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Saturday, August 15, 2026

दिमागी नक्सलियों से निपटने की चुनौती


स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किला की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही, जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नक्सलवाद, माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया। नक्सलवाद ने चार-पांच दशक तक हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से को, बहुत बड़ी आबादी को दबोच कर रखा। बंदूक की नोक पर दबोच रखा था। संविधान की धज्जियां उड़ा दी थीं। देश के समान्य नागरिकों की रक्षा में 3500 से ज्यादा सुरक्षा बल के जवान शहीद हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि उनको खुशी है कि नक्सलवादी-माओवादी हिंसा को आखिरी सांस लेने की ताकत भी नहीं बची। जहां पर कभी नक्सलियों की गोलियां चलती थी, जहां कभी धरती रक्त रंजित रहा करती थी, आज उन्हीं नक्सल क्षेत्रों में विकास, विश्वास और प्रयास का तिरंगा लहरा है। यहां तक तो प्रधानमंत्री अपनी सरकार की सफलता के बारे में बात कर रहे थे लेकिन इसके बाद प्रधानमंत्री ने जो कहा उसपर वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हथियारी नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल बचे हैं। दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। वो हिंसा और अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव चल रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा। सुरक्षित भारत बनाना हम सबका दायित्व है। चुनौती सीमा के भीतर हो या सरहद के बाहर भारत हर परिस्थिति के लिए तैयार है।

प्रधानमंत्री की उपरोक्त बातों के आलोक में हम पिछले तीन चार महीने में घटी घटनाओं पर नजर डालते हैं। सबसे पहले अयोध्याजी के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी के प्रकरण को देखते हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय अपराध था। इसमें लिप्त लोगों की गिरफ्तारी हुई। सभी जेल में हैं। विशेष जांच दल इसकी पड़ताल में जुटा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस केस पर नजर रखे हुए हैं। ये आपराधिक घटना कोई साधारण अपराध नहीं है इस कारण अपराधियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और उनको कठोर दंड भी मिलना चाहिए। अब इसका दूसरा हिस्सा देखते हैं जो इस अपराध से अधिक खतरनाक है। चढ़ावा चोरी की घटना को सनातन से जोड़ कर सनातन को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। संसद परिसर में एक निर्दलीय सांसद ने भगवा पहनकर सनातन के प्रतीकों के साथ सनातन को बदनाम करने के लिए एक प्रहसन किया। इस प्रहसन में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने पात्र के तौर पर हिस्सा लिया। हिंदुओं के आराध्य प्रभु श्रीराम की तस्वीर जिस तरह से जमीन पर गिराकर अपमान किया गया उसको भी याद रखा जाना चाहिए। सनातन पर आक्रमण करके भारत की आत्मा पर चोट पहुंचाने का प्रयास किया गया। भारत की सभ्यता और संस्कृति पर चोट की गई। भारत विचार पर कुठाराघात किया गया। सनातन को कठघरे में खड़े करने का विचार दिमागी नक्सलियों का हो सकता है। उन्होंने इसकी रूपरेखा तय की होगी और कुछ दलों को चुनावी लाभ का स्वप्न दिखाया होगा। दिमागी नक्सली जब किसी को अपने कब्जे में लेते हैं तो सबसे पहले उसके दिमाग पर कब्जा करते हैं। फिर उसको लाभ होने या दिलाने का आश्वासन देकर अपने जाल में फांसते हैं। इस बात की चिंता किए बगैर कि उसके इस कदम के देश कितना और किस हद तक प्रभावित होगा। चढ़ावा चोरी प्रकरण में पूरे देश ने दिमागी नक्सलियों की इन करतूतों को देखा कि कैसे एक आपराधिक घटना को सनातन से जोड़कर उसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया गया।

दूसरा उदाहरण दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए युवाओं के प्रदर्शन के बाद की घटनाओं के विश्लेषण से निकलता है। अब ये बात लगभग स्पष्ट हो चुकी है कि जंतर-मंतर के आंदोलन का जिन लोगों ने नेतृत्व किया उनका सिरा आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ था। यहां तक तो ठीक था। किसी भी राजनीतिक दल को ये अधिकार है कि वो अपने दांव पेंच से अपने राजनीतिक विरोधियों को घेरे, कभी सामने से आकर और कभी परोक्ष रूप से। पर जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान वहां जिस तरह के नारे लगे। जिस तरह के भाषण दिए गए उसके पीछे की मंशा साफ थी। जंतर-मंतर पर नारे लगे कि मेरा लिंग मेरी मर्जी, मेरा जेंडर मेरी मर्जी, मेरे कपड़े मेरी मर्जी। वहीं कुछ प्रदर्शनकारियों के बयानों के निहितार्थ परिवार और शादी नाम की संस्था को चुनौती देनेवाले थे। एक तरफ एक संस्था पिछले सौ वर्षों से भारत और भारतीयता को लेकर आगे चल रही है। अपनी संस्था के सौ वर्ष पूरे होने पर परिवार नाम की संस्था को बल प्रदान करने के लिए कुंटुब प्रबोधन जैसा देशव्यापी कार्यक्रम चला रही हो, जिसमें नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, भाषा और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बताए जाते हों ताकि राष्ट्र मजबूत हो सके। दूसरी तरफ दिमागी नक्सली परिवार नाम की संस्था को ही खारिज करते हैं। वो किशोरों और युवाओं के मन में स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता का बीज बोना चाहते हैं। ये दो तरह के विचारों की लड़ाई है। एक भारतीय विचार जो परिवार को जोड़कर राष्ट्र को मजबूत करना चाहता है और दूसरा जो परिवार को कमजोर करके देश को कमजोर करना चाहता है। कहा भी जाता है कि देश एक बड़ा परिवार है और परिवार एक छोटा देश है। तो सनातन से लेकर भारतीय मूल्यों पर हमला करना ही दिमागी नक्सलियों का ध्येय है।

अर्बन नक्सल वो होते थे जो परोक्ष रूप से माओवादी हिंसा का समर्थन करते थे। उनके पक्ष में माहौल बनाकर देश के युवाओं को गुमराह करके माओवाद के रोमांटिसिज्म की ओर ले जाते थे। दिमागी नक्सल वो हैं जो अकादमिक जगत में भारतीय ज्ञान परंपरा का विरोध करते हैं। उसको दकियानूसी और रूढ़ीवादी बताकर खारिज करते हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के 12 वर्षों में अकादमिक जगत में ये दिमागी नक्सल कमजोर अवश्य हुए हैं लेकिन अपनी उपस्थिति का एहसास समय-समय पर करवाते रहते हैं। सरकारी सिस्टम में भी इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। विशेषकर शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में तो ये अब भी सक्रिय ही नहीं ताकतवर भी हैं। दिमागी नक्सलियों ने कमजोर पड़ने की आशंका में रणनीति बदल ली है। अब वे तिलक लगाकर सनातनी होने का स्वांग रचकर अपनी पहचान छिपाते हैं। तमाम तरह के लाभ लेते हैं। समय आने पर राष्ट्रवादी ताकतों का परोक्ष रूप से विरोध करते हैं और उनको अपने लक्ष्य से दूर करने के लिए राह में रोड़ा भी अटकाते हैं। कई बार तो बहुत साफ दिखता है कि ये हो रहा है लेकिन सिस्टम में दिमागी नक्सलियों की मजबूककी के कारण कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए प्रधानमंत्री की चेतावनी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। देश में सक्रिय दिमागी नक्सलियों की पहचान करने और उनको आइसोलेट करने का कार्य समाज को भी करना होगा। जब तक सामाजिक रूप से ये आइसोलेट नहीं होंगे तबतक वो रूप बदल बदलकर किशोरों और युवाओं को भटकाते रहेंगे।

 

Saturday, August 8, 2026

संप्रुभता को डिजीटल चुनौती


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फेसबुक पर की गई पोस्ट को थोड़े समय के लिए हटाने के लिए फेसबुक चलानेवाली कंपनी मेटा ने भारत सरकार से माफी मांग ली है लेकिन इससे पूरा प्रकरण समाप्त नहीं हो जाता। इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले प्लेटफार्म्स के बारे में गंभीरता से विचार ही करने और एक ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है। जंतर-मंचर पर छात्रों के नाम पर जो आंदोलन हुआ और उसमें इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका रही उसपर राष्ट्रव्यापी बहस की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की व्यंग्यात्मक टिप्पणी के बाद अमेरिका में बैठा एक व्यक्ति काकरोच जनता पार्टी के नाम से इंस्टाग्राम हैंडल बनाता है। 78 घंटे में इस हैंडल को तीस लाख फालेवर्स मिल जाते हैं। कुछ और समय में ये संख्या दो करोड़ बीस लाख तक पहुंच जाती है। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि क्या आर्गेनिक रूप से इतने फालोवर्स इतने कम समय में किसी भी हैंडल को मिल सकते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न स्त्रोतों के अनुसार भारत में इंस्टाग्राम पर करीब 55 करोड़ सक्रिय उपभोक्ता हैं। इस समूह में सबसे बड़ी संख्या 25-34 आयुवर्ग के उपभोक्ताओं की है और उसके बाद 18-24 वर्ष के यूजर्स है। इलके अलावा भारत में फेसबुक के करीब 70 करोड़ यूजर्स हैं। व्हाट्सएप का प्रयोग करनेवाले 85 करोड़ लोग हैं। ये तीनों प्लेटफार्म मेटा कंपनी के अंतर्गत आते हैं। मेटा अमेरिका की कंपनी है। 

इस पृष्ठभूमि में जंतर मंतर पर जुलाई में हुए काकरोच जनता पार्टी के धरने को देखते हैं। दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना आरंभ होता है। बहुत समर्थन नहीं मिलता है। काकरोच जनता पार्टी के लोग पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर मंतर पर लाते हैं। उनके अनशन पर बैठने के बाद उनके स्वास्थ्य को लेकर चर्चा होती है। काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को समर्थन मिलने लगता है लेकिन अपेक्षित नहीं। इंटरनेट मीडिया विशेषकर इंस्टाग्राम पर इस आंदोलन को लेकर रील आदि दिखने लगते हैं। काकरोच जनता पार्टी 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा करती है। अनशन के कारण सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने लगती है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर रीलों की संख्या बढ़ने लगती है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से उठाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवा देती है। सुबह हुए पुलिस एक्शन की खूब सारी रीलें और वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल होती हैं। उन अकाउंट्स पर भी ये रीलें दिखने लगती हैं जो कभी इस तरह की रील नहीं देखते थे। मेरे एक मित्र ने बताया कि वो सिर्फ फिल्मों और पर्यटन से जुड़ी रीलें देखते थे लेकिन उन दिनों उनके वाल पर जंतर मंतर की ही रीलें दिखती थीं। आमतौर पर ये माना जाता है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म एक अल्गोरिथम से काम करता है और आप जिस तरह का वीडियो देकते हैं उसी तरह के वीडियो आपको दिखाता है। सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती करवाने के बाद उन अकाउंट्स पर भी जंतर मंतर से संबंधित वीडियो दिखने लगे थे जिनकी रुचि इनमें नहीं थी। रीलों  के माध्यम से माहौल बनाया जाने लगा। इसके बाद ही जंतर मंतर पर भीड़ बढ़ने लगी थी। ये कसेंट मैनुफैक्चरिंग का उदाहरण है। इंटरनेट मीडिया के माध्यम से आंदोलन को गति दिया जाने लगा। 

इंटरनेट मीडिया के माध्यम से साइकोलाजिकल टेकओवर आफ पालिटिकल कंज्यूमर का खेल आरंभ हो चुका था। बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से किसी के भाषण का अंश, सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से उठाकर ले जाने का विजुअल, किशोर छात्रों का सरकार के विरुद्ध बयान रील के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचने लगे थे। भारत में यह एक नए तरह का प्रयोग था। इसके पहले विश्व के कई देशों में इस तरह के प्रयोग हो चुके हैं। बंग्लादेश और नेपाल में तो हाल ही में ऐसा हुआ था। योजना इस तरह से बनाई जाती है कि पहले कोई मुद्दा उठाया जाता है। इस बार पेपर लीक को मुद्दा बनाया गया। पेपर लीक ऐसा मुद्दा है जिससे युवा वर्ग सीधे जुड़ता है। इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में सत्ता विरोधी माहौल बनाया जाने लगा। शासक को तानाशाह बताकर उसकी छवि गढ़ने का प्रयत्न किया गया। डिजीटल के माध्यम से इस तरह के बयानों को प्रसारित और प्रचलित करवा कर इस छवि को गाढ़ा करवाया जाता है। सारा खेल लोकतंत्र को बचाने की आड़ में खेला जाता है। 

नेपाल और बंगलादेश के अलावा 2010 में मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में अरब स्प्रिंग का खेल हुआ था। 17 दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया में हुई घटना को याद करने की आवश्यकता है। एक ठेलेवाले के साथ हुए दुर्वव्यवहार पर विरोध का स्वर उठा। पूरे देश में ये इतनी तेजी से फैला कि वहां के राष्ट्रपति को 14 जनवरी 2011 को देश छोड़कर भागना पड़ा। ये सिर्फ ट्यूनीशिया की कहानी नहीं है। ऐसा कई देशों में हुआ। सब जगह सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट एक जैसी है। 2024 के चुनाव में जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने अपना अलगोरिथम बदला, जिस तरह से मोदी विरोधियों को प्रमुखता मिली वो एक अलग शोध की मांग करता है। डिजीटल और सोशल सेक्टर को साथ लेकर सरकार बनाने और गिराने का अंतराष्ट्रीय खेल खेला जाता है उसके बारे में चर्चा होनी चाहिए। भारत में भी बार-बार वो शक्तियां इस तरह का षडयंत्रकारी खेल रचती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी को तानाशाह बताया गया। नागरिक अधिकारों की कटौती और संविधान बदलने जैसे विमर्श केंद्र में आए। मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद ये वैश्विक ताकतें निष्क्रिय नहीं हुई हैं। निरंतर सरकार विरोधी माहौल बनाने में जुटी हैं। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इन वैश्विक ताकतों को लगता है कि भारत को कमजोर करने का यही तरीका है कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ जनता में आक्रोश पैदा करो। इसके लिए वो छात्रों का और तथाकथित सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं को औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। 

इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका की चर्चा 2020 के अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी हुई थी। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़े और हारे थे। चुनाव के दरान ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को कुछ समय के लिए सस्पेंड किया गया था। चुनाव परिणाम के बाद ट्विटर (अब एक्स) ने डोनाल्ड ट्रंप के हैंडल पर बैन लगा दिया था। ट्रंप ने अपना प्लेटफार्म ट्रूथ सोशल लांच किया था। बाद में उनके समर्थक एलन मस्क ने ट्विटर खरीद लिया था और ट्रंप के अकाउंट से बैन हटाया था। ट्विटर नाम एक्स हुआ। ये अनायास नहीं है कि चीन इस तरह के प्लेटफार्म्स को अपने देश में घुसने नहीं देता। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स के बढ़ते दायरे के कारण भारत में उनका प्रभाव काफी बढ़ गया है। उनके पास उपभोक्ताओं की सारी जानकारी है। वो जब चाहें जिसको चाहें अपना मनचाहा कंटेंट दे सकते हैं। ये विशेष आयुवर्ग के लोगों को लक्षित कर दिया जा सकता है, विशेष भौगोलिक क्षेत्र को लक्षित कर दिया जा सकता है। यह एक नए तरह का उपनिवेशवाद है जो किसी भी देश की संप्रभुता पर आक्रमण करता है। इसके लिए राजनीतिक दल मायने नहीं रखते हैं। मायने रखती है अपना कारोबारी हित। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि इस तकनीकी नवउपनिवेशवाद से राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा की जा सके। 


