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Tuesday, March 23, 2010

मकबूल पर फिदा क्यों हों ?

जब मैंने मकबूल फिदा हुसैन के भारत छोड़ने और कतर की नागरिकता स्वीकार करने पर सेक्युलरवादियों के दोहरे चरित्र को उजागर करता हुआ लेख हाहाकार पर लिखा तो मेरे विवेक और मेरी समझ,मेरी विचारधारा, मेरी शिक्षा, मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर लोगों ने सवाल किए ।मुझे कालिदास का कुमार संभव पढ़ने की और खजुराहो की प्रसिद्ध मूर्तियां देखने समझने के अलावा प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के बारे में अपने ज्ञान को बढ़ाने का उपदेश दिया गया । मुझे इस बात पर घेरने की कोशिश की गई कि मेरी बातें भगवा ब्रिगेड या संघियों से क्यों मिलती जुलती हैं । जिन लोगों ने मुझे इस तरह की सलाह दी मुझे नहीं मालूम कि उनकी समझ कितनी बेहतर है, उन्होंने कालीदास को कितना पढ़ा है । उन्होंने कितनी बार खजुराहो की मूर्तियां देखी है, लेकिन उन्हें मैं ये बता दूं कि हुसैन ने अपनी जीवनी और अपनी एक पेंटिंग दस्तखत करके मुझे दिए हैं जो मेरे लिए अमूल्य धरोहर हैं । हुसैन की पेंटिंग को समझने का दावा करनेवाले उनके तथाकथित समर्थकों में अभिवयक्ति की आजादी को लेकर घोर चिंता है और उन्हें लगता है कि हुसैन के भारत चोड़कर चले जाने से संविधान द्वारा प्रदत्त इस अधिकार पर हमला हुआ है । उन्हें यह सोचने समझने की जरूरत है कि जब भी कोई अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए ज्यादा स्वतंत्रता की अपेक्षा करता है तो स्वत: उससे ज्यादा उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार भी अपेक्षित हो जाता है । भारत माता का नंगा चित्र बनाने पर हुसैन के खिलाफ दायर याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल ने खारिज कर दिया, साथ ही अपने फैसले में कला और उसकी समझ को लेकर कुछ कठोर टिप्पणियां भी की । लेकिन हुसैन के उन्नीस सौ सत्तर में बनाए गए सरस्वती और दुर्गा की नंगी तस्वीरों के एक दूसरे मामले में दो हजार चार में दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस जे डी कपूर का भी एक फैसला आया था । जस्टिस कपूर ने आठ अप्रैल दो हजार चार के अपने फैसले में लिखा-

