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Saturday, July 25, 2026

सफेद रंग का इंद्रधनुष


राज कपूर के बारे में कई बातें कही जाती हैं। एक तो उनको सफेद साड़ी पहनने वाली स्त्रियां पसंद थीं। या उनको पसंद करनेवाली स्त्रियां सफेद साड़ी पहनती थीं। दूसरी उनकी वो फिल्में जबरदस्त हिट होती थीं जिनकी लीड हीरोइन के साथ उनके अफेयर के चर्चे होते थे। नरगिस से लेकर पद्मिनी और वैजयंतीमाला तक का उदाहरण उनके साथ काम करनेवाले अबतक देते रहते हैं। उनपर लिखी कई पुस्तकों में भी इस तरह की बातों का उल्लेख मिलता है। एक और बात राज कपूर के बारे में कही जाती है, जब से नरगिस और उनका अलगाव हुआ तब से उनकी फिल्मों में सेंसुअलिटी का स्थान सेक्सुअलिटी ने ले लिया। इस बीच एक और घटना घटी जिसने राज कपूर को नायिकाओं को पेश करने का आयडिया दे दिया। एक दिन राज कपूर मुंबई (तब बांबे) में अपने किसी मित्र के यहां रात के खाने पर गए थे। मित्र के घर जब वो खाना खा रहे थे डायनिंग टेबल के ऊपर लगी तस्वीर देखकर वो खाना भूल गए। वो राजजा रवि वर्मा की एक पेंटिंग थी। पेंटिंग में एक स्त्री भीगी हुई साड़ी में थी। गीली और झीनी साड़ी अपने बदन पर लपेटी। उस स्त्री की पेंटिंग में सेंसुअलिटी थी, जिसे राज कपूर ने पर्दे पर सेक्सुअलिटी में बदल दिया। ये वही दौर था जब राज कपूर की जिंदगी से नरगिस जा चुकी थीं। उनकी नई नायिका थीं पद्मिनी। उनको लेकर राज कपूर फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ बना रहे थे। इस फिल्म में पद्मिनी पर फिल्माए गए गीत ‘ओ मैंने प्यार किया ओहो क्या जुर्म किया’ में राज कपूर ने राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को दृष्यों में उतारने का प्रयास किया। गाने के दौरान पद्मिनी काली साड़ी पहनकर झरने के नीचे बने जलकुंड में कूदती हैं। तैरती हैं। पानी से बाहर आकर चट्टान पर लेटती हैं। पलटती हैं। इन सारी मादक अदाओं को कैमरा कैद करता रहता है। पद्मिनी ने इस पूरे सीन में काली साड़ी पहनी थी जो उसके शरीर के साथ चिपकी रहती है। झरने में नहाने का छोटा सीन भी है। जिसको राज कपूर दिखाते तो हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वो अगली फिल्म के लिए कुछ बचा लेना चाहते हैं।

राज कपूर ने फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में जो बचा लिया था उसको उन्होंने दिखाया अपनी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में। इस फिल्म का गाना याद करिए ‘अंग लग जा बालमा’। इस गाने के बोल शुरु होने से पहले लगभग एक मिनट तक नायिका अपने कमरे में बेचैनी में करवटें बदलती हैं। कैमरा विभिन्न मुद्राओं को कैद करता है। डेढ मिनट बाद जब कड़कती हुई बिजली और तूफानी रात में नायिका पद्मिनी पेड़ के तने से लिपट कर गाना आरंभ करती है तो दर्शक नायिका की अदाओं में खो जाते हैं। यहां राज कपूर अपनी नायिका को काली साड़ी से हल्के क्रीम कलर और लाल बार्डर वाली साड़ी तक लेकर आते हैं और उसको भिगाते भी हैं। चौखट पर अपने बदन पर साड़ी लपेटकर खड़ी पद्मिनी राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को साकार कर देती हैं। पर इस फिल्म में भी ऐसा लगता है कि राज कपूर ने यहां भी कुछ बचा लिया। इस फिल्म के करीब डेढ़ दशक बाद राज कपूर की एक फिल्म आती है ‘राम तेरी गंगा मैली’। ये फिल्म राज कपूर ने अपने बेटे राजीव कपूर को लेकर बनाई थी। इस फिल्म का गाना याद करिए, तुझे बलाए मेरी बाहें। इसमें लाल वस्त्र में नायिका आती है लेकिन उसके बाद जब वो पर्वत के नीचे और झरने के पीछे अपने होने की बात करती है तो सफेद पारदर्शी साड़ी पहने होती है और यहां आकर राज कपूर लगभग नग्नता तक चले जाते हैं। मंदाकिनी पर फिल्माए इस दृष्य को लेकर उस समय काफी बवाल मचा था। सेंसर से सर्टिफिकेट मिलने के बाद ये फिल्म जबरदस्त हिट रही थी। उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट फिल्म। इस फिल्म ने रातों रात मंदाकिनी को स्टार बना दिया। उसके बाद मंदाकिनी ने दर्जनों फिल्में की जिनमें मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा के साथ की गई फिल्में ठीक ठाक चली। मेरठ की रहने वाली यास्मीन जोसेफ को राज कपूर ने देखा। कहा जाता है कि हिंदी फिल्मों की नायिकाएं राज कपूर की नीली आंखों में खो जाती थीं लेकिन राज कपूर यास्मीन जोसेफ की नीली आंखों में खोए नहीं बल्कि डूब गए। सीधे अपनी फिल्म का लीड रोल दे दिया। मंदाकिनी नाम भी दिया। मेरठ की यास्मीन जोसेफ मंदाकिनी बनकर प्रसिद्ध हो गई। मंदाकिनी फिर प्रसिद्धि से गुमनामी में गई और कुछ दिनों बाद पता चला कि उन्होंने एक बौद्ध मतावलंबी से शादी कर ली और अब फिल्मी दुनिया से दूर अपना पारिवारिक जीवन जी रही हैं।    


सरकार के हिसाब से कब बनेगा सिस्टम ?


दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन के बीच दो सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी मिली। एक कार्यक्रम भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के भोपाल स्थित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान और शालभंजिका का आयोजन है। भारत सरकार की संस्था एनसीईआरटी ने कवि विनय कुमार की कृति श्रेयसी पर चर्चा आयोजित की है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि राजेश जोशी कर रहे हैं। चर्चा में कुमार अंबुज, निरंजन श्रोत्रिय, आशुतोष दुबे और अंबर पांडे भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का पोस्टर देखकर तो सामान्य लग सकता है पर अगर अध्यक्षता कर रहे महानुभाव और कुछ वक्ताओं की प्रतिबद्धता को देखेंगे तो ऐसा लगता है कि भारत सरकार अपने विरोधियों को लेकर कितनी उदार है। घोर वामपंथी कवि राजेश जोशी हमेशा से मोदी सरकार के विरोधी रहे हैं और कई सार्वजनिक मंचों पर भी सरकार को विरोध करते रहते हैं। इस कार्यक्रम के पोस्टर देखने के बाद सोचा कि जोशी जी की फेसबुक वाल पर टहल आया जाए। वहां जाकर देखा तो पता चला कि वो भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा के आकांक्षी हैं। बावजूद इसके भारत सरकार की शिक्षा मंत्रालय उनका आतिथ्य कर रही है। उनकी अध्यक्षता में कार्यक्रम आयोजित कर रही है। शिक्षा मंत्रालय तो चलिए अपनी उदारता का परिचय दे रही है लेकिन क्या राजेश जोशी को ये नहीं पता कि उन्होंने जिस कार्यक्रम में जाने की सहमति दी है उसी महकमे के मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान थे। दरअसल ये वामपंथियों का चरित्र है। जहां लाभ दिखता है वहां जाने में उनको कोई परहेज नहीं होता है। वहां जाने के लिए कोई खूबसूरत बहाना ढूंढ लेते हैं। उदाहरण के लिए इस केस में कह सकते हैं कि एनसीईआरटी तो करदाताओं के पैसे से चलता है इसलिए उनके कार्यक्रमों में जाने में क्या परेशानी है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण साहित्यिक पत्रिकाओं मं देखा जा सकता है जहां संपादकीय में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी की आलोचना होती है और उसके ठीक पहले इनर कवर पर योगी सरकार का विज्ञापन। राजेश जोशी के अलावा जो वक्ता हैं उनमें से अधिकतर शिक्षा मंत्री को हटाने के पक्षधर थे। 

दूसरा कार्यक्रम शिवपूजन सहाय की कृति देहाती दुनिया के सौ साल पूरा होने पर पटना में बिहार संग्रहालय का एक आयोजन है। देहाती दुनिया ठेठ देहात का औपन्यासिक चित्र की परिभाषा के साथ बाजार में आया था। देहाती दुनिया का पहला संस्करण जब प्रकाशित हुआ था तब उसके आरंभ में श्री गणेशाय नम: प्रकाशित था। पहले खंड में एक ही पृष्ठ पर श्री गणेशाय नम: उसके बाद बड़े अक्षरों में देहाती दुनिया फिर अंक एक और उसके नीचे माता का अंचल उल्लिखित था। ऐसे शिवपूजन सहाय की कृति के सौ वर्ष पूरे होने पर बिहार के कला और संस्कृति विभाग के अंतर्गत चलनेवाली संस्था बिहार संग्रहालय ने जो आयोजन किया है उसमें वक्ताओं में वामपंथ से जुड़े लेखकों की प्रधानता है। प्रगतिशील लेखक संघ के बिहार के अध्यक्ष, महासचिव और एक अन्य पदाधिकारी पहले सत्र में वक्ता के तौर पर आमंत्रित हैं। दूसरे सत्र में भी सरकार के विरोधियों को स्थान दिया गया है। ऐसे लोगों को आमंत्रित किया गया है जो सरकार के विरोध में खड़े होकर पटना के गांधी मैदान में नारे लगाते रहे हैं। अब भी लगाते रहते हैं। पर बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग की उदारता के क्या ही कहने। दरअसल पिछले कुछ समय से ये देखा जा रहा है कि बिहार संग्रहालय वामपंथियों को अच्छी खासी जगह दे रहा है। कुछ वामपंथी लेखक तो वहां के कार्यक्रमों में स्थायी हैं। बिडंबना है कि शिवपूजन बाबू के साहित्य पर उस विचार के लोग बोलेंगे जिन्होंने प्रयासपूर्वक शिवपूजन सहाय का मूल्यांकन नहीं होने दिया। उनकी समग्र रचना उनके पुत्र मंगलमूर्ति जी के सौजन्य और श्रम से प्रकाशित हो पाई। शिवपूजन सहाय परम रामभक्त थे। वो अपनी डायरी में सैकड़ों जगह राम, रामकृपा और भगवान की इच्छा जैसी बातें लिखते हैं लेकिन उनके इस लेखन के बारे में बहुत ही कम चर्चा की गई। देश के विभाजन से लेकर चीन युद्ध तक शिवपूजन सहाय ने बेहद कठोर टिप्पणियां कीं। उन्होंने नेहरू से लेकर उनके मंत्री कृष्ण मेनन तक की आलोचना की। लेकिन नेहरू की विराट छवि बनाने में लगे कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम ने इन टिप्पणियों को दबा दिया। वही अब उनकी प्रमुख कृति पर बात करेंगे। 

संभव है कि बहुत लोगों को ये लगे कि इन दो सरकारी कार्यक्रम में वामपंथियों को बुलाने से क्या ही हो जाएगा। लेकिन ये दो कार्यक्रम तो सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिए गए हैं। ऐसे सैकड़ों कार्यक्रम होते रहते हैं जहां वामपंथी किसी न किसी से जुगाड़ भिड़ाकर घुस जाते हैं। सरकारी समितियों से लेकर पुरस्कार आदि में भी वो अपनी गोटी सेट कर लेते हैं। हाल ही में एक महत्वपूर्ण पुरस्कार की घोषणा हुई। उसमें जिन सज्जन को पुरस्कृत किया है वो रोजाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते रहते हैं। सार्वजनिक तौर पर करते रहते हैं। फिर भी उनको पुरस्कृत करने का ऐलान किया गया। ऐसा नहीं है कि पुरस्कृत करनेवालों को उनके बारे में पता नहीं था, पता था। फिर भी हुआ। इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर निरंतर हो रही हैं पर इसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक लड़ाई होती है। वर्षों तक वामपंथी-कांग्रेसी इकोसिस्टम ने दक्षिणपंथ से जुड़े लेखकों और साहित्यकारों को मंच तक नहीं दिया। फिर योजनाबद्ध तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। वर्षों तक इस झूठ के सहारे अपने विचार को श्रेष्ठ दिखाने का जतन करते रहे। कुबेरनाथ राय जैसे अप्रतिम प्रतिभा के लेखक को अकादमिक जगत से षडयंत्रपूर्वक बाहर रखा गया। सिर्फ कुबेरनाथ राय ही क्यों हाल के दिनों की बात करें तो नरेन्द्र कोहली जी का भी सम्मान नहीं कर सके। यह वामपंथी विचारधारा की योजना थी। अब भी वामपंथी लेखक जिन कार्यक्रमों में जाते हैं और वहां इसी तरह की बातें करते हैं जिससे भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नीचा दिखाया जा सके। कई गोष्ठियों में इस तरह के विमर्श का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं इस कारण यह बात रख रहा हूं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र से वामपंथियों का प्रभाव कम नहीं हो पाया है। यह कार्य प्रधानमंत्री के स्तर से नहीं होना है। इस कार्य को करने के लिए शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे नेतृत्व को निर्णय लेना होगा। विश्वविद्यालयों में कुलपति के स्तर पर और सांस्कृतिक संस्थाओं में निदेशक/अध्यक्ष के स्तर पर ये कार्य होना चाहिए। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं को भी ध्यानपूर्वक कार्य करना होगा। फिल्मों के क्षेत्र में जिस तरह से वाम विचार के लोग विचार की रामनामी ओढ़कर सक्रिय हैं उनकी पहचान करके उनकी षडयंत्रकारी योजनाओं को नाकाम करना होगा। ये कहकर भी नहीं बचा जा सकता है कि सरकार भले ही हमारी है लेकिन सिस्टम तो उनका ही है। सिस्टम तो सरकार के हिसाब से बनती है। बनाने का प्रयास करना चाहिए। 

Saturday, July 18, 2026

संवाद नहीं कठोर निर्णय का समय


कुछ दिनों पूर्व ये समाचार प्रकाशित हुआ कि ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्मों पर फिल्म के प्रदर्शन से पहले प्रमाणन के लिए नियमों में संशोधन पर विचार किया जा रहा है। बताया गया कि संभवत: सरकार ओटीटी  पर दिखाई जानेवाली फिल्मों के लिए पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करने पर मंथन कर रही है। उसी समाचार में ये भी कहा गया कि सरकार इसके लिए आईटी नियम 2021 में भी संशोधन कर सकती है। इस तरह की खबरें नियमित अंतराल पर प्रकाशित होती रही हैं। जब भी किसी फिल्म या वेबसीरीज को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं तो इस तरह की बात सामने आती ही है। पिछले सात-आठ वर्षों में ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री पर जब-जब बवाल होता है तब इस तरह की खबरें आती हैं कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत सख्ती से कंटेंट के आकलन पर विचार कर रहा है। पूर्व में भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों से कई दौर की बातचीत की थी। मनोरंजन जगत के प्रतिनिधियों को इस तरह की बैठकों में सरकार की तरफ से सख्त संदेश दिया गया था। पहले स्वनियमन की बात हुई। फिर त्रिस्तरीय व्यवस्था बनी। लेकिन ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला। कंटेंट और संवाद में अराजकता जारी है। गाहे बगाहे कुछ सीरीज और कुछ फिल्में इस तरह की आ जाती हैं जो बगैर किसी विवाद के निकल जाती हैं। लेकिन कुछ ऐसे निर्माता हैं जो अपनी फिल्मों में और वेबसीरीज में यौनिकता, नग्नता, जुगुप्साजनक दृष्य, हिंसा या गाली गलौच भरे संवाद से बाज नहीं आते हैं। वेबसीरीज निर्माताओं को लगता है कि नग्नता और हिंसा के साथ गाली गलौच की छौंक सीरीज की सफलता की गारंटी है। मनोरंजन की दुनिया में भेड़चाल है। एक सफल फार्मूला मिला नहीं कि सब उसी तरफ दौड़ पड़ते हैं और दौड़ते ही रहते हैं। 

