प्रतिवर्ष जनवरी के दूसरे सप्ताह में जयपुर में एक आयोजन होता है, जनवरी आफ जयपुर। इस आयोजन में राजस्थान की संस्कृति का उत्सव मनाया जाता है। राजस्थान से जुड़े कलाकार एक सत्र में प्रस्तुति देते हैं। दूसरे सत्र में या तो राष्ट्रीय स्तर का कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करता है या फिर किसी ख्यात व्यक्ति से बातचीत होती है। जनवरी आफ जयपुर में आमंत्रित अतिथि राजस्थानी व्यंजन का भी आनंद उठाते हैं। जनवरी आफ जयपुर का आयोजन संस्कृतिकर्मी संदीप भूतोड़िया-मंजरी भूतोड़िया और सौरभ कक्कड़-विनी कक्कड़ करते हैं। इस वर्ष 11 जनवरी को जय महल पैलेस में जनवरी आफ जयपुर का आयोजन हुआ। सबसे पहले पद्मश्री से सम्मानित लोकगायक अली और मोहम्मद गनी ने अपने गीतों से समां बांधा। इसके बाद प्रख्यात पटकथा लेखक-गीतकार जावेद अख्तर से बातचीत का सत्र हुआ। जावेद अख्तर से बातचीत नृत्यांगना शिंजिनी कुलकर्णी ने की। संवाद के बाद प्रश्नोत्तर का सत्र था। प्रश्न करने के लिए तीन चार हाथ उठे जिसको जावेद साहब देख नहीं पाए। उन्होंने टिप्पणी कर दी कि पहले प्रश्न पूछने में लोग हिचकते हैं। एक-दो प्रश्नों के बाद सिलसिला चल निकलता है। मैंने पहले प्रश्न के लिए हाथ खड़ा किया था। जावेद अख्तर हमको देख नहीं पा रहे थे तो उन्होंने पूछा कि आप किधर हैं। मैंने खड़े होकर कहा कि मैं आपके राइट में हूं तो तपाक से टिप्पणी की आप तो जानते ही हैं कि राइट वालों से मेरा जरा कम ही....। मैंने जावेद अख्तर से जानना चाहा था कि, क्या फिल्म लेखक के लेखन पर उसके संस्कार, उसके पारिवारिक परिवेश और उसके धार्मिक या मजहबी मान्यताओं का प्रभाव पड़ता है। जावेद अख्तर ने इस प्रश्न को और खोलने को कहा।
फिल्म शोले और दीवार का उदाहरण देकर प्रश्न के धागे खोले गए। फिल्म शोले के एक दृष्य में हेमा मालिनी भगवान शंकर से अरनी मन की बात करती है तो धर्मेन्द्र प्रतिमा के पीछे से भोंपू से आवाज बदलकर उत्तर देता है। अमिताभ बच्चन की एंट्री होती है और वो हेमा मालिनी को प्रतिमा के पीछे ले जाकर धर्मेन्द्र की असलियत दिखाता है। फिल्म दीवार में नायक जब मंदिर में जाता है तो भगवान से कहता है कि आज खुश तो तुम बहुत होगे। अन्य दृष्य में अमिताभ बच्चन पुलिस से बचकर भागते हैं और शशि कपूर उसका पीछा करते हैं। एक जगह वो ग्रिल से टकरा कर गिरते हैं और 786 का बिल्ला छिटक जाता है। अमिताभ बिल्ला उठाने का प्रयास करते हैं। पुलिस पीछा कर रही होती है लिहाजा वो बिल्ला थोड़कर भागते हैं। शशि कपूर चेतावनी के बाद गोली चला देता है जो अमिताभ की बांह पर लगता है। इसमें लेखक की धार्मिकता का प्रभाव दिखता है या नहीं। इतना सुनते ही जावेद साहब लगभग भड़क से गए और अपनी पुरानी दलीलें देने लगे कि आप क्या मुल्क को सीरिया जैसा बनाना चाहते हैं। आप भी क्या उनकी तरह होना चाहते हैं। उनकी बातों को सुनकर तालियां बजती थीं। मैंने सहजता से कहा कि आपके जुमलों पर तालियां बज सकती हैं लेकिन प्रश्न अनुत्तरित है। उनको लगा कि मैं उनकी लोकप्रियता पर टिप्पणी कर रहा हूं जबकि मैं तो बगैर लाउड हुए अपने प्रश्न का उत्तर चाहता था। जावेद साहब लंबी तकरीर करने लगे और दुनिया का तमाम कट्टरपंथी और मजहबी मुल्कों का उदाहरण देने लगे। प्रश्न के उत्तर पर अंत तक नहीं आए। जब मैंने उनको फिर से प्रश्न पर लाने की कोशिश की तो उन्होंने मुझे क्रास क्वेश्चनिंग ना करने की नसीहत देकर अपनी बात जारी रखी। गाजा पर बच्चों पर बम बरसाने की बात