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश के करोड़ो हिंदुओं की इन देवियों में अटूट श्रद्धा है- एक ज्ञान की देवी हैं तो दूसरी शक्ति की । इन देवियों की नंगी तस्वीर पेंट करना इन करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना तो है ही साथ ही उन करोड़ों लोगों की धर्म और उसमें उनकी आस्था का भी अपमान है ।
शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा हासिल है जो कि हर नागरिक के लिए अमूल्य है । कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीकों से अभिवयक्त कर सकता है । इन मनोभावों और आइडियाज की अभिवयक्ति को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है । लेकिन कोई भी इस बात को भुला या विस्मृत नहीं कर सकता कि जितनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी उतनी ही ज्यादा जिम्मेदारी भी होती है । अगर किसी को अभिवयक्ति का असीमित अधिकार मिला है तो उससे यह अपेक्षित है कि इस अधिकार का उपयोग अच्छे कार्य के लिए करे ना कि किसी धर्म या धार्मिक प्रतीकों या देवी देवताओं के खिलाफ विद्वेषपूर्ण भावना के साथ उन्हे अपमानित करने के लिए । हो सकता है कि ये धर्मिक प्रतीक या देवी देवता एक मिथक हों लेकिन इन्हें श्रद्धाभाव से देखा जाता है और समय के साथ ये लोगों के दैनिक धर्मिक क्रियाकलापों से इस कदर जुड़ गए हैं कि उनके खिलाफ अगर कुछ छपता है, चित्रित किया जाता है या फिर कहा जाता है तो इससे धार्मिक भावनाएं बेतरह आहत होती है । किसी भी खास धर्म के देवी देवताओं की आपत्तिजनक या नीचा दिखाने वाले रेखाचित्र या फिर पेंटिंग समाज में वैमनस्यता और एक दूसरे के प्रति नफरत पैदा करते हैं ।
अगर यह मान लिया जाए कि इस तरह के कार्य कला का एक नमूना है तब भी इस बात को विस्मृत नहीं किया जा सकता है कि इस तरह के कृत्य जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या फिर अपमानित करने के दायरे में आता है, क्योंकि ये देवी देवता करोड़ों लोगों के अराध्य हैं । एक बार फिर मैं ये कहता हूं कि ये देवी देवता एक मिथक हो सकते हैं लेकिन जब भी इस तरह से नग्न रूप में उनको चित्रित किया जाता है तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं ।
अभिवयक्ति की आजादी के नाम पर किसी व्यक्ति को किसी भी वर्ग या समाज की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ की इजाजत नहीं दी जा सकती है । यह बात याचिकाकर्ता ( हुसैन) को समझनी चाहिए कि वो एक अलग धर्म से संबंधित हैं । अगर याचिकाकर्ता को लोगों की धार्मिक भावनाओं की गहराई का एहसास नहीं है तो वो अपने धर्म या फिर किसी और धर्म पर हाथ अजमाकर देखें तो उन्हें पता चल जाएगा कि धार्मिक भवानाओं की जड़ें कितनी गहरी होती हैं । इस तरह के काम दो अलग-अलग धर्मों को मानने वालों के बीच वैमनस्यता की खाई को और गहरा करती हैं, साथ ही सामाजिक सदभाव और आपसी भाईचारे के बीच बाधा बनकर खड़ी हो जाती है ।
याचिकाकर्ता ने महाभारत की पात्र द्रोपदी, जिन्हें हिंदू धर्म को मानने वाले लोग इज्जत की नजरों से देखते हैं, को भी पूरी तरह से निर्वस्त्र चित्रित किया है, जबकि चीरहरण के वक्त भी द्रोपदी निर्वस्त्र नहीं हो पाई थी । इस पेंटिंग में जिस तरह से द्रोपदी का चित्रण हुआ है वह साफ तौर से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचानेवाला और नफरत पैदा करनेवाला है । अपने बारह पन्नों के जजमेंट में विद्वान न्यायाधीश ने और कई बातें कही और अंत में आठ शिकायतकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी क्योंकि धार्मिक भावनाओं को भड़काने, दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने आदि के संवंध में जो धाराएं (153 ए और 295 ए) लगाई जाती हैं उसमें राज्य या केंद्र सरकार की पू्र्वानुमति आवश्यक होती है, जो कि इस केस में नहीं थी । सनद रहे कि जब केस चल रहा था तो केंद्र में बीजेपी की सरकार थी । ये तो हुई अदालत और न्यायाधीश की बात । आपको एक और उदाहरण देते चलें जिससे कि हुसैन की महानता(?) और उनके पूर्वाग्रह पर से परदा हटता है । हुसैन ने एक बार महात्मा गांधी, कार्ल मार्क्स, अलबर्ट आइंस्टीन और हिटलर की पेंटिंग बनाई जिसमें हिटलर को उन्होंने नंगा दिखाया । जब उनसे इसके बार में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि किसी को अपमानित करने का यह उनका यह अपना तरीका है । इसके बाद मुझे लगता नहीं है कि कुछ कहने की जरूरत है । मार्क्स के अंध भक्तो धर्मनिरपेक्षता और अभिवयक्ति की आजादी के खतरे पर विलाप करना बंद करो । अपनी आंखों पर चढ़ा लाल चश्मा उतारो, तभी तर्क संगत बातें भी होंगी और विमर्श भी ।
( जस्टिस कपूर के जजमेंट के चुनिंदा अंशों के अनुवाद में हो सकता है कोर्ट की भाषा में कोई त्रुटि रह गई हो लेकिन भाव वही हैं )

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