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Saturday, April 4, 2026

फिल्मों के सामाजिक सरोकार


इस वर्ष जनवरी के आखिर में जब रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म मर्दानी-3 रिलीज हुई थी तब दिल्ली से लापता हो रही बच्चियों का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। एक रिपोर्ट के हवाले से ये समाचार चर्चा में आया था कि दिल्ली और आसपास के इलाकों से भारी संख्या में किशोरियां और महिलाएं गायब हो रही हैं। उस समय आए आंकड़े बेहद डरानेवाले थे। तब भी ये भी कहा गया था कि जिस रिपोर्ट के हवाले से मुद्दा बनाया जा रहा था उसमें गायब हुई लड़कियों की बरामदगी के आंकड़े नहीं दिखाए गए थे। आंकड़ों को लेकर जब चर्चा बढ़ी को दिल्ली पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने एक्स पर एक पोस्ट किया। उसमें लिखा कि, चंद संकेतों या प्रारंभिक जानकारी को जांचने के बाद ये सामने आया कि दिल्ली से गुमशुदा लड़कियों की संख्या पेड प्रमोशन का हिस्सा है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया था कि डर का माहौल बनाकर लाभ कमाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इस तरह का वातावरण बनानेवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संयोग ऐसा था कि मर्दानी 3 में भी दिल्ली और इसके आसपास के इलाकों से बच्चियों के गायब होने की कहानी थी। दिल्ली पुलिस के पेड प्रमोशन वाले पोस्ट के बाद चर्चा कम जरूर हुईं लेकिन समाचारपत्रों में लड़कियों के गायब होने के बारे में कुछ न कुछ सामग्री प्रकाशित होती रही। गुमशुदा होनेवाली लड़कियों की संख्या के साथ साथ बरामदगी की संख्या भी प्रकाशित हुई। इससे इंटरनेट मीडिया से बना भ्रम कुछ कम हुआ और राजधानी और इसके आसपास के क्षेत्रों के निवासियों में भय भी कम हुआ। 

फिल्म मर्दानी-3 में बच्चियों का अपहरण कर उनको विदेश भेजने और उनपर दवाओं के ट्रायल की बहुत मार्मिक और भयावह कहानी है। फिल्मकार ने ये दिखाने का प्रयास किया है कि मानव तस्करी सिर्फ देह व्यापार के लिए नहीं होती बल्कि इसके अनेक रूप होते हैं। इस फिल्म में बच्चियों का अपरहण किया जाता था और जिनका ब्लड ग्रुप खास किस्म का होता था उसको विदेश ले जाकर उसपर कैंसर की दवाई का टेस्ट किया जाता था। अगवा की गई जिन लड़कियों का ब्लड ग्रुप उस समूह का नहीं होता है उनसे भीख मंगवाने से लेकर अन्य गैरकानूनी कार्य करवाए जाते थे। कैंसर की दवाई का जिन लड़कियों पर टेस्ट किया जाता था उनकी हालत बहुत खराब हो जाती थी और कुछ समय बाद तड़प तड़प कर उनकी मृत्यु होते दिखाया गया। इस सिंडिकेट में लड़कियों के लिए काम करने वाली एक संस्था और उसके प्रमुख की संलिप्तता भी दिखाई गई थी। कहानी थोड़ी फिल्मी भी होती है। जांच कर रही पुलिस आफिसर को सस्पेंड कर दिया जाता है लेकिन वो विभाग के अपने साथियों का साथ श्रीलंका जाकर इस गैंग का खात्मा करती है। फिल्म में कई टर्न और ट्विस्ट हैं, जो फिल्म को रोचक बनाने और दर्शकों को बांधने के लिए किए गए हैं, पर मूल कहानी तो लड़कियों का गिनी पिग की तरह इस्तेमाल करने की ही है। फिल्म की कहानी, संभव है काल्पनिक हो लेकिन मानव तस्करी का जो पहलू इसमें दिखाया गया है उसको देखकर गायब होने वाली लड़कियों को लेकर समाज को चिंतित होना चाहिए। ये अपराध बेहद संगठित और समाज के इज्जतदार लोगों की सरपरस्ती में चलता हुआ दिखाया गया है। वैसे लोग जो पैसे की खातिर किसी की जान को बेचने या जान लेने में नहीं हिचकते हैं। 