ताजा विवाद फिल्म सतलुज को लेकर उठा है। इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से पिछले चार वर्षों से सर्टिफिकेट नहीं मिला था। निर्माता और बोर्ड के बीच कुछ बिंदुओं पर सहमति नहीं बन पा रही थी। इस बीच जी 5 ने सतलुज को दिखाना आरंभ कर दिया। जबतक सरकार जागी तबतक दो दिन बीच चुके थे। जिनको देखना था वो देख चुके थे। बताया जा रहा है कि भारत में वैधानिक रूप से भले ही इस फिल्म को दिखाने पर प्रतिबंध है लेकिन पंजाब के कई शहरों में इस फिल्म का सार्वजनिक प्रसारण हो चुका है या हो रहा है। यह तो और भी गंभीर बात है। बगैर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के प्रमाणपत्र के किसी भी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 का उल्लंघन है। इस एक्ट के मुताबिक हर फिल्म को, अगर वो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए है, तो पहले फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणपत्र लेना होगा। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ये देखता है कि फिल्म सार्वजनिक प्रदर्शन के योग्य है या नहीं। उस फिल्म से देश की अखंडता  और संप्रभुता पर तो कोई कतरा नहीं पैदा हो सकता है। इसके अलावा भी अन्य कई बिंदु हैं जिसकी पड़ताल करके प्रमाणन बोर्ड फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की श्रेणी तय करते है। फिर प्रमाणपत्र के रूप में फिल्म के प्रदर्सन की अनुमति दी जाती है। फिल्म सतलुज का बगैर सेंसर सर्टिफिकेट के सार्वजनिक प्रदर्शन कानून सम्मत नहीं है। पंजाब पुलिस को या प्रशासन को इसके प्रदर्शन को रोकना चाहिए था। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि जी 5 ने अपने प्लेटफार्म पर इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए कैसे और क्यों अनुमति दी। क्या उनको ये पता नहीं था कि फिल्म सतलुज को लेकर निर्माता और सेंसर बोर्ड के बीच विवाद चल रहा है। अगर पता नहीं था तो आश्चर्य की बात है और अगर पता होते हुए ऐसा किया गया तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इसपर ध्यान देना चाहिए।  

ऐसा नहीं है कि इस तरह का विवाद पहली बार सामने या है। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर विवाद होते रहे हैं। भारतीय वायुसेना और कश्मीर के हालात पर पहले भी ओटीटी प्लेटफार्म पर आपत्तिजनक संवाद और दृष्य दिखाए गए थे। विरोध के बाद उसको हटाया गया था। परंतु वो फिल्में नहीं थी। उनका सार्वजनिक प्रदर्सन नहीं हुआ था। सतलुज के इंटरनेट मीडिया और मैसेजिंग एप्स पर उपलब्ध होने की बात कही जाती है उससे तो सरकार का प्रतिबंध बेमानी हो गया। देश ये भी जानना चाहता है कि सरकार ने जी 5 पर इस फिल्म के प्रदर्शन पर तो रोक लगा दी लेकिन उसके बाद क्या किया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उसके बाद क्या कदम उठाए। कानून तोड़नेवालों की पहचान करने और उनको दंडित करने के लिए क्या पंजाब सरकार ने कोई कदम उठाया। ये बहुत ही चिंता की बात है कि संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण की बात करनेवालों को भी ये प्रकरण नहीं दिखा या देखकर भी अनजान बने रहे। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत गंभीरता के साथ ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर ठोस निर्णय ले। कड़े कदम उठाए जाएंगे, किसी को बख्शा नहीं जाएगा आदि के आगे जाकर निर्णय लेने का वक्त है। सरकार ने मनोरंजन जगत को बहुत समय दे दिया। स्वनियमन को लेकर व्यवस्था बनाई वो चली नहीं, त्रिस्तरीय व्यवस्था भी ठीक साबित नहीं हुई। लिहाजा सरकार को अब प्रसारित होनेवाली सामग्री के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। 

ओटीटी प्लेटफार्म पर जारी होनेवाले सामग्री के प्रमाणन की व्यवस्था करना बहुत आसान नहीं होगा। इसके लिए मानव संसाधन के अलावा संस्थागत ढांचा भी तैयार करना होगा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस प्रकरण को या इस प्रकल्प को अपनी प्राथमिकता में लेना होगा। जिस तरह से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड बरसों से बगैर सदस्यों के चल रहा है उसपर भी ध्यान देकर सदस्यों की नियुक्ति करनी होगी। बगैर सदस्यों के काम तो चल सकता है लेकिन उससे कई प्रकार की दिक्कतें पैदा होती हैं। अस्थायी विशेषज्ञों के भरोसे काम चलाया जाता है पर इसमें जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है। सदस्यों के नहीं होने से बोर्ड के दफ्तरों में काम करने वाले बाबुओं का दखल बढ़ता है। वहीं से भ्रष्ट व्यवस्था के जन्म लेने की जमीन तैयार होती है। पूर्व में इ तरह के मामले आए हैं। प्रमाणन बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी संसाधन देना होगा। क्षेत्रीय स्तर पर फिल्म प्रीव्यू करनेवाले सदस्यों की संख्या बढ़ानी होगी। ओटीटी की सामग्री को फिल्म प्रमाणन बोर्ड के दायरे में लाने से काम बढ़ेगा। अब यह करना इस कारण आवश्यक हो गया है कि ओटीटी पर चलनेवाली बेवसीरीज और फिल्मों का उपयोग मनोरंजन की आड़ में राजनीति करने में होने लगा है। राजनीतिक मैसेजिंग या किसी व्यक्ति या विचारधारा को बदनाम करने का औजार बनने लगा है। कोई भी प्लेटफार्म जब अपनी मूल प्रकृत्ति को छोड़ने लगे तो सरकार को हस्तक्षेप करके उसको संविधानसम्मत तरीके से रेगुलेट करना पड़ता है। कानून को लागू करना होता है। ओटीटी प्लेटफार्म को लेकर अब यही स्थिति बन रही है। संवाद का समय समाप्त हो गया है और समय है उचित और कठोर निर्णय का।  


Saturday, July 11, 2026

मंदिर चोरी पर ताजा सनातनी चुप


अयोध्या स्थित प्रभु श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच से अधिक तेजी से इस प्रकरण पर राजनीति हो रही। श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना निंदनीय है। दोषियों को कठोरतम सजा होनी चाहिए। इस चोरी की सजा जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा। सरकार को चाहिए कि वो विशेष जांच दल (एसआईटी) को एक निश्चित समयावधि में जांच पूरी करने का आदेश निर्गत करे। उसकी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस अपनी जांच कर कोर्ट में रिपोर्ट सौंपे। उसकी सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करके दोषियों को सजा दी जाए। इस मामले में न्याय होना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है न्याय होते दिखना। चढ़ावा चोरी प्रकरण पर कई राजनीतिक दल के नेता स्वयं को सनातनी साबित करने पर तुले हुए हैं। कोई किसी को रामघाती बता रहा है तो कोई सुंदरकांड का पाठ करवा रहा है। किसी को प्रभु श्रीराम की आस्था पर हुई चोट की चिंता हो रही है तो कोई भक्तों की आहत भावना की चिंता कर रहा । राजनीति के रंगमंच पर हर दिन श्रीराम भक्ति के नए आयाम प्रस्तुत किए जा रहे हैं। जो दल प्रभु श्रीराम को किस्से कहानियों का चरित्र मानते थे, श्रीरामजन्भूमि पर अस्पताल और स्कूल खोलने की वकालत किया करते थे आज उनकी भी आस्था प्रभु श्रीराम में द्विगुणित हो गई है। जिस प्रकार की राजनीति चढ़ावा चोरी को लेकर हो रही है उसमें सभी राजनीतिक दल स्वयं को सच्चा सनातनी कहते हुए नहीं थक रहे हैं। यह भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय है।  

इस पूरे प्रकरण पर जिस प्रकार की राजनीति हो रही है उससे सबसे बड़ा प्रश्न ये खड़ा हो रहा है कि चढ़ावा चोरी बड़ी चोरी है या मंदिर चोरी बड़ी है। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि किस तरह से लुटेरों ने हमारे आस्था के केंद्र मंदिरों को लूटा। सिर्फ लूटकर ही नहीं छोड़ा बल्कि लूटने के बाद मंदिरों को ध्वस्त भी किया। ध्वस्त करने के बाद उस स्थान पर मस्जिदें और ईदगाह बनाई गईं। चढ़ावा चोरी के बाद जो राजनीतिक दल इस मसले पर राजनीतिक फसल काटना चाहते हैं उनमें से अधिकतर ने मंदिर चोरों की पैरोकारी की है। कभी चुप रहकर तो कभी मुखर होकर। सबसे पहले बात करते हैं गुजरात के सोमनाथ मंदिर की। ईसवी 1026 से लेकर 1706 तक कई लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर को लूटा। गजनी, खिलजी, मुजफ्फर शाह, औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को लूटा भी और मंदिर को तोड़ा भी। स्वाधीन भारत में जब सोमनाथ मंदिर के लुटोरों और ध्वंस के दाग को मिटाने का प्रयास हुआ तो कांग्रेस के उस समय के नेता जवाहरलाल नेहरू ने उसका परोक्ष विरोध किया था। जब भी इस प्रकरण की बात उठती है तो पंडित नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद के बीच के पत्र व्यवहार की याद आती है। 10 मार्च 1951 को राजन्द्र बाबू ने नेहरू को लिखा, मैं देखता हूं कि सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह के साथ संबद्ध होने का मेरा विचार आपको पसंद नहीं, क्योंकि इसमें अनेक बातें अंतर्निहित हैं। आपको लगता है कि इस समारोह में मेरे जुड़ने से हो सकता है कि कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मैं समझता हूं, आप मानेंगे कि यह रुख अपनाना उचित नहीं है, खासकर जबकि सरकार इसपर कुछ खर्च नहीं कर रही है।... अत: मैं समझता हूं कि इस निमंत्रेण को अस्वीकार करने का कोई अर्थ नहीं है। ( डा राजेन्द्र प्रसाद कारस्पोंडेंस...खंड 14, पृष्ठ 37) एक बार फिर से विचार करना चाहिए कि स्वाधीन भारत में चढ़ावा चोरी बड़ा अपराध है मंदिर चोरी। 

श्रीरामजन्मभूमि के मामले में तो पूरे देश ने देखा कि किस तरह से जब जन्मभूमि को मुक्त करवाने का आंदोलन चल रहा था तो कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों का क्या रुख था। अदालतों में प्रभु श्रीराम के बारे में किस तरह की बातें कही गईं, पूरे देश को अब भी याद है। जब श्रीरामजन्मभूमि स्थित विवादित ढांचा गिरा था उसके बाद जिस तरह की राजनीति हुई वो भी स्मृतियों में है। संसद में श्रीरामजन्मभूमि में विराजमान रामलला को अनआथराइज्ड तक कहा गया। समाजवादी पार्टी नेता रामगोपाल वर्मा ने तो यहां तक कह दिया था कि जो गुंबद पर चढ़ गए थे वो नीचे उतर नहीं सके। उनको इस बात की चिंता भी नहीं थी कि हिंदू उनकी पार्टी को वोट देंगे या नहीं। उसी समाजवादी पार्टी के नेता अब सनातनी और रामभक्त होने का दावा करते घूम रहे हैं। श्रीरामजन्मभूमि स्थित मंदिर की भी तो चोरी ही हुई थी। उसके बाद वहां मस्जिद बना दी गई थी। चढ़ावा चोरी पर हमलावर राजनीतिक दल के नेता मंदिर चोरी पर एक शब्द नहीं बोल पाते थे। डा राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू को जो लिखा उसका एक वाक्य देखा जाना चाहिए- कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मुसलमान आक्रमणकारियों या मंदिर चोरों के प्रति नरम रुख दिखा कर वर्षों तक मुस्लिम वोट की राजनीति होती रही। काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर भी यही रुख देखने को मिलता रहा है। वहां भी यही सारे दल मंदिर चोरों के पक्ष में दिखते हैं। 

मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर भी ताजा-ताजा रामभक्त हुए दलों का रुख देखना चाहिए। इस बात का उल्लेख इतिहास की तमाम पुस्तकों और या6 वृत्तांतों में मिलेता है कि 1670 में औरंगजेब ने मथुरा के केशवदेव मंदिर का ध्वंस कर वहां शाही ईदगाह बनावाया था। क्या ये हिंदू मंदिर की चोरी नहीं थी। पूरे मंदिर की चोरी करके वहां ईदगाह बनवा दिया गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उस स्थान की नीलामी कर दी। नीलामी में बनारस के राजा पटनीमल ने ये जमीन खरीदी थी। कालांतर में उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने पटनीमल के वारिसों से ये जमीन खरीद ली। उनके साथ उस समय जयदयाल डालमिया और हनुमान प्रसाद पोद्दार भी थे। बाद में उस स्थान पर रामकृष्ण डालमिया ने केशवदेव का मंदिर बनवाया। मंदिर बनने से लेकर 1968 तक कांग्रेस पार्टी का क्या रुख रहा ये बताने की आवश्यकता नहीं है। आज भी अगर श्रीकृष्णजन्मभूमि स्थित कारावास में जाने पर स्पष्ट लगता है कि मंदिर चोरों ने हिंदुओं के इस पवित्र स्थल पर डाका डाला था। क्या स्वाधीनता के बाद इन मंदिर चोरों के कृत्यों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी ? नहीं हुई। क्योंकि इससे मुस्लिम वोट बैंक छिटकने का खतरा था। आज जो भी राजनीतिक दल सनातनी होने का दावा कर रहे हैं उनको मंदिर चोरों पर भी अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। उचित तो ये होगा कि सनातनी होने का दावा करनेवाली पार्टियां श्रीकृष्णजन्मभूमि के मामले में भी सनातनी रुख अपनाए और उसको मुक्त करने के अभियान में साथ आए। बयानों में सनातनी दिखने से बेहतर होगा अपने कर्मों में सनातनी दिखें। क्योंकि कर्म की प्रधानता का अपना महत्व है। 

