्रतीकों को बदनाम करने के लिए सोची समझी रणनीति के तहत काम किया जाता रहा है, आज भी कुछ लोग कर ही रहे हैं लेकिन चूंकि वो हिंदू विरोधी हैं इस कारण से राहुल गांधी को वो हथियार नहीं लगता है. आज फिल्मों के दर्शक बहुत समझदार हो चुके हैं और वो किसी भी भाषा में अगर उनकी धर्म और संस्कृति के खिलाफ कोई बात आती है तो उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। अयोध्या में भव्य रामलला के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय तमिल में अन्नपूर्णी फिल्म आई थी। उसमें हिंदू विरोधी कहानी थी। दर्शकों ने उसका विरोध किया था। नेटफ्लिक्स को उस फिल्म को अपने प्लेटफार्म से हटाना पड़ा था। जिस दिन राहुल गांधी फिल्मों, टीवी और मीडिया को समग्रता में देखना आरंभ करेंगे वो इसको राजनीति के हथियार के तौर पर उपयोग करना बंद कर देंगे।  

Saturday, February 28, 2026

वंदे मातरम् के खंडित स्वरूप पर सवाल


बंकिमचंद चटर्जी लिखित गीत वंदे मातरम् को पूरा गाने का निर्णय भारत सरकार ने लागू कर दिया है। अब खंडित वंदे मातरम् की जगह पूरा गीत गाया जा सकेगा। कुछ समय पहले इस स्तंभ में भारतीय सभ्यतागत चेतना और मूल्यों के पुनर्स्थापना की बात की गई थी। वंदे मातरम् गीत को पूर्ण स्वरूप में गाया जाना भी उसी दिशा में बढ़ा एक कदम है। 150 वर्ष पहले रचित वंदे मातरम् एक ऐसा गीत है जो पुस्तकों और पत्रिकाओं से निकलकर लोक में व्याप्त हो गया। जो रचनाएं लोक में व्याप्त हो जाती हैं वो अमर हो जाती हैं। कालखंड या समय की सीमाओं से परे जाकर कालजयी हो जाती हैं। वंदे मातरम् ऐसा ही गीत है। खंडित होने के बावजूद बंकिम का ये गीत आजतक जनमानस पर अंकित है। आज जब भारत अपनी सभ्यतागत चेतना को रिक्लेम कर रहा है तो इस गीत को उसके मूल स्वरूप में लाना बहुत आवश्यक था। इस गीत का कई भारतीय भाषाओं में न केवल अनुवाद हुआ है बल्कि असंख्य धुनों पर इसको गाया भी जा चुका है। हिंदी में महावीर प्रसाद द्विवेदी से लेकर सुमित्रानंदन पं तक ने इस गीत का भावानुवाद किया। द्विवेदी जी का भावानुवाद सरस्वती पत्रिता में प्रकाशित हुआ था। इस बात के प्रमाण अनेक पुस्तकों में मिलते हैं कि वंदे मातरम की रचना 1875 में अक्षय नवमी के दिन हुई थी। अक्षय यानि जिसका क्षय न हो। बंगाल में अक्षय नवमी के दिन जगत जननी माता जगद्धात्री की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि मुर्शिदाबाद के लालगोला,जहां बंकिम पदस्थापित थे, के एक मंदिर में मां काली के चित्र को बेड़ियों में जकड़ा हुआ देखकर बंकिम ने उस चित्र को एक रूपक के तौर पर उठाया और इस गीत की रचना की।

बंकिम रचित वंदे मातरम् को लेकर राजनीति 1920 से लेकर 1940 तक होती है। उसके पहले किसी को भी संपूर्ण वंदे मातरम् के पाठ से परेशानी नहीं थी। 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता (अब कोलकाता) अधिवेशन में तो गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पूरा वंदे मातरम् गाया था। 1905 में कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में गोपाल कृष्ण गोखले के कहने पर सरला देवी चौधरानी ने इस गीत को गाया।  लेकिन उस वक्त की सांप्रदायिक राजनीति ने एक साहित्यिक रचना को अपना औजार बनाया । जिस साहित्यिक रचना ने पूरे देश को एक राष्ट्रीय पहचान दी उसको राजनीति ने सांप्रदायिक रंग दे दिया। 17 मार्च 1938 को जिन्ना ने नेहरू को वंदे मातरम के विरोध में एक पत्र लिखा। इसके पहले सिंध के नेता अहमद यार दौलताना ने इसका विरोध किया था। मुस्लिम लीग की तरफ से वंदे मातरम का विरोध बढ़ने लगा था। 16 अक्तूबर 1937 को विश्व भारती न्यूज में कृष्ण कृपलानी ने वंदे मातरम् के विभाजनकारी स्वरूप पर एक विध्वसंक लेख लिखा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस उस लेख को पढ़कर बेहद आहत हुए थे। उन्होंने गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को एक पत्र लिखकर जानना चाहा था कि पत्रिका में प्रकाशित लेख में विचार लेखक के हैं या पत्रिका भी उन विचारों से सहमत है। नेताजी ने तब जवाहरलाल नेहरू से लेकर गांधी जी और माडर्न रिव्यू के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय को भी अपनी भावनाओं से अवगत करवाया था। वंदे मातरम् के अविभाजित स्वरूप पर विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस के नेता दबाव में आ गए। तय किया गा कि गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर से इसपर राय ली जाए। 

