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Saturday, September 19, 2026

सेंसर बोर्ड के समझ नई चुनौतियां


नौ वर्षों के लंबे अंतराल और प्रतीक्षा के बाद केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (चलन  में सेंसर बोर्ड) का पुनर्गठन किया गया। 2017 में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड में नए सदस्यों का मनोनयन हुआ था। नियमानुसार हर तीन साल में नया बोर्ड बनाया जाना चाहिए। इस वर्ष मई में जब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी को प्रसार भारती का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था तब चर्चा हुई थी कि सेंसर बोर्ड का नए सिरे से गठन होगा। प्रसून जोशी के बाद शशिशेखर वेंपति को सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया गया लेकिन बोर्ड के नए सदस्यों की घोषणा नहीं हुई। अध्यक्ष की नियुक्ति के लगभग चार महीनों बाद 16 सितंबर को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अगले तीन वर्षों के लिए सेंसर बोर्ड के 18 नए सदस्यों के नाम की घोषणा कर दी। सेंसर बोर्ड में सिनेमा से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी गई है। फिल्मकार, अभिनेता, लेखक और रंगमंच से जुड़े लोगों को सदस्य बनाकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बोर्ड के गठन को तर्कसंगत बनाया। पर प्रश्न ये उठता है कि जिस बोर्ड का गठन तीन वर्षों बाद यानि 2020 में हो जाना चाहिए था उसके गठन में इतनी देरी क्यों हुई। पिछले नौ वर्षों में सेंसर बोर्ड कई बार विवादों में घिरी थी। तब के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने अपने सूझबूझ से उन विवादों का हल निकाल लिया था। नए बोर्ड के सामने अब नई तरह की चुनौतियां हैं। अब फिल्मकारों में सेंसर बोर्ड को फिल्म के प्रचार के टूल के तौर पर उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। बोर्ड के गठन से ऐसा प्रतीत होता है कि मंत्रालय को इन चुनौतियों का अनुमान है इस कारण से विभिन्न क्षेत्रों में फिल्मों से जुड़े लोगों को सदस्य बनाया गया है। 

फिल्म सेंसर बोर्ड के गठन के बाद मनोरंजन की बदलती दुनिया को दृष्टिगत रखते हुए 1952 के सिनेमैटोग्राफी एक्ट में समयानुकूल बदलाव करने की चुनौती थी। मनोरंजन की दुनिया के बदलते स्वरूप और तकनीक के कारण बदलते समय के हिसाब से एक्ट में बदलाव पर लंबे समय से विमर्श हो रहा था। कोई निणय नहीं लिया जा सका था। सूचना और प्रसारण मंत्रालय में बैठे यथास्थिवाद के देवता बदलावों को नोटिफाई नहीं कर पा रहे थे। जिस दिन सेंसर बोर्ड के सदस्यों के नाम घोषित किए गए उसी दिन सरकार ने फिल्म प्रमाणन को लेकर एक नई गाइडलाइन भी जारी कर दी। 35 वर्षों बाद जारी इस गाइडलाइन में ड्रग्स और बच्चों को लेकर स्पष्टता दी गई है। दर्शकों के वर्गीकरण को और भी स्पष्ट किया गया है। 2016 में जब स्वर्गीय अरुण जेटली सूचना और प्रसारण मंत्री थी तो श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में उन्होंने एक समिति बनाई थी। उस समिति की सिफारिशों को आंशिक रूप से समय समय पर लागू किया जाता रहा। अब जब मनोरंजन की दुनिया के साथ-साथ समाज भी बदल रहा है तो इसमें और भी सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। 35 वर्षों बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ये कदम उठाया है। इस गाइडलाइन के आरंभ में ही कहा गया है कि कलात्मक और सृजनात्मक अभिव्यक्ति को बाधित नहीं किया जाएगा। प्रमाणन को सामाजिक बदलाव के अनुसार तय किया जाए। नए गाइडलाइन में अश्लीलता पर भी एक पंक्ति है। हम सब जानते हैं कि अश्लीलता को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है। जहां जुगुप्साजनक अश्लीलता होगी उसकी पहचान तो आसानी से की जा सकती है। बहुत लंबा चुंबन दृष्य हो या इंटीमेट सीन, दोनों को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि ये कहानी की मांग है या फिर फिल्मकार की मुनाफा कमाने की मंशा। 

गाडलाइन की एक और बिंदु ने ध्यान खींचा, जिसमें ये लिखा गया है कि सेंसर बोर्ड फिल्म के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करते हुए प्रमाणन का निर्णय ले। कई बार फिल्मकार बहुत चालाकी से पात्रों के नाम आदि के आधार पर ये संदेश देने की कोशिश करते हैं कि अमुक समुदाय पीड़ित है और अमुक समुदाय उसको दबा रहा है या उसपर अत्याचार कर रहा है। फिल्म मुक्काबाज के एक संवाद का उदाहरण कई बार दिया जा चुका है। संवाद है – वो आएंगे और पीट-पीटकर तुम्हारी हत्या कर देंगे और भारत माता की जय का नारा लगाकर चले जाएंगे। संवाद से स्पष्ट था कि फिल्मकार किसको टार्गेट कर रहे थे। इस संवाद का फिल्म की कहानी और संबंधित दृश्य से बहुत अधिक लेना देना नहीं था। लेना-देना था तो फिल्मकार के सोच और उसकी राजनीतिक मानस और प्रतिबद्धता से। फिल्मों के माध्यम से राजनीति करने की, अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने की और विरोधी विचारधारा को गिराने का खेल इन दिनों काफी बढ़ गया है। बहुत सारे ऐसे फिल्मकार हैं जो मोदी सरकार के विरोधी हैं और वो अपनी कहानी और संवाद के माध्यम से सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए फिल्म की कलात्मक और सृजनात्मक स्वतंत्रता का सहारा लेते हैं। पहले भी ऐसा होता था पर कम।  

पिछले दिनों ऐसी खबरें आई थीं कि पंजाबी फिल्म दस्तार को लेकर सेंसर बोर्ड ने कड़ा रुख अपनाया था। उसमें कई कट्स लगाने की सलाह दी गई थी। इस फिल्म के दृष्य और संवाद ऐसे थे जो कि व्यापक समाज हित में नहीं थे। आतंकवादियों को लेकर गांवों में जिस तरह के दृष्य दिखाकर उनको महिमामंडित करने की कोशिश की गई थी वो व्यापक समाज और देशहित में नहीं था। आतंकवादियों के पड़ोसी देश में जाने को लेकर परिवार में जो संवाद होता था वो भी अनुचित था। इसके पहले फिल्म सतलुज को पिछले चार वर्षों से सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिला था तो उसके पीछे कारण है। वो फिल्म सिस्टम पर सवाल उठाने के आवरण में देश पर प्रश्न खड़े करती है। सेंसर बोर्ड  के सामने इस तरह के कंटेंट को देखना और उसका प्रमाणन बड़ी चुनौती है। सेंसर बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी सुधारना होगा। वहां से पूर्व में भ्रष्टाचार की खबरें ती रही हैं। जो फिल्में क्षेत्रीय स्तर पर प्रमाणित की जाती हैं उसमें पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने की आवश्यकता है। अकारण किसी फिल्म को रोका न जाए और कारण हो तो किसी फिल्म को प्रमाण पत्र दिया भी न जाए। चतुर फिल्म निर्माताओं ने ऐसी जुगत निकाली है कि फिल्म मुंबई में बनाओ लेकिन सर्टिफिकेशन के लिए कोलकाता या दिल्ली में आवेदन करो। क्यों। 

सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव के पास कई अहम जिम्मेदारियां हैं। पर एक काम अच्छा किया गया कि सेंसर बोर्ड के चेयरमैन शशिशेखर वेंपति को बनाया गया। शशिशेखर वेंपति तकनीक में माहिर हैं। उनके इस हुनर का लाभ सेंसर बोर्ड के क्रियाकलापों को और पारदर्शी बनाने में किया जाना चाहिए। हलांकि सेंसर बोर्ड का एक्स हैंडल जो 2022 के बाद से निष्क्रिय था उसको सक्रिय किया गया है। दरअसल फिल्म एक ऐसी विधा है जिसका समाज पर व्यापक प्रभाव है। इस कारण लोगों की इसमें अधिक रुचि होती है। कोई फिल्म विवादित होती है तो चर्चा बटोरती है। कोई सूत्र मिल जाए तो प्रधानमंत्री तक को लपेटे में लेने का प्रयास किया जाता है। नए बोर्ड के समझ चुनौतियां भी हैं और अवसर भी। 


Saturday, September 12, 2026

विचारधारा की जकड़न में फिल्मकार


हिंदी फिल्मों के एक निर्देशक हैं तिग्मांशु धूलिया। उन्होंने कई फिल्में निर्देशित की हैं। कुछ में अभिनय भी किया है। लोग उनको फिल्म पान सिंह तोमर के निर्देशक के तौर पर जानते हैं। इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में उनका भाषण हुआ। तिग्मांशु ने करीब आधे घंटे के अपने उद्बोधन में दुनिया जहान की बातें की। पूंजीवाद के खतरे से लेकर इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) से जुड़े किस्से सुनाए। चूंकि वो फिल्मों से जुड़े हैं तो फिल्मी बातें अधिक हुईं। राजनीति पर भी गए। अपने अनुभव भी साझा किए। अपना मत भी रखा। उनका मानना था कि इन दिनों हिंदी फिल्मों से कहानी गायब हो गई है। फिल्म धुरंधर का उदाहरण देते हुए उपहास के अंदाज में उसकी कहानी पर प्रश्न खड़ा किया। बोले कि बस एक व्यक्ति है जो पाकिस्तान जाता है। वहां तबाही मचाता है। ऐसी टिप्पणी करनेवाले तिग्मांशु को ये बताना चाहिए था कि कहानी क्या होती है। क्या कहानी सिर्फ उन फिल्मों में ही होती है जो लेफ्ट इकोसिस्टम के निर्देशक बनाते हैं। फिल्म धुरंधर में अगर कहानी नहीं दिखाई देती है तो उनको कहानी की परिभाषा का फिर से अध्ययन करना चाहिए। हिंदी के कई आलोचकों ने कहानी की परिभाषा दी है। अगर तिग्मांशु उन परिभाषाओं को एक बार देख लेते तो बेहतर तरीके से अपनी बात रख पाते। 

तिग्मांशु ने ये भी कहा कि हिंदी फिल्मों में हिंसा बहुत हो गई है। समाज क्रोध में है। यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है लेकिन सामान्यीकरण भी है। फिल्मों में हिंसा दिखाई जा रही है पर कई ऐसी फिल्में बन रही हैं जिनमें हिंसा नहीं होती। हिंसा तो कहानी पर निर्भर करती है। पिछले दिनों कई बेहतर प्रेम कहानी आई हैं जिसको दर्शकों ने पसंद किया। फिल्म सैयारा इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। चूंकि उन्होंने कहा कि वो फिल्में नहीं देखते। संभव है कि इस कारण उनको हिंदी फिल्मों की दुनिया में क्या घट रहा है इसका अनुमान कम हो। तिग्मांशु धूलिया की बातों के आलोक में उनकी फिल्म घमासान को परख लेते हैं। बीते शुक्रवार को उनकी फिल्म घमासान रिलीज हुई। ये फिल्म 2006 के उत्तर प्रदेश की कहानी कहती है। उत्तर प्रदेश का एक दस्यु सम्राट जिसका बुंदेलखंड इलाके में खौफ है। राजनीति से उसका संबंध और चुनाव के बाद फिल्म के अंत में उसके एनकाउंटर पर कहानी समाप्त होती है। ये एक ऐसी कहानी है जो दर्जनों बार हिंदी फिल्मों में कही जा चुकी है। तिग्मांशु ने जिस तरह से इस फिल्म को बुना है वो भी पुरानी प्रविधि है। एक ही कहानी को बार बार दोहराने से कथा का मूल तत्त्व, उत्सुकता, समाप्त हो जाता है। उनकी शिकायत है कि हिंदी फिल्में हिंसा के एक विशेष टेंपलेट में फंस गई है। घमासान देखने के बाद तो यही लगता है कि तिग्मांशु स्वयं डकैतों की समस्या और उसके खात्मे के हिंदी फिल्मों के पुराने टेंपलेंट में फंसे हैं। अपनी ही फिल्म पान सिंह तोमर से एक इंच भी आगे नहीं जा पाए हैं। राजनीति का तड़का लगाने का प्रयास अवश्य किया है लेकिन वो फार्मूला भी बहुत ही पुराना हो चुका है। रही बात हिंसा की तो इस फिल्म में तिग्मांशु ने भी दस कटे हुए सर का सार्वजनिक प्रदर्शन किया है। क्लोज शाट भी दिखाया है। यहां वो हिंसा को कहानी की मांग बताकर उचित करार दे सकते हैं। यही बात अन्य फिल्मों पर भी लागू होगी। अपनी फिल्म में हिंसा दिखाना कहानी की मांग और कोई दूसरा दिखाए तो वो एक टेंपलेट। गजब विचार है। 

उन्होंने अपने व्याख्यान में दो उदाहरण दिए और बताया कि जवाहरलाल नेहरू कितने उदार थे। जब एक फिल्म सेंसर बोर्ड में अटक गई तो दिलीप कुमार ने नेहरू से गुहार लगाई। नेहरू ने फिल्म देखकर सेंसर बोर्ड को फिल्म रिलीज करने को कहा। तिग्मांशु को ये कदम उदारता लग सकती है। पर यह एक खतरनाक प्रवृत्ति थी कि एक वैधानिक संस्था के निर्णय को प्रधानमंत्री ने पलट दिया। आज अगर ऐसी कोई छोटी सी घटना हो जाए तो यही लोग आसमान सर पर उठा लेंगे। संविधान की दुहाई देने लगेंगे। उनकी एक और बात को रेखांकित करने की आवश्कता है कि 2017 तक सब ठीक था लेकिन पता नहीं क्यों उसके बाद फिल्मी दुनिया अचानक क्यों बदल गई। वो ये भी कह गए कि 2017 तक ‘इनको’ (वर्तमान सरकार को) फिल्मों की समझ नहीं थी। कैसा अजीब तर्क है। तिग्मांशु जैसे वामपंथी पता नहीं क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि देश का मूड बदल चुका है। दर्शकों की पसंद बदल गई है। दस्यु और उनके आतंक की कहानी अब दर्शक नहीं सुनना/देखना चाहते हैं। कई बार देख लेने के बाद उनको ये दोहराव लगता है। न कहानी अलग, न ही ट्रीटमेंट अलग न ही कोई चौंकानेवाली बात।

दरअसल तिग्मांशु और उन जैसे वामपंथी निर्देशकों की कठिनाई अलग है। अब उनकी फिल्में चल नहीं रही हैं तो वो दर्शकों के सर पर इसका ठीकरा फोड़ना चाहते हैं। इसी इकोसिस्टम के एक और निर्देशक हैं सुधीर मिश्रा। एकाध अच्छी फिल्में बनाईं हैं। जब उनकी फिल्म अफवाह रिलीज हुई तो वो दर्शकों को बांटने लगे थे। अफवाह और द केरल स्टोरी एक साथ रिलीज हुई थी। द केरल स्टोरी सुपर हिट रही और अफवाह बुरी तरह पिट गई। तब सुधीर ने एक्स पर लिखा था- ‘द कश्मीर फाइल्स के बारे में लिबरल्स को शिकायत रहती है। क्यों? विवेक अग्निहोत्री ने एक फिल्म बनाई और उसके दर्शक इस फिल्म को देखने के लिए थिएटर में आए। लेकिन जब हम फिल्म बनाते हैं तो हमारे दर्शक, जो विवेक की आलोचना करते हैं, चुपचाप बैठे रहते हैं। वो फिल्म देखने के लिए सिनेमा हाल नहीं पहुंचते हैं।‘ ये टिप्पणी कुंठा की पराकाष्ठा है। तिग्मांशु उसी राह पर हैं। 

