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Wednesday, September 25, 2013

रणनीतियों का खेल

सात महीने बाद लोकसभा के चुनाव होनेवाले हैं । अर्थव्यवस्था की पतली हालत को लेकर सरकार पस्त नजर आ रही है । खाने पीने से लेकर आम जरूरतों की चीजों के दामों में बेतहाशा बढ़ोतरी को लेकर आम आदमी बेहाल है । लेकिन इन विपरीत परिस्थितियों के बीच कांग्रेस पूरी तरह से लोकलुभावन वायदों और कानूनों से मतदाताओं को लुभाने में लगी है । कोयला आबंटन से जुड़ी फाइलों के गायब होने,सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर जमीनों की खरीद फरोख्त में गड़बड़झाले को लेकर संसद के पूरे मॉनसून सत्र में बीजेपी हमलावर थी । लगातार संसद का कामकाज ठप था । विपक्ष की इस घेरेबंदी को नाकाम करते हुए एक हफ्ते के अंदर कांग्रेस पार्टी ने दो अहम बिल लोकसभा से पास करवा कर आम आदमी को एक संदेश दिया कि सिर्फ कांग्रेस ही उनका हित सोचती है । संसद में सोनिया गांधी की दिनभर की मौजूदगी में मैराथन बैठक के बाद खाद्य सुरक्षा बिल का लोकसभा में पारित होना और उसके बाद दशकों पुराने भूमि अधिग्रहण के कानून को बदलनेवाला नया बिल पास करवा कर कांग्रेस ने विपक्ष की रणनीति को ध्वस्त कर दिया है । खाद्य सुरक्षा को लेकर तमाम तरह की आशंकाएं जताईं गईं, उसके डिलीवरी सिस्टम को लेकर सरकार पर आलोचना के तीर भी चले लेकिन लोकसभा में खड़े होकर किसी भी दल ने इस बिल के विरोध की हिम्मत नहीं दिखाई । उसी तरह से जमीन अधिग्रहण बिल पर भी विपक्ष ने लोकसभा में सिर्फ विरोध की रस्म अदायगी ही की । नौ साल से लटके पेंशन बिल को भी पास करवाकर कांग्रेस ने करम्चारियों का दिल जीतने की चाल चली ।
इन बिलों को पास करवाने और उसको प्रचारित करने की कांग्रेस ने जो रणनीति बनाई उसमें भी उनको सफलता मिलती दिख रही है । आम आदमी के बीच यह संदेश गया कि गरीबों को खाने की गारंटी देने वाला कानून सोनिया गांधी की व्यक्तिगत पसंद है और वो हर हाल में उसको लागू करवाना चाहती हैं । उसी तरह से भूमि अधिग्रहण बिल को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का सपना बताकर प्रचारित किया गया । कहना ना होगा कि कांग्रेस दोनों ऐतिहासिक बिलों का सेहरा गांधी सोनिया-राहुल के सर बांधकर चुनावी फायदे की रणनीति बना रही है । इस बात को भी जबरदस्त तरीके से प्रचारित किया जा रहा है कि कांग्रेस (गांधी परिवार पढ़ें) ने आम आदमी को पहले सूचना का अधिकार दिया, फिर रोजगार की गारंटी दी, फिर शिक्षा का अधिकार दिया और अब भोजन की गारंटी दी । सोनिया और राहुल गांधी जब भी बोलते हैं तो इन बिंदुओं पर काफी जोर रहता है । अगर स्वास्थ्य को छोड़ दिया जाए तो यही चार चीजें हैं जो आम आदमी के जीवन में महत्व रखती हैं और बेहतर जिंदगी का भरोसा देती हैं । कांग्रेस यही चाहती है कि उसकी छवि गरीबों के साथ खड़े होने वाली पार्टी के तौर पेश हो । गरीबी हटाओ के नारे के साथ इंदिरा गांधी भी एक चुनाव जीत चुकी हैं । अब आम आदमी को केंद्र में रखकर कांग्रेस जो रणनीति बना रही है वह रणनीति दरअसल इंदिरा गांधी की नीतियों का विस्तार है ।  