रवीन्द्रनाथ ठाकुर को वंदे मातरम् के पहले दो पैराग्राफ पर कोई आपत्ति नहीं थी। उन्होंने तब कहा था कि कविता के बाकी हिस्से के बगैर भी उसकी आत्मा कायम रह सकती है। उन्होंने इस कविता को आनंदमठ से जोड़कर देखा और कहा कि गीत को उपन्यास के साथ मिलाकर इसको देखने से इसपर मुसलमानों को आपत्ति हो सकती है। गुरुदेव ने इस कविता के खंडित स्वरूप की विवेचना करते हुए कहा था कि इसके पहले दो पैरा की स्वतंत्र पहचान हो सकती है और उन दो को पढ़कर भी इसकी भावना बची रहती है। कांग्रेस कार्यसमिति ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मत को आधार बनाकर वंदे मातरम् के खंडित स्वरूप को मान्यता दे दी। मजेदार बात ये 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के कुछ ही दिन पहले नेहरू ने पहली बार आनंदमठ पढ़ा था। पढ़ने के बाद 20 अक्तूबर 1937 को लिखा कि मैंने आनंदमठ का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा ताकि वंदे मातरम् की पृष्ठभूमि जान सकूं। नेहरू ने ये भी स्वीकार किया था कि आनंदमठ की भाषा बहुत कठिन है। बहुत स्थान पर उल्लिखित शब्द उनको समझ में नहीं आए। जब उपन्यास ही समझ नहीं आया तो उसमे वर्णित वंदे मातरम् को खंडित करने का समर्थन क्यों किया गया ये समझ से परे था।    

गुरुदेव के पत्र को ही कांग्रेस ने वंदे मातरम् को खंडित करने का आधार बनाया था। इस कारण गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मत की बंगाल के बौद्धिक जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। उनके मित्र रामानंद चटर्जी ने भी ठाकुर की आलोचना की। उन्होंने माडर्न रिव्यू में गुरुदेव के मत के विरुद्ध संपादकीय लिखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ना तो वंदे मातरम् सांप्रदायिक है और ना ही मुसलमानों के खिलाफ। अन्यय समाचारपत्रों र पत्रिकाओं में भी गुरुदेव के मत के विरुद्ध लेख आदि छपे। तब नेहरू ने ठाकुर के मत के समर्थन में लेख लिखा। बावजूद इसके इन सारी बातों का जिन्ना पर कोई असर नहीं हुआ। वो इस बात पर अड़ा रहा कि वंदे मातरम को नहीं गाया जा सकता है। गांधी भी वंदे मातरम् को लेकर हो रहे विवाद पर क्षुब्ध थे। जुलाई 1939 के हरिजन में लिखे एक लेख में उन्होंने माना कि उनको ये कभी नहीं लगा कि ये (वंद मातरम्) हिंदू टेक्सट है। हम ऐसे समय में हैं जहां सोना भी लोहा लगने लगा है। राजा जी ने भी कहा था कि इससे (गीत को खंडित करने से) कोई लाभ नहीं होगा बल्कि ये भविष्य के विभाजन की नींव बनेगा। राजा जी की आशंका सच साबित हुई। वंदे मातरम् को खंडित करने के करीब 10 वर्षों के अंदर भारत का विभाजन हो गया। 

कुछ दिनों पूर्व महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला की वंदे मातरम् पर आयोजित दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने का अवसर मिला। वहां भी इस गीत को खंडित करने पर चर्चा हुई। मेरे मन में भी कई प्रश्न उठे। क्या किसी कवि को दूसरे लेखक की रचना को विभाजित करने या विभाजित करने के पक्ष में अपना मत देने का अधिकार है। जब हम साहित्यिक रचनात्मकता को परखते हैं तो रचनात्मक या लेखकीय संवेदना की बात भी आती है। क्या बौद्धिक स्वतंत्रता हमें इस बात की अनुमति देता है कि किसी लेखक की मृत्यु के बाद कोई दूसरा लेखक उसकी कृति में काट-छांट के पक्ष में अपना मत दे सकता है। क्या इसपर राष्ट्रव्यापी बहस नहीं होनी चाहिए थी। क्या अकादमिक जगत को वंदे मातरम् के खंडित किए जाने पर नए सिरे से विचार नहीं करना चाहिए। जो कृति स्वाधीनता का मंत्र था उसको खंडित करने का अधिकार राजनीतिक दल को था क्या। क्या मुसलमानों को या मुस्लिम नेताओं को खुश करने के लिए वंदे मातरम् का विभाजन किया गया था। क्या इसको तुष्टीकरण न माना जाए। क्या स्वाधीन भारत में राजनीतिशास्त्र के दिग्गजों ने वंदे मातरम् के विभाजन को तुष्टीकरण के तौर पर देखा। आज जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत की सभ्यतागत मूल्यों की पुनर्स्थापना में लगे हैं तब ये प्रश्न अकादमिक और बौद्धिक जगत के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं। इस चुनौती से मुठभेड़ करना ही होगा ताकि इतिहास की गलतियों पर चर्चा करके देश की नई पीढ़ी को ये बताया जाए कि किस तरह से राजनीतिक लाभ-लोभ के लिए रचनात्मकता और सृजनात्मकता से खिलवाड़ किया गया।            