तिग्मांशु जब फिल्मकारों की लाचारगी की बात करते हुए कहते हैं कि जब अच्छी कहानी कहनेवाले फिल्मकारों पर संकट आता हो तो कोई बचाने नहीं आता। भाईचारा खत्म हो गया है। तिग्मांशु धूलिया जी इस भाईचारे को खत्म करने का आरंभ तो आप जैसे कलाकारों ने ही 2014 में किया था। जब लोकसभा चुनाव का प्रचार अपने अंतिम चरण में था तो इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, नंदिता दास, कबीर खान, महेश भट्ट जैसे लोगों ने परोक्ष रूप से कांग्रेस के पक्ष में और नरेन्द्र मोदी के विरोध में खुला पत्र लिखा था। आप जब नेहरू फैन होने की बात करते हैं तो 2014 की आपका बयान याद आता है कि मोदी को प्रधानमंत्री के पद पर देखना दुखद होगा। आपकी प्रतिबद्धता स्पष्ट है । आपलोगों को अगर राजनीति करनी है तो खुलकर राजनीति के मैदान में उतरिए। कला और फिल्मों को औजार मत बनाइए। दर्शक समझ चुके हैं आपलोग कब समझेंगे । जितनी जल्दी समझ जाएं वो फिल्मी दुनिया के लिए बेहतर होगा। और हां ! लोकतंत्र 1793 में फ्रांस में आरंभ नहीं हुआ था। उसके बहुत पहले से भारत में वैशाली में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली चल रही थी। अपने देश को, अपने अतीत को समझिए, उसपर गर्व करिए दर्शकों को समझ जाएंगे। 


Saturday, September 5, 2026

प्रयोगधर्मिता से ‘एक्शन’ में नायिकाएं,


हाल के दिनों में दो नायिका प्रधान फिल्में आई। दोनों एक्शन फिल्म है। दोनों फिल्मों में बच्चियों की जिंदगी केंद्र में है। जुलाई में शिव रवैल के निर्देशन में आई फिल्म अल्फा में आलिया और शरवरी मुख्य भूमिका में हैं। जबकि इसी महीने देवाशीष मखीजा के निर्देशन में बनी फिल्म गांधारी आई। इसमें तापसी पन्नू मुख्य भूमिका में है। गांधारी के पहले तापसी और कंगना के बीच विवाद भी उठा था। कई बार देखा गया है कि जब कोई फिल्म रिलीज होनेवाली होती है तो उससे जुड़े नायक-नायिका या कहानी को लेकर विवाद होता है। कुछ लोगों का मानना है कि फिल्म की रिलीज के समय इस तरह के विवाद उठाने के पीछे मंशा फिल्म को चर्चित करने की होती है। कंगना और तापसी के बीच के विवाद को तापसी ने खत्म करने का प्रयास किया, लेकिन विवाद की चर्चा तो हो ही गई। फिल्म को इससे कितना लाभ मिला ये कहना तो कठिन है लेकिन विवाद की टाइमिंग को तो रेखांकित किया ही जाना चाहिए। इस लेख का विषय दो नायिकाओं के बीच विवाद की चर्चा नहीं हे। चर्चा तो नायिका प्रधान एक्शन फिल्मों की करना चाह रहे हैं। 

हिंदी फिल्मों में इस बात की बहुत चर्चा होती रही है कि नायिकों को सिर्फ उनके ग्लैमर औरर आकर्षण के कारण फिल्मों में शो पीस की तरह रखा जाता है। ये बात तो कई दशकों से कही सुनी जा रही है कि हिंदी फिल्मों में नायिकाओं को पेड़ के चारों तरफ घूमते हुए डांस करना और रोमांटिक सीन देने के लिए फिल्मों रखा जाता है। पिछले सालों में तो चर्चा ये होने लगी थी नायक और नायिकाओं को फिल्म में काम करने के लिए एक समान पैसे मिलते हैं या नहीं। अगर नायिकाओं को कम दिए जाते हैं तो क्यों। एक दौर ऐसा भी आया था कि फिल्मों में माधुरी दीक्षित को कई नायकों से अधिक पैसे मिलते थे। टीवी की दुनिया में स्मृति इरानी को साथी पुरुष कलाकारों से अधिक पैसे मिला करते थे। लेकिन ये एक दो उदाहरण हैं। हिंदी फिल्मों में नायकों को अधिक और नायिकाओं को कम पैसे मिलते रहे हैं। अभी भी मिल रहे हैं। इसके पीछे का कारण तो सिर्फ व्यवसाय ही नजर आता है। इसमें नायक नायिका में भेद-भाव की मानसिकता जैसी कोई बात ना तो समझ आती है और ना ही नजर। फिल्म उद्योग पूरी तरह से कारोबारी दुनिया है जहां सबकुछ लाभ-हानि को ध्यान में रखकर होता है। अगर कोई फिल्म नायक के नाम और छवि पर सफल होती है तो उसका बाजार भाव बढ़ जाता है। अगर कोई फिल्म नायिका अपने कंधे पर उठाकर सफलता की सीढ़ी चढ़ती है तो उसका बाजार भाव निश्चित रूप से बढता है। 

फिल्म अल्फा यशराज फिल्म्स की स्पाई यूनिवर्श की कहानी है। इसमें अनिल कपूर, बाबी देओल, ऋतिक रोशन भी हैं लेकिन कहानी आलिया भट्ट और शरबरी के इर्द गिर्द ही घूमती है। कहानी अच्छी है। स्पाई यूनिवर्स की कहानियों में सरप्राइज एलिमेंट बहुत होते हैं। इस फिल्म में भी है। बाबी देओल का जो फिल्मी चरित्र है वो खुद को देशभक्त कहता है लेकिन अंत में उसका भेद खुलता है और वो पाकिस्तानी एजेंट होता है। वो सेना और आर एंड डब्ल्यू को चकमा देने में सफल रहता है। कहानी बहुत सधे तरीके से आगे बढ़ती है। फिल्म में मार-धाड़ बहुत है लेकिन निर्देशक ने फिल्म को जुगुप्साजनक हिंसा से बचा लिया है। हिंसक दृष्यों को देखकर मन खराब नही होता है। आलिया अपने एक्शन दृष्यों में स्वाभाविक लगती है लेकिन शबरबी की एंट्री के साथ ही वो आलिया पर भारी पड़ती दिखती है। आलिया की तुलना में शरबरी का रोल कम है लेकिन जितनी भी देर वो पर्द पर रहती है आलिया को टक्कर देती नजर आती है। अपने अपियरेंस से, अपने एटीट्यूड से और अपने अभिनय से। इस फिल्म में निर्देशक शिव रवैल की भी प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने कथानक को बहुत मजबूती से बुना। दर्शक कहीं उबता नहीं है। कहानी में सरप्राइज एलिमेंट्स भी हैं जो कथानक के बढने के साथ साथ खुलता है। दर्शकों के मन में फिल्म देखते हुए ये चलता रहता है कि आगे क्या। यही आगे क्या किसी फिल्म की सफलता का पैमाना होना चाहिए, खासकर अगर स्पाई यूनिवर्स की फिल्म है तो। शिव रवैल ने इसके पहले भोपाल गैस त्रासदी पर आधारित वेबसीरीज द रेलवे मैन निर्देशित की थी। उस सीरीज को दर्शकों का प्यार मिला था और शिव के काम की सराहना हुई थी। शिव रवैल एक समृद्ध विरासत को भी आगे बढ़ा रहे हैं, उनके पिता राहुल रवैल और दादा एचएस रवैल ने कई सुपर हिट फिल्में बनाई थीं। फिल्म अल्फा में शिव रवैल ने पहली बार निर्देशक की भूमिका का निर्वाह किया है। 

फिल्म गांधारी में तापसी पन्नू अपनी छवि के अनुरूप किरदार निभा रही हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार की महिला जिसकी बेटी का अपहरण हो जाता है। बेटी की तलाश में पूरी फिल्म है। तापसी ने एक्शन करने का भी प्रयास किया है लेकिन जब वो फाइट सीन देती है तो स्वाभाविक नहीं लगती हैं। अपनी बेटी की तलाश करते करते उसको छह साल से कम उम्र की बच्चियों को अवैध तरीके से विदेश भेजने के गैंग का पता चलता है। कहानी बहुत उलझी हुई है और कथानक में गैप है जिसको भरने में निर्देशक विफल रहे हैं। दर्शकों को चौंकाने के चक्कर में कथानक की निरंतरता बाधित होती है। फिल्म में धर्म का ज्ञान भी दिया गया है लेकिन ये आउट आफ प्लेस लगता है। जैसे तापसी की ही एक अन्य फिल्म अस्सी में जबरदस्ती हिंदी के कवियों का नाम पात्रों से कहलवाया गया था। ना तो उसकी कोई प्रासंगिकता थी और ना ही आवश्यकता। निर्देशक और फिल्म लेखक को लगा होगा कि उन नामों के उल्लेख से उनको हिंदी साहित्य का ज्ञाता मान लिया जाएगा। फिल्म गांधारी के कई दृश्यों में तापसी स्वाभाविक भी लगी है। जब वो दृष्टिहीन महिला के रोल में थाने के बाहर बैठकर बेबस दिखती हैं। ये बहुत ही पावरफुल सीन है। ऐसा फिल्म में बहुत कम जगह दिखा है। कई जगह तो अस्वाभिवक से लगने वाले दृष्य भी निर्देशक ने ठूंसे हैं। बहुरूपियों की दुनिया को दिखाने का प्रयत्न भी किया गया है लेकिन उस दुनिया को लेकर और रिसर्च करने की जरूरत थी। 

फिल्म अल्फा और गांधारी को देखने के बाद लगता है कि हिंदी की फिल्मी दुनिया अब नायिका प्रधान फिल्मों में ज्यादा निवेश करने लगी है। कंगना की फिल्म भारत भाग्य विधाता भी नायिका प्रधान थी। नायिका प्रधान फिल्म बनाना अच्छी बात है लेकिन कहानी और उसके ट्रीटमेंट को लेकर बहुत सजग और सावधान रहने की आवश्कता होती है। जहां भी अनावश्यक रूप से नायिका को सुपर हीरो बनाने या दिखाने का प्रयास होता है, दर्शक फौरन भांप लेता है। परिणाम फिल्म असफलता के रास्ते पर चल पड़ती है। बावजूद इसके अगर नायिकाओं को लीड रोल और विशेषकर एक्शन रोल में लेकर फिल्में बनने लगी हैं तो यह एक सुखद ट्रेंड है। हिंदी दर्शकों को के लिए भी और फिल्मकारों के लिए भी।    


Saturday, August 29, 2026

पुस्तक को चर्चित करने का खेल


कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक के भारत में प्रकाशन को लेकर विवाद जैसा हो गया है। बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी की पुस्तक बिलांगिंग,ए जर्नी आफ लव के भारत में प्रकाशन पर लेखक और प्रकाशक में मतभेद है। इस पर चर्चा करने के पहले जरा इस पुस्तक की घोषणा की पृष्ठभूमि देखते हैं। पहले इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म्स पर इस पुस्तक का कवर आया। लोगों ने पोस्ट करना आरंभ किया, सोनिया जी की पुस्तक आ रही है। उत्सुकता का वातावरण बनाया गया। एक्स और फेसबुक पर कवर के बाद कहा जाने लगा कि सोनिया गांधी ने अपनी पुस्तक में राजीव गांधी से मिलने से लेकर गांधी परिवार की बहू बनने तक की घटनाओं का उल्लेख किया है। जो लोग भी पोस्ट कर रहे थे उनमें से किसी ने पुतक पढ़ी नहीं थी। पुस्तक 10 नवंबर को बाजार में आ रही है। अमेरिका का प्रकाशक इसको प्रकाशित कर रहा है। राजीव और सोनिया ने प्रेम विवाह किया था। किताब के नाम में जर्नी आफ लव को उनकी प्रेमकथा से जोड़कर लोगों ने पोस्ट लिखे। पुस्तक के प्रति उत्सुकता का वातावरण गाढ़ा हुआ। अब चर्चा हो रही है कि प्रकाशक पेंग्विन इंडिया ने भारत में उनकी पुस्तक को छापने से मना कर दिया है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर चर्चा ने जोर पकड़ा। बताया जाने लगा कि प्रकाशक ने लेखिका से कुछ प्रसंगों और अंशों को बदलने का आग्रह किया गया। लेखिका ने प्रकाशक की बात मानने से इंकार कर दिया। इसको विवाद का रूप दिया गया। इस प्रसंग को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाने लगा। 

प्रकाशक पेंग्विन ने अपनी तरफ से सफाई दी। घोषणा की कि सोनिया गांधी की पुस्तक पेंग्विन से प्रकासित नहीं हो रही है। आगे लिखा कि प्रकाशक होने के नाते उनका विशेषाधिकार और जिम्मेदारी है कि वो किसी भी पुस्तक के किसी भी प्रसंग का फैक्ट चेक करें। लेखक को अपनी राय से अवगत करवाएं, जो कि पुस्तक के हित में हो। ये प्रकाशन जगत की समान्य प्रक्रिया है। पेंग्विन ने आधिकारिक बयान में कहा वो अब भी इस पुस्तक को छापने के इच्छुक हैं। साथ ही बताया कि प्रकाशक और लेखक के बीच जो भी बात हुई है उसकी गोपनीता बरकरार रखना चाहते हैं। पेंग्विन ने सही कहा है। कथेतर पुस्तकों में फैक्ट चेक करने की आवश्यकता होती है। फिक्शन में तो किसी तरह प्रसंग काल्पनिक कहकर चल जाता है। जब आप किसी पुस्तक को संस्मरणात्मक कहते हैं या किसी घटना के आधार पर लिखते हैं तो उसकी प्रामाणिकता तो सिद्ध करनी ही होती है। ये तो प्रकाशन जगत की सामान्य प्रक्रिया है। जो लेखक कथेतर गद्य लिखते हैं उनको ये पता भी है। मैंने ही लोकसभा चुनाव में अमेठी में राहुल गांधी की हार और स्मृति इरानी की जीत को केंद्र में रखकर अमेठी संग्राम नाम की पुस्तक लिखी थी। उस पुस्तक के कई प्रसंगों पर प्रकाशक ने आपत्ति जताई थी। कइयों की उसकी प्रामणिकता के बारे में आशंकित थे। प्रियंका गांधी से संबंधित एक घटना मेरी पुस्तक में उल्लिखित है। प्रियंका पर टिप्पणी सुनने के बाद  स्मृति इरानी ने एक बेहद कठोर निर्णय लिया था। उस निर्णय का उनके चुनाव परिणा पर असर पड़ सकता था। इस प्रेसंग को लेकर प्रकाशक आश्वस्त नहीं थे। उन्होंने प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए बोला। जब उस घटना के साक्षियों के वर्जन आए तब प्रकाशक संतुष्ट हुए। दूसरी पुस्तक मार्क्सवाद का अर्धसत्य को लेकर भी प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। जिनको हमने साथ बैठकर हल किया था। यह तो लेखक और प्रकाशक के बीच चलनेवाली एक रुटीन प्रक्रिया है। लेकिन इन तमाम बातों के बीच सोनिया गांधी की पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। 

