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Saturday, February 10, 2018

जलेस के जलसे पर सवाल


एक लेखक संगठन है। जनवादी लेखक संघ। दिल्ली में उसका केंद्रीय कार्यालय है। भारतीय जनता पार्टी और जनवादी लेखक संघ का दफ्तर दिल्ली की एक ही सड़क पर स्थित है। यह लेखक संगठन हिंदी और उर्दू के लेखकों का संगठन है। अभी इसका राष्ट्रीय सम्मेलन झारखंड के धनबाद में हुआ। सम्मेलन का उद्घाटन अंग्रेजी के पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने किया। हिंदी के लेखक असगर वजाहत को इसका अध्यक्ष चुना गया। चुनाव के वक्त अधिवेशन में असगर वजाहत अनुपस्थित थे। वजह उऩका कहीं अन्यत्र व्यस्त होना बताया गया। महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप महासचिव संजीव कुमार बने रहे। इस वर्ष जनवरी में यह सब संपन्न हो गया। उपर से देखने पर ये बातें सामान्य लगती हैं लेकिन कुछ पूर्व जनवादियों को सिद्धार्थ वरदराजन से जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ करवाना खल गया। उनके मुताबिक यह जनवादी लेखक संघ के सांगठनिक कौशल की कमजोरी है जो किसी बड़े हिंदी या उर्दू के लेखक से सम्मेलन के उद्घाटन को ना करवा कर अंग्रेजी के पत्रकार से करवाता है । दूसरी बात जिसको लेकर साहित्यिक हलके में चर्चा रही वो ये कि जनवादी लेखक संघ के शीर्ष पदाधिकारी अब पूर्वी दिल्ली इलाके के निवासी हो गए। यह महज एक संयोग हो सकता है लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जनवादी लेखक संघ को हिन्दुस्तान के अन्य शहरों से कोई अध्यक्ष, महासचिव या उप महासचिव क्यों नहीं मिलता है। जनवादी लेखक संघ में कुछ चुनिंदा लोगों का वर्चस्व कायम क्यों हैं। इससे बेहतर तो प्रगतिशील लेखक संघ है जो हर साल देश के अलग अलग हिस्से के लेखकों को शीर्ष पदों की नुमाइंदगी के लिए चुनते हैं। जनवादी लेखक संघ तो दिल्ली से पूर्वी दिल्ली में आ डटा है। खैर थोड़ी बहुत चर्चा के बाद बात आई गई हो गई।
इस बीच जनवादी लेखक संघ से पूर्व में जुड़े कोलकाता के लेखक अरुण माहेश्वरी ने धनबाद में आयोजित जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन को लेकर एक लंबी पोस्ट फेसबुक पर डाल दी। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि साहित्य के मसले अब फेसबुक पर स्थान पाने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि सभी तरह के साहित्यिक मसले फेसबुक पर हल हो जाएंगे। जनवादी लेखक संघ के धनबाद सम्मेलमन के संपन्न होने के बाद अरुण माहेश्वरी ने अपनी पोस्ट में लिखा- यद्यपि संजीव कुमार ने सम्मेलन के सांगठनिक सत्र और सचिव की रिपोर्ट के सूत्रीकरण पर विवादों का एक लाईन में संकेत दिया है, लेकिन कुछ इस प्रकार मानो वह सब किसी गोपनीय संगठन की गोपनीय बातें हो, जिनका खुले में उल्लेख करना पाप है! उनसे उस सम्मेलन में अनुपस्थित लेखकों का कोई सरोकार नहीं हो सकता है ! कहना न होगा, संजीव कुमार ने खुद ही अपनी रिपोर्ट से जलेस के इस राष्ट्रीय सम्मेलन को अजीब प्रकार से रहस्यमय बना दिया है । आज जब हर लेखक और संस्कृतिकर्मी अपनी सांसों पर मोदी-आरएसएस के फासीवाद के जहरीले सामाजिक दबाव को महसूस कर रहा है, उस समय लेखकों के एक राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट में उसका कहीं कोई उल्लेख तक न होना और भी रहस्यमय है? सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में चल रही गुटबाज़ी आज जगजाहिर है और दुनिया इस बात को भी जानती है कि सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में अभी ऐसे तत्वों ने अपना बहुमत बना रखा है जो मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और उनके खिलाफ व्यापकतम मोर्चा तैयार करने के विचारों के विरोधी हैं । हमारा अनुमान है कि इन तत्वों ने ही अपने जनवादी केंद्रीयतावादके पवित्र अस्त्र के प्रयोग से जनवादी लेखक संघ की तरह के एक जन-संगठन की स्वायत्तता को पूरी तरह से रौंद डाला हैं ।
इस सम्मेलन में हिंदी के एक प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत को जलेस का अध्यक्ष बनाया गया है । हम नहीं जानते कि क्या वे भी मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और इनके खिलाफ सभी धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक ताक़तों के व्यापकतम मोर्चे के विरोधी हैं ? बहरहाल, हमारी दृष्टि में लगता है यह सम्मेलन जलेस नामक एक ऐतिहासिक संगठन को मौत के मुँह में धकेल देने वाला सम्मेलन हुआ है, क्योंकि जनवाद की रक्षा के जिस बुनियादी उद्देश्य पर इस संगठन की नींव पड़ी थी, अब क्रमश: क्षय की एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया के बीच से होते हुए अंत में उसी उद्देश्य को ठुकरा कर इसकी प्राण-सत्ता का ही अंत कर दिया गया है । प्रलेस का एक दुखांत हमने बिहार के ही गया में आंतरिक आपातकाल के दिनों में देखा था, अब उसी पिंडदानको प्रहसन के तौर पर हम झारखंड के शहर में दोहराते हुए देख रहे हैं।