Saturday, February 21, 2026

साहित्य से छंटती विवादों की धुंध


इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर उपभोक्ताओं के व्यतीत किए जानेवाले समय को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। इन प्लेटफार्म्स की सार्थकता को लेकर पक्ष विपक्ष के तर्क सामने आते रहते हैं। फेसबुक से लेकर एक्स और इंस्टा जैसे प्लेटफार्म पर डाली जानेवाली सामग्री चर्चा कें केंद्र में रहती है। हिंदी साहित्य के अधिकतर लोग फेसबुक पर अपनी मन की बात लिखते हैं। कोई पुस्तकों के बारे में बताता है तो कोई वैचरिक वातें करता है। कुछ कवि अपनी कविताओं का पाठ करके वीडियो फेसबुक पर डालते हैं। स्मार्ट फोन का चलन बढ़ने से और फोन के कैमरे की क्वालिटी बेहतर होने से वीडियो पोस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कई बार फेसबुक पर इतिहास की घटनाओं की जानकारी भी मिल जाती है। कोई चर्चित साहित्यिक प्रसंग और उसपर हुई चर्चा भी अचानक आपके सामने आ जाती है। पिछले दिनों फेसबुक पर स्क्रोल करते समय एक ऐसे ही विवादित प्रंसग की जानकारी मिली। नामवर सिंह और उनके अनुज काशीनाथ सिंह की टिप्पणी और उसपर महाश्वेता देवी का प्रतिकार। ये पोस्ट कोलकाता से निकलनेवाली पत्रिका लहक के संपादक निर्भय देव्यांश की थी। इस पोस्ट में नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह के बयान की चर्चा थी।  उक्त पोस्ट में लिखा था कि लखनऊ में एक पत्रिका के कार्यक्रम में नामवर सिंह ने साहित्यकारों की हैसियत सत्ता के समक्ष कांता यानि जोरू जैसी बताया। वहीं उनके कहानीकार भाई काशीनाथ सिंह ने कहा था कि साहित्यकार गांव के सिवान पर मुंह ऊपर उठाकर भूंकता हुआ कुकूर है। इसी पोस्ट के नीचे बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की अंग्रेजी में लिखी हस्तलिखित प्रतक्रिया थी। जिसका अनुवाद है, मैं यह जानकर बहुत आहत हुई कि सम्मानित लेखक नामवर सिंह ने कहा है कि आज के लेखक सत्ता के समझ लार टपकानेवाले कुत्ते हैं, वे रखैल और जोरू की तरह हैं। उनके छोटे भाई भी उनके इस बयान से सहमत हैं। महाश्वेता देवी ने लिखा कि 29.4.2012 के समाचारपत्र में प्रकाशित समाचार को पढ़कर उनका दिल टूट गया। उन्होंने आगे लिखा कि वो बचपन से ही एक ऐसे भारत में विश्वास करती हैं जिसमें हिंदी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, उर्दू व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का साझा विकास हो। यह संपदा सिर्फ भारत के पास है। महाश्वेता देवी ने अपनी हस्तलिखित नोट पर 4 मई 2012 की तिथि अंकित की थी। 

नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह ने अगर इस तरह का बयान दिया था, महाश्वेता जी के पत्र से तो यही लगता है, तो यह बेहद आपत्तिजनक था साथ ही महिला और साहित्यकार विरोधी भी। हिंदी के शीर्ष आलोचक और प्रमुख कथाकार अगर अपने साथी लेखकों के बारे में इस तरह की बातें करेंगे तो अन्य भाषा के साहित्यकारों की बीच हिंदी जगत की क्या छवि बनी होगी। इस बात की कल्पना की जा सकती है। दरअसल हिंदी में ये देखा जाता है कि जो साहित्यकार शीर्ष पर पहुंच जाते हैं वो अपने साथी साहित्यकारों को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। उनका श्रेष्ठता बोध उनको अहंकारी बना देता है। अशोक वाजपेयी से लेकर रवीन्द्र कालिया तक इसके शिकार रहे हैं। राजेन्द्र यादव इसके अपवाद रहे हैं। वो लेखकों पर तीखा हमला करते थे, नाम लेकर करते थे, लेकिन कभी भी वो समान्यीकरण के शिकार नहीं होते थे। वो इस तरह की गर्वोक्ति नहीं कहते थे कि हिंदी के लेखकों को हवाई जहाज पर मैंने चढ़ाया। जब मैंने निर्भय की फेसबुक वाल पर ये पोस्ट देखी तो मुझे दशकों पहले एक चैनल पर करीब 20 वर्ष हुई परिचर्चा का स्मरण हो उठा। इस परिचर्चा में रवीन्द्र कालिया, ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडे, विभूति नारायण राय, संतोष भारतीय,अखिलेश और मैंने हिस्सा लिया था। चर्चा का विषय था हिंदी साहित्य में विवादों का गिरता स्तर। हिंदी साहित्य में विवादों के स्तर पर होते हुई चर्चा साहित्य के सत्ता केंद्रों तक पहुंच गई। संतोष भारतीय ने रवीन्द्र कालिया से दिल्ली के साहित्यिक मठाधीश के बारे में जानना चाहा।  रवीन्द्र कालिया ने चर्चा का रुख मेरी तरफ मोड़ते हुए कहा था कि अनंत उन मठाधीशों को जानते हैं। अनंत उनको साहित्य का ब्रह्मा विष्णु महेश कहते हैं। मैं उन्हें ऐसा नहीं मानता बल्कि मैं उन तीनों को साहित्य का कफ, पित्त और वात कहता हूं। चर्चा में शामिल सभी लोगों को पता था कि कालिया जी नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव के बारे में बोल रहे थे। आज से करीब तीस वर्ष या उसके भी पहले हिंदी साहित्य में नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव की तूती बोलती थी। नामवर सिंह नियमित अंतराल पर विवादित बयान देते रहते थे। कई बार उन बयानों से लक्षित साहित्यकार या साहित्य समूह आहत भी होते थे। उनके विरुद्ध प्रदर्शन आदि भी होते थे। नरेन्द्र कोहली जी तो जीवनपर्यंत नामवर सिंह के आलोचक रहे और साहित्य को समग्रता में नहीं देखने की प्रवृत्ति के प्रवर्तक भी मानते रहे। अपनी विचारधारा के औसत लेखकों को बढ़ावा देनेवाले और विपरीत विचारधारा वाले लेखकों को हाशिए पर रखनेवाले मठाधीश।

