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Saturday, April 18, 2026

मुस्लिम घुसपैठ और हिंदी साहित्य


हाल में असम विधानसभा का चुनाव संपन्न हुआ है। बंगाल में विधानसभा चुनाव का प्रचार जारी है। इसके पहले बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ था। इन तीन विधानसभा चुनावों के दौरान घुसपैठिए शब्द पर बहुत राजनीति हुई। बंगाल में तो मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा के बाद से ही राजनीतिक दलों के बीच बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को लेकर बयानबाजी आरंभ हो गई थी। बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान और उसको राज्य से बाहर करने को भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी मुद्दा बना लिया है। ममता बनर्जी भी अपने भाषणों में घुसपैठियों को लेकर केंद्र की सरकार को ललकारती नजर आती हैं। असम में विशेष पुनरीक्षण के पहले और उसके बाद भी बांग्लादेशी घुसपैठिए चुनावी मुद्दा बना था। इस तरह के समाचार बंगाल और असम से आते ही रहे हैं। समाचारों को पढ़ने के बाद मन में विचार आया कि देखा जाए घुसपैठिए की समस्या को हिंदी साहित्य ने किस तरह से अपनी रचनाओं में दर्ज किया है। दिमाग में सबसे पहला नाम कुबेरनाथ राय का आया । कुबेरनाथ राय ने असम में शिक्षण कार्य करते हुए देश-दुनिया के विषयों पर लिखा। कुबेरनाथ राय ने 1960-70 के दशक में नक्सवादियों और उनके समर्थकों पर प्रहार किया। भारतीय पौराणिक प्रतीकों को अपने लेखों में उपयोग किया कि जो पाठकों को आनंद देते हैं। उनके निबंध संग्रहों को पलटने लगा। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कुबेरनाथ राय का एक निबंध संग्रह है गंधमादन। इस संग्रह में एक निबंध है ‘कजरीबन में जीवहंस’। इसकी पहली पंक्ति से प्रतीत होता है कि 1969 में लिखा गया था। वो लिखते हैं, उन्नीस सौ सत्तर का युवा वसंत अभी कुछ दूर है, पर उसकी नक्सलपंथी लौह मृदंग की टंकार सुनकर यह वर्ष उनहत्तर का जर्जर-पाण्डुर बूढ़ा हेमंत और ठंडा पड़ गया है।

बात बंगलादेशी घुसपैठियों की हो रही थी। कुबेरनाथ राय ने अपने इस निबंध में उसका बहुत ही तार्किक वर्णन किया है। ये भी बताया है कि किस तरह से बंगलादेसी मुसलमान असम में घुसते हैं और फिर यहां खेती-किसानी के नाम पर अपना स्थायी अड्डा बना लेते हैं। ‘कजरीबन में जीवहंस’ में राय लिखते हैं- असम में कई लाख अनुप्रवेशकारी आ गए हैं, उसमें ज्यादा तादाद इन्हीं यायावर मुसलमान कृषकों की है। ये फर्जी नाम से या किसी स्थानीय मुसलमान के नाम से जमीन का बंदोबस्त सरकारी दफ्तरों से करा लेते हैं और कभी कभी यों ही दखल करके पाट, सनई, धान, कलाई, आलू और सरसों की फसल उगा लेते हैं। नयी मिट्टी के कारण फसल भी बड़ी जानदार होती है। इधर असम मंत्रिमंडल और सुरक्षा विभाग कुछ कड़ा पड़ा है तो धीरे-धीरे यहीं के बाशिंदे हो रहे हैं और कभी इस राजनीतिक दल से तो कभी उस दल की मदद से मतदाता सूची में आ जाते हैं।‘ अब अगर हम कुबेरनाथ राय की 1969 में लिखी इन बातों को ध्यान से देखें तो ये स्पष्ट होता है कि राजनीतिक दलों की मदद से बंगलादेशी मुसलमान भारत की मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवाने में कामयाब होते रहे हैं। कुबेरनाथ राय सिर्फ मतदाता सूची में नाम दर्ज करवाने तक ही नहीं रुकते हैं उसको राजनीतिक सिद्धांतों की कसौटी पर भी कसते हैं। वो आगे लिखते हैं कि भारतीय कम्युनिस्टों की भावना है कि कम्युनिज्म का प्रधान शत्रु है हिंदुवाद, अतएव भावी लड़ाई में मुसलमान बड़े काम की चीज साबित होगा। उधर कांग्रेस के केंद्रीय कर्णधारों की धारणा है कि कम्युनिज्म के खिलाफ मोर्चा तभी जीता जा सकता है जब मुसलमान हाथ में रहें- हिंदू तो वामपंथी होता जा रहा है। पर साधारण मुसलमान किसी प्रतिबद्धता का कायल नहीं। वह अपनी लाभ हानि ही देखता है और संप्रदाय की लाभ-हानि भी कुछ देखता है-इससे आगे और कुछ नहीं। चाहे जो हो ये यायावर मुसलमान बड़े परिश्रमी होते हैं। विशेषत: इनकी औरतें बहुत खटती हैं। एक-एक मुसलमान तीन-चार शादियां रखता है, मौज से तंबाकू पीता है, पान खाता है, केश सजाता है और उसमें जो नयी रहती है उसके साथ सोता है- शेष को प्राचीनकाल के गुलामों की तरह खटना और खाना है।...फातिमा की दीदी का पति भी ऐसे भी यायावर परिवार से आया है जो अब इस नदी के किनारे दस-बारह साल से बस गए हैं। घर-द्वार बनाकर स्थायी बाशिंदे हो हो गए हैं। 

