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Saturday, February 7, 2015

कहानी पर अश्लीलता के आरोप


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में स्त्री शक्ति के सत्र में बहुत गर्मागर्मी रही थी । हिंदी की तीन कथाकार उसमें हिस्सा ले रही थी और संचालन कर रहे थे जनसत्ता के संपादक ओम थानवी । कहानी पर बात होते होते इस चर्चा में हिस्सा लेते हुए कथा लेखिका मृदुला बिहारी ने कहा कि इन दिनों स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श हो रहा है और कुछ नई लेखिकाएं अपनी रचनाओं में देह का वर्णन करती हैं जो कि काफी अश्लील होता है । स्त्री के नाम पर देह विमर्श की बात बहुत पुरानी है । राजेन्द्र यादव ने जब हंस पत्रिका के माध्यम से स्त्री विमर्श को उठाया था तब भी उनके उपर और पूरे विमर्श के उपर देह विमर्श का आरोप लगता था । कालांतर में कई बार राजेन्द्र यादव को इस तर्क की बिनाह पर घेरने की कोशिश भी की गई । लेकिन मृदुला बिहारी ने देह विमर्श से आगे जाकर नई पीढ़ी की कहानी पर अश्लील होने का आरोप जड़ा । जाहिर है वहां मौजूद युवा दर्शकों को उनका यह कहना नहीं भाया और उन्होंने विरोध दर्ज करवाया । वहां मौजूद कहानीकार गीताश्री ने मृदुला बिहारी को कठघरे में खड़ा करते हुए उनसे अश्लील लेखन करनेवाली लेखिकाओं के नाम पूछे लेकिन बवाल बढ़ता देख संचालक महोदय ने बहस को अन्य दिशा में मोड़ दिया । दरअसल मृदुला बिहारी ने जो कहा या जो आरोप नई पीढ़ी के लेखकों पर लगाया वह और भी कई लोग लगा चुके हैं । अब वक्त आ गया है कि हिंदी साहित्य में अश्लीलता को परिभाषित किया जाना चाहिए । दरअसल सेक्सुअल और सेंसुअल के बीच में हिंदी के लोग फर्क नहीं कर पाते हैं । आजतक कालिदास पर अपनी कृतियों में अश्लील होने का आरोप नहीं लगा और ना ही विद्यापति पर । दोनों ने अपनी रचनाओं में स्त्री पुरुष संबंधों को उठाया है । हिंदी के आलोचक या कुछ लेखक रचनाओं में शुद्धतावाद की पैरवी करते नजर आते हैं । उन्हें लगता है कि स्त्री पुरुष के संबंधों के वर्णन की एक सीमा होनी चाहिए । जो भी उस लक्ष्मण रेखा के करीब जाता है उसपर अश्लीलता का आरोप लगने लगता है । इसी तरह के शुद्धतावादियों ने मंटो की कहानियों पर भी अश्लीलता के आरोप लगाए थे । दरअसल कहानी में वर्णित चरित्रों के चित्रण और उसके बात व्यवहार को लेकर आपत्ति जताई जताई जाती है । इन आपत्तियों को सुनने और कहानी के अश्लील औप बुरे होने के कोलाहल में मुझे 1961 में मोहन राकेश की एक और जिंदगी की भूमिका में लिखे शब्द याद आ रहे हैं ष मोहन राकेश ने लिखा था कहानी की अच्छाई और बुराई का संबंध इस बात से कदापि नहीं है कि जिन चरित्रों को कहानी में चित्रित किया गया है वे भले हैं या बुरे अपना सरपत काटकर किसी को दे आते हैं या नहीं । यदि चरित्र की उद्दात्तता ही कहानी की कसौटी है तो