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Tuesday, June 2, 2015

परसेप्शन की लड़ाई में पिछड़ती बीजेपी !

लंबी छुट्टी ले लौटने के बाद कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के व्यक्तित्व और स्टाइल दोनों में बदलाव देखा जा रहा है । वो पहले से ज्यादा मुखर और सक्रिय नजर आ रहे हैं । पहले भी राहुल गांधी आक्रामक नजर आते थे जब यूपी विधानसभा चुनाव के पहले कुर्ते की बांह चढ़ाकर भाषण दिया करते थे या फिर दो हजार तेरह में यूपीए सरकार के दागी राजनेताओं को अभयदान देने के अध्यादेश को फाड़ कर रद्दी की टोकरी में फेंकनेवाला बयान हो । परंतु उस वक्त के राहुल गांधी में निरंतरता की कमी थी । वो कैजुअल पॉलिटिशियन की तरह बयान देकर या फिर कोई पदयात्रा कर गायब हो जाते थे । नजीता यह हुआ कि ये परसेप्शन बन गया कि वो कैजुअल राजनीति करते हैं । इस परसेप्शन को लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने जमकर भुनाया । नरेन्द्र मोदी ने उस वक्त चुनाव प्रचार के दौरान इस बात का मजाक बनाया था, साथ ही उन्होंने मां-बेटे की सरकार का एक जुमला उछाला जो काफी लोकप्रिय हुआ । दरअसल लोकसभा चुनाव में परसेप्शन और जुमलेबाजी दोनों ही लड़ाई में कांग्रेस पिछड़ गई थी । नतीजा सबके सामने है । अब लगता है कि राहुल गांधी ने अपनी लंबी छुट्टी में यही आत्ममंथन किया है । अपने नए अवतार में राहुल गांधी जुमले और परसेप्शन दोनों में बीजेपी पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं । जिस तरह से राहुल गांधी ने बजट सत्र के दौरान सरकार पर नाटकीय अंदाज में हमला बोला उससे कम से कम यही संकेत मिलता है । राहुल गांधी ने सूट बूट की सरकार का जो जुमला उछाला उसकी काट में बीजेपी भले ही सूटकेस सरकार का जुमला चलाने की कोशिश कर रही है लेकिन सूट बूट की सरकार का जवाब नहीं है । दरअसल ये सूट बूट की सरकार को जो जुमला है वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दस लाख के कथित सूट और उनके ड्रेसेज को लेकर गढ़ा गया है । ये जुमला उसी तरह से बीजेपी सरकार से चिपक गया है जिस तरह से यूपीए सरकार पर मां-बेटे की सरकार का जुमला चस्पां हो गया था । ऐसा लगता है कि राहुल गांधी को इस बात का इलहाम हो गया है कि राजनीति में सफल होने के लफ्फाजी जरूरी है । लोगों के बीच जिस बात की चर्चा हो रही हो या फिर सोशल मीडिया पर जो जोक्स चल रहे हों उसको उभार दो । जैसे सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों को लेकर काफी दिनों से ये चल रहा था कि प्रधानमंत्री इन दिनों भारत दौरे पर हैं । राहुल ने उसको अपने अंदाज में उछाला । ये सब ऐसे जुमले हैं जो जनता को लुभाते हैं ।
इसी तरह से अब कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर भी मौजूदगी मजबूत की है । पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से जुड़ा कोई भी विषय ट्विटर पर लगातार ट्रेंड कर जाता था । उनको जवाब सिर्फ आम आमदी पार्टी से ही मिल पाता था । लेकिन अब कांग्रेस भी अपने जुमलों को ट्रेंड करवा ले जाती है । जैसे हाल ही में #मोदीइंसल्ट्सइंडिया ट्विटर पर नंबर वन पर ट्रेंड करता रहा । इसी तरह से सोलह मई को जहां बीजेपी #विक्ट्रीडे ट्रेंड करवा रही थी तो कांग्रेस के लोग #जुमलादिवस को ट्रेंड करवा रहे थे । अब तो राहुल गांधी खुद भी ट्विटर पर आ गए हैं । परंतु ऐसा नहीं है कि वो बीजेपी को सोशल मीडिया पर मात दे पाने की स्थिति में हैं । हां इतना अवश्य है कि कांग्रेस भी अब गाहे बगाहे सोशल मीडिया की जंग में अपनी उपस्थिति तो दर्ज करवाती भी है कभी कभार जीतती हुई भी नजर आती है । मोदी सरकार के सालभर पूरा होते होते कांग्रेस वापस लडा़ई में लौटती नजर आ रही है । कांग्रेस ने जिस तरह से भूमि बिल पर हमलावर रुख अपनाया हुआ है और उसके नेता अपने भाषणों से किसानों के बीच जिस तरह का संदेश दे रहे हैं वो भी बीजेपी के लिए चिंता का सबब हो सकती है । इस देश में ज्यातार चुनाव और राजनीतिक जंग परसेप्शन के आधार पर लड़े और जीते जाते रहे हैं । नारों और जुमलों ने कई सरकारें बनवाई और गिरवाईं । बस नारे के क्लिक करने की जरूरत होती है ।  ज्यादा पीछे नहीं जाते हुए अगर हम देखें तो इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ के नारे पर कई चुनाव जीते, राजा नहीं फकीर है के जुमले पर वीपी सिंह देश के पीएम बने । सुशासन बाबू का तमगा लगाकर नीतीश लगातार चुनाव जीतते रहे हैं।
द इंसाइक्लोपीडिया ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस (1978-83) के पच्चीसवें खंड में इंदिरा गांधी ने कहा था कि कांग्रेस अपने डायनमिक प्रोग्राम्स और आम जनता से जुड़ी नीतियों की बदैलत की अपने आपको बचा सकती है । हम कांग्रेस के सरवाइवल के लिए तो लड़ ही रहे हैं, लेकिन भारत की जनता की लड़ाई भी लड़ रहे हैं ।अब यहां भी यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह से इंदिरा गांधी ने बेहद चतुराई के साथ अपनी लड़ाई को जनता की लड़ाई बताई । नतीजा यह हुआ कि इमरजेंसी के बाद सतहत्तर के चुनाव में बुरी तरह से मात खानेवाली कांग्रेस अस्सी में बहुमत से सरकार में आई । पर इंदिरा की तरह राहुल गांधी में वो राजनीतिक चतुराई है या नहीं इसको साबित होना अभी शेष है । पर जिस तरह से वो इन दिनों परसेप्शन की जंग में बीजेपी को चुनौती दे रहे हैं उससे ये लगता है कि आत्मचिंतन के दौर में उन्होंने इंदिरा गांधी की राजनीति को परखा और उसकी जमीन पर खड़े होकर नए जमाने के हथियारों से हमलावर होना सीखा है ।

2 comments:

रेणु मिश्रा said...

मानीख़ेज लेख। "यह राजनीति नहीं आसां बस इतना समझ लीजै...इक आग का दरिया है और डूब के जाना है"...यही बात राहुल गांधी जी को समझना है।

uma verma said...

अभी भी बहुत कुछ सीखना होगा पप्पू को