Saturday, July 4, 2026

भारत की संप्रभुता पर हमले का मंसूबा


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 12 वर्षों के कार्यकाल में बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य किए। इन कार्यों में से दो कार्य ऐसे हैं जिसको ऐतिहासिक कार्य की कोष्ठक में रखा जा सकता है। पहला है अनुच्छेद 370 की समाप्ति। दूसरा है माओवाद का सफाया। ये दोनों कार्य इतिहास में इस तरह से दर्ज हो गए जिसको कभी भी मिटाया नहीं जा सकेगा। दोनों में गृहमंत्री अमित शाह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अनुच्छेद 370 की समाप्ति बहुत साहसिक कदम था। उसके लिए व्यापक प्रसासनिक तैयारी भी आवश्यकता थी। जो लोग कहते थे कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कश्मीर में खून की नदियां बहेंगी उन्होंने भी खामोशी के साथ इस बदलाव को स्वीकार किया। 370 के समाप्त होने के आसन्न खतरे से  निबटने के लिए तैयारियां की गई थीं। माओवादी आतंक को समाप्त करने के लिए एक जिस इच्छाशक्ति की आवश्यकता थी वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिखाई। परिणामस्वरूप गृहमंत्री को इस कार्य को करने में अपेक्षित शक्ति और भरोसा मिला। रणनीति बनाई गई। उसपर निश्चित समयावधि में कार्य हुआ। आज देश माओवादी आतंक से मुक्त है। जब माओवाद के आतंक के कारणों पर पर विचार कर रहा था तो एक्स पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण का एक अंश दिखा। उसमें वो कह रहे हैं कि अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेटस एजेंसी फार इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) 2024 के लोकसभा चुनाव के समय करीब 200 करोड़ रुपए भारत में भेजना चाहता था ताकि नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और को प्रधानमंत्री बनाया जा सके। यूएसएआईडी दुनिया के देशों को अलग अलग कारणों से आर्थिक मदद करता रहता है। ये आर्थिक मदद शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतंत्र को मजबूत करने आदि के नाम पर दी जाती है। अधिकतर मामलों में इस तरह की मदद स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से ही दी जाती है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस तरह का बयान पहले भी दे चुके हैं। उन्होंने दावा किया था कि 2024 में भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए धन भेजा गया था। प्रश्न उठ सकता है कि माओवादी आतंक की समाप्ति और ट्रंप के इस बयान में क्या संबंध है। इन दोनों बातों में गहरा संबंध है। इसको समझने के लिए समय समय पर विदेशी फंडिंग के नियमों को सख्त और पारदर्शी बनाने के लिए उठाए गए कदमों और उसपर मचे बवाल पर ध्यान देना होगा। इस वर्ष भी विदेशी फंडिंग को लेकर गृह मंत्रालय ने संशोधित नोटिफिकेशन जारी किया। अभी जारी नोटिफिकेशन के अनुसार गैर सरकारी संगठनों को जिस कार्य के लिए विदेश से पैसा मिलता है उस कार्य में ही खर्च करने की व्यवस्था के लिए नियम और सख्त किए गए। गैर सरकारी संगठनों के प्रशासनिक व्यय की सीमा भी तय की गई है। विदेश से मिले धन के उपयोग का प्रमाण देने के बाद ही फिर से मदद की मंजूरी मिलेगी। पहले होता ये था कि धन किसी अन्य कार्य के लिए आता था और उसका उपयोग किसी अन्य कार्य में होता था। लोकतंत्र को या सिविल सोसाइटी को मजबूत करने के लिए आनेवाले धन का उपयोग बहुधा सरकार के विरुद्ध आंदोलन में होता था। धर्मिक कार्यों या धर्म प्रचार के लिए मिलनेवाली राशि का उपयोग मतांतरण में किया जाता था। इस वर्ष के संशोधन में ये स्पष्ट किया गया है कि धार्मिक कार्यों के लिए विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का उपयोग किसी भी हाल में मतातंरण के लिए नहीं किया जा सकेगा। संविधान का अनुच्छेद 25 देश के नागरिकों को रिलीजस स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। अपने रिलीजन का अनुकरण करने और उसके प्रचार करने की भी अनुमति है। इसकी आड़ में ही मतांतरण के कार्य को अंजाम दिया जाता रहा है। इसमें विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का भरपूर उपयोग होता रहा है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में किए गए संशोधन के अनुसार अब धार्मिक प्रचार के लिए मिलनेवाले विदेशी धन से मतांतरण की अनुमति नहीं है। ऐसा पाए जानेपर लाइसेंस रद करने का अधिकार सरकार के पास होगा। 

विदेश से मिलनेवाली आर्थिक मदद गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) शिक्षा के प्रसार के नाम पर भी लेते रहे हैं। इस तरह की बात सामने आती रही है कि अमुक एनजीओ ने शिक्षा के प्रसार के लिए विदेश से आर्थिक सहायता ली लेकिन उसका उपयोग विचारधारा विशेष के प्रचार प्रसार में किया गया। विशेषकर इस तरह के मामले छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे आदिवासी बहुल इलाकों से आते रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए मिलनेवाले धन के दुरुपयोग की खबरें आती रही हैं। इस तरह के समाचार भी आते रहे हैं कि विदेश से मिलनेवाले धन का उपयोग पहले नक्सलियों और बाद में माओवादियों को मदद के लिए किया जाता रहा। इस तरह की गतिविधियां भारत की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने रहे। इस कारण से जब विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में संशोधन हुआ तब केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने का प्रयास किया गया। जब भी एनजीओ को मिलनेवाले विदेशी धन को लेकर आर्थिक अनुशासन की बात गृह मंत्रालय से की जाती है तब भी विरोध के स्वर मुखर हो जाते हैं। इसका एकमात्र कारण है कि कई एनजीओ जिस कार्य के लिए धन लेते हैं उस कार्य के अलावा अन्य काम में पैसे खर्च किए जाते हैं। माओवादियों को विदेशी मदद का एक बड़ा स्त्रोत ये भी था। अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय ने इस स्त्रोत को खत्म किया जिससे माओवादियों को मिलनेवाली आर्थिक सहायता न्यून हो गई। 

देश में सत्ता परिवर्तन का मंसूबा पाले बैठे विदेशी ताकतों को भी इससे कमजोर किया गया। ये बात सिर्फ ट्रंप ही नहीं कह रहे हैं। 12 सितंबर 2011 को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने कुछ दस्तावेज डिक्सालीफाई किए। उन दस्तावेजों से ये राज खुला कि किस तरह से भारत की स्वतंत्रता के बाद से सोवियत संघ ने कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (सीपीआई) की पूर्ण स्वामित्व वाले प्रकाशन  गृह पीपल्स पब्लिशिंग हाउस को 65 प्रतिशत तक आर्थिक अनुदान देता था। इतना ही नहीं सीपीआई के प्रकाशनों को 1984 में करीब साठ हजार डालर तक का विज्ञापन दिया जाता था। सीपीआई और उसके अनुषांगिक संगठनों के लोगों को आर्थिक मदद और सोवियत संघ की यात्रा के लिए टिकट आदि दिए जाते थे। उसमें इस बात का भी उल्लेख है कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान करीब 40 प्रतिशत संसद सदस्यों को सोवियत रूस से पैसे मिलते थे। इसकी प्रामाणिकता ना तो कभी सिद्ध हो सकती है ना ही सच सामने आता है। लेकिन खुफिया क्लासीफाई दस्तावेजों के सामने आने से संकेत तो मिलते ही हैं। प्रश्न यही है कि जब नरेन्द्र मोदी की सरकार को बदलने के लिए आर्थिक मदद की बात अंतराष्ट्रीय मंचों पर होती है तो उसपर देश में विचार तो होना ही चाहिए। क्योंकि ये धनबल के आधार पर देश की संप्रभुता पर आक्रमण जैसा मामला है। केंद्र सरकार के संज्ञान में ये बातें हैं। वो देश की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध है, ये संतोष की बात है। बात तो उन एनजीओ और उन नेताओं पर भी होनी चाहिए जो विदेश में जाकर ऐसी ताकतों से मिलते हैं जो धनबल से देश की संप्रभुता को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।         

Wednesday, July 1, 2026

प्रेम और अपराध कथा का कालटेल


गुरदत्त का नाम आते ही प्रेम और विरह, दर्द और संवेदना, दया और करुणा, मासूमियत और बेबसी जैसे शब्दों को परदे पर उतारनेवाले दृश्य याद आने लगते हैं। याद आती है उनकी फिल्में साहब बीबी और गुलाम, प्यासा और कागज के फूल। प्रतीत होता है कि कम ही लोग इस बारे में जानते होंगे कि गुरुदत्त ने सिर्फ दर्द और संवेदना वाली फिल्में ही नहीं बनाई बल्कि उनकी आरंभिक फिल्में अपराध कथाओं पर आधारित थी। जब वो फिल्मों में काम करने आए थे तो उन्होंने अपराध कथाओं पर फिल्म बनानेवाले ज्ञान मुखर्जी के साथ काम किया था। फिल्म की बारीकियां उनसे ही सीखी। देवानंद की फिल्म कंपनी नवकेतन के लिए गुरुदत्त को फिल्म निर्देशित करने का अवसर मिला। फिल्म थी बाजी, जो जुलाई 1951 में प्रदर्शित हुई थी। गुरुदत्त 39 वर्ष की आयु में दुनिया से चले गए । कम उम्र में ही उन्होंने कई कल्ट फिल्में बनाईं जिनका विश्लेषण अब भी होता रहता है। इन कल्ट मानी जानेवाली फिल्मों के अलावा गुरुदत्त ने चार अपराध कथाओं पर आधारित फिल्में बनाई -बाजी, जाल, बाज और सैलाब। ये वही दौर था जब देश में अपराध कथाओं को लेकर एक खास किस्म की उत्सकुकता का वातावरण था। अपराध कथाओं पर आधारित उपन्यास खूब बिक रहे थे। उधर हालीवुड में फिल्म नोयर मूवमेंट आरंभ हो चुका था। इस तरह की फिल्मों का नायक नायक कुटिल भी होता था, उसका संदेहास्पद होता था लेकिन जो दिखता था वो उससे अलग होता था। इन फिल्मों में ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम का उपयोग बहुतायत में होता था। फ्लैशबैक और वायस ओवर के साथ नैरेशन इस तरह की फिल्मों में एक अलग ही तरह का प्रभाव पैदा करती थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के वैश्विक परिदृश्य में इस तरह की फिल्में बननी शुरु हुई थी। हिंदी फिल्मों की दुनिया पर भी इसका असर दिखा। गुरुदत्त की इस फिल्म बाजी को भी नोयर मूवमेंट का हिस्सा माना गया। 1951 में प्रदर्शित फिल्म बाजी के नायक देवानंद और नायिका गीता बाली और कल्पना कार्तिक थी। फिल्म में अधिकतर गीत गीता दत्त ने गाए थे। इस फिल्म का संगीत एस डी बर्मन ने दिया था। संगीत में गजब किस्म का आकर्षण है। गीता दत्त की आवाज में गाया गीत ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ या ‘ये कौन आया कि मेरे दिल की दुनिया में बहार आई’ की धुन अब भी लोगों के स्मरण में है।

फिल्म की कहानी बहुत अलग नहीं थी। फिल्म का नायक मदन (देव आनंद) एक संपन्न परिवार से आता है लेकिन परिस्थियों के कारण जीवन यापन कठिन हो जाता है। वो छोटी बहन मंजू (रूपा वर्मन) के साथ रहता है। रोजगार की तलाश में भटकते भटकते जुआ खेलने लगता है। एक दिन एक होटल में उसकी भेंट डांसर लीना (गीता बाली) से होती है। लोग लीना की अदाओं के दीवाने हैं। मदन को अपने होटल में देख लीना उसको अपने बास के लिए काम करने का आफर देती है। मदन के अंदर बची खुची नैतिकता उसको ऐसा करने से रोक देती है। वो लीना के प्रस्ताव को ठुकरा कर घर लौट आता है। अपनी बहन के इलाज के लिए वो डा रजनी (कल्पना कार्तिक) से मिलता है और दोनों में नजदीकियां बढ़ जाती हैं। डा रजनी के पिता को ये मंजूर नहीं था। बदलते घटनाक्रम में रजनी का एक इंसपेक्टर से विवाह हो जाता है। बहन के इलाज के लिए पैसों की जरूरत मदन को लीना के पास ले जाता है। लीना से मिलकर वो उसके बास के लिए काम करने की हामी भर देता है। दोनों एक दूसरे से अपना सुख-दुख बतियाते हैं। कथा का प्रवाह तेज होता है और एक दिन की लीना की हत्या हो जाती है। जिस रिवाल्वर से उसकी हत्या होती है उसपर मदन की अंगुलियों के निशान पाए जाते हैं। मुकदमा चलता है और मदन को फांसी की सजा होती है। इंसपेक्टर को इस हत्याकड पर शक था। वो जाल बिछाता है जिसमें लीना हत्याकांड का असली दोषी फंस जाता है। कहानी बेहद कसावट के साथ घटनाओं में पिरोई गई है। दो छोटी प्रेम कथाओं के समांतर एक अपराध कथा चलती है जो दर्शकों को बांधे रखती है। गुरुदत्त प्रेम और अपराध का ऐसा काकटेल बनाते हैं जिसके सम्मोहन में दर्शक बंधे रहते हैं। गुरदत्त शताब्दी वर्ष में एक बार फिर से गुरुदत्त की उन फिल्मों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो विश्लेषकों और फिल्म इतिहासकारों की दृष्टि ससे झल हैं। 75 वर्ष पहले बनी फिल्म बाजी उनमें से एक है। 


Saturday, June 27, 2026

कम्युनिस्ट खतरों से आगाह करते ट्रंप


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों की वैश्विक स्तर पर चर्चा होती ही रहती है। लेकिन उनका एक बयान इन दिनों अमेरिका में खूब चर्चा बटोर रहा है। इंटरनेट मीडिया पर उसके पक्ष विपक्ष में लगातार टिप्पणियां प्रकाशित हो रही हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने एक सार्वजनिक भाषण में कम्युनिस्टों के आसन्न खतरे के बारे में बेहद कठोर बातें की हैं। उन्होंने कहा कि ‘कम्युनिस्ट एक बार फिर से क्रिश्चियन और चर्च के विरुद्ध युद्ध आरंभ करना चाहते हैं। वो सरकार और चर्च को अलग करके देखने की वकालत करते रहते हैं। आपने देखा कि किस तरह से कम्युनिस्टों ने एकजुट होकर न्यूयार्क में चुनाव जीता। वो पूरी तरह से अमेरिकी जीवन पद्धति को समाप्त करना चाहते हैं। कम्युनिज्म को फैलाना बहुत आसान है पर जो इसकी चपेट में आता है वो गंदगी में जीवन जीने को मजबूर होता है। न तो खाना मिलता है, न ही आवास की व्यवस्ता हो पाती है, न ही सेना होती है और ना ही कानून व्यवस्था बन पाती है। वहां कुछ भी नहीं होता है और तीसरी दुनिया के देशों की तरह हो जाते हैं जहां सभी पीड़ित होते हैं या मरने के लिए अभिशप्त।‘  दरअसल अमरिका में क्रिश्चियनिटी और चर्च पर लगातार हो रहे प्रहारों को ध्यान में रखते हुए ट्रंप प्रशासन ने रिलीजस लिबर्टी कमीशन बनाया था। उसके चेयरमैन ने अपने अध्ययन के आधार पर कहा कि ‘वे (कम्युनिस्ट) अमेरिका से गाड  (भगवान) को हटाना चाहते हैं, चर्चों को बंद करना चाहते हैं और आस्थावान अमेरिकियों को दंडित करना चाहते हैं। अमेरिका की कट्टरपंथी ताकतें अमेरिका से गाड को मिटाना चाहती हैं, लेकिन ऐसा होने नहीं देंगे। अमेरिका फर्स्ट का अर्थ है गाड फर्स्ट।‘ उन्होंने अमेरिकी जनता का आह्वान किया कि वो देश में मौजूद कट्टरपंथी ताकतों के विरुद्ध खड़े हों और अपनी रिलीजस लिबर्टी के लिए अंतिम सांस तक लडें। रिलीजस लिबर्टी कमेटी के चेयरमैन ने राष्ट्रपति ट्रंप के सामने ही अपनी बातें कही। उनके इन निष्कर्षों के सार्वजनिक होने करने के बाद अमेरिका में क्रिश्चियनिटी पर आसन्न खतरे को लेकर बहस आरंभ हो गई है। 