सफेद सागर में शौर्य की अग्नि


नई दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदलोन और उसके बाद की परिस्थितियों के संदर्भ में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में दी जानेवाली गालियों को लेकर चर्चा हो रही है। इसके पहले जी-5 पर फिल्म सतलुज के प्रदर्शित होने और उसको हटाने के बाद ओटीटी पर अंकुश लगाने के पक्ष और विपक्ष में तर्क रखे जा रहे हैं। उधर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि ओटीटी के विनियमन के लिए एक विस्तृत संवैधानिक फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है। ये भी जोड़ा गया कि विनियमन को इस तरह से तैयार किया जा रहा है ताकि किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वाधीनता बाधित ना हो। इस रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात कही गई है। वो ये सरकार ओटीटी प्लेटफार्म पर किसी वेबसीरीज या फिल्म के रिलीज होने के बाद विशेषज्ञों के पैनल से समीक्षा पर विचार कर रही है। अगर सीरीज या फिल्म में किसी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री हो तो उसको हटाने का उपक्रम किया जा सके। जानबूझकर मैंने इस संभावना को दिलचस्प कहा। अगर कोई फिल्म या वेबसीरीज रिलीज हो गई तो उसको भारत में तो हटवाया जा सकता है लेकिन क्या भारत के बाहर के दर्शकों के लिए हटवाया जा सकता है। तकनीक के विस्तार से ये लगभग मुमकिन नहीं है। फिल्म सतलुज के केस में हमने ये देखा कि जी 5 से फिल्म को हटवा देने के बाद भी वो इंटरनेट पर उपलब्ध रही। इस रिपोर्ट में ये भी माना गया है कि ओटीटी प्लेटफार्म ने मनोरंजन की दुनिया में पारंपरिक मनोरंजन के साधन यथा सिनेमा को पीछे छोड़ दिया है। फिल्मों में तो प्रदर्शन के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था है लेकिन ओटीटी मुख्यतया स्वनियमन के फार्मूले पर कार्य करती है। इसमें दर्शकों की उम्र को चेक करने का कोई मैकनिज्म भी नहीं है जिससे बहुधा कम उम्र के बच्चे भी सेक्सुअल कटेंट या गाली गलौच वाले संवादों से भरी सीरीज देखते हैं। इसका प्रभाव भी उनपर पड़ता है। इतना ही नहीं कई बार तो इस तरह के कटेंट सामने आते हैं जो समाज में वैमनस्यता परोसते हैं। दो समुदायों के बीच में कटुता बढ़ाते हैं। अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय पोस्ट रिलीज पैनल के माध्यम से इसको विनयमित करना चाहती है। जब भी किसी वेबसीरीज या फिल्म को लेकर दर्शकों की शिकायत आएगी तो ये पैनल उसको देखेगी। अपने सुझावों से मंत्रालय को अवगत कराएगी। 

अभी भी लगभग इसी तरह की व्यवस्था है। स्वनियमन की त्रिस्तरीय व्यवस्था में शिकायत मिलने पर मंत्रालय की समिति विचार करती ही है। उसके बाद निर्णय करती है। इस तरह के कई उदाहरण है। 2024 में श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का आयोजवन होनेवाले था। उससे एक महीने पहले नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी, द गाडेस आफ फूड रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको बताया गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना सीखना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्यों को लेकर मुकदमा हुआ। केस होने के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। एक तो इसके प्रदर्शन के टाइमिंग पर विचार करना चाहिए। पहले ही फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी थी। दर्शक इसको नकार चुके थे। लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के कुछ दिनों पूर्व इसको ओटीटी पर रिलीज करने के पीछे की मंशा क्या थी। इस तरह की स्थितियों में पोस्ट रिलीज पैनल की क्या भूमिका होगी। क्या मुकदमा होने के बाद वो फिल्म देखेगी। क्या दर्शकों की आपत्ति या शिकायत के बाद फिल्म देखेगी। सरकारी प्रक्रिया में जबतक पैनल देखेगी तबतक कितना समय बीत चुका होगा। किसी भी वैधानिक फ्रेमवर्क को बनाने के पहले इन बातों और पहलुओं पर विचार करना चाहिए। 

ओटीटी पर लेकर हो रही तमाम चर्चाओं के बीच एक ऐसी सिरीज आई जिसको लेकर किसी भी प्रकार का विवाद संभव नहीं है। नाम है आपरेशन सफेद सागर। 1999 के कारगिल युद्ध के समय भारतीय वायुसेना के आपरेशन पर आधारित छह एपिसोड की इस सीरीज में निर्देशक ओनी सेन ने अपने क्राफ्ट, संवाद और परिस्थितियों की रचना इस प्रकार से की है कि दर्शक बंधा रहता है। इस सीरीज में सिर्फ काकपिट और युद्ध की कहानी ही नहीं है। शांति के समय पायलटों और उनके परिवारों की भावनाओं का सुंदर चित्रण भी है। युवा और अनुभवी पायलटों के जीवन को इस तरह से दिखाया गया है जो लगभग वास्तविक जैसा है। एक युवा पायलट की प्रेमिका जब अपने घर से भागकर एयरफोर्स स्टेशन पहुंचती है तो उसके बाद के दृष्य एकदम वास्तविक प्रतीत होते हैं। लड़की को बगैर मेकअप या गहरे मेकअप के पेश करने का जोखिम निर्देशक ने उठाया है। इसी तरह से इस सीरीज के केंद्रीय पात्रों में से एक स्कावड्रन लीडर अजय आहूजा, जिसका किरदार सिद्धार्थ ने निभाया, ने बहुत ही स्वाभिवक ढंग से निभाया गया है। उनकी पत्नी अलका आहूजा का किरदार अमृता बागची ने निभाया है। कैसे सीनियर पायलट का परिवार भी जूनियर पायलट के परिवार को बातों बातों में ट्रेनिंग देते हैं। इसको स्वाभाविक तरीके से संवाद के माध्यम से चित्रित किया गया है। युवा पायलट की प्रेमिका अजय आहूजा के घर में रहती है। एक दिन बातों बातों में अलका आहूजा उससे कहती है कि जब भी उसके पति जहाज लेकर जाते हैं उस दिन वो झगड़ा नहीं करती। लेकिन शिकायतों की सूची बनाते रहती हैं। जब उनके पति को जहाज नहीं उड़ाना होता है उसदिन वो सारा हिसाब बराबर कर लेती हैं। वेबसीरीज आपरेशन सफेद सागर एयरफोर्स से जुड़े पायलटों की जीवन की तमाम बारीकियों को छूती है। रिश्तों की संवेदना को इस तरह से उकेरती है कि कई बार दर्शकों की आंखें भर आती हैं। बेहद सधा हुआ संवाद। कोई पात्र अकारण लाउड नहीं होता है। कई बार तो पात्रों के बीच की चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है।  

इस वेब सीरीज के पहले भी माधुरी दीक्षित अभिनीत क्राइम थ्रिलर मिसेज देशपांडे आई थी। वो भी सलीके से बनाई गई थी। दरअसल जिन निर्देशकों को अपने हुनर और कहानी पर भरोसा होता है वो अकारण यौनिकता, हिंसा, गाली गलौच नहीं दिखाते। जिनको अपने हुनर पर भरोसा नहीं होता और जो कला में वैचारिकी की मिलावट करते हैं। राजनीति करते हैं। उससे सफलता का रसायन तैयार करना चाहते हैं। उससे ही विवाद खड़े होते हैं। ओटीटी को लेकर अगर सरकार को विनियमिन की व्यवस्था करनी है तो पोस्ट रिलीज पैनल के स्थान पर प्री रिलीज पैनल बनाने पर विचार करना होगा। ताकि अकारण नग्नता और अश्लीलता परोसने पर तो लगाम लगे ही सीरीज के बहाने राजनीति करनेवालों की पहचान भी हो सके। उनके मंसूबों को नाकाम किया जा सके। इससे ना केवल विवाद कम होंगे बल्कि अकारण सरकारी कामकाज भी नहीं बढ़ेगा।


Saturday, August 1, 2026

परंपरा में गालियों का सौंदर्यशास्त्र


जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद आंदोलन में शामिल हुए युवक और युवतियों की भाषा और गालियों पर चर्चा हो रही है। साहित्य जगत इससे अछूता नहीं है। साहित्य जगत में भी गालियों पर खूब चर्चा हुई। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ऐसी भाषा का उपयोग किया गया जो साहित्यकारों और लेखक/लेखिकाओं से अपेक्षित नहीं थी। राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर गालियों की पैरोकारी की गई। कुछ उत्साही लेखकों ने तो गाली को साहित्य का अभिन्न अंग बता दिया। राही मासूम रजा से लेकर काशीनाथ सिंह के उपन्यासों में गालियों की बात कर अपने तर्कों में वजन डालने का प्रयत्न किया गया। अति उत्साह में वैसी रचनाएं खोजी गईं जिनको गालियों के पक्ष में उद्धूत किया जा सके। पर वहां ये नहीं बताया जा सका कि गालियों में प्रयुक्त शब्दावली कैसी थी और उसका किस संदर्भ में प्रयोग किया गया था। चूंकि ये विवाद साहित्यकारों, लेखकों और कुलेखकों के बीच था इस कारण हमें उन कृतियों पर भी विचार करना चाहिए जिसमें गालियों की भरमार है। विचार तो उसपर भी किया जाना चाहिए कि गालियों का संदर्भ क्या रहा है। किन पात्रों और परिवेश में गालियां दी जाती रही हैं। इस संबंध में राही मासूम रजा के उपन्यास आधा गांव का उदाहरण कई लोगों ने दिया। राही ने अपने उपन्यास आधा गांव में जिन पात्रों के मुंह से गालियां दिलवाई हैं उनका परिवेश और उन परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए। उसको देखने से ये स्पष्ट हो जाता है कि गालियों का उपयोग लेखक ने कथा को प्रामाणिक बनाने के लिए किया। किसी को अपमानित करने या उसको नीचा दिखाने के लिए नहीं। कटेंट का इटेंट देखना सबसे आवश्यक है। यही स्थिति काशीनाथ सिंह के यहां भी दिखाई देती है। 

जिन लेखकों ने अपने उपन्यासों में गालियों को अश्लीलता के साथ प्रस्तुत किया उनपर भी विचार किया जाना चाहिए। हिंदी में एक उपन्यासकार हुए कृष्ण बलदेव वैद। उनका एक उपन्यास है विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां। इस उपन्यास में अश्लीलता की पराकाष्ठा है। उनकी ये कृति जब प्रकाशित होकर आई थी तो उसकी भाषा को लेकर,स्थितियों के चित्रण में अश्लीलता को लेकर चर्चा हुई थी। आमतौर पर इस तरह की कृतियों के साथ जो होता है वही उनके इस उपन्यास के साथ भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी चर्चा कम होती चली गई। अब तो गाहे बगाहे ही इस उपन्यास का नाम सुनाई देता है। वैद का एक और उपन्यास है उसका बचपन। इस औपन्यासिक कृति को संवेदनशील बचपन की आंख से देखी गई एक बड़ी दुनिया की कथा कहा गया। इसकी भाषा भी अश्लील ही थी। प्रकाशन के बाद इसकी चर्चा हुई लेकिन धीरे-धीरे चर्चा तो खत्म हुई ही ये कृति पाठकों की दृष्टि से ओझल भी हो गई। कहना ना होगा कि कटेंट का इंटेंट बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वैद ने कभी कहा था कि ये हिंदी साहित्य में उनके खिलाफ साजिश है। उनको ये भी विचार करना चाहिए था कि किस कारण से उनके उपन्यास फौरी तौर पर चर्चित होते थे और फिर नेपथ्य में चले जाते थे। दूसरी तरफ निर्मल वर्मा हैं जो उनके ही समकालीन थे। उनके उपन्यासों में भी ऐसी परिस्थियां बनती थीं कि वो अश्लील हो सकते थे। गालियों और स्त्री देह का वर्णन कर सकते थे। उन्होंने अपने भाषा कौशल से उन स्थितियों को अश्लील होने से बचाया। याद पड़ता है उनका एक उपन्यास लाल टीन की छत। इस उपन्यास में निर्मल ने अपने पात्र काया के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाया है। काया इस उपन्यास में बचपन और किशोरावस्था के संधिकाल में थी। यहां भी देह के यथार्थ से पात्र का मुठभेड़ होता है। लेखक बेहद संवेदनशील तरीके से उसका बगैर अश्लील हुए पात्र की मन:स्थिति का सफलतापूर्वक चित्रण कर ले जाते हैं। ये उपन्यास भी खूब चर्चित हुआ। अब भी ये हिंदी के पाठकों के साथ साथ गैर-हिंदी पाठकों को अपने शिल्प और भाषाई सौष्ठव के कारण लुभाता है। कंटेंट का इंटेंट साफ है। निर्मल कई बार विसंगतियों को रेखांकित करते हैं लेकिन अर्थहीन नहीं होते। 

कई लोगों ने प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के उपन्यासों का नाम लेकर भी गालियों को या अश्लीलता के सार्वजनिक प्रदर्शन को उचित ठहराने का प्रयत्न किया। ऐसे लोगों की हालत भी वैद साहब जैसी होकर रह गई। चर्चा तो मिली लेकिन तर्कों को स्थायित्व नहीं। इंटरनेट मीडिया के जमाने में किसको स्थायित्व की चिंता है। हो भी क्यों ? यहां तो तुरंता प्रसिद्धि के फेर में लोग साहित्यकार बने फिरते हैं। किसी भी चर्चा में छूट ना जें इसलिए उलजलूल लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। उपन्यासकारों के बाद अशोक वाजपेयी की बात कर लेते हैं। आयोजनधर्मी होने के बावजूद आज भी अशोक वाजपेयी को कवि के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रतिक्रीड़ा की कविताएं लिखनेवाले अशोक वाजपेयी को देह और गेह का कवि ही माना गया। अपनी कविताओं में बाद के दिनों में अशोक वाजपेयी ने मोहक गद्य लिखना आरंभ किया लेकिन कवि के तौर पर पहचान और कविताओं को लोक में स्वीकृति नहीं मिल पाई है। उनकी तुलना में कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह ना केवल कवि के रूप में स्थापित हुए बल्कि कविताओं में वैचारिकी और सिद्धांत के कारण हिंदी साहित्य समाज में समादृत भी हुए। कुंवर जी कविता है- अबकी बार लौटा तो। उसकी कुछ पंक्तियां हैं- अबकी बार लौटा तो/ वृह्तर लौटूंगा। अबकी बार लौटूंगा तो मनुष्यतर लौटूंगा। अबकी बार लौटा तो/ हताहत नहीं/सबके हिताहित को सोचता/ पूर्णतर लौटूंगा। इन पंक्तियों में भारत है। भारत का दर्शन है । अशोक वाजपेयी की तरह पाश्चात्य पांडित्य को भारतीय परिवेश में ढालने की फूहड़ कोशिश नहीं। केदारनाथ सिंह की कविता है घास। इस कविता की आखिरी पंक्ति है कभी भी.../ कहीं से उग आने की/ एक जिद है वह। इस तरह की कई पंक्तियां पाठकों को याद हैं। अशोक वाजपेयी की शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो पाठकों को या काव्य रसिकों को याद हो। यह है कंटेंट का इटेंट। इंटेंट अगर फौरी चर्चा है तो वो तो गालियों से मिल सकती है लेकिन कालजयी नहीं हो सकते। 

