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Tuesday, February 20, 2018

'कथ्य पर विमर्श को नहीं थोपती'


   मनीषा कुलश्रेष्ठ हिंदी की ऐसी लेखिका हैं जिन्होंने लगातार अपने लेखन की चौहद्दी का अतिक्रमण किया है। हाल ही में उन्होंने बिरजू महाराज पर अपनी किताब पूरी की है। इसके पहले मानसिक रोग को केंद्र में रखकर उन्हों उपन्यास लिखा था जो खासा चर्चित हुआ था।  उऩसे हिंदी साहित्य के परिदृश्य और उनके लेखन पर मैंने उनसे बात की । 


1.   कहानी से शुरु करके उपन्यास और अब एक कलाकार पर पूरी किताब, लेखक क तौर पर कैसे विषयों के वैविध्य को संभाल पाती हैं
 उत्तर : मैं बहुविध विषयों से जुड़ी रही हूँ। विज्ञान की स्नातक होकर, हिंदी में एम. . फिर एम. फिल. किया, कथक में विशारद साथ चलता रहा। मनोविज्ञान मेरी रुचि का विषय रहा सो इसमें स्वअध्ययन मैं करती आई हूं। मुझे लगता है, ज्ञान का एक पात्र होता है जिसे एकत्र हो छलकना होता है, अभिव्यक्ति के माध्यम से पहले कहानी लिख पाना श्रमसाध्य काम लगता था, फिर कहानी का फलक छोटा लगने लगा तो उपन्यास लिखे। फिर लगा कुछ अलग भी लिखा जाए, तब बिरजू महाराज के समूचे नृत्य को तकनीकी ढंग से विश्लेषित करती किताब लिखी, जो शीघ्र प्रकाशित होगी। अब मैं मेघदूतकॉरीडोर परिकल्पना पर यात्राएं कर रही हूं रामगिरी से मानसरोवर तक की, साथ - साथ यात्रावृत्तांत लिख रही हूँ। जब जुनून हो तो बहुत कुछ मुनासिब हो ही जाता है।
2.   हिंदी कहानी पर अगर बात करें तो इस वक्त विषयगत नवीनता का अभाव दिखता है, आपको क्या वजह लगती है 
उत्तर : मैं पुरानी हिंदी कहानी की बात करूं तो ऐसा नहीं था। वह समय था जब राजनैतिक, आंचलिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक, नागरिक जीवन की कहानियां लिखी जाती थीं। विज्ञान कथाओं का भी द्वार खुला था। कहानी में शिल्पगत विविधताएं भी थीं। आज का परिदृश्य देख मुझे यही लगता है कि नए लेखक पढ़ते कम हैं, वे साहित्येतर कुछ नहीं पढ़ते। यही वजह है कि वे किसी पुरातन विषय पर लिखकर सोचते हैं, पहले किसी ने नहीं लिखा। शिल्प का बासीपन भी हिंदी कहानी को बोझिल बना रहा है। उस पर जीवनानुभव के बिना बहुत कुछ डैस्क पर बैठ कर लिखे जाने पर ऐसा होता है। इस कमी के चलते हम नई प्रवृत्तियों वाला अपना कथा-समय नहीं गढ़ पा रहे। वरना पुराने कहानीकारों को देखें वे निरंतर यात्राएं करते थे, आपसी संवाद उन्हें प्रेरित करता था कि वे स्वयं को प्रतिष्ठित करने से पहले अपना रचना - समय तो प्रतिष्ठित करें, जिस की पीठिका पर उनके समय की कथा प्रवृत्तियाँ उभर कर आएं।
3.   हिंदी कहानी में डिटेलिंग का भी अभाव नजर आत है वो क्यों।
उत्तर- सतही डीटेलिंग तो बहुत है आज की हिंदी कहानी में, मगर एक सतत बहुपरतीय बारीकी का अभाव है। इस मामले में मुझे छोटी क्रिस्प उर्दू कहानियां ज़्यादा पसंद हैं। डीटेलिंग हो तो गुलेरी जी की ‘ उसने कहा था’, राजेंद्र यादव की ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’, कमलेश्वर की ‘राजा निरबंसिया’, मन्नू जी की ‘यही सच है’ या मृदुला गर्ग की ताज़ा कहानी ‘जूते का जोड़ – गोभी का मोड़’ जैसी हो।
4.   इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में लंबी कहानियों का दौर चला लेकिन अब लंबी कहानियां कम लिखी जा रही हैं , आपको इसकी क्या वजह लगती है।
उत्तर : मैं यह नहीं मानती कि हमारे समकालीन यह चुनौती नहीं ले सकते, मैंने भी लंबी कहानियां लिखी हैं, कई समकालीनों ने भी। मनोज रूपड़ा लिखते आए हैं। हां, संपादकों का दबाव रहता है पत्रिका के पन्नों को लेकर।

5.   आपने अपने उपन्यास शिगाफ में कश्मीर को विषय बनाया, जब आपने लिखना शुरू किया था तो आपके दिमाग में क्या था या कैसे ये विषय सूझा।
उत्तर : मैं अवंतिपुर रही हूं। वह मेरे दांपत्य जीवन की शुरुआत हुई थी और आतंक के दौर की भी। तब मैं लेखक नहीं थी, मगर कश्मीर घूमने का उत्साह था। उसी दौर में एक बसस्टॉप पर वरिष्ठ वायुसेना अधिकारी को बस का इंतजार करते हुए गोली मार दी गई थी और तब से वह स्टेशन हमारे लिए एक बंद किला बन कर रह गया था मैं कश्मीर में होकर भी कश्मीर को देखने का ख्वाब लिए लौट आई थी। कश्मीर का मुद्दा मेरे लिए समझ आने वाला गुंजल था। बरस बीते, लिखना शुरू हुआ। पहलगाम में वर्ष 2005 जून में साहित्य अकादमी की एक अनुवाद कार्यशाला हुई जिसमें मैं भी आमंत्रित थी। आतंक का ब्रेक टाईम था, टूरिस्ट बसों पर यदाकदा बम फेंके जाते थे। कभी कभी श्रीनगर का लाल - चौक दहल जाता था। अमरनाथ यात्रा चल रही थी, राज्य में रेडअलर्टसा था। माहौल में तनाव जाहिर था, मगर हमारे लेखक मित्र आजुर्दा का आग्रह और उत्साह था कि यह कार्यशाला संपन्न हुई। आते-जाते मुझे अवंतिपुर बसस्टैंड का वह पेड़ दिखा, जिस पर गोलियों के निशान तब तक थे। मेरा मन अनमना हो गया। हम आठ भाषाओं के लेखक, अनुवादक और साहित्य अकादमी के सदस्य  पहलगाम में जम्मू एंड कश्मीर टूरिज्म की कॉटेजेज़ में ठहरे हुए थे। प्रो.आज़ुर्दा के कॉटेज में अकसर सब इकट्ठा होते, शायरीकविताओं का माहौल रहता। उन्ही दिनों एक स्वर्गीय कश्मीरी पंडित प्रोफेसर की बेटी विदेश में बस जाने के बाद श्रीनगर आई थी घूमने, पुराना सब देखने। वे लोग प्रो. आजुर्दा से भी मिलने आए। चाय के बीच अचानक कहीं से यह सवाल उछला- आप लोग चले क्यों गए थे? मरहूम कश्मीरी पंडित प्रोफेसर की बेटी कुछ देर बाद चुप रह कर बोली- सब तो जा रहे थे। उसके चेहरे की पीड़ा ने मुझे कहीं हिला दिया। बस उसी समय मेरे उपन्यास की प्रॉटोगॉनिस्ट अमिता ने जन्म ले लिया था।
6.       हिंदी में जिस तरह से स्त्री विमर्श हो रहा है उसपर कुछ लेखकों को आपत्ति है, आपका स्त्री विमर्श को लेकर क्या रुख या स्टैंड है ।

