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Monday, September 7, 2009

दो जन्मदिन, दो अहसास

पिछले हफ्ते साहित्य से जुड़ी दो हस्तियों के जन्मदिन के अवसर पर जाना हुआ । दिल्ली के ऑफिसर्स क्लब में हंस संपादक राजेन्द्र यादव का जन्मदिन समारोह मनाया गया गया जिसमें साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े सौ से ज्यादा लोग मौजूद थे । राजेन्द्र यादव के जन्म दिन समारोह का एक बेहद दिलचस्प निमंत्रण पत्र मिला था जो उनकी बेटी रचना यादव ने भेजा था । रचना ने लिखा था- 28 अगस्त को राजेन्द्र यादव यानि मेरे पापू अस्सी वर्ष पूरे कर रहे हैं । उन्हें इस बात का एहसास दिलाने के लिए मुझे आपका सहयोग चाहिए । मुझे बहुत खुशी होगी यदि पापा के खास दोस्त होने के नाते आप मेरे निमंत्रण को स्वीकार करें । चाहे प्रशंसा करते हुए आएं या भर्त्सना लेकिन आएं जरूर । बेहद सुरुचिपूर्ण कागज और हाथ से लिखा था ये पत्र । जाहिर था वहां जाना ही था । वहां पहुंचा तो महफिल सज चुकी थी और रसरंजन का दौर जारी था । कई साहित्यकार अपनी रौ में आ चुके थे । इस बीच यादव जी के मित्र डॉ रमेश सक्सेना ने एक पगड़ी निकाली और वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जी के हाथ में थमा दिया । प्रभाष जी ने राजेन्द्र यादव को पगड़ी पहनाई और उनका पांव छू कर कहा कि आप महान हैं । इसके बाद कवि अजीत कुमार ने राजन्द्र जी के साथ के अपने पुराने संस्मरणों को याद करते हुए कि कहा कि जब हम पतिदेव हुआ करते थे उस वक्त राजेन्द्र विपत्तिदेव थे । अजीत कुमार ने बेहद संक्षिप्त लेकिन उतना ही दिलचस्प संस्मरण राजेन्द्र यादव के बारे में सुनाया । राजेन्द्र यादव का जन्मदिन दिल्ली के साहित्यिक हलके में एक सालाना उत्सव की तरह होता है और राजेन्द्र जी से जुड़े लोग बगैर निमंत्रण के भी वहां जुटते हैं और इस बहाने लोगों की एक दूसरे से मुलाकातें और बातें होती है । कई समीकरण बनते बिगड़ते हैं । इस बार कई नए चेहरे भी देखने को मिले । उनसे बात करने पर पता चला कि वो उत्सुकतावश इस जन्मदिन समारोह में आ गए । वो देखना चाहते थे कि राजेन्द्र यादव का जन्मदिन कैसे मनाया जाता है । पत्रकारिता की एक प्रशिक्षु छात्रा से जब मैंने पूछा कि तुम यहां कैसे तो उसका जबाव सुनकर मैं हैरान रह गया । उसने कहा कि वो वर्तिका नंदा और उदय सहाय की किताब के विमोचन समारोह में पहुंची थी । विमोचन के पहले जब चाय-पान चल रहा था तो कुछ साहित्यकार आपस में यादव जी के जन्मदिन के बारे में बात कर रहे थे वहीं उसे पता चला कि ऑफिसर्स क्लब में हंस संपादक का जन्मदिन समारोह मनाया जा रहा है । जिज्ञासावश, बगैर निमंत्रण के यहां पहुंची उस लड़की से जब मैंने पूछा कि तुम्हें यहां आकर कैसा लगा तो उसका जबाव और भी हैरान करनेवाला था । उसने कहा कि जिनकी कहानियां और लेख पढ़कर मैं बड़ी हुई उन्हें नजदीक से देखना सुखद तो लगा लेकिन कुछ लोगों को जब मैंने शराब से सराबोर होश खोते देखा तो मेरा विश्वास दरक गया । जब मैं ये सुन रहा था तो मृदुला गर्ग के नए उपन्यास मिलजुल मन का एक प्रसंग याद आ रहा था जहां