रिलीजस लिबर्टी और कम्युनिस्टों की प्रविधि की इस बहस में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाले रूसी लेखक सोल्झेत्सिन का लिखा एक वाक्य अमेरिका में इंटरनेट मीडिया पर जमकर उद्धृत किया जा रहा है। सोल्झेत्सिन ने रूस में राजनीतिक उत्पीड़न पर लिखकर पूरी दुनिया को बताया था। सोल्झेत्सिन ने लिखा था कि ‘कम्युनिस्ट सिस्टम में अपराधियों को बख्श दिया जाता है और राजनीतिक विरोधियों को अपराधी बना दिया जाता है।‘ दरअसल अमेरिकी प्रशासन इस समय क्रिश्चियनिटी के प्रति अनुरागी लोगों की संख्या कम होने को लेकर चिंतित है। एक अनुमान के मुताबिक इस समय अमेरिका के शहर न्यूयार्क में 40 प्रतिशत लोग गैर क्रिश्चियन हैं। वहां इस बात पर बहस हो रही है कि क्या प्रवासियों के कारण देश की अस्मिता और वहां का रिलीजन संकट में है। अमेरिका में जिस तरह से हैती और सीरियन समुदाय के लोगों की संख्या बढ़ रही है उसके विरुद्ध जनमानस तैयार करने का प्रयास ट्रंप और उनके सहयोगी कर रहे हैं। अब तो इसपर भी बात होने लगी है कि जिस धर्म को माननेवाले आतंकवादियों ने वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमला किया और अमेरिका को चुनौती दी उसी समुदाय के लोग एक बार फिर इकट्ठा होकर क्रश्चियनिटी को चुनौती देते प्रतीत हो रहे हैं। उस समुदाय को कम्युनिस्टों का प्रत्यक्ष समर्थन भी मिल रहा है। अमेरिकियों का एक पढ़ा लिखा तबका भी उनके समर्थन में दिखता है। स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह से तुष्टीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है उसको लेकर ट्रंप और उनकी पार्टी के लोग अमरिका में चिंता का माहौल बनाने का प्रयास करते दिख रहे हैं। 

भारत में कम्युनिस्टों की स्थिति को देखें तो ऊपरी तौर पर ये लगता है कि चुनावों में उनकी निरंतर हार के बाद वो अपने सबसे बुरे दौर में हैं। कम्युनिस्ट भले ही कमजोर प्रतीक हो रहे हों लेकिन जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस पार्टी को समर्थन करना आरंभ किया है उसको रेखांकित करना आवश्यक है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी के हैदराबाद प्लेनरी सेशन में स्पष्ट रूप से ये माना था कि पार्टी की हिंदुत्व के कारण नहीं बल्कि अपनी संगठन की कमजोरी से जूझ रही है। वही राहुल गांधी कालांतर में कम्युनिस्टों के एजेंडे पर आते दिखे। आज कांग्रेस पार्टी की नीतियों में कम्युनिस्ट विचारों की छाप स्पष्ट दिखती है। हिंदुत्व पर आक्रमण अब पार्टी के केंद्र में है। इसके अलावा अकादमिक जगत में अब भी कम्युनिस्टों के प्रभाव को महसूस किया जा सकता है। विशेषकर भाषा और संस्कृति के विषयों में जिस तरह की पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं उनमें वामपंथी विचार और उसके पैरोकारों की बहुलता है। अब भी कई विश्वविद्यासयों में कल्चरल स्टडीज के पाठ्यक्रम में वाम विचार की प्रधानता है। ये वही विचार है जो भारत और भारतीयता के विषयों और सिद्धांतों का निषेध करने के लिए विदेशी और आयातित विचारों को लेकर आते हैं। विदेशी विचारों के आधार पर अकादमिक जगत में विमर्श होते हैं। अमेरिका में भी पढ़े लिखे लोगों के एक वर्ग के कम्युनिस्ट विचार को आगे बढ़ाने वाले के तौर पर पहचान की गई है। भारत में तो स्वाधीनता के बाद लंबे समय तक उनको ही पढ़ा लिखा माना जाता रहा जो कम्युनिस्ट थे या फिर मार्क्स के अनुयायी थे। कहना ना होगा कि अब भी यह प्रवृत्ति अकादमिक जगत में है कि वहां कोई पढ़ा लिखा या विद्वान तभी समझा जाता है जब उसकी आत्मा लेफ्ट की तरफ झुकी हो। सुविचारित तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। 

यह अनायास नहीं है कि अमेरिका अपने देश और धर्म को सांस्कृतिक मार्क्सवाद से बचाकर रखना चाहता है। वहां चिंता इस बात पर है कि संस्कृतिक मार्क्सवाद पहले परिवार नाम की संस्था को नुकसान पहुंचाता है। फिर धर्म को निशाना बनाता है और निजी संपत्ति को लेकर विरोध का माहौल बनाता है। इन सब लक्ष्यों को पूरा करके वो राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने के लक्ष्य की ओर बढ़ता है। हमारे देश में भी स्वादीनता के बाद सांस्कृतिक मार्क्सवाद के दुष्परिणामों को देखा जा सकता है। किस तरह से संयुक्त परिवार की अवधारणा को एकल परिवार की तरफ मोड़ दिया गया। धर्म की तुलना अफीम से करके नास्तिकता को बढ़ावा दिया गया। जो लोग धार्मिक प्रतीक चिन्हों को धारण करते थे उनको पोंगापंथी या दकियानूसी करार दिए जाते सबने देखा है। पिछले लोककसभा चुनाव में निजी संपत्ति के स्कैनिंग करवाने जैसे बयान भी सुने गए थे। इसके बाद राष्ट्र की अवधारणा को प्रश्नांकित कर उसको कमजोर करने के मंसूबे भी स्पष्ट ही हैं। सांस्कृतिक मार्क्सवाद की इस राह की सबसे बड़ी बाधा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके विचार हैं। सभ्यतागत मूल्यों की पुनर्स्थापना के प्रयत्नों से नरेन्द्र मोदी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जड़ें मजबूत कर रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि अमेरिका की तरह भारत में कम्युनिस्टों के विरोध में निरंतर बोला और लिखा जाना चाहिए। महत्वपूर्ण यह भी है कि अकादमिक जगत में उनके वर्चस्व को चुनौती देने का संगठित प्रयास हो। 


Saturday, June 20, 2026

सफल राजनय का फार्मूला मोदीनामिक्स


विश्व के सात उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी 7 की बैठक फ्रांस के शहर एवियन में हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस सम्मेलन में भाग लेने का समाचार आया तो सबकी निगाहें प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की वहां होनेवाली मुलाकात पर टिक गई। सम्मेलन संपन्न हुआ। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच भेंट हुई। मोदी विरोधियों को उम्मीद थी कि राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के बीच कुछ ऐसा घटित होगा जिससे कि मोदी को घेरा जा सकेगा। हुआ इसके ठीक विपरीत। प्रधानमंत्री जब सम्मेलन कक्ष में पहुंचे तो राष्ट्रपति ट्रंप अपनी कुर्सी से उठकर उनसे गर्मजोशी से मिले। द्विपक्षीय वार्ता के बाद साझा प्रेस कांफ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। प्रशंसा पर व्यापक चर्चा हो चुकी है इस कारण दुहराने का अर्थ नहीं। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत में मोदी विरोधियों की आशाओं पर पानी फेर दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान-अमेरिका संघर्ष के दौरान तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा भी राष्ट्रपति ट्रंप के सामने उठाया। मजबूती के साथ अपनी बात रखी। इस पूरी प्रेस कांफ्रेस में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप बहुत सहज दिखे।

इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की। जब उनसे महान नेता की परिभाषा पूछी गई तो उन्होंने कहा प्रधानमंत्री मोदी जो 12 वर्ष से प्रधानमंत्री हैं और बहुत सालिड हैं। वो काम बहुत शांति से करते हैं लेकिन बहुत सख्त हैं। ये मैं बहुत अच्छे से जानता हूं। वो 150 करोड़ आबादी वाले देश के नेता है और निरंतर बने हुए है। जब ट्रंप बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के लिए शांत लेकिन सख्त शब्द का प्रयोग कर रहे हैं तो इसका विश्लेषण करना चाहिए। पिछले वर्ष अप्रैल में पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 भारतीयों की धर्म पूछकर हत्या की थी। उस आतंकी वारदात के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए आपरेशन सिंदूर आरंभ किया। पाकिस्तान ने भारत पर ही हमला कर दिया जिसका बारतीय सेना ने मुंहतोड़ जबाव दिया। 10 मई को संघर्ष विराम हुआ। तब से कई महीनों तक जब भी राष्ट्रपति ट्रंप को अवसर मिलता वो इस बात को कहते थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम उन्होंने ही करवाया। इस बात को उन्होंने पचास से अधिक बार दुहराया। जब भी डोनाल्ड ट्रंप ये बात कहते तो यहां विपक्षी दलों के नेता प्रधानमंत्री को घेरने का प्रयत्न करते। उनकी विदेश नीति को लेकर प्रश्न खड़े करने लगते। उसी समय अमेरिका ने एकतरफा टैरिफ बढ़ाने की घोषणा कर दी थी। उस दौर में राष्ट्रपति ट्रंप भारत को लेकर सकारात्मक टिप्पणी नहीं करते थे। एक बार तो उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के डेड (मृत) होने की बात तक कह डाली थी। उनके बयानों पर यहां मोदी विरोधी सक्रिय हो जाते। ये सिलसिला कई महीनों तक चला। इस बीच प्रधानमंत्री कनाडा के दौरे पर गए थे। उनकी और ट्रंप की फोन पर बातचीत हुई। ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी से वाशिंगटन होते हुए भारत लौटने का निमंत्रण दिया। राष्ट्रपति ट्रंप के उस अनुरोध को प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देकर टाल दिया था। इसको अंतराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़े कदम के तौर पर देखा गया था। ट्रंप की बयानबाजियों का मोदी ने कोई नोटिस ही नहीं लिया। कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। मोदी की इस उदासीनता के भाव ने अमेरिका के साथ कूटनीतिक संबंधों को नया आयाम दे दिया।

खाड़ी संकट के दौरान हार्मूज जलडमरूमध्य के बंद होने पर जब कच्चे तेल का संकट हुआ तो भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चे तेल का आयात जारी रखा। अमेरिका ने रूस से तेल खरीद पर प्रतिबंध लगाया था पर भारत-रूस संबंध पर उसका असर नहीं पड़ा। अमेरिका ने एकतरफा प्रतिबंध लगाया था और अपनी तरफ से ही एक महीने की छूट दी। वो छूट भी खत्म हो गई लेकिन उसके बारे में फिर कोई बयान नहीं आया। इस वर्ष जून में जिस मात्रा में भारत रूस से कच्चा तेल आयात कर रहा है वो एक नया कीर्तिमान बनने की ओर बढ़ रहा है। शिप ट्रैकिंग डाटा के अनुसार भारत अपनी जरूरतों के 50 प्रतिशत से अधिक तेल रूस से आयात कर रहा है। बिना किसी शोर शराबे के और बयानबाजी के ये काम निर्बाध गति से चलता रहा। ये प्रधानमंत्री मोदी का अपना इकोनामिक्स है जिसको अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदीनामिक्स कहा जाने लगा है। दरअसल जब राष्ट्रपति ट्रंप मोदी को टफ निगोशिएटर कहते हैं तो उसके पीछे मोदी की खामोश पर दृढ़ निर्णयों की पृष्ठभूमि है। राहुल गांधी भले ही प्रधानमंत्री मोदी को कंप्रोमाइज्ड प्राइम मिनिस्टर कहें लेकिन अंतराष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री की जो स्थिति है वो इस बयान को बचकाना बयान साबित करता है। फ्रांस में जी 7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जितने भी वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं वो सब इस बात की गवाही देने के लिए पर्याप्त है कि मोदोनामिक्स कैसे काम कर रहा है। आज अंतराष्ट्रीय राजनय में मोदी ने वैश्विक नेताओं के साथ जिस तरह का रैपो बनाया है या कहें कि जिस तरह के व्यक्तिगत संबंध बनाए हैं उसका लाभ देश को हो रहा है। इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भले ही मजाक में कहा हो कि वो और मोदी वायरल कपल हैं लेकिन इससे दोनों देशों के संबंधों में एक निकटता झलकती है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने जिस तरह से हिंदी में बोलकर प्रधानमंत्री का स्वागत किया और भारत-फांस मैत्री के अमर रहने की बात की वो दोनों देशों की निकटता को दर्शाता है।

इतना ही नहीं खाड़ी संकट के दौरान प्रधानमंत्री ने खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों को मजबूत किया वो भी अंतराष्ट्रीय राजनय में एक मिसाल है। इतने लंबे संघर्ष के दौरान उन देशों में रहनेवाले भारतीयों की सुरक्षा को अहम स्थान मिला। दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत के बाजार की ताकत को ना केवल पहचानते हैं बल्कि अपनी इस ताकत का उपयोग अंतराष्ट्रीय राजनय में बहुत बेहतर तरीके से करते हैं। बगैर आक्रामक दिखे दृढता से देशहित के लिए कदम उठाते रहते हैं।  150 करोड़ भारतवासियों की ताकत और राजनय में प्रधानमंत्री का गांभीर्य मोदीनामिक्स को विशिष्टता प्रदान करता है। यह अनायास नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति कहता है कि अगर भारत पर संकट आया तो वो साथ खड़ा रहेगा। अगली ही पंक्ति में ये भी कह देता है कि जबतक मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अगर खाड़ी संकट नहीं आता और देश की अर्थव्यवस्था पर उसका असर नहीं पड़ता तो भारत ने विकास की जो रफ्तार पकड़ी थी वो कायम रहती। खाड़ी संकट के दौरान ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भारत ने जिस तरह की रणनीति अपनाई उसके कारण ही जनता पर बहुत अधिक बोझ नहीं पड़ा। जिस तरह से ऊर्जा चुनौतियों का सामना भारत ने किया और नई जगहों से अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया वो एक केस स्टडी है। आनेवाले समय में प्रधानमंत्री मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में जब उपलब्धियों और चुनौतियों पर शोधादि होंगे तो मोदीनामिक्स उसके केंद्र में होगा।   


Sunday, June 14, 2026

महाकवि के प्रति उदासीनता


आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लेखन पर कुछ काम करते हुए कवि भूषण के बारे में उनकी राय सामने आई। आचार्य शुक्ल ने कवि भूषण को ‘हिंदू जाति का प्रतिनिधि’ कवि कहा है। जाति से आचार्य शुक्ल का आशय किसी ‘कास्ट’ से नहीं बल्कि हिंदू राष्ट्रीयता से है क्योंकि हिंदू कोई जाति तो है नहीं। आचार्य शुक्ल की ये टिप्पणी दिमाग में बैठक गई। इसके कुछ दिनों बाद दैनिक जागरण में प्रकाशित एक समाचार ने ध्यान खींचा। समाचार का शीर्षक था, साझा संस्कृति का केंद्र बनेगा महाकवि का गांव। बात कवि भूषण के पैतृक गांव की हो रही थी जो कि कानपुर का टिकवांपुर है। समाचार में विस्तार से बताया गया था कि किस तरह से कवि भूषण के पैतृक आवास में चलनेवाले प्राथमिक विद्यालय का भवन जर्जर हो चुका था। इस जर्जर भवन के कमरों में ग्रामीण भूसा भंडारण कर रहे थे और परिसर में मवेशी पालन हो रहा था। इस भवन को ठीक कराने का आदेश हुआ। कवि भूषण हिंदी के शीर्ष कवियों में माने जाते हैं। उन्होंने शिवाजी महाराज की वीरता और पराक्रम पर विस्तार से लिखा है। उनके द्वारा रचित शिवा-बावनी में शिवाजी महाराज के युद्ध कौशल, उनकी रणनीति, तेज गति से चलती उनकी तलवार आदि के बारे में विस्तार से लिखा है। कवि भूषण का कालखंड मुगल राजा औरंगजेब के समय का था। जब औरंगजेब मंदिरों को तोड़ता था तो समाचार सुनकर कवि भूषण विचलित हो जाते थे। उनकी लेखनी चलती थी और उससे राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होकर जो छंद निकलते थे उसमें औरंगजेब से पीड़ित जनता का स्वर होता था। उन्होंने शिवाजी के माध्यम से हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए जो रचनाएं की उसने भारत की जनता के मध्य राष्ट्र के प्रति एक अनुराग पैदा किया। शिवाजी महाराज की प्रशंसा में जो रचनाएं उन्होंने लिखी उसका लक्ष्य भी जनता के बीच शिवाजी को हिंदू संस्कृति के रक्षक के तौर पर स्थापित करना था। उन्होंने लिखा- ‘मीड़ि राखे मुगल मरोड़ि राखे पातसाह बैरी पीसि राखे बरदान राख्यौ कर मैं/राजन की हद्द राखी/तेग-बल सिवराज देव राखे देवल स्वधर्म राख्यो घर मैं।‘ इससे स्पष्ट है कि वो अपनी कविताओं में शिवाजी महाराज को देवतुल्य बताकर जनता को प्रेरित करते थे। अनायास नहीं था कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल उनको हिंदू जाति का प्रतिनिधि कवि मानते थे। 