फिल्म से वापस समाज में लौटते हैं। तीन चार दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों की तस्करी को लेकर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान बेहद कठोर टिप्पणी की। अदालत ने कहा मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड आपरेटिंग प्रोसिड्योर) और न्यायिक आदेशों के बावजूद दिल्ली बच्चों की तस्करी की मंडी बन चुकी है। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग से ये जानना चाहा कि बच्चों की तस्करी को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने एक बेहद ही डराने और चौंकानेवाली बात कही। याचिकाकर्ता ने एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन से एक बच्ची को बचाकर पुलिस को सौंपा गया था। आरोप लगाया गया कि पुलिस ने बचाई गई बच्ची को बाल कल्याण समिति के सामने पेश करने की बजाए उसको वापस तस्करों को सौंप दिया। बाद में वही बच्ची फिर से तस्करों के पास से मिली। अगर ये आरोप सही हैं तो ये हमारे सिस्टम पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है। कोर्ट ने इस आरोप का संज्ञान लिया है। हलांकि इस सुनवाई के दौरान ये बात भी सामने आई कि 2018 से लेकर 2024 के बीच रेलवे सुरक्षा बल ने रेलवे परिसर से 84000 बच्चों को बचाया भी। इस तरह से कई अन्य आंकड़े भी कोर्ट के समझ रखे गए थे। आज जब हमारी पुलिस व्यवस्था अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों और सुविधाओं से युक्त है तब कोर्ट की तस्करी की मंडी बनने जैसी टिप्पणी भयावह है। आज भी अगर बच्चों की तस्करी हो रही है तो उसका किन अपराध में उपयोग हो रहा होगा इस बारे में सोचकर सिहरन होती है। 

कई बार ये कहा जाता है कि फिल्में समाज के लिए संदेश देने का काम करती है। मर्दानी 3 में कम उम्र की लड़कियों का अपहरण करके विदेश भेजने की बात हो या वेबसीरीज डेल्ही क्राइम-3 में कम उम्र की लड़कियों को विदेश में बेचने की कहानी, एक संकेत तो समाज को दिया ही जा रहा है। इस तरह की कहानियां फिल्मों में आ रही हों और उसी समय इस तरह के केस कोर्ट में भी सुनवाई के लिए आ रहे हों तो ये प्रतीत होता है कि फिल्में कुछ तो कहने का प्रयास कर रही हैं। फिल्मों को बहुधा मनोरंजन कह कर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन कई बार उनसे निकलनेवाले संदेश को पकड़ने की आवश्यकता भी है। 1950 में व्ही शांताराम की एक फिल्म आई थी दहेज। स्वाधीन भारत में दहेज की समस्या को लेकर ये फिल्म बनी थी। इस बात की कई बार चर्चा होती है कि बिहार विधानसभा में दहेज की कुरीति पर चर्चा के दौरान इस फिल्म का नाम कई बार आया था। कहा तो यहां तक जाता है कि बिहार में दहेज उन्मूलन कानून बनने के पीछे इस फिल्म की प्रेरणा थी। इस बात में सचाई हो या ना हो लेकिन इतना तो तय है कि व्ही शांताराम ने अपने फिल्म के माध्यम से इस कुरीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया था। फिल्मों से ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। आज अगर मर्दानी-3 में बालिकाओं की तस्करी का मुद्दा उठा है तो समाज को इस घृणित अपराध के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। सरकार और पुलिस तो अपने स्तर पर प्रयास करेंगी, अदालतों में सुनवाई होगीं, आदेश पारित होंगे लेकिन जबतक हमारा समाज इस अपराध के खिलाफ सजग होकर नहीं उठेगा तबतक बेटियों की तस्करी पर लगाम लगा पाना संभव नहीं है। आज जब हमारा देश विकसित बनने की राह पर अग्रसर है तब इस तरह के अपराध की समाज में कोई जगह होनी नहीं चाहिए।    


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