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Saturday, October 3, 2009

हंस के पन्नों पर जिन का चमत्कार

जनचेतना का प्रगतिशील मासिक हंस ने जब युवा रचनाशीलता पर पर अंक केंद्रित करने का एलान किया था तो पाठकों के साथ-साथ लेखकों में इस अंक को लेकर खासी उत्सुकता थी । हंस संपादक राजेन्द्र यादव ने युवा रचनाशीलता पर केंद्रित अंक के संपादन की जिम्मेदारी युवा दलित लेखक और हंस खेमे के खास सिपहसालार अजय नावरिया को सौंपा । संपाद सौंपने के निर्णय के बारे में राजेन्द्र यादव ने अपने संपादकीय में लिखा- बात तब सूझी जब समय नहीं रह गया था. सहसा अजय नावरिया में अलादीन का वह चिराग दिखाई दिया, जिसे घिसकर जिन पैदा किया जा सकात है । जिन पैदा हुआ और उसके कुछ पूछने से पहले उसे चमत्कार करने का काम सौंप दिया गया - महीने भर में हंस का युवा रचनाशीलता पर केंद्रित अंक तैयार हो जाना चाहिए । य़ादव जी को अपने जिन पर भरोसा था कि वो चमत्कार कर देगा । अतिथि संपादक के रूप में प्रकट हुए यादव जी के जिन ने चमत्का किया भी और महीने भर में ही इतनी सामग्री जमा कर दी कि वो एक अंक में नहीं समा पाया और उसे दो अंकों में समेटना पड़ा । सामग्री इकट्ठा करना और स्तरीय सामग्री जुटाना दो अलग अलग बातें हैं जिसपर हम आगे विचार करेंगे ।

राजेन्द्र यादव को भले ही लगता हो कि अजय नावरिया ने अपने संपादकीय में सौंदर्यशास्त्र को नए ढंग से परिभाषित करने की कोशिश की है लेकिन सिर्फ चैबर्स डिक्शनरी में से एसथेटिक्स का मतलब ढूंढ निकालना ही सौंदर्यशास्त्र को नए सिरे से परिभाषित करना नहीं है । इसके अलावा सौंदर्य़शाश्त्रपर अजय ने अपने संपादकीय में कोई नई बात नहीं की है । कहीं संस्कृत के श्लोकों और कहीं मार्क्स को आधार बनाकर सौंदर्यशास्त्र पर टिप्पणी करते चलते हैं । अंतत: वो इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि - मानव सभ्यता का विकास जरूरत के टुच्चे सिद्धांत के चलते नहीं बल्कि सौंदर्यबोधात्मक चेतना के कारण हुआ है । राजेन्द्र यादव को यह निष्कर्ष नया लग सकता है लेकिन मैं यह फैसला पाठकों के विवेक पर छोड़ता हूं कि वो इस बात को परखें कि इसमें नया क्या है ।

अब बात दोनों अंकों में प्रकाशित कहानियों की । युवा रचनाशीलता पर केंद्रित इस अंक की पहली कहानी पत्रकार गीताश्री की है । प्रार्थना से बाहर नाम की यह कहानी संभवत: गीताश्री की पहली प्रकाशित कहानी है । गीताश्री की यह कहानी बेहद शानदार और पठनीय है । सचमुच में ये युवा रचनाशीलता की प्रतिनिधि कहानी कही जा सकती है । इसमें युवावस्था के दौर हर पहलू, हर भटकाव, हर विचलन पर विचार किया गया है । जब किसी छोटे शहर की लड़की राजधानी पहुंचती है तो वहां की चमक दमक और तेज रफ्तार जिंदगी उसे अपने आगोश में लेने को बेचैन होती है । इस बेचैनी में जब लड़की की महात्वाकांक्षा शामिल होती है तो कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिसकी कल्पना उसने अपने शहर से चलते वक्त तक नहीं की थी । इस कहानी में गीताश्री ने युवाओं के इस मानसिक कॉकटेल को बेहद शिद्दत से उभारा है । लेकिन एक जगह कहानीकार से चूक हो गई है वो ये कि उसने एक उपन्यास की बेहद शानदार थीम को सस्ते में निपटा दिया । धैर्य और श्रमपूर्वक अगर इस विषय पर उपन्यास लिखा जाए और छोटे शहर की लड़कियों के संघर्ष को सूक्ष्मता से विश्लेषित किया जाए तो एक बेहतर कृति सामने आ सकती है । गीताश्री की भाषा में रवानगी है, अनुभव भी है बस जरूरत है धैर्य की । इसके अलावा अश्विनी पंकज की कहानी पेनाल्टी कॉर्नर भी उल्लेखनीय है ।

