Translate

Showing posts with label हेमा मालिनी. धर्मेंद्र. Show all posts
Showing posts with label हेमा मालिनी. धर्मेंद्र. Show all posts

Saturday, May 23, 2026

आजा तेरी याद आई


आज पूरी दुनिया ड्रग्स की समस्या से जूझ रही है। नशे के कारोबार ने अपनी जड़ें बहुत गहरी जमा ली है। भारत के पहाड़ी और मैदानी राज्य भी इस समस्या से बुरी तरह से जूझ रहे हैं। नशे की तस्करी के रूप भी बदल गए हैं। इस कारोबार से होनेवाली आय से तंकवाद का जुड़ना एक बड़ी वैश्विक समस्या के तौर पर उभरा है। नशे के कारोबार और ड्रग तस्करी पर कई फिल्में बनी हैं। पिछले वर्षों में एक वेबसीरीज आर्या आई थी जिसमें नशे के कारोबार के आधुनिक और बेहद खतरनाक स्वरूप को दिखाया गया था। किस तरह से ये कारोबार लोगों की जान लेता भी है और जान जाती भी है इसका सूक्षम्ता से प्रदर्शन किया गया था। ये समस्या आज की नहीं है बल्कि दशकों पुरानी है। आज से 50 वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी चरस। रामानंद सागर लिखित और निर्देशित इस फिल्म चरस में नशे के कारोबार के अंतराष्ट्रीय कारोबार और उससे होनेवेली कमाई के लालच को प्रदर्शित किया गया था। धर्मेन्द्र- हेमा मालिनी अभिनीत फिल्म चरस मानवता की रक्षा के लिए समर्पित और ड्रग्स के कारोबार के विरुद्ध लड़ाई में अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने वाले लोगों को समर्पित है। आरंभिक संवाद भी ये संदेश देती है कि फिल्म मानवता, इंसानियत और समाज को बचाने के लिए है। जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती जाती है वो संदेश से आगे निकलकर एक प्रेम कहानी में बदलती जाती है। एक बेहद रोमांटिक प्रेम कहानी समांतर रूप से चलती रहती है। इस प्रेम कहानी को हेमा का हुस्न और धर्मेन्द्र का भोलापन और हस्य एक अलग ही ऊंचाई प्रदान करता है। ये वही समय था जब असल जिंदगी में हेमा और धर्मेन्द्र के बीच प्यार के किस्सों की चर्चा होने लगी थी। दोनों के बीच पर्दे पर जिस तरह की निकटता दिखती है उससे भी इस बात के संकेत मिलने लगे थे। फिल्मी भाषा में उसको पर्दे की केमेस्ट्री कहते हैं। 1975 में आई फिल्म शोले में जो चुलबुली और शोख तांगेवाली लड़की थी वो अब एक थिएटर आर्टिस्ट के रूप में उपस्थित थी। शोले हिट हो चुकी थी और सिनेमा घरों से लेकर बैठकी तक में बसंती और वीरू के प्यार का संवाद आम होने लगा था। शोले की सफलता ने ही रामानंद सागर को इस जोड़ी को दोहराने के लिए प्रेरित किया था। रामानंद सागर ने अपनी फिल्म में अमजद खान को भी खलनायक के रोल में लिया था। शोले में अमजद खान का किरदार खैनी खानेवाला डाकू का था जो क्रूर भी था लेकिन चरस में वही अमजद खान बो-टाई में विलेन के रूप में थे लेकिन मेकअप और गेटअप के बाद भी वैसी प्रभावोत्पादकता नहीं ला सके।

चरस इस मायने में अपने समय की यादगार फिल्म थी कि इसके बड़े हिस्से की शूटिंग माल्टा और रोम में हुई थी। जब फिल्म रिलीज होने वाली थी तो इस बात का प्रचार जोर शोर से किया गया था कि फिल्म खूबसूरत विदेशी लोकेशन पर शूट की गई थी। फिल्मी मैगजीन और प्रचार सामग्री में विदेशी लोकेशन की बात की गई थी। चरस फिल्म की कहानी औसत थी लेकिन उसमें रामांनद सागर ने जिस चरह के लटके-झटके डाले थे वो दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब हो गए थे। पिता की मौत का इंतकाम लेनेवाला बेटा और पिता के इलाज के लिए पैसे की खातिर ब्लैकमेल होती बेटी और स्थितियों का लाभ उठाता विलेन। ना जाने इस तरह की कहानी कितनी बार दोहराई जा चुकी थी लेकिन क्राफ्ट अगर बेहतर होता है तो दर्शक कहानी के दोहराव को स्वीकार कर लेते हैं। कहानी के बीच धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के बीच खूबसूरत लोकेशन और समंदर किनारे गाए फिल्मी गीत अबतक लोगों को पसंद आते हैं। आनंद बक्षी की कलम से निकले शब्दों को लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी और आशा भोसले की आवाज ने अमर कर दिया। मैं एक शरीफ लड़की बदनाम हो गई, नाइट क्लब में फिल्माया गीत है। नाइट क्लब में नायिका की वेशभूषा और अंदाज मादक होते थे जिसे आशा भोसले की आवाज ने और बढ़ा दिया था। एक और गीत है जिसको लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी। इस गीत का मुखड़ा आनंद बक्षी ने गाया था। गीत है- आ जा तेरी याद आई। ये गाना जब आरंभ होता है तो धर्मेन्द्र और हेमा खड़े हैं और पार्श्व से गीत बजता है जिसके बोले हैं दिल इंसान का एक तराजू है..। चंद पंक्तियों के बाद लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी की आवाज। संदेश के आवरण में लिपटी इस फिल्म को रामानंद सागर ने इस तरह से पेश किया था जो आज 50 वर्षों के बाद धर्मेन्द्र हेमा की बेहतरीन फिल्मों में शामिल किया जा सकता है।