एक बार फिर लौटते हैं नामवर और काशीनाथ सिंह के उक्त बयान पर जिसमें साहित्कारों पर अपमानजनक टिप्पणी की गई। उस टिप्पणी से दोनों भाइयों की मानसिकता का भी संकेत मिलता है। महाश्वेता देवी ने बहुत सधे हुए तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उस समय फेमिनिज्म का इतना जोर नहीं था अन्यथा नामवर सिंह के कथन पर उनकी जमकर आलोचना होती। प्रश्न ये उठता है कि साहित्य में इस तरह की टिप्पणियां शीर्ष पर माने जानेवाले साहित्यकार क्यों करते थे। दरअसल नामवर सिंह जिस कथित प्रगतिशील विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे उसमें महिलाओं को लेकर एक विचित्र भाव था। नामवर सिंह की उक्त टिप्पणी पर याद पड़ता है शायर कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी से जुड़ा एक प्रसंग। शौकत कैफी ने अपनी किताब ‘यादों की रहगुजर’ में लिखा है कि शादी के बाद वो मुंबई (तब बांबे) में एक कम्यून में रहती थीं। उनको एक बेटा हुआ जो टी बी के कारण काल के गाल में समा गया। शौकत पूरी तरह से टूट गई थीं। दुख से उबरने की कोशिश में उनको पता चला कि वो फिर से मां बनने वाली हैं। अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । तब शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी। पार्टी को जब इसका पता चला तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। ये कैसी अमानवीय विचारधारा है। महिलाओं को लेकर कितना असंवेदनशील रवैया। हिंदी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह उसी विचारधारा के लंबे समय तक ध्वजवाहक रहे थे।  

हिंदी में विवादों की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन साहित्यिक सत्ता में जब से मठाधीशी आरंभ हुई तब से व्यक्तिगत टिप्पणियां अधिक होने लगी। व्यक्ति केंद्रित कहानियां पहले से अधिक लिखी जाने लगी। हंस पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के बाद इस प्रवृत्ति को मंच मिला। उदय प्रकाश ने कई ऐसी कहानियां लिखीं जिसके केंद्र में साहित्यकार लेखक थे। अशोक वाजपेयी ने साथी लेखकों पर कई व्यक्तिगत टिप्पणियां कीं। नामवर जी को अचूक अवसरवादी कहा। आज कम से उस तरह के विवाद साहित्य जगत में नहीं हैं। अपमानित करने की मंशा से होनेवाले विवादों का धुंध झंट सा गया लगता है।              


Saturday, February 14, 2026

सभ्यतागत चेतना की पुनर्स्थापना


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए प्रधानमंत्री कार्यालय का शुभारंभ किया। इसका नाम रखा गया सेवा तीर्थ। सेवा तीर्थ के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री ने गणेश पूजा करके कार्यालय में विधिवत प्रवेश किया। भारत में कार्यारंभ के समय भगवान श्रीगणेश की पूजा की परंपरा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय परंपरा का ध्यान रखा। प्रधानमंत्री मोदी भारतीय परंपराओं और विधियों का ना केवल ध्यान रखते हैं बल्कि उसको निजी और सार्वजनिक रूप से बरतते भी हैं। इसको भारत की पारंपरिक और आध्यात्मिक चेतना को वापस लाने का प्रयत्न के तौर पर देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री जब किसी कार्य का आरंभ करते हैं, किसी मंदिर या धर्मस्थल पर जाते हैं तो वहां विधि-विधान के साथ पारंपरिक अर्चना से परहेज नहीं करते हैं। उनके इन कदमों पर कांग्रेस समेत कई अन्य दलों के नेता टीका टिप्पणी करते रहते हैं। उनका आरोप रहता है कि प्रधानमंत्री मोदी हिंदुओं को लुभाने के लिए इस तरह के कार्य करते हैं। इन आरोपों पर कुछ कहना व्यर्थ है क्योंकि हिंदुओं को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री ने कभी भी वस्त्र के ऊपर जनेऊ नहीं पहना। कभी भी दिखावे के लिए ना तो पूजा-अर्चना की ना ही दिखावे के लिए श्रद्धावनत हुए। दरअसल मोदी के विरोधी इस बात को नहीं समझते हैं कि प्रधानमंत्री अपने इन कदमों को सभ्यतागत संघर्ष में एक टूल की तरह उपयोग करते हैं। पिछले बारह वर्षों में मोदी ने सभ्यतागत चेतना को विमर्श के केंद्र में लाने के लिए दिन-रात मेहनत की। आज स्वाधीन भारत के इतिहास में वो ऐसे प्रधानमंत्री के तौर पर दिखाई देते हैं जिन्होंने भारतीय सभ्यता को पुनर्स्थापित करने का ना केवल प्रयत्न किया बल्कि उसमें बहुत हद तक सफलता भी प्राप्त की।। सभ्यतागत संघर्ष में आनेवाली बाधाओं का अनुमान जनता बहुत देर से लग पाता है। पर बाधाएं होती बहुत भीषण हैं। धर्म और आध्यामिकता को विमर्श के केंद्र में लाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने जो कदम उठाए वो रेखांकित करने योग्य हैं। आज हमारी सभ्यता और उसकी विरासत राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। आलोचकों को लगता है कि ये धर्म और राजनीति का घालमेल है लेकिन ये घालमेल नहीं बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटना है। 