कुछ लोगों ने विवाहोत्सव में बारातियों के स्वागत में गाई जानेवाली गालियों और  नकटौरा के संवादों में अश्लीलता की बात की। दोनों बातें सही हैं। गालियां दी जाती हैं लेकिन उसका अपना एक सौंदर्यशास्त्र है। विवाहोत्सव के दौरान गाई जानेवाली गालियां शारदा सिन्हा ने खूब गाईं। बिहार में उसको गारी कहते हैं। उसको सुनकर कभी भी उबकाई नहीं आई। विवाहोत्सव और नकटौरा की गालियों में एक रस होता है। वैसा रस जो शब्दों में घुलकर सुननेवाले को आनंद देता है। नकटौरा तो बिल्कुल ही निजी आयोजन होता है। इसके मनोविज्ञान को समझना चाहिए। ये महिलाओं को अपनी बात, अपनी भावनाएं सामने रखने का एक निजी मंच है। इसलिए जंतर मंतर पर दी गई गालियों का गारी और नकटौरा से तुलना हास्यास्पद है। जो अंतर सेंसुअलिटी और सेक्सुअलिटी में है वही जंतर मंतर की गालियों और गारी में है। गालियों को लेकर फेसबुक आदि पर लिखी टिप्पणियों से कई लेखकनुमा जीवों का अज्ञान सामने आ गया।   


Sunday, July 26, 2026

हिंदी का संवादप्रिय आलोचक


हिंदी अकादमिक और साहित्य जगत में नामवर सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी जन्म शताब्दी वर्ष में उनके लेखन और भाषणों पर समग्रता में विचार करने की आवश्कता है। नामवर सिंह पर अधिकांश लेख भक्ति भाव से लिखे जाते रहे हैं। बहुत कम लेख ऐसे लिखे गए जो उनकी रचनात्मकता के आधार पर उनका मूल्यांकन करने जैसा हो। या तो प्रशंसात्मक लिखा गया या उनकी व्यक्तिगत आलोचना की गई। नामवर सिंह ने अपने आरंभिक दिनों में विपुल लेखन किया। बाद में उन्होंने वाचन विधा को अपना लिया। मनसा वाचा कर्मणा वो आजीवन कम्युनिस्ट रहे। उनके लेखों में कभी भी कम्युनिस्ट विचारधारा से विचलन देखने को नहीं मिलता है। नामवर सिंह एक सच्चे पार्टी कार्यकर्ता की तरह साहित्य में भी अपनी विचारधारा के कार्यकर्ता थे। लेनिन का एक लेख है ‘पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन’। इस लेख में वो पार्टी लेखकों से पक्षधरता का आग्रह करते हैं। नामवर सिंह के लेखन में लेनिन का वो आग्रह साकार दिखाई देता है। आलोचक होने के नाते उनका दायित्व था कि खोज-खोजकर हिंदी साहित्य के कवियों-लेखकों को मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित बताना और स्थापित करना। निराला को लेनिन के प्रभाव में बताने के लिए वो उनकी 1920 की एक कविता बादल राग की पंक्तियां लेकर आए थे। पंक्ति है- तुझे बुलाता कृषक अधीर/ऐ विप्लव के वीर। अब इस पंक्ति में चूंकि कृषक भी है और विप्लव भी तो निराला कम्युनिस्ट हो गए। नामवर सिंह ने तो जयशंकर प्रसाद पर भी लेनिन का प्रभाव देखा और कहा भी। दिनकर की किसी कविता में लेनिन का नाम आया तो उनको कम्युनिस्ट बताने लगे थे। प्रेमचंद को तो कम्युनिस्ट बता ही चुके थे। नामवर सिंह ने जो राह दिखाई थी उनके कम्युनिस्ट चेले उसी पर चलकर इन लेखकों कवियों के बारे में बोलने-लिखने लगे। परिणाम ये हुआ कि इन लेखकों का इकहरा और दोषपूर्ण मूल्यांकन हुआ। 

जब नामवर सिंह लेखन से वाचन की ओर आए तो उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा पर भी प्रहार किया। विचारधारा को लेकर चलनेवाले इस नामवर आलोचक ने किसी गोष्ठी में कह दिया कि विचारधारा हमें अमानवीकृत करती है। फिर किसी गोष्ठी में कह दिया कि शुक्र है कि हमारे देश में कम्युनिष्टों का शासन नहीं है वर्ना हम सभी यानि उनसे असहमति रखनेवाले जेलों में बंद होते। एक और इसी तरह का बयान था-भारतीय समाज में जो दुर्गति समाजवाद की है साहित्य में वही प्रतिबद्धता की। इन बयानों पर प्रगतिशील जमात के लेखकों ने खूब हो हल्ला मचाया था। एक बार मैंने राजेन्द्र यादव से पूछा था कि नामवर सिंह इस तरह के बयान क्यों देते हैं? उन्होंने छूटते ही कहा कि वो प्रचार-प्रिय आलोचक हैं। उनको पता है कि कैसे चर्चा के केंद्र में रहा जाता है। नामवर सिंह ने भी अशोक वाजपेयी के साथ एक बातचीत में कहा था कि विवादों के माध्यम से सिद्धांत का विकास हो सकता है और इनके माध्यम से ठोस साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन की दिशा में भी हम पाठकों की समझ ज्यादा बढ़ा सकते हैं, विकसित कर सकते हैं। उसी बातचीत में ये भी कहा था कि विवाद आलोचना कर्म और आलोचना धर्म में ही निहित है। नामवर सिंह के शिष्यों ने उनके व्याख्यानों को लिपिबद्ध कर पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है। उन व्याख्यानों से नामवर सिंह की जो तस्वीर बनती है वो लेखक नामवर सिंह से अलग है। ऐसा प्रतीत होता है कि नामवर सिंह लिखे हुए शब्दों और बोले गए शब्दों के महत्व को समझते थे। लिखे हुए को संशोधित करना या बदलना या अपनी स्थापना से पलट जाना कठिन होता है जबकि व्याख्यानों में ये सुविधा होती है। नामवर सिंह का जिस समय हिंदी साहित्य में डंका बज रहा था उस समय संचार के माध्यम बहुत ही कम थे। नामवर सिंह ने इसका लाभ उठाया। 

नामवर सिंह की आलोचना में तमाम विचलन होने के बावजूद इतना तो स्वीकार करना होगा कि उनके अध्ययन का दायरा बहुत विशाल था। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, उर्दू और विदेशी साहित्य बहुत पढ़ा था। एक तरफ अपने व्याख्यानों में वो श्रीरामचरितमानस की पंक्ति उद्धृत करते थे तो मीर और गालिब की शायरी का भी धड़ल्ले से प्रयोग करते थे। अपनी स्थापना के समर्थन में विदेशी आलोचकों और लेखकों को उद्धृत करते थे। उनके व्याख्यानों से ये लगता है कि वो हर गोष्ठी में पूरी तैयारी के साथ जाते थे और कुछ न कुछ नया देने की कोशिश करते। जब भी वो विचारधारा और राजनीति से मुक्त होकर अकादमिक स्तर पर बोलते तो उनका व्याख्यान सुनने योग्य होता था। उनकी आलोचना का जो वाचिक स्वरूप था वो विमर्शात्मक होता था लेकिन जब वो लिखते थे तो सृजनात्मक हो जाते थे। नामवर सिंह ने कभी स्वयं इस बात को स्वीकार किया था कि सिद्धांत निर्माण की जगह मूल्ययांकन पर प्रतिक्रिया देकर संवाद बढ़ाया जाना अधिक बेहतर है। नामवर सिंह ने छायावाद पर जो पुस्तक लिखी थी उसने अपने समय में छायावाद पर नए सिरे से साहित्य जगत को सोचने पर मजबूर किया था। कविता के नए प्रतिमान और कहानी नई कहानी उनकी दो पुस्तकों ने हिंदी साहित्य पर विचार करने की एक नई जमीन तैयार की थी। उसी तरह से जैसे डा रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ लिखकर हिंदी नवजागरण को समझने की नई दृष्टि दी थी। नामवर सिंह क्रिया केवलम उत्तरम को अपना आदर्श वाक्य मानते थे और जीवन के अंतिम दिनों तक वो इसपर डटे रहे। बाद के दिनों में जब उनपर बहुत व्यक्तिगत हमले होने लगे थे तो एक दिन मैंने उनसे इस बाबत पूछा था। उन्होंने कहा- चढ़िए हाथी ज्ञान को, सहज दुलीचा डाल/स्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार। 


Saturday, July 25, 2026

सफेद रंग का इंद्रधनुष


राज कपूर के बारे में कई बातें कही जाती हैं। एक तो उनको सफेद साड़ी पहनने वाली स्त्रियां पसंद थीं। या उनको पसंद करनेवाली स्त्रियां सफेद साड़ी पहनती थीं। दूसरी उनकी वो फिल्में जबरदस्त हिट होती थीं जिनकी लीड हीरोइन के साथ उनके अफेयर के चर्चे होते थे। नरगिस से लेकर पद्मिनी और वैजयंतीमाला तक का उदाहरण उनके साथ काम करनेवाले अबतक देते रहते हैं। उनपर लिखी कई पुस्तकों में भी इस तरह की बातों का उल्लेख मिलता है। एक और बात राज कपूर के बारे में कही जाती है, जब से नरगिस और उनका अलगाव हुआ तब से उनकी फिल्मों में सेंसुअलिटी का स्थान सेक्सुअलिटी ने ले लिया। इस बीच एक और घटना घटी जिसने राज कपूर को नायिकाओं को पेश करने का आयडिया दे दिया। एक दिन राज कपूर मुंबई (तब बांबे) में अपने किसी मित्र के यहां रात के खाने पर गए थे। मित्र के घर जब वो खाना खा रहे थे डायनिंग टेबल के ऊपर लगी तस्वीर देखकर वो खाना भूल गए। वो राजजा रवि वर्मा की एक पेंटिंग थी। पेंटिंग में एक स्त्री भीगी हुई साड़ी में थी। गीली और झीनी साड़ी अपने बदन पर लपेटी। उस स्त्री की पेंटिंग में सेंसुअलिटी थी, जिसे राज कपूर ने पर्दे पर सेक्सुअलिटी में बदल दिया। ये वही दौर था जब राज कपूर की जिंदगी से नरगिस जा चुकी थीं। उनकी नई नायिका थीं पद्मिनी। उनको लेकर राज कपूर फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ बना रहे थे। इस फिल्म में पद्मिनी पर फिल्माए गए गीत ‘ओ मैंने प्यार किया ओहो क्या जुर्म किया’ में राज कपूर ने राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को दृष्यों में उतारने का प्रयास किया। गाने के दौरान पद्मिनी काली साड़ी पहनकर झरने के नीचे बने जलकुंड में कूदती हैं। तैरती हैं। पानी से बाहर आकर चट्टान पर लेटती हैं। पलटती हैं। इन सारी मादक अदाओं को कैमरा कैद करता रहता है। पद्मिनी ने इस पूरे सीन में काली साड़ी पहनी थी जो उसके शरीर के साथ चिपकी रहती है। झरने में नहाने का छोटा सीन भी है। जिसको राज कपूर दिखाते तो हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वो अगली फिल्म के लिए कुछ बचा लेना चाहते हैं।

राज कपूर ने फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में जो बचा लिया था उसको उन्होंने दिखाया अपनी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में। इस फिल्म का गाना याद करिए ‘अंग लग जा बालमा’। इस गाने के बोल शुरु होने से पहले लगभग एक मिनट तक नायिका अपने कमरे में बेचैनी में करवटें बदलती हैं। कैमरा विभिन्न मुद्राओं को कैद करता है। डेढ मिनट बाद जब कड़कती हुई बिजली और तूफानी रात में नायिका पद्मिनी पेड़ के तने से लिपट कर गाना आरंभ करती है तो दर्शक नायिका की अदाओं में खो जाते हैं। यहां राज कपूर अपनी नायिका को काली साड़ी से हल्के क्रीम कलर और लाल बार्डर वाली साड़ी तक लेकर आते हैं और उसको भिगाते भी हैं। चौखट पर अपने बदन पर साड़ी लपेटकर खड़ी पद्मिनी राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को साकार कर देती हैं। पर इस फिल्म में भी ऐसा लगता है कि राज कपूर ने यहां भी कुछ बचा लिया। इस फिल्म के करीब डेढ़ दशक बाद राज कपूर की एक फिल्म आती है ‘राम तेरी गंगा मैली’। ये फिल्म राज कपूर ने अपने बेटे राजीव कपूर को लेकर बनाई थी। इस फिल्म का गाना याद करिए, तुझे बलाए मेरी बाहें। इसमें लाल वस्त्र में नायिका आती है लेकिन उसके बाद जब वो पर्वत के नीचे और झरने के पीछे अपने होने की बात करती है तो सफेद पारदर्शी साड़ी पहने होती है और यहां आकर राज कपूर लगभग नग्नता तक चले जाते हैं। मंदाकिनी पर फिल्माए इस दृष्य को लेकर उस समय काफी बवाल मचा था। सेंसर से सर्टिफिकेट मिलने के बाद ये फिल्म जबरदस्त हिट रही थी। उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट फिल्म। इस फिल्म ने रातों रात मंदाकिनी को स्टार बना दिया। उसके बाद मंदाकिनी ने दर्जनों फिल्में की जिनमें मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा के साथ की गई फिल्में ठीक ठाक चली। मेरठ की रहने वाली यास्मीन जोसेफ को राज कपूर ने देखा। कहा जाता है कि हिंदी फिल्मों की नायिकाएं राज कपूर की नीली आंखों में खो जाती थीं लेकिन राज कपूर यास्मीन जोसेफ की नीली आंखों में खोए नहीं बल्कि डूब गए। सीधे अपनी फिल्म का लीड रोल दे दिया। मंदाकिनी नाम भी दिया। मेरठ की यास्मीन जोसेफ मंदाकिनी बनकर प्रसिद्ध हो गई। मंदाकिनी फिर प्रसिद्धि से गुमनामी में गई और कुछ दिनों बाद पता चला कि उन्होंने एक बौद्ध मतावलंबी से शादी कर ली और अब फिल्मी दुनिया से दूर अपना पारिवारिक जीवन जी रही हैं।    


सरकार के हिसाब से कब बनेगा सिस्टम ?


दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन के बीच दो सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी मिली। एक कार्यक्रम भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के भोपाल स्थित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान और शालभंजिका का आयोजन है। भारत सरकार की संस्था एनसीईआरटी ने कवि विनय कुमार की कृति श्रेयसी पर चर्चा आयोजित की है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि राजेश जोशी कर रहे हैं। चर्चा में कुमार अंबुज, निरंजन श्रोत्रिय, आशुतोष दुबे और अंबर पांडे भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का पोस्टर देखकर तो सामान्य लग सकता है पर अगर अध्यक्षता कर रहे महानुभाव और कुछ वक्ताओं की प्रतिबद्धता को देखेंगे तो ऐसा लगता है कि भारत सरकार अपने विरोधियों को लेकर कितनी उदार है। घोर वामपंथी कवि राजेश जोशी हमेशा से मोदी सरकार के विरोधी रहे हैं और कई सार्वजनिक मंचों पर भी सरकार को विरोध करते रहते हैं। इस कार्यक्रम के पोस्टर देखने के बाद सोचा कि जोशी जी की फेसबुक वाल पर टहल आया जाए। वहां जाकर देखा तो पता चला कि वो भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा के आकांक्षी हैं। बावजूद इसके भारत सरकार की शिक्षा मंत्रालय उनका आतिथ्य कर रही है। उनकी अध्यक्षता में कार्यक्रम आयोजित कर रही है। शिक्षा मंत्रालय तो चलिए अपनी उदारता का परिचय दे रही है लेकिन क्या राजेश जोशी को ये नहीं पता कि उन्होंने जिस कार्यक्रम में जाने की सहमति दी है उसी महकमे के मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान थे। दरअसल ये वामपंथियों का चरित्र है। जहां लाभ दिखता है वहां जाने में उनको कोई परहेज नहीं होता है। वहां जाने के लिए कोई खूबसूरत बहाना ढूंढ लेते हैं। उदाहरण के लिए इस केस में कह सकते हैं कि एनसीईआरटी तो करदाताओं के पैसे से चलता है इसलिए उनके कार्यक्रमों में जाने में क्या परेशानी है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण साहित्यिक पत्रिकाओं मं देखा जा सकता है जहां संपादकीय में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी की आलोचना होती है और उसके ठीक पहले इनर कवर पर योगी सरकार का विज्ञापन। राजेश जोशी के अलावा जो वक्ता हैं उनमें से अधिकतर शिक्षा मंत्री को हटाने के पक्षधर थे। 

दूसरा कार्यक्रम शिवपूजन सहाय की कृति देहाती दुनिया के सौ साल पूरा होने पर पटना में बिहार संग्रहालय का एक आयोजन है। देहाती दुनिया ठेठ देहात का औपन्यासिक चित्र की परिभाषा के साथ बाजार में आया था। देहाती दुनिया का पहला संस्करण जब प्रकाशित हुआ था तब उसके आरंभ में श्री गणेशाय नम: प्रकाशित था। पहले खंड में एक ही पृष्ठ पर श्री गणेशाय नम: उसके बाद बड़े अक्षरों में देहाती दुनिया फिर अंक एक और उसके नीचे माता का अंचल उल्लिखित था। ऐसे शिवपूजन सहाय की कृति के सौ वर्ष पूरे होने पर बिहार के कला और संस्कृति विभाग के अंतर्गत चलनेवाली संस्था बिहार संग्रहालय ने जो आयोजन किया है उसमें वक्ताओं में वामपंथ से जुड़े लेखकों की प्रधानता है। प्रगतिशील लेखक संघ के बिहार के अध्यक्ष, महासचिव और एक अन्य पदाधिकारी पहले सत्र में वक्ता के तौर पर आमंत्रित हैं। दूसरे सत्र में भी सरकार के विरोधियों को स्थान दिया गया है। ऐसे लोगों को आमंत्रित किया गया है जो सरकार के विरोध में खड़े होकर पटना के गांधी मैदान में नारे लगाते रहे हैं। अब भी लगाते रहते हैं। पर बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग की उदारता के क्या ही कहने। दरअसल पिछले कुछ समय से ये देखा जा रहा है कि बिहार संग्रहालय वामपंथियों को अच्छी खासी जगह दे रहा है। कुछ वामपंथी लेखक तो वहां के कार्यक्रमों में स्थायी हैं। बिडंबना है कि शिवपूजन बाबू के साहित्य पर उस विचार के लोग बोलेंगे जिन्होंने प्रयासपूर्वक शिवपूजन सहाय का मूल्यांकन नहीं होने दिया। उनकी समग्र रचना उनके पुत्र मंगलमूर्ति जी के सौजन्य और श्रम से प्रकाशित हो पाई। शिवपूजन सहाय परम रामभक्त थे। वो अपनी डायरी में सैकड़ों जगह राम, रामकृपा और भगवान की इच्छा जैसी बातें लिखते हैं लेकिन उनके इस लेखन के बारे में बहुत ही कम चर्चा की गई। देश के विभाजन से लेकर चीन युद्ध तक शिवपूजन सहाय ने बेहद कठोर टिप्पणियां कीं। उन्होंने नेहरू से लेकर उनके मंत्री कृष्ण मेनन तक की आलोचना की। लेकिन नेहरू की विराट छवि बनाने में लगे कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम ने इन टिप्पणियों को दबा दिया। वही अब उनकी प्रमुख कृति पर बात करेंगे। 

संभव है कि बहुत लोगों को ये लगे कि इन दो सरकारी कार्यक्रम में वामपंथियों को बुलाने से क्या ही हो जाएगा। लेकिन ये दो कार्यक्रम तो सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिए गए हैं। ऐसे सैकड़ों कार्यक्रम होते रहते हैं जहां वामपंथी किसी न किसी से जुगाड़ भिड़ाकर घुस जाते हैं। सरकारी समितियों से लेकर पुरस्कार आदि में भी वो अपनी गोटी सेट कर लेते हैं। हाल ही में एक महत्वपूर्ण पुरस्कार की घोषणा हुई। उसमें जिन सज्जन को पुरस्कृत किया है वो रोजाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते रहते हैं। सार्वजनिक तौर पर करते रहते हैं। फिर भी उनको पुरस्कृत करने का ऐलान किया गया। ऐसा नहीं है कि पुरस्कृत करनेवालों को उनके बारे में पता नहीं था, पता था। फिर भी हुआ। इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर निरंतर हो रही हैं पर इसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक लड़ाई होती है। वर्षों तक वामपंथी-कांग्रेसी इकोसिस्टम ने दक्षिणपंथ से जुड़े लेखकों और साहित्यकारों को मंच तक नहीं दिया। फिर योजनाबद्ध तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। वर्षों तक इस झूठ के सहारे अपने विचार को श्रेष्ठ दिखाने का जतन करते रहे। कुबेरनाथ राय जैसे अप्रतिम प्रतिभा के लेखक को अकादमिक जगत से षडयंत्रपूर्वक बाहर रखा गया। सिर्फ कुबेरनाथ राय ही क्यों हाल के दिनों की बात करें तो नरेन्द्र कोहली जी का भी सम्मान नहीं कर सके। यह वामपंथी विचारधारा की योजना थी। अब भी वामपंथी लेखक जिन कार्यक्रमों में जाते हैं और वहां इसी तरह की बातें करते हैं जिससे भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नीचा दिखाया जा सके। कई गोष्ठियों में इस तरह के विमर्श का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं इस कारण यह बात रख रहा हूं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र से वामपंथियों का प्रभाव कम नहीं हो पाया है। यह कार्य प्रधानमंत्री के स्तर से नहीं होना है। इस कार्य को करने के लिए शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे नेतृत्व को निर्णय लेना होगा। विश्वविद्यालयों में कुलपति के स्तर पर और सांस्कृतिक संस्थाओं में निदेशक/अध्यक्ष के स्तर पर ये कार्य होना चाहिए। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं को भी ध्यानपूर्वक कार्य करना होगा। फिल्मों के क्षेत्र में जिस तरह से वाम विचार के लोग विचार की रामनामी ओढ़कर सक्रिय हैं उनकी पहचान करके उनकी षडयंत्रकारी योजनाओं को नाकाम करना होगा। ये कहकर भी नहीं बचा जा सकता है कि सरकार भले ही हमारी है लेकिन सिस्टम तो उनका ही है। सिस्टम तो सरकार के हिसाब से बनती है। बनाने का प्रयास करना चाहिए। 

Saturday, July 18, 2026

संवाद नहीं कठोर निर्णय का समय


कुछ दिनों पूर्व ये समाचार प्रकाशित हुआ कि ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्मों पर फिल्म के प्रदर्शन से पहले प्रमाणन के लिए नियमों में संशोधन पर विचार किया जा रहा है। बताया गया कि संभवत: सरकार ओटीटी  पर दिखाई जानेवाली फिल्मों के लिए पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करने पर मंथन कर रही है। उसी समाचार में ये भी कहा गया कि सरकार इसके लिए आईटी नियम 2021 में भी संशोधन कर सकती है। इस तरह की खबरें नियमित अंतराल पर प्रकाशित होती रही हैं। जब भी किसी फिल्म या वेबसीरीज को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं तो इस तरह की बात सामने आती ही है। पिछले सात-आठ वर्षों में ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री पर जब-जब बवाल होता है तब इस तरह की खबरें आती हैं कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत सख्ती से कंटेंट के आकलन पर विचार कर रहा है। पूर्व में भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों से कई दौर की बातचीत की थी। मनोरंजन जगत के प्रतिनिधियों को इस तरह की बैठकों में सरकार की तरफ से सख्त संदेश दिया गया था। पहले स्वनियमन की बात हुई। फिर त्रिस्तरीय व्यवस्था बनी। लेकिन ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला। कंटेंट और संवाद में अराजकता जारी है। गाहे बगाहे कुछ सीरीज और कुछ फिल्में इस तरह की आ जाती हैं जो बगैर किसी विवाद के निकल जाती हैं। लेकिन कुछ ऐसे निर्माता हैं जो अपनी फिल्मों में और वेबसीरीज में यौनिकता, नग्नता, जुगुप्साजनक दृष्य, हिंसा या गाली गलौच भरे संवाद से बाज नहीं आते हैं। वेबसीरीज निर्माताओं को लगता है कि नग्नता और हिंसा के साथ गाली गलौच की छौंक सीरीज की सफलता की गारंटी है। मनोरंजन की दुनिया में भेड़चाल है। एक सफल फार्मूला मिला नहीं कि सब उसी तरफ दौड़ पड़ते हैं और दौड़ते ही रहते हैं। 

ताजा विवाद फिल्म सतलुज को लेकर उठा है। इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से पिछले चार वर्षों से सर्टिफिकेट नहीं मिला था। निर्माता और बोर्ड के बीच कुछ बिंदुओं पर सहमति नहीं बन पा रही थी। इस बीच जी 5 ने सतलुज को दिखाना आरंभ कर दिया। जबतक सरकार जागी तबतक दो दिन बीच चुके थे। जिनको देखना था वो देख चुके थे। बताया जा रहा है कि भारत में वैधानिक रूप से भले ही इस फिल्म को दिखाने पर प्रतिबंध है लेकिन पंजाब के कई शहरों में इस फिल्म का सार्वजनिक प्रसारण हो चुका है या हो रहा है। यह तो और भी गंभीर बात है। बगैर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के प्रमाणपत्र के किसी भी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 का उल्लंघन है। इस एक्ट के मुताबिक हर फिल्म को, अगर वो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए है, तो पहले फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणपत्र लेना होगा। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ये देखता है कि फिल्म सार्वजनिक प्रदर्शन के योग्य है या नहीं। उस फिल्म से देश की अखंडता  और संप्रभुता पर तो कोई कतरा नहीं पैदा हो सकता है। इसके अलावा भी अन्य कई बिंदु हैं जिसकी पड़ताल करके प्रमाणन बोर्ड फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की श्रेणी तय करते है। फिर प्रमाणपत्र के रूप में फिल्म के प्रदर्सन की अनुमति दी जाती है। फिल्म सतलुज का बगैर सेंसर सर्टिफिकेट के सार्वजनिक प्रदर्शन कानून सम्मत नहीं है। पंजाब पुलिस को या प्रशासन को इसके प्रदर्शन को रोकना चाहिए था। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि जी 5 ने अपने प्लेटफार्म पर इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए कैसे और क्यों अनुमति दी। क्या उनको ये पता नहीं था कि फिल्म सतलुज को लेकर निर्माता और सेंसर बोर्ड के बीच विवाद चल रहा है। अगर पता नहीं था तो आश्चर्य की बात है और अगर पता होते हुए ऐसा किया गया तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इसपर ध्यान देना चाहिए।  

ऐसा नहीं है कि इस तरह का विवाद पहली बार सामने या है। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर विवाद होते रहे हैं। भारतीय वायुसेना और कश्मीर के हालात पर पहले भी ओटीटी प्लेटफार्म पर आपत्तिजनक संवाद और दृष्य दिखाए गए थे। विरोध के बाद उसको हटाया गया था। परंतु वो फिल्में नहीं थी। उनका सार्वजनिक प्रदर्सन नहीं हुआ था। सतलुज के इंटरनेट मीडिया और मैसेजिंग एप्स पर उपलब्ध होने की बात कही जाती है उससे तो सरकार का प्रतिबंध बेमानी हो गया। देश ये भी जानना चाहता है कि सरकार ने जी 5 पर इस फिल्म के प्रदर्शन पर तो रोक लगा दी लेकिन उसके बाद क्या किया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उसके बाद क्या कदम उठाए। कानून तोड़नेवालों की पहचान करने और उनको दंडित करने के लिए क्या पंजाब सरकार ने कोई कदम उठाया। ये बहुत ही चिंता की बात है कि संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण की बात करनेवालों को भी ये प्रकरण नहीं दिखा या देखकर भी अनजान बने रहे। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत गंभीरता के साथ ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर ठोस निर्णय ले। कड़े कदम उठाए जाएंगे, किसी को बख्शा नहीं जाएगा आदि के आगे जाकर निर्णय लेने का वक्त है। सरकार ने मनोरंजन जगत को बहुत समय दे दिया। स्वनियमन को लेकर व्यवस्था बनाई वो चली नहीं, त्रिस्तरीय व्यवस्था भी ठीक साबित नहीं हुई। लिहाजा सरकार को अब प्रसारित होनेवाली सामग्री के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। 

ओटीटी प्लेटफार्म पर जारी होनेवाले सामग्री के प्रमाणन की व्यवस्था करना बहुत आसान नहीं होगा। इसके लिए मानव संसाधन के अलावा संस्थागत ढांचा भी तैयार करना होगा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस प्रकरण को या इस प्रकल्प को अपनी प्राथमिकता में लेना होगा। जिस तरह से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड बरसों से बगैर सदस्यों के चल रहा है उसपर भी ध्यान देकर सदस्यों की नियुक्ति करनी होगी। बगैर सदस्यों के काम तो चल सकता है लेकिन उससे कई प्रकार की दिक्कतें पैदा होती हैं। अस्थायी विशेषज्ञों के भरोसे काम चलाया जाता है पर इसमें जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है। सदस्यों के नहीं होने से बोर्ड के दफ्तरों में काम करने वाले बाबुओं का दखल बढ़ता है। वहीं से भ्रष्ट व्यवस्था के जन्म लेने की जमीन तैयार होती है। पूर्व में इ तरह के मामले आए हैं। प्रमाणन बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी संसाधन देना होगा। क्षेत्रीय स्तर पर फिल्म प्रीव्यू करनेवाले सदस्यों की संख्या बढ़ानी होगी। ओटीटी की सामग्री को फिल्म प्रमाणन बोर्ड के दायरे में लाने से काम बढ़ेगा। अब यह करना इस कारण आवश्यक हो गया है कि ओटीटी पर चलनेवाली बेवसीरीज और फिल्मों का उपयोग मनोरंजन की आड़ में राजनीति करने में होने लगा है। राजनीतिक मैसेजिंग या किसी व्यक्ति या विचारधारा को बदनाम करने का औजार बनने लगा है। कोई भी प्लेटफार्म जब अपनी मूल प्रकृत्ति को छोड़ने लगे तो सरकार को हस्तक्षेप करके उसको संविधानसम्मत तरीके से रेगुलेट करना पड़ता है। कानून को लागू करना होता है। ओटीटी प्लेटफार्म को लेकर अब यही स्थिति बन रही है। संवाद का समय समाप्त हो गया है और समय है उचित और कठोर निर्णय का।  