कुबेरनाथ राय शब्दों के चयन में बेहद सजग लेखक के तौर पर जाने जाते हैं। उनकी उक्त टिप्पणी से स्पष्ट है कि किस तरह से बंगलादेशी मुसलमान असम में आते थे और राजनीतिक दलों की मदद से मतदाता सूची में स्थान बनाते थे। राजनीतिक दल बंगलादेशी मुसलमानों को अपनी विचारधारा को मजबूत करने के लिए उपयोग में लाते रहे हैं। यहां वो यह भी स्पष्ट करते हैं कि मुसलमान किसी प्रतिबद्धता का कायल नहीं है बल्कि वो अपने व्यक्ति लाभ को प्राथमिकता देता है। कुबेरनाथ राय का ये निबंध भले ही साहित्यिक हो लेकिन इसमें जिस तरह से उन्होंने बंगलादेशी मुसलमानों की असम में घुसपैठ, उनकी जीवनशैली और फिर यहां के स्थायी निवासी बनने के तरीकों को उजागर किया है वो बेहद सटीक प्रतीत होता है। वामपंथियों की राजनीति पर कुबेरनाथ राय 1969 में प्रहार कर रहे होते हैं जबकि उस समय नक्सलियों को लेकर एक रोमांटिसिज्म अकादमिक और बौद्धिक जगत में रेखांकित किया जा सकता है। यह अकारण नहीं है कि वामपंथी इकोसिस्टम ने बहुत कायदे से कुबेरनाथ राय जैसे भारतीय परंपरा और पौराणिक ग्रंथों से प्रतीकों को उठाकर समकालीन स्थितियों पर लिखनेवाले लेखक को किनारे लगाने का कुत्सित खेल खेला। खैर... ये इस लेख का विषय नहीं है। उक्त लेख में कुबेरनाथ राय की एक और पंक्ति है जो ध्यान खींचती है। वो लिखते हैं, मैमनसिंह बंगलादेश का एक जिला है। ये मैमनसिंहिया मुसलमान कहीं भी अच्छी मिट्टी वाली जमीन पाकर खेती करने लगते हैं। कानूनी या गैर-कानूनी दखल द्वारा लावारिस जमीन पर खरपतवार की एक बस्ती आनन फानन में तैयार कर डालते हैं। अपने इस लेख में आगे वो समझाते हैं कि किस तरह से असम की नदियां अपना पथ परिवर्तन करती हैं तो जो जमीन डूब से बाहर निकलता है उसपर मैमनसिंहिया मुसलमान किस तरह से कब्जा करते हैं। साहित्य में घुसपैठ का ये समाजशास्त्रीय विश्लेषण है। 

आज मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण हो रहा है। घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने पर गृहमंत्री अमित शाह अडिग नजर आते हैं। असम में भी विधानसभा चुनाव में ये मुद्दा बना था तो इसके पीछे राजनीति नहीं बल्कि देश की मतदाता सूची को शुद्ध करने का उपक्रम ही नजर आता है। कहा जाता है कि साहित्य अपने समय को भी दर्ज करता हुआ चलता है। कभी यथार्थ के चित्रण के तौर पर तो कभी गल्प का छौंक लगाकर। कुबेरनाथ राय ने तो अपने निबंध कजरीबन में जीवहंस में यात्रा, प्रकृत्ति और समाज के बहाने मुसलमानों के भारत में घुसपैठ के तरीकों और राजनीतिक दलों की मतदाता सूची को दूषित करने की युक्ति को उजागर करते हैं। देश मुस्लिम घुसपैठ की समस्या को लंबे समय से झेल रहा है और अब समय आ गया है कि उसपर सख्त एक्शन हो। भारत की जनता संविधानसम्मत तरीके से अपने नीतिनिर्धारकों का चुनाव करे।     


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