गुरदत्त का नाम आते ही प्रेम और विरह, दर्द और संवेदना, दया और करुणा, मासूमियत और बेबसी जैसे शब्दों को परदे पर उतारनेवाले दृश्य याद आने लगते हैं। याद आती है उनकी फिल्में साहब बीबी और गुलाम, प्यासा और कागज के फूल। प्रतीत होता है कि कम ही लोग इस बारे में जानते होंगे कि गुरुदत्त ने सिर्फ दर्द और संवेदना वाली फिल्में ही नहीं बनाई बल्कि उनकी आरंभिक फिल्में अपराध कथाओं पर आधारित थी। जब वो फिल्मों में काम करने आए थे तो उन्होंने अपराध कथाओं पर फिल्म बनानेवाले ज्ञान मुखर्जी के साथ काम किया था। फिल्म की बारीकियां उनसे ही सीखी। देवानंद की फिल्म कंपनी नवकेतन के लिए गुरुदत्त को फिल्म निर्देशित करने का अवसर मिला। फिल्म थी बाजी, जो जुलाई 1951 में प्रदर्शित हुई थी। गुरुदत्त 39 वर्ष की आयु में दुनिया से चले गए । कम उम्र में ही उन्होंने कई कल्ट फिल्में बनाईं जिनका विश्लेषण अब भी होता रहता है। इन कल्ट मानी जानेवाली फिल्मों के अलावा गुरुदत्त ने चार अपराध कथाओं पर आधारित फिल्में बनाई -बाजी, जाल, बाज और सैलाब। ये वही दौर था जब देश में अपराध कथाओं को लेकर एक खास किस्म की उत्सकुकता का वातावरण था। अपराध कथाओं पर आधारित उपन्यास खूब बिक रहे थे। उधर हालीवुड में फिल्म नोयर मूवमेंट आरंभ हो चुका था। इस तरह की फिल्मों का नायक नायक कुटिल भी होता था, उसका संदेहास्पद होता था लेकिन जो दिखता था वो उससे अलग होता था। इन फिल्मों में ब्लैक एंड व्हाइट फ्रेम का उपयोग बहुतायत में होता था। फ्लैशबैक और वायस ओवर के साथ नैरेशन इस तरह की फिल्मों में एक अलग ही तरह का प्रभाव पैदा करती थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के वैश्विक परिदृश्य में इस तरह की फिल्में बननी शुरु हुई थी। हिंदी फिल्मों की दुनिया पर भी इसका असर दिखा। गुरुदत्त की इस फिल्म बाजी को भी नोयर मूवमेंट का हिस्सा माना गया। 1951 में प्रदर्शित फिल्म बाजी के नायक देवानंद और नायिका गीता बाली और कल्पना कार्तिक थी। फिल्म में अधिकतर गीत गीता दत्त ने गाए थे। इस फिल्म का संगीत एस डी बर्मन ने दिया था। संगीत में गजब किस्म का आकर्षण है। गीता दत्त की आवाज में गाया गीत ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले’ या ‘ये कौन आया कि मेरे दिल की दुनिया में बहार आई’ की धुन अब भी लोगों के स्मरण में है।
फिल्म की कहानी बहुत अलग नहीं थी। फिल्म का नायक मदन (देव आनंद) एक संपन्न परिवार से आता है लेकिन परिस्थियों के कारण जीवन यापन कठिन हो जाता है। वो छोटी बहन मंजू (रूपा वर्मन) के साथ रहता है। रोजगार की तलाश में भटकते भटकते जुआ खेलने लगता है। एक दिन एक होटल में उसकी भेंट डांसर लीना (गीता बाली) से होती है। लोग लीना की अदाओं के दीवाने हैं। मदन को अपने होटल में देख लीना उसको अपने बास के लिए काम करने का आफर देती है। मदन के अंदर बची खुची नैतिकता उसको ऐसा करने से रोक देती है। वो लीना के प्रस्ताव को ठुकरा कर घर लौट आता है। अपनी बहन के इलाज के लिए वो डा रजनी (कल्पना कार्तिक) से मिलता है और दोनों में नजदीकियां बढ़ जाती हैं। डा रजनी के पिता को ये मंजूर नहीं था। बदलते घटनाक्रम में रजनी का एक इंसपेक्टर से विवाह हो जाता है। बहन के इलाज के लिए पैसों की जरूरत मदन को लीना के पास ले जाता है। लीना से मिलकर वो उसके बास के लिए काम करने की हामी भर देता है। दोनों एक दूसरे से अपना सुख-दुख बतियाते हैं। कथा का प्रवाह तेज होता है और एक दिन की लीना की हत्या हो जाती है। जिस रिवाल्वर से उसकी हत्या होती है उसपर मदन की अंगुलियों के निशान पाए जाते हैं। मुकदमा चलता है और मदन को फांसी की सजा होती है। इंसपेक्टर को इस हत्याकड पर शक था। वो जाल बिछाता है जिसमें लीना हत्याकांड का असली दोषी फंस जाता है। कहानी बेहद कसावट के साथ घटनाओं में पिरोई गई है। दो छोटी प्रेम कथाओं के समांतर एक अपराध कथा चलती है जो दर्शकों को बांधे रखती है। गुरुदत्त प्रेम और अपराध का ऐसा काकटेल बनाते हैं जिसके सम्मोहन में दर्शक बंधे रहते हैं। गुरदत्त शताब्दी वर्ष में एक बार फिर से गुरुदत्त की उन फिल्मों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो विश्लेषकों और फिल्म इतिहासकारों की दृष्टि ससे झल हैं। 75 वर्ष पहले बनी फिल्म बाजी उनमें से एक है।