गुंडों, जुआरियों , वेश्याओं और घूसखोर अफसरों को लेकर लिखी गई संसार की कहानियां रद्दी हैं । चरित्र की श्रेष्ठता ही,कहानी की श्रेष्ठता है तो संसार की सर्वश्रेष्ठ कहानियां आज से हजार साल पहले लिखी जा चुकी है । मोहन राकेश जो बात साठ के दशक में कह रहे थे वो अब भी मौजूं हैं । कहानियों पर अश्लीलता का आरोप लगानेवालों को इस पर विचार तो करना ही चाहिए कि जब वो नई दृष्टि नई चेतना आदि की बात करते हैं तो उसमें अश्लीलता की बात ना जोड़ें । दरअसल अगर हम विचार करते हैं तो यह पाते हैं कि यह नए कथाकारों और पुराने कथाकारों की सोच और पीढ़ियों में अंतर की वजह से ऐसे आरोप लगते हैं । आज से बीस साल पहले का समाज और आज के समाज में बहुत फर्क है । पहले कहानियों में सहजीवन जैसा विषय विरले ही देखने को मिलते थे लेकिन अब कथाकार बहुत बोल्ड होकर इस तरह के विषयों को अपनी कहानी में उठाते हैं । इससे पुरानी पीढ़ी के लेखकों के मन को ठेस पहुंचती है । अश्लीलता का आरोप तो मृदुला गर्ग के उपन्यास कठगुलाब और मैत्रेयी पुष्पा के दो तीन उपन्यासों पर भी लगा था । इन दोनों लेखिकाओं ने अपनी कलम से स्थापित मान्यताओं की धज्जियां उड़ा दी थी लिहाजा यथास्थितिवादियों के पेट में उस वक्त भी दर्द हुआ था और अब भी हो रहा है । आज की जो पीढ़ी है वह अपने मनोभावों और भावभूमि के आधार पर रचनाएं लिखती हैं । उनकी भाषा उत्तर आधुनिक से भी आगे की भाषा है । अश्लीलता का आरोप दरअसल कुंठा और अज्ञानता की उपज है ।  
आज की कहानी को लेकर जो चिंता है वो यह है कि कहानी की कई फैक्ट्रियां खुल गई हैं । इन दिनों हिंदी साहित्य में कहानियां भी बहुतायत में लिखी जा रही हैं । मांग के आधार पर कहानियां लिखने का चलन काफी भढ़ा है । जिस तरह से लेख लिखे जाते हैं उसी तरह से इन दिनों कहानियां भी लिखी जा रही हैं । कहानीकारों पर शब्द संख्या में कहानी लिखने का दबाव बढ़ा है । पत्र-पत्रिकाओं की अपनी सीमाएं होती हैं और उनके पाठक लंबी कहानियां पढ़ना नहीं चाहते हैं लिहाजा वहां से छोटी कहानियों की मांग होती है । हजार डेढ हजार शब्दों की कहानी । इसका नुकसान यह हो रहा है कि नई पीढ़ी के कथाकार छोटी कहानियां लिख रहे हैं जो कि विस्तार से स्थितियों और परिस्थितियों के चित्रण में नाकाम हो जा रही हैं । पात्रों के मनोभावों को उभारने का ना तो वक्त है और ना ही जगह । परिस्थिति के विशाल फलक से सिमटती हुई कहानी घटना प्रधान होती जा रही है । कहीं कहीं तो कहानी और घटनाओं के विवरण का भेद भी मिट जा रहा है । कहानी से कहानीपन ही गायब होता जा रहा है । यह अकारण नहीं है कि हिंदी के कथा प्रदेश में कई कथाकार फॉर्मूलाबद्ध कहानियां लिखकर ख्यात होने की बेचैनी से विचरण कर रहे हैं । इस वक्त हिंदी में कहानीकारों की पांच पीढ़ियां मौजूद हैं । कृष्णा सोबती और शेखर जोशी सबसे वरिष्ठ पीढ़ी के कथाकार हैं । उसके बाद रवीन्द्र कालिया और दूधनाथ सिंह की पीढ़ी, फिर उदय प्रकाश, शिवमूर्ति की पीढ़ी, उसके बाद अखिलेश से लेकर संजय कुंदन की पीढ़ी और इस वक्त युवा लेखकों की पीढ़ी जिसमें गीताश्री, मनीषा कुलश्रेष्ठ से लेकर बिल्कुल नई कथाकार इंदिरा दांगी और सोनाली सिंह कहानी लिख रही हैं । नई कहानी के दौर में हरिशंकर परसाईं ने कभी कहा था कि जीवन के अंश को अंकित करनेवाली हर गद्य रचना, जिसमें कथा का तत्व हो, आज कहानी कहलाती है ।  कालांतर में यह और भी विकसित हुआ लेकिन कहानी से कथा तत्व का लगातार ह्रास होते रहा । नये विषयों और नई भाव-भूमि और नए यथार्थ की आड़ में कहानी का रूप बदला लेकिन यह रूप हर जगह एक सा ही लगने लगा । कहानी के इस एकरूपता ने कहानी से किस्सागोई गायब कर दी । घटना प्रधान और विवरणों से भरपूर कहानियां थोक के भाव से लिखी जाने लगीं । आज हम कहानी के परिदृश्य पर नजर डालते हैं तो ज्ञानरंजन की घंटा, रवीन्द्र कालिया की काला रजिस्टर, दूधनाथ सिंह की रक्तपात, अमरकांत की हत्यारे, शेखर जोशी की कहानी कोशी का घटवार, शिवमूर्ति का तिरिया चरित्तर, सृंजय का कामरेड का कोट के अलावा उदय प्रकाश की कहानियों याद आती हैं । इन कहानियों के बरक्श आज की कहानियों को रखकर देखने पर स्थिति उत्साहजनक नहीं दिखाई देती है । कविता की तरह अब कहानी भी थोक के भाव से लिखी जाने लगी है । प्रसिद्धि की भागदौड़ में कहानी पीछे छूट रही है । वजह की तलाश होनी चाहिए ।
कहानीकारों से नए की मांग भी उनको कुछ भी उलजलूल करने को बाध्य कर देता है । मोहन राकेश ने अपने उसी लेख में कहा था कि कहानी की नवीनता का संबंध अगर वस्तु और चरित्र की नवीनता के साथ जो़ दिया जाए तो संसार में जितनी कहानियां लिखी जा रही हैं उनमें से एक भी नयी कहानी ढूंढ लेना कठिन काम होगा । उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि कहानी की सार्थकता इस बात में नहीं है कि वह किस नये अजायबघर से कौन सा अजूबा लाकर हमारे सामने पेश करती है । तो कहानी का जो दूसरा नुकसान हो रहा है वह है नए विषय की मांग और उसका दुराग्रह । होना यह चाहिए कि आज की कहानी पर उसके हल्के होते चले जाने और बिल्कुल सपाट तरीके से कह देने पर विमर्श होना चाहिए । उसपर सवाल खड़े करने चाहिए जबकि हो यह रहा है कि कहानी या कहानीकार पर अश्लीलता का आरोप चस्पां कर उसको खारिज किया जा रहा है । मूल चिंता यह है ही नहीं । मूल चिंता तो है कहानियों के पाछक का कम होना ।कहानियों से मानवीय पक्ष और हमारे जीवन की बिडंबनाओं के संकेत का खत्म होना । उसका सपाट होना । कहानीकारों के अनुभूतियों का विस्तार हुआ है लेकिन उन अनुभूतियों को जल्दबाजी में पिरोने से हल्का होने का खतरा बढ़ा है । अब भी वक्त है हिंदी कहानी के संभलने का नहीं तो उसे कविता की गति प्राप्त होते देर नहीं लगेगी ।

1 comment:

Rashmi Bhardwaj said...