Saturday, July 11, 2026

मंदिर चोरी पर ताजा सनातनी चुप


अयोध्या स्थित प्रभु श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच से अधिक तेजी से इस प्रकरण पर राजनीति हो रही। श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना निंदनीय है। दोषियों को कठोरतम सजा होनी चाहिए। इस चोरी की सजा जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा। सरकार को चाहिए कि वो विशेष जांच दल (एसआईटी) को एक निश्चित समयावधि में जांच पूरी करने का आदेश निर्गत करे। उसकी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस अपनी जांच कर कोर्ट में रिपोर्ट सौंपे। उसकी सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करके दोषियों को सजा दी जाए। इस मामले में न्याय होना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है न्याय होते दिखना। चढ़ावा चोरी प्रकरण पर कई राजनीतिक दल के नेता स्वयं को सनातनी साबित करने पर तुले हुए हैं। कोई किसी को रामघाती बता रहा है तो कोई सुंदरकांड का पाठ करवा रहा है। किसी को प्रभु श्रीराम की आस्था पर हुई चोट की चिंता हो रही है तो कोई भक्तों की आहत भावना की चिंता कर रहा । राजनीति के रंगमंच पर हर दिन श्रीराम भक्ति के नए आयाम प्रस्तुत किए जा रहे हैं। जो दल प्रभु श्रीराम को किस्से कहानियों का चरित्र मानते थे, श्रीरामजन्भूमि पर अस्पताल और स्कूल खोलने की वकालत किया करते थे आज उनकी भी आस्था प्रभु श्रीराम में द्विगुणित हो गई है। जिस प्रकार की राजनीति चढ़ावा चोरी को लेकर हो रही है उसमें सभी राजनीतिक दल स्वयं को सच्चा सनातनी कहते हुए नहीं थक रहे हैं। यह भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय है।  

इस पूरे प्रकरण पर जिस प्रकार की राजनीति हो रही है उससे सबसे बड़ा प्रश्न ये खड़ा हो रहा है कि चढ़ावा चोरी बड़ी चोरी है या मंदिर चोरी बड़ी है। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि किस तरह से लुटेरों ने हमारे आस्था के केंद्र मंदिरों को लूटा। सिर्फ लूटकर ही नहीं छोड़ा बल्कि लूटने के बाद मंदिरों को ध्वस्त भी किया। ध्वस्त करने के बाद उस स्थान पर मस्जिदें और ईदगाह बनाई गईं। चढ़ावा चोरी के बाद जो राजनीतिक दल इस मसले पर राजनीतिक फसल काटना चाहते हैं उनमें से अधिकतर ने मंदिर चोरों की पैरोकारी की है। कभी चुप रहकर तो कभी मुखर होकर। सबसे पहले बात करते हैं गुजरात के सोमनाथ मंदिर की। ईसवी 1026 से लेकर 1706 तक कई लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर को लूटा। गजनी, खिलजी, मुजफ्फर शाह, औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को लूटा भी और मंदिर को तोड़ा भी। स्वाधीन भारत में जब सोमनाथ मंदिर के लुटोरों और ध्वंस के दाग को मिटाने का प्रयास हुआ तो कांग्रेस के उस समय के नेता जवाहरलाल नेहरू ने उसका परोक्ष विरोध किया था। जब भी इस प्रकरण की बात उठती है तो पंडित नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद के बीच के पत्र व्यवहार की याद आती है। 10 मार्च 1951 को राजन्द्र बाबू ने नेहरू को लिखा, मैं देखता हूं कि सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह के साथ संबद्ध होने का मेरा विचार आपको पसंद नहीं, क्योंकि इसमें अनेक बातें अंतर्निहित हैं। आपको लगता है कि इस समारोह में मेरे जुड़ने से हो सकता है कि कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मैं समझता हूं, आप मानेंगे कि यह रुख अपनाना उचित नहीं है, खासकर जबकि सरकार इसपर कुछ खर्च नहीं कर रही है।... अत: मैं समझता हूं कि इस निमंत्रेण को अस्वीकार करने का कोई अर्थ नहीं है। ( डा राजेन्द्र प्रसाद कारस्पोंडेंस...खंड 14, पृष्ठ 37) एक बार फिर से विचार करना चाहिए कि स्वाधीन भारत में चढ़ावा चोरी बड़ा अपराध है मंदिर चोरी। 

श्रीरामजन्मभूमि के मामले में तो पूरे देश ने देखा कि किस तरह से जब जन्मभूमि को मुक्त करवाने का आंदोलन चल रहा था तो कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों का क्या रुख था। अदालतों में प्रभु श्रीराम के बारे में किस तरह की बातें कही गईं, पूरे देश को अब भी याद है। जब श्रीरामजन्मभूमि स्थित विवादित ढांचा गिरा था उसके बाद जिस तरह की राजनीति हुई वो भी स्मृतियों में है। संसद में श्रीरामजन्मभूमि में विराजमान रामलला को अनआथराइज्ड तक कहा गया। समाजवादी पार्टी नेता रामगोपाल वर्मा ने तो यहां तक कह दिया था कि जो गुंबद पर चढ़ गए थे वो नीचे उतर नहीं सके। उनको इस बात की चिंता भी नहीं थी कि हिंदू उनकी पार्टी को वोट देंगे या नहीं। उसी समाजवादी पार्टी के नेता अब सनातनी और रामभक्त होने का दावा करते घूम रहे हैं। श्रीरामजन्मभूमि स्थित मंदिर की भी तो चोरी ही हुई थी। उसके बाद वहां मस्जिद बना दी गई थी। चढ़ावा चोरी पर हमलावर राजनीतिक दल के नेता मंदिर चोरी पर एक शब्द नहीं बोल पाते थे। डा राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू को जो लिखा उसका एक वाक्य देखा जाना चाहिए- कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मुसलमान आक्रमणकारियों या मंदिर चोरों के प्रति नरम रुख दिखा कर वर्षों तक मुस्लिम वोट की राजनीति होती रही। काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर भी यही रुख देखने को मिलता रहा है। वहां भी यही सारे दल मंदिर चोरों के पक्ष में दिखते हैं। 

मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर भी ताजा-ताजा रामभक्त हुए दलों का रुख देखना चाहिए। इस बात का उल्लेख इतिहास की तमाम पुस्तकों और या6 वृत्तांतों में मिलेता है कि 1670 में औरंगजेब ने मथुरा के केशवदेव मंदिर का ध्वंस कर वहां शाही ईदगाह बनावाया था। क्या ये हिंदू मंदिर की चोरी नहीं थी। पूरे मंदिर की चोरी करके वहां ईदगाह बनवा दिया गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उस स्थान की नीलामी कर दी। नीलामी में बनारस के राजा पटनीमल ने ये जमीन खरीदी थी। कालांतर में उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने पटनीमल के वारिसों से ये जमीन खरीद ली। उनके साथ उस समय जयदयाल डालमिया और हनुमान प्रसाद पोद्दार भी थे। बाद में उस स्थान पर रामकृष्ण डालमिया ने केशवदेव का मंदिर बनवाया। मंदिर बनने से लेकर 1968 तक कांग्रेस पार्टी का क्या रुख रहा ये बताने की आवश्यकता नहीं है। आज भी अगर श्रीकृष्णजन्मभूमि स्थित कारावास में जाने पर स्पष्ट लगता है कि मंदिर चोरों ने हिंदुओं के इस पवित्र स्थल पर डाका डाला था। क्या स्वाधीनता के बाद इन मंदिर चोरों के कृत्यों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी ? नहीं हुई। क्योंकि इससे मुस्लिम वोट बैंक छिटकने का खतरा था। आज जो भी राजनीतिक दल सनातनी होने का दावा कर रहे हैं उनको मंदिर चोरों पर भी अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। उचित तो ये होगा कि सनातनी होने का दावा करनेवाली पार्टियां श्रीकृष्णजन्मभूमि के मामले में भी सनातनी रुख अपनाए और उसको मुक्त करने के अभियान में साथ आए। बयानों में सनातनी दिखने से बेहतर होगा अपने कर्मों में सनातनी दिखें। क्योंकि कर्म की प्रधानता का अपना महत्व है। 

Saturday, July 4, 2026

भारत की संप्रभुता पर हमले का मंसूबा


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 12 वर्षों के कार्यकाल में बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य किए। इन कार्यों में से दो कार्य ऐसे हैं जिसको ऐतिहासिक कार्य की कोष्ठक में रखा जा सकता है। पहला है अनुच्छेद 370 की समाप्ति। दूसरा है माओवाद का सफाया। ये दोनों कार्य इतिहास में इस तरह से दर्ज हो गए जिसको कभी भी मिटाया नहीं जा सकेगा। दोनों में गृहमंत्री अमित शाह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अनुच्छेद 370 की समाप्ति बहुत साहसिक कदम था। उसके लिए व्यापक प्रसासनिक तैयारी भी आवश्यकता थी। जो लोग कहते थे कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कश्मीर में खून की नदियां बहेंगी उन्होंने भी खामोशी के साथ इस बदलाव को स्वीकार किया। 370 के समाप्त होने के आसन्न खतरे से  निबटने के लिए तैयारियां की गई थीं। माओवादी आतंक को समाप्त करने के लिए एक जिस इच्छाशक्ति की आवश्यकता थी वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिखाई। परिणामस्वरूप गृहमंत्री को इस कार्य को करने में अपेक्षित शक्ति और भरोसा मिला। रणनीति बनाई गई। उसपर निश्चित समयावधि में कार्य हुआ। आज देश माओवादी आतंक से मुक्त है। जब माओवाद के आतंक के कारणों पर पर विचार कर रहा था तो एक्स पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण का एक अंश दिखा। उसमें वो कह रहे हैं कि अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेटस एजेंसी फार इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) 2024 के लोकसभा चुनाव के समय करीब 200 करोड़ रुपए भारत में भेजना चाहता था ताकि नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और को प्रधानमंत्री बनाया जा सके। यूएसएआईडी दुनिया के देशों को अलग अलग कारणों से आर्थिक मदद करता रहता है। ये आर्थिक मदद शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतंत्र को मजबूत करने आदि के नाम पर दी जाती है। अधिकतर मामलों में इस तरह की मदद स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से ही दी जाती है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस तरह का बयान पहले भी दे चुके हैं। उन्होंने दावा किया था कि 2024 में भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए धन भेजा गया था। प्रश्न उठ सकता है कि माओवादी आतंक की समाप्ति और ट्रंप के इस बयान में क्या संबंध है। इन दोनों बातों में गहरा संबंध है। इसको समझने के लिए समय समय पर विदेशी फंडिंग के नियमों को सख्त और पारदर्शी बनाने के लिए उठाए गए कदमों और उसपर मचे बवाल पर ध्यान देना होगा। इस वर्ष भी विदेशी फंडिंग को लेकर गृह मंत्रालय ने संशोधित नोटिफिकेशन जारी किया। अभी जारी नोटिफिकेशन के अनुसार गैर सरकारी संगठनों को जिस कार्य के लिए विदेश से पैसा मिलता है उस कार्य में ही खर्च करने की व्यवस्था के लिए नियम और सख्त किए गए। गैर सरकारी संगठनों के प्रशासनिक व्यय की सीमा भी तय की गई है। विदेश से मिले धन के उपयोग का प्रमाण देने के बाद ही फिर से मदद की मंजूरी मिलेगी। पहले होता ये था कि धन किसी अन्य कार्य के लिए आता था और उसका उपयोग किसी अन्य कार्य में होता था। लोकतंत्र को या सिविल सोसाइटी को मजबूत करने के लिए आनेवाले धन का उपयोग बहुधा सरकार के विरुद्ध आंदोलन में होता था। धर्मिक कार्यों या धर्म प्रचार के लिए मिलनेवाली राशि का उपयोग मतांतरण में किया जाता था। इस वर्ष के संशोधन में ये स्पष्ट किया गया है कि धार्मिक कार्यों के लिए विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का उपयोग किसी भी हाल में मतातंरण के लिए नहीं किया जा सकेगा। संविधान का अनुच्छेद 25 देश के नागरिकों को रिलीजस स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। अपने रिलीजन का अनुकरण करने और उसके प्रचार करने की भी अनुमति है। इसकी आड़ में ही मतांतरण के कार्य को अंजाम दिया जाता रहा है। इसमें विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का भरपूर उपयोग होता रहा है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में किए गए संशोधन के अनुसार अब धार्मिक प्रचार के लिए मिलनेवाले विदेशी धन से मतांतरण की अनुमति नहीं है। ऐसा पाए जानेपर लाइसेंस रद करने का अधिकार सरकार के पास होगा। 

विदेश से मिलनेवाली आर्थिक मदद गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) शिक्षा के प्रसार के नाम पर भी लेते रहे हैं। इस तरह की बात सामने आती रही है कि अमुक एनजीओ ने शिक्षा के प्रसार के लिए विदेश से आर्थिक सहायता ली लेकिन उसका उपयोग विचारधारा विशेष के प्रचार प्रसार में किया गया। विशेषकर इस तरह के मामले छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे आदिवासी बहुल इलाकों से आते रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए मिलनेवाले धन के दुरुपयोग की खबरें आती रही हैं। इस तरह के समाचार भी आते रहे हैं कि विदेश से मिलनेवाले धन का उपयोग पहले नक्सलियों और बाद में माओवादियों को मदद के लिए किया जाता रहा। इस तरह की गतिविधियां भारत की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने रहे। इस कारण से जब विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में संशोधन हुआ तब केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने का प्रयास किया गया। जब भी एनजीओ को मिलनेवाले विदेशी धन को लेकर आर्थिक अनुशासन की बात गृह मंत्रालय से की जाती है तब भी विरोध के स्वर मुखर हो जाते हैं। इसका एकमात्र कारण है कि कई एनजीओ जिस कार्य के लिए धन लेते हैं उस कार्य के अलावा अन्य काम में पैसे खर्च किए जाते हैं। माओवादियों को विदेशी मदद का एक बड़ा स्त्रोत ये भी था। अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय ने इस स्त्रोत को खत्म किया जिससे माओवादियों को मिलनेवाली आर्थिक सहायता न्यून हो गई। 

देश में सत्ता परिवर्तन का मंसूबा पाले बैठे विदेशी ताकतों को भी इससे कमजोर किया गया। ये बात सिर्फ ट्रंप ही नहीं कह रहे हैं। 12 सितंबर 2011 को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने कुछ दस्तावेज डिक्सालीफाई किए। उन दस्तावेजों से ये राज खुला कि किस तरह से भारत की स्वतंत्रता के बाद से सोवियत संघ ने कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (सीपीआई) की पूर्ण स्वामित्व वाले प्रकाशन  गृह पीपल्स पब्लिशिंग हाउस को 65 प्रतिशत तक आर्थिक अनुदान देता था। इतना ही नहीं सीपीआई के प्रकाशनों को 1984 में करीब साठ हजार डालर तक का विज्ञापन दिया जाता था। सीपीआई और उसके अनुषांगिक संगठनों के लोगों को आर्थिक मदद और सोवियत संघ की यात्रा के लिए टिकट आदि दिए जाते थे। उसमें इस बात का भी उल्लेख है कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान करीब 40 प्रतिशत संसद सदस्यों को सोवियत रूस से पैसे मिलते थे। इसकी प्रामाणिकता ना तो कभी सिद्ध हो सकती है ना ही सच सामने आता है। लेकिन खुफिया क्लासीफाई दस्तावेजों के सामने आने से संकेत तो मिलते ही हैं। प्रश्न यही है कि जब नरेन्द्र मोदी की सरकार को बदलने के लिए आर्थिक मदद की बात अंतराष्ट्रीय मंचों पर होती है तो उसपर देश में विचार तो होना ही चाहिए। क्योंकि ये धनबल के आधार पर देश की संप्रभुता पर आक्रमण जैसा मामला है। केंद्र सरकार के संज्ञान में ये बातें हैं। वो देश की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध है, ये संतोष की बात है। बात तो उन एनजीओ और उन नेताओं पर भी होनी चाहिए जो विदेश में जाकर ऐसी ताकतों से मिलते हैं जो धनबल से देश की संप्रभुता को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।         