हिंदू जाति के ऐसे प्रतिनिधि कवि के पैतृक आवास की ये स्थिति क्यों है ? हिंदू जाति अपने नायकों की स्मृति को क्यों नहीं सहेज सकती। इन प्रश्नों के साथ कुछ दिनों पूर्व कोलंबिया यात्रा में बोगोटा में वहां के नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्केज के बारे में जानना चाहा। वहां के लेखकों ने जानकारी दी कि कोलंबिया ने उनकी यादों को सहेजा हुआ है। बोगोटा में वो बहुत अधिक दिन नहीं रहे थे। जितने भी दिन बिताए और जहां भी उनका कार्यस्थल रहा उसको बोगोटा ने सहेजा। वहीं पता चला कि कोलंबिया के ही शहर कार्टेघाना में गैब्रियल गार्सिया मार्केज का घर अब भी सुरक्षित और जस का तस है। कोलबिंया आने वाले पर्यटक उस घर को देखने जाते हैं। लाल ईंटों से बनी उस इमारत में उनकी स्टडी, उनका लिविंग रूम को मूल स्वरूप में संभाल कर रखा गया है। ये वही स्थान है जहां मार्केज ने अपनी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की थी। इस वर्ष अप्रैल में अंतराष्ट्रीय माचार माध्यमों में इस बात की खूब चर्चा रही कि किंग्स कालेज लंदन की एक प्रोफेसर लूसी मुनरो ने विलियम शेक्सपियर के घर का सटीक स्थान खोज निकाला। श्कसपियर के घर के सटीक स्थान को लेकर इसके पहले तक भ्रम था। बताया जाता था कि वो इसी स्थान पर कहीं रहते थे। कहने का आशय ये है कि एक प्रोफेसर वर्षों तक अपने सम्मानित लेखक के घर को ढूंढने में रही। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसने ये काम कर दिया। हम अपनी भाषा के पूर्वज लेखकों, उनसे जुड़ी धरोहरों को लेकर इतने उदासीन क्यों हैं। इस पूरे प्रसंग को लिखते हुए याद आता है प्रयागराज के मालवीय नगर इलाके में पंडित बालकृष्ण भट्ट का निवास। सरस्वती पत्रिका के संपादक स्व देवीदत्त शुक्ल के पौत्र व्रतशील शर्मा के साथ भट्ट जी के घर गया था। जर्जर अवस्था में था उनका घर। उनके परिवार के लोगों ने काठ वो चौकी बचा रखी थी जिसपर बैठकर भट्ट जी ‘प्रदीप’ का संपादन किया करते थे। तब उनके घर की स्थिति को देखकर बहुत पीड़ा हुई थी। अब कवि भूषण के पैतृक घर की स्थिति के बारे में जानकार दुख बढ़ गया। कवि भूषण के जन्म स्थान पर उनका भव्य स्मारक बनाया जाना चाहिए। हिंदू जाति के इस प्रतिनिधि कवि की यादों को संजोने के लिए और आगे आनेवालि पीढ़ी को ये बताने के लिए वहां उनकी रचनाओं पर आधारित म्यूजियम बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को पहल करनी चाहिए। इस कार्य में महाराष्ट्र सरकार को भी आगे आकर उत्तर प्रदेश सरकार का सहयोग करना चाहिए। कवि भूषण का नाम भारत के गौरव शिवाजी महाराज से जुड़ता है। अगर उत्तर प्रदेश सरकार और महाराष्ट्र सरकार ठान ले तो टिकवांपुर में कवि भूषण का भव्य और दिव्य स्मारक बनने में देर नहीं लगेगी।    


  


Saturday, June 13, 2026

तुष्टीकरण पर वैश्विक चिंता


भारतीय राजनीति में इन दिनों घुसपैठियों की जमकर चर्चा होती है। चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान के आरंभ के बाद से ही घुसपैठियों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी होने लगी है। पश्चिम बंगाल के चुनाव के समय भी घुसपैठिए चर्चा के केंद्र में रहे। बंगलादेश से लगी भारत की सीमा पर चुनाव आयोग के विशेष पुनरीक्षण अभियान के समय और चुनाव परिणाम के बाद घुसपैठियों के देश लौटने की तस्वीरें भी पूरे देश ने देखीं। घुसपैठियों की ये समस्या सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। इस समस्या से यूरोप के कई देश और अमेरिका भी जूझ रहा है। इस माह के आरंभ में ब्रिटेन में भारतीय मूल के एक युवक को एक ब्रिटिश युवक की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सजा के कुछ दिनों पूर्व हत्याकांड के वीडियो के सामने आने के बाद पूरे ब्रिटेन में प्रवासियों के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा। दरअसल हुआ कि जब ब्रिटेन के युवक पर हमला हुआ और पुलिस घटनासथल पर पहुंची तो पुलिस ने 18 वर्ष के घायल युवक हेनरी को अस्पताल पहुंचाने के बजाए उसको ही हथकड़ी पहना दी। उसकी कराह और स्थिति से भी पुलिस का दिल नहीं पसीजा। उसकी मौत हो गई। ब्रिटेन में इस कांड के वीडियो सामने आने के बाद प्रवासियों और घुसपैठियों के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया है। इनके अधिकारों को लेकर बहस भी चल पड़ी है। बहस तो तुष्टीकरण को लेकर भी हो रही है, रिलीजन को लेकर भी हो रही है। पूरे ब्रिटेन में मृत युवक हेनरी की स्मृति और समर्थन में युवक और युवतियां घुटनों पर बैठकर अपने वीडियो जारी कर रहे हैं। अपनी मौत के पहले हेनरी भी इसी तरह पुलिस वालों से गुहार लगा रहा था।

हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का एक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रचलित हो रहा है। इस वीडियो में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर से पूछा जाता है कि क्या अब भी ब्रिटेन एक क्रिश्चियन देश है?  उनका सीधा उत्तर नहीं आता। वो कहते हैं कि अगर क्रिश्चियन देश की बात है तो मैं स्वयं एक क्रिश्चियन हूं और चर्च में मेरा विश्वास है। हमारे अनौपचारिक संविधान में भी क्रिश्चियनिटी की बात प्रमुखता से है। वे इतने पर ही नहीं रुकते हैं और आगे कहते हैं कि हम अनेक मतों को सेलिब्रेट करते हैं और मैं इसके लिए गर्व का अनुभव करता हूं। इस बयान के बाद ब्रिटेन में रिलीजन को लेकर भी एक नई बहस छिड़ गई है। बहस ये कि क्या क्रिश्चियनिटी को ब्रिटेन में कम महत्व मिल रहा है। ब्रिटेन के मूल निवासियों के एक वर्ग में अपने प्रधानमंत्री के इस बयान को लेकर नाराजगी है। उनका तर्क है कि अन्य मतावलंबियों को सम्मान मिले लेकिन देश को अपने मूल रीलिजन को प्रमुखता और प्राथमिकता होनी चाहिए। इस बहस ने ब्रिटेन की सीमा को पार कर लिया है। फ्रांस और जर्मनी के अलावा अमेरिका भी इस बहस में शामिल हो गया है। रिलीजन के अलावा चर्चा राज्य के दायित्व पर हो रही है। पूछा जा रहा है कि राज्य पीड़ित के पक्ष में दया और न्याय का भाव रखे या नहीं। ब्रिटेन में हेनरी पर हमले के बाद देखा गया कि पीड़ित के साथ पुलिस ने दया नहीं दिखाई। अपने स्तर का न्यायपूर्म व्यवहार भी नहीं कर पाई। वार से घायल हेनरी जमीन पर तड़पता रहा और पुलिस उसको घुटने के बल पर बैठा कर हथकड़ी लगाती रही। ब्रिटेन की बहस अब राष्ट्रीय अस्मिता और पहचान तक पहुंच गई है। ब्रिटेन किसका ? ब्रिटेन का कानून किसके लिए? मूल निवासियों के लिए या प्रवासियों और घुसपैठियों के लिए। बहस ने ब्रिटेन की राजनीति को भी प्रभावित करना आरंभ कर दिया है।

ब्रिटिश युवक की हत्या और उसके बाद घुसपैठियों और प्रवासियों को लेकर चलनेवाली बहस सीमाओं से आगे निकल गई है। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वांस ने एक्स पर हेनरी का वीडियो साझा करते हुए लिखा कि हेनरी नोवाक उसी तरह से मरा है जिस तरह से एक सभ्यता की मौत होती है। प्रशासन ने ना तो उस पर विश्वास किया। ना ही उसका ध्यान रखा। हथकड़ी लगाकर मरने के लिए छोड़ दिया। उसपर हेट क्राइम का आरोप भी लगाया जो उसने किया ही नहीं था। जे डी वांस ने अपने लंबे पोस्ट में लिखा कि हेनरी इस तरह के अपराध में जान गंवाने वाला पहला युवक नहीं है और ना ही आखिरी होगा। इस तरह की घटना के प्रतिवाद का एकमात्र रास्ता है न्यापूर्ण तरीके से क्रोध का प्रदर्शन। अंत में वांस ने लिखा कि हम अपनी सभ्यता और अपने देश को प्यार करते हैं। अपने बच्चों से प्यार करते हैं और किसी की भी जान हेनरी नोवाक की तरह न जाए इसका ध्यान रखना होगा। उपराष्ट्रपति जे डी वांस के अलावा उद्गोयपति एलान मस्क ने भी इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देकर उसको अंतराष्ट्रीय मसला बना दिया। वो तो सिविल वार होने तक की टिप्पणी कर गए। यूरोप में जनता का न्यायपूर्ण क्रोध बढ़ता जा रहा है और इसने ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के अलावा नीददरलैंड और स्वीडन को भी अपनी चपेट में ले लिया है। कहा जा रहा है कि इन देशों की सरकारों की उदारवादी नीतियों ने मूल निवासियों के अधिकारों को खतरे में डाल दिया है।

जब भारत में घुसपैठियों और तुष्टीकरण की बात होती है तो यहां का कथित लिबरल तबका इसका विरोध करता है। उदारता और समानता के सिद्दांतों की बातें होने लगती हैं। हमारा देश भी घुसपौठियों के कारण अनेक समस्याओं से जूझता रहा है। बंगाल का ही उदाहरण लें तो वहां पूर्व में जिस तरह से घुसपौठियों को आधार कार्ड और राशन कार्ड देकर वैधता प्रदान की गई उसके पीछे वोट और सत्ता पाने की मंशा थी। हमारे देश ने भी तुष्टिकरण का लंबा दंश झेला है। तुष्टीकरण के कारण ही अपराधियों और गैंगस्टरों का बड़ा वर्ग तैयार हुआ था। बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें। वहां तुष्टीकरण के कारण ही अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसी खूंखार अपराधी ना केवल जन्मे बल्कि उन्होंने अपना साम्राज्य खडा कर लिया। ये तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि उत्तर प्रदेश के अपराधी को लंबे समय तक पंजाब की जेल में रखा गया। कानूनी प्रक्रिया के बाद उसको उत्तर प्रदेश की जेल में लाया जा सका। ये उस तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि मुंबई बम धमाकों के अपराधी याकूब मेनन के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच आधी रात के बाद सुनवाई के लिए बैठी थी। आज हमाररे देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या हम भी यूरोप और अमेरिका की तरह भारत के मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा की राजनीति करें या इसको छोड़कर घुसपैठियों को वैधता प्रदान कर सत्ता के लिए राजनीति चमकाएं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा केंद्रीय हो सकता है। अभी से इसके आसार दिखने लगे हैं। राजनीतिक दल मुद्दा बनाएं या नहीं लेकिन समाज को भी इस बारे में सोचना होगा। न्यापूर्ण क्रोध का प्रदर्शन करना होगा।   

Friday, June 5, 2026

जाग्रत समाज बनाएगी पुस्तक संस्कृति


कुछ वर्ष पहले की बात है। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्तशासी संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की वेबसाइट पर क्रय की जानेवाली पुस्तकों की सूची प्रकाशित हुई थी। उसमें एक पुस्तक थी जिसका नाम था मदर आफ डेमोक्रेसी इंडिया। संस्था की वेबसाइट पर क्रय की जानेवली पुस्तकों की सूची में इस पुस्तक का मूल्य पांच हजार रुपए बताया गया था। पुस्तक प्रकाशक या विक्रेता की तरफ से छूट भी प्रस्तावित थी। उसके बाद पुस्तक का मूल्य तीन हजार (स्मरण के आधार पर) के करीब था। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की बैठक में इस पुस्तक को लेकर प्रश्न उठा था। किसी सदस्य ने प्रश्न उठाया था कि यही पुस्तक जब बाजार में किसी अन्य प्रकाशन, संभवत: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से सात सौ रुपए मूल्य पर उपलब्ध है तो फाउंडेशन इतनी महंगी पुस्तक क्यों खरीद रहा है। ये जानकारी नहीं है कि उक्त पुस्तक की खरीद राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में हुई या नहीं। ये इस लेख का विषय भी नहीं है। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन और उसके क्रियाकलाप पर भी चर्चा करना उद्देश्य नहीं है। उक्त उदाहरण से एक बड़ा प्रश्न भारतीय प्रकाशन जगत के सामने खड़ा होता है कि सरकारी खरीद के लिए पुस्तकों के मूल्य बहुत ज्यादा और बाजार के लिए उसी पुस्तक का मूल्य कम क्यों रखे जाते हैं? ये तो एक उदाहरण है जबकि प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि ये तो सामान्य बात है। कवर अलग करके पुस्तकों का मूल्य कई गुणा बढ़ा दिए जाते हैं। बढ़े हुए मूल्य पर खरीद भी होने की बात की जाती है। समय आ गया है कि हिंदी के प्रकाशकों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि पुस्तकों के मूल्य का मानकीकरण होना चाहिए या नहीं। 

