हिंदी पत्रकारिता के दौ सौ वर्ष पूर्ण होने पर देश के अलग-अलग हिस्से में गोष्ठियों का आयोजन हो रहा है। हिंदी के पहले समाचारपत्र उद्दंत मार्तंड और उसके संपादक जुगुल किशोर सुकुल से लेकर वर्तमान दौर की पत्रकारिता पर चर्चा हो रही है और इस क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी-अपनी राय और विश्लेषण रख रहे हैं। पत्रकारिता और साहित्य के संबंध पर भी बातें हो रही है। कुछ दिनों पूर्व सहितम् संस्था द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में जाने का अवसर मिला। वहां देश के विभिन्न प्रांतों से आए युवाओं से संवाद हुआ। संवाद का विषय हिंदी साहित्य चुनौतियां और संभावनाएं जैसा था। सहितम् का ये प्रयास युवाओं को लेखन की दुनिया से जोड़ने और उनको एक मंच प्रदान करने का है। युवा लेककों से बात करते हुए साहित्य सृजन पर बात हुई। कुछ दिनों पूर्व हिंदी के वरिष्ठ आलोचक सुधीश पचौरी से कामायनी और छायावाद पर लंबी बात हुई थी। कामायनी और छायावाद को वो इन दिनों बिल्कुल अलग तरीके से व्याख्यित करने का कार्य कर रहे हैं। उनकी स्थापना है कि छायावादी कविता देशप्रेम के भाव से युक्त एक राष्ट्रवादी कविता है। सहितम् की गोष्ठी में युवाओं से संवाद के दौरान सुधीश जी से हुई बातचीत अवचेतन मन में थी। इस कारण जब साहित्य सृजन पर बात होने लगी तो साहित्य सृजन की एक अलग परिभाषा पर चर्चा आरंभ हो गई। साहित्य सृजन को परिभाषित करते हुए बात ज्ञान की पारिस्तिथिकी (इकोसिस्टम आफ नालेज) तक पहुंच गई। स्वाधीनता के पूर्व के साहित्य सृजन को देखकर यही प्रतीत होता है कि अधिकतर साहित्यकरों ने और लेखकों ने अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत किया। विशेषकर यदि हम भक्तिकाल के कवियों को देखें तो उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से एक इकोसिस्टम तैयार किया। ज्ञान के इस इकोसिस्टम से भारत की उस समय की जनता लाभान्वित तो हुई ही संगठित भी हुई। उनके टूटे मनोबल को बल मिलने लगा।
जयशंकर प्रसाद की महान कृति कामायनी को देखें तो उसमें लेखक एक साथ कई स्तरों पर अपनी बात कहते हुए आगे बढ़ते हैं। देवत्व जब दानत्व की ओर बढ़ता है तो प्रलय आती है। प्रलय सबको नष्ट कर देती है। कामायनी का नायक मनु जीवन से हताश निराश हो जाता है। हिमालय चला जाता है। कविता आगे बढ़ती है तो मनु को श्रद्धा मिलती है। श्रद्धा से ज्ञान मिलता है। प्रलय से ज्ञान की जिस पारिस्थितिकी को क्षति पहुंची थी वो उसका परिष्कार होने लगता है। कामायनी में वर्णित स्थितियां और पात्रों के मनोविज्ञान को पकड़ने और उसको विश्लेषित करने का काम आलोचकों का है। लेकिन पत्रकारिता को या ज्ञानार्जन करनेवालों के लिए एक बड़ी व्यवस्था जयशंकर प्रसाद ने अपनी इस रचना में दी। प्रलय के बाद भी अगर आपके पास श्रद्धा है तो आपको ज्ञानार्जन से कोई रोक नहीं सकता है। सृजन क बाधित नहीं किया जा सकता। ज्ञान अर्जन करने के लिए विनयशील होना आवश्यक है। श्रद्धा नाम कामायनी की नायिका का अवश्य है लेकिन उसको प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है। आदर बिना ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है। यही बात तो पत्रकारिता पर भी लागू होती है। पत्रकार भी अपनी लेखनी के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाता है। पूर्व में बने हुए इकोसिस्टम को मजबूत करता है। अब यहां हमें दो बातों पर विचार करना चाहिए कि दो सौ वर्षों की हिंदी पत्रकारिता के किस कालखंड के पत्रकारों ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाने या उसको मजबूत करने का काम किया। स्वाधीनता पूर्व की हिंदी पत्रकारिता को देख लेते हैं। उस कालखंड की पत्रकारिता के आकलन से निष्कर्ष निकलता है कि वो ज्ञान की पारिस्थितिकी को मजबूत करके देश की जनता को जागरूक कर रही थी। उस दौर के साहित्यकार भी यही कर रहे थे। ये अनायास नहीं है कि उस कालखंड में अधिकतर पत्रकार साहित्यकार भी थे या कह सकते हैं कि जो साहित्यकार थे वही पत्रकारिता भी कर रहे थे। क्योंकि दोनों का उद्देश्य समान था।