इंटरनेटट मीडिया पर अब इस तरह की बातें आ रही हैं कि सोनिया जी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक भेंट के प्रसंग को लेकर प्रकाशक ने आपत्ति जताई। चीन-भारत संबंध के अध्याय को लेकर प्रकाशक के कुछ प्रश्न थे। इसी तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित प्रसंगों की प्रामाणिकता को लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहते थे। संस्मरणों में इस तरह की बातें होती हैं जो बहुधा लेखक की धारणा पर आधारित होती है । उससे किसी अन्य की छवि पर असर पड़ सकता है। संभव है कि उक्त प्रसंगों में इस तरह की धारणाएं हों जिसको लेकर प्रकाशक आश्वस्त होना चाहता हो। यही आश्वस्ति तो कांग्रेस के नेता 2010 में चाह रहे थे जब स्पैनिश लेखक जेवियर मोरो की पुस्तक ‘द रेड साड़ी’ भारत में प्रकाशित होनेवाली थी। जेवियर मोरो ने 2008 में स्पैनिश भाषा में सोनिया गांधी की जीवनी लिखी थी। उसका अनुवाद इटैलियन, फ्रेंच और डच भाषा में हुआ था। भारत में जब मोरो की पुस्तक के प्रकाशन की बात आई थी को कांग्रेस के नेताओं ने इसका खूब विरोध किया था। जहां तक मुझे स्मरण है कि जेवियर मोरो को कानूनी नोटिस भी भेजी गई थी। उस पुस्तक के कुछ प्रसंगों को लेकर कांग्रेस के नेताओं को आपत्ति थी। इमरजेंसी में सोनिया गांधी की भूमिका, सोनिया और मेनका गांधी के बीच के संबंध, गांधी परिवार की घटनाओं को लेकर कांग्रेस नेताओं को आपत्ति थी। कांग्रेस नेताओं ने तब जेवियर मोरो की पुस्तक को असत्य, अर्धसत्य और अपमानजनक बताया था। उस समय जेवियर मोरे ने ये दावा किया था कि सोनिया गांधी की जीवनी लिखने के लिए इटली स्थित सोनिया गांधी के पैतृक शहर लुसियाना में काफी समय बिताया था। उसने तो यहां तक दावा किया था कि पुस्तक प्रकाशन के पहले उसकी पांडुलिपि सोनिया जी की बहन नाडिया को दिखाई गई थी। सोनिया जी को भेजने का दावा भी मोरो ने किया था। बाद में जब केंद्र में सरकार बदली तब 2015 में ये पुस्तक भारत में प्रकाशित हो सकी। मोरो ने विवादों के बीच अपनी पुस्तक को फिक्शनलाइज्ड बायोग्राफी कहा था। पुस्तक पर डिस्क्लेमर भी लगाया था कि बातचीत संवाद और स्थितियां लेखक की व्याख्या पर आधारित है। यह आवश्यक नहीं कि वो प्रामाणिक भी हो। 

अब जब सोनिया गांधी की संस्मरणात्मक पुस्तक आ रही है तो वही लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न खड़ा कर रहे हैं जो उस समय जेवियर मोरो की पुस्तक का विरोध कर रहे थे। प्रामाणिकता की मांग करनेवाले वही लोग या तो अब खामोश हैं या प्रकाशक को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। ना तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मसला है और ना ही इसमें किसी प्रकार के दबाव की बात है। यह मामला सीधे तौर पर प्रसंगों की प्रामाणिकता का है। संभव था कि सोनिया जी इसको फिक्शनलाइज्ड संस्मरण कह देती और पेंग्विन आपत्ति नहीं करता। पर ऐसा नहीं होने के संकेत हैं। दुनिया भर में ऐसे अनेक विवाद सामने आते रहे हैं जब प्रकाशक, लेखक की बातों से असहमत होते हैं और पुस्तक छापने से इंकार देते हैं। सोनिया जी की पुस्तक का विवाद को भी इसी आईने में देखे जाने की जरूरत है। हां, इन प्रसंगों से इतना अवश् हुआ कि पुस्तक को लेकर उत्सुकता का वातावरण बना हुआ है। चर्चा होगी तो बिक्री पर असर पड़ना स्वाभाविक है। 


Saturday, August 22, 2026

श्रीराम की छवि की व्याख्या का खेल


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किला की प्राचीर से दिमागी नक्सल शब्द युग्म का प्रयोग किया। तमाम दिमागी नक्सल बिलबिलाने लगे। समाज को पता लगाने के लिए श्रम नहीं करना पड़ा और उनकी पहचान हो गई। यह ठीक है कि समाज में दिमागी नक्सलियों की उपस्थिति है, पर दिमागी नक्सल व्यक्ति से अधिक प्रवृत्ति है। ये प्रवृत्ति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती है। दिमागी नक्सली जैसी प्रवृत्ति समय के अनुसार अपने में बदलाव करके समाज को भ्रमित करने का कार्य भी करती है। प्रश्न उठता है कि क्या ये अनायास है कि प्रगतिशील और जनवादियों को अब प्रभु श्रीराम की चिंता होने लगी है। समाज में राम-राम कहकर अभिवादन करने की जगह जयश्रीराम से अभिवादन करना उनको राजनीतिक लगने लगा है। राम-राम और जयश्रीराम में उनको अंतर नजर आता है। राम-राम में कोमलता और जयश्रीराम में आक्रामकता। इतना ही नहीं समाजवाद की डोर थामे जनवाद की ध्वजा लहरानेवाले एक प्राध्यापक आलोचक तो कबीर और गांधी के राम, तुलसीदास के राम और सत्ताधारी दल के राम में अंतर दिखाने की कोशिश करते हैं। अयोध्या के भव्य और नव्य मंदिर में स्थापित श्रीराम की अलग छवि ढूंढने की कोशिश भी होती है। ढूंढते ही नहीं हैं बल्कि प्रभु श्रीराम की एक राजनीतिक छवि गाढा करने का प्रयत्न करते हैं। अच्छी बात है कि समाजवादी/जनवादी और वामपंथी प्रभु श्रीराम की बात तो करने लगे हैं। यह इनका ह्रदय परिवर्तन है या समाज को राम के नाम पर बांटने का प्रयास। इसको देखना होगा। वो राम की राजनीतिक छवि गढ़ने का प्रयत्न नहीं करते बल्कि राम के इमाम-ए-हिंद कहे जाने की बात को दोहराते हुए एक अलग विमर्श खड़ा करना चाहते हैं। ये भूल जाते हैं कि लोक में प्रभु श्रीराम की जो छवि व्याप्त है उसको बदलने या उसको प्रश्नांकित करने का प्रयास सफल हो ही नहीं सकता है। 

एक वामपंथी प्राध्यापक आलोचक प्रभु श्रीराम की छवियों में अंतर खोज रहे हैं तो एक अन्य वामपंथी प्राध्यापक-आलोचक तुलसी को याद करते हुए उनकी पंक्तियों को व्याख्यायित करते हुए वर्तमान राजनीति से जोड़कर सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। तुलसी दास की पंक्तियों के आधार पर ये महोदय भी श्रीराम की वाल्मीकि की बनाई छवि, तुलसी की रचनाओं से बनती छवि और आज की राजनीति में उनकी छवि को अलग अलग देखने का प्रयत्न करते हैं। आलोचक महोदय कहते हैं, तुलसी ने जिस राम को गढ़ा था वे वाल्मीकि से भिन्न हैं और आज जिस राम का प्रचार है वो तुलसी के राम से भिन्न हैं। फतवेबाजी करके निकल जाते हैं अपनी अवधारणा के समर्थन में कोई मजबूत तर्क प्रस्तुत नहीं करते हैं। ये महोदय तुलसी की एक पंक्ति राज-नीति बिनु धन-बिनु धर्मा को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि इसमें तुलसी अपने समय में स्पष्ट कहते हैं कि राजनीति नीति-विहीन हो गई है और लोग अधर्म को अपना कर अमीर हो रहे हैं। साथ ही एक पंक्ति जड़ते हैं कि यह आज का भी यथार्थ है। प्रस्तुत ऐसे कर रहे हैं कि ऐसा हाल के दिनों में हो रहा है पहले ऐसा नहीं था। यही आलोचकीय बेईमानी है। इस तरह की कई पंक्तियों को उद्धत करके उसको आज का संदर्भ देने की कोशिश में भाईलोग लगे हुए हैं। तुलसीदास की पंक्तियों के साथ वामपंथी ऐसा पहली बार नहीं कर रहे हैं बल्कि पहले भी लगातार ऐसा करते हैं। महिलाओं और समाज के एक विशेष वर्ग को लेकर लिखी गई उनकी पंक्तियों के आधार पर तुलसीदास को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है। 

तुलसीदास की बात करते हुए इन वामपंथियों को कबीर अवश्य याद आते हैं। कबीर को वो क्रांतिकारी सिद्ध करते रहे हैं । उनकी तुलना में तुलसी को परंपरावादी और दकियानूसी कहते हैं। कबीर को क्रांतिकारी और तुलसी को परंपरावादी दिखाने की होड़ में कुछ क्रांतिकारी लेखकों ने तुलसीदास को वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक, नारी और शूद्र विरोधी करार देकर उनकी जमकर आलोचना की। श्रीरामचरितमानस की एक पंक्ति को उठाकर तुलसीदास को कलंकित करने का प्रयास हुआ लेकिन उनकी कविताओं में उनकी रचित चौपाइयों में इतनी शक्ति है कि वो उनपर इन आलोचनाओं का कोई असर ही नहीं हुआ। वामपंथियों ने सुनियोजित तरीके से तुलसीदास की उन पंक्तियों को उठाया जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक की बनती हो। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले श्रीरामचरितमानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर उनकी नजर नहीं जाती है। तुलसीदास लिखते हैं – कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं । इसी तरह अगर देखें तो श्रीरामचरितमानस में पुत्री की विदाई के प्रसंग में लिखा - बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इतना ही नहीं तुलसी ये भी कहते हैं कि- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा। इन पंक्तियों को आलोच्य पंक्ति के सामने रखकर तुलसीदास का मूल्यांकन किया जाना चाहिए । नारी के अलावा जब उनको शूद्रों का विरोधी कहा जाता है तब भी खास विचार के पोषक आलोचक उन पंक्तियों को भूल जाते हैं जहां वो रामराज्य की बात करते हुए सबकी बराबरी की बात करते हैं। तुलसी के रामराज्य में चारों वर्णों के सरयू नदी के तट पर साथ स्नान करने का वर्णन मिलता है । इस ओर क्रांतिकारी कामरेड लेखकों का ध्यान जाता नहीं है। चुलसी ने लिखा है– राजघाट सब बिधि सुंदर बर, मज्जहिं तहां बरन चारिउ नर। साहित्य में ये वामपंथी खेल तुलसीदास के अलावा प्रेमचंद और निराला के साथ भी खेला गया। प्रेमचंद और निराला दोनों लेखकों ने गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका कल्याण के विशेषांकों और अन्य अंकों में लेख लिखे। उनको ओझल कर दिया गया। नई पीढ़ी के पाठकों को इस बात का पता ही नहीं चलने दिया गया कि प्रेमंद और निकाला ने कल्याण में भी लिखा है। उनको वामपंथी बता दिया गया। ये पाठ्य पुस्चतों से लेकर शोध तक होता रहा। इसके आधार पर ही स्वयं को बौद्धिक भी कहने लगे। 

इस तरह की बौद्धिक बेइमानियों को किस कोष्ठक में रखना चाहिए ये तो पाठक तय कर लेंगे। पाठकों के सामने नहीं आने देने का जो षडयंत्र रचा गया और जिसको सरकारों की शक्ति के कारण अंजाम तक पहुंचाया गया उसको परिभाषित करने के लिए लाल किला की प्राचीर से बोला गया शब्द युग्म दिमागी नक्सल सटीक बैठता है। हिंदी समाज को इसपर आत्ममंथन करना चाहिए। वही तत्व अब श्रीराम को भी बांटकर समाज के सामने प्रस्तुत करने के चक्कर में लग गए हैं लेकिन इससे इतना तो हुआ कि प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को नकार नहीं रहे हैं, उनको काल्पनिक नहीं बता रहे हैं। जब ये संगठित और सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया जाने लगे और सबकी टिप्पणियों में एक साझा सूत्र दिखाई देने लगे तो समझ लीजिए कि साहित्य के बेईमान लोग इकट्ठा हो गए हैं और कुछ काल्पनिक अवधारणा को यथार्थ का रूप देने निकल पड़े हैं। पर इस बार ये भूल जा रहे हैं कि भारतीय समाज में श्रीराम को परिभाषित करके उनको किसी कोष्ठक में नहीं रखा जा सकता। सबके अपने अपने काम हैं उनको किसी परिभाषा की आवश्कता नहीं।   


Saturday, August 15, 2026

दिमागी नक्सलियों से निपटने की चुनौती


स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किला की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही, जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नक्सलवाद, माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया। नक्सलवाद ने चार-पांच दशक तक हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से को, बहुत बड़ी आबादी को दबोच कर रखा। बंदूक की नोक पर दबोच रखा था। संविधान की धज्जियां उड़ा दी थीं। देश के समान्य नागरिकों की रक्षा में 3500 से ज्यादा सुरक्षा बल के जवान शहीद हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि उनको खुशी है कि नक्सलवादी-माओवादी हिंसा को आखिरी सांस लेने की ताकत भी नहीं बची। जहां पर कभी नक्सलियों की गोलियां चलती थी, जहां कभी धरती रक्त रंजित रहा करती थी, आज उन्हीं नक्सल क्षेत्रों में विकास, विश्वास और प्रयास का तिरंगा लहरा है। यहां तक तो प्रधानमंत्री अपनी सरकार की सफलता के बारे में बात कर रहे थे लेकिन इसके बाद प्रधानमंत्री ने जो कहा उसपर वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हथियारी नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल बचे हैं। दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। वो हिंसा और अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव चल रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा। सुरक्षित भारत बनाना हम सबका दायित्व है। चुनौती सीमा के भीतर हो या सरहद के बाहर भारत हर परिस्थिति के लिए तैयार है।

प्रधानमंत्री की उपरोक्त बातों के आलोक में हम पिछले तीन चार महीने में घटी घटनाओं पर नजर डालते हैं। सबसे पहले अयोध्याजी के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी के प्रकरण को देखते हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय अपराध था। इसमें लिप्त लोगों की गिरफ्तारी हुई। सभी जेल में हैं। विशेष जांच दल इसकी पड़ताल में जुटा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस केस पर नजर रखे हुए हैं। ये आपराधिक घटना कोई साधारण अपराध नहीं है इस कारण अपराधियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और उनको कठोर दंड भी मिलना चाहिए। अब इसका दूसरा हिस्सा देखते हैं जो इस अपराध से अधिक खतरनाक है। चढ़ावा चोरी की घटना को सनातन से जोड़ कर सनातन को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। संसद परिसर में एक निर्दलीय सांसद ने भगवा पहनकर सनातन के प्रतीकों के साथ सनातन को बदनाम करने के लिए एक प्रहसन किया। इस प्रहसन में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने पात्र के तौर पर हिस्सा लिया। हिंदुओं के आराध्य प्रभु श्रीराम की तस्वीर जिस तरह से जमीन पर गिराकर अपमान किया गया उसको भी याद रखा जाना चाहिए। सनातन पर आक्रमण करके भारत की आत्मा पर चोट पहुंचाने का प्रयास किया गया। भारत की सभ्यता और संस्कृति पर चोट की गई। भारत विचार पर कुठाराघात किया गया। सनातन को कठघरे में खड़े करने का विचार दिमागी नक्सलियों का हो सकता है। उन्होंने इसकी रूपरेखा तय की होगी और कुछ दलों को चुनावी लाभ का स्वप्न दिखाया होगा। दिमागी नक्सली जब किसी को अपने कब्जे में लेते हैं तो सबसे पहले उसके दिमाग पर कब्जा करते हैं। फिर उसको लाभ होने या दिलाने का आश्वासन देकर अपने जाल में फांसते हैं। इस बात की चिंता किए बगैर कि उसके इस कदम के देश कितना और किस हद तक प्रभावित होगा। चढ़ावा चोरी प्रकरण में पूरे देश ने दिमागी नक्सलियों की इन करतूतों को देखा कि कैसे एक आपराधिक घटना को सनातन से जोड़कर उसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया गया।

दूसरा उदाहरण दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए युवाओं के प्रदर्शन के बाद की घटनाओं के विश्लेषण से निकलता है। अब ये बात लगभग स्पष्ट हो चुकी है कि जंतर-मंतर के आंदोलन का जिन लोगों ने नेतृत्व किया उनका सिरा आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ था। यहां तक तो ठीक था। किसी भी राजनीतिक दल को ये अधिकार है कि वो अपने दांव पेंच से अपने राजनीतिक विरोधियों को घेरे, कभी सामने से आकर और कभी परोक्ष रूप से। पर जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान वहां जिस तरह के नारे लगे। जिस तरह के भाषण दिए गए उसके पीछे की मंशा साफ थी। जंतर-मंतर पर नारे लगे कि मेरा लिंग मेरी मर्जी, मेरा जेंडर मेरी मर्जी, मेरे कपड़े मेरी मर्जी। वहीं कुछ प्रदर्शनकारियों के बयानों के निहितार्थ परिवार और शादी नाम की संस्था को चुनौती देनेवाले थे। एक तरफ एक संस्था पिछले सौ वर्षों से भारत और भारतीयता को लेकर आगे चल रही है। अपनी संस्था के सौ वर्ष पूरे होने पर परिवार नाम की संस्था को बल प्रदान करने के लिए कुंटुब प्रबोधन जैसा देशव्यापी कार्यक्रम चला रही हो, जिसमें नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, भाषा और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बताए जाते हों ताकि राष्ट्र मजबूत हो सके। दूसरी तरफ दिमागी नक्सली परिवार नाम की संस्था को ही खारिज करते हैं। वो किशोरों और युवाओं के मन में स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता का बीज बोना चाहते हैं। ये दो तरह के विचारों की लड़ाई है। एक भारतीय विचार जो परिवार को जोड़कर राष्ट्र को मजबूत करना चाहता है और दूसरा जो परिवार को कमजोर करके देश को कमजोर करना चाहता है। कहा भी जाता है कि देश एक बड़ा परिवार है और परिवार एक छोटा देश है। तो सनातन से लेकर भारतीय मूल्यों पर हमला करना ही दिमागी नक्सलियों का ध्येय है।

