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Sunday, July 5, 2015

किसानों के नेता कहां गए ?

भूमि बिल पर बीजेपी और कांग्रेस दोनों किसानों के हितैषी होने का दावा कर रहे हैं । एक का दावा है कि आजादी के बाद से जमीन अधिग्रहण को लेकर किसानों के साथ अन्यास हो रहा था लिहाजा उन्होंने भूमि अधिग्रहण कानून बनाया । दूसरे दल का दावा है कि यूपीए सरकार ने जो भूमि अधिग्रहण कानून बनाया उसमें कई खामियां हैं लिहाजा जब बीजेपी की सरकार बनी तो उसने अध्यादेश की जरिए कानून की खामियों को दूर करने की कोशिश की । किसानों के हितैषी होने के दावे और प्रतिदावे के बीच जो एक बात गौण है वो यह है कि किसानों की आवाज कौन है । भूमि बिल पर मचे घमासान के बीच यह बात साफ तौर पर उभर कर सामने आई है कि इस वक्त देश में कोई देशव्यापी अपील वाला किसान नेता नहीं है । आजादी के बाद से इस देश में हर वक्त पर कोई ना कोई या कई किसान नेता ऐसे रहे हैं जिनकी एक आवाज पर देशभर के किसान खड़े हो जाते थे । कई किसान नेताओं ने तो भूमि सुधार के लिए बहुत काम किया और किसानों का दिल जीता ।  भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है और अब भी है लिहाजा यहां किसानों के नेता होते रहे हैं । यहां तक कि स्वतंत्रता आंदोलन में भी गांधी ने चंपारण के नील किसानों के हक की लड़ाई लड़ी थी । उसके बाद स्वामी सहजानंद ने किसानों को एकजुट करने का काम किया था । स्वामी सहजानंद सरस्वती ने अपनी आत्मकथा में लिखा है जिसका हक छीना जाए या छिन गया हो उसे तैयार करके उसका हक उसे वापस दिलाना यही तो मेरे विचार से आजादी की लड़ाई और असली समाजसेवा का रहस्य है । आजादी के बाद भी कई किसान नेता हुए जिनकी एक आवाज पर देश का किसान एकजुट हो जाता था । बाद में इस देशव्यापी नेतृत्व में क्षरण हुआ और प्रदेशों के किसान नेता होने लगे । जैसे उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह, हरियाणा में चौधरी देवीलाल आदि । कालांतर में इसमें भी कमी आती गई और आखिरी किसान नेता के तौर पर महेन्द्र सिंह टिकैत को याद किया जा सकता है । शरद जोशी को भी किसान नेता के तौर पर माना जाता है । पर सवाल यही उठता है कि एक कृषि प्रधान देश में किसान नेता की कमी क्यों कर हो गई । किसानों की इतनी बड़ी आबादी और वोट बैंक होने के बावजूद देश में किसान नेता का नहीं होना समाजशास्त्रीय विश्लेषण की मांग करता है ।
देश में किसान नेताओं की कमी की कई वजहें हो सकती हैं । लेकिन हमें इसकी जड़ में जाना होगा । अखिल भारतीय किसान सभा का पहला अधिवेशन स्वामी सहजानंद की अध्यक्षता में ग्यारह अप्रैल उन्नीस सौ छत्तीस में लखनऊ में हुआ था । उस वक्त उसके महासचिव एनजी रंगा थे । यह क्रम उन्नीस सौ चवालीस तक चलता रहा । अध्यक्ष और महासचिव बदलते रहे । उसके बाद नवें अधिवेशन तक आते आते हमारे देश के कम्युनिस्टों की महात्वाकांक्षा अलग तरीके से हिलोरें लेने लगीं और कम्युनिस्ट नेतृत्व और सहजानंद में मतभेद हो गया। सोशलिस्ट और फॉर्वर्ड ब्लॉक के सदस्यों ने किसान सभा छोड़नी शुरू कर दी । यहां से ही देश में किसान आंदोलन में बिखराव के सूत्र देखे जा सकते हैं । लेकिन किसानों को नेतृत्व मिलता रहा चाहे वो गुजरात में इंदुलाल याज्ञनिक हों या आँध्रप्रदेश के सी राजेश्वर राव हों । आजादी के बाद यह चला रहा । बिनोवा भावे ने भी अपने भूदान आंदोलन की बदैलत काफी हद तक किसानों का भरोसा जीता था पर उनकी कोई राजनीति नहीं थी । सत्तर और अस्सी के दशक में हमारे देश में कई किसान आंदोलन