पहले अंक में यतीन्द्र मिश्र की कविता फैज को पढ़ते हुए में हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सियात पर तल्ख टिप्पणी है । कवि जब कहता है - आज भी कि फैज होते/जितने कि वो हैं अभी भी/ अपनी नज्मों की तरक्कीपसंद आवाजाही में/उम्मीद की तरह सुलगे हुए । यतीन्द्र मिश्र ने कम उम्र में ही कविता की प्रौढता को हासिल कर लिया है । इसके अलावा आकांक्षा पारे की दो छोटी कविताएं भी उल्लेखनीय हैं । आठ कहानियों और कुछ कविताओं के अलावा इस अंक में लेखों की भरमार है । अपने नजरिए में नामवर सिंह और मैनेजर पांडे ने ई भी नई बात नहीं कही है, क्योंकि कोई नई बात पूछी ही नहीं गई है । घिसे पिटे प्रश्नों के रटे-रटाए जबाव । इस अंक में अल्पना मिश्र की कहानी पुष्पक विमान अच्छी है ।

नयी नजर का नया नजरिए के दूसरे अंक में राजेन्द्र यादव का संपादकीय बेहद सुलझा हुआ और आक्रामक भी है । आमतौर पर हंस का संपादकीय बौद्धिकता के के बोझ तले दबा होता है, लेकिन इस बार राजेन्द्र यादव के हमलावर तेवर ने बौद्धिकता को परे रख दिया है । नामवर सिंह पर हमला करते हुए यादव जी लिखते हैं - अपने युवाकाल में यही नामवर थे जो अपनी मेधा और तेजस्विता से सुननेवालों को झकझोर डालते थे । प्लेइंग टु द गैलरी की मानसिकता ने उन्हें कहां का ला छोड़ा है ? इधर उन्होंने यह सोचना भी छोड़ दिया है कि विमोचन वो अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का कर रहे हैं या वरवर राव की ... सत्ता वंदना के साथ थोड़ी बहुत क्रांति भी होती रहे तो क्या मुज़ायका । संकेत हाल ही में नामवर द्वारा भारतीय जनता पार्टी के नेता जसवंत सिंह की किताब के विमोचन करने की ओर है ।

कहानियों के अलावा दूसेर अंक में भी एक परिचर्चा है जिसमें लेखक, पत्रकार, प्रकाशक आदि के विचारों को प्रमुखता दी गई है । नयी नजर का नया नजरिया होने का दावा करनेवाला हंस का दोनों अंक बेहद सामान्य और साधारण अंक है । इसमें युवा रचनाशीलता की झलकभर दिखाई देती है । राजेन्द्र यादव के जिन ने चमत्कार तो किया लेकिन ये चमत्कार रचनाओं को जुटाने भर तक और परिचर्चाओं को आयोजित करने तक ही सीमित रह गया । समय की कमी और महीने भर में अंक निकालने की हड़बड़ी भी साफतौर पर दिखती है । किन इतने कम समय में इतनी ढेर सारी रचनाएं जुटाने के लिए अजय की तारीफ तो करनी ही पड़ेगी ।

3 comments:

Kishore Choudhary said...

मुझे अफ़सोस है कि आप जिस बात को कहना चाह रहे थे उसके बारे में संकेत कर के मौन हो गए हैं, गीताश्री की कहानी क्या पता उपन्यास हो सकती थी या नहीं पर सौंदर्यशास्त्र के सन्दर्भ में आपका प्रश्न जायज है, कुछ लोग और कुछ संस्थान स्वयं को पैमाना समझते हैं जब हैं वे रीते हुए ही.

शरद कोकास said...

तारीफ तो अजय की ही होनी चाहिये और राजेन्द्र यादव जी के लिये कहना चाहिय धन्य है धन्य हैं ।

Sheeba Aslam Fehmi said...

'Nayi nazar ka naya nazariya', October ank tak phaila hua hai, samagri to khoob-khoob jama hui! Ajay ka doosra sampadkiya behtar tha.
Paricharcha me nami-giramiyon se bachna chahiye tha...ya phir Rajendra yadav ko bhi shamil kartey.
Khair...aainda...!