अभी मेरे सामने एक ही प्रकाशन से प्रकाशित दो पुस्तकें रखी हैं। एक हार्ड बाउंड है और दूसरा पेपरबैक। हार्ड बाउंड पुस्तक की पृष्ठ संख्या 200 है और उसका मूल्य रु 499 है। पेपरबैक पुस्तक की पृष्ठ संख्या 191 है और मूल्य रु 299 है। अन्य प्रकाशक की एक पुस्तक में पृष्ठ है 120 और मूल्य है रु 200। एक और प्रकाशन से प्रकाशित पेपरबैक पुस्तक में पृष्ठ है 230 मूल्य है रु 500। लेख लिखने के क्रम में दर्जनों पुस्तकों की पृष्ठ संख्या और मूल्य देखा। एक ही प्रकाशन से एक ही जैसे कागज पर एक ही आकार में और लगभग समान पृष्ठ संख्या की प्रकाशित पुस्तकों के मूल्य अलग-अलग हैं। उनको देखकर कोई अनुमान नहीं लगा सकता है कि प्रकाशकों ने पुस्तकों के मूल्य निर्धारण का क्या फार्मूला तय किया है। कई प्रकाशकों से मूल्य निर्धारण को लेकर बात की तो पता चला कि आमतौर पर एक रुपए प्रति पृष्ठ की दर से पुस्तकों का मूल्य निर्धारण होता था। अब ये दर बढ़कर दो रुपए प्रति पेज तक पहुंच गया है। एक प्रकाशक ने बताया कि पुस्तक की लागत से चार से छह गुणा अधिक मूल्य रखा जाता है। उनका तर्क था कि पुस्तक विक्रेताओं को चालीस प्रतिशत तक कमीशन और करीब तीन महीने का क्रेडिट देना होता है। ई-कामर्स प्लेटफार्म अब प्रकाशकों से 50-55 प्रतिशत कमीशन की मांग करने लगे हैं। इस कारण पुस्तक का मूल्य लागत के चार से छह गुणा अधिक रखा जाता है। बड़े प्रकाशक तो फिर भी अपने प्रकाशनों के बल पर मूल्यों को नियंत्रण में रख पातें हैं लेकिन कई छोटे प्रकाशक अपनी एक अच्छी पुस्तक से ही मुनाफा कमाने के चक्कर में अधिक मूल्य रख देते हैं। इससे कई बार पाठक खिन्न भी होते हैं और खरीदने में हिचकते भी हैं। 

पुस्तकों के बाजार या बिक्री का इकोसिस्टम बहुत सारी बातों पर निर्भर करता है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर कोई घटना घटी तो पेपर के दाम बढ़ जाते हैं। किसी दो देश के बीच संघर्ष जैसी स्थिति बनती है तो भी उसका असर पुस्तकों के बाजार पर पड़ता है। कोरोना जैसी महामारी का असर भी प्रकाशन व्यवसाय पर पड़ते देखा गया । पायरेसी भी पुस्तकों के बाजार पर नकारात्मक असर डालती है। पुस्तक चर्चित हुई नहीं कि पायरेटेड वर्जन बाजार में उपलब्ध। खुले आम चौक-चौराहों पर बिक्री आरंभ। हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में लेखकों को दी जानेवली कापीराइट राशि की दर भी मूल्य को प्रभावित करता है। ये प्रश्न उठ सकता है कि पुस्तकों के मूल्य निर्धारण की कोई नीति क्यों नहीं है? प्रकाशकों की अखिल भारतीय संस्थाएं या अन्य संस्थाएं इसमें पहल क्यों नहीं करती हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम कारनेवाले लेखक संगठनों से तो ये अपेक्षा ही व्यर्थ थी/ है। यहां सरकारी खरीद की बात नहीं हो रही है। वो एक अलग ही किस्म का खेल है। जिसमें बहुधा भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं। पारदर्शिता की कमी का उल्लेख होता ही रहता है। हिंदी के एक आलोचक जब राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष थे तो एक प्रकाशक को लाभ पहुंचाने की बात हिंदी साहित्य जगत में आम है। इसकी चर्चा फिर कभी। इस बात पर विचार करना होगा कि जो पुस्तकें ज्ञान का आधार होती हैं। प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण के लिए पीढ़ियों को तैयार करती हैं। राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ने के उपक्रम के तौर पर देखी जाती हैं। उसको लेकर समाज को क्या करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पहले कार्यकाल से ही पुस्तकों और पुस्तकालयों की महत्ता पर जोर दे रहे हैं। घर में देवालय और पुस्तकालय की बात भी कर चुके हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में भी पुस्तकों की महत्ता कम नहीं हुई है। हिंदी क्षेत्र के पुस्तक मेलों और साहित्य उत्सवों में पुस्तकों के प्रति पाठकों का प्रेम दिखता है। नई दिल्ली में आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेला ने इस वर्ष सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे। प्रतिवर्ष दिसंबर में आयोजित होनेवाले पुणे पुस्तक मेला का आकार और बिक्री के आंकड़े संतोषजनक ही नहीं बल्कि चौंकानेवाले हैं। मराठी में पुस्तक खरीदकर पढ़नेवाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। मलयालम, तमिल और बांगला में भी पुस्तकों की बड़ी संख्या में बिक्री होती है। 

आज आवश्यकता इस बात की है कि पुस्तकों की संस्कृति के विकास को लेकर समाज को जाग्रत होना होगा। हमें ये तय करना होगा कि पायरेटेड या चोरी से प्रकाशित की गई पुस्तकें नहीं खरीदनी है। चाहे उनका मूल्य कितना भी कम क्यों ना हो। पुस्तकालयों को दी जानेवाली पुस्तकों की सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। अगर कहीं भ्रष्टाचार है तो उसको रोकने के उपाय करने होंगे। अनियमितता के कारण सरकारी पुस्तकों के खरीद रोक देने से प्रकाशन जगत पर असर पड़ता है। प्रकाशकों को भी व्यक्तिगत और सरकारी खरीद के लिए उपलब्ध पुस्तकों के मूल्य में समानता रखनी होगी। जो प्रकाशक ऐसा नहीं करते हैं उनके बारे में प्रकाशक संघों को सार्वजनिक रूप से सामने आकर कदम उठाने होंगे। लेखकों और पाठकों को भी प्रकाशकों के साथ मिलकर इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना होगा क्योंकि इस कारोबार की प्रकृति अलग है। पूंजी लगानेवाले लाभ की इच्छा रखते हैं, रखना भी चाहिए क्योंकि ये पूंजी का स्वभाव है। पर लाभ के चक्कर में ये नहीं भूलना चाहिए कि ये कारोबार पीढ़ियों के निर्माण से भी जुड़ा है। इसका उद्देश्य पवित्र है।         


Saturday, May 30, 2026

ज्ञान का इकोसिस्टम बनाती पत्रकारिता


हिंदी पत्रकारिता के दौ सौ वर्ष पूर्ण होने पर देश के अलग-अलग हिस्से में गोष्ठियों का आयोजन हो रहा है। हिंदी के पहले समाचारपत्र उद्दंत मार्तंड और उसके संपादक जुगुल किशोर सुकुल से लेकर वर्तमान दौर की पत्रकारिता पर चर्चा हो रही है और इस क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी-अपनी राय और विश्लेषण रख रहे हैं। पत्रकारिता और साहित्य के संबंध पर भी बातें हो रही है। कुछ दिनों पूर्व सहितम् संस्था द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में जाने का अवसर मिला। वहां देश के विभिन्न प्रांतों से आए युवाओं से संवाद हुआ। संवाद का विषय हिंदी साहित्य चुनौतियां और संभावनाएं जैसा था। सहितम् का ये प्रयास युवाओं को लेखन की दुनिया से जोड़ने और उनको एक मंच प्रदान करने का है। युवा लेककों से बात करते हुए साहित्य सृजन पर बात हुई। कुछ दिनों पूर्व हिंदी के वरिष्ठ आलोचक सुधीश पचौरी से कामायनी और छायावाद पर लंबी बात हुई थी। कामायनी और छायावाद को वो इन दिनों बिल्कुल अलग तरीके से व्याख्यित करने का कार्य कर रहे हैं। उनकी स्थापना है कि छायावादी कविता देशप्रेम के भाव से युक्त एक राष्ट्रवादी कविता है। सहितम् की गोष्ठी में युवाओं से संवाद के दौरान सुधीश जी से हुई बातचीत अवचेतन मन में थी। इस कारण जब साहित्य सृजन पर बात होने लगी तो साहित्य सृजन की एक अलग परिभाषा पर चर्चा आरंभ हो गई। साहित्य सृजन को परिभाषित करते हुए बात ज्ञान की पारिस्तिथिकी (इकोसिस्टम आफ नालेज) तक पहुंच गई। स्वाधीनता के पूर्व के साहित्य सृजन को देखकर यही प्रतीत होता है कि अधिकतर साहित्यकरों ने और लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत किया। विशेषकर यदि हम भक्तिकाल के कवियों को देखें तो उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से एक इकोसिस्टम तैयार किया। ज्ञान के इस इकोसिस्टम से भारत की उस समय की जनता लाभान्वित तो हुई ही संगठित भी हुई। उनके टूटे मनोबल को बल मिलने लगा।  

जयशंकर प्रसाद की महान कृति कामायनी को देखें तो उसमें लेखक एक साथ कई स्तरों पर अपनी बात कहते हुए आगे बढ़ते हैं। देवत्व जब दानत्व की ओर बढ़ता है तो प्रलय आती है। प्रलय सबको नष्ट कर देती है। कामायनी का नायक मनु जीवन से हताश निराश हो जाता है। हिमालय चला जाता है। कविता आगे बढ़ती है तो मनु को श्रद्धा मिलती है। श्रद्धा से ज्ञान मिलता है। प्रलय से ज्ञान की जिस पारिस्थितिकी को क्षति पहुंची थी वो उसका परिष्कार होने लगता है। कामायनी में वर्णित स्थितियां और पात्रों के मनोविज्ञान को पकड़ने और उसको विश्लेषित करने का काम आलोचकों का है। लेकिन पत्रकारिता को या ज्ञानार्जन करनेवालों के लिए एक बड़ी व्यवस्था जयशंकर प्रसाद ने अपनी इस रचना में दी। प्रलय के बाद भी अगर आपके पास श्रद्धा है तो आपको ज्ञानार्जन से कोई रोक नहीं सकता है। सृजन क बाधित नहीं किया जा सकता। ज्ञान अर्जन करने के लिए विनयशील होना आवश्यक है। श्रद्धा नाम कामायनी की नायिका का अवश्य है लेकिन उसको प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है। आदर बिना ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है। यही बात तो पत्रकारिता पर भी लागू होती है। पत्रकार भी अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाता है। पूर्व में बने हुए इकोसिस्टम को मजबूत करता है। अब यहां हमें दो बातों पर विचार करना चाहिए कि दो सौ वर्षों की हिंदी पत्रकारिता के किस कालखंड के पत्रकारों ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाने या उसको मजबूत करने का काम किया। स्वाधीनता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता को देख लेते हैं। उस कालखंड की पत्रकारिता के आकलन से निष्कर्ष निकलता है कि वो ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत करके देश की जनता को जागरूक कर रही थी। उस दौर के साहित्यकार भी यही कर रहे थे। ये अनायास नहीं है कि उस कालखंड में अधिकतर पत्रकार साहित्यकार भी थे या कह सकते हैं कि जो साहित्यकार थे वही पत्रकारिता भी कर रहे थे। क्योंकि दोनों का उद्देश्य समान था।

पत्रकारिता के दो सौ वर्षों के इतिहास को देखें तो भी स्पष्ट होता है कि जो आदर और विनयशीलता के साथ पत्रकारिता कर रहे थे वो शीर्ष पर पहुंचे। आक्रामकता कभी पत्रकारिता को आगे नहीं बढ़ाती है। विनम्र होकर आदर के साथ प्रश्नों के उत्तर ढूंढेंगे तो बेहतर उत्तर मिलने की संभावना बनेगी। संभव है कि उत्तर उस तरह का मिले कि ज्ञान की पारिस्थितिकी में कुछ जोड़ें। वहीं अगर आक्रामकता के साथ पत्रकारिता की जाती तो पूर्वज पत्रकारों द्वारा बनाई गई ज्ञान की पारिस्थितिकी कमजोर होने का खतरा रहता है। पत्रकारिता में हमेशा से ये कहा जाता है कि पत्रकारों को प्रश्नाकुल होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए। परंतु प्रश्नाकुलता के साथ विनयशीलता होनी चाहिए। पत्रकारिता के जरिए जब ज्ञान के इकोसिस्टम को बल देने की बात होती है तो स्मरण आता है इस वर्ष तीन खंडों में प्रकाशित समग्र भारतीय पत्रकारिता। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित लेखक विजयदत्त श्रीधर ने श्रमपूर्वक इसको तैयार किया है। विजयदत्त क्षीधर पत्रकार रहे हैं। उन्होने भोपाल में माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान की स्थापना भी है। ये अपनी तरह का एक अनोखा संग्रहालयय है। वहां शोधार्थियों के लिए प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा। समग्र भारतीय पत्रकारिता के तीन खंडों को देखने के बाद ये विश्वास पक्का होता है कि पत्रकार अपनी पत्रकारिता के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाते रहे हैं। तीन खंडों के 49 अध्यायों में विजयदत्त श्रीधर ने बेहद श्रमपूर्वक भारतीय पत्रकारिता की विकास यात्रा को दर्शाने का प्रयास किया है। वो इन तीन खंडो को समग्र भारतीय पत्रकारिता की सन 1780 से लेकर 1948 तक की 128 वर्ष की यात्रा कथा बताते हैं। उनकी इस कृति में हिंदी भाषा के बदलते स्वरूप को भी देखा-समझा जा सकता है। विजयदत्त श्रीधर ने जहां भी पत्र-पत्रिकाओं के उद्धरण दिए हैं वहां उसकी भाषा को यथावत रखा है। इस कृति में पाठकों को तमिल, मलयालम, तेलुगु, ओडिया और अंग्रेजी पत्रकारिता के बारे में भी अलग अलग अध्यायों में जानकी मिलती है। पुस्तक में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पत्रकारिता और उनकी ओजस्वी वाणी को भी रेकांकित किया गया है। 

विजयदत्त श्रीधर की इस पुस्तक से ये स्पष्ट होता है कि किस तरह से भारतीय पत्रकारिता ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाया। श्रीधर जी स्वाधीनता के बाद रुक जाते हैं। आज इस बात की पड़ताल करने की आवश्यकता है कि स्वाधीनता के बाद किस विचार और किस प्रचार ने भारतीय पत्रकारिता निर्मित ज्ञान के इकोसिस्टम को बाधित या खंडित करने का प्रयत्न किया। 1948 के बाद भारतीय पत्रकारिता में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए। 1962 के युद्ध में चीन से पराजय, 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा और उसके बाद नागरिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त होना, 1991 में आर्थिक उदारीकरण का आरंभ होना। पत्रकारिता और पत्रकार ने नई तकनीक आई, चुनौतियों के साथ संभावनाएं आईं। इसो पत्रकारिता ने किस तरह से लिया। इस पर विस्तार से लिखे जाने की आवश्यकता है। पत्रकारिता किस तरह से ज्ञान के इकोसिस्टम से दूर होकर राजनीतिक परिवार के इकोसिस्टम को मजबूत करने में लग गई। ये भी देखा जाना चाहिए। 