अर्बन नक्सल वो होते थे जो परोक्ष रूप से माओवादी हिंसा का समर्थन करते थे। उनके पक्ष में माहौल बनाकर देश के युवाओं को गुमराह करके माओवाद के रोमांटिसिज्म की ओर ले जाते थे। दिमागी नक्सल वो हैं जो अकादमिक जगत में भारतीय ज्ञान परंपरा का विरोध करते हैं। उसको दकियानूसी और रूढ़ीवादी बताकर खारिज करते हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के 12 वर्षों में अकादमिक जगत में ये दिमागी नक्सल कमजोर अवश्य हुए हैं लेकिन अपनी उपस्थिति का एहसास समय-समय पर करवाते रहते हैं। सरकारी सिस्टम में भी इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। विशेषकर शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में तो ये अब भी सक्रिय ही नहीं ताकतवर भी हैं। दिमागी नक्सलियों ने कमजोर पड़ने की आशंका में रणनीति बदल ली है। अब वे तिलक लगाकर सनातनी होने का स्वांग रचकर अपनी पहचान छिपाते हैं। तमाम तरह के लाभ लेते हैं। समय आने पर राष्ट्रवादी ताकतों का परोक्ष रूप से विरोध करते हैं और उनको अपने लक्ष्य से दूर करने के लिए राह में रोड़ा भी अटकाते हैं। कई बार तो बहुत साफ दिखता है कि ये हो रहा है लेकिन सिस्टम में दिमागी नक्सलियों की मजबूककी के कारण कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए प्रधानमंत्री की चेतावनी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। देश में सक्रिय दिमागी नक्सलियों की पहचान करने और उनको आइसोलेट करने का कार्य समाज को भी करना होगा। जब तक सामाजिक रूप से ये आइसोलेट नहीं होंगे तबतक वो रूप बदल बदलकर किशोरों और युवाओं को भटकाते रहेंगे।

 

Saturday, August 8, 2026

संप्रुभता को डिजीटल चुनौती


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फेसबुक पर की गई पोस्ट को थोड़े समय के लिए हटाने के लिए फेसबुक चलानेवाली कंपनी मेटा ने भारत सरकार से माफी मांग ली है लेकिन इससे पूरा प्रकरण समाप्त नहीं हो जाता। इंटरनेट मीडिया पर चलनेवाले प्लेटफार्म्स के बारे में गंभीरता से विचार ही करने और एक ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है। जंतर-मंचर पर छात्रों के नाम पर जो आंदोलन हुआ और उसमें इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका रही उसपर राष्ट्रव्यापी बहस की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की व्यंग्यात्मक टिप्पणी के बाद अमेरिका में बैठा एक व्यक्ति काकरोच जनता पार्टी के नाम से इंस्टाग्राम हैंडल बनाता है। 78 घंटे में इस हैंडल को तीस लाख फालेवर्स मिल जाते हैं। कुछ और समय में ये संख्या दो करोड़ बीस लाख तक पहुंच जाती है। इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि क्या आर्गेनिक रूप से इतने फालोवर्स इतने कम समय में किसी भी हैंडल को मिल सकते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध विभिन्न स्त्रोतों के अनुसार भारत में इंस्टाग्राम पर करीब 55 करोड़ सक्रिय उपभोक्ता हैं। इस समूह में सबसे बड़ी संख्या 25-34 आयुवर्ग के उपभोक्ताओं की है और उसके बाद 18-24 वर्ष के यूजर्स है। इलके अलावा भारत में फेसबुक के करीब 70 करोड़ यूजर्स हैं। व्हाट्सएप का प्रयोग करनेवाले 85 करोड़ लोग हैं। ये तीनों प्लेटफार्म मेटा कंपनी के अंतर्गत आते हैं। मेटा अमेरिका की कंपनी है। 

इस पृष्ठभूमि में जंतर मंतर पर जुलाई में हुए काकरोच जनता पार्टी के धरने को देखते हैं। दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना आरंभ होता है। बहुत समर्थन नहीं मिलता है। काकरोच जनता पार्टी के लोग पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर मंतर पर लाते हैं। उनके अनशन पर बैठने के बाद उनके स्वास्थ्य को लेकर चर्चा होती है। काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को समर्थन मिलने लगता है लेकिन अपेक्षित नहीं। इंटरनेट मीडिया विशेषकर इंस्टाग्राम पर इस आंदोलन को लेकर रील आदि दिखने लगते हैं। काकरोच जनता पार्टी 20 जुलाई को संसद मार्च की घोषणा करती है। अनशन के कारण सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने लगती है। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर रीलों की संख्या बढ़ने लगती है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से उठाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवा देती है। सुबह हुए पुलिस एक्शन की खूब सारी रीलें और वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल होती हैं। उन अकाउंट्स पर भी ये रीलें दिखने लगती हैं जो कभी इस तरह की रील नहीं देखते थे। मेरे एक मित्र ने बताया कि वो सिर्फ फिल्मों और पर्यटन से जुड़ी रीलें देखते थे लेकिन उन दिनों उनके वाल पर जंतर मंतर की ही रीलें दिखती थीं। आमतौर पर ये माना जाता है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म एक अल्गोरिथम से काम करता है और आप जिस तरह का वीडियो देकते हैं उसी तरह के वीडियो आपको दिखाता है। सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती करवाने के बाद उन अकाउंट्स पर भी जंतर मंतर से संबंधित वीडियो दिखने लगे थे जिनकी रुचि इनमें नहीं थी। रीलों  के माध्यम से माहौल बनाया जाने लगा। इसके बाद ही जंतर मंतर पर भीड़ बढ़ने लगी थी। ये कसेंट मैनुफैक्चरिंग का उदाहरण है। इंटरनेट मीडिया के माध्यम से आंदोलन को गति दिया जाने लगा। 

इंटरनेट मीडिया के माध्यम से साइकोलाजिकल टेकओवर आफ पालिटिकल कंज्यूमर का खेल आरंभ हो चुका था। बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से किसी के भाषण का अंश, सोनम वांगचुक को अनशन स्थल से उठाकर ले जाने का विजुअल, किशोर छात्रों का सरकार के विरुद्ध बयान रील के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचने लगे थे। भारत में यह एक नए तरह का प्रयोग था। इसके पहले विश्व के कई देशों में इस तरह के प्रयोग हो चुके हैं। बंग्लादेश और नेपाल में तो हाल ही में ऐसा हुआ था। योजना इस तरह से बनाई जाती है कि पहले कोई मुद्दा उठाया जाता है। इस बार पेपर लीक को मुद्दा बनाया गया। पेपर लीक ऐसा मुद्दा है जिससे युवा वर्ग सीधे जुड़ता है। इस संवेदनशील मुद्दे की आड़ में सत्ता विरोधी माहौल बनाया जाने लगा। शासक को तानाशाह बताकर उसकी छवि गढ़ने का प्रयत्न किया गया। डिजीटल के माध्यम से इस तरह के बयानों को प्रसारित और प्रचलित करवा कर इस छवि को गाढ़ा करवाया जाता है। सारा खेल लोकतंत्र को बचाने की आड़ में खेला जाता है। 

नेपाल और बंगलादेश के अलावा 2010 में मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देशों में अरब स्प्रिंग का खेल हुआ था। 17 दिसंबर 2010 में ट्यूनीशिया में हुई घटना को याद करने की आवश्यकता है। एक ठेलेवाले के साथ हुए दुर्वव्यवहार पर विरोध का स्वर उठा। पूरे देश में ये इतनी तेजी से फैला कि वहां के राष्ट्रपति को 14 जनवरी 2011 को देश छोड़कर भागना पड़ा। ये सिर्फ ट्यूनीशिया की कहानी नहीं है। ऐसा कई देशों में हुआ। सब जगह सत्ता परिवर्तन की स्क्रिप्ट एक जैसी है। 2024 के चुनाव में जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स ने अपना अलगोरिथम बदला, जिस तरह से मोदी विरोधियों को प्रमुखता मिली वो एक अलग शोध की मांग करता है। डिजीटल और सोशल सेक्टर को साथ लेकर सरकार बनाने और गिराने का अंतराष्ट्रीय खेल खेला जाता है उसके बारे में चर्चा होनी चाहिए। भारत में भी बार-बार वो शक्तियां इस तरह का षडयंत्रकारी खेल रचती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी को तानाशाह बताया गया। नागरिक अधिकारों की कटौती और संविधान बदलने जैसे विमर्श केंद्र में आए। मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद ये वैश्विक ताकतें निष्क्रिय नहीं हुई हैं। निरंतर सरकार विरोधी माहौल बनाने में जुटी हैं। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। इन वैश्विक ताकतों को लगता है कि भारत को कमजोर करने का यही तरीका है कि चुनी हुई सरकार के खिलाफ जनता में आक्रोश पैदा करो। इसके लिए वो छात्रों का और तथाकथित सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं को औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। 

इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की भूमिका की चर्चा 2020 के अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी हुई थी। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव लड़े और हारे थे। चुनाव के दरान ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को कुछ समय के लिए सस्पेंड किया गया था। चुनाव परिणाम के बाद ट्विटर (अब एक्स) ने डोनाल्ड ट्रंप के हैंडल पर बैन लगा दिया था। ट्रंप ने अपना प्लेटफार्म ट्रूथ सोशल लांच किया था। बाद में उनके समर्थक एलन मस्क ने ट्विटर खरीद लिया था और ट्रंप के अकाउंट से बैन हटाया था। ट्विटर नाम एक्स हुआ। ये अनायास नहीं है कि चीन इस तरह के प्लेटफार्म्स को अपने देश में घुसने नहीं देता। इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स के बढ़ते दायरे के कारण भारत में उनका प्रभाव काफी बढ़ गया है। उनके पास उपभोक्ताओं की सारी जानकारी है। वो जब चाहें जिसको चाहें अपना मनचाहा कंटेंट दे सकते हैं। ये विशेष आयुवर्ग के लोगों को लक्षित कर दिया जा सकता है, विशेष भौगोलिक क्षेत्र को लक्षित कर दिया जा सकता है। यह एक नए तरह का उपनिवेशवाद है जो किसी भी देश की संप्रभुता पर आक्रमण करता है। इसके लिए राजनीतिक दल मायने नहीं रखते हैं। मायने रखती है अपना कारोबारी हित। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि इस तकनीकी नवउपनिवेशवाद से राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा की जा सके। 


सफेद सागर में शौर्य की अग्नि


नई दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आंदलोन और उसके बाद की परिस्थितियों के संदर्भ में ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में दी जानेवाली गालियों को लेकर चर्चा हो रही है। इसके पहले जी-5 पर फिल्म सतलुज के प्रदर्शित होने और उसको हटाने के बाद ओटीटी पर अंकुश लगाने के पक्ष और विपक्ष में तर्क रखे जा रहे हैं। उधर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने संसदीय समिति को बताया कि ओटीटी के विनियमन के लिए एक विस्तृत संवैधानिक फ्रेमवर्क तैयार किया जा रहा है। ये भी जोड़ा गया कि विनियमन को इस तरह से तैयार किया जा रहा है ताकि किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वाधीनता बाधित ना हो। इस रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात कही गई है। वो ये सरकार ओटीटी प्लेटफार्म पर किसी वेबसीरीज या फिल्म के रिलीज होने के बाद विशेषज्ञों के पैनल से समीक्षा पर विचार कर रही है। अगर सीरीज या फिल्म में किसी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री हो तो उसको हटाने का उपक्रम किया जा सके। जानबूझकर मैंने इस संभावना को दिलचस्प कहा। अगर कोई फिल्म या वेबसीरीज रिलीज हो गई तो उसको भारत में तो हटवाया जा सकता है लेकिन क्या भारत के बाहर के दर्शकों के लिए हटवाया जा सकता है। तकनीक के विस्तार से ये लगभग मुमकिन नहीं है। फिल्म सतलुज के केस में हमने ये देखा कि जी 5 से फिल्म को हटवा देने के बाद भी वो इंटरनेट पर उपलब्ध रही। इस रिपोर्ट में ये भी माना गया है कि ओटीटी प्लेटफार्म ने मनोरंजन की दुनिया में पारंपरिक मनोरंजन के साधन यथा सिनेमा को पीछे छोड़ दिया है। फिल्मों में तो प्रदर्शन के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था है लेकिन ओटीटी मुख्यतया स्वनियमन के फार्मूले पर कार्य करती है। इसमें दर्शकों की उम्र को चेक करने का कोई मैकनिज्म भी नहीं है जिससे बहुधा कम उम्र के बच्चे भी सेक्सुअल कटेंट या गाली गलौच वाले संवादों से भरी सीरीज देखते हैं। इसका प्रभाव भी उनपर पड़ता है। इतना ही नहीं कई बार तो इस तरह के कटेंट सामने आते हैं जो समाज में वैमनस्यता परोसते हैं। दो समुदायों के बीच में कटुता बढ़ाते हैं। अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय पोस्ट रिलीज पैनल के माध्यम से इसको विनयमित करना चाहती है। जब भी किसी वेबसीरीज या फिल्म को लेकर दर्शकों की शिकायत आएगी तो ये पैनल उसको देखेगी। अपने सुझावों से मंत्रालय को अवगत कराएगी। 

अभी भी लगभग इसी तरह की व्यवस्था है। स्वनियमन की त्रिस्तरीय व्यवस्था में शिकायत मिलने पर मंत्रालय की समिति विचार करती ही है। उसके बाद निर्णय करती है। इस तरह के कई उदाहरण है। 2024 में श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का आयोजवन होनेवाले था। उससे एक महीने पहले नेटफ्लिक्स पर एक तमिल फिल्म अन्नपूर्णी, द गाडेस आफ फूड रिलीज की गई। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इस फिल्म में दिखाया गया था एक ब्राह्मण लड़की देश का श्रेष्ठ शेफ बनना चाहती है। उसको बताया गया कि इसके लिए उसको नानवेज खाना बनाना सीखना होगा। इस फिल्म के संवाद में प्रभु श्रीराम को मांसाहारी बताया गया। हिंदू लड़की को नमाज पढ़ते हुए दिखाया गया। तर्क दिया गया कि उसने बिरयानी बनाना एक मुस्लिम महिला से सीखा था इसलिए आभार प्रकट करने के लिए नमाज पढ़ी। नेटफ्लिक्स पर आने के बाद इसके संवाद और दृष्यों को लेकर मुकदमा हुआ। केस होने के बाद इसके निर्माता कंपनी ने क्षमा मांगी। इस फिल्म को नेटफ्लिक्स से हटाया गया। एक तो इसके प्रदर्शन के टाइमिंग पर विचार करना चाहिए। पहले ही फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी थी। दर्शक इसको नकार चुके थे। लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के कुछ दिनों पूर्व इसको ओटीटी पर रिलीज करने के पीछे की मंशा क्या थी। इस तरह की स्थितियों में पोस्ट रिलीज पैनल की क्या भूमिका होगी। क्या मुकदमा होने के बाद वो फिल्म देखेगी। क्या दर्शकों की आपत्ति या शिकायत के बाद फिल्म देखेगी। सरकारी प्रक्रिया में जबतक पैनल देखेगी तबतक कितना समय बीत चुका होगा। किसी भी वैधानिक फ्रेमवर्क को बनाने के पहले इन बातों और पहलुओं पर विचार करना चाहिए। 