भारतीय ज्ञान परंपरा, भारतीय शोध विधि, भारतीय न्याय संहिता...ये सूची बहुत लंबी हो सकती है। ये सभी आज देश में केंद्रीय विमर्श का हिस्सा हैं। जब प्रधानमंत्री मोदी 2047 में विकसित भारत की बात करते हुए आध्यत्मिकता की बात करते हैं तो हमें स्मरण होता है कि यही काम तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी अपने देश में कर रहे हैं। वहां भी धर्म की वापसी को लेकर ना केवल प्रयत्न किए जा रहे हैं बल्कि ईसाई धर्म की ओर युवाओं का लाने के लिए कई तरह के कदमों की घोषणा की जा रही है। कुछ दिनों पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने 17 मई को देशव्यापी प्रेयर डे मनाने के लिए अमेरिकी जनता का आह्वान किया। प्रेयर डे के आयोजन की घोषणा क्यों की गई उसका भी जिक्र राष्ट्रपति ट्रंप ने किया। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों में चर्च जानेवालों की संख्या बढ़ी है। इस खुशनुमा नवीनीकरण को ध्यान में रखते हुए 17 मई को सभी अमरीकियों को नेशनल माल में प्रार्थना के लिए आमंत्रित कर रहा हूं। उस दिन हमलोग फिर से अपने राष्ट्र अमेरिका को ईश्वर की सत्ता के अधीन करनेवाले हैं। अमेरिका में ईसाई धर्म को लेकर पिछले कुछ वर्षों में आकर्षण बढ़ा है। वहां जिस तरह से नास्तिकता के नाम पर, मानवाधिकार के नाम पर, स्वाधीनता के नम पर अराजकता जैसी स्थिति हो गई थी वो भी सभ्यतागत लड़ाई का ही नतीजा था। आज से कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में थर्ड जेंडर और उनके अधिकारों की बात होती थी लेकिन आज वहां स्पष्ट तौर पर कहा जाता है कि दो ही लिंग होते हैं महिला और पुरुष। पुरुष के मां बनने की बात का उपहास सार्वजनिक रूप से वहां के नीतिनियंता उड़ाते रहते हैं। वहां फिर से ईश्वर में विश्वास वापसी, आस्तिकता और परिवार प्रबंधन में दो से अधिक बच्चे पैदा करने की बातें होने लगी हैं। यह अनायास नहीं है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में पिछले सौ वर्षों में सबसे अधिक संख्या में बाइबिल की बिक्री हुई है। हमारे यहां भी तो पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने परिवार में तीन बच्चों को शास्त्रसम्मत और विज्ञान सम्मत बताया था। मुंबई में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने प्रश्नों के उत्तर देने के क्रम में डाक्टरों, मनोविज्ञानियों और जनसंख्या विशेषज्ञों का हवाला देते हुए तीन बच्चों को परिवार के लिए उचित बताया। बच्चों की परवरिश के लिए भी। भागवत ने अमेरिका में प्रकाशित पुस्तक चीपर बाय द डिजायन का संदर्भ दिया था। 

अमेरिका के सेक्रेट्री आफ वार ने कहा कि अमेरिका ईसाई राष्ट्र के तौर पर स्थापित हुआ और वैसा ही बना रहेगा। अमेरिका स्वयं को एक बार फिर से 17 मई को ईश्वर को समर्पित करेगा। भारत में भी जब हिंदू राष्ट्र की बात होती है तो उसको पता नहीं किस किस तरीके से परिभाषित किया जाता है। वेबसीरीज और फिल्मों में हिंदू राष्ट्र की एक गंदी छवि प्रस्तुत की जाती है। पर सरसंघचालक समेत तमाम बड़े हिंदूवादी नेताओं ने ये स्पष्ट किया है कि भारत तो पहले से हिंदू राष्ट्र है और उनके अपने तर्क हैं। यहां हिंदू राष्ट्र में किसी का विरोध नहीं है बल्कि भारत में रहनेवाले सभी को हिंदू मानने की अपेक्षा की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि हिंदू एक जीवन शैली है। मोहन भागवत भी कई बार कह चुके हैं कि पूजा या उपासना पद्धतियां अलग हो सकती है और उससे किसी का भी किसी तरह का विरोध नहीं है। अमेरिका में तो खुलेआम वहां के कांग्रेसजन कह रहे हैं कि शरिया कानून का अमेरिकी मूल्यों के साथ तालमेल नहीं हो सकता है और इसके लिए वहां कोई जगह नहीं है। कांग्रेसमैन ब्रैंडन गिल ने तो सके बाद  स्पष्ट किया कि उनको गर्व है कि वो शरिया मुक्त अमेरिकी काकस का हिस्सा बन गए हैं। 