उत्तर : हिंदी में हम लोग अभी उस परिपक्वता को हासिल ही नहीं हुए हैं कि हम लेखन संग एक्टिविज्म की बात कर सकें। हम हमेशा विमर्श के मूल-मुद्दे से उखड़ जाते हैं। हर विमर्श का राजनैतिक ध्रुवीकरण हो जाता है और इन विमर्शों से किसी को कोई लाभ हो नहीं पाता। किंतु अगर स्त्री अपने परिवेश के उठ कर अपनी आज़ादी और हर किस्म की बराबरी की मांग उठाती है, या अपने अंतरंग संसार के घाव, अतृप्तियां, असमानता को उघाड़ती है तो वह साहस की बात है। इसलिए हिंदी जगत को स्त्री की हर खुलती आवाज़ का स्वागत करना चाहिए, इसे देह विमर्श, फैशनेबल फेमिनिज्म जैसे जुमलों में रिड्यूस नहीं करना चाहिए। हां दूसरी तरफ मैं यह भी मानती हूं कि स्त्री का अंतरंग बाज़ार की आपूर्ति का विषय नहीं सो अगंभीर चौंकाऊ चीजों से हमें बचना चाहिए। मेरे अपने कथा संसार में अपने अस्तित्व को लेकर सजग स्त्रियां जगह पाती रही हैं।

6.   फिक्शन में विमर्श होने से कथा बाधित होती है, इससे आप सहमत हैं असहमत ?  
उत्तर : सहमत। मैं कथाकार हूं और कथ्य पर मैं जबरन विमर्श को नहीं थोप सकती। हम सब दीर्घ या सूक्ष्म तौर पर मानव जीवन को कथ्य बनाते हैं। ऐसे में किसी पात्र को सहज जीवन प्रवाह से विपरीत पॉलिटिकली सही करना कथा को बाधित करता है। सहज जाग्रत किरदार अपने साथ कोई जागृति की किरण ले आए तो बात अलग है।

7.   हिंदी साहित्य के लिए सोशल मीडिया के विस्तार को आप किस तरह से देखती हैं, क्या इससे सकारात्मकता आई है या रचनात्मकता का विकास हुआ है।
उत्तर : सच कहूं तो मिश्रित असर हुआ है, यह विश्लेषण की विषयवस्तु है। सकारात्मकता के नज़रिए से देखें तो हम सब हिंदी लेखक एक जगह जुटे हैं, जहां सहज ही, मिनटों में सूचनाओं का आदानप्रदान कर लेते हैं। हम पाठकों से रूबरू हैं। प्रकाशकों के लगातार संपर्क में हैं, आलोचकों की आपकी लेखनी, वैचारिकता, राजनैतिक रुझान, स्टैंड पर निगाह है। नए लेखक, नए मंच उभर रहे हैं। हम सब आपस में एक क्लिक की दूरी पर हैं। नकारात्मक नज़रिए से देखें तो वैचारिक गुटों की खोखली राजनीति, अवसरपरकता अपने पूरे नंगेपन से सामने रही है। गुटों की भीतरी टूटन और अंतत: लेखक के अकेले होने, रचने का सच सामने रहा है। एक क्लिक की आभासी निकटता का खोखलापन। सबसे बड़ी विडंबना कई लेखकों के वैचारिक मुखौटे ढीले होकर पाठकों के सामने ही लटक गए हैं।

9.   सोशल मीडिया ने लिखनेवाले को एक ऐसा मंच दे दिया जहां किसी तरह का चेक नहीं है, यह साहित्य के लिए कितना अहितकर है।

उत्तर- इंटरनेट ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में मैं जब नया ज्ञानोदय में हिंदी और इंटरनेट पर कॉलम लिखती थी। तब ही मैंने यह चिंता जताई थी कि जहां नेट हर किसी के भीतर की ‘छपास’ को तृप्त कर सकता है, वहीं संपादक नामक फ़िल्टर यहां नहीं होने वाला है। यहां अच्छा पढ़ना भूसे के ढेर में सुई खोजने जैसा है। गंभीर साहित्य की अपनी धारा होती है, अगंभीर, अकलात्मक और दिशाहीन साहित्य वहां अपने आप पीछे छूट जाता है। इसकी चिंता हमें नहीं करनी चाहिए।

10. आलोचना खासकर कथा आलोचना से आप संतुष्ट हैं 

उत्तर : नहीं। यह सच हम सब जानते हैं कि रचनात्मक आलोचना सिरे से गायब है। बहुत कम आलोचक हैं जो सरोकारों के साथ निष्पक्ष आलोचना कर रहे हैं। बुरी किताबों पर महान आलोचना पढ़ कर रहा,सहसा विश्वास उठ जाता है। जिन पर आलोचक लगातार लिख रहे हैं, वे पाठकों को औसत लगते हैं, जिनकों पाठकों का प्यार मिलता है उनसे आलोचक चिढ़े रहते हैं। तो मन में यह सवाल उठता है कि क्या कथा साहित्य को आलोचना की अब जरूरत भी है?