Saturday, May 23, 2026

इतिहास के लैंडस्केप में बदलाव संभव


पिछले दिनों भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के कई विद्वानों से संवाद का अवसर मिला। उनके विभिन्न प्रकार के शोध की जानकारी मिली। उच्च अध्ययन संस्थान में ही टैगोर फेलो के रूप में कार्यरत प्रो ओम प्रकाश शर्मा जी से लंबी बातचीत हुई। उनका अध्ययन हिमाचली पहाड़ी भाषा, लिपियां और लोकसाहित्य पर है। बातचीत के क्रम में उन्होंने एक पांडुलिपि दिखाई। उन्होंने बताया कि इस पांडुलिपि का नाम खुजित्रा फलित ज्योतिष पांडुलिपि है। इसमें आगम शास्त्र के अंतर्गत होरारि ज्योतिष के विषय पर लिखा गया है। पांडुलिपि की लिपि के संबंध में उन्होंने दिलचस्प बात बताई। उनका कहना है कि इसकी लिपि शारदा लिपि से जन्मी हिमाचल प्रदेश की भटाखरी लिपि है। उत्तराखंड के जौंसार-बाबर के लिपिकार इस पांडुलिपि को जड़ाखरी लिपि मानते हैं। ओम प्रकाश शर्मा लंबे समय से पांडुलिपियों की खोज में लगे हैं और करीब सात वर्षों की कठिन मेहनत के बाद उनको ये पांडुलिपि डिजिटाइजेशन के लिए मिली है। उनका शोध ये कहता है कि यह पांडुलिपि बहुत पुरानी है और मूल शारदा लिपि में लिखी गई होगी। शारदा लिपि ब्राह्मी परिवार की लेखन प्रणाली के तौर पर कश्मीर में मान्य रही है। ज्ञान की देवी शारदा के नाम पर ही इस लिपि का नामकरण बताया जाता है। प्राचीन काल में इस लिपि का प्रयोग कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश तक में होता था। उत्तराखंड से मिली इस पांडुलपि से संकेत मिलता है कि किस प्रकार से शारदा लिपि की यात्रा कश्मीर से लेकर उत्तराखंड तक हुई होगी। जब डा शर्मा से बात हो रही थी तो उसी समय संस्कृति मंत्रालय की योजना ज्ञान भारतम का ध्यान आया।

ज्ञान भारतम के बारे में पहली बार इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली के प्रोफेसर रमेशचंद्र गौड़ से पिछले वर्ष विस्तार से चर्चा हुई थी। ये वो समय था जब ज्ञान भारतम पर मंथन के लिए तीन दिनों का अंतराष्ट्रीय सम्मेलन दिल्ली में आयोजित किया गया था। इस सम्मेसन का विषय था- रिक्लेमिंग इंडियाज नालेज लीगेसी थ्रू मैनुस्क्रिप्ट हैरिटेज। हाइब्रिड मोड में आयोजित इस सम्मेलन में देश विदेश के करीब दो हजार विद्वानों ने हिस्सा लिया था जिसमें डेढ सौ विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी थी। सम्मेलन के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ज्ञान भारतम को औपचारिक रूप से आरंभ किया था । इसके पहले बजट में भी इस तरह की योजना की घोषणा की गई थी। इस सम्मेलन में इस योजना से जुड़े वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट भी जारी की गई थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पांडुलिपियां भारतीय ज्ञान परंपरा के लिखित स्त्रोत हैं जो भारत की विभिन्न संस्थाओं के साथ-साथ व्यक्तिगत अधिकार के घरों में उपलब्ध हैं। इन पांडुलिपियों के बारे में गहन सर्वेक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है। संस्कृति मंत्रालय ने इस वर्ष अप्रैल से जून तक तीन महीने की अवधि में पांडुलिपियों के सर्वेक्षण का कार्य आरंभ किया है। 2003 में भी राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन आरंभ किया गया था। तब इसमें जन भागीदारी नहीं थी। विशेषज्ञों और संस्थाओं के माध्यम से कार्य किया गया था जो बाद में लगभग समाप्त हो गया। अब भारत सरकार ने पांच वर्षों के लिए करीब पांच सौ करोड़ रुपए का बजट ज्ञान भारतम के लिए तय किया है। उसके अंतर्गत पांडुलिपियों की खोज का पहला चरण आरंभ हो गया है। अभी जो सर्वेक्षण हो रहा है उसमें जन भागीदारी सुनिश्चित की गई है। जनसाधारण से एक एप के माध्यम से पांडुलिपियों के बारे में जानकारी देने की अपेक्षा की गई है। ज्ञान भारतम के सर्वे समाप्त हो जाने के बाद प्राप्त जानकारी की प्रामाणिकता जांची जाएगी। फिर संरक्षण, प्रलेखन, डिजीटाइजेशन, आकार्इविंग, पाठक संपादन और प्रकाशन का चरण आरंभ होगा। दीर्घ योजना है। पिछले वर्ष आयोजित अंतराष्ट्रीय सम्मेलन के वर्किंग समूह की रिपोर्ट में भवनाथ झा ने विस्तार से पांडुलिपि सर्वेक्षण के चरणों और उसके बाद के कार्यों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया है।

एक अनुमान के मुताबिक राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के अंतर्गत पहले ही हमारे पास करीब 50 लाख पांडुलपियों की कैटलागिंग हो चुकी है। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान इसका काम बहुत धीमा हो गया था। अब नरेन्द्र मोदी सरकर ने संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत इसका रोडमैप बनाकर सर्वेक्षण का कार्य आरंभ किया है। संस्कृति मंत्रालय में इस कार्य से जुड़े व्यक्ति ने बताया कि पिछले करीब डेढ महीने में 25 लाख पांडुलिपियों की जानकारी मिल चुकी है। जिस प्रकार से जानकारियां मिल रही हैं उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि आनेवाले दिनों में इस जानकारी का दायरा विस्तृत होगा। सबसे मुश्किल कार्य है जानकारी के बाद उन पांडुलपियों को डिजीटाइजेशन के लिए हासिल करना। जिन धार्मिक संस्थाओं के कमरों में पांडुलपियां बंद हैं उनके प्रमाणीकरण और उसके डिजिटाइजेशन के लिए पांडुलिपियों प्राप्त करना कठिन हो सकता है। ये काम हो भी गया तो उसके बाद इन पांडुलिपियों के पाठ के लिए बड़ी संख्या में भाषा, लिपि और इतिहास के विद्वानों की आवश्यकता होगी। कृत्रिम प्रज्ञा (एआई) से पांडुलिपियों के वर्गीकरण में सहायता मिल सकती है लेकिन एआई बहुत मददगार साबित होगा इसमें संदेह है। अभी जर्मनी के एक विश्वविद्लाय से जुड़ा एक समाचार चर्चा में आया है। इसके अनुसार वहां इस तरह का एक एआई टूल विकसित किया गा है जो प्राचीन लिपियों को पढ़ने में मददगार है। ये अभी बहुत आरंभिक बातें हैं इसके विकसित होने और उपयोगी टूल के रूप में चलन में आने में समय लग सकता है। पांडुलपियों के इंडेक्सिंग का कार्य भी समय लेगा। कीवर्ड के आधार पर इंडेक्सिंग की विधि से ही ये काम होगा। इसमें एक चुनौती और भी है कि अगर इस कार्य में कुशल लोगों को नहीं लगाया गया तो सारी मेहनत पर पानी फिर सकता है। पांडुलिपियों को जुटाने के काम के साथ साथ संस्कृति मंत्रालय को कुशल मानव संसाधन के विकास की भी योजना बनानी पड़ेगी। सर्वेक्षण के साथ साथ इस कार्य को करने से भविष्य में मदद मिलेगी।

ज्ञान भारतम भारत सरकार का एक ऐसा प्रकल्प है जो भारत की सभ्यतागत विशेषताओं को रिक्लेम करेगा। इस स्तंभ में पहले भी प्रधानमंत्री की सभ्यतागत चेतना की पुनर्स्थापना के कार्यों को रेखांकित किया गया है। ज्ञान भारतम के अंतर्गत जमा की गई पांडुलपियों के माध्यम से भारत की वो शक्ति सामने आ सकती है जिसको विदेशी इतिहासकारों और विदेशी विचारधारा से प्रभावित विद्वानों ने योजनाबद्ध तरीके से नजरअंदाज किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पिछले बारह वर्षों के महत्वपूर्ण कार्यों का विश्लेषण करें तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वो भारत और भारतीयता को स्थापित करने और अपनी सभ्यतागत निरंतरता से जोड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं। प्राचीन पांडुलपियों में वो खजाना छुपा हुआ जो भारत के इतिहास को बदल देने की सामर्थ्य रखता है। बस इसमें एक सतर्कता बरतनी होगी कि इन पांडुलिपियों को लेकर जिस प्रकार से संगठित तरीके से अफवाह फैलाई जाती रही है उसकी काट भी रखनी होगी। अगर वैश्विक इतिहास और ज्ञान का लैंडस्केप बदलता दिखेगा तो तमाम वैश्विक शक्तियां ज्ञान भारतम के कार्य को पटरी से उतारने की कोशिश करेंगी। अकादमिक रूप से बहुत सतर्क रहने की आवश्यकत है। ये सतर्कता इस कारण भी आवश्यक है कि ये हमारी सभ्यता की निरंतरता और ज्ञान परंपरा को स्थापित करेगी।    

आजा तेरी याद आई


आज पूरी दुनिया ड्रग्स की समस्या से जूझ रही है। नशे के कारोबार ने अपनी जड़ें बहुत गहरी जमा ली है। भारत के पहाड़ी और मैदानी राज्य भी इस समस्या से बुरी तरह से जूझ रहे हैं। नशे की तस्करी के रूप भी बदल गए हैं। इस कारोबार से होनेवाली आय से तंकवाद का जुड़ना एक बड़ी वैश्विक समस्या के तौर पर उभरा है। नशे के कारोबार और ड्रग तस्करी पर कई फिल्में बनी हैं। पिछले वर्षों में एक वेबसीरीज आर्या आई थी जिसमें नशे के कारोबार के आधुनिक और बेहद खतरनाक स्वरूप को दिखाया गया था। किस तरह से ये कारोबार लोगों की जान लेता भी है और जान जाती भी है इसका सूक्षम्ता से प्रदर्शन किया गया था। ये समस्या आज की नहीं है बल्कि दशकों पुरानी है। आज से 50 वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी चरस। रामानंद सागर लिखित और निर्देशित इस फिल्म चरस में नशे के कारोबार के अंतराष्ट्रीय कारोबार और उससे होनेवेली कमाई के लालच को प्रदर्शित किया गया था। धर्मेन्द्र- हेमा मालिनी अभिनीत फिल्म चरस मानवता की रक्षा के लिए समर्पित और ड्रग्स के कारोबार के विरुद्ध लड़ाई में अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने वाले लोगों को समर्पित है। आरंभिक संवाद भी ये संदेश देती है कि फिल्म मानवता, इंसानियत और समाज को बचाने के लिए है। जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती जाती है वो संदेश से आगे निकलकर एक प्रेम कहानी में बदलती जाती है। एक बेहद रोमांटिक प्रेम कहानी समांतर रूप से चलती रहती है। इस प्रेम कहानी को हेमा का हुस्न और धर्मेन्द्र का भोलापन और हस्य एक अलग ही ऊंचाई प्रदान करता है। ये वही समय था जब असल जिंदगी में हेमा और धर्मेन्द्र के बीच प्यार के किस्सों की चर्चा होने लगी थी। दोनों के बीच पर्दे पर जिस तरह की निकटता दिखती है उससे भी इस बात के संकेत मिलने लगे थे। फिल्मी भाषा में उसको पर्दे की केमेस्ट्री कहते हैं। 1975 में आई फिल्म शोले में जो चुलबुली और शोख तांगेवाली लड़की थी वो अब एक थिएटर आर्टिस्ट के रूप में उपस्थित थी। शोले हिट हो चुकी थी और सिनेमा घरों से लेकर बैठकी तक में बसंती और वीरू के प्यार का संवाद आम होने लगा था। शोले की सफलता ने ही रामानंद सागर को इस जोड़ी को दोहराने के लिए प्रेरित किया था। रामानंद सागर ने अपनी फिल्म में अमजद खान को भी खलनायक के रोल में लिया था। शोले में अमजद खान का किरदार खैनी खानेवाला डाकू का था जो क्रूर भी था लेकिन चरस में वही अमजद खान बो-टाई में विलेन के रूप में थे लेकिन मेकअप और गेटअप के बाद भी वैसी प्रभावोत्पादकता नहीं ला सके।

चरस इस मायने में अपने समय की यादगार फिल्म थी कि इसके बड़े हिस्से की शूटिंग माल्टा और रोम में हुई थी। जब फिल्म रिलीज होने वाली थी तो इस बात का प्रचार जोर शोर से किया गया था कि फिल्म खूबसूरत विदेशी लोकेशन पर शूट की गई थी। फिल्मी मैगजीन और प्रचार सामग्री में विदेशी लोकेशन की बात की गई थी। चरस फिल्म की कहानी औसत थी लेकिन उसमें रामांनद सागर ने जिस चरह के लटके-झटके डाले थे वो दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब हो गए थे। पिता की मौत का इंतकाम लेनेवाला बेटा और पिता के इलाज के लिए पैसे की खातिर ब्लैकमेल होती बेटी और स्थितियों का लाभ उठाता विलेन। ना जाने इस तरह की कहानी कितनी बार दोहराई जा चुकी थी लेकिन क्राफ्ट अगर बेहतर होता है तो दर्शक कहानी के दोहराव को स्वीकार कर लेते हैं। कहानी के बीच धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के बीच खूबसूरत लोकेशन और समंदर किनारे गाए फिल्मी गीत अबतक लोगों को पसंद आते हैं। आनंद बक्षी की कलम से निकले शब्दों को लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी और आशा भोसले की आवाज ने अमर कर दिया। मैं एक शरीफ लड़की बदनाम हो गई, नाइट क्लब में फिल्माया गीत है। नाइट क्लब में नायिका की वेशभूषा और अंदाज मादक होते थे जिसे आशा भोसले की आवाज ने और बढ़ा दिया था। एक और गीत है जिसको लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी। इस गीत का मुखड़ा आनंद बक्षी ने गाया था। गीत है- आ जा तेरी याद आई। ये गाना जब आरंभ होता है तो धर्मेन्द्र और हेमा खड़े हैं और पार्श्व से गीत बजता है जिसके बोले हैं दिल इंसान का एक तराजू है..। चंद पंक्तियों के बाद लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की आवाज। संदेश के आवरण में लिपटी इस फिल्म को रामानंद सागर ने इस तरह से पेश किया था जो आज 50 वर्षों के बाद धर्मेन्द्र हेमा की बेहतरीन फिल्मों में शामिल किया जा सकता है।    

 

Saturday, May 16, 2026

इतिहास लेखन की बाधा स्लीपर सेल


इतिहास एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा भारतीय राजनीति में निरंतर होती रहती है। भारतीय राजनीतिक दल हमेशा एक दूसरे पर दोषारोपण करने में अबतक लिखे इतिहास का सहारा लेते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय इतिहास को समग्रता में देखे और लिखने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार कर चुके हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ वर्षों पहले काशी की एक गोष्ठी में कहा था कि इतिहास लेखन में दूसरे की गलतियों को रेखांकित करने से बेहतर होगा कि अपनी लकीर लंबी की जाए। कहना ना होगा कि देश का शीर्ष नेतृत्व भारतीय इतिहास को समग्रता में लिखे जाने और देश की जनता के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की अपेक्षा करता है। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तब से वामपंथी इतिहास लेखन की जगह भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन की बात की जाने लगी थी। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के करीब चार वर्ष बाद 2018 में भारत के समग्र इतिहास लेखन का सोच भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च- आईसीएचआर) में आया। चार वर्षों तक वहां इसपर मंथन होता रहा। इस बीच देश की जनता ने एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत दिया। 2022 में भारत के समग्र इतिहास की योजना पर कार्य आरंभ हुआ। उस समय के समाचार पत्रों में आईसीएचआऱ के चैयरमैन राघवेन्द्र तंवर के हवाले से ये बातें प्रकाशित हैं कि आईसीएचआर भारत के समग्र इतिहास के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने इसको इतिहास के पुनर्लेखन से जोड़कर इसकी आलोचना आरंभ कर दी। एक वामपंथी सांसद ने 2022 के दिसंबर में संसद में इसपर प्रश्न भी उठाया। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने उस प्रश्न के उत्तर में सदन को बताया था कि इतिहास का पुनर्लेखन नहीं किया जा रहा है। आईसीएचआर ने भारत के समग्र इतिहास लेखन पर एक प्रोजेक्ट आरंभ किया है। कांग्रेस सांसद मनीषे तिवारी ने भी इस पर प्रश्न उठाया था।

