Translate

Saturday, June 15, 2013

आलोचना से अपेक्षा क्यो ?

आज हिंदी के वर्तमान परिदृश्य में हिंदी आलोचना की जमकल लान मलामत की जा रही है । आलोचना पर सतही और अपनी राह से भटकने के आरोप भी जड़े जा रहे हैं । आलोचना पर एक संगीन इल्जाम यह लगता है कि वो पुस्तक समीक्षा से आगे नहीं बढ पा रही है । विद्वान लेखक उसके घटते गांभीर्य को लेकर रुद-क्रन्दन कर रहे हैं । लेकिन आलोचना पर यह आरोप नए नहीं हैं ये दशकों से लग रहे हैं । एक फैशन की तरह से कविता पर संकट, कहानी पर संकट या फिर रचनाशीलता पर संकट को लेकर साहित्य जगत में कोलाहल होता रहा है उसी तरह आलोचना को लेकर भी छाती कूटी जाती है । कुछ लेखक अति उत्साह में उसकी शवयात्रा निकाल चुके हैं । हो सकता है कि आलोचना में थोड़ा ठहराव आ गया हो लेकिन अंधकार जैसे हालात नहीं है । रचनाकारों को तो इस बात की छूट मिलती है कि वो अपनी संवेदना और बोध का निरंतर परिष्कार करते चलें लेकिन आमतौर पर आलोचकों से यह अपेक्षा की जाती है कि उन्होंने एक बार जो निष्कर्ष प्रस्तुत कर दिया है उससे हटना उनके लिए मुमकिन नहीं है और अगर वो हटते हैं तो उसे आलोचक का भटकाव या उसका विचलन मान लिया जाता है । रामविलास शर्मा जैसे आलोचक इसके लिए अवसरवाद शब्द का प्रयोग करते हैं । जबकि होना यह चाहिए कि रचनाकारों की तरह आलोचकों को भी अपने निष्कर्षों में संशोधन का हक मिलना चाहिए ।
हिंदी आलोचना में वामपंथी विचारधारा के व्यापक प्रभाव और वर्चस्व की वजह से उसके औजार पुराने पड़ गए हैं । एक खास विचारधारा के आधार पर खेमेबंदी ने आलोचना का सबसे ज्यादा नुकसान किया है । दरअसल मार्क्सवादियों के साथ दिक्कत यह है कि वो कोई नया औजार विकसित नहीं करना चाहते हैं । मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब पैट्रियाट और पार्टीशन में एक लेख लिखा है द पास्ट एंड फ्यूचर ऑफ इंडियन लेफ्ट । इस लेख में एक जगह पर गुहा लिखते हैं कि मार्कसवादी छपे हुए को अंतिम सत्य मानते हैं । उन्होंने इस मसले पर मार्कसवादियों की तुलना कट्टरपंथी इस्लाम और क्रिश्चियनिटी को मानने वालों से की है । गुहा लिखते हैं कि मार्क्सवादियों का भरोसा छपे हुए शब्दों में इतना ज्यादा है कि वो अपने हर कृत्य को, तर्कों को मार्क्स, लेनिन और एंगेल्स के इस या उस पैराग्राफ को कोट करते हुए जस्टिफाई करते हैं । दरअसल यह उनकी कमजोरी है । किसी भी चीच में आस्था रखना अच्छी बात है लेकिन अंधभक्ति तर्क और विज्ञान दोनों के लिए सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं । वैज्ञानिक विश्लेषण का मतलब ही है कि हर चीच को सवालों के घेरे में खड़ा किया जाए और फिर उसको तर्कों की कसौटी पर कसा जाए लेकिन मार्क्सवाद इसकी इजाजत नहीं देता उसके लिए तो मार्क्स के कहे गए वचन अंतिम सत्य हैं । एक यमय तो मार्क्सवादी आलोचना राजनीतिक पार्टियों के सिद्धांत को आगे बढ़ाने में लगी थी । उस समय मार्कसवाद का रोमांटिसिज्म अपने चरम पर था लेकिन बाद में जब साम्यवादी व्यवस्था ध्वस्त हुई तो यह रोमांटिसिज्म भी हवा हो गया । उसका एक और बेहतर नतीजा यह निकला कि आलोचना ने आयातित विचारधारा की भाषा से खुद को मुक्त किया और सिद्धांत के बोझ से मुक्त होकर रचनात्मकता की भाषा को अपनाया । जिसकी वजह से आलोचना पठनीय हुई । एक जमाना था जब निराला जी कहा करते थे कि यदि उनकी कविताएं शुक्ल जी सुन रहे हैं तो जैसे समूचा हिंदी जगत सुन रहा है । लेकिन क्या अब ऐसी स्थिति है । क्या कोई लेखक यह कह सकता है । कदापि नहीं । लेकिन यहां यह भी याद रखना आवश्यक है कि जब हिंदी के सबसे बड़े आलोचक रामचंद्र शुक्ल सक्रिय थे तो वह वक्त था- प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत जैसे मूर्धन्य लेखकों का । सवाल यह उठता है कि कि क्या वर्तमान परिदृश्य में लेखकों का वह स्तर रह गया है । फिर आलोचना से स्तरीयता की अपेक्षा करना कुछ ज्यादा डिमांडिग होना नहीं है ।