11. नई पीढ़ी के लेखकों के लिए कुछ कहना चाहेंगी।

उत्तर- पहली,अपना नया - पुराना हिंदी कथा साहित्य पढ़ लेना, फिर लेखक होने के बारे में दावा करना। दूसरी– जब तक बहुत ही नया न हो कहने को, तब तक कलम मत उठाना। औसत लेखकों का एक हुजूम है जो एक जैसी रचनाएं लिख रहे हैं।

12.   दैनिक जागरण हिंदी बेस्टसेलर पर आपकी क्या राय है।

उत्तर : मैं जानती हूं बेस्टसेलर को लेकर बहुत स्वागत और विरोध हुआ। मुझे यह प्रयास अच्छा लगा कि हिंदी में सबकी नींद खुली कि हिंदी में भी बेस्टसेलर किताबें हो सकती हैं। जहां आमतौर पर प्रकाशक किताब की तीन सौ पांच सौ - प्रतियां छाप कर भी, अंतत: किताबें डंप कर देते हैं। अब वे भी प्रतियोगिता में आने की कोशिश कर रहे हैं। हिंदी लेखक में शुरू से एक ऊंघ रही है, बाज़ार से बेरुख़ होने की, जिसे हमने हिंदी का स्वाभिमान नाम दिया, मगर फायदा इसका प्रकाशक ने उठाया है। किताब को तो बाज़ार से ही निकलना है, तो हम क्यों धारा के विपरीत बहने वाली मछलियों की तरह व्यवहार कर भालुओं का शिकार हों?
  

Saturday, February 17, 2018

गंगा-जमुनी तहजीब का स्वांग


जब भी हमारे देश में सौहार्द की बात होती है, दो समुदायों के बीच प्रेम की बात होती है या जब भी कभी दो समुदायों के बीच किसी भी प्रकार की टकराहट या वैमनस्यता की बात होती है, तब एक शब्द युग्म बार बार हमारे सामने आता है। गंगा-जमुनी तहजीब। बहुत जोर-शोर से इस गंगा-जुमनी तहजीब को बचाने और उसको कायम रखने की वकालत की जाती है। कथित रूप से समाज को बांटनेवाली ताकतों को गंगा-जुमनी तहजीब के जुमले से भारत में व्याप्त बहुलतावाद के सिद्धांत की याद दिलाई जाती है। इस शब्द युग्म के हवाले से दो समुदायों के बीच समरसता को मजबूत करने की दुहाई भी दी जाती है। अब जरा हम इस गंगा-जमुनी-तहजीब की पड़ताल साहित्य के क्षेत्र में करते हैं। जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष और कथाकार असगर वजाहत ने पिछले साल अक्तूबर में एक बातचीत में कहा था, जो कि प्रकाशित भी है, कि आज की समकालीन हिंदी कविता गंगा जमुनी चेतना से बहुत दूर चली गई है और उसने यूरोपीय कविता का दामन थाम लिया है। यही वजह है कि हमारे हिंदी कवियों के अनुवाद किसी एशियाई भाषा में कम या नहीं, जबकि सीधे यूरोप की भाषाओं में अधिक होते हैं और कवि इस पर गर्व करते हैं। असगर वजाहत आगे कहते हैं कि आज के पूरे परिदृश्य को समझने के लिए इतिहास में जाने की आवश्यकता है। हम सब जानते हैं कि फारसी लिपि में लिखी खड़ी बोली कविता का प्रारंभ 12-13 वीं शताब्दी में हो चुका था और 400 साल की यात्रा तय करती हुई यह 19वीं शताब्दी में विश्व स्तर की कविता बन चुकी थी। यह वह समय था, जब खड़ी बोली कविता के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग नहीं या बहुत कम किया जाता था। यही कारण था कि 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में अयोध्या प्रसाद खत्री ने खड़ी बोली कविता आंदोलन चलाया था। उन्होंने उस समय नागरी लिपि में खड़ी बोली हिंदी कविता की चार शैलियों का उल्लेख किया है। और गंगा- जमुनी चेतना से संपन्न मुंशी स्टाइल के अंतर्गत मीर तकी मीर और नजीर अकबराबादी की कविता को इसमें शामिल किया है। उन्होंने मुंशी शैली को हिंदी खड़ी बोली कविता के लिए आदर्श शैली माना था। मुंशी शैली या गंगा-जमुनी काव्य संस्कार है क्या? यह मिली-जुली उत्तर भारत की उस संस्कृति का नाम है, जो मध्य एशिया और उत्तर भारत का सांस्कृति समन्वय थी। इस परंपरा के अंतर्गत जो कविता लिखी गयी, वह गंगा-जमुनी संस्कार की कविता कही जाती है। यह भावना, विचार और शैली के अदभुत संयोजन पर आधारित थी, और है। आधुनिक भारत में मुंशी स्टाइल हिंदी कविता की मुख्यधारा नहीं बन सकी। इसके कई कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि बीसवीं शताब्दी में उर्दू-हिंदी विवाद या विभाजन शुरू हो गया था और हिंदी और उर्दू दोनों अलग होकर अपनी अलग पहचान बना रही थीं। गंगा-जमुनी संस्कार क्योंकि समन्वय की चेतना है, इसलिए उसे काफी हद तक अस्वीकार कर दिया गया था। दूसरा कारण, हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता का बढ़ना था। इस कारण भी उर्दू और हिंदी का भेद उभारा गया था और मिली-जुली संस्कृति की भावना कमजोर पड़ गई थी।