जेएलएफ में नयी कहानी को लेकर उठे सवालों पर प्रसिद्ध पत्रकार और आलोचक अनंत विजय का यह लेख बहुत प्रासंगिक है और इस बात को आगे अवश्य बढ़ाया जाना चाहिए अगर नयी कहानी को आगे बढ़ना है। अङ्ग्रेज़ी साहित्य की विद्यार्थी होने के नाते कह सकती हूँ कि हिन्दी साहित्य को अभी अपने संकीर्ण खोल से निकलने में लंबा वक्त लगेगा। लंबा समय लगेगा अपने फतवों और गिरहों के पार धड़कती ज़िंदगी को देखने में, उसके स्पंदन को सही तरह से महसूस कर पाने में और जिन्होने भी उसकी नब्ज़ पकड़ने की कोशिश की है , मंटो से लेकर इस्मत चुगताई तक, मैत्रेयी पुष्पा, मृदुला गर्ग से लेकर गीताश्री तक, उन्हें शुरुआत में इसी अश्लील के ठप्पे के साथ खारिज करने की कोशिश की गयी है । लेकिन प्रश्न यह उठता है कि अपने आस पास के परिवेश से आँखें मूँद कर क्या कोई रचनाकार अपने लेखकीय कर्तव्य से मुँह नहीं मोड लेगा। साहित्य कोई फैंटेसी नहीं। फैन्टेसी पर आधारित कोई रचना पाठकीय पहुँच बना भी ले उसकी कोई भावनात्मक अपील नहीं बन सकती। जब हमारे आस पास का परिवेश तेज़ी से बदल रहा। बहुत तेज़ी से बदल रही अच्छे- बुरे की परिभाषा, नैतिक –अनैतिक के खांचे। जब आज कोई नज़रिया अपनी उत्पत्ति के साथ ही उसकी काट ले कर आता है और पहले की तरह हम चीजों को अलग –अलग डिब्बों में नहीं बंद कर सकते ताकि अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल कर सकें तो क्या नयी कहानी से दूर रह पाएगा यह बदलाव ! अगर रहता है या जानबूझ कर किया जाता है तो यह लेखनी से, लेखकीय कर्म से धोखा है । क्या आप देख नहीं पा रहे या देखकर भी अपने शुद्धतावाद के खयाली महल से आदर्शों की कहानियाँ बुनते रहना चाहते हैं कि अब तीसरी –चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे जलते हुए सवाल लेकर आते हैं औए कई बार जिसका कोई उत्तर तक देते नहीं बनता।
अगर रोज महसूस की जाने वाली जिंदा भावनाएं कहानी में दिखाना अश्लीलता है और नयी पीढ़ी की कहानी अश्लील है तो मेरे विचार से इस पूरी नयी पीढ़ी को ही अश्लील मान लिया जाना चाहिए क्योंकि इस पीढ़ी ने अपनी सहज मानवीय भावनाओं को छुपाने के लिए किसी आवरण का सहारा नहीं लिया। इस पीढ़ी ने जीना सीख लिया है या कम से कम जीने के रास्ते बनाना सीख गयी है। इस पीढ़ी को अपनी भावनाओं, अपनी कामनाओं पर शर्म नहीं आती बल्कि वह उसे सहजता से एक्सेप्ट करती है।
एक और बात इसी परिपेक्ष्य में कि इन मॉरल पौलिसिंग के ठेकेदारों को खतरा किस बात से ज्यादा है! कहानी में बढ़ती अश्लीलता से या कि स्त्रियों के खुलकर खुद को अभिव्यक्त कर पाने से जो बिना किसी फतवे के डर के, बिना किसी गढ़ों और मठाधीशों से डरे गढ़ रही हैं नए सपने, खोल रहीं हैं हर बंद रास्ता।
हाँ, इस लेख ने जो सबसे जरूरी मुद्दा उठाया वह यह कि कहानियाँ किसी कारखाने में पैदा नहीं की जा सकती। अगर वह वर्जित क्षेत्रों में बेधड़क प्रवेश करने का माद्दा रखती हैं तो साथ ही उन्हें अपनी बुनावट, अपनी कारीगरी पर भी अपेक्षित श्रम करना पड़ेगा। अंतत: वही कहानी पाठकों के जेहन में रह जाएगी जो उनकी संवेदनाओं से जुड़ेगी। उनकी आत्मा तक पहुंचेगी।