युवतम पीढ़ी के आलोचकों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वह अब भी मार्क्सवाद के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाई है । आज भी आलोचना में कहानी नई जमीन तोड़ती है, खुरदरे यथार्थ को उभारती है आदि आदि । नतीजा यह हो रहा है कि हिंदी कहानी ने इतनी नई जमीन तोड़ दी है कि अबतक कोई जमीन बचनी नहीं चाहिए थी । दूसरी बड़ी दिक्कत समकालीन विश्व साहित्य से अपरिचय है। विश्व की अलग अलग भाषाओं में क्या लिखा जा रहा है उससे अनभिज्ञता भी आज की आलोचना के विकास को रोक रही है । वर्तमान हिंदी आलोचना के परिदृश्य में बहुत कम ऐसे आलोचक हैं जो अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में चलनेवाली बहसों से परिचित हैं । हिंदी के नए आलोचकों ने अपने आपको एक चौहद्दी में घेर लिया है और उनको लगता है कि उस चौहद्दी में रहते हुए वो सुरक्षित हैं । कहना ना होगा कि यह मार्क्सवाद की चौहद्दी है ।
कुछ महीनों पहले हिंदी की वरिष्ठ आलोचक डॉक्टर निर्मला जैन ने एक दैनिक में लेख लिखा था जिसका लब्बोलुआब यह था कि हिंदी लेखकों में धैर्य की कमी हो गई है और वो अपनी रचनाओं का विरोध सहन नहीं कर पाते हैं । रचना की आलोचना का असर व्यक्तिगत संबंधों पर पड़ता है । निर्मला जी ने एक कड़वी सचाई की तरफ इशारा किया था । जिस दिन से कोई लेखक आलोचना विधा का चुनाव करता है उसको यह सोच लेना चाहिए है कि सच कहने पर हमले होंगे । इन खतरों को झेलने का माद्दा रखनेवालों को ही आलोचना में हाथ आजमाना चाहिए क्यों बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कहना लेखकीय बेईमानी है ।
आज की आलोचना ने विश्वविद्लायों की चाहरदीवारी से खुद को मुक्त किया है । रचना के साथ आलोचना का एक बेहतर संबंध बनता दिख रहा है लेकिन इसको सामने आने में लंबा वक्त लगेगा । कुछ लोग आलोचना पर पुस्तक समीक्षा होने का आरोप जड़ रहे हैं । लेकिन समीक्षा आलोचना से अलग नहीं है । समीक्षा एक फूल है तो आलोचना पूरा गुलदस्ता । हिंदी में समीक्षा के स्तर को लेकर भी खूब हल्ला गुल्ला मच रहा है । कई आलोचकों को लगता है कि अखबारी समीक्षा से इस विधा की इज्जत कम हो रही है । उनका मानना है कि अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में छपनेवाली समीक्षा बेहद हल्के तरीके से लिखी जाती है । लेकिन इस तर्क पर समीक्षा को खारिज करनेवाले यह भूल जाते हैं कि समीक्षा से आलोचना का एक पाठक वर्ग संस्कारित होता है । वो यह भी भूल जाते हैं कि आधुनिक हिंदी आलोचना का जन्म पुस्तक समीक्षा से ही हुआ है । दूसरे समीक्षा का काम है कि नई छपी पुस्तकों के बारे में पाठकों के मन में जिज्ञासा पैदा करना । समीक्षा पर यह आरोप भी लगता है कि वो कई बार मित्रों और अपनी विचारधारा के लेखकों को आगे बढ़ाने के लिए लिखे जाते हैं । हो सकता है कि इस आरोप में सचाई हो लेकिन अगर समग्रता में यह आरोप लगाया जाता है तो वो आरोप का सामान्यीकरण है । पुस्तक समीक्षा एक गंभीर रचनाकर्म है और आज छपनेवाली कई साहित्यक पत्रिकाओं- हंस, तद्भव, कथादेश, पहल आदि में बेहतरीन समीक्षाएं देखने को मिल जाया करती हैं । दरअसल अगर हम समग्रता में पूरे साहित्यक परिदृश्य पर विचार करें तो कविता, कहानी, उपन्यास सभी में स्तरहीनता का अनुपात वही है तो समीक्षा और आलोचना में है । इसलिए सिर्फ समीक्षा या फिर आलोचना को कठघरे में खड़ा करना बेमानी है । हम सिर्फ समीक्षा या आलोचना से यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हर अक्षर सर्वश्रेष्ठ हो । हां इतना अवश्य है कि समकालीन परिदृश्य में रचनाकारों की रुचि आलोचना कर्म में नहीं रही । मुक्तिबोध ने अंधेरे में नाम की लंबी कविता लिखी तो कामायनी एक पुनर्विचार भी लिखा । इसके अलावा कुंवर नारायण, निर्मल वर्मा, राजेन्द्र यादव, विष्णु खरे, अरुण कमल आदि ने भी आलोचना के क्षेत्र में गंभीर काम किया । आज इस बात की कमी जरूर खलती है कि रचनाकार आलोचना से विमुख हो गए हैं । हो सकता है कि इससे आलोचना का कुछ नुकसान हो रहा हो । लेकिन आलोचना और समीक्षा को लेकर जितना स्यापा किया जा रहा है वो चर्चा पाने का एक तरीका बनता जा रहा है ।

1 comment:

SP Sudhesh said...

यह लेख बड़ा सन्तुलित और पठनीय है । इसे श्री अनन्त विजय ने लिखा है तो नामवर सिंह का चित्र किस लिए लगाया गया है ?