आज सिर्फ भारत या अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में अपनी जड़ों की ओर लौटने की व्याकुलता देखी जा सकती है। दुनिया के वो देश जो मानवाधिकार से लेकर जेंडर मुक्त बातों की वकालत करते थे आज इनसे दूर होते दिख रहे हैं क्योंकि स्वाधीनता और स्वायत्ता के नाम पर कथित आधुनिक विचारधारा ने पूरी दुनिया में जो अराजकता फैलाई उसका दुष्परिणाम लंबे समय बात सामने आ रहा है। आज भारत की जनता भी इस बात को समझ चुकी है कि उनके यहां भी स्वाधीनता के बाद आधुनिकता के नाम पर जिस तरह से विदेशी विचारों और मूल्यों को सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों ने थोपा उससे उनका हित नहीं हो सका। राष्ट्र को आधुनिक बनाने के नाम पर जिस तरह के विचारों का पोषण किया गया उसने राष्ट्र को परोक्ष रूप से आंतरिक तौर पर कमजोर और विभाजित किया। चाहे वो भाषा के नाम पर हो, शोध प्रविधि और अध्ययन -अध्यापन के नाम पर हो। अपने पौराणिक ग्रंथों में वर्णित सिद्धातों और प्रविधियों को नजरअंदाज कर विदेशी सिद्धातों को अपनाकर भारतीय विचारों को कुंद किया गया। यही कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में भी हुआ था लेकिन अब वहां भी अपनी जड़ों की ओर लौटने की ललक दिख रही है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग भी उसी विचार के हैं। हमारे देश में भी भारतीय पद्धतियों को अपनाने की दिशा में बहुत काम हो चुका है लेकिन गाहे बगाहे अब भी स्वयं को प्रगतिशील कहनेवाले इन कदमों का उपहास करते रहते हैं पर अब उनका ना तो बहुत नोटिस लिया जाता है और ना ही बातों को महत्व मिलता है। 


Sunday, February 8, 2026

युवाओं को लुभा रही पुस्तक


जनवरी में देश के विभिन्न हिस्सों में कई तरह से साहित्यिक आयोजन हुए। दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला का आयोजन, छत्तीसगढ़ की राजधानी में रायपुर साहित्य उत्सव, चेन्नई में पुस्तक मेला और उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साहित्य उत्सव। साहित्यिक आयोजन इस कारण कि वहां लेखकों से संवाद के अलावा पुस्तकों की बिक्री भी हुई। दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में पुस्तकों की बिक्री के अलावा फेस्टिवल आफ फेस्टिवल्स का भी आयोजन हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश के विभिaन्न हिस्सों में आयोजित होनेवाले साहित्योत्सवों ने एक ही मंच पर अलग अलग संवाद सत्र किए। विश्व पुस्तक मेला में पुरी लिटरेचर फेस्टिवल, नालंदा लिट फेस्ट, कोलकाता लिटरेचर फेस्टिवल, भारत लिटरेचर फेस्टिवल आदि ने अपने आयोजन किए। रायपुर साहित्य उत्सव और मुरादाबाद में पुस्तक मेला भी लगा था। लग अलग प्रकाशकों के स्टाल थे। चेन्नई पुस्तक मेला में भी लेखकों से संवाद का कार्यक्रम था। इन सब आयोजनों का स्वरूप अलग था लेकिन एक बात इनमें समान रूप से लक्षित की गई कि पुस्तकों को लेकर समाज में, विशेषकर युवाओं में जबरदस्त आकर्षण देखने को मिला। साहित्य के सत्रों में भी युवाओं की भागीदारी रही। इन आयोजनों ने उस धारणा का निषेध किया कि आज के युवा रील्स देखने में व्यस्त हैं और पुस्तकों और पठन-पाठन में उनकी रुचि घट रही है। ऐसा सिर्फ गमारे देश में नहीं हो रहा है, अमेरिका और यूरोप में भी पुस्तकों की बिक्री बढ़ी है। 

विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली के आयोजकों के मुताबिक इस बार मेले में पिछले वर्ष की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक पुस्तक प्रेमी पहुंचे। पहले ही दिन से वहां प्रकाशकों के चेहरे खिले हुए थे। प्रकाशकों के चेहरे तभी खिलते हैं जब बिक्री अच्छी होती है। तीन चार प्रकाशकों से बात करने पर ये अनुमान हुआ कि पुस्तकों की बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में करीब 30 प्रतिशत अधिक रही है। इस बार विश्व पुस्तक मेला में प्रवेश में कोई टिकट नहीं रखा गया था। कई नवाचार भी किए गए थे। सैन्य इतिहास की थीम पर सजे मेले में सैनिकों की वीरता और शौर्य की कहानियों की पुस्तकें बिक रही थीं, उनपर चर्चा सत्र आयोजित किए गए थे। रेखांकित करनेवाली बात ये रही कि भारत मंडपम में आयोजित पुस्तक मेले में स्वच्छता और अनुशासन का बहुत ध्यान रखा गया था। चेन्नई पुस्तक मेला में बिक्री का आंकड़ा भी उत्साहवर्धक रहा। मुरादाबाद में चार दिनों के आयोजन में सम्मिलित होकर लौटे एक प्रकाशक ने बताया कि स्थानीय होने के बावजूद उनके स्टाल से डेढ़ लाख रुपये से अधिक की बिक्री हुई। रायपुर साहित्य उत्सव के पुस्तक मेले में भी जमकर पुस्तकों की बिक्री हुई। एक प्रकाशक ने तो बताया कि वो जितनी पुस्तकें लेकर आए थे सभी लगभग समाप्त हो गईं। वहां भी युवा खरीदारों की संख्या बहुत अधिक थी। रायपुर् साहित्य उत्सव में तमाशा नहीं था बल्कि साहित्य केंद्र में था। फिल्मों से भी वही लोग आमंत्रित थे जो गंभीर बातें कर सकते थे। इन दिनों आमतौर पर साहित्य उत्सव के नाम पर बीते जमाने के फिल्मी सितारों को आमंत्रित कर लिया जाता है ताकि उनके नाम पर भीड़ जुट सके। रायपुर साहित्य उत्सव और विश्व पुस्तक मेला ने ये साबित किया कि पाठकों को साहित्य और उसकी विधाओं पर गंभीर चर्चा चाहिए। 

