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Wednesday, January 31, 2018

'काली करतूतों के अलावा सब ईमानदारी से लिखा'


सुरेन्द्र मोहन पाठक हिंदी में सबसे ज्यादा पढे जाने वाले लेखकों में से एक हैं। अब तक उनकी 298 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और भारत में अपराध कथाओं के बेताज बादशाह माने जाते हैं। आगामी फरवरी के पहले सप्ताह में उनकी आत्मकथा ना बैरी ना कोई बेगानाप्रकाशित होने जा रही है। अपनी आत्मकथा के प्रकाशन के पूर्व उन्होंने मुझसे खास बातचीत की।

प्रश्न- अपराध कथाएं या जासूसी उपन्यास लिखते लिखते आत्मकथा लिखने का ख्याल कैसे आया?

उत्तर- ख्याल मुझे नहीं आया, मेरी एडिटर मीनाक्षी ठाकुर को आया। उसने ना सिर्फ मुझे बायो लिखने को कहा- कहा, पूछा नहीं कि मैं लिख सकता हूं या नहीं और प्रस्ताव को प्रकाशकीय मजबूती देने के लिए एडवांस में कांट्रैक्ट भी भेज दिया। तब मुझे गंभीरता से अपने अंतर को टटोलना पड़ा कि क्या मैं बायो लिख सकता था, क्या मेरी गुजरी जिंदगी में ऐसा गैरमामूली कुछ घटित हुआ था कि उसे बायो में समेटा जा सकता ! मुझे ऐसा कुछ दिखाई ना दिया। जो दिखाई दिया वो इतना था कि 50-60 पृष्ठों में चुक जाता। असमर्थता दिखाने की जगह मैंने फैसला किया कि लिखना शुरू करता हूं, कुछ बन पड़ा तो ठीक वर्ना हाथ खड़े कर दूंगा। जब कलम चली तो मेरे सामने 1200 प्रिटेंड पेजे का व्यापक मैटर था। मेरा ईश्वर ही जानता है कि कौन सा शैतान मुझपर सवार हुआ जो कि मैं एक गैरवाकिफ सब्जेक्ट पर एकमुश्त इतना लिख पाया। 

प्रश्न- आपने अपनी आत्मकथा का नाम ना बैरी ना कोई बेगाना रखा है, इसके पीछे की सोच क्या है?

उत्तर- ना बैरी ना कोई बेगाना नाम गुरू गोविंद सिंह के एक वाक पर आधारित है। जो कहता है न कोई बैरी नहीं बिगाना, सगल संग हम को बनि आयी। मैंने अपनी गुजरी जिंदगी को रिव्यू किया तो उसमें मुझे ना कोई दुश्मन दिखाई दिया, न कोई गैर लगा, इस सबमें कोई खामी पायी तो खुद में पायी। लिहाजा मैंने वाक के एक हिस्से को टाइटल के लायक बनाने के लिए और संक्षिप्त किया और बायो के पहले खंड का नाम ना बैरी ना कोई बेगाना रखा । ये मेरे पाठकों की जानकारी में आते ही फौरन क्लिक कर गया और ये नाम फाइनल हुआ। वर्ना संपादक का पसंदीदा नाम पाठकनामा था।

प्रश्न- चंद दिनों में आपकी आत्मकथा प्रकाशित होनेवाली है। आपने अपनी आत्मकथा में सैमुअल गोल्डविन को कोट किया है जो कहते हैं कि आत्मकथा मरने के बाद प्रकाशित होनी चाहिए। लेकिन आपने तो लिख डाला?

उत्तर- सैमुअल गोल्डविन की उक्ति आई डोंट थिंक एनीवन शुड राइट देयर आटोबॉयोग्राफी अनटिल आफ्टर दे आर डेड व्यंग्यात्मक है। इसका अर्थ ये है कि जीते जी बायो लिखना बेतहाशा दुश्मन बनाने का आसान तरीका है। प्रशस्तिगान से तो बायो नहीं बनती, बनती है तो पठनीय नहीं बनती। बायो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लेखक का दखल बनाती है, अब अगर वो अभिव्यक्ति का वक्त आने पर अपने हाथ मर्यादाओं से, लोकलाज से बंधा पाता है तो कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? अगर आप आप किसी को भड़काने, आंदोलित करने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कोई मायने ही नहीं रहते । कोई माई का लाल किसी को राजी नहीं कर सकता, विवादास्पद कुछ लिखा जाएगा तो निंदक तो बनेंगे ही। शाद इसलिए सैम गोल्डविन का इशारा है कि आत्मकथा को मरणोपरांत छपना ही बेहतर होता है। तब कोई कहनेवाले की जुबान नहीं पकड़ सकता है, जबकि जीवन काल में लिखी गई आत्मकथा का तीव्र विरोध होना, कोर्ट कचहरी तक होना आम बात है।