असगर वजाहत साहब इतिहास में जाने की बात अवश्य करते हैं और इतिहास के चुनिंदा अंशों को उद्धृत भी करते हैं। लेकिन वो एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न से टकराए बिना आगे निकलते हैं और अपनी राय प्रकट कर देते हैं। वो साहित्य में गंगा-जमुनी संस्कार के छीजते जाने के लिए हिंदी उर्दू के बीच के विभाजन या हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता को जिम्मेदार ठहराते हैं। अब जरा ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में इस कथन की पुष्टि कर ली जाए। असगर वजाहत साहब जिस हिंदी उर्दू-हिंदी विभाजन की बात करते हैं उसका असर हिंदी साहित्य पर तो दिखाई नहीं देता है। उर्दू के जितने रचनाकारों का हिंदी में अनुवाद हुआ है, उसकी संख्या उनकी इस स्थापना को खारिज कर देते हैं। सालों तक हिंदी के पाठक कृश्न चंदर को हिंदी का ही लेखक मानते रहे क्योंकि उनकी रचनाएं हिंदी में अनुदित होकर छपती थी उसमें अनुवादक का नाम बहुधा होता नहीं था। कृश्न चंदर हिंदी में अनूदित होकर ही बेहद लोकप्रिय हुए। इसी तरह अगर हम देखें तो कुर्तुल एन हैदर, सअदात हसन मंटो, इकबाल, गालिब, मीर, से लेकर जौन एलिया और इंतजार हुसैन तक की ढेरों रचनाओं का हिंदी में अनुवाद हुआ और अब भी हो रहा है। हिंदी के लोगों ने बगैर किसी भेदभाव के उनको ना केवल अपनाया बल्कि रचनाकार के तौर पर उनको सर माथे पर बिठाया। एक अनुमान के मुताबिक गालिब के जितने दीवान हिंदी में प्रकाशित हैं उतने दीवान तो उर्दू में भी प्रकाशित नहीं हैं। अहमद फराज के गजलों और शायरी को लेकर हिंदी में दो खंडों में असासा का प्रकाशन हुआ। ये फेहरिश्त बहुत लंबी है। लेकिन इसकी तुलना में अगर हम हिंदी के लेखकों की रचनाओं का उर्दू में अनुवाद ढूंढते हैं तो वो ना के बराबर मिलती है। क्या उर्दू ने सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा, मुक्तिबोध, अज्ञेय जैसे दिग्गज हिंदी के लेखकों को अपनाया। क्या उनकी रचनाएं उसी अनुपात में उर्दू में अनूदित हुईं जिस अनुपात में उर्दू के कवियों और लेखकों का अनुवाद हिंदी में हुआ। इस प्रश्न का उत्तर है नहीं। तो फिर हम किस गंगा-जुमनी तहजीब की बात करते हैं और उसपर आसन्न खतरे को लेकर छाती कूटते हैं। उस गंगा-जमुनी तहजीब में जहां हिंदी ने तो बहुत उदारता के साथ उर्दू के लेखकों को अपनाया, उनको प्रकाशित किया लेकिन उर्दू ने वो गर्मजोशी नहीं दिखाई। क्या ये भाषाई सांप्रदायिकता नहीं है? इसपर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। असगर वजाहत गंगा-जमुनी संस्कार को समन्वय की चेतना मानते हैं और इसी वजह से उसको काफी हद तक अस्वीकार कर देने की बात करते हैं । प्रश्न यह है कि समन्वय की चेतना को किसने बाधित किया, इसका उत्तर ढूंढने की कोशिश की जानी चाहिए।
इस बात पर भी विचार करने की जरूरत है कि उर्दू में हिंदी के कवियों लेखकों को लेकर उत्साह क्यों नहीं दिखाई देता है। उर्दू पाठकों का एक विशाल वर्ग है। इस विशाल पाठक वर्ग को हिंदी की रचनात्मकता से वंचित रखने का उपक्रम इतने सालों से जारी है लेकिन इसको लेकर साहित्य के किसी कोने अंतरे में किसी प्रकार की कोई बहस हुई हो, ऐसा ज्ञात नहीं है। यह अनायास तो नहीं हो सकता है कि हिंदी के लेखकों को लेकर उर्दू में उदासीनता का भाव हो क्योंकि अगर अनायास होता तो ये इतने लंबे कालखंड तक नहीं चलता। गंगा-जमुनी तहजीब या गंगा-जमुनी काव्य संस्कार की पौरोकारी करनेवाले लेखकों को इस असंतुलन की इतनी लंबे समय तक याद क्यों नहीं आई। उर्दू के तमाम सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों के रहनुमाओं ने ये क्यों नहीं सोचा कि उर्दू के पाठकों को दिनकर और बच्चन की रचनाएं पढ़ाई जाएं। उनका परिचय मुक्तिबोध और शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं से करवाया जाए। असगर वजाहत हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता के उभार की बात करते हैं लेकिन ये साहित्य में, खासतौर पर हिंदी में, तो दिखाई नहीं देता है। हिंदी के प्रकाशकों से लेकर पाठकों तक ने उर्दू के लेखकों को खूब प्रतिष्ठा दी लेकिन उर्दू के प्रकाशकों, पाठकों और लेखकों ने हिंदी के लेखकों को लेकर किसी तरह का कोई उत्साह नहीं दिखाया। ये कैसी सांप्रदायिकता है साहब, इसपर गौर करें।
साहित्य में गंगा-जमुनी तहजीब के झंडाबरदारों ने इतने सालों से ये सवाल नहीं उठाया,उनकी चुप्पी भी सवालों के कठघरे में है। प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच ने कभी इस सवाल से मुठभेड़ करने की कोशिश की हो तो उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए। प्रगतिशीलता के ध्वजवाहकों ने भी मुक्तिबोध को समग्र रूप में उर्दू में उपलब्ध करवाने का कोई जतन किया हो तो उसको भी हिंदी के पाठकों के सामने लाना चाहिए। गंगा-जमुनी तहजीब में गंगा भी है और जमुना भी है लेकिन साहित्य में तो ऐसा प्रतीत होता है कि गंगा की धारा बगैर किसी भेदभाव के लगातार सबको समेटे आगे बढ़ रही है लेकिन जमुना का बहाव कमजोर या बाधित हो रहा है। कुछ लोग ये प्रश्न उठा सकते हैं कि भाषा में इस तरह के सवाल उठाकर एक खास किस्म की सांप्रदायिक दृष्टि प्रतिपादित की जा रही है ।ऐसे लोगों को विनम्रतापूर्वक कीनिया के मशहूर लेखक गुअवा थिन्योंगों के उस कथन की याद दिलाना चाहूंगा जहां वो कहते हैं भाषा का चरित्र दोहरा होता है। भाषा संवाद का माध्यम तो होती ही है, साथ ही वो संस्कृति की संवाहक भी होती है। अगर हम भाषा की इस दोहरी भूमिका और चरित्र को मानते हैं तो गंगा-जमुनी तहजीब या गंगा-जमुनी साहित्यिक संस्कार एक स्वांग नजर आता है।  