पत्रकारिता के दो सौ वर्षों के इतिहास को देखें तो भी स्पष्ट होता है कि जो आदर और विनयशीलता के साथ पत्रकारिता कर रहे थे वो शीर्ष पर पहुंचे। आक्रामकता कभी पत्रकारिता को आगे नहीं बढ़ाती है। विनम्र होकर आदर के साथ प्रश्नों के उत्तर ढूंढेंगे तो बेहतर उत्तर मिलने की संभावना बनेगी। संभव है कि उत्तर उस तरह का मिले कि ज्ञान की पारिस्थितिकी में कुछ जोड़ें। वहीं अगर आक्रामकता के साथ पत्रकारिता की जाती तो पूर्वज पत्रकारों द्वारा बनाई गई ज्ञान की पारिस्थितिकी कमजोर होने का खतरा रहता है। पत्रकारिता में हमेशा से ये कहा जाता है कि पत्रकारों को प्रश्नाकुल होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए। परंतु प्रश्नाकुलता के साथ विनयशीलता होनी चाहिए। पत्रकारिता के जरिए जब ज्ञान के इकोसिस्टम को बल देने की बात होती है तो स्मरण आता है इस वर्ष तीन खंडों में प्रकाशित समग्र भारतीय पत्रकारिता। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित लेखक विजयदत्त श्रीधर ने श्रमपूर्वक इसको तैयार किया है। विजयदत्त क्षीधर पत्रकार रहे हैं। उन्होने भोपाल में माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान की स्थापना भी है। ये अपनी तरह का एक अनोखा संग्रहालयय है। वहां शोधार्थियों के लिए प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। इसपर फिर कभी विस्तार से चर्चा। समग्र भारतीय पत्रकारिता के तीन खंडों को देखने के बाद ये विश्वास पक्का होता है कि पत्रकार अपनी पत्रकारिता के माध्यम से ज्ञान का इकोसिस्टम ही बनाते रहे हैं। तीन खंडों के 49 अध्यायों में विजयदत्त श्रीधर ने बेहद श्रमपूर्वक भारतीय पत्रकारिता की विकास यात्रा को दर्शाने का प्रयास किया है। वो इन तीन खंडो को समग्र भारतीय पत्रकारिता की सन 1780 से लेकर 1948 तक की 128 वर्ष की यात्रा कथा बताते हैं। उनकी इस कृति में हिंदी भाषा के बदलते स्वरूप को भी देखा-समझा जा सकता है। विजयदत्त श्रीधर ने जहां भी पत्र-पत्रिकाओं के उद्धरण दिए हैं वहां उसकी भाषा को यथावत रखा है। इस कृति में पाठकों को तमिल, मलयालम, तेलुगु, ओडिया और अंग्रेजी पत्रकारिता के बारे में भी अलग अलग अध्यायों में जानकी मिलती है। पुस्तक में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की पत्रकारिता और उनकी ओजस्वी वाणी को भी रेकांकित किया गया है।
विजयदत्त श्रीधर की इस पुस्तक से ये स्पष्ट होता है कि किस तरह से भारतीय पत्रकारिता ने ज्ञान का इकोसिस्टम बनाया। श्रीधर जी स्वाधीनता के बाद रुक जाते हैं। आज इस बात की पड़ताल करने की आवश्यकता है कि स्वाधीनता के बाद किस विचार और किस प्रचार ने भारतीय पत्रकारिता निर्मित ज्ञान के इकोसिस्टम को बाधित या खंडित करने का प्रयत्न किया। 1948 के बाद भारतीय पत्रकारिता में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए। 1962 के युद्ध में चीन से पराजय, 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा और उसके बाद नागरिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त होना, 1991 में आर्थिक उदारीकरण का आरंभ होना। पत्रकारिता और पत्रकार ने नई तकनीक आई, चुनौतियों के साथ संभावनाएं आईं। इसो पत्रकारिता ने किस तरह से लिया। इस पर विस्तार से लिखे जाने की आवश्यकता है। पत्रकारिता किस तरह से ज्ञान के इकोसिस्टम से दूर होकर राजनीतिक परिवार के इकोसिस्टम को मजबूत करने में लग गई। ये भी देखा जाना चाहिए।

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