लेखिका ने लिखा है - हिंदी के लेखक शराब पीकर फूहड़ मजाक से आगे नहीं बढ़ पाते । मैं सोचा करती थी, लिक्खाड़ हैं,सोचविचार करनेवाले दानिशमंद । पश्चिम के अदीबों की मानिंद, पी कर गहरी बातें क्यों नहीं करते, अदब की, मिसाइल की, इंसानी सरोकार की । अब समझी वहां दावतों में अपनी शराब खुद खरीदने का रिवाज क्यों है । न मुफ्त की पियो और न सहने की ताकत से आगे जाकर उड़ाओ । अपने यहां मुफ्त की पीते हैं और तब तक चढ़ाते हैं जबतक अंदर बैठा फूहर मर्द बाहर ना निकल आए । दूसरा जन्मदिन था बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन का । ये एक बेहद ही निजी अवसर था जहां कुल जमा छह लोग मौजूद थे । जब रात के तकरीबन ग्यारह बजे मैं तसलीमा के घर पहुंचा तो उनका ड्राइंग रूम गुब्बारों और फ्रिल्स से सजा हुआ था, केक काटा जा चुका था और वहां मौजूद दो तीन लोग खाना खा रहे थे । मैंने घुसते ही उन्हें विश किया तो वो वेहद गर्मजोशी से मिली और तुरत ही खाना खाने का अनुरोध कर डाला । तस्लीमा ने खुद से कई वेज और नॉनवेज डिशेज तैयार की थी । इसमें हिलसा मछली और पॉमप्रेट बेहद स्वादिष्ट था । तस्लीमा मछली के अलावा चिकेन और मूंग दाल खिलाने पर ज्यादा जोर दे रही थी । खाना बेहद स्वादिष्ट बना था । तस्लीमा वहां मौजूद अपने दोस्तों को पूछ-पूछकर खाना खिला रही थी । दो ढाई घंटे तक रुक रुक कर खाना चलता रहा और साहित्य संसकडति पर बता होती रही । उनकी रचनाओं और नया क्या लिख रही हैं इसपर लंबी बात हुई । पूरे दक्षिण एशिया में महिलाओं की स्थिति पर चर्चा हुई । वहीं मौजूद एक पत्रकार मित्र ने तस्लीमा की रचनाओं का हिंदी में पाठ कर माहौल को गमगीन बना दिया । तस्लीमा की कविताओं का भी पाठ हुआ । अपनी रचनाओं को सुनते हुए तस्लीमा सिगरेट पर सिगरेट फूंकती जा रही थी । लग रहा था कि निर्वासन झेल रही ये बहादुर लेखिका कुछ छुपाना चाह रही है । जाहिर तौर पर निर्वासन का दर्द । रचनाओं के पाठ के बाद जब बातचीत शुरू हुई तब भी तस्लीमा के चेहरे पर कई बार गम और दुख की छाया आती जाती रही लेकिन कभी भी गम और दर्द की वजह को अपने लब पर नहीं आने दिया । बातों का सिलसिला इस कदर चल रहा था किसी को भी उठने का मन नहीं कर रहा था । नीचे बैठा मेरा ड्राइवर लगातार मुझे एसएमएस भेज रहा था कि चलो । आखिरकार लगभग एक बजे मैंने ही पहल कर इस गंभीर चर्चा को विराम लगवाया । और रात लगभग एक बजे हमलोग वहां से निकले । अगले दिन तस्लीमा को विदेश जाना था । एक बार फिर हैप्पी बर्थ डे बोलेत हुए हमने उनसे विदा ली और जब मैं उनके मकान से बाहर निकल रहा था तो ये सोच रहा था कि आखिरकार कब तक तस्लीमा कैदियों जौसी जिंदगी बिताएंगी । कबतक अभिव्यक्ति की आजादी की कीमत उसे अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखकर चुकानी पड़ेगी ।

3 comments:

ओम आर्य said...

bahut hi badhiya aalekh......

भूतनाथ said...

dhatt....tere ki...mujhe to pataa hi naa chalaa......!!

Geetashree said...

तो जनाब..आप छुपे रुस्तम हैं। आपकी रेंज बहुत है..कहां से कहां पहुंचे। बाकी छह लोगो का ज्रिक कर देते तो अच्छा होता.