Friday, February 16, 2018

भक्तिभाव से लिखी जीवनी


इन दिनों बॉलीवुड के फिल्म कलाकारों के हॉलीवुड की फिल्मों और टी वी सीरियल्स में काम करने को लेकर खासी चर्चा होती है। प्रियंका चोपड़ा से लेकर दीपिका पादुकोण तक की। हमेशा जब भी किसी भारतीय कलाकार को विदेशी फिल्मों में काम मिलता है तो वो खबर बनती है। लेकिन इन चर्चा के बीच हम भूल जाते हैं कि प्रियंका चोपड़ा के हॉलीवुड में काम करने से लगभग दशकों पहले भारतीय फिल्मों का एक सितारा विदेशी फिल्माकाश पर चमक चुका था। इस सितारे का नाम था शशि कपूर। शशि कपूर ने 1967 में प्रिटी पॉली फिल्म में काम किया था। कहना ना होगा कि शशि कपूर बॉलीवुड के पहले अंतराष्ट्रीय कलाकार थे जिनको प्रसिद्धि मिली थी। दरअसल हम बहुधा सबसे पहले सिंड्रोम के शिकार होकर गलतियां कर बैठते हैं। शशि कपूर के मामले में तो कई बार ऐसा हुआ। इन्हीं स्थितियों से प्ररित होकर असीम छाबड़ा ने शशि कपूर पर एक मुक्कमल किताब लिखने की योजना बनाई थी जो शशि के जीवन काल में ही पूरी हो गई थी। इस किताब का नाम है शशि कपूर, द हाउस होल्डर, द स्टार। लेखक ने साफ तौर पर इस बात को स्वीकार किया है कि शशि कपूर पर पुस्तक लिखने के दौरान जब उसने कपूर खानदान की दूसरी पीढ़ी के तीसरे सितारे के इंटरव्यू को पढ़ना शुरू किया तो उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि लोगों ने शशि के व्यक्तित्व के कितने पहलुओं को भुला दिया है।
इस पुस्तक में असीम छाबड़ा ने शशि कपूर की शुरुआती जिंदगी पर विस्तार से प्रकाश डाला है कि किस तरह से उनका जेनिफर से इश्क हुआ। दोनों एक ही नाटक कंपनी में काम करते थे और वहीं इश्क पनपा था। जेनिफर की पिता की मर्जी के खिलाफ दोनों ने शादी करने का फैसला किया था, शादी की भी थी। इन प्रसंगों में असीम छाबड़ा ने उपलब्ध अलग अलग तथ्यों को सामने रखा है ताकि पाठकों को समग्रता में घटनाओं को पता लग सके। अफवाहों पर विराम लग सके और सचाई समाने आ सके। शशि कपूर एक बेहतरीन इंसान और सच्चे अर्थों में प्रोफेशनल थे । पर इस किताब को पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगता है कि शशि प्रोफेशनलिज्म पर दिल की बातों को या रिश्तों को तरजीह देते थे लेकिन जब वो दिल से कुछ करते थे तो उसका ढिंढोरा नहीं पीटते थे। शबाना आजमी के साथ का एक वाकया बेहद मशहूर है। 1986 में शबाना आजामी ने कोलाबा की झुग्गियों को हटाने के सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और भूख हड़ताल पर बैठ गई थीं। भूख हड़ताल के पांचवें दिन शबाना की तबीयत बिगड़ने लगी थी और उनका रक्तचाप बहुत कम होने लगा था। शशि कपूर को ये बात पता चली तो वो सीधे उस वक्त के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हाण के पास जा पहुंचे। उनके कहा कि आपको जब जरूरत होती है तो पूरी फिल्म इंडस्ट्री आपके समर्थन में खड़ी हो जाती है। शंकर राव चव्हाण ने तुरंत संबंधित विभाग के मंत्री को बलाया और उनसे कहा कि जाकर शबाना आजमी की हड़ताल तुड़वाएं। शशि कपूर और मंत्री दोनों हड़ताल स्थल पर पहुंचे और जूस मंगवा कर शाबाना की हड़ताल खत्म करवाई। जाहिर सी बात है कि मांगे मान ली गईं। हड़ताल तोड़ने के बाद जब शबाना मंच पर आईं और वो शशि कपूर को धन्यवाद देने ही वाली थीं कि उनकी नजर शशि पर पड़ी जो अपनी गाड़ी में बैठकर जा रहे थे। जाने के पहले उन्होंने कहा था कि ये आंदोलनकारियों की जीत है और उनका इससे कोई लेना देना नहीं है। शशि कपूर से जुड़े इस तरह के कई वाकए इस किताब में हैं जहां वो अपने साथी कलाकारों को सेट से लेकर व्यक्तिगत जीवन में मदद करते रहते थे।
लेकिन अगर हम समग्रता में असीम छाबड़ा की इस किताब पर विचार करते हैं तो ये भक्तिभाव में डूबकर लिखी किताब प्रतीत होती है जिसमें तथ्यों को अपने निष्कर्षों के हिसाब से कई जगह पर घुमाया गया है। शुरुआत के अध्याय में लेखक इस तरह से लिखते हैं ताकि पाठकों को लगे कि वो वस्तुनिष्ठ होकर समग्रता में शशि के व्यक्तित्व को सामने रख रहे हैं लेकिन जैसे जैसे किताब आगे बढ़ती है वैसे वैसे लेखक पर भक्ति हावी होती जाती है। लेखक जब उनको व्यस्ततम स्टार कहते हैं तो ये ध्वनित होता है कि वो उस दौर के सुपरस्टार थे । लेखक के मुताबिक शशि कपूर साठ से लेकर अस्सी के दशक तक लगातार सफलता की बुलंदियों पर रहे लेकिन इन बुलंदियों के बारे में बात करते हुए वो राजेन्द्र कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर, शम्मी कपूर की सफलता क़ा बस उल्लेख भर कर देते हैं। इसी तरह से जब वो सत्तर की दशक की बात करते हैं तो राजेश खन्ना की रिकॉर्डतोड़ सफलता को गहराई से रेखांकित नहीं करते हैं। उसके बाद अमिताभ बच्चन का जिक्र भर होता चलता है। लेखक इस बात से भी बचते नजर आते हैं कि शशि कपूर की सफलता में उनके को स्टार का बड़ा रोल रहा है। दीवार, त्रिशूल, शर्मीली, प्यार का मौसम, आमने सामने, चोर मचाए शोर आदि पर विस्तार से चर्चा बगैर शशि पर मुकम्मल किताब नहीं हो सकती है। दीवार के जिस रोल को लेकर शशि की तारीफ होती है वो रोल पहले नवीन निश्चल को मिलने वाला था लेकिन इसका उल्लेख दिखता नहीं है। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि शशि कपूर के व्यक्तित्व औक कृत्तित्व पर यह मुकम्मल पुस्तक नहीं है। 