प्रश्न- आपने अपनी पत्नी की वॉर्निंग और पुत्री की चेतावनी के बाद आत्मकथा लिखने का जोखिम उठाया । कैसे मनाया उन दोनों को ?

उत्तर- पत्नी और पुत्री की वार्निंग अकादमिक थी, जिसका मंतव्य मुझे उस अंजाम से खबरदार करना था जो करीबी रिश्तेदारों, दोस्तों के बारे में कुछ खराब लिखने से मेरा हो सकता था। बायो में मैंने गढ़ी हुई कोई बात नहीं लिखी, वही लिखा जो मेरे साथ घटित हुआ। विवादास्पद बातों के मेरे पास दस्तावेजी सबूत है। इसलिए मुझे यकीन है कि किसी का ये कहने का मुंह नहीं बनेगा कि मैंने गलत लिखा या बढ़ा चढ़ा कर लिखा। अगर ऐसी कोई बात लिखना गलता है, तो उसे कहना गलत क्यों नहीं है। कहकर डैमेज कर चुकने के बाद उसके कलमबद्ध बयान पर सेंसर लगाना मैं नहीं समझता कि ठीक है। ये तो यों होगा कि जबरा मारे पर रोने ना दे।   

प्रश्न- आपकी पत्नी और बेटी ने आत्मकथा के कुछ अंशों को सेंसर किया या नहीं?

उत्तर- कुछ सेंसर नहीं किया, सब ठीक-ठाक पाया। अलबत्ता अगले भाग में ऐसी नौबत आ सकती है क्योंकि उसमें परिपक्व जीवन के किस्से हैं और तब के हैं जब मेरे सामाजिक सरोकरों में बहुत विविधता आ चुकी थी। तब शायद कुछ बातों पर ऐतराज हो लेकिन वो ऐतराज मुझे कुबूल नहीं होगा। इसलिए क्योंकि जो मैंने लिखा है, ईमानदारी से लिखा है, उसमें फैवरिकेटेड कोई बात नहीं है।

प्रश्न- आपने अपने बचपन को जीवन का बेहतरीन हिस्सा कहा है, कोई खास वजह जबकि उस दौर में आपने विभाजन का दंश झेला?

उत्तर- बचपन इग्नोरेंस का दौर होता है। बच्चा उन बातों को नहीं समझता जो वयस्कों के लिए गंभीर होती हैं। इसलिए अंजाम से बेखबर होता है। विभाजन का दौर मैंने देखा लेकिन उसकी विभीषिका को समझने की मेरी उम्र नहीं थी। बचपन मां-बाप की छत्रछाया का सुख पाने का वक्त होता है– कुछ बुरा होता है तो मां बाप झेलते हैं, अच्छा होता है तो बच्चा उसका सुख पाता है। इन बातों में फर्क करना कभी बच्चे का सरोकार नहीं बन पाता है। बच्चे के लिए ये बड़ी घटना है कि उसका खिलौना टूट गया, न कि ये कि देश का विभाजन हो गया। इसलिए मैंने बचपन को जिन्दगी का बेहतरीन हिस्सा करार दिया है।  

प्रश्न- अपने जवानी के बारे में लिखते हुए आप कहते हैं कि जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है। ये व्यवस्था के प्रति गुस्सा है या आजादी से मोहभंग का दर्द ?