तक चले गए। अंत में कहा कि अगर आज उनको वो दृष्य लिखने होते तो नहीं लिखते। बदतमीजी न हो जाए इस कारण मैंने प्रश्न के उत्तर जानने की अपेक्षा नहीं की और बैठ गया। प्रश्नोत्तर के पूरे सत्र में जावेद साहब मेरे प्रश्न से परेशान से दिखे। मेरी मंशा उनको परेशान करने की नहीं बल्कि एक वरिष्ठ लेखक से ये जानने की थी कि लेखक का लेखन किन बातों से प्रभावित होता है। सत्र की समाप्ति के बाद एक महिला मेरे पास आईं और बोलीं कि जावेद साहब को गाजा के बच्चों पर बमबारी की याद रही लेकिन पहलगाम में धर्म पूछकर हत्या करने की वारदात उनके जेहन में नहीं थी।
जावेद अख्तर ने प्रश्न का उत्तर टाल तो दिया लेकिन यह प्रश्न तो हिंदी सिनेमा के सामने अब भी है। क्या कारण रहा कि जब हिंदी फिल्में आरंभ हुई तो दादा साहब फाल्के से लेकर उनके बाद के कई वर्षों तक भारतीय संस्कृति के अनुसार नायक होते रहे। हिंदू देवी देवताओं और धार्मिक प्रतीक चिन्हों का उपहास नहीं उड़ाया गया। बाद में जब सलीम जावेद की जोड़ी आई तो भगवान और हिंदू धर्म के प्रतीक चिन्हों का उपहास आरंभ हुआ। उनके बाद के लेखकों ने भी ऐसा किया। तिलकधारी पुजारी को खलनायक के तौर पर चित्रित किया जाने लगा। शोले में तो अजान की आवाज सुनकर अपने बेटे की मृत्यु का गम छोड़कर पात्र उस ओर उन्मुख हो जाता है। हिंदू नायक भी मंदिरों में जाकर भगवान के सामने अपने मन की भड़ास निकालने लगा। नास्तिक टाइप के नायक गढ़े गए, जो मंदिर की सीढ़ियों पर चढ़ने में हिचकते दिखे। फिल्म मि. नटवरलाल में भी नायक भगवान कृष्ण की तस्वीर सामने जिस तरह से संवाद बोलते हैं उसको भी ध्यान में रखा जाना चहिए। इसको अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता के तौर पर रेखांकित किया जाता रहा। प्रश्न यही है कि अभिव्यक्ति की वो कथित स्वतंत्रता सिर्फ हिंदू देवी-देवताओं और हिंदू धर्म से जुड़े लोगों को लेकर ही क्यों दिखती है। किसी और मजहब को लेकर उस तरह से किसी संवाद लेखक ने मजाक किया हो याद नहीं पड़ता। मेरी जिज्ञासा बस इतनी सी थी और जावेद अख्तर जैसे वरिष्ठतम फिल्म लेखक से अपेक्षा भी थी कि वो बेलौस अंदाज में अपनी बात रखते। पर ऐसा हो न सका।
समय का पहिया घूमता रहा और भगवान का उपहास उड़ाने की प्रवृत्ति बढ़ती चली गई। हद तो ये हुई कि उस समय से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने भी इस तरह की प्रवृत्ति पर किसी तरह का रोक लगाने की कोशिश नहीं की। फिल्मों के बाद जब ओटीटी का युग आरंभ हुआ तो उसमें भी यही प्रवृत्ति दिखाई देने लगी। ओटीटी प्लेटफार्म पर चलनेवाले वेबसीरीज में तो मंदिरों के अंदर चुंबन दृष्य तक दिखाए जाने लगे। तर्क खजुराहो की मूर्तियों में भी इस तरह नायक नायिका को दिखाया गया है। धार्मिक ग्रंथों से कहानियां उद्धृत कर इस प्रवृत्ति का बचाव किया गया। तर्क गढे गए कि हिंदू धर्म और उसके अनुयायी बहुत उदार हैं इस कारण वो अपने अराध्य को लेकर किसी तरह की उपहासजनक टिप्पणी से आहत नहीं होते हैं। देश में बौद्धिक जगत में ऐसी विचारधारा का दबदबा था जिसमें कहा जाता था कि धर्म तो अफीम है। हिंदू धर्म पर उपहासजनक टिप्पणी या संवाद करनेवालों को प्रगतिशील कहा जाने लगा। धर्म और आस्तिकता की बात करने और उसके चिन्हों का सार्वजनिक उपयोग करनेवालों को दकियानूसी कहा गया। प्रश्न वही कि ऐसा जानबूझकर किया गया या लेखक के सामाजिक और मजहबी परिवेश ने उससे ऐसा करवाया।

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