Saturday, February 10, 2018

जलेस के जलसे पर सवाल


एक लेखक संगठन है। जनवादी लेखक संघ। दिल्ली में उसका केंद्रीय कार्यालय है। भारतीय जनता पार्टी और जनवादी लेखक संघ का दफ्तर दिल्ली की एक ही सड़क पर स्थित है। यह लेखक संगठन हिंदी और उर्दू के लेखकों का संगठन है। अभी इसका राष्ट्रीय सम्मेलन झारखंड के धनबाद में हुआ। सम्मेलन का उद्घाटन अंग्रेजी के पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने किया। हिंदी के लेखक असगर वजाहत को इसका अध्यक्ष चुना गया। चुनाव के वक्त अधिवेशन में असगर वजाहत अनुपस्थित थे। वजह उऩका कहीं अन्यत्र व्यस्त होना बताया गया। महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप महासचिव संजीव कुमार बने रहे। इस वर्ष जनवरी में यह सब संपन्न हो गया। उपर से देखने पर ये बातें सामान्य लगती हैं लेकिन कुछ पूर्व जनवादियों को सिद्धार्थ वरदराजन से जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ करवाना खल गया। उनके मुताबिक यह जनवादी लेखक संघ के सांगठनिक कौशल की कमजोरी है जो किसी बड़े हिंदी या उर्दू के लेखक से सम्मेलन के उद्घाटन को ना करवा कर अंग्रेजी के पत्रकार से करवाता है । दूसरी बात जिसको लेकर साहित्यिक हलके में चर्चा रही वो ये कि जनवादी लेखक संघ के शीर्ष पदाधिकारी अब पूर्वी दिल्ली इलाके के निवासी हो गए। यह महज एक संयोग हो सकता है लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जनवादी लेखक संघ को हिन्दुस्तान के अन्य शहरों से कोई अध्यक्ष, महासचिव या उप महासचिव क्यों नहीं मिलता है। जनवादी लेखक संघ में कुछ चुनिंदा लोगों का वर्चस्व कायम क्यों हैं। इससे बेहतर तो प्रगतिशील लेखक संघ है जो हर साल देश के अलग अलग हिस्से के लेखकों को शीर्ष पदों की नुमाइंदगी के लिए चुनते हैं। जनवादी लेखक संघ तो दिल्ली से पूर्वी दिल्ली में आ डटा है। खैर थोड़ी बहुत चर्चा के बाद बात आई गई हो गई।
इस बीच जनवादी लेखक संघ से पूर्व में जुड़े कोलकाता के लेखक अरुण माहेश्वरी ने धनबाद में आयोजित जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन को लेकर एक लंबी पोस्ट फेसबुक पर डाल दी। इस स्तंभ में पहले भी इस बात की चर्चा की जा चुकी है कि साहित्य के मसले अब फेसबुक पर स्थान पाने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि सभी तरह के साहित्यिक मसले फेसबुक पर हल हो जाएंगे। जनवादी लेखक संघ के धनबाद सम्मेलमन के संपन्न होने के बाद अरुण माहेश्वरी ने अपनी पोस्ट में लिखा- यद्यपि संजीव कुमार ने सम्मेलन के सांगठनिक सत्र और सचिव की रिपोर्ट के सूत्रीकरण पर विवादों का एक लाईन में संकेत दिया है, लेकिन कुछ इस प्रकार मानो वह सब किसी गोपनीय संगठन की गोपनीय बातें हो, जिनका खुले में उल्लेख करना पाप है! उनसे उस सम्मेलन में अनुपस्थित लेखकों का कोई सरोकार नहीं हो सकता है ! कहना न होगा, संजीव कुमार ने खुद ही अपनी रिपोर्ट से जलेस के इस राष्ट्रीय सम्मेलन को अजीब प्रकार से रहस्यमय बना दिया है । आज जब हर लेखक और संस्कृतिकर्मी अपनी सांसों पर मोदी-आरएसएस के फासीवाद के जहरीले सामाजिक दबाव को महसूस कर रहा है, उस समय लेखकों के एक राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट में उसका कहीं कोई उल्लेख तक न होना और भी रहस्यमय है? सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में चल रही गुटबाज़ी आज जगजाहिर है और दुनिया इस बात को भी जानती है कि सीपीआई(एम) के सर्वोच्च नेतृत्व में अभी ऐसे तत्वों ने अपना बहुमत बना रखा है जो मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और उनके खिलाफ व्यापकतम मोर्चा तैयार करने के विचारों के विरोधी हैं । हमारा अनुमान है कि इन तत्वों ने ही अपने जनवादी केंद्रीयतावादके पवित्र अस्त्र के प्रयोग से जनवादी लेखक संघ की तरह के एक जन-संगठन की स्वायत्तता को पूरी तरह से रौंद डाला हैं ।
इस सम्मेलन में हिंदी के एक प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत को जलेस का अध्यक्ष बनाया गया है । हम नहीं जानते कि क्या वे भी मोदी-आरएसएस को फासीवादी नहीं मानते और इनके खिलाफ सभी धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक ताक़तों के व्यापकतम मोर्चे के विरोधी हैं ? बहरहाल, हमारी दृष्टि में लगता है यह सम्मेलन जलेस नामक एक ऐतिहासिक संगठन को मौत के मुँह में धकेल देने वाला सम्मेलन हुआ है, क्योंकि जनवाद की रक्षा के जिस बुनियादी उद्देश्य पर इस संगठन की नींव पड़ी थी, अब क्रमश: क्षय की एक बहु-स्तरीय प्रक्रिया के बीच से होते हुए अंत में उसी उद्देश्य को ठुकरा कर इसकी प्राण-सत्ता का ही अंत कर दिया गया है । प्रलेस का एक दुखांत हमने बिहार के ही गया में आंतरिक आपातकाल के दिनों में देखा था, अब उसी पिंडदानको प्रहसन के तौर पर हम झारखंड के शहर में दोहराते हुए देख रहे हैं।
