बीते वर्ष जनवरी में दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने साहित्यकारों, कवियों और पत्रकारों के लिए पिछले तीन साल के पुरस्कारों की एक साथ घोषणा की थी। दिल्ली के तत्कालीन मंत्री सौरभ भारद्वाज ने उस समय बड़ी-बड़ी बातें की थीं, कहा था कि पुरस्कारों की घोषणा से हिंदी अकादमी ने साहित्य के क्षेत्र में मील का पत्थर दोबारा स्थापित किया है। जो पुरस्कार किन्हीं कारणों से पिछले छह साल से नहीं दिए गए थे, उन्हें अकादमी ने फिर से शुरू किया है।सौरभ भारद्वाज ने किस मील के पत्थर की बात की थी पता नहीं। हिंदी अकादमी के पुरस्कार की घोषणा अगर मील का पत्थर थी तो उस मील के पत्थर को ढंका भी तो उनकी यानि आम आदमी पार्टी की सरकार ने ही था। 2018-19 के बाद से पुरस्कारों की घोषणा और उसका वितरण भी तो सौरभ भारद्वाज की पार्टी की सरकार ने ही रोका था। सौरभ भारद्वाज को क्या पता था कि वो जिसे वो मील का पत्थर बता रहे हैं वो भी घोषणा मात्र होकर रह जाएगी। हिंदी अकादमी ने पुरस्कारों की घोषणा तो की लेकिन पुरस्कार अर्पण समारोह नहीं हो सका। दिल्ली में विधानसभा चुनाव घोषित हो गए। विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी हार गई। भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। सत्ता बदली तो हिंदी अकादमी में भी बदलाव देखने को मिला। हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष और हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा वहां से हटे। सुरेन्द्र शर्मा ने भी पुरस्कारों की घोषणा के समय मंत्री के साथ बैठकर दावा किया था कि पिछले तीन साल के पुरस्कारों की घोषणा से देशभर में हिंदी का मान बढ़ेगा। घोषणा करके पुरस्कार नहीं दे पाने से हिंदी अकादमी का मान बढ़ा या उसकी साख प्रश्नांकित हुई ये तो सुरेन्द्र शर्मा ही बता सकते हैं।
पिछले वर्ष फरवरी में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो रेखा गुप्ता मुख्यमंत्री बनीं और कपिल मिश्रा को भाषा और संस्कृति विभाग मिला। इस विभाग के अंतर्गत ही हिंदी और अन्य भाषाई अकादमियां आती हैं। नई सरकार बने लगभग 11 महीने होने को आए लेकिन आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा घोषित पुरस्कार अभी तक नहीं बंट सके। विधानसभा चुनाव के ठीक पहले आम आदमी पार्टी की सरकार ने जिनका चयन पुरस्कार के लिए किया था उनमें भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोधियों का भी नाम था। अगर पुरस्कार सूची से नई सरकार या नए मंत्री को कोई आपत्ति है तो उसको रद कर देना चाहिए। उन वर्षों के पुरस्कार की घोषित सूची को रद करने से अनिश्चितता की स्थिति दूर होगी। पूर्व में भी कई-कई वर्ष तक पुरस्कार नहीं दिए गए इस कारण किसी विवाद की आशंका भी नहीं है। अधिक से अधिक क्या होगा, अशोक वाजपेयी कहीं लिख-बोल देंगे क्योंकि उनका नाम श्लाका सम्मान के लिए घोषित हुआ था। जब से अशोक वाजपेयी राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए हैं तब से उनके कहे या लिखे का उतना असर नहीं रहा क्योंकि उनकी निष्पक्षता संदिग्ध हो गई। ये तो हुई पुरस्कार की बात लेकिन अगर हिंदी अकादमी और अन्य भाषाई अकादमियों के काम-काज पर नजर डालें तो स्थिति बदलतर नजर आती है।