ओटीटी पर लेकर हो रही तमाम चर्चाओं के बीच एक ऐसी सिरीज आई जिसको लेकर किसी भी प्रकार का विवाद संभव नहीं है। नाम है आपरेशन सफेद सागर। 1999 के कारगिल युद्ध के समय भारतीय वायुसेना के आपरेशन पर आधारित छह एपिसोड की इस सीरीज में निर्देशक ओनी सेन ने अपने क्राफ्ट, संवाद और परिस्थितियों की रचना इस प्रकार से की है कि दर्शक बंधा रहता है। इस सीरीज में सिर्फ काकपिट और युद्ध की कहानी ही नहीं है। शांति के समय पायलटों और उनके परिवारों की भावनाओं का सुंदर चित्रण भी है। युवा और अनुभवी पायलटों के जीवन को इस तरह से दिखाया गया है जो लगभग वास्तविक जैसा है। एक युवा पायलट की प्रेमिका जब अपने घर से भागकर एयरफोर्स स्टेशन पहुंचती है तो उसके बाद के दृष्य एकदम वास्तविक प्रतीत होते हैं। लड़की को बगैर मेकअप या गहरे मेकअप के पेश करने का जोखिम निर्देशक ने उठाया है। इसी तरह से इस सीरीज के केंद्रीय पात्रों में से एक स्कावड्रन लीडर अजय आहूजा, जिसका किरदार सिद्धार्थ ने निभाया, ने बहुत ही स्वाभिवक ढंग से निभाया गया है। उनकी पत्नी अलका आहूजा का किरदार अमृता बागची ने निभाया है। कैसे सीनियर पायलट का परिवार भी जूनियर पायलट के परिवार को बातों बातों में ट्रेनिंग देते हैं। इसको स्वाभाविक तरीके से संवाद के माध्यम से चित्रित किया गया है। युवा पायलट की प्रेमिका अजय आहूजा के घर में रहती है। एक दिन बातों बातों में अलका आहूजा उससे कहती है कि जब भी उसके पति जहाज लेकर जाते हैं उस दिन वो झगड़ा नहीं करती। लेकिन शिकायतों की सूची बनाते रहती हैं। जब उनके पति को जहाज नहीं उड़ाना होता है उसदिन वो सारा हिसाब बराबर कर लेती हैं। वेबसीरीज आपरेशन सफेद सागर एयरफोर्स से जुड़े पायलटों की जीवन की तमाम बारीकियों को छूती है। रिश्तों की संवेदना को इस तरह से उकेरती है कि कई बार दर्शकों की आंखें भर आती हैं। बेहद सधा हुआ संवाद। कोई पात्र अकारण लाउड नहीं होता है। कई बार तो पात्रों के बीच की चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है।  

इस वेब सीरीज के पहले भी माधुरी दीक्षित अभिनीत क्राइम थ्रिलर मिसेज देशपांडे आई थी। वो भी सलीके से बनाई गई थी। दरअसल जिन निर्देशकों को अपने हुनर और कहानी पर भरोसा होता है वो अकारण यौनिकता, हिंसा, गाली गलौच नहीं दिखाते। जिनको अपने हुनर पर भरोसा नहीं होता और जो कला में वैचारिकी की मिलावट करते हैं। राजनीति करते हैं। उससे सफलता का रसायन तैयार करना चाहते हैं। उससे ही विवाद खड़े होते हैं। ओटीटी को लेकर अगर सरकार को विनियमिन की व्यवस्था करनी है तो पोस्ट रिलीज पैनल के स्थान पर प्री रिलीज पैनल बनाने पर विचार करना होगा। ताकि अकारण नग्नता और अश्लीलता परोसने पर तो लगाम लगे ही सीरीज के बहाने राजनीति करनेवालों की पहचान भी हो सके। उनके मंसूबों को नाकाम किया जा सके। इससे ना केवल विवाद कम होंगे बल्कि अकारण सरकारी कामकाज भी नहीं बढ़ेगा।


Saturday, August 1, 2026

परंपरा में गालियों का सौंदर्यशास्त्र


जंतर मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद आंदोलन में शामिल हुए युवक और युवतियों की भाषा और गालियों पर चर्चा हो रही है। साहित्य जगत इससे अछूता नहीं है। साहित्य जगत में भी गालियों पर खूब चर्चा हुई। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ऐसी भाषा का उपयोग किया गया जो साहित्यकारों और लेखक/लेखिकाओं से अपेक्षित नहीं थी। राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर गालियों की पैरोकारी की गई। कुछ उत्साही लेखकों ने तो गाली को साहित्य का अभिन्न अंग बता दिया। राही मासूम रजा से लेकर काशीनाथ सिंह के उपन्यासों में गालियों की बात कर अपने तर्कों में वजन डालने का प्रयत्न किया गया। अति उत्साह में वैसी रचनाएं खोजी गईं जिनको गालियों के पक्ष में उद्धूत किया जा सके। पर वहां ये नहीं बताया जा सका कि गालियों में प्रयुक्त शब्दावली कैसी थी और उसका किस संदर्भ में प्रयोग किया गया था। चूंकि ये विवाद साहित्यकारों, लेखकों और कुलेखकों के बीच था इस कारण हमें उन कृतियों पर भी विचार करना चाहिए जिसमें गालियों की भरमार है। विचार तो उसपर भी किया जाना चाहिए कि गालियों का संदर्भ क्या रहा है। किन पात्रों और परिवेश में गालियां दी जाती रही हैं। इस संबंध में राही मासूम रजा के उपन्यास आधा गांव का उदाहरण कई लोगों ने दिया। राही ने अपने उपन्यास आधा गांव में जिन पात्रों के मुंह से गालियां दिलवाई हैं उनका परिवेश और उन परिस्थितियों को भी देखा जाना चाहिए। उसको देखने से ये स्पष्ट हो जाता है कि गालियों का उपयोग लेखक ने कथा को प्रामाणिक बनाने के लिए किया। किसी को अपमानित करने या उसको नीचा दिखाने के लिए नहीं। कटेंट का इटेंट देखना सबसे आवश्यक है। यही स्थिति काशीनाथ सिंह के यहां भी दिखाई देती है। 

जिन लेखकों ने अपने उपन्यासों में गालियों को अश्लीलता के साथ प्रस्तुत किया उनपर भी विचार किया जाना चाहिए। हिंदी में एक उपन्यासकार हुए कृष्ण बलदेव वैद। उनका एक उपन्यास है विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां। इस उपन्यास में अश्लीलता की पराकाष्ठा है। उनकी ये कृति जब प्रकाशित होकर आई थी तो उसकी भाषा को लेकर,स्थितियों के चित्रण में अश्लीलता को लेकर चर्चा हुई थी। आमतौर पर इस तरह की कृतियों के साथ जो होता है वही उनके इस उपन्यास के साथ भी हुआ। समय बीतने के साथ इसकी चर्चा कम होती चली गई। अब तो गाहे बगाहे ही इस उपन्यास का नाम सुनाई देता है। वैद का एक और उपन्यास है उसका बचपन। इस औपन्यासिक कृति को संवेदनशील बचपन की आंख से देखी गई एक बड़ी दुनिया की कथा कहा गया। इसकी भाषा भी अश्लील ही थी। प्रकाशन के बाद इसकी चर्चा हुई लेकिन धीरे-धीरे चर्चा तो खत्म हुई ही ये कृति पाठकों की दृष्टि से ओझल भी हो गई। कहना ना होगा कि कटेंट का इंटेंट बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। वैद ने कभी कहा था कि ये हिंदी साहित्य में उनके खिलाफ साजिश है। उनको ये भी विचार करना चाहिए था कि किस कारण से उनके उपन्यास फौरी तौर पर चर्चित होते थे और फिर नेपथ्य में चले जाते थे। दूसरी तरफ निर्मल वर्मा हैं जो उनके ही समकालीन थे। उनके उपन्यासों में भी ऐसी परिस्थियां बनती थीं कि वो अश्लील हो सकते थे। गालियों और स्त्री देह का वर्णन कर सकते थे। उन्होंने अपने भाषा कौशल से उन स्थितियों को अश्लील होने से बचाया। याद पड़ता है उनका एक उपन्यास लाल टीन की छत। इस उपन्यास में निर्मल ने अपने पात्र काया के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाया है। काया इस उपन्यास में बचपन और किशोरावस्था के संधिकाल में थी। यहां भी देह के यथार्थ से पात्र का मुठभेड़ होता है। लेखक बेहद संवेदनशील तरीके से उसका बगैर अश्लील हुए पात्र की मन:स्थिति का सफलतापूर्वक चित्रण कर ले जाते हैं। ये उपन्यास भी खूब चर्चित हुआ। अब भी ये हिंदी के पाठकों के साथ साथ गैर-हिंदी पाठकों को अपने शिल्प और भाषाई सौष्ठव के कारण लुभाता है। कंटेंट का इंटेंट साफ है। निर्मल कई बार विसंगतियों को रेखांकित करते हैं लेकिन अर्थहीन नहीं होते। 

कई लोगों ने प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के उपन्यासों का नाम लेकर भी गालियों को या अश्लीलता के सार्वजनिक प्रदर्शन को उचित ठहराने का प्रयत्न किया। ऐसे लोगों की हालत भी वैद साहब जैसी होकर रह गई। चर्चा तो मिली लेकिन तर्कों को स्थायित्व नहीं। इंटरनेट मीडिया के जमाने में किसको स्थायित्व की चिंता है। हो भी क्यों ? यहां तो तुरंता प्रसिद्धि के फेर में लोग साहित्यकार बने फिरते हैं। किसी भी चर्चा में छूट ना जें इसलिए उलजलूल लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। उपन्यासकारों के बाद अशोक वाजपेयी की बात कर लेते हैं। आयोजनधर्मी होने के बावजूद आज भी अशोक वाजपेयी को कवि के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। रतिक्रीड़ा की कविताएं लिखनेवाले अशोक वाजपेयी को देह और गेह का कवि ही माना गया। अपनी कविताओं में बाद के दिनों में अशोक वाजपेयी ने मोहक गद्य लिखना आरंभ किया लेकिन कवि के तौर पर पहचान और कविताओं को लोक में स्वीकृति नहीं मिल पाई है। उनकी तुलना में कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह ना केवल कवि के रूप में स्थापित हुए बल्कि कविताओं में वैचारिकी और सिद्धांत के कारण हिंदी साहित्य समाज में समादृत भी हुए। कुंवर जी कविता है- अबकी बार लौटा तो। उसकी कुछ पंक्तियां हैं- अबकी बार लौटा तो/ वृह्तर लौटूंगा। अबकी बार लौटूंगा तो मनुष्यतर लौटूंगा। अबकी बार लौटा तो/ हताहत नहीं/सबके हिताहित को सोचता/ पूर्णतर लौटूंगा। इन पंक्तियों में भारत है। भारत का दर्शन है । अशोक वाजपेयी की तरह पाश्चात्य पांडित्य को भारतीय परिवेश में ढालने की फूहड़ कोशिश नहीं। केदारनाथ सिंह की कविता है घास। इस कविता की आखिरी पंक्ति है कभी भी.../ कहीं से उग आने की/ एक जिद है वह। इस तरह की कई पंक्तियां पाठकों को याद हैं। अशोक वाजपेयी की शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो पाठकों को या काव्य रसिकों को याद हो। यह है कंटेंट का इटेंट। इंटेंट अगर फौरी चर्चा है तो वो तो गालियों से मिल सकती है लेकिन कालजयी नहीं हो सकते। 

कुछ लोगों ने विवाहोत्सव में बारातियों के स्वागत में गाई जानेवाली गालियों और  नकटौरा के संवादों में अश्लीलता की बात की। दोनों बातें सही हैं। गालियां दी जाती हैं लेकिन उसका अपना एक सौंदर्यशास्त्र है। विवाहोत्सव के दौरान गाई जानेवाली गालियां शारदा सिन्हा ने खूब गाईं। बिहार में उसको गारी कहते हैं। उसको सुनकर कभी भी उबकाई नहीं आई। विवाहोत्सव और नकटौरा की गालियों में एक रस होता है। वैसा रस जो शब्दों में घुलकर सुननेवाले को आनंद देता है। नकटौरा तो बिल्कुल ही निजी आयोजन होता है। इसके मनोविज्ञान को समझना चाहिए। ये महिलाओं को अपनी बात, अपनी भावनाएं सामने रखने का एक निजी मंच है। इसलिए जंतर मंतर पर दी गई गालियों का गारी और नकटौरा से तुलना हास्यास्पद है। जो अंतर सेंसुअलिटी और सेक्सुअलिटी में है वही जंतर मंतर की गालियों और गारी में है। गालियों को लेकर फेसबुक आदि पर लिखी टिप्पणियों से कई लेखकनुमा जीवों का अज्ञान सामने आ गया।   


Sunday, July 26, 2026

हिंदी का संवादप्रिय आलोचक


हिंदी अकादमिक और साहित्य जगत में नामवर सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी जन्म शताब्दी वर्ष में उनके लेखन और भाषणों पर समग्रता में विचार करने की आवश्कता है। नामवर सिंह पर अधिकांश लेख भक्ति भाव से लिखे जाते रहे हैं। बहुत कम लेख ऐसे लिखे गए जो उनकी रचनात्मकता के आधार पर उनका मूल्यांकन करने जैसा हो। या तो प्रशंसात्मक लिखा गया या उनकी व्यक्तिगत आलोचना की गई। नामवर सिंह ने अपने आरंभिक दिनों में विपुल लेखन किया। बाद में उन्होंने वाचन विधा को अपना लिया। मनसा वाचा कर्मणा वो आजीवन कम्युनिस्ट रहे। उनके लेखों में कभी भी कम्युनिस्ट विचारधारा से विचलन देखने को नहीं मिलता है। नामवर सिंह एक सच्चे पार्टी कार्यकर्ता की तरह साहित्य में भी अपनी विचारधारा के कार्यकर्ता थे। लेनिन का एक लेख है ‘पार्टी साहित्य और पार्टी संगठन’। इस लेख में वो पार्टी लेखकों से पक्षधरता का आग्रह करते हैं। नामवर सिंह के लेखन में लेनिन का वो आग्रह साकार दिखाई देता है। आलोचक होने के नाते उनका दायित्व था कि खोज-खोजकर हिंदी साहित्य के कवियों-लेखकों को मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित बताना और स्थापित करना। निराला को लेनिन के प्रभाव में बताने के लिए वो उनकी 1920 की एक कविता बादल राग की पंक्तियां लेकर आए थे। पंक्ति है- तुझे बुलाता कृषक अधीर/ऐ विप्लव के वीर। अब इस पंक्ति में चूंकि कृषक भी है और विप्लव भी तो निराला कम्युनिस्ट हो गए। नामवर सिंह ने तो जयशंकर प्रसाद पर भी लेनिन का प्रभाव देखा और कहा भी। दिनकर की किसी कविता में लेनिन का नाम आया तो उनको कम्युनिस्ट बताने लगे थे। प्रेमचंद को तो कम्युनिस्ट बता ही चुके थे। नामवर सिंह ने जो राह दिखाई थी उनके कम्युनिस्ट चेले उसी पर चलकर इन लेखकों कवियों के बारे में बोलने-लिखने लगे। परिणाम ये हुआ कि इन लेखकों का इकहरा और दोषपूर्ण मूल्यांकन हुआ। 