उधर अगर हम देश की प्रमुख विपक्षी दल और उनकी रणनीतियों की तरफ देखें तो वह एक अलग ही रास्ते पर चलती नजर आ रही है । भाजपा में प्रधानमंत्री पद के तौर पर मोदी को पेश करने में लंबे समय तक हिचक और विरोध दिखाई देती रही । लगभग आधे दर्जन नेता इस पद पर आंख गड़ाए बैठे रहे , आडवाणी का विरोध सार्वजनिक भी हुआ । इसमें गलत कुछ नहीं है । लोकतंत्र में स्वाभाभिक तौर पर हर नेता की सर्वोच्च पद पर पहुंचने की आकांक्षा होती है, होनी भी चाहिए । लेकिन जिस तरह से भाजपा में इसको लेकर लंबे समय से भ्रम की स्थिति और बयानबाजी होती रही वो एक अनुशासित पार्टी की छवि को तार तार कर गई । कार्यकर्ताओं के बीच जबरदस्त भ्रम फैला । चुनावों को लेकर जो बीजेपी रणनीतियां बना रही हैं या जो सामने आ रही हैं उसके भी उत्साह वर्धक परिणाम नहीं आ रहे हैं । मुस्लिम वोटरों को लुभाने की योजना को लेकर भी पार्टी की दुविधा साफ दिखाई देती है । पहले मुसलमानों को लेकर विजन डॉक्यूमेंट की बात होती है । फिर पिल्ले और सेक्यूलर बुर्के का बयान आता है । इस बीच नरेन्द्र मोदी के सिपहसालार अमित शाह उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के साथ मिलकर मुसलमानों को पार्टी के पाले में लाने की जुगत में हैं । मुसलमानों को लुभाने की राह पर चलते हुए बीजेपी को लगा कि वोटों के ध्रवीकरण से फायदा हो सकता है । आड़ विश्व हिंदू परिषद की ली गई और चौरासी कोसी परिक्रमा की योजना बनाई गई । लेकिन कहावत है ना कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती । विश्व हिंदू परिषद की इस कोशिश को उत्तर प्रदेश की जनता ने नकार दिया । इलके अलावा आम आदमी तक पहुंचने से ज्यादा पार्टी के नेताओं में फेसबुक और ट्विटर पर लोकप्रिय होने की लालसा दिखाई देती है । नेता विपक्ष तक अपनी बात ट्विटकर के जरिए कहती हैं । अटल बिहारी वाजपेयी जैसा जनता से सीधे संवाद करनेवाले नेता का आभाव दिखता है ।
भाजपा को यह बात समझनी होगी की राम मंदिर आंदोलन का दौर बहुत पीछे छूट गया है 2014 के चुनाव में वोटरों की एक ऐसी पीढ़ी वोट डालने जा रही है जिसने उन्माद का वह दौर नहीं देखा है यह पीढ़ी मंदिर मस्जिद को पीछे छोड़कर विकास के रास्ते पर चल चुकी है उन्हें काम करनेवाले नो नानसेंस नेता चाहिए भाजपा की ताकत रही है अनुशासन और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से दीक्षित होकर पार्टी में आए ईमानदार नेता उसको अपनी इस ताकत का एक बार फिर से आकलन करना होगा और 2014 के चुनाव की रणनीति बनानी होगी उन्हें जनता के सामने हर मुद्दे पर एक वैकल्पिक मॉडसल पेश करना होगा। कांग्रेस की नाकामियों के आसरे रहकर चुनाव जीतने का सपना छोड़ना होगा । किसी की नाकामियों पर सवार होकर सफलता कभी किसी को मिली नहीं है ।बीजेपी 2009 के लोकसभा चुनाव में यह गलती कर चुकी है । अगर अब भी बीजेपी के लोग यह समझ रहे हैं कि कांग्रेस की असफलता ही उनके लिए राजपथ का मार्ग प्रशस्त करेगी तो यह उनकी ऐतिहासिक भूल साबित हो सकती है

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