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Thursday, February 18, 2010

निराशा की किरण

भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है , भारत विकास कर रहा है, आनेवाले कुछ वर्षों में भारत विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगी, विश्व मंच पर भारत की बात गंभीरता से सुनी जाने लगी है, आदि-आदि जाने कितनी बातें पढ़ते सुनते जानते यह लगता है कि देश सचमुच तरक्की कर रहा है, हम मजबूत हो रहे हैं । सरकार भी इस बात का एहसास कराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती कि देश की जनता खुशहाल हो रही है और सरकार आम आदमी का ध्यान रख रही है । लेकिन देश के प्रधानमंत्री के आवास और कार्यालय से तकरीबन बीस किलोमीटर की दूरी पर औसतन हर दो दिन पर मानसिक रूप से बीमार रोगी बेहतर इलाज और रहन सहन के आभाव में दम तोड़ रहे हैं । राजधानी दिल्ली में मानसिक रूप से बीमार लोगों की आश्रय स्थली आशा किरण में लगातार हो रही मौत से विकास और खुशहाली के सारे दावों की पोल खुल रही है । दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार चाहे लाख दावे करे लेकिन राजधानी में लगभग दो महीने में 26 मंदबुद्धि और मानसिक रूप से कमजोर और बीमार लोगों की मौत ने उनकी सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए है । दिल्ली सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय की यह जिम्मेदारी है कि वो ये सुनिश्चित करे कि मानसिक रूप से बीमार लोगों को पर्याप्त सुविधाएं मिले । लेकिन आशा किरण होम में क्षमता से दुगने मरीज ठूंस दिए गए हैं, और भ्रष्टाचार की वजह से उनके रहन सहन और बीमारी के इलाज की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है । हर मौत के बाद जब सवाल खड़े होते हैं तो जांच की बात कर सरकार अपना पल्ला झाड़ लेती है । देश की राजधानी दिल्ली में मानसिक रूप से बीमार लोगों की यह हालत है तो देश के अन्य इलाकों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में इन रोगियों की हालत क्या होगी आप अंदाजा लगा सकते हैं ।
दरअसल ऐसा करके शीला दीक्षित की सरकार संविधान का भी अनादर कर रही है । देश के संविधान की प्रस्तावना भारतवासियों को समानता का अधिकार प्रदान करती है । संविधान साफ तौर पर यह कहता है कि धर्म, जाति, जन्म स्थान, लिंग के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जा सकता है । राइट टू लिव विद डिगनिटी भी भारतवासी का अधिकार है । और सरकार को इन अधिकारों को सुरक्षित करना है । प्रतिष्ठापूर्वक जीवन के अधिकार की गारंटी सिर्फ भारतीय संविधान ही नहीं बल्कि कई अंतराष्ट्रीय संधियां भी देती है । अस्सी के दशक में मानसिक रूप से बीमार लोगों के अधिकारों को लेकर अंतराष्ट्रीय स्तर पर जोरदार मुहिम चली थी । नतीजा यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्र संघ की साधारण सभा ने मानसिक रूप से बीमार लोगों को सम्मानपूर्व जीने के अधिकारो को लेकर एक घोषणा पत्र को मंजूरी दी । इस घोषणा-पत्र की धारा पच्चीस के मुताबिक हर व्यक्ति को बेरोजगारी, बीमारी, विकलांगता, बुढापा या फिर कोई ऐसी वजह जिसपर उसका नियंत्रण ना हो, की हालात में जीने के अधिकार की सुरक्षा दी जाएगी । और संयुक्त राष्ट्र के सदस्य होने के नाते हमारे देश पर भी इसे लागू करने की जिम्मेदारी है । लेकिन दिल्ली सरकार देश के संविधान के साथ-साथ अंतराष्ट्रीय मानकों की भी धज्जियां उड़ा रही है ।
मानसिक रोग एक ऐसी ही परिस्थिति है जिसमें बीमार व्यक्ति को यह नहीं पता होता है कि वो क्या और क्यों कर रहा है । उसे एक ऐसे वातावरण की जरूरत होती है जहां वो अपने आपको सहज और सुरक्षित महसूस कर सके । इसी तरह के वातावरण के निर्माण के लिए बनाए गए आशा किरण में इन रोगियों को सिर्फ निराशा की किरण ही नजर आती है । मानसिक रूप से बीमार लोगों को लेकर सरकार बेहद सवंदनहीन रहती है और वोट बैंक की राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियों को भी इन मंदबुद्धि लोगों की पीड़ा का एहसास तक नहीं होता है । हमारा समाज भी इनके प्रति बहुधा उदासीन ही रहता है और मंदबुद्धि और मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को परिवार पर बोझ समझा जाता है । उन्हें पागल मानकर मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती करवाकर परिवार के लोग जैसे छुटकारा पाना चाहते हैं जबकि उन्हें यह नहीं मालूम कि अगर मानसिक रूप से बीमार मरीज अपने घर में रहेगा तो उसमें सुधार जल्द आने की संभावना बढ़ जाती है । यहां हम याद दिलाते चलें कि रामनाथपुरम के पास दिमागी तौर पर बीमार लोगों के एक हॉस्टल में लगी आग में 25 मरीज जिंदा जल कर मर गए थे, क्योंकि उनकी मानसिक स्थिति के मद्देनजर रात में उन्हें बिस्तर से बांध दिया जाता था । इसलिए जब आग लगी तो लोहे की जंजीर में जकड़े ये मरीज बिस्तर पर ही खाक हो गए ।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार इस तरह के बीमार लोगों के प्रति संवेदनशीव रवैया अपनाए और उन्हें हर तरह की सुरक्षा की गारंटी देने का इंतजाम करे । अगर ऐसा नहीं होता है तो विकास और सामाजिक बदलाव की बात बेमानी और हवाई ही रहेगी ।
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1 comment:

परमजीत बाली said...

बहुत सामयिक पोस्ट लिखी है...मानसिक रोगीयों के लिए सरकार सच मे ही बहुत संवेदनहीन है..बस कुछ निजि व समाज सेवा की भावना से कुछ ही संस्थाएं एस काम मे लगी हैं...