अरुण माहेश्वरी की इस पोस्ट का जनवादी लेखक संघ के उप महासचिव संजीव कुमार ने बेहद आक्रामक तरीके से उत्तर दिया और एक नया शब्द चूर्ख गढ़ते हिए अरुण माहेश्वरी पर पलटवार किया- सबसे झूठा आरोप चूरख ने यह लगाया कि जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट (उसका आशय सम्मेलन में पेश केंद्र की रिपोर्ट से ही होगा) में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का कहीं जिक्र नहीं है. जिसकी भाषा की समझ का हाल आप देख चुके हैं, उसका ऐसा मानना कतई आश्चर्यजनक नहीं.
साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार पूरी रिपोर्ट की केन्द्रीय चिंता है और अगर आप शब्द की मौजूदगी ढूंढने पर बजिद हों तो उसके भी दसियों उदाहरण रिपोर्ट में हैं. पहले खंड का शीर्षक ही है : साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के अच्छे दिन’ ”. इस खंड में 1.1 से लेकर 1.8 तक, आठ बिंदु हैं जिनमें साम्प्रदायिक फ़ासीवाद की विभिन्न अभिव्यक्तियों पर विचार किया गया है।संजीव कुमार जी के इस उत्तर पर पक्ष और विपक्ष में बातें शुरू हो गई । कई लोगों ने चूरख शब्द पर आपत्ति जताई और हिंदी के प्रतिष्ठित कवि बोधिसत्व ने तो उनसे इस शब्द को वापस लेने की मांग की। बोधिसत्व ने तो यहां तक लिखा कि सांगठनिक बहसों में किसी तरह से किसी गाली की आवश्यकता क्यों? आप उत्तर दें लिहाड़ी नहीं लें..विरोध और आलोचना को सहज लें....संगठन संगठन ही है हस्तिनापुर का सिंहासन तो नहीं कि उस पर और उसके नियंताओं पर सवाल न उठाया जा सके?’
बवाल बढ़ा तो संजीव जी ने एक और पोस्ट लिखी जिसमें उन्होंने अपनी पिछली पोस्ट पर शर्मिदंगी का जिक्र किया। लेकिन वो पोस्ट खेद की शक्ल में व्यंग्य था। संजीव कुमार और अरुण माहेश्वरी में सीधे सीधे भी विवाद हुआ। ट्रोल से लेकर भक्त आदि जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए गए। इस पूरे विवाद में साहित्यिक मर्यादा तार-तार हुई। अब सवाल यह उठता है कि अरुण माहेश्वरी को अचानक से जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों से क्यों दिक्कत होने लगी। कुछ सालों पहले तक जब वो जनवादी लेखक संघ में पदाधिकारी थे तो क्या उस वक्त संगठन में इस तरह की बातें नहीं होती थी। हिंदी साहित्य जगत और वामपंथी लेखक संगठनों के क्रियाकलापों पर नजर रखनेवाले लोगों का कहना है कि जब प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने जनवादी लेखक संघ छोड़ा था तब अरुण माहेश्वरी ने कोई स्टैंड क्यों नहीं लिया था।
रही बात जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों को लेकर तो वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अपेक्षा करना व्यर्थ है। जिस कथित फासीवाद की चर्चा दोनों महानुभावों ने अपनी अपनी पोस्ट में किया है वह बहुत विद्रूप रूप में जनवादी लेखक संघ में उपस्थित है और वर्षों से वहां राज कर रहा है। नीचे के स्तर पर नए पदाधिकारियों का बदलाव चुनाव के जरिए होता रहा है लेकिन शीर्ष स्तर पर बहुत बदलाव नहीं होता है। पहले चंचल चौहान लंबे समय तक जनवादी लेखक संघ को चलाते रहे, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के साथ, अब मुरली बाबू ओर संजीव कुमार चला रहे हैं। इस संघटन की उपयोगिता और सार्थकता पर तो तब बात हो जब इसमें लोकतंत्र दिखाई दे। यहां कुछ भी कहना बेमानी सा लगता है क्योंकि होता वही है तो शीर्ष पर बैठे दो लोग चाहते हैं। दूसरी बात जो यह कही जाती है वो यह कि इस लेखक संगठन का पदाधिकारी वही बन सकता है जो सीपीएम का सदस्य हो। इस वजह से भी शीर्ष के पदाधिकारियों मे ज्यादा बदलाव देखने को नहीं मिलता है। जो लेखक जमे हैं वो अपनी जगह पर बने रहते हैं। पहले भी मैं यह कह चुका हूं ये लेखक संगठन अपनी राजनीतिक पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करते हैं। जब आप किसी राजनीतिक दल के पिछलग्गू बन जाते हैं या फिर उस पार्टी के बौद्धिक प्रकोष्ठ बन जाते हैं तो आपको स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार नहीं रह जाता है और आपको हर महत्वपूर्ण फैसले के लिए अपनी पार्टी के आलाकमान का मुंह जोहना पड़ता है। जब लेखक अपने राजनीतिक अकाओं की तरफ देखकर फैसले लेते हैं तो उनकी पहली प्राथमिकता पार्टी का हित हो जाता है और लेखक नेपथ्य में चला जाता है। यह बात पूरे देश ने इमरजेंसी के समय देखा जब प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी का समर्थन किया था। क्या लेखक संगछनों की अब कोई उपयोगिता बची है। विचार करें।  


1 comment:

जितेन्द्र 'जीतू' said...

सही लिखा लेकिन अभी और लिखना था। अंत में जल्दी समाप्त करना अखरता है।