जो लोग हिंदी की पुस्तकों को लेकर चिंता प्रकट कर रहे थे उनको भी युवा पुस्तक प्रेमियों ने अपने पुस्तक प्रेम से चौंकाया है। युवाओं के पुस्तकों के पास पहुंचने का मुख्य कारण जो समझ में आता है वो ये कि हिंदी लेखन में विविधता आई है। हिंदी में एक ही तरह की कहानी, कविताओं और उपन्यासों ने पाठकों को दूर किया था। जब से हिंदी लेखन में विविधता आई है और जमकर कथेतर लेखन होने लगा है तो पाठक भी इस ओर आकर्षित होने लगे। अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुदित पुस्तकें भी खूब बिक रही हैं। सिनेमा,स्थानीय कहानियां, तकनीक, विज्ञान आदि पर जिस तरह से पुस्तकें आ रही हैं उसने युवा पाठकों के बीच एक उत्सुकता जगाई है। फिक्शन में भी फार्मूलाबद्ध लेखन के चौखटे को तोड़कर कई लेखकों ने देसी कहानियों और देसी माहौल को रचा। इंटरनेट मीडिया पर पुस्तकों की जानकारियां और चर्चा होने के कारण पुस्तकों का व्यापक प्रचार प्रसार होने लगा। पाठकों के बीच पुस्तकों को लेकर उत्सुकता बनी। ई कामर्स प्लेटफार्म पर तो पुस्तकें पहले से बिक रही थीं अब क्विक कामर्स प्लेटफार्म पर भी पुस्तकें उपलब्ध होने लगी हैं। आप पुस्तक के बारे में सोचें, आर्डर करें और 10 से 15 मिनट में पुस्तक आपके हाथ में पहुंच जाती है। इसने भी समाज में एक वातावरण का निर्माण किया। ये भी प्रचार किया गया कि भारत में युवाओं की एकाग्रता अवधि (कंस्ट्रेशन स्पैन) चंद सेकेंड की रह गई है। जब ये भ्रामक प्रचार फैला तो युवाओँ ने अपनी एकाग्रता अवधि को जांचने के लिए पुस्तकों की ओर लौटना आरंभ किया। परिणाम ये हुआ वो पुस्तकों के नजदीक पहुंचे और उनको पढ़ने में आनंद आने लगा। प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना काल के दौरान पुस्तकों के प्रति रुझान देखने को मिला था। कोरोना काल के समाप्त होने के बाद ये रुझान आकर्षण में बदला। एक और कारण जो समझ में आता है वो ये कि पुस्तकों का प्रोडक्शन भी उन्नत कोटि का हो गया है। अच्छी छपाई और अच्छी प्रिंटिंग और बाइंडिंग के कारण पाठकों को पुस्तकों ने अपनी ओर खींचा। पहले की तुलना में पुस्तकों के मूल्य भी तर्कसंगत हुए। पेपरबैक संस्करण की क्वालिटी भी अच्छी होने लगी है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इन आयोजनों में किशोरों और युवाओं की भागीदारी पुस्तकों के प्रति आश्वस्ति देती प्रतीत होती है।


Saturday, February 7, 2026

जातिसूचक फिल्म शीर्षक पर बवाल


इस सप्ताह मनोज वाजयेपी अभिनीत फिल्म घूसखोर पंडत के नाम पर उठा विवाद उठा। ये फिल्म ओवर द टाप प्लेटफार्म (ओटीटी) नेटफ्लिक्स पर रिलीज होनेवाली थी। उसका ट्रेलर सामने आते ही इसके नाम को लेकर विवाद आरंभ हो गया। कई शहरों में इसके विरुद्ध प्रदर्शन हुए। लखनऊ में केस दर्ज होने और भारत सरकार के दखल के बाद फिल्म के निर्माताओँ ने ना सिर्फ ट्रेलर बल्कि इंटरनेट मीडिया पर मौजूद सभी प्रकार की प्रचार सामग्री हटा ली। फिल्म के निर्देशक ने एक लिखित बयान जारी किया जिसमें अपनी सफाई दी। कहा कि फिल्म का टाइटल एक कालपनिक चरित्र को ध्यान में रखकर तय किया गया था। फिल्म के शीर्षक किसी समुदाय विशेष को लक्षित करने के इरादे नहीं रखा गया था। अपने लंबे बयान में नीरज ने अपने पूर्व के कामों को भी याद किया। ये भी स्वीकार किया कि इस फिल्म के शीर्षक से कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। वो लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए फिल्म से जुड़ी सभी प्रचारात्मक सामग्री हटा रहे हैं। जल्द ही फिल्म को दर्शकों के सामने पेश करने का भरोसा भी दिया। अपने बयान में नीरज ने कंटेंट के इंटेट की बात भी की। प्रश्न ये उठता है कि बार-बार हिंदुओं को ही क्यों लक्षित किया जाता है। नीरज पांडे को ऐसी कहानी कैसे मिली कि उसमें पंडत को ही घूसखोर दिखाया गया। क्या नीरज पांडे कभी ऐसी कहानी पर काम कर पाएंगें या ऐसी फिल्म बनाने का साहस कर पाएंगे जिसका शीर्षक घूसखोर मौलाना या भ्रष्ट पादरी होगा। उत्तर नकारात्मक ही होगा।