Wednesday, July 1, 2026

प्रेम और अपराध कथा का कालटेल


गुरदत्त का नाम आते ही प्रेम और विरह, दर्द और संवेदना, दया और करुणा, मासूमियत और बेबसी जैसे शब्दों को परदे पर उतारनेवाले दृश्य याद आने लगते हैं। याद आती है उनकी फिल्में साहब बीबी और गुलाम, प्यासा और कागज के फूल। प्रतीत होता है कि कम ही लोग इस बारे में जानते होंगे कि गुरुदत्त ने सिर्फ दर्द और संवेदना वाली फिल्में ही नहीं बनाई बल्कि उनकी आरंभिक फिल्में अपराध कथाओं पर आधारित थी। जब वो फिल्मों में काम करने आए थे तो उन्होंने अपराध कथाओं पर फिल्म बनानेवाले ज्ञान मुखर्जी के साथ काम किया था। फिल्म की बारीकियां उनसे ही सीखी। देवानंद की फिल्म कंपनी नवकेतन के लिए गुरुदत्त को फिल्म निर्देशित करने का अवसर मिला। फिल्म थी बाजी, जो जुलाई 1951 में प्रदर्शित हुई थी। गुरुदत्त 39 वर्ष की आयु में दुनिया से चले गए । कम उम्र में ही उन्होंने कई कल्ट फिल्में बनाईं जिनका विश्लेषण अब भी होता रहता है। इन कल्ट मानी जानेवाली फिल्मों के अलावा गुरुदत्त ने चार अपराध कथाओं पर आधारित फिल्में बनाई -बाजी, जाल, बाज और सैलाब। ये वही दौर था जब देश में अपराध कथाओं को लेकर एक खास किस्म की उत्सकुकता का वातावरण था। अपराध कथाओं पर आधारित उपन्यास खूब बिक रहे थे। उधर हालीवुड में फिल्म नोयर मूवमेंट आरंभ हो चुका था। इस तरह की फिल्मों का नायक नायक कुटिल भी होता था, उसका संदेहास्पद होता था लेकिन जो दिखता था वो उससे अलग होता था। इन फिल्मों में ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम का उपयोग बहुतायत में होता था। फ्लैशबैक और वायस ओवर के साथ नैरेशन इस तरह की फिल्मों में एक अलग ही तरह का प्रभाव पैदा करती थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के वैश्विक परिदृश्य में इस तरह की फिल्में बननी शुरु हुई थी। हिंदी फिल्मों की दुनिया पर भी इसका असर दिखा। गुरुदत्त की इस फिल्म बाजी को भी नोयर मूवमेंट का हिस्सा माना गया। 1951 में प्रदर्शित फिल्म बाजी के नायक देवानंद और नायिका गीता बाली और कल्पना कार्तिक थी। फिल्म में अधिकतर गीत गीता दत्त ने गाए थे। इस फिल्म का संगीत एस डी बर्मन ने दिया था। संगीत में गजब किस्म का आकर्षण है। गीता दत्त की आवाज में गाया गीत ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ या ‘ये कौन आया कि मेरे दिल की दुनिया में बहार आई’ की धुन अब भी लोगों के स्मरण में है।

फिल्म की कहानी बहुत अलग नहीं थी। फिल्म का नायक मदन (देव आनंद) एक संपन्न परिवार से आता है लेकिन परिस्थियों के कारण जीवन यापन कठिन हो जाता है। वो छोटी बहन मंजू (रूपा वर्मन) के साथ रहता है। रोजगार की तलाश में भटकते भटकते जुआ खेलने लगता है। एक दिन एक होटल में उसकी भेंट डांसर लीना (गीता बाली) से होती है। लोग लीना की अदाओं के दीवाने हैं। मदन को अपने होटल में देख लीना उसको अपने बास के लिए काम करने का आफर देती है। मदन के अंदर बची खुची नैतिकता उसको ऐसा करने से रोक देती है। वो लीना के प्रस्ताव को ठुकरा कर घर लौट आता है। अपनी बहन के इलाज के लिए वो डा रजनी (कल्पना कार्तिक) से मिलता है और दोनों में नजदीकियां बढ़ जाती हैं। डा रजनी के पिता को ये मंजूर नहीं था। बदलते घटनाक्रम में रजनी का एक इंसपेक्टर से विवाह हो जाता है। बहन के इलाज के लिए पैसों की जरूरत मदन को लीना के पास ले जाता है। लीना से मिलकर वो उसके बास के लिए काम करने की हामी भर देता है। दोनों एक दूसरे से अपना सुख-दुख बतियाते हैं। कथा का प्रवाह तेज होता है और एक दिन की लीना की हत्या हो जाती है। जिस रिवाल्वर से उसकी हत्या होती है उसपर मदन की अंगुलियों के निशान पाए जाते हैं। मुकदमा चलता है और मदन को फांसी की सजा होती है। इंसपेक्टर को इस हत्याकड पर शक था। वो जाल बिछाता है जिसमें लीना हत्याकांड का असली दोषी फंस जाता है। कहानी बेहद कसावट के साथ घटनाओं में पिरोई गई है। दो छोटी प्रेम कथाओं के समांतर एक अपराध कथा चलती है जो दर्शकों को बांधे रखती है। गुरुदत्त प्रेम और अपराध का ऐसा काकटेल बनाते हैं जिसके सम्मोहन में दर्शक बंधे रहते हैं। गुरदत्त शताब्दी वर्ष में एक बार फिर से गुरुदत्त की उन फिल्मों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो विश्लेषकों और फिल्म इतिहासकारों की दृष्टि ससे झल हैं। 75 वर्ष पहले बनी फिल्म बाजी उनमें से एक है। 


Saturday, June 27, 2026

कम्युनिस्ट खतरों से आगाह करते ट्रंप


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों की वैश्विक स्तर पर चर्चा होती ही रहती है। लेकिन उनका एक बयान इन दिनों अमेरिका में खूब चर्चा बटोर रहा है। इंटरनेट मीडिया पर उसके पक्ष विपक्ष में लगातार टिप्पणियां प्रकाशित हो रही हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने एक सार्वजनिक भाषण में कम्युनिस्टों के आसन्न खतरे के बारे में बेहद कठोर बातें की हैं। उन्होंने कहा कि ‘कम्युनिस्ट एक बार फिर से क्रिश्चियन और चर्च के विरुद्ध युद्ध आरंभ करना चाहते हैं। वो सरकार और चर्च को अलग करके देखने की वकालत करते रहते हैं। आपने देखा कि किस तरह से कम्युनिस्टों ने एकजुट होकर न्यूयार्क में चुनाव जीता। वो पूरी तरह से अमेरिकी जीवन पद्धति को समाप्त करना चाहते हैं। कम्युनिज्म को फैलाना बहुत आसान है पर जो इसकी चपेट में आता है वो गंदगी में जीवन जीने को मजबूर होता है। न तो खाना मिलता है, न ही आवास की व्यवस्ता हो पाती है, न ही सेना होती है और ना ही कानून व्यवस्था बन पाती है। वहां कुछ भी नहीं होता है और तीसरी दुनिया के देशों की तरह हो जाते हैं जहां सभी पीड़ित होते हैं या मरने के लिए अभिशप्त।‘  दरअसल अमरिका में क्रिश्चियनिटी और चर्च पर लगातार हो रहे प्रहारों को ध्यान में रखते हुए ट्रंप प्रशासन ने रिलीजस लिबर्टी कमीशन बनाया था। उसके चेयरमैन ने अपने अध्ययन के आधार पर कहा कि ‘वे (कम्युनिस्ट) अमेरिका से गाड  (भगवान) को हटाना चाहते हैं, चर्चों को बंद करना चाहते हैं और आस्थावान अमेरिकियों को दंडित करना चाहते हैं। अमेरिका की कट्टरपंथी ताकतें अमेरिका से गाड को मिटाना चाहती हैं, लेकिन ऐसा होने नहीं देंगे। अमेरिका फर्स्ट का अर्थ है गाड फर्स्ट।‘ उन्होंने अमेरिकी जनता का आह्वान किया कि वो देश में मौजूद कट्टरपंथी ताकतों के विरुद्ध खड़े हों और अपनी रिलीजस लिबर्टी के लिए अंतिम सांस तक लडें। रिलीजस लिबर्टी कमेटी के चेयरमैन ने राष्ट्रपति ट्रंप के सामने ही अपनी बातें कही। उनके इन निष्कर्षों के सार्वजनिक होने करने के बाद अमेरिका में क्रिश्चियनिटी पर आसन्न खतरे को लेकर बहस आरंभ हो गई है। 

रिलीजस लिबर्टी और कम्युनिस्टों की प्रविधि की इस बहस में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाले रूसी लेखक सोल्झेत्सिन का लिखा एक वाक्य अमेरिका में इंटरनेट मीडिया पर जमकर उद्धृत किया जा रहा है। सोल्झेत्सिन ने रूस में राजनीतिक उत्पीड़न पर लिखकर पूरी दुनिया को बताया था। सोल्झेत्सिन ने लिखा था कि ‘कम्युनिस्ट सिस्टम में अपराधियों को बख्श दिया जाता है और राजनीतिक विरोधियों को अपराधी बना दिया जाता है।‘ दरअसल अमेरिकी प्रशासन इस समय क्रिश्चियनिटी के प्रति अनुरागी लोगों की संख्या कम होने को लेकर चिंतित है। एक अनुमान के मुताबिक इस समय अमेरिका के शहर न्यूयार्क में 40 प्रतिशत लोग गैर क्रिश्चियन हैं। वहां इस बात पर बहस हो रही है कि क्या प्रवासियों के कारण देश की अस्मिता और वहां का रिलीजन संकट में है। अमेरिका में जिस तरह से हैती और सीरियन समुदाय के लोगों की संख्या बढ़ रही है उसके विरुद्ध जनमानस तैयार करने का प्रयास ट्रंप और उनके सहयोगी कर रहे हैं। अब तो इसपर भी बात होने लगी है कि जिस धर्म को माननेवाले आतंकवादियों ने वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमला किया और अमेरिका को चुनौती दी उसी समुदाय के लोग एक बार फिर इकट्ठा होकर क्रश्चियनिटी को चुनौती देते प्रतीत हो रहे हैं। उस समुदाय को कम्युनिस्टों का प्रत्यक्ष समर्थन भी मिल रहा है। अमेरिकियों का एक पढ़ा लिखा तबका भी उनके समर्थन में दिखता है। स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह से तुष्टीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है उसको लेकर ट्रंप और उनकी पार्टी के लोग अमरिका में चिंता का माहौल बनाने का प्रयास करते दिख रहे हैं। 

भारत में कम्युनिस्टों की स्थिति को देखें तो ऊपरी तौर पर ये लगता है कि चुनावों में उनकी निरंतर हार के बाद वो अपने सबसे बुरे दौर में हैं। कम्युनिस्ट भले ही कमजोर प्रतीक हो रहे हों लेकिन जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस पार्टी को समर्थन करना आरंभ किया है उसको रेखांकित करना आवश्यक है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी के हैदराबाद प्लेनरी सेशन में स्पष्ट रूप से ये माना था कि पार्टी की हिंदुत्व के कारण नहीं बल्कि अपनी संगठन की कमजोरी से जूझ रही है। वही राहुल गांधी कालांतर में कम्युनिस्टों के एजेंडे पर आते दिखे। आज कांग्रेस पार्टी की नीतियों में कम्युनिस्ट विचारों की छाप स्पष्ट दिखती है। हिंदुत्व पर आक्रमण अब पार्टी के केंद्र में है। इसके अलावा अकादमिक जगत में अब भी कम्युनिस्टों के प्रभाव को महसूस किया जा सकता है। विशेषकर भाषा और संस्कृति के विषयों में जिस तरह की पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं उनमें वामपंथी विचार और उसके पैरोकारों की बहुलता है। अब भी कई विश्वविद्यासयों में कल्चरल स्टडीज के पाठ्यक्रम में वाम विचार की प्रधानता है। ये वही विचार है जो भारत और भारतीयता के विषयों और सिद्धांतों का निषेध करने के लिए विदेशी और आयातित विचारों को लेकर आते हैं। विदेशी विचारों के आधार पर अकादमिक जगत में विमर्श होते हैं। अमेरिका में भी पढ़े लिखे लोगों के एक वर्ग के कम्युनिस्ट विचार को आगे बढ़ाने वाले के तौर पर पहचान की गई है। भारत में तो स्वाधीनता के बाद लंबे समय तक उनको ही पढ़ा लिखा माना जाता रहा जो कम्युनिस्ट थे या फिर मार्क्स के अनुयायी थे। कहना ना होगा कि अब भी यह प्रवृत्ति अकादमिक जगत में है कि वहां कोई पढ़ा लिखा या विद्वान तभी समझा जाता है जब उसकी आत्मा लेफ्ट की तरफ झुकी हो। सुविचारित तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। 

यह अनायास नहीं है कि अमेरिका अपने देश और धर्म को सांस्कृतिक मार्क्सवाद से बचाकर रखना चाहता है। वहां चिंता इस बात पर है कि संस्कृतिक मार्क्सवाद पहले परिवार नाम की संस्था को नुकसान पहुंचाता है। फिर धर्म को निशाना बनाता है और निजी संपत्ति को लेकर विरोध का माहौल बनाता है। इन सब लक्ष्यों को पूरा करके वो राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने के लक्ष्य की ओर बढ़ता है। हमारे देश में भी स्वादीनता के बाद सांस्कृतिक मार्क्सवाद के दुष्परिणामों को देखा जा सकता है। किस तरह से संयुक्त परिवार की अवधारणा को एकल परिवार की तरफ मोड़ दिया गया। धर्म की तुलना अफीम से करके नास्तिकता को बढ़ावा दिया गया। जो लोग धार्मिक प्रतीक चिन्हों को धारण करते थे उनको पोंगापंथी या दकियानूसी करार दिए जाते सबने देखा है। पिछले लोककसभा चुनाव में निजी संपत्ति के स्कैनिंग करवाने जैसे बयान भी सुने गए थे। इसके बाद राष्ट्र की अवधारणा को प्रश्नांकित कर उसको कमजोर करने के मंसूबे भी स्पष्ट ही हैं। सांस्कृतिक मार्क्सवाद की इस राह की सबसे बड़ी बाधा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके विचार हैं। सभ्यतागत मूल्यों की पुनर्स्थापना के प्रयत्नों से नरेन्द्र मोदी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जड़ें मजबूत कर रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि अमेरिका की तरह भारत में कम्युनिस्टों के विरोध में निरंतर बोला और लिखा जाना चाहिए। महत्वपूर्ण यह भी है कि अकादमिक जगत में उनके वर्चस्व को चुनौती देने का संगठित प्रयास हो। 