प्रश्न ये नहीं है कि इतिहास का पुनर्लेखन किया जा रहा है या इतिहास लेखन के एकांगी प्रविधि से उत्पन्न रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए इतिहास लिखा जा रहा है। प्रश्न ये है कि आईसीएचआर ने 2018 में जो सोचा वो आठ वर्षों बाद भी भौतिक रूप से आकार नहीं ले सका है। अब तक भारत के समग्र इतिहास का एक भी खंड प्रकाशित नहीं हो पाया है। जबकि इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया गया था। इस प्रोजेक्ट के लिए इतिहासकार सुष्मिता पांडे की नियुक्ति संपादक के पद पर की गई थी। उनके साथ प्रधानमंत्री मेमोरियल लाइब्रेरी से नरेन्द्र शुक्ल को प्रतिनियुक्ति पर लाकर इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया । दो और युवा विद्वानों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया था। नरेन्द्र शुक्ल वापस जा चुके हैं। कहना ना होगा कि इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के वेतन आदि का खर्च तो आईसीएचआर उठा ही रहा है। इस बीच आईसीएचआर के सदस्य सचिव रहे उमेश कदम पर 2022 में गंभीर वित्तीय अमियमितता के आरोप लगे। वो यहां से कार्यमुक्त हो गए। भारत के समग्र इतिहास के पहले खंड पर कार्य आरंभ हो चुका था। इस प्रोजोक्ट से जुड़े लोगों ने बताया कि उमेश कदम ने पदमुक्त होने के बाद पत्र लिखकर आईसीएचआर को अपने लिखित कार्यों के उपयोग से रोक दिया था। पहले खंड के लिए उन्होंने मध्यकालीन इतिहास पर लिखा था। उसकी जगह नए व्यक्ति की खोज करना और लिखवाने में समय लगा, बताया गया। इस बात को भी चार वर्ष बीत गए। अभी तक पहला खंड नहीं आ पाना आईसीएचआर की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल है। प्रभारी सचिव ओमजी उपाध्याय को आशा है कि जल्द ही पहला खंड प्रकाशित हो जाएगा। अगर ये मान भी लिया जाए कि 2022 में ये प्रोजेक्ट जमीन पर उतरा और पहला खंड 2026 में आ जाएगा तो इस हिसाब से तो आठ खंड को प्रकाशित होने में 32 वर्ष लगेंगे।

इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के अनुसार ये तय हुआ था कि भारत का समग्र इतिहास का पहला खंड परिचयात्मक होगा। इस खंड में भारत के समग्र इतिहास लेखन की आवश्यकता को स्थापित किया जाएगा। इस बात की चर्चा होगी कि भारत के इतिहास लेखन का आधार भू-राजनीतिक न होकर भू-सांस्कृतिक होगा। पहला खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का होना था। बढ़ते बढ़ते वो करीब ग्यारह सौ पृष्ठों का हो गया। इसके प्रकाशन के बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि ग्यारह सौ पन्नों के पहले खंड को तीन विशेषज्ञों के पास भेजा गया है। उनसे अनुरोध किया गया है कि वो इसका मूल्यांकन करके अपनी राय दें। विशेषज्ञों के लिखे हुए को विशेषज्ञों से मूल्यांकन करवाने की क्या आवश्यकता है। क्या आईसीएचआर को इस प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों पर भरोसा नहीं है। इस प्रोजेक्ट की संपादक सुष्मिता पांडे विदुषी हैं। आईसीएचआर के अध्यक्ष राघवेन्द्र तंवर स्वयं विद्वान इतिहासकार हैं। ऐसे में मूल्यांकन के लिए बाहर के विद्वानों के पास भेजने की आवश्यकता क्यों ? इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए अगर पहला खंड परिचयात्मक और इस प्रोजेक्ट की आवश्यकता बताने वाला है तो ग्यारह सौ पृष्ठों का भारी भरकम खंड क्यों? क्या ये खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का नहीं होना चाहिए जो पहले तय किया गया था। तय तो ये भी किया जाना चाहिए कि ये प्रोजेक्ट कब तक पूरा होगा? क्या अनंत काल तक इस प्रोजेक्ट को चलाया जाना उचित रहेगा? क्या आईसीएचआर इसको निश्चित समय सीमा में पूरा नहीं कर सकता है। बहुत संभव है कि आईसीएचआर में अब भी वामपंथियों के स्लीपर सेल सक्रिय हों और इस प्रोजेक्ट को अपने आकाओं के कहने पर लटकाने का उपक्रम कर रहे हों। ये देखना तो अध्यक्ष का काम है कि ये प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो। आईसीएचआर में गड़बड़ियों का समाचार भी आता रहता है. चाहे वो मदर आफ डेमोक्रेसी पुस्तक का प्रकाशन हो या सुभाषचंद्र बोस नाम की पुस्तक का गलत शीर्षक प्रकाशन का मसला हो।

दरअसल आईसीएचआर की समस्या बौद्धिक कम प्रशासनिक अधिक प्रतीत होती है। 2022 में उमेश कदम के पद छोड़ने के बाद से वहां स्थायी सदस्य सचिव नहीं हैं। पिछले वर्ष मई में अल्केश चतुर्वेदी को मंत्रालय ने सदस्य सचिव नियुक्त किया लेकिन वो इस पद पर अपना योगदान नहीं दे सके। कारण मंत्रालय और आईसीएचआर बेहतर बता सकते हैं। कुछ दिनों पूर्व फिर से सदस्य सचिव पद के लिए इंटरव्यू हुआ। पैनल तय करके नाम मंत्रालय भेज दिए गया लेकिन अबतक किसी की नियुक्ति नहीं हो सकी। अब तो ये भी संदेह होता है कि आईसीएचआर के उच्च पदों पर बैठे लोग ही नहीं चाहते हैं कि वहां सदस्य सचिव के पद पर कोई स्थायी नियुक्ति हो। अगर सदस्य सचिव आ जाते हैं तो वो संस्था को चलाएंगे, इससे यथास्थितिवादियों को परेशानी हो सकती है। लेकिन चार वर्षों से इतनी महत्वपूर्ण संस्था में सदस्य सचिव का नहीं होना शिक्षा मंत्रालय के निर्णय लेने की क्षमता पर भी प्रश्न खड़े करता है। आईसीएचआर ऐसी संस्था है जिसकी सक्रियता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों को उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। बशर्ते कि सक्रिय हो।    

Saturday, May 9, 2026

फिल्म संस्थान की आवश्यकता-अपेक्षा


फिल्म और टेलीविजन संस्थान पुणे ने हाल में फेसबुक पर एक पोस्ट डाली। इसमें बताया कि बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग के सचिव प्रणव कुमार ने संस्थान का दौरा किया। सचिव ने फिल्म और टेलीविजन संस्थान के शार्टटर्म कोर्स और आउटरीच कार्यक्रम के बारे में समझा। संस्थान इस तरह के कोर्स और कार्यक्रम देश के अलग अलग हिस्से में चलाता है। इस संभावना को भी टटोला गया कि क्या ये कोर्स बिहार में भी चलाए जा सकते हैं ताकि स्थानीय प्रतिभाओं को लाभ मिले। राज्य में फिल्म शिक्षा को बेहतर किया जा सके। इस पोस्ट को देखते हुए बिहार विधानसभा चुनाव के पहले तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की एक पोस्ट की याद आई। उसमें लिखा गया था, बिहार फिल्म एवं नाट्य संस्थान की स्थापना को मिली स्वीकृति। बताया गया था कि कैबिनेट बैठक के महत्वपूर्ण निर्णय से बिहार की कला और संस्कृति को नई उड़ान मिलेगी। फिल्म इंडस्ट्री को प्रस्तावित संस्थान नई पहचान देगा। थिएटर और नाट्यकला के कलाकारों के लिए प्रशिक्षण केंद्र होगा और स्थानीय प्रतिभाओं को राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का सेतु बनेगा। कुछ इसी तरह का पोस्ट तत्कालीन उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी डाला था। उन्होंने लिखा था कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की तर्ज पर राज्य में बिहार नाट्य विद्यालय बनेगा। विजय कुमार सिन्हा ने लिखा था कि विद्यालय निर्माण की प्रक्रिया के लिए जल्द ही कैबिनेट में प्रस्ताव लाया जाएगा। छात्र राज्य में नाट्य विधा से जुड़ी पढ़ाई और प्रशिक्षण ले सकेंगे। संस्थान में स्नातक स्तर पर डिग्री और दो वर्षीय डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा और यह विद्यालय राज्य के कला के क्षेत्र में कार्य करेगा।

बिहार विधान सभा चुनाव संपन्न हो गए। पहले जनता दल (यू) के नीतीश कुमार और अब भारतीय जनता पार्टी के सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री बने । मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया। अब अपेक्षा है कि सम्राट चौधरी चुनाव पूर्व दी गई जानकारी के बारे में ठोस पहल करें। संभव है बिहार के कला संस्कृति विभाग के सचिव का फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे का दौरा इस संबंध में ही रहा हो। आज बिहार में एक फिल्म और टेलीविजन के लिए अभिनय समेत विभिन्न विधाओं को सिखानेवाले एक संस्थान की बहुत आवश्यकता है। बिहार में रंगमंच की परंपरा रही है। मनोज वाजपेयी, पंकज त्रिपाठी तो जाना पहचाना नाम हैं। इसके अलावा बिहार से अखिलेन्द्र मिश्रा, विजय कुमार जैसे उत्कृष्ट कलाकारों ने रंगमंच और फिल्म दोनों में अपनी जगह बनाई। अमिताभ सिन्हा ने लेखन और निर्देशन में नाम कमाया है। वो बिहार के हैं और फिल्म और टेलीविजन सस्थान, पुणे के छात्र रह चुके हैं। इनके अलावा भी बिहार का रंगमंच काफी समृद्ध रहा है। बावदूद इसके बिहार में ना तो कोई सरकारी नाट्य विद्यालय है और ना ही कोई फिल्म और टेलीविजन से जुड़ा संस्थान। बिहार में प्रतिवर्ष सैकड़ों छात्र अभिनय को अपना करियर बनाना चाहते हैं। कोई संस्थान नहीं होने के कारण उनको दिल्ली, मुंबई या देस के किसी और राज्य की ओर रुख करना होता है। कई ऐसे प्रतिभाशाली छात्र हैं जो नाट्य कला या सिनेमा निर्माण से जुड़ना चाहते हैं लेकिन अवसर नहीं होने के कारण उनकी प्रतिभा का उपयोग नहीं हो पाता है। निजी संस्थानों की फीस इतनी अधिक होती है कि सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के छात्रों के लिए वहां जाना संभव नहीं हो पाता। स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद भी बिहार में इस तरह के किसी संस्थान के नहीं होने से यहां के राजनीतिक नेतृत्व पर प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है। स्वाधीनता के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली बार बिहार में सरकार बनी है। अब अवसर है कि इस भूल को सुधारा जाए। बिहार में एक नाट्य कला विद्यालय या फिल्म इंस्टीट्यूट की स्थापना करके यहां के छात्रों के सपने को पूरा किया जाए। 

पिछले दिनों बिहार से खबर आई थी कि राज्य सरकार फिल्मसिटी का निर्माण करना चाहती है। मुंबई से सिनेमा से जुड़े कुछ लोगों के साथ अधिकारियों ने बांका इलाके में फिल्मसिटी निर्माण की संभावनाओं पर विचार करने के लिए दौरा किया था। इस बात को कई महीने बीत गए लेकिन अबतक ये ज्ञात नहीं हो सका है कि फिल्मसिटी के निर्माण की योजना का क्या हुआ। अगर बिहार में फिल्मसिटी का निर्माण करके उसको सफल और क्रियाशील बनाना है तो बिहार में फिल्म निर्माण से जुड़े मानव संसाधन तैयार करने पर भी विचार करना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि बिहार में राज्य का अपना एक फिल्म इंस्टीट्यूट हो। इस फिल्म इंस्टीट्यूट में सिर्फ अभिनय का प्रशिक्षण नहीं दिया जाए बल्कि तकनीकी में भी छात्रों को प्रशिक्षित किया जाए चाहे वो साउंड रिकार्डिंग हो. डबिंग हो या फिर वीएफएक्स जैसी विधा हो। बिहार सरकार चाहो तो केंद्र सरकार से अनुरोध करके फिल्म एंड टेलीविजन संस्थान, पुणे या सत्यजित राय फिल्म और टेलीविजन संस्थान, कोलकाता का एक केंद्र पटना या बिहार के किसी अन्य शहर में खोल सकती है। दोनों संस्थानों को अब विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है लिहाजा उनको कहीं भी केंद्र खोलने में किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी। बिहार सरकार को आधिकारिक रूप से सूचना और प्रसारण मंत्रालय को अनुरोध भेजना होगा। सूचना और प्रसार मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय के साथ समन्वय करके इस कार्य को पूरा किया जा सकता है। आवश्यकता राजनीतिक इच्छा शक्ति और प्रयास की है। डबल इंजन की सरकार का इतना लाभ तो बिहार को मिलना ही चाहिए। 

बीते शुक्रवार को सुवेंदु अधिकारी को जब बीजेपी के बंगाल विधानमंडल दल का नेता चुना गया था तो गृह मंत्री अमित शाह ने वहां उपस्थित विधायकों को संबोधित किया था। अपने संबोधन में अमित शाह ने बंगाल में एक विश्वस्तरीय नाट्य और कला विद्यालय की स्थापना की बात की थी। बंगाल में अगर विश्वस्तरीय नाट्य कला विद्यालय बनाया जाता है तो अच्छी बात होगी लेकिन ध्यान में रहना चाहिए कि वहां तो पहले से ही सत्यजित राय फिल्म और टेलीविजन संस्थान है। नया संस्थान बनाने से बेहतर है कि इस संस्थान को ही संसाधानयुक्त करके, नियुक्तियां आदि करके इसको विश्वस्तरीय बनाया जाए। जबकि बिहार में तो ऐसा कोई संस्थान है भी नहीं। सुवेंदु की तरह सम्राट चौधरी भी गृहमंत्री अमित शाह की पसंद बताए जाते हैं। बंगाल की तरह बिहार चुनाव के समय भी अमित शाह ने कमान संभाली थी। मंत्रिमंडल विस्तार के पहले उनके पटना पहुंचने से स्पष्ट है कि उनकी नजर बिहार पर भी है। गृहमंत्री ने जिस तरह से बंगाल को नाट्य विद्यालय देने की घोषणा की उसी तरह उनका ध्यान बिहार पर भी जाए, ऐसी अपेक्षा बिहार के लोग कर रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को विधानसभा चुनाव पूर्व के कैबिनेट के उक्त निर्णय पर ध्यान देना चाहिए। प्रस्ताव को पुनर्जीवित करते हुए सरकार की ओर से केंद्र सरकार को अनुरोध भेजना चाहिए। इसमें कोई समस्या है तो बिहार को मध्य प्रदेश की तर्ज पर अपना नाट्य विद्यालय खोलना चाहिए। बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है, कमी है तो बेहतर अवसर की। अगर राज्य में ही छात्रों को अवसर मिलता है तो ये बदलाव के एक बड़े कदम के तौर पर रेखांकित हो सकता है।