नीरज पांडे की इस फिल्म ने एक बार फिर से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की मंशा पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। एक बार फिर से ओटीटी प्लेटफार्म के नियमन को लेकर चर्चा होने लगी है। क्या ओटीटी के लिए भी किसी प्रकार के प्रमाणन या नियमन की आवश्यकता है। ये पहली बार नहीं हो रहा है कि ओटीटी प्लेटपार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर जनता का गुस्सा फूटा हो। इसके पहले भी याद करिए जब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित होनेवाला था तो उसके कुछ दिनों पूर्व नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको कहा गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क ये दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए उसने नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्य पर मुकदमा हुआ। केस के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। ये सब कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर हुआ लेकिन 22 जनवरी को श्रीरामजन्मभमि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के पहले इस तरह के कंटेंट का आना इंटेंट पर प्रश्न तो खड़े करता ही है। सिर्फ नेटफ्लिक्स ही क्यों प्राइम वीडियो पर जब वेबसीरीज तांडव रिलीज हो रही थी तब उसको लेकर भी काफी हंगामा हुआ था। लखनऊ में केस दर्ज हुआ था। प्राइम वीडियो से जुड़ी अपर्णा पुरोहित से लखनऊ पुलिस ने पूछताछ भी की थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुरोहित को अग्रिम जमानत देने से मना कर दिया था। पिछले कई सालों से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाई जानेवाले वेब सीरीज की सामग्री और फिल्मों को लेकर विवाद होते रहे हैं। हिंदू धर्म प्रतीकों के गलत चित्रण के आरोप लगते रहे हैं। दरअसल स्वनियमन या त्रिस्तरीय नियमन के नाम पर जो व्यवस्था बनाई गई है उसमें बहुत सारे झोल हैं। उन्हीं झोल का फायदा ये प्लेटफार्म्स उठाते रहे हैं। यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर समाज का एक वर्ग उद्वेलित था। ऐसे वातावरण में घूसखोर पंडत की घोषणा ने उनके जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया।

एक दूसरा समाचार जो दिल्ली पुलिस के हवाले से सामने आया। समाचार था दिल्ली से गायब होनेवाली लड़कियों और महिलाओं को लेकर। अचानक इंटरनेट मीडिया पर इस खबर ने जोर पकड़ा कि दिल्ली से भारी संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। रिपोर्ट को इस तरह से प्रस्तुत किया गया कि अमुक अवधि में अमुक संख्या में लड़कियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। सामने आए आंकड़े डरानेवाले थे। रिपोर्ट आधारित समाचार में गुमशुदा लोगों की बरामदगी का उल्लेख नहीं था। बाद में इन आंकड़ों पर विमर्श बढ़ा। देश की राजधानी में जब ये विमर्श बढ़ा तो दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करके बताया कि चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ये स्पष्ट तो नहीं है कि कौन इस तरह का वातावरण बनाकर लाभ कमाना चाहता है। संयोग है कि इसी समय फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी। इस फिल्म की कहानी भी गुमशुदा लड़कियों और उनकी बरामदगी की है जिसमें रानी मुखर्जी लीड रोल में है। कैसे लड़कियां गायब होती हैं और किन-किन गैंगों का इसमें हाथ रहता है। यह बिल्कुल नहीं कहा जा रहा है कि मर्दानी फिल्म को लाभ पहुंचाने के लिए ही दिल्ली में लड़कियों के गायब होने की रिपोर्ट पर चर्चा हुई। अगर दिल्ली पुलिस कह रही है कि उस रिपोर्ट को प्रचारित करना पेड प्रमोशन का हिस्सा है तो उसको इसकी जांच तो करनी ही चाहिए। पेड प्रमोशन में हिस्सा लेकर लाभ कमाने की कोशिश करनेवालों को दिल्ली पुलिस को सामने लाना चाहिए।

एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि प्रचार के लिए घूसखोर पंडत नाम रख दिया गया। इस तरह के तर्क के बाद दर्शक ये सोचने को विवश हो जाता है कि क्या फिल्मकारों को अब अपनी कला पर भरोसा नहीं रहा। क्या उनको अपनी स्टोरीटेलिंग पर विश्वास नहीं रहा और वो प्रचार के विभिन्न हथकंडों को अपनाने लगा। फिल्म धुरंधर ने 1000 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया लेकिन फिल्म को सफल बनाने के लिए निर्देशक आदित्य धर ने किसी प्रकार के सनसनी फैलाने वाले हथकंडे का उपयोग नहीं किया। आदित्य धर कहानी कहने के अपने हुनर और फिल्म की कहानी पर भरोसा था। दर्शकों ने उस भरोसे को सही साबित किया। धुरंधर को लेकर भी कुछ लोगों ने नकारात्मक प्रचार करने की कोशिश की लेकिन उसको दर्शकों ने नकार दिया। हिंदी फिल्मों में जब से भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े लोग कहानी और गाने लिखने लगे तब से ही सनातन धर्म प्रतीकों का उपहास बढ़ा। इस स्तंभ में पिछले दिनों जावेद अख्तर से पूछे गए प्रश्न की चर्चा की थी। वो प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि क्या लेखक का मजहब उसकी कृति को प्रभावित करती है। अब उस प्रश्न का दायरा और बढ़ा देता हूं कि क्या लेखक की विचारधारा कहानी में जबरदस्ती अपने विचार ठूंसती है।