हिंदी अकादमी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसकी स्थापना का उद्देश्य हिंदी भाषा साहित्य और संस्कृति से संबंधित कार्यक्रमों को कार्यरूप में लाना है। इसके अन्तर्गत दिल्ली के प्राचीन तथा समकालीन उत्कृष्ट साहित्य का संकलन, परिरक्षण तथा उसके सृजन के लिए प्रोत्साहन का कार्य सम्मिलित है। जिससे कि दिल्ली के साहित्यकारों को उत्कृष्ट साहित्य के सृजन के लिए प्रोत्साहन मिले, पुराना और दुर्लभ साहित्य सुरक्षित किया जा सके और नये साहित्यकारों के लिए योजनाओं और नयी दिशाओं की खोज की जा सके। जब वेबसाइट पर ही इन उद्देश्यों की पूर्ति के उपक्रम खोजने लगा तो वहां दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली की मुख्यमंत्री का चित्र- परिचय दिखा। जब हमने नया क्या है सेक्शन में क्लिक किया तो बहुत ही दिलचस्प जानकारियां मिली। पहली जानकारी दो दिवसीय बाल नाट्य उत्सव कलरव -2 के लिए प्रविष्टियां आमंत्रित करने की थी। इसके लिए अंतिम तिथि 25 अक्तूबर 25 थी। यानि उसके बाद नया कुछ हुआ नहीं। उसके पहले समाचार पत्रों की रद्दी बेचने और सचिव के प्रभार देने की जानकारी है। सबसे दिलचस्प है पथ-प्रदर्शन का खंड। इसमें संचालन समिति पर क्लिक करने पर कोई जानकारी नहीं मिलती है। प्रतीत होता है कि नई सरकार गठन के बाद हिंदी अकादमी की संचालन समिति नहीं बन पाई है। संचालन समिति नहीं बन पाई तो संचालन कैसे हो। इसी खंड में दायित्वों की सूची है जिसमें सचिव, सहायक सचिव और मुख्य लेखाधिकारी की जानकारी है। सिर्फ तीन की। हिंदी अकादमी का सरकारी उपयोग शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते ही आरंभ हो गया था। अरविंद केजरीवास की सरकार के समय तो ये पूरी तरह से सरकार की प्रचार एजेंसी में तब्दील हो गई। आरंभिक दिनों में केजरीवाल की पार्टी से जुड़े मंचीय कवि इसको चलाते थे। उसी दौर में कपिल मिश्रा उसके बाद मनीष सिसोदिया और सौरभ भारद्वाज ने इसको संभाला। हो सकता है कि अन्य मंत्रियों के पास भी हिंदी अकादमी का दायित्व रहा हो। शीला दीक्षित के समय जब नानकचंद इसके सचिव थे तो उस दौरान हिंदी अकादमी ने काफी कार्य किया था। उसके बाद से निरंतर इस संस्था की साख और कार्य छीजते चले गए। अब न तो इस संस्था का उपाध्यक्ष है और ना ही संचालन समिति। भगवान भरोसे है इनका कार्य।
सिर्फ हिंदी अकादमी ही क्यों अगर मैथिली-भोजपुरी अकादमी को देखें तो उसकी हालत और भी दयनीय है। पूर्वांचलियों को प्रसन्न करने के लिए 2008 में इस अकादमी की स्थापना की गई थी। विधानसभा चुनाव के आसपास सभी दलों को पूर्वांचलियों की याद आती है लेकिन उसके बाद भूल जाते हैं। मैथिली और भोजपुरी अकादमी का उद्देश्य मैथिली और भोजपुरी भाषाओं और साहित्य संस्कृति का उन्नयन और पल्लवन। जब इस संस्था का ही उन्नयन नहीं हो पाया तो भाषा, साहित्य और संस्कृति का उन्नयन कैसे हो पाता। ये अकादमी भी संचालन समिति और पूर्णकालिक कर्मचारियों की कमी से मरणासन्न है। दिल्ली के भाषा और संस्कृति विभाग और उसके मंत्री कपिल मिश्रा को प्राथमिकता के आधार पर इन अकादमियों पर ध्यान देना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी तो कला और संस्कृति के काम करने की प्रतिबद्धता निरंतर दोहराती रहती है बावजूद इसके दिल्ली की इन अकादमियों की स्थिति कुछ और ही कहानी कह रही है। दिल्ली सरकार के सामने अपनी पूर्ववर्ती सरकार की इन अकादमियों के प्रति बरती गई उदासीनता को दूर करने की चुनौती है। इस उदासीनता के कारण ही इन अकादमियों की दुर्दशा हुई। अकादमियों को मूल स्वरूप में लाने का काम करना होगा। साहित्य और संस्कृति की बदलती प्रवृत्तियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की चुनौती है। सरकार की प्रचार मशीनरी के तौर पर काम करनेवाली इन अकादमियों को इससे मुक्त करके भाषा और संस्कृति के लिए गंभीर कार्य करने पर ध्यान देना होगा। यह सही है कि साहित्य कला के उन्नयन आदि के कार्यों से वोट नहीं मिलते लेकिन कई बार यही सेगमेंट वोटर की मानसिकता तय कर देते हैं।
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