अरुण माहेश्वरी की इस पोस्ट का जनवादी लेखक संघ के उप महासचिव संजीव कुमार ने बेहद आक्रामक तरीके से उत्तर दिया और एक नया शब्द चूर्ख गढ़ते हिए अरुण माहेश्वरी पर पलटवार किया- सबसे झूठा आरोप चूरख ने यह लगाया कि जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन की रिपोर्ट (उसका आशय सम्मेलन में पेश केंद्र की रिपोर्ट से ही होगा) में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का कहीं जिक्र नहीं है. जिसकी भाषा की समझ का हाल आप देख चुके हैं, उसका ऐसा मानना कतई आश्चर्यजनक नहीं.
साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार पूरी रिपोर्ट की केन्द्रीय चिंता है और अगर आप शब्द की मौजूदगी ढूंढने पर बजिद हों तो उसके भी दसियों उदाहरण रिपोर्ट में हैं. पहले खंड का शीर्षक ही है : साम्प्रदायिक फ़ासीवाद के अच्छे दिन’ ”. इस खंड में 1.1 से लेकर 1.8 तक, आठ बिंदु हैं जिनमें साम्प्रदायिक फ़ासीवाद की विभिन्न अभिव्यक्तियों पर विचार किया गया है।संजीव कुमार जी के इस उत्तर पर पक्ष और विपक्ष में बातें शुरू हो गई । कई लोगों ने चूरख शब्द पर आपत्ति जताई और हिंदी के प्रतिष्ठित कवि बोधिसत्व ने तो उनसे इस शब्द को वापस लेने की मांग की। बोधिसत्व ने तो यहां तक लिखा कि सांगठनिक बहसों में किसी तरह से किसी गाली की आवश्यकता क्यों? आप उत्तर दें लिहाड़ी नहीं लें..विरोध और आलोचना को सहज लें....संगठन संगठन ही है हस्तिनापुर का सिंहासन तो नहीं कि उस पर और उसके नियंताओं पर सवाल न उठाया जा सके?’
बवाल बढ़ा तो संजीव जी ने एक और पोस्ट लिखी जिसमें उन्होंने अपनी पिछली पोस्ट पर शर्मिदंगी का जिक्र किया। लेकिन वो पोस्ट खेद की शक्ल में व्यंग्य था। संजीव कुमार और अरुण माहेश्वरी में सीधे सीधे भी विवाद हुआ। ट्रोल से लेकर भक्त आदि जैसे शब्द भी इस्तेमाल किए गए। इस पूरे विवाद में साहित्यिक मर्यादा तार-तार हुई। अब सवाल यह उठता है कि अरुण माहेश्वरी को अचानक से जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों से क्यों दिक्कत होने लगी। कुछ सालों पहले तक जब वो जनवादी लेखक संघ में पदाधिकारी थे तो क्या उस वक्त संगठन में इस तरह की बातें नहीं होती थी। हिंदी साहित्य जगत और वामपंथी लेखक संगठनों के क्रियाकलापों पर नजर रखनेवाले लोगों का कहना है कि जब प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने जनवादी लेखक संघ छोड़ा था तब अरुण माहेश्वरी ने कोई स्टैंड क्यों नहीं लिया था।
रही बात जनवादी लेखक संघ के क्रियाकलापों को लेकर तो वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अपेक्षा करना व्यर्थ है। जिस कथित फासीवाद की चर्चा दोनों महानुभावों ने अपनी अपनी पोस्ट में किया है वह बहुत विद्रूप रूप में जनवादी लेखक संघ में उपस्थित है और वर्षों से वहां राज कर रहा है। नीचे के स्तर पर नए पदाधिकारियों का बदलाव चुनाव के जरिए होता रहा है लेकिन शीर्ष स्तर पर बहुत बदलाव नहीं होता है। पहले चंचल चौहान लंबे समय तक जनवादी लेखक संघ को चलाते रहे, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के साथ, अब मुरली बाबू ओर संजीव कुमार चला रहे हैं। इस संघटन की उपयोगिता और सार्थकता पर तो तब बात हो जब इसमें लोकतंत्र दिखाई दे। यहां कुछ भी कहना बेमानी सा लगता है क्योंकि होता वही है तो शीर्ष पर बैठे दो लोग चाहते हैं। दूसरी बात जो यह कही जाती है वो यह कि इस लेखक संगठन का पदाधिकारी वही बन सकता है जो सीपीएम का सदस्य हो। इस वजह से भी शीर्ष के पदाधिकारियों मे ज्यादा बदलाव देखने को नहीं मिलता है। जो लेखक जमे हैं वो अपनी जगह पर बने रहते हैं। पहले भी मैं यह कह चुका हूं ये लेखक संगठन अपनी राजनीतिक पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम करते हैं। जब आप किसी राजनीतिक दल के पिछलग्गू बन जाते हैं या फिर उस पार्टी के बौद्धिक प्रकोष्ठ बन जाते हैं तो आपको स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार नहीं रह जाता है और आपको हर महत्वपूर्ण फैसले के लिए अपनी पार्टी के आलाकमान का मुंह जोहना पड़ता है। जब लेखक अपने राजनीतिक अकाओं की तरफ देखकर फैसले लेते हैं तो उनकी पहली प्राथमिकता पार्टी का हित हो जाता है और लेखक नेपथ्य में चला जाता है। यह बात पूरे देश ने इमरजेंसी के समय देखा जब प्रगतिशील लेखक संघ ने इमरजेंसी का समर्थन किया था। क्या लेखक संगछनों की अब कोई उपयोगिता बची है। विचार करें।  