Saturday, June 20, 2026

सफल राजनय का फार्मूला मोदीनामिक्स


विश्व के सात उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी 7 की बैठक फ्रांस के शहर एवियन में हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस सम्मेलन में भाग लेने का समाचार आया तो सबकी निगाहें प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की वहां होनेवाली मुलाकात पर टिक गई। सम्मेलन संपन्न हुआ। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच भेंट हुई। मोदी विरोधियों को उम्मीद थी कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच कुछ ऐसा घटित होगा जिससे कि मोदी को घेरा जा सकेगा। हुआ इसके ठीक विपरीत। प्रधानमंत्री जब सम्मेलन कक्ष में पहुंचे तो राष्ट्रपति ट्रंप अपनी कुर्सी से उठकर उनसे गर्मजोशी से मिले। द्विपक्षीय वार्ता के बाद साझा प्रेस कांफ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्रशंसा पर व्यापक चर्चा हो चुकी है इस कारण दुहराने का अर्थ नहीं। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत में मोदी विरोधियों की आशाओं पर पानी फेर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान-अमेरिका संघर्ष के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा भी राष्ट्रपति ट्रंप के सामने उठाया। मजबूती के साथ अपनी बात रखी। इस पूरी प्रेस कांफ्रेस में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप बहुत सहज दिखे।

इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की। जब उनसे महान नेता की परिभाषा पूछी गई तो उन्होंने कहा प्रधानमंत्री मोदी जो 12 वर्ष से प्रधानमंत्री हैं और बहुत सालिड हैं। वो काम बहुत शांति से करते हैं लेकिन बहुत सख्त हैं। ये मैं बहुत अच्छे से जानता हूं। वो 150 करोड़ आबादी वाले देश के नेता है और निरंतर बने हुए है। जब ट्रंप बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के लिए शांत लेकिन सख्त शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो इसका विश्लेषण करना चाहिए। पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 भारतीयों की धर्म पूछकर हत्या की थी। उस आतंकी वारदात के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए आपरेशन सिंदूर आरंभ किया। पाकिस्तान ने भारत पर ही हमला कर दिया जिसका बारतीय सेना ने मुंहतोड़ जबाव दिया। 10 मई को संघर्ष विराम हुआ। तब से कई महीनों तक जब भी राष्ट्रपति ट्रंप को अवसर मिलता वो इस बात को कहते थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम उन्होंने ही करवाया। इस बात को उन्होंने पचास से अधिक बार दुहराया। जब भी डोनाल्ड ट्रंप ये बात कहते तो यहां विपक्षी दलों के नेता प्रधानमंत्री को घेरने का प्रयत्न करते। उनकी विदेश नीति को लेकर प्रश्न खड़े करने लगते। उसी समय अमेरिका ने एकतरफा टैरिफ बढ़ाने की घोषणा कर दी थी। उस दौर में राष्ट्रपति ट्रंप भारत को लेकर सकारात्मक टिप्पणी नहीं करते थे। एक बार तो उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के डेड (मृत) होने की बात तक कह डाली थी। उनके बयानों पर यहां मोदी विरोधी सक्रिय हो जाते। ये सिलसिला कई महीनों तक चला। इस बीच प्रधानमंत्री कनाडा के दौरे पर गए थे। उनकी और ट्रंप की फोन पर बातचीत हुई। ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से वाशिंगटन होते हुए भारत लौटने का निमंत्रण दिया। राष्ट्रपति ट्रंप के उस अनुरोध को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देकर टाल दिया था। इसको अंतराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़े कदम के तौर पर देखा गया था। ट्रंप की बयानबाजियों का मोदी ने कोई नोटिस ही नहीं लिया। कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। मोदी की इस उदासीनता के भाव ने अमेरिका के साथ कूटनीतिक संबंधों को नया आयाम दे दिया।

खाड़ी संकट के दौरान हार्मूज जलडमरूमध्य के बंद होने पर जब कच्चे तेल का संकट हुआ तो भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखा। अमेरिका ने रूस से तेल खरीद पर प्रतिबंध लगाया था पर भारत-रूस संबंध पर उसका असर नहीं पड़ा। अमेरिका ने एकतरफा प्रतिबंध लगाया था और अपनी तरफ से ही एक महीने की छूट दी। वो छूट भी खत्म हो गई लेकिन उसके बारे में फिर कोई बयान नहीं आया। इस वर्ष जून में जिस मात्रा में भारत रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है वो एक नया कीर्तिमान बनने की ओर बढ़ रहा है। शिप ट्रैकिंग डाटा के अनुसार भारत अपनी जरूरतों के 50 प्रतिशत से अधिक तेल रूस से आयात कर रहा है। बिना किसी शोर शराबे के और बयानबाजी के ये काम निर्बाध गति से चलता रहा। ये प्रधानमंत्री मोदी का अपना इकोनामिक्स है जिसको अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदीनामिक्स कहा जाने लगा है। दरअसल जब राष्ट्रपति ट्रंप मोदी को टफ निगोशिएटर कहते हैं तो उसके पीछे मोदी की खामोश पर दृढ़ निर्णयों की पृष्ठभूमि है। राहुल गांधी भले ही प्रधानमंत्री मोदी को कंप्रोमाइज्ड प्राइम मिनिस्टर कहें लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री की जो स्थिति है वो इस बयान को बचकाना बयान साबित करता है। फ्रांस में जी 7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जितने भी वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं वो सब इस बात की गवाही देने के लिए पर्याप्त है कि मोदोनामिक्स कैसे काम कर रहा है। आज अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदी ने वैश्विक नेताओं के साथ जिस तरह का रैपो बनाया है या कहें कि जिस तरह के व्यक्तिगत संबंध बनाए हैं उसका लाभ देश को हो रहा है। इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भले ही मजाक में कहा हो कि वो और मोदी वायरल कपल हैं लेकिन इससे दोनों देशों के संबंधों में एक निकटता झलकती है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने जिस तरह से हिंदी में बोलकर प्रधानमंत्री का स्वागत किया और भारत-फांस मैत्री के अमर रहने की बात की वो दोनों देशों की निकटता को दर्शाता है।

इतना ही नहीं खाड़ी संकट के दौरान प्रधानमंत्री ने खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत किया वो भी अंतराष्ट्रीय राजनय में एक मिसाल है। इतने लंबे संघर्ष के दौरान उन देशों में रहनेवाले भारतीयों की सुरक्षा को अहम स्थान मिला। दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के बाजार की ताकत को ना केवल पहचानते हैं बल्कि अपनी इस ताकत का उपयोग अंतराष्ट्रीय राजनय में बहुत बेहतर तरीके से करते हैं। बगैर आक्रामक दिखे दृढता से देशहित के लिए कदम उठाते रहते हैं।  150 करोड़ भारतवासियों की ताकत और राजनय में प्रधानमंत्री का गांभीर्य मोदीनामिक्स को विशिष्टता प्रदान करता है। यह अनायास नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति कहता है कि अगर भारत पर संकट आया तो वो साथ खड़ा रहेगा। अगली ही पंक्ति में ये भी कह देता है कि जबतक मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अगर खाड़ी संकट नहीं आता और देश की अर्थव्यवस्था पर उसका असर नहीं पड़ता तो भारत ने विकास की जो रफ्तार पकड़ी थी वो कायम रहती। खाड़ी संकट के दौरान ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत ने जिस तरह की रणनीति अपनाई उसके कारण ही जनता पर बहुत अधिक बोझ नहीं पड़ा। जिस तरह से ऊर्जा चुनौतियों का सामना भारत ने किया और नई जगहों से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया वो एक केस स्टडी है। आनेवाले समय में प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में जब उपलब्धियों और चुनौतियों पर शोधादि होंगे तो मोदीनामिक्स उसके केंद्र में होगा।   


Sunday, June 14, 2026

महाकवि के प्रति उदासीनता


आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लेखन पर कुछ काम करते हुए कवि भूषण के बारे में उनकी राय सामने आई। आचार्य शुक्ल ने कवि भूषण को ‘हिंदू जाति का प्रतिनिधि’ कवि कहा है। जाति से आचार्य शुक्ल का आशय किसी ‘कास्ट’ से नहीं बल्कि हिंदू राष्ट्रीयता से है क्योंकि हिंदू कोई जाति तो है नहीं। आचार्य शुक्ल की ये टिप्पणी दिमाग में बैठक गई। इसके कुछ दिनों बाद दैनिक जागरण में प्रकाशित एक समाचार ने ध्यान खींचा। समाचार का शीर्षक था, साझा संस्कृति का केंद्र बनेगा महाकवि का गांव। बात कवि भूषण के पैतृक गांव की हो रही थी जो कि कानपुर का टिकवांपुर है। समाचार में विस्तार से बताया गया था कि किस तरह से कवि भूषण के पैतृक आवास में चलनेवाले प्राथमिक विद्यालय का भवन जर्जर हो चुका था। इस जर्जर भवन के कमरों में ग्रामीण भूसा भंडारण कर रहे थे और परिसर में मवेशी पालन हो रहा था। इस भवन को ठीक कराने का आदेश हुआ। कवि भूषण हिंदी के शीर्ष कवियों में माने जाते हैं। उन्होंने शिवाजी महाराज की वीरता और पराक्रम पर विस्तार से लिखा है। उनके द्वारा रचित शिवा-बावनी में शिवाजी महाराज के युद्ध कौशल, उनकी रणनीति, तेज गति से चलती उनकी तलवार आदि के बारे में विस्तार से लिखा है। कवि भूषण का कालखंड मुगल राजा औरंगजेब के समय का था। जब औरंगजेब मंदिरों को तोड़ता था तो समाचार सुनकर कवि भूषण विचलित हो जाते थे। उनकी लेखनी चलती थी और उससे राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होकर जो छंद निकलते थे उसमें औरंगजेब से पीड़ित जनता का स्वर होता था। उन्होंने शिवाजी के माध्यम से हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए जो रचनाएं की उसने भारत की जनता के मध्य राष्ट्र के प्रति एक अनुराग पैदा किया। शिवाजी महाराज की प्रशंसा में जो रचनाएं उन्होंने लिखी उसका लक्ष्य भी जनता के बीच शिवाजी को हिंदू संस्कृति के रक्षक के तौर पर स्थापित करना था। उन्होंने लिखा- ‘मीड़ि राखे मुगल मरोड़ि राखे पातसाह बैरी पीसि राखे बरदान राख्यौ कर मैं/राजन की हद्द राखी/तेग-बल सिवराज देव राखे देवल स्वधर्म राख्यो घर मैं।‘ इससे स्पष्ट है कि वो अपनी कविताओं में शिवाजी महाराज को देवतुल्य बताकर जनता को प्रेरित करते थे। अनायास नहीं था कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल उनको हिंदू जाति का प्रतिनिधि कवि मानते थे। 

हिंदू जाति के ऐसे प्रतिनिधि कवि के पैतृक आवास की ये स्थिति क्यों है ? हिंदू जाति अपने नायकों की स्मृति को क्यों नहीं सहेज सकती। इन प्रश्नों के साथ कुछ दिनों पूर्व कोलंबिया यात्रा में बोगोटा में वहां के नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्केज के बारे में जानना चाहा। वहां के लेखकों ने जानकारी दी कि कोलंबिया ने उनकी यादों को सहेजा हुआ है। बोगोटा में वो बहुत अधिक दिन नहीं रहे थे। जितने भी दिन बिताए और जहां भी उनका कार्यस्थल रहा उसको बोगोटा ने सहेजा। वहीं पता चला कि कोलंबिया के ही शहर कार्टेघाना में गैब्रियल गार्सिया मार्केज का घर अब भी सुरक्षित और जस का तस है। कोलबिंया आने वाले पर्यटक उस घर को देखने जाते हैं। लाल ईंटों से बनी उस इमारत में उनकी स्टडी, उनका लिविंग रूम को मूल स्वरूप में संभाल कर रखा गया है। ये वही स्थान है जहां मार्केज ने अपनी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की थी। इस वर्ष अप्रैल में अंतराष्ट्रीय माचार माध्यमों में इस बात की खूब चर्चा रही कि किंग्स कालेज लंदन की एक प्रोफेसर लूसी मुनरो ने विलियम शेक्सपियर के घर का सटीक स्थान खोज निकाला। श्कसपियर के घर के सटीक स्थान को लेकर इसके पहले तक भ्रम था। बताया जाता था कि वो इसी स्थान पर कहीं रहते थे। कहने का आशय ये है कि एक प्रोफेसर वर्षों तक अपने सम्मानित लेखक के घर को ढूंढने में रही। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसने ये काम कर दिया। हम अपनी भाषा के पूर्वज लेखकों, उनसे जुड़ी धरोहरों को लेकर इतने उदासीन क्यों हैं। इस पूरे प्रसंग को लिखते हुए याद आता है प्रयागराज के मालवीय नगर इलाके में पंडित बालकृष्ण भट्ट का निवास। सरस्वती पत्रिका के संपादक स्व देवीदत्त शुक्ल के पौत्र व्रतशील शर्मा के साथ भट्ट जी के घर गया था। जर्जर अवस्था में था उनका घर। उनके परिवार के लोगों ने काठ वो चौकी बचा रखी थी जिसपर बैठकर भट्ट जी ‘प्रदीप’ का संपादन किया करते थे। तब उनके घर की स्थिति को देखकर बहुत पीड़ा हुई थी। अब कवि भूषण के पैतृक घर की स्थिति के बारे में जानकार दुख बढ़ गया। कवि भूषण के जन्म स्थान पर उनका भव्य स्मारक बनाया जाना चाहिए। हिंदू जाति के इस प्रतिनिधि कवि की यादों को संजोने के लिए और आगे आनेवालि पीढ़ी को ये बताने के लिए वहां उनकी रचनाओं पर आधारित म्यूजियम बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को पहल करनी चाहिए। इस कार्य में महाराष्ट्र सरकार को भी आगे आकर उत्तर प्रदेश सरकार का सहयोग करना चाहिए। कवि भूषण का नाम भारत के गौरव शिवाजी महाराज से जुड़ता है। अगर उत्तर प्रदेश सरकार और महाराष्ट्र सरकार ठान ले तो टिकवांपुर में कवि भूषण का भव्य और दिव्य स्मारक बनने में देर नहीं लगेगी।    


  


Saturday, June 13, 2026

तुष्टीकरण पर वैश्विक चिंता


भारतीय राजनीति में इन दिनों घुसपैठियों की जमकर चर्चा होती है। चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान के आरंभ के बाद से ही घुसपैठियों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी होने लगी है। पश्चिम बंगाल के चुनाव के समय भी घुसपैठिए चर्चा के केंद्र में रहे। बंगलादेश से लगी भारत की सीमा पर चुनाव आयोग के विशेष पुनरीक्षण अभियान के समय और चुनाव परिणाम के बाद घुसपैठियों के देश लौटने की तस्वीरें भी पूरे देश ने देखीं। घुसपैठियों की ये समस्या सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। इस समस्या से यूरोप के कई देश और अमेरिका भी जूझ रहा है। इस माह के आरंभ में ब्रिटेन में भारतीय मूल के एक युवक को एक ब्रिटिश युवक की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सजा के कुछ दिनों पूर्व हत्याकांड के वीडियो के सामने आने के बाद पूरे ब्रिटेन में प्रवासियों के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा। दरअसल हुआ कि जब ब्रिटेन के युवक पर हमला हुआ और पुलिस घटनासथल पर पहुंची तो पुलिस ने 18 वर्ष के घायल युवक हेनरी को अस्पताल पहुंचाने के बजाए उसको ही हथकड़ी पहना दी। उसकी कराह और स्थिति से भी पुलिस का दिल नहीं पसीजा। उसकी मौत हो गई। ब्रिटेन में इस कांड के वीडियो सामने आने के बाद प्रवासियों और घुसपैठियों के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया है। इनके अधिकारों को लेकर बहस भी चल पड़ी है। बहस तो तुष्टीकरण को लेकर भी हो रही है, रिलीजन को लेकर भी हो रही है। पूरे ब्रिटेन में मृत युवक हेनरी की स्मृति और समर्थन में युवक और युवतियां घुटनों पर बैठकर अपने वीडियो जारी कर रहे हैं। अपनी मौत के पहले हेनरी भी इसी तरह पुलिस वालों से गुहार लगा रहा था।

हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का एक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो रहा है। इस वीडियो में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर से पूछा जाता है कि क्या अब भी ब्रिटेन एक क्रिश्चियन देश है?  उनका सीधा उत्तर नहीं आता। वो कहते हैं कि अगर क्रिश्चियन देश की बात है तो मैं स्वयं एक क्रिश्चियन हूं और चर्च में मेरा विश्वास है। हमारे अनौपचारिक संविधान में भी क्रिश्चियनिटी की बात प्रमुखता से है। वे इतने पर ही नहीं रुकते हैं और आगे कहते हैं कि हम अनेक मतों को सेलिब्रेट करते हैं और मैं इसके लिए गर्व का अनुभव करता हूं। इस बयान के बाद ब्रिटेन में रिलीजन को लेकर भी एक नई बहस छिड़ गई है। बहस ये कि क्या क्रिश्चियनिटी को ब्रिटेन में कम महत्व मिल रहा है। ब्रिटेन के मूल निवासियों के एक वर्ग में अपने प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर नाराजगी है। उनका तर्क है कि अन्य मतावलंबियों को सम्मान मिले लेकिन देश को अपने मूल रीलिजन को प्रमुखता और प्राथमिकता होनी चाहिए। इस बहस ने ब्रिटेन की सीमा को पार कर लिया है। फ्रांस और जर्मनी के अलावा अमेरिका भी इस बहस में शामिल हो गया है। रिलीजन के अलावा चर्चा राज्य के दायित्व पर हो रही है। पूछा जा रहा है कि राज्य पीड़ित के पक्ष में दया और न्याय का भाव रखे या नहीं। ब्रिटेन में हेनरी पर हमले के बाद देखा गया कि पीड़ित के साथ पुलिस ने दया नहीं दिखाई। अपने स्तर का न्यायपूर्म व्यवहार भी नहीं कर पाई। वार से घायल हेनरी जमीन पर तड़पता रहा और पुलिस उसको घुटने के बल पर बैठा कर हथकड़ी लगाती रही। ब्रिटेन की बहस अब राष्ट्रीय अस्मिता और पहचान तक पहुंच गई है। ब्रिटेन किसका ? ब्रिटेन का कानून किसके लिए? मूल निवासियों के लिए या प्रवासियों और घुसपैठियों के लिए। बहस ने ब्रिटेन की राजनीति को भी प्रभावित करना आरंभ कर दिया है।

ब्रिटिश युवक की हत्या और उसके बाद घुसपैठियों और प्रवासियों को लेकर चलनेवाली बहस सीमाओं से आगे निकल गई है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वांस ने एक्स पर हेनरी का वीडियो साझा करते हुए लिखा कि हेनरी नोवाक उसी तरह से मरा है जिस तरह से एक सभ्यता की मौत होती है। प्रशासन ने ना तो उस पर विश्वास किया। ना ही उसका ध्यान रखा। हथकड़ी लगाकर मरने के लिए छोड़ दिया। उसपर हेट क्राइम का आरोप भी लगाया जो उसने किया ही नहीं था। जे डी वांस ने अपने लंबे पोस्ट में लिखा कि हेनरी इस तरह के अपराध में जान गंवाने वाला पहला युवक नहीं है और ना ही आखिरी होगा। इस तरह की घटना के प्रतिवाद का एकमात्र रास्ता है न्यापूर्ण तरीके से क्रोध का प्रदर्शन। अंत में वांस ने लिखा कि हम अपनी सभ्यता और अपने देश को प्यार करते हैं। अपने बच्चों से प्यार करते हैं और किसी की भी जान हेनरी नोवाक की तरह न जाए इसका ध्यान रखना होगा। उपराष्ट्रपति जे डी वांस के अलावा उद्गोयपति एलान मस्क ने भी इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देकर उसको अंतराष्ट्रीय मसला बना दिया। वो तो सिविल वार होने तक की टिप्पणी कर गए। यूरोप में जनता का न्यायपूर्ण क्रोध बढ़ता जा रहा है और इसने ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के अलावा नीददरलैंड और स्वीडन को भी अपनी चपेट में ले लिया है। कहा जा रहा है कि इन देशों की सरकारों की उदारवादी नीतियों ने मूल निवासियों के अधिकारों को खतरे में डाल दिया है।

जब भारत में घुसपैठियों और तुष्टीकरण की बात होती है तो यहां का कथित लिबरल तबका इसका विरोध करता है। उदारता और समानता के सिद्दांतों की बातें होने लगती हैं। हमारा देश भी घुसपौठियों के कारण अनेक समस्याओं से जूझता रहा है। बंगाल का ही उदाहरण लें तो वहां पूर्व में जिस तरह से घुसपौठियों को आधार कार्ड और राशन कार्ड देकर वैधता प्रदान की गई उसके पीछे वोट और सत्ता पाने की मंशा थी। हमारे देश ने भी तुष्टिकरण का लंबा दंश झेला है। तुष्टीकरण के कारण ही अपराधियों और गैंगस्टरों का बड़ा वर्ग तैयार हुआ था। बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें। वहां तुष्टीकरण के कारण ही अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसी खूंखार अपराधी ना केवल जन्मे बल्कि उन्होंने अपना साम्राज्य खडा कर लिया। ये तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि उत्तर प्रदेश के अपराधी को लंबे समय तक पंजाब की जेल में रखा गया। कानूनी प्रक्रिया के बाद उसको उत्तर प्रदेश की जेल में लाया जा सका। ये उस तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि मुंबई बम धमाकों के अपराधी याकूब मेनन के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच आधी रात के बाद सुनवाई के लिए बैठी थी। आज हमाररे देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या हम भी यूरोप और अमेरिका की तरह भारत के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा की राजनीति करें या इसको छोड़कर घुसपैठियों को वैधता प्रदान कर सत्ता के लिए राजनीति चमकाएं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा केंद्रीय हो सकता है। अभी से इसके आसार दिखने लगे हैं। राजनीतिक दल मुद्दा बनाएं या नहीं लेकिन समाज को भी इस बारे में सोचना होगा। न्यापूर्ण क्रोध का प्रदर्शन करना होगा।   

Friday, June 5, 2026

जाग्रत समाज बनाएगी पुस्तक संस्कृति


कुछ वर्ष पहले की बात है। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्तशासी संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की वेबसाइट पर क्रय की जानेवाली पुस्तकों की सूची प्रकाशित हुई थी। उसमें एक पुस्तक थी जिसका नाम था मदर आफ डेमोक्रेसी इंडिया। संस्था की वेबसाइट पर क्रय की जानेवली पुस्तकों की सूची में इस पुस्तक का मूल्य पांच हजार रुपए बताया गया था। पुस्तक प्रकाशक या विक्रेता की तरफ से छूट भी प्रस्तावित थी। उसके बाद पुस्तक का मूल्य तीन हजार (स्मरण के आधार पर) के करीब था। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की बैठक में इस पुस्तक को लेकर प्रश्न उठा था। किसी सदस्य ने प्रश्न उठाया था कि यही पुस्तक जब बाजार में किसी अन्य प्रकाशन, संभवत: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से सात सौ रुपए मूल्य पर उपलब्ध है तो फाउंडेशन इतनी महंगी पुस्तक क्यों खरीद रहा है। ये जानकारी नहीं है कि उक्त पुस्तक की खरीद राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में हुई या नहीं। ये इस लेख का विषय भी नहीं है। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन और उसके क्रियाकलाप पर भी चर्चा करना उद्देश्य नहीं है। उक्त उदाहरण से एक बड़ा प्रश्न भारतीय प्रकाशन जगत के सामने खड़ा होता है कि सरकारी खरीद के लिए पुस्तकों के मूल्य बहुत ज्यादा और बाजार के लिए उसी पुस्तक का मूल्य कम क्यों रखे जाते हैं? ये तो एक उदाहरण है जबकि प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि ये तो सामान्य बात है। कवर अलग करके पुस्तकों का मूल्य कई गुणा बढ़ा दिए जाते हैं। बढ़े हुए मूल्य पर खरीद भी होने की बात की जाती है। समय आ गया है कि हिंदी के प्रकाशकों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि पुस्तकों के मूल्य का मानकीकरण होना चाहिए या नहीं। 

अभी मेरे सामने एक ही प्रकाशन से प्रकाशित दो पुस्तकें रखी हैं। एक हार्ड बाउंड है और दूसरा पेपरबैक। हार्ड बाउंड पुस्तक की पृष्ठ संख्या 200 है और उसका मूल्य रु 499 है। पेपरबैक पुस्तक की पृष्ठ संख्या 191 है और मूल्य रु 299 है। अन्य प्रकाशक की एक पुस्तक में पृष्ठ है 120 और मूल्य है रु 200। एक और प्रकाशन से प्रकाशित पेपरबैक पुस्तक में पृष्ठ है 230 मूल्य है रु 500। लेख लिखने के क्रम में दर्जनों पुस्तकों की पृष्ठ संख्या और मूल्य देखा। एक ही प्रकाशन से एक ही जैसे कागज पर एक ही आकार में और लगभग समान पृष्ठ संख्या की प्रकाशित पुस्तकों के मूल्य अलग-अलग हैं। उनको देखकर कोई अनुमान नहीं लगा सकता है कि प्रकाशकों ने पुस्तकों के मूल्य निर्धारण का क्या फार्मूला तय किया है। कई प्रकाशकों से मूल्य निर्धारण को लेकर बात की तो पता चला कि आमतौर पर एक रुपए प्रति पृष्ठ की दर से पुस्तकों का मूल्य निर्धारण होता था। अब ये दर बढ़कर दो रुपए प्रति पेज तक पहुंच गया है। एक प्रकाशक ने बताया कि पुस्तक की लागत से चार से छह गुणा अधिक मूल्य रखा जाता है। उनका तर्क था कि पुस्तक विक्रेताओं को चालीस प्रतिशत तक कमीशन और करीब तीन महीने का क्रेडिट देना होता है। ई-कामर्स प्लेटफार्म अब प्रकाशकों से 50-55 प्रतिशत कमीशन की मांग करने लगे हैं। इस कारण पुस्तक का मूल्य लागत के चार से छह गुणा अधिक रखा जाता है। बड़े प्रकाशक तो फिर भी अपने प्रकाशनों के बल पर मूल्यों को नियंत्रण में रख पातें हैं लेकिन कई छोटे प्रकाशक अपनी एक अच्छी पुस्तक से ही मुनाफा कमाने के चक्कर में अधिक मूल्य रख देते हैं। इससे कई बार पाठक खिन्न भी होते हैं और खरीदने में हिचकते भी हैं। 

पुस्तकों के बाजार या बिक्री का इकोसिस्टम बहुत सारी बातों पर निर्भर करता है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर कोई घटना घटी तो पेपर के दाम बढ़ जाते हैं। किसी दो देश के बीच संघर्ष जैसी स्थिति बनती है तो भी उसका असर पुस्तकों के बाजार पर पड़ता है। कोरोना जैसी महामारी का असर भी प्रकाशन व्यवसाय पर पड़ते देखा गया । पायरेसी भी पुस्तकों के बाजार पर नकारात्मक असर डालती है। पुस्तक चर्चित हुई नहीं कि पायरेटेड वर्जन बाजार में उपलब्ध। खुले आम चौक-चौराहों पर बिक्री आरंभ। हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में लेखकों को दी जानेवली कापीराइट राशि की दर भी मूल्य को प्रभावित करता है। ये प्रश्न उठ सकता है कि पुस्तकों के मूल्य निर्धारण की कोई नीति क्यों नहीं है? प्रकाशकों की अखिल भारतीय संस्थाएं या अन्य संस्थाएं इसमें पहल क्यों नहीं करती हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम कारनेवाले लेखक संगठनों से तो ये अपेक्षा ही व्यर्थ थी/ है। यहां सरकारी खरीद की बात नहीं हो रही है। वो एक अलग ही किस्म का खेल है। जिसमें बहुधा भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं। पारदर्शिता की कमी का उल्लेख होता ही रहता है। हिंदी के एक आलोचक जब राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष थे तो एक प्रकाशक को लाभ पहुंचाने की बात हिंदी साहित्य जगत में आम है। इसकी चर्चा फिर कभी। इस बात पर विचार करना होगा कि जो पुस्तकें ज्ञान का आधार होती हैं। प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण के लिए पीढ़ियों को तैयार करती हैं। राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ने के उपक्रम के तौर पर देखी जाती हैं। उसको लेकर समाज को क्या करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पहले कार्यकाल से ही पुस्तकों और पुस्तकालयों की महत्ता पर जोर दे रहे हैं। घर में देवालय और पुस्तकालय की बात भी कर चुके हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में भी पुस्तकों की महत्ता कम नहीं हुई है। हिंदी क्षेत्र के पुस्तक मेलों और साहित्य उत्सवों में पुस्तकों के प्रति पाठकों का प्रेम दिखता है। नई दिल्ली में आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेला ने इस वर्ष सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे। प्रतिवर्ष दिसंबर में आयोजित होनेवाले पुणे पुस्तक मेला का आकार और बिक्री के आंकड़े संतोषजनक ही नहीं बल्कि चौंकानेवाले हैं। मराठी में पुस्तक खरीदकर पढ़नेवाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। मलयालम, तमिल और बांगला में भी पुस्तकों की बड़ी संख्या में बिक्री होती है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि पुस्तकों की संस्कृति के विकास को लेकर समाज को जाग्रत होना होगा। हमें ये तय करना होगा कि पायरेटेड या चोरी से प्रकाशित की गई पुस्तकें नहीं खरीदनी है। चाहे उनका मूल्य कितना भी कम क्यों ना हो। पुस्तकालयों को दी जानेवाली पुस्तकों की सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। अगर कहीं भ्रष्टाचार है तो उसको रोकने के उपाय करने होंगे। अनियमितता के कारण सरकारी पुस्तकों के खरीद रोक देने से प्रकाशन जगत पर असर पड़ता है। प्रकाशकों को भी व्यक्तिगत और सरकारी खरीद के लिए उपलब्ध पुस्तकों के मूल्य में समानता रखनी होगी। जो प्रकाशक ऐसा नहीं करते हैं उनके बारे में प्रकाशक संघों को सार्वजनिक रूप से सामने आकर कदम उठाने होंगे। लेखकों और पाठकों को भी प्रकाशकों के साथ मिलकर इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना होगा क्योंकि इस कारोबार की प्रकृति अलग है। पूंजी लगानेवाले लाभ की इच्छा रखते हैं, रखना भी चाहिए क्योंकि ये पूंजी का स्वभाव है। पर लाभ के चक्कर में ये नहीं भूलना चाहिए कि ये कारोबार पीढ़ियों के निर्माण से भी जुड़ा है। इसका उद्देश्य पवित्र है।