जब नामवर सिंह लेखन से वाचन की ओर आए तो उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा पर भी प्रहार किया। विचारधारा को लेकर चलनेवाले इस नामवर आलोचक ने किसी गोष्ठी में कह दिया कि विचारधारा हमें अमानवीकृत करती है। फिर किसी गोष्ठी में कह दिया कि शुक्र है कि हमारे देश में कम्युनिष्टों का शासन नहीं है वर्ना हम सभी यानि उनसे असहमति रखनेवाले जेलों में बंद होते। एक और इसी तरह का बयान था-भारतीय समाज में जो दुर्गति समाजवाद की है साहित्य में वही प्रतिबद्धता की। इन बयानों पर प्रगतिशील जमात के लेखकों ने खूब हो हल्ला मचाया था। एक बार मैंने राजेन्द्र यादव से पूछा था कि नामवर सिंह इस तरह के बयान क्यों देते हैं? उन्होंने छूटते ही कहा कि वो प्रचार-प्रिय आलोचक हैं। उनको पता है कि कैसे चर्चा के केंद्र में रहा जाता है। नामवर सिंह ने भी अशोक वाजपेयी के साथ एक बातचीत में कहा था कि विवादों के माध्यम से सिद्धांत का विकास हो सकता है और इनके माध्यम से ठोस साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन की दिशा में भी हम पाठकों की समझ ज्यादा बढ़ा सकते हैं, विकसित कर सकते हैं। उसी बातचीत में ये भी कहा था कि विवाद आलोचना कर्म और आलोचना धर्म में ही निहित है। नामवर सिंह के शिष्यों ने उनके व्याख्यानों को लिपिबद्ध कर पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है। उन व्याख्यानों से नामवर सिंह की जो तस्वीर बनती है वो लेखक नामवर सिंह से अलग है। ऐसा प्रतीत होता है कि नामवर सिंह लिखे हुए शब्दों और बोले गए शब्दों के महत्व को समझते थे। लिखे हुए को संशोधित करना या बदलना या अपनी स्थापना से पलट जाना कठिन होता है जबकि व्याख्यानों में ये सुविधा होती है। नामवर सिंह का जिस समय हिंदी साहित्य में डंका बज रहा था उस समय संचार के माध्यम बहुत ही कम थे। नामवर सिंह ने इसका लाभ उठाया। 

नामवर सिंह की आलोचना में तमाम विचलन होने के बावजूद इतना तो स्वीकार करना होगा कि उनके अध्ययन का दायरा बहुत विशाल था। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, उर्दू और विदेशी साहित्य बहुत पढ़ा था। एक तरफ अपने व्याख्यानों में वो श्रीरामचरितमानस की पंक्ति उद्धृत करते थे तो मीर और गालिब की शायरी का भी धड़ल्ले से प्रयोग करते थे। अपनी स्थापना के समर्थन में विदेशी आलोचकों और लेखकों को उद्धृत करते थे। उनके व्याख्यानों से ये लगता है कि वो हर गोष्ठी में पूरी तैयारी के साथ जाते थे और कुछ न कुछ नया देने की कोशिश करते। जब भी वो विचारधारा और राजनीति से मुक्त होकर अकादमिक स्तर पर बोलते तो उनका व्याख्यान सुनने योग्य होता था। उनकी आलोचना का जो वाचिक स्वरूप था वो विमर्शात्मक होता था लेकिन जब वो लिखते थे तो सृजनात्मक हो जाते थे। नामवर सिंह ने कभी स्वयं इस बात को स्वीकार किया था कि सिद्धांत निर्माण की जगह मूल्ययांकन पर प्रतिक्रिया देकर संवाद बढ़ाया जाना अधिक बेहतर है। नामवर सिंह ने छायावाद पर जो पुस्तक लिखी थी उसने अपने समय में छायावाद पर नए सिरे से साहित्य जगत को सोचने पर मजबूर किया था। कविता के नए प्रतिमान और कहानी नई कहानी उनकी दो पुस्तकों ने हिंदी साहित्य पर विचार करने की एक नई जमीन तैयार की थी। उसी तरह से जैसे डा रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ लिखकर हिंदी नवजागरण को समझने की नई दृष्टि दी थी। नामवर सिंह क्रिया केवलम उत्तरम को अपना आदर्श वाक्य मानते थे और जीवन के अंतिम दिनों तक वो इसपर डटे रहे। बाद के दिनों में जब उनपर बहुत व्यक्तिगत हमले होने लगे थे तो एक दिन मैंने उनसे इस बाबत पूछा था। उन्होंने कहा- चढ़िए हाथी ज्ञान को, सहज दुलीचा डाल/स्वान रूप संसार है, भूंकन दे झकमार। 


Saturday, July 25, 2026

सफेद रंग का इंद्रधनुष


राज कपूर के बारे में कई बातें कही जाती हैं। एक तो उनको सफेद साड़ी पहनने वाली स्त्रियां पसंद थीं। या उनको पसंद करनेवाली स्त्रियां सफेद साड़ी पहनती थीं। दूसरी उनकी वो फिल्में जबरदस्त हिट होती थीं जिनकी लीड हीरोइन के साथ उनके अफेयर के चर्चे होते थे। नरगिस से लेकर पद्मिनी और वैजयंतीमाला तक का उदाहरण उनके साथ काम करनेवाले अबतक देते रहते हैं। उनपर लिखी कई पुस्तकों में भी इस तरह की बातों का उल्लेख मिलता है। एक और बात राज कपूर के बारे में कही जाती है, जब से नरगिस और उनका अलगाव हुआ तब से उनकी फिल्मों में सेंसुअलिटी का स्थान सेक्सुअलिटी ने ले लिया। इस बीच एक और घटना घटी जिसने राज कपूर को नायिकाओं को पेश करने का आयडिया दे दिया। एक दिन राज कपूर मुंबई (तब बांबे) में अपने किसी मित्र के यहां रात के खाने पर गए थे। मित्र के घर जब वो खाना खा रहे थे डायनिंग टेबल के ऊपर लगी तस्वीर देखकर वो खाना भूल गए। वो राजजा रवि वर्मा की एक पेंटिंग थी। पेंटिंग में एक स्त्री भीगी हुई साड़ी में थी। गीली और झीनी साड़ी अपने बदन पर लपेटी। उस स्त्री की पेंटिंग में सेंसुअलिटी थी, जिसे राज कपूर ने पर्दे पर सेक्सुअलिटी में बदल दिया। ये वही दौर था जब राज कपूर की जिंदगी से नरगिस जा चुकी थीं। उनकी नई नायिका थीं पद्मिनी। उनको लेकर राज कपूर फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ बना रहे थे। इस फिल्म में पद्मिनी पर फिल्माए गए गीत ‘ओ मैंने प्यार किया ओहो क्या जुर्म किया’ में राज कपूर ने राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को दृष्यों में उतारने का प्रयास किया। गाने के दौरान पद्मिनी काली साड़ी पहनकर झरने के नीचे बने जलकुंड में कूदती हैं। तैरती हैं। पानी से बाहर आकर चट्टान पर लेटती हैं। पलटती हैं। इन सारी मादक अदाओं को कैमरा कैद करता रहता है। पद्मिनी ने इस पूरे सीन में काली साड़ी पहनी थी जो उसके शरीर के साथ चिपकी रहती है। झरने में नहाने का छोटा सीन भी है। जिसको राज कपूर दिखाते तो हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वो अगली फिल्म के लिए कुछ बचा लेना चाहते हैं।

राज कपूर ने फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में जो बचा लिया था उसको उन्होंने दिखाया अपनी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में। इस फिल्म का गाना याद करिए ‘अंग लग जा बालमा’। इस गाने के बोल शुरु होने से पहले लगभग एक मिनट तक नायिका अपने कमरे में बेचैनी में करवटें बदलती हैं। कैमरा विभिन्न मुद्राओं को कैद करता है। डेढ मिनट बाद जब कड़कती हुई बिजली और तूफानी रात में नायिका पद्मिनी पेड़ के तने से लिपट कर गाना आरंभ करती है तो दर्शक नायिका की अदाओं में खो जाते हैं। यहां राज कपूर अपनी नायिका को काली साड़ी से हल्के क्रीम कलर और लाल बार्डर वाली साड़ी तक लेकर आते हैं और उसको भिगाते भी हैं। चौखट पर अपने बदन पर साड़ी लपेटकर खड़ी पद्मिनी राजा रवि वर्मा की पेंटिंग को साकार कर देती हैं। पर इस फिल्म में भी ऐसा लगता है कि राज कपूर ने यहां भी कुछ बचा लिया। इस फिल्म के करीब डेढ़ दशक बाद राज कपूर की एक फिल्म आती है ‘राम तेरी गंगा मैली’। ये फिल्म राज कपूर ने अपने बेटे राजीव कपूर को लेकर बनाई थी। इस फिल्म का गाना याद करिए, तुझे बलाए मेरी बाहें। इसमें लाल वस्त्र में नायिका आती है लेकिन उसके बाद जब वो पर्वत के नीचे और झरने के पीछे अपने होने की बात करती है तो सफेद पारदर्शी साड़ी पहने होती है और यहां आकर राज कपूर लगभग नग्नता तक चले जाते हैं। मंदाकिनी पर फिल्माए इस दृष्य को लेकर उस समय काफी बवाल मचा था। सेंसर से सर्टिफिकेट मिलने के बाद ये फिल्म जबरदस्त हिट रही थी। उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट फिल्म। इस फिल्म ने रातों रात मंदाकिनी को स्टार बना दिया। उसके बाद मंदाकिनी ने दर्जनों फिल्में की जिनमें मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा के साथ की गई फिल्में ठीक ठाक चली। मेरठ की रहने वाली यास्मीन जोसेफ को राज कपूर ने देखा। कहा जाता है कि हिंदी फिल्मों की नायिकाएं राज कपूर की नीली आंखों में खो जाती थीं लेकिन राज कपूर यास्मीन जोसेफ की नीली आंखों में खोए नहीं बल्कि डूब गए। सीधे अपनी फिल्म का लीड रोल दे दिया। मंदाकिनी नाम भी दिया। मेरठ की यास्मीन जोसेफ मंदाकिनी बनकर प्रसिद्ध हो गई। मंदाकिनी फिर प्रसिद्धि से गुमनामी में गई और कुछ दिनों बाद पता चला कि उन्होंने एक बौद्ध मतावलंबी से शादी कर ली और अब फिल्मी दुनिया से दूर अपना पारिवारिक जीवन जी रही हैं।    


सरकार के हिसाब से कब बनेगा सिस्टम ?


दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी विरोध प्रदर्शन के बीच दो सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी मिली। एक कार्यक्रम भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत चलनेवाली संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के भोपाल स्थित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान और शालभंजिका का आयोजन है। भारत सरकार की संस्था एनसीईआरटी ने कवि विनय कुमार की कृति श्रेयसी पर चर्चा आयोजित की है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कवि राजेश जोशी कर रहे हैं। चर्चा में कुमार अंबुज, निरंजन श्रोत्रिय, आशुतोष दुबे और अंबर पांडे भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का पोस्टर देखकर तो सामान्य लग सकता है पर अगर अध्यक्षता कर रहे महानुभाव और कुछ वक्ताओं की प्रतिबद्धता को देखेंगे तो ऐसा लगता है कि भारत सरकार अपने विरोधियों को लेकर कितनी उदार है। घोर वामपंथी कवि राजेश जोशी हमेशा से मोदी सरकार के विरोधी रहे हैं और कई सार्वजनिक मंचों पर भी सरकार को विरोध करते रहते हैं। इस कार्यक्रम के पोस्टर देखने के बाद सोचा कि जोशी जी की फेसबुक वाल पर टहल आया जाए। वहां जाकर देखा तो पता चला कि वो भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफा के आकांक्षी हैं। बावजूद इसके भारत सरकार की शिक्षा मंत्रालय उनका आतिथ्य कर रही है। उनकी अध्यक्षता में कार्यक्रम आयोजित कर रही है। शिक्षा मंत्रालय तो चलिए अपनी उदारता का परिचय दे रही है लेकिन क्या राजेश जोशी को ये नहीं पता कि उन्होंने जिस कार्यक्रम में जाने की सहमति दी है उसी महकमे के मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान थे। दरअसल ये वामपंथियों का चरित्र है। जहां लाभ दिखता है वहां जाने में उनको कोई परहेज नहीं होता है। वहां जाने के लिए कोई खूबसूरत बहाना ढूंढ लेते हैं। उदाहरण के लिए इस केस में कह सकते हैं कि एनसीईआरटी तो करदाताओं के पैसे से चलता है इसलिए उनके कार्यक्रमों में जाने में क्या परेशानी है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण साहित्यिक पत्रिकाओं मं देखा जा सकता है जहां संपादकीय में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योगी की आलोचना होती है और उसके ठीक पहले इनर कवर पर योगी सरकार का विज्ञापन। राजेश जोशी के अलावा जो वक्ता हैं उनमें से अधिकतर शिक्षा मंत्री को हटाने के पक्षधर थे। 

दूसरा कार्यक्रम शिवपूजन सहाय की कृति देहाती दुनिया के सौ साल पूरा होने पर पटना में बिहार संग्रहालय का एक आयोजन है। देहाती दुनिया ठेठ देहात का औपन्यासिक चित्र की परिभाषा के साथ बाजार में आया था। देहाती दुनिया का पहला संस्करण जब प्रकाशित हुआ था तब उसके आरंभ में श्री गणेशाय नम: प्रकाशित था। पहले खंड में एक ही पृष्ठ पर श्री गणेशाय नम: उसके बाद बड़े अक्षरों में देहाती दुनिया फिर अंक एक और उसके नीचे माता का अंचल उल्लिखित था। ऐसे शिवपूजन सहाय की कृति के सौ वर्ष पूरे होने पर बिहार के कला और संस्कृति विभाग के अंतर्गत चलनेवाली संस्था बिहार संग्रहालय ने जो आयोजन किया है उसमें वक्ताओं में वामपंथ से जुड़े लेखकों की प्रधानता है। प्रगतिशील लेखक संघ के बिहार के अध्यक्ष, महासचिव और एक अन्य पदाधिकारी पहले सत्र में वक्ता के तौर पर आमंत्रित हैं। दूसरे सत्र में भी सरकार के विरोधियों को स्थान दिया गया है। ऐसे लोगों को आमंत्रित किया गया है जो सरकार के विरोध में खड़े होकर पटना के गांधी मैदान में नारे लगाते रहे हैं। अब भी लगाते रहते हैं। पर बिहार सरकार के कला और संस्कृति विभाग की उदारता के क्या ही कहने। दरअसल पिछले कुछ समय से ये देखा जा रहा है कि बिहार संग्रहालय वामपंथियों को अच्छी खासी जगह दे रहा है। कुछ वामपंथी लेखक तो वहां के कार्यक्रमों में स्थायी हैं। बिडंबना है कि शिवपूजन बाबू के साहित्य पर उस विचार के लोग बोलेंगे जिन्होंने प्रयासपूर्वक शिवपूजन सहाय का मूल्यांकन नहीं होने दिया। उनकी समग्र रचना उनके पुत्र मंगलमूर्ति जी के सौजन्य और श्रम से प्रकाशित हो पाई। शिवपूजन सहाय परम रामभक्त थे। वो अपनी डायरी में सैकड़ों जगह राम, रामकृपा और भगवान की इच्छा जैसी बातें लिखते हैं लेकिन उनके इस लेखन के बारे में बहुत ही कम चर्चा की गई। देश के विभाजन से लेकर चीन युद्ध तक शिवपूजन सहाय ने बेहद कठोर टिप्पणियां कीं। उन्होंने नेहरू से लेकर उनके मंत्री कृष्ण मेनन तक की आलोचना की। लेकिन नेहरू की विराट छवि बनाने में लगे कांग्रेस-वामपंथी इकोसिस्टम ने इन टिप्पणियों को दबा दिया। वही अब उनकी प्रमुख कृति पर बात करेंगे। 