Saturday, February 3, 2018

खत की आड़ में प्रसिद्धि की चाहत


संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत को लेकर उठा विवाद फिल्म की रिलीज के बाद शांत होने लगा था। उसी वक्त फिल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने पद्मावत के निर्देशक संजय लीला भंसाली को एक लंबा उपदेशात्मक खत लिखकर एक और विवाद उठाने की कोशिश की। स्वरा के खत से बॉलीवुड में थोडा उद्वेलन हुआ। शाहिद कपूर और दीपिका ने अपने अंदाज में जवाब दिया। विवेक अग्निहोत्री समेत कई अन्य लोगों ने भी स्वरा के खत का उत्तर दिया। स्वरा ने फिल्म पद्मावत के बहाने से देश में महिलाओं को लेकर जो सवाल उठाए हैं उसपर समग्रता में विचार किया जाना आवश्यक प्रतीत होता है। स्वरा अपने खत में इस बात को रेखांकित करती हैं कि उन्होंने टिकट खरीदकर ये फिल्म देखी लेकिन वहां उनको ये महसूस हुआ कि संजय लीला भंसाली ने जौहर और सती को महिमामंडित किया है। उत्तेजना में उन्होंने यहां तक कह डाला कि आपकी भव्य फिल्म को देखने के बाद मुझे योनि जैसा होने का एहसास हुआ. मुझे ऐसा लगा कि मैं महज एक योनि में सीमित कर दी गयी हूं। स्वरा के विचारों का सम्मान किया जाना चाहिए लेकिन किसी भी विचार को अतीत की कसौटी पर भी कसे बिना उसकी वस्तुनिष्ठता का पता नहीं चल पाता है।
स्वरा के खत को अगर हम ठीक से ठहरकर पढ़ें तो शुरू से ही उसमें एक व्यंग्यात्मक भाव है। फिल्म पद्मावत के बहाने वो अपने विचारों को बढ़ाती हुई नजर आती हैं। इसके पहले कि स्वरा के विचारों को लेकर बात हो उनके पत्र की पहली पंक्ति पर बात कर लते हैं जो दोषपूर्ण ही नहीं महज कल्पना पर आधारित है। उस पंक्ति में स्वरा फिल्म पद्मावत में 70 कट की बात करती हैं जो गलत है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड की सदस्या वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान मंच से ये बात साफ कर दी थी कि फिल्म पद्मावत में कोई कट नहीं लगाया गया है। जयपुर लिट फेस्ट में भी एक सत्र में संचालक सलिल त्रिपाठी ने भी कुछ इसी तरह की बात की थी। सलिल त्रिपाठी पेन इंटरनेशनल से जुड़े हुए हैं और पुरस्कार वापसी के दौर में काफी सक्रियता से असहिष्णुता को लेकर लेखन कर रहे थे। खैर ये अलग प्रसंग है। अब वापस लौटते हैं स्वरा के पत्र पर जहां वो कहती हैं – और आज के इस सहिष्णुभारत में, जहां मीट को लेकर लोगों की हत्याएं हो जाती हैं और किसी आदिम मर्दाने गर्व की भावना का बदला लेने के लिए स्कूल जाते बच्चों को निशाना बनाया जाता है, उसके बीच आपकी फिल्म रिलीज हो सकी, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है. इसलिए आपको एक बार फिर से बधाई।  बहुत चतुराई से स्वरा भास्कर ने फिल्म पद्मावत के बहाने देश में दो साल पहले चली सहिष्णुता और असहिष्णुता की बहस को भी छेड़ने की कोशिश की है। इससे भी इस खत को लिखने की मंशा के संकेत तो मिलते ही हैं। तंज कसते हुए वो इस बात का उल्लेख करती हैं कि भारत में मीट के लिए हत्या हो रही है। फिर वो सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर उसको प्रचारित करने के दोष की शिकार हो रही हैं। कल्पना और परसेप्शन के आधार पर अपने तथ्य निर्मित करती चल रही हैं। और जब कल्पना के आधार पर यथार्थ का निर्माण होता है तो वो बहुत खोखला होता है।
अपने इस पत्र में स्वरा भास्कर ने ये भी दावा किया है कि उन्होंने संजय लीला भंसाली के लिए ट्विटर पर आभासी लठैतों से डटकर मुकाबला किया। स्वरा ने अपने पक्ष के साथ एक वीडियो क्लिप भी लगाया जिसमें वो फिल्म पद्मावत के बचाव का दावा कर रही हैं। उस वीडियो में भी अगर पहली पंक्ति देखी जाए तो वहां वो ये कहती नजर आ रही हैं कि विवाद जानबूझकर खड़ा किया गया और बढ़ने दिया गया। किसने जानबूझकर विवाद खड़ा किया, उनका इशारा किसकी ओर था, इसको साफ करना चाहिए। क्या वो इसके लिए संजय लीला भंसाली को जिम्मेदार मान रही हैं? लेकिन जो एक और बड़ी चूक स्वरा से हुई वो ये जब वो कहती हैं कि – मैंने पूरी सच्चाई के साथ यह यकीन किया कि और आज भी करती हूं कि इस देश के हर दूसरे व्यक्ति को वह कहानी कहने का हक है, जो वह कहना चाहता है और जिस तरह से कहना चाहता है।वह अपनी नायिका के पेट को जितना चाहे उघाड़ कर दिखा सकता है और ऐसा करते उन्हें अपने सेटों को जलाए जाने का, मारपीट किए जाने, अंगों को काटे जाने, जान जाने का डर नहीं सताएगा। हर व्यक्ति को कहानी कहने का हक है, जो वो कहना चाहता है लेकिन जिस तरह से कहना चाहता है उसकी कुछ सीमाएं संविधान में तय की गई हैं। अभिव्यक्ति की आजादी संपूर्ण नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में भारत की जनता को अभिव्यक्ति की आजादी का हक दिया गया है लेकिन उसके साथ ही संविधान का अनुच्छेध 19(2) इस हक की सीमाएं भी तय कर देता है। इसलिए कोई भी नायिका के पेट को जितना चाहे उघाड़कर नहीं दिखा सकता है। संविधान के अंतर्गत जो व्यवस्था है उसका सम्मान तो करना ही होगा । हां, ये भी साथ साथ देखा जाना चाहिए कि संविधान इसके उल्लंघन की स्थिति में कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं देता है । किसी भी प्रकार की हिंसा या हिंसा की धमकी कानूनन अपराध है। लेकिन स्वरा के पत्र में इस तरह की कई बातें हैं। बहुधा उत्तेजना में तर्क भटकने लगते हैं।
अपने इस पत्र में स्वरा ने एक बात गंभीरता से रेखांकित करने की कोशिश की है वो ये कि फिल्म सती या जौहर को बढ़ावा देती है। अपनी इस बात को पुष्ट करने के लिए स्वरा बहुत जोरदार तरीके से स्त्रियों की स्थितियों के बारे में बातें करती चलती हैं। भंसासी को 13 वीं शताब्दी से लेकर 21 वी शताब्दी के भारत की याद दिलाती हैं। एक माध्यम के तौर पर फिल्म के ताकत की तरफ भी इशारा करती हैं । यह ठीक है लेकिन स्वरा इस बात को भूल गई हैं कि इस फिल्म के पहले चार बड़े डिसक्लेमर लगाए गए हैं जिसमें फिल्म निर्माता की तरफ से कहा गया है कि यह जायसी के महाकाव् पद्मावत पर आधारित है। यह फिल्म सती या जौहर को महिमामंडित नहीं करती है आदि। स्वरा के पत्र के बाद इस फिल्म की अभिनेत्री दीपिका ने ठीक ही कहा प्रतीत होता है। दीपिका ने कहा कि ऐसा लगता है कि फिल्म शुरू होने के पहले वो पॉपकॉर्न खाने चली गई थीं जिससे कि फिल्म की शुरुआत में दिखाई गए डिसक्लेमर उनसे छूट गए। वैसे भी 13 वीं शताब्दी की स्थितियों का अगर चित्रण हो रहा है तो उसमें 21वीं शताब्दी की सोच को घुसाना उचित नहीं होगा। क्या फिल्म बाजी राव मस्तानी को बहुविवाह और व्यभिचार को बढ़ावा देने और इन कुप्रथाओ को बढ़ावा देनेवाला माना जाएगा। मैं यहां स्वरा की खुद की फिल्म तनु वेड्स मनु की चर्चा नहीं करना चाहता हूं क्योंकि उस फिल्म की कहानी तो उनको याद ही होगी। उस वक्त उनके अंदर का पत्र लेखक खामोश रहा।
अपने इस पत्र में स्वरा ने अपने समर्थन में विभाजन के वक्त के भारतीय महिलाओं के दर्द का उल्लेख कर इसको गंभीर बनाने की कोशिश की है। कुछ साहित्यक कृतियों का उदाहरण भी दिया है। लेकिन स्वरा भी उसी दोष का शिकार हो जाती हैं जिसके शिकार तुलसीदास की पंक्ति ढोल गंवार... को व्याख्यायित करनेवाले होते हैं। रामचरित मानस में चुलसीदास की इन दो पंक्तियों के आधार पर उनको पिछड़ी जातियों और महिलाओं का विरोधी करार देने की कोशिश लगातार की जाती रही, बगैर संदर्भ को समझे कि ये पंक्ति कौन कहता है। तुलसीदास की पंक्तियों की व्याख्या करनेवाले आलोचक या लेखक बहुधा बहुत ही सुनियोजित तरीके से तुलसीदास के उन पदों को प्रमुखता से उठाते हैं जिनसे उनकी छवि स्त्री विरोधी और वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थक की बनती है। तुलसीदास को स्त्री विरोधी करार देनेवाले मानस में अन्यत्र स्त्रियों का जो वर्णन है उसकी ओर देखते ही नहीं हैं। एक प्रसंग में कहा गया हैं – ‘कत विधि सृजीं नारि जग माहीं, पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं। इसी तरह अगर देखें तो मानस में पुत्री की विदाई के समय के प्रसंग में कहा गया है- बहुरि बहुरि भेटहिं महतारी, कहहिं बिरंची रचीं कत नारी। इसके अलावा तुलसी साफ तौर पर कहते हैं- रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।आकलन सदैव समग्रता में होना चाहिए। स्वरा के इस खत से उसको दो मिनट की प्रसिद्धि अवश्य मिल गई लेकिन अगर वो इस खत से बौद्धिक होने का रास्ता ढूंढ रही है तो वो भटकती हुई नजर आती है।