उत्तर- सकल संसार इस बात से सहमत है कि जुल्म सहने से जालिम की मदद होती है। बुराई की जीत इसलिए भी होती है क्योंकि सच्चाई ने विरोध के लिए सामने आना जरूरी न समझा। बुरा उम्मीदवार इसलिए चुनाव जीत जाता है क्योंकि अच्छे वोटर वोट देने नहीं जाते। जुल्म सारी दुनिया में होता है, ऐसा न होता तो अमेरिका में माफिया की समांतर सरकार न चल रही होती। फर्क ये है कि बाहर इन ताकतों का अनुपात बहुत कम है जबकि हमारे यहां ये ज्यादा है । कोई माई का लाल, वो दुनिया के किसी हिस्से में हो, बुराई का समूल नाश नहीं कर सकता, लेकिन विरोध तो कर सकता है। मुझे क्या, मेरे साथ तो ना हुआ वाली प्रवृत्ति को को तिलांजलि दे सकता है। आपको जुल्म से ऐतराज ना होना इस बात का सबूत है कि आप जुल्म का शिकार होने के लिए बैठे हैं।

प्रश्न- लगभग चार सौ पन्नों की अपनी आत्मकथा में आपने कितना बताया और कितना छुपाया?

उत्तर- कुछ नहीं छुपाया। सबकुछ बहुत ईमानदारी से कलमबद्ध किया, फिर भी उन बातों को नजरअंदाज किया जो मेरी बहुत ही काली करतूतों से संबंधित थीं और जो मेरे करीबियों की निगाह में मुझे शैतान ठहरा सकती थी। मैं उम्मीद करता हूं कि अभी चंद और साल मुझे जीना है और बाकी का जीवन अपने पर कालिख पोत कर जियूं ये तो ठीक न होगा। लिहाजा मैं ने अपनी जिंदगी की बहुत सी अन्दरुनी , छवि को धव्स्त करनेवाली बातों से परहेज किया। कहते हैं कि आज तक दो ही बायो ईमानदारी से लिखी गई, एक महात्मा गांधी की और दूसरी रूसो की। मेरे जैसा निहायत मामूली इंसान बायो लिखने के सिलसिले में कैसे इन महान विभूतियों जैसा हैसला अपने आप में पैदा कर सकता है ? ऐसी बातें लिखने का हौसला क्योंकर मैं दिखा सकता हूं कि बीबी नफरत करने लगे, औलाद हिकारत से देखने लगे।

प्रश्न- आपका उपन्यास हीराफेरी दैनिक जागरण बेस्टसेलर में नंबर वन पर रहा है। दैनिक जागरण बेस्टसेलर को लेकर आपकी क्या राय है

उत्तर- ये अच्छी शुरुआत दैनिक जागरण ने की है जो लेखन के क्षेत्र में हिन्दी लेखकों की औकात बनाने में ही कारगर नहीं होगी, हिन्दी की भी औकात बनाने में कारगर होगी जो कि वर्तमान में संदिग्ध है। इस मुबारक कदम के दूरगामी नतीजे आने में अभी वक्त लगेगा। इसका उदाहरण मैं खुद हूं। मैंने इतना कामयाब उपन्यास लिखा जिसे अमेजन ने भी 2017 में बेस्टसेलर करा दिया लेकिन फिर भी हीराफेरी का प्रकाशक अब मेरा प्रकाशक नहीं है। उसे अपने ही छापे उपन्यास की कामयाबी से कुछ लेना देना नहीं है। लेखक उसके लिए पहले भी नोबॉडी था और अब भी नोबॉडी है। ये हिन्दी लेखक का ही नहीं बल्कि हिंदी का भी अपमान है। बाहरी मुल्कों में कोई रचना बेस्टसेलर घोषित होती है तो उसका प्रकाशक तुरंत उसका नया संस्करण प्रकाशित करता है जिस पर इस बात पर जोर देती टैगलाइन होती है और दूसरे वो ग्रंथ कई भाषाओं में अनुवाद के अनुबंधित हो जाती है। यहां ऐसा कुछ नहीं होता, न निकट भविष् में होनेवाला है। शायद आगे चलकर कुछ हो। 

3 comments:

Kaushal Lal said...

साफगोई भरी बातें

vandana gupta said...

सच्ची बातें

विकास नैनवाल said...

पाठक साहब अपनी इसी बेबाकी के लिए मशहूर हैं। मैंने इनका लिखा २०१३ के बाद पढ़ना शुरू किया और पाया कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अपराध कथा अगर कोई लिख सकता है तो वो फ़िलहाल वो पाठक साहब हैं। इस साक्षात्कार में भी उनकी साफगोई साफ़ झलकती है। उनकी आत्मकथा का बेसब्री से इंतजार है।