संभव है कि बहुत लोगों को ये लगे कि इन दो सरकारी कार्यक्रम में वामपंथियों को बुलाने से क्या ही हो जाएगा। लेकिन ये दो कार्यक्रम तो सिर्फ उदाहरण के तौर पर दिए गए हैं। ऐसे सैकड़ों कार्यक्रम होते रहते हैं जहां वामपंथी किसी न किसी से जुगाड़ भिड़ाकर घुस जाते हैं। सरकारी समितियों से लेकर पुरस्कार आदि में भी वो अपनी गोटी सेट कर लेते हैं। हाल ही में एक महत्वपूर्ण पुरस्कार की घोषणा हुई। उसमें जिन सज्जन को पुरस्कृत किया है वो रोजाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते रहते हैं। सार्वजनिक तौर पर करते रहते हैं। फिर भी उनको पुरस्कृत करने का ऐलान किया गया। ऐसा नहीं है कि पुरस्कृत करनेवालों को उनके बारे में पता नहीं था, पता था। फिर भी हुआ। इस तरह की घटनाएं नियमित अंतराल पर निरंतर हो रही हैं पर इसकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में वैचारिक लड़ाई होती है। वर्षों तक वामपंथी-कांग्रेसी इकोसिस्टम ने दक्षिणपंथ से जुड़े लेखकों और साहित्यकारों को मंच तक नहीं दिया। फिर योजनाबद्ध तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है। वर्षों तक इस झूठ के सहारे अपने विचार को श्रेष्ठ दिखाने का जतन करते रहे। कुबेरनाथ राय जैसे अप्रतिम प्रतिभा के लेखक को अकादमिक जगत से षडयंत्रपूर्वक बाहर रखा गया। सिर्फ कुबेरनाथ राय ही क्यों हाल के दिनों की बात करें तो नरेन्द्र कोहली जी का भी सम्मान नहीं कर सके। यह वामपंथी विचारधारा की योजना थी। अब भी वामपंथी लेखक जिन कार्यक्रमों में जाते हैं और वहां इसी तरह की बातें करते हैं जिससे भारत और भारतीयता की बात करनेवाले लेखकों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नीचा दिखाया जा सके। कई गोष्ठियों में इस तरह के विमर्श का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं इस कारण यह बात रख रहा हूं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र से वामपंथियों का प्रभाव कम नहीं हो पाया है। यह कार्य प्रधानमंत्री के स्तर से नहीं होना है। इस कार्य को करने के लिए शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे नेतृत्व को निर्णय लेना होगा। विश्वविद्यालयों में कुलपति के स्तर पर और सांस्कृतिक संस्थाओं में निदेशक/अध्यक्ष के स्तर पर ये कार्य होना चाहिए। फिल्मों से जुड़ी संस्थाओं को भी ध्यानपूर्वक कार्य करना होगा। फिल्मों के क्षेत्र में जिस तरह से वाम विचार के लोग विचार की रामनामी ओढ़कर सक्रिय हैं उनकी पहचान करके उनकी षडयंत्रकारी योजनाओं को नाकाम करना होगा। ये कहकर भी नहीं बचा जा सकता है कि सरकार भले ही हमारी है लेकिन सिस्टम तो उनका ही है। सिस्टम तो सरकार के हिसाब से बनती है। बनाने का प्रयास करना चाहिए। 

Saturday, July 18, 2026

संवाद नहीं कठोर निर्णय का समय


कुछ दिनों पूर्व ये समाचार प्रकाशित हुआ कि ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफार्मों पर फिल्म के प्रदर्शन से पहले प्रमाणन के लिए नियमों में संशोधन पर विचार किया जा रहा है। बताया गया कि संभवत: सरकार ओटीटी  पर दिखाई जानेवाली फिल्मों के लिए पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करने पर मंथन कर रही है। उसी समाचार में ये भी कहा गया कि सरकार इसके लिए आईटी नियम 2021 में भी संशोधन कर सकती है। इस तरह की खबरें नियमित अंतराल पर प्रकाशित होती रही हैं। जब भी किसी फिल्म या वेबसीरीज को लेकर प्रश्न खड़े होते हैं तो इस तरह की बात सामने आती ही है। पिछले सात-आठ वर्षों में ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली सामग्री पर जब-जब बवाल होता है तब इस तरह की खबरें आती हैं कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत सख्ती से कंटेंट के आकलन पर विचार कर रहा है। पूर्व में भी सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने इन ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों से कई दौर की बातचीत की थी। मनोरंजन जगत के प्रतिनिधियों को इस तरह की बैठकों में सरकार की तरफ से सख्त संदेश दिया गया था। पहले स्वनियमन की बात हुई। फिर त्रिस्तरीय व्यवस्था बनी। लेकिन ओटीटी पर चलनेवाली सामग्री में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला। कंटेंट और संवाद में अराजकता जारी है। गाहे बगाहे कुछ सीरीज और कुछ फिल्में इस तरह की आ जाती हैं जो बगैर किसी विवाद के निकल जाती हैं। लेकिन कुछ ऐसे निर्माता हैं जो अपनी फिल्मों में और वेबसीरीज में यौनिकता, नग्नता, जुगुप्साजनक दृष्य, हिंसा या गाली गलौच भरे संवाद से बाज नहीं आते हैं। वेबसीरीज निर्माताओं को लगता है कि नग्नता और हिंसा के साथ गाली गलौच की छौंक सीरीज की सफलता की गारंटी है। मनोरंजन की दुनिया में भेड़चाल है। एक सफल फार्मूला मिला नहीं कि सब उसी तरफ दौड़ पड़ते हैं और दौड़ते ही रहते हैं। 

ताजा विवाद फिल्म सतलुज को लेकर उठा है। इस फिल्म को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से पिछले चार वर्षों से सर्टिफिकेट नहीं मिला था। निर्माता और बोर्ड के बीच कुछ बिंदुओं पर सहमति नहीं बन पा रही थी। इस बीच जी 5 ने सतलुज को दिखाना आरंभ कर दिया। जबतक सरकार जागी तबतक दो दिन बीच चुके थे। जिनको देखना था वो देख चुके थे। बताया जा रहा है कि भारत में वैधानिक रूप से भले ही इस फिल्म को दिखाने पर प्रतिबंध है लेकिन पंजाब के कई शहरों में इस फिल्म का सार्वजनिक प्रसारण हो चुका है या हो रहा है। यह तो और भी गंभीर बात है। बगैर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के प्रमाणपत्र के किसी भी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952 का उल्लंघन है। इस एक्ट के मुताबिक हर फिल्म को, अगर वो सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए है, तो पहले फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणपत्र लेना होगा। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ये देखता है कि फिल्म सार्वजनिक प्रदर्शन के योग्य है या नहीं। उस फिल्म से देश की अखंडता  और संप्रभुता पर तो कोई कतरा नहीं पैदा हो सकता है। इसके अलावा भी अन्य कई बिंदु हैं जिसकी पड़ताल करके प्रमाणन बोर्ड फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की श्रेणी तय करते है। फिर प्रमाणपत्र के रूप में फिल्म के प्रदर्सन की अनुमति दी जाती है। फिल्म सतलुज का बगैर सेंसर सर्टिफिकेट के सार्वजनिक प्रदर्शन कानून सम्मत नहीं है। पंजाब पुलिस को या प्रशासन को इसके प्रदर्शन को रोकना चाहिए था। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि जी 5 ने अपने प्लेटफार्म पर इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए कैसे और क्यों अनुमति दी। क्या उनको ये पता नहीं था कि फिल्म सतलुज को लेकर निर्माता और सेंसर बोर्ड के बीच विवाद चल रहा है। अगर पता नहीं था तो आश्चर्य की बात है और अगर पता होते हुए ऐसा किया गया तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इसपर ध्यान देना चाहिए।  

ऐसा नहीं है कि इस तरह का विवाद पहली बार सामने या है। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर विवाद होते रहे हैं। भारतीय वायुसेना और कश्मीर के हालात पर पहले भी ओटीटी प्लेटफार्म पर आपत्तिजनक संवाद और दृष्य दिखाए गए थे। विरोध के बाद उसको हटाया गया था। परंतु वो फिल्में नहीं थी। उनका सार्वजनिक प्रदर्सन नहीं हुआ था। सतलुज के इंटरनेट मीडिया और मैसेजिंग एप्स पर उपलब्ध होने की बात कही जाती है उससे तो सरकार का प्रतिबंध बेमानी हो गया। देश ये भी जानना चाहता है कि सरकार ने जी 5 पर इस फिल्म के प्रदर्शन पर तो रोक लगा दी लेकिन उसके बाद क्या किया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उसके बाद क्या कदम उठाए। कानून तोड़नेवालों की पहचान करने और उनको दंडित करने के लिए क्या पंजाब सरकार ने कोई कदम उठाया। ये बहुत ही चिंता की बात है कि संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण की बात करनेवालों को भी ये प्रकरण नहीं दिखा या देखकर भी अनजान बने रहे। अब समय आ गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय बहुत गंभीरता के साथ ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाली सामग्री को लेकर ठोस निर्णय ले। कड़े कदम उठाए जाएंगे, किसी को बख्शा नहीं जाएगा आदि के आगे जाकर निर्णय लेने का वक्त है। सरकार ने मनोरंजन जगत को बहुत समय दे दिया। स्वनियमन को लेकर व्यवस्था बनाई वो चली नहीं, त्रिस्तरीय व्यवस्था भी ठीक साबित नहीं हुई। लिहाजा सरकार को अब प्रसारित होनेवाली सामग्री के पूर्व प्रमाणन की व्यवस्था करनी चाहिए। 

ओटीटी प्लेटफार्म पर जारी होनेवाले सामग्री के प्रमाणन की व्यवस्था करना बहुत आसान नहीं होगा। इसके लिए मानव संसाधन के अलावा संस्थागत ढांचा भी तैयार करना होगा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इस प्रकरण को या इस प्रकल्प को अपनी प्राथमिकता में लेना होगा। जिस तरह से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड बरसों से बगैर सदस्यों के चल रहा है उसपर भी ध्यान देकर सदस्यों की नियुक्ति करनी होगी। बगैर सदस्यों के काम तो चल सकता है लेकिन उससे कई प्रकार की दिक्कतें पैदा होती हैं। अस्थायी विशेषज्ञों के भरोसे काम चलाया जाता है पर इसमें जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है। सदस्यों के नहीं होने से बोर्ड के दफ्तरों में काम करने वाले बाबुओं का दखल बढ़ता है। वहीं से भ्रष्ट व्यवस्था के जन्म लेने की जमीन तैयार होती है। पूर्व में इ तरह के मामले आए हैं। प्रमाणन बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालयों को भी संसाधन देना होगा। क्षेत्रीय स्तर पर फिल्म प्रीव्यू करनेवाले सदस्यों की संख्या बढ़ानी होगी। ओटीटी की सामग्री को फिल्म प्रमाणन बोर्ड के दायरे में लाने से काम बढ़ेगा। अब यह करना इस कारण आवश्यक हो गया है कि ओटीटी पर चलनेवाली बेवसीरीज और फिल्मों का उपयोग मनोरंजन की आड़ में राजनीति करने में होने लगा है। राजनीतिक मैसेजिंग या किसी व्यक्ति या विचारधारा को बदनाम करने का औजार बनने लगा है। कोई भी प्लेटफार्म जब अपनी मूल प्रकृत्ति को छोड़ने लगे तो सरकार को हस्तक्षेप करके उसको संविधानसम्मत तरीके से रेगुलेट करना पड़ता है। कानून को लागू करना होता है। ओटीटी प्लेटफार्म को लेकर अब यही स्थिति बन रही है। संवाद का समय समाप्त हो गया है और समय है उचित और कठोर निर्णय का।  


Saturday, July 11, 2026

मंदिर चोरी पर ताजा सनातनी चुप


अयोध्या स्थित प्रभु श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी की जांच से अधिक तेजी से इस प्रकरण पर राजनीति हो रही। श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना निंदनीय है। दोषियों को कठोरतम सजा होनी चाहिए। इस चोरी की सजा जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा। सरकार को चाहिए कि वो विशेष जांच दल (एसआईटी) को एक निश्चित समयावधि में जांच पूरी करने का आदेश निर्गत करे। उसकी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस अपनी जांच कर कोर्ट में रिपोर्ट सौंपे। उसकी सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन करके दोषियों को सजा दी जाए। इस मामले में न्याय होना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है न्याय होते दिखना। चढ़ावा चोरी प्रकरण पर कई राजनीतिक दल के नेता स्वयं को सनातनी साबित करने पर तुले हुए हैं। कोई किसी को रामघाती बता रहा है तो कोई सुंदरकांड का पाठ करवा रहा है। किसी को प्रभु श्रीराम की आस्था पर हुई चोट की चिंता हो रही है तो कोई भक्तों की आहत भावना की चिंता कर रहा । राजनीति के रंगमंच पर हर दिन श्रीराम भक्ति के नए आयाम प्रस्तुत किए जा रहे हैं। जो दल प्रभु श्रीराम को किस्से कहानियों का चरित्र मानते थे, श्रीरामजन्भूमि पर अस्पताल और स्कूल खोलने की वकालत किया करते थे आज उनकी भी आस्था प्रभु श्रीराम में द्विगुणित हो गई है। जिस प्रकार की राजनीति चढ़ावा चोरी को लेकर हो रही है उसमें सभी राजनीतिक दल स्वयं को सच्चा सनातनी कहते हुए नहीं थक रहे हैं। यह भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय है।  

इस पूरे प्रकरण पर जिस प्रकार की राजनीति हो रही है उससे सबसे बड़ा प्रश्न ये खड़ा हो रहा है कि चढ़ावा चोरी बड़ी चोरी है या मंदिर चोरी बड़ी है। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि किस तरह से लुटेरों ने हमारे आस्था के केंद्र मंदिरों को लूटा। सिर्फ लूटकर ही नहीं छोड़ा बल्कि लूटने के बाद मंदिरों को ध्वस्त भी किया। ध्वस्त करने के बाद उस स्थान पर मस्जिदें और ईदगाह बनाई गईं। चढ़ावा चोरी के बाद जो राजनीतिक दल इस मसले पर राजनीतिक फसल काटना चाहते हैं उनमें से अधिकतर ने मंदिर चोरों की पैरोकारी की है। कभी चुप रहकर तो कभी मुखर होकर। सबसे पहले बात करते हैं गुजरात के सोमनाथ मंदिर की। ईसवी 1026 से लेकर 1706 तक कई लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर को लूटा। गजनी, खिलजी, मुजफ्फर शाह, औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को लूटा भी और मंदिर को तोड़ा भी। स्वाधीन भारत में जब सोमनाथ मंदिर के लुटोरों और ध्वंस के दाग को मिटाने का प्रयास हुआ तो कांग्रेस के उस समय के नेता जवाहरलाल नेहरू ने उसका परोक्ष विरोध किया था। जब भी इस प्रकरण की बात उठती है तो पंडित नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद के बीच के पत्र व्यवहार की याद आती है। 10 मार्च 1951 को राजन्द्र बाबू ने नेहरू को लिखा, मैं देखता हूं कि सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह के साथ संबद्ध होने का मेरा विचार आपको पसंद नहीं, क्योंकि इसमें अनेक बातें अंतर्निहित हैं। आपको लगता है कि इस समारोह में मेरे जुड़ने से हो सकता है कि कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मैं समझता हूं, आप मानेंगे कि यह रुख अपनाना उचित नहीं है, खासकर जबकि सरकार इसपर कुछ खर्च नहीं कर रही है।... अत: मैं समझता हूं कि इस निमंत्रेण को अस्वीकार करने का कोई अर्थ नहीं है। ( डा राजेन्द्र प्रसाद कारस्पोंडेंस...खंड 14, पृष्ठ 37) एक बार फिर से विचार करना चाहिए कि स्वाधीन भारत में चढ़ावा चोरी बड़ा अपराध है मंदिर चोरी। 

श्रीरामजन्मभूमि के मामले में तो पूरे देश ने देखा कि किस तरह से जब जन्मभूमि को मुक्त करवाने का आंदोलन चल रहा था तो कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों का क्या रुख था। अदालतों में प्रभु श्रीराम के बारे में किस तरह की बातें कही गईं, पूरे देश को अब भी याद है। जब श्रीरामजन्मभूमि स्थित विवादित ढांचा गिरा था उसके बाद जिस तरह की राजनीति हुई वो भी स्मृतियों में है। संसद में श्रीरामजन्मभूमि में विराजमान रामलला को अनआथराइज्ड तक कहा गया। समाजवादी पार्टी नेता रामगोपाल वर्मा ने तो यहां तक कह दिया था कि जो गुंबद पर चढ़ गए थे वो नीचे उतर नहीं सके। उनको इस बात की चिंता भी नहीं थी कि हिंदू उनकी पार्टी को वोट देंगे या नहीं। उसी समाजवादी पार्टी के नेता अब सनातनी और रामभक्त होने का दावा करते घूम रहे हैं। श्रीरामजन्मभूमि स्थित मंदिर की भी तो चोरी ही हुई थी। उसके बाद वहां मस्जिद बना दी गई थी। चढ़ावा चोरी पर हमलावर राजनीतिक दल के नेता मंदिर चोरी पर एक शब्द नहीं बोल पाते थे। डा राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू को जो लिखा उसका एक वाक्य देखा जाना चाहिए- कुछ लोगों को यह विचार पसंद नहीं आए कि जिस मंदिर को उस समय के मुसलमान आक्रमणकारियों ने अनेक बार तोड़ा, उसका पुनर्निमाण या पुनरुद्धार किया जाए। मुसलमान आक्रमणकारियों या मंदिर चोरों के प्रति नरम रुख दिखा कर वर्षों तक मुस्लिम वोट की राजनीति होती रही। काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर भी यही रुख देखने को मिलता रहा है। वहां भी यही सारे दल मंदिर चोरों के पक्ष में दिखते हैं। 

मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर भी ताजा-ताजा रामभक्त हुए दलों का रुख देखना चाहिए। इस बात का उल्लेख इतिहास की तमाम पुस्तकों और या6 वृत्तांतों में मिलेता है कि 1670 में औरंगजेब ने मथुरा के केशवदेव मंदिर का ध्वंस कर वहां शाही ईदगाह बनावाया था। क्या ये हिंदू मंदिर की चोरी नहीं थी। पूरे मंदिर की चोरी करके वहां ईदगाह बनवा दिया गया। औरंगजेब की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उस स्थान की नीलामी कर दी। नीलामी में बनारस के राजा पटनीमल ने ये जमीन खरीदी थी। कालांतर में उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने पटनीमल के वारिसों से ये जमीन खरीद ली। उनके साथ उस समय जयदयाल डालमिया और हनुमान प्रसाद पोद्दार भी थे। बाद में उस स्थान पर रामकृष्ण डालमिया ने केशवदेव का मंदिर बनवाया। मंदिर बनने से लेकर 1968 तक कांग्रेस पार्टी का क्या रुख रहा ये बताने की आवश्यकता नहीं है। आज भी अगर श्रीकृष्णजन्मभूमि स्थित कारावास में जाने पर स्पष्ट लगता है कि मंदिर चोरों ने हिंदुओं के इस पवित्र स्थल पर डाका डाला था। क्या स्वाधीनता के बाद इन मंदिर चोरों के कृत्यों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी ? नहीं हुई। क्योंकि इससे मुस्लिम वोट बैंक छिटकने का खतरा था। आज जो भी राजनीतिक दल सनातनी होने का दावा कर रहे हैं उनको मंदिर चोरों पर भी अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। उचित तो ये होगा कि सनातनी होने का दावा करनेवाली पार्टियां श्रीकृष्णजन्मभूमि के मामले में भी सनातनी रुख अपनाए और उसको मुक्त करने के अभियान में साथ आए। बयानों में सनातनी दिखने से बेहतर होगा अपने कर्मों में सनातनी दिखें। क्योंकि कर्म की प्रधानता का अपना महत्व है। 

Saturday, July 4, 2026

भारत की संप्रभुता पर हमले का मंसूबा


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 12 वर्षों के कार्यकाल में बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य किए। इन कार्यों में से दो कार्य ऐसे हैं जिसको ऐतिहासिक कार्य की कोष्ठक में रखा जा सकता है। पहला है अनुच्छेद 370 की समाप्ति। दूसरा है माओवाद का सफाया। ये दोनों कार्य इतिहास में इस तरह से दर्ज हो गए जिसको कभी भी मिटाया नहीं जा सकेगा। दोनों में गृहमंत्री अमित शाह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अनुच्छेद 370 की समाप्ति बहुत साहसिक कदम था। उसके लिए व्यापक प्रसासनिक तैयारी भी आवश्यकता थी। जो लोग कहते थे कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कश्मीर में खून की नदियां बहेंगी उन्होंने भी खामोशी के साथ इस बदलाव को स्वीकार किया। 370 के समाप्त होने के आसन्न खतरे से  निबटने के लिए तैयारियां की गई थीं। माओवादी आतंक को समाप्त करने के लिए एक जिस इच्छाशक्ति की आवश्यकता थी वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिखाई। परिणामस्वरूप गृहमंत्री को इस कार्य को करने में अपेक्षित शक्ति और भरोसा मिला। रणनीति बनाई गई। उसपर निश्चित समयावधि में कार्य हुआ। आज देश माओवादी आतंक से मुक्त है। जब माओवाद के आतंक के कारणों पर पर विचार कर रहा था तो एक्स पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण का एक अंश दिखा। उसमें वो कह रहे हैं कि अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेटस एजेंसी फार इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) 2024 के लोकसभा चुनाव के समय करीब 200 करोड़ रुपए भारत में भेजना चाहता था ताकि नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और को प्रधानमंत्री बनाया जा सके। यूएसएआईडी दुनिया के देशों को अलग अलग कारणों से आर्थिक मदद करता रहता है। ये आर्थिक मदद शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतंत्र को मजबूत करने आदि के नाम पर दी जाती है। अधिकतर मामलों में इस तरह की मदद स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से ही दी जाती है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस तरह का बयान पहले भी दे चुके हैं। उन्होंने दावा किया था कि 2024 में भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए धन भेजा गया था। प्रश्न उठ सकता है कि माओवादी आतंक की समाप्ति और ट्रंप के इस बयान में क्या संबंध है। इन दोनों बातों में गहरा संबंध है। इसको समझने के लिए समय समय पर विदेशी फंडिंग के नियमों को सख्त और पारदर्शी बनाने के लिए उठाए गए कदमों और उसपर मचे बवाल पर ध्यान देना होगा। इस वर्ष भी विदेशी फंडिंग को लेकर गृह मंत्रालय ने संशोधित नोटिफिकेशन जारी किया। अभी जारी नोटिफिकेशन के अनुसार गैर सरकारी संगठनों को जिस कार्य के लिए विदेश से पैसा मिलता है उस कार्य में ही खर्च करने की व्यवस्था के लिए नियम और सख्त किए गए। गैर सरकारी संगठनों के प्रशासनिक व्यय की सीमा भी तय की गई है। विदेश से मिले धन के उपयोग का प्रमाण देने के बाद ही फिर से मदद की मंजूरी मिलेगी। पहले होता ये था कि धन किसी अन्य कार्य के लिए आता था और उसका उपयोग किसी अन्य कार्य में होता था। लोकतंत्र को या सिविल सोसाइटी को मजबूत करने के लिए आनेवाले धन का उपयोग बहुधा सरकार के विरुद्ध आंदोलन में होता था। धर्मिक कार्यों या धर्म प्रचार के लिए मिलनेवाली राशि का उपयोग मतांतरण में किया जाता था। इस वर्ष के संशोधन में ये स्पष्ट किया गया है कि धार्मिक कार्यों के लिए विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का उपयोग किसी भी हाल में मतातंरण के लिए नहीं किया जा सकेगा। संविधान का अनुच्छेद 25 देश के नागरिकों को रिलीजस स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। अपने रिलीजन का अनुकरण करने और उसके प्रचार करने की भी अनुमति है। इसकी आड़ में ही मतांतरण के कार्य को अंजाम दिया जाता रहा है। इसमें विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का भरपूर उपयोग होता रहा है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में किए गए संशोधन के अनुसार अब धार्मिक प्रचार के लिए मिलनेवाले विदेशी धन से मतांतरण की अनुमति नहीं है। ऐसा पाए जानेपर लाइसेंस रद करने का अधिकार सरकार के पास होगा। 

विदेश से मिलनेवाली आर्थिक मदद गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) शिक्षा के प्रसार के नाम पर भी लेते रहे हैं। इस तरह की बात सामने आती रही है कि अमुक एनजीओ ने शिक्षा के प्रसार के लिए विदेश से आर्थिक सहायता ली लेकिन उसका उपयोग विचारधारा विशेष के प्रचार प्रसार में किया गया। विशेषकर इस तरह के मामले छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे आदिवासी बहुल इलाकों से आते रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए मिलनेवाले धन के दुरुपयोग की खबरें आती रही हैं। इस तरह के समाचार भी आते रहे हैं कि विदेश से मिलनेवाले धन का उपयोग पहले नक्सलियों और बाद में माओवादियों को मदद के लिए किया जाता रहा। इस तरह की गतिविधियां भारत की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने रहे। इस कारण से जब विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में संशोधन हुआ तब केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने का प्रयास किया गया। जब भी एनजीओ को मिलनेवाले विदेशी धन को लेकर आर्थिक अनुशासन की बात गृह मंत्रालय से की जाती है तब भी विरोध के स्वर मुखर हो जाते हैं। इसका एकमात्र कारण है कि कई एनजीओ जिस कार्य के लिए धन लेते हैं उस कार्य के अलावा अन्य काम में पैसे खर्च किए जाते हैं। माओवादियों को विदेशी मदद का एक बड़ा स्त्रोत ये भी था। अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय ने इस स्त्रोत को खत्म किया जिससे माओवादियों को मिलनेवाली आर्थिक सहायता न्यून हो गई। 

देश में सत्ता परिवर्तन का मंसूबा पाले बैठे विदेशी ताकतों को भी इससे कमजोर किया गया। ये बात सिर्फ ट्रंप ही नहीं कह रहे हैं। 12 सितंबर 2011 को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने कुछ दस्तावेज डिक्सालीफाई किए। उन दस्तावेजों से ये राज खुला कि किस तरह से भारत की स्वतंत्रता के बाद से सोवियत संघ ने कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (सीपीआई) की पूर्ण स्वामित्व वाले प्रकाशन  गृह पीपल्स पब्लिशिंग हाउस को 65 प्रतिशत तक आर्थिक अनुदान देता था। इतना ही नहीं सीपीआई के प्रकाशनों को 1984 में करीब साठ हजार डालर तक का विज्ञापन दिया जाता था। सीपीआई और उसके अनुषांगिक संगठनों के लोगों को आर्थिक मदद और सोवियत संघ की यात्रा के लिए टिकट आदि दिए जाते थे। उसमें इस बात का भी उल्लेख है कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान करीब 40 प्रतिशत संसद सदस्यों को सोवियत रूस से पैसे मिलते थे। इसकी प्रामाणिकता ना तो कभी सिद्ध हो सकती है ना ही सच सामने आता है। लेकिन खुफिया क्लासीफाई दस्तावेजों के सामने आने से संकेत तो मिलते ही हैं। प्रश्न यही है कि जब नरेन्द्र मोदी की सरकार को बदलने के लिए आर्थिक मदद की बात अंतराष्ट्रीय मंचों पर होती है तो उसपर देश में विचार तो होना ही चाहिए। क्योंकि ये धनबल के आधार पर देश की संप्रभुता पर आक्रमण जैसा मामला है। केंद्र सरकार के संज्ञान में ये बातें हैं। वो देश की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध है, ये संतोष की बात है। बात तो उन एनजीओ और उन नेताओं पर भी होनी चाहिए जो विदेश में जाकर ऐसी ताकतों से मिलते हैं जो धनबल से देश की संप्रभुता को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।         

Wednesday, July 1, 2026

प्रेम और अपराध कथा का कालटेल


गुरदत्त का नाम आते ही प्रेम और विरह, दर्द और संवेदना, दया और करुणा, मासूमियत और बेबसी जैसे शब्दों को परदे पर उतारनेवाले दृश्य याद आने लगते हैं। याद आती है उनकी फिल्में साहब बीबी और गुलाम, प्यासा और कागज के फूल। प्रतीत होता है कि कम ही लोग इस बारे में जानते होंगे कि गुरुदत्त ने सिर्फ दर्द और संवेदना वाली फिल्में ही नहीं बनाई बल्कि उनकी आरंभिक फिल्में अपराध कथाओं पर आधारित थी। जब वो फिल्मों में काम करने आए थे तो उन्होंने अपराध कथाओं पर फिल्म बनानेवाले ज्ञान मुखर्जी के साथ काम किया था। फिल्म की बारीकियां उनसे ही सीखी। देवानंद की फिल्म कंपनी नवकेतन के लिए गुरुदत्त को फिल्म निर्देशित करने का अवसर मिला। फिल्म थी बाजी, जो जुलाई 1951 में प्रदर्शित हुई थी। गुरुदत्त 39 वर्ष की आयु में दुनिया से चले गए । कम उम्र में ही उन्होंने कई कल्ट फिल्में बनाईं जिनका विश्लेषण अब भी होता रहता है। इन कल्ट मानी जानेवाली फिल्मों के अलावा गुरुदत्त ने चार अपराध कथाओं पर आधारित फिल्में बनाई -बाजी, जाल, बाज और सैलाब। ये वही दौर था जब देश में अपराध कथाओं को लेकर एक खास किस्म की उत्सकुकता का वातावरण था। अपराध कथाओं पर आधारित उपन्यास खूब बिक रहे थे। उधर हालीवुड में फिल्म नोयर मूवमेंट आरंभ हो चुका था। इस तरह की फिल्मों का नायक नायक कुटिल भी होता था, उसका संदेहास्पद होता था लेकिन जो दिखता था वो उससे अलग होता था। इन फिल्मों में ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम का उपयोग बहुतायत में होता था। फ्लैशबैक और वायस ओवर के साथ नैरेशन इस तरह की फिल्मों में एक अलग ही तरह का प्रभाव पैदा करती थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के वैश्विक परिदृश्य में इस तरह की फिल्में बननी शुरु हुई थी। हिंदी फिल्मों की दुनिया पर भी इसका असर दिखा। गुरुदत्त की इस फिल्म बाजी को भी नोयर मूवमेंट का हिस्सा माना गया। 1951 में प्रदर्शित फिल्म बाजी के नायक देवानंद और नायिका गीता बाली और कल्पना कार्तिक थी। फिल्म में अधिकतर गीत गीता दत्त ने गाए थे। इस फिल्म का संगीत एस डी बर्मन ने दिया था। संगीत में गजब किस्म का आकर्षण है। गीता दत्त की आवाज में गाया गीत ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ या ‘ये कौन आया कि मेरे दिल की दुनिया में बहार आई’ की धुन अब भी लोगों के स्मरण में है।

फिल्म की कहानी बहुत अलग नहीं थी। फिल्म का नायक मदन (देव आनंद) एक संपन्न परिवार से आता है लेकिन परिस्थियों के कारण जीवन यापन कठिन हो जाता है। वो छोटी बहन मंजू (रूपा वर्मन) के साथ रहता है। रोजगार की तलाश में भटकते भटकते जुआ खेलने लगता है। एक दिन एक होटल में उसकी भेंट डांसर लीना (गीता बाली) से होती है। लोग लीना की अदाओं के दीवाने हैं। मदन को अपने होटल में देख लीना उसको अपने बास के लिए काम करने का आफर देती है। मदन के अंदर बची खुची नैतिकता उसको ऐसा करने से रोक देती है। वो लीना के प्रस्ताव को ठुकरा कर घर लौट आता है। अपनी बहन के इलाज के लिए वो डा रजनी (कल्पना कार्तिक) से मिलता है और दोनों में नजदीकियां बढ़ जाती हैं। डा रजनी के पिता को ये मंजूर नहीं था। बदलते घटनाक्रम में रजनी का एक इंसपेक्टर से विवाह हो जाता है। बहन के इलाज के लिए पैसों की जरूरत मदन को लीना के पास ले जाता है। लीना से मिलकर वो उसके बास के लिए काम करने की हामी भर देता है। दोनों एक दूसरे से अपना सुख-दुख बतियाते हैं। कथा का प्रवाह तेज होता है और एक दिन की लीना की हत्या हो जाती है। जिस रिवाल्वर से उसकी हत्या होती है उसपर मदन की अंगुलियों के निशान पाए जाते हैं। मुकदमा चलता है और मदन को फांसी की सजा होती है। इंसपेक्टर को इस हत्याकड पर शक था। वो जाल बिछाता है जिसमें लीना हत्याकांड का असली दोषी फंस जाता है। कहानी बेहद कसावट के साथ घटनाओं में पिरोई गई है। दो छोटी प्रेम कथाओं के समांतर एक अपराध कथा चलती है जो दर्शकों को बांधे रखती है। गुरुदत्त प्रेम और अपराध का ऐसा काकटेल बनाते हैं जिसके सम्मोहन में दर्शक बंधे रहते हैं। गुरदत्त शताब्दी वर्ष में एक बार फिर से गुरुदत्त की उन फिल्मों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो विश्लेषकों और फिल्म इतिहासकारों की दृष्टि ससे झल हैं। 75 वर्ष पहले बनी फिल्म बाजी उनमें से एक है।