हुए और उन दिनों किसानों के साथ खड़े होने या किसानों के हितैषी होने के लिए नेताओं के बीच होड़ लगी रहती थी । उन्हीं दिनों चौधरी चरण सिंह और देवीलाल किसान राजनीति के क्षितिज पर चमके । ये वो वक्त था इन नेताओं की बात राष्ट्रीय फलक पर सुनी जाती थी । लेकिन हमारे देश में राजनीति की धुरी बहुधा जाति, धर्म, संपद्राय, क्षेत्रीय अस्मिता रही है । बाद में इन चारों के गठजोड़ अलग अलग तरीके से मजबूत होते चले गए । जाति और क्षेत्रवाद ने राजनीति को एक ऐसी दिशा दी जिसमें राष्ट्रीय नेता कमजोर होने लगे या जो भी राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्थापित हो रहे थे उन्होंने भी क्षेत्रवाद और जातिवाद का दामन थाम लिया ।
दरअसल अगर हम नब्बे के दशक के बाद बाद के राजनीतिक स्थितियों का विश्लेषण करते हैं तो किसान नेता के नेपथ्य में जाने की स्थितियां साफ हो जाती हैं । भारतीय राजनीति के लिहाज से नब्बे के दशक की शुरुआत काफी अहम रही है । उस समय भारतीय समाज में एक साथ कई बदलाव हो रहे थे । राम मंदिर आंदोलन की वजह से समाज में जबरदस्त ध्रुवीकरण हो रहा था । उसी वक्त हमारा देश पिछड़ों की राजनीति का गवाह बना । वी पी सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कर अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण लागू कर दिया । नतीजा यह हुआ कि समाज में एक बार फिर से अगड़ों और पिछड़ों के नाम पर ध्रुवीकरण हो गया । मंडल और कमंडल की राजनीति ने समाज को गहरे तक प्रभावित किया । उसका नतीजा यह हुआ कि भारतीय राजनीति में नए तरह के नेतृत्व का उदय हो गया । यह वही वक्त था जब लालू नीतीश जैसे नेता भारतीय राजनीति के क्षितिज पर धूमकेतु की तरह उभरे । किसानों के नेता जाति के नेता के तौर पर पहचाने और मजबूती पाने लग गए । चरण सिंह और देवीलाल किसानों की बजाए जाटों के नेता हो गए, लालू और मुलायम यादवों के नेता हो गए, रामविलास पासवान दलित नेता हो गए तो नीतीश कुमार पिछड़ों के नेता के तौर पर स्थापित होने लगे । सामाजिक ध्रुवीकरण के बीच समुदाय और जाति प्रमुख होने लगे । यही वह दौर था जब भारत में अर्थव्यवस्था के बंद दरवाजे खुलने लगे थे । बाजार के खुलने का असर किसानों पर भी दिखाई देने लगा था । अन्न के न्यूनतम समर्थन मूल्य में जोरदार वृद्धि देखने को मिली । 1991 से लेकर 2004-05 तक की अवधि में धान और चावल के समर्थन मूल्य में क्रमश: 173 और 193 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई । अर्थव्यवस्था के खुलने का अनाज के समर्थन मूल्य पर ये असर बाद के वर्षों में भी जारी रहा । 2006-07 में चावल के समर्थन मूल्य में पचहत्तर फीसदी तो 2008-09 में चौवन फीसदी बढ़ोतरी हुई । अनाज के समर्थन मूल्य में वृद्धि होने से किसानों को लगा कि सरकारें उनके हित में काम कर रही हैं, लिहाजा किसान नेता अप्रासंगिक होते चले गए । इसके अलावा जो एक और कारक रहा वो ये कि ज्यादातर किसान नेताओं ने चुनावी राजनीति से परहेज किया लिहाजा उनका जनता से सीधा जुड़ाव उस तरह से नहीं हो पाया कि वो लंबी पारी खेल सकें । लेकिन भूमि बिल पर मचे घमासान के बीच इस बात की जरूरत महसूस की जा रही है कि देश के किसानों ती आवाज कोई संगठन या नेता उठा सके । इस वक्त तो स्थिति यह है कि मैदान खाली है और किसानों ने नेता होने का दावा हर दल के नेता ठोंक रहे हैं । ये स्थिति कृषि प्रधान देश के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती है ।  

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