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Saturday, February 21, 2026

साहित्य से छंटती व्यक्तिगत विवादों की धुंध


इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स पर उपभोक्ताओं के व्यतीत किए जानेवाले समय को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। इन प्लेटफार्म्स की सार्थकता को लेकर पक्ष विपक्ष के तर्क सामने आते रहते हैं। फेसबुक से लेकर एक्स और इंस्टा जैसे प्लेटफार्म पर डाली जानेवाली सामग्री चर्चा कें केंद्र में रहती है। हिंदी साहित्य के अधिकतर लोग फेसबुक पर अपनी मन की बात लिखते हैं। कोई पुस्तकों के बारे में बताता है तो कोई वैचरिक वातें करता है। कुछ कवि अपनी कविताओं का पाठ करके वीडियो फेसबुक पर डालते हैं। स्मार्ट फोन का चलन बढ़ने से और फोन के कैमरे की क्वालिटी बेहतर होने से वीडियो पोस्ट करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कई बार फेसबुक पर इतिहास की घटनाओं की जानकारी भी मिल जाती है। कोई चर्चित साहित्यिक प्रसंग और उसपर हुई चर्चा भी अचानक आपके सामने आ जाती है। पिछले दिनों फेसबुक पर स्क्रोल करते समय एक ऐसे ही विवादित प्रंसग की जानकारी मिली। नामवर सिंह और उनके अनुज काशीनाथ सिंह की टिप्पणी और उसपर महाश्वेता देवी का प्रतिकार। ये पोस्ट कोलकाता से निकलनेवाली पत्रिका लहक के संपादक निर्भय देव्यांश की थी। इस पोस्ट में नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह के बयान की चर्चा थी।  उक्त पोस्ट में लिखा था कि लखनऊ में एक पत्रिका के कार्यक्रम में नामवर सिंह ने साहित्यकारों की हैसियत सत्ता के समक्ष कांता यानि जोरू जैसी बताया। वहीं उनके कहानीकार भाई काशीनाथ सिंह ने कहा था कि साहित्यकार गांव के सिवान पर मुंह ऊपर उठाकर भूंकता हुआ कुकूर है। इसी पोस्ट के नीचे बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी की अंग्रेजी में लिखी हस्तलिखित प्रतक्रिया थी। जिसका अनुवाद है, मैं यह जानकर बहुत आहत हुई कि सम्मानित लेखक नामवर सिंह ने कहा है कि आज के लेखक सत्ता के समझ लार टपकानेवाले कुत्ते हैं, वे रखैल और जोरू की तरह हैं। उनके छोटे भाई भी उनके इस बयान से सहमत हैं। महाश्वेता देवी ने लिखा कि 29.4.2012 के समाचारपत्र में प्रकाशित समाचार को पढ़कर उनका दिल टूट गया। उन्होंने आगे लिखा कि वो बचपन से ही एक ऐसे भारत में विश्वास करती हैं जिसमें हिंदी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, उर्दू व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का साझा विकास हो। यह संपदा सिर्फ भारत के पास है। महाश्वेता देवी ने अपनी हस्तलिखित नोट पर 4 मई 2012 की तिथि अंकित की थी। 

नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह ने अगर इस तरह का बयान दिया था, महाश्वेता जी के पत्र से तो यही लगता है, तो यह बेहद आपत्तिजनक था साथ ही महिला और साहित्यकार विरोधी भी। हिंदी के शीर्ष आलोचक और प्रमुख कथाकार अगर अपने साथी लेखकों के बारे में इस तरह की बातें करेंगे तो अन्य भाषा के साहित्यकारों की बीच हिंदी जगत की क्या छवि बनी होगी। इस बात की कल्पना की जा सकती है। दरअसल हिंदी में ये देखा जाता है कि जो साहित्यकार शीर्ष पर पहुंच जाते हैं वो अपने साथी साहित्यकारों को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। उनका श्रेष्ठता बोध उनको अहंकारी बना देता है। अशोक वाजपेयी से लेकर रवीन्द्र कालिया तक इसके शिकार रहे हैं। राजेन्द्र यादव इसके अपवाद रहे हैं। वो लेखकों पर तीखा हमला करते थे, नाम लेकर करते थे, लेकिन कभी भी वो समान्यीकरण के शिकार नहीं होते थे। वो इस तरह की गर्वोक्ति नहीं कहते थे कि हिंदी के लेखकों को हवाई जहाज पर मैंने चढ़ाया। जब मैंने निर्भय की फेसबुक वाल पर ये पोस्ट देखी तो मुझे दशकों पहले एक चैनल पर करीब 20 वर्ष हुई परिचर्चा का स्मरण हो उठा। इस परिचर्चा में रवीन्द्र कालिया, ज्ञानरंजन, मैनेजर पांडे, विभूति नारायण राय, संतोष भारतीय,अखिलेश और मैंने हिस्सा लिया था। चर्चा का विषय था हिंदी साहित्य में विवादों का गिरता स्तर। हिंदी साहित्य में विवादों के स्तर पर होते हुई चर्चा साहित्य के सत्ता केंद्रों तक पहुंच गई। संतोष भारतीय ने रवीन्द्र कालिया से दिल्ली के साहित्यिक मठाधीश के बारे में जानना चाहा।  रवीन्द्र कालिया ने चर्चा का रुख मेरी तरफ मोड़ते हुए कहा था कि अनंत उन मठाधीशों को जानते हैं। अनंत उनको साहित्य का ब्रह्मा विष्णु महेश कहते हैं। मैं उन्हें ऐसा नहीं मानता बल्कि मैं उन तीनों को साहित्य का कफ, पित्त और वात कहता हूं। चर्चा में शामिल सभी लोगों को पता था कि कालिया जी नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव के बारे में बोल रहे थे। आज से करीब तीस वर्ष या उसके भी पहले हिंदी साहित्य में नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव की तूती बोलती थी। नामवर सिंह नियमित अंतराल पर विवादित बयान देते रहते थे। कई बार उन बयानों से लक्षित साहित्यकार या साहित्य समूह आहत भी होते थे। उनके विरुद्ध प्रदर्शन आदि भी होते थे। नरेन्द्र कोहली जी तो जीवनपर्यंत नामवर सिंह के आलोचक रहे और साहित्य को समग्रता में नहीं देखने की प्रवृत्ति के प्रवर्तक भी मानते रहे। अपनी विचारधारा के औसत लेखकों को बढ़ावा देनेवाले और विपरीत विचारधारा वाले लेखकों को हाशिए पर रखनेवाले मठाधीश।

एक बार फिर लौटते हैं नामवर और काशीनाथ सिंह के उक्त बयान पर जिसमें साहित्कारों पर अपमानजनक टिप्पणी की गई। उस टिप्पणी से दोनों भाइयों की मानसिकता का भी संकेत मिलता है। महाश्वेता देवी ने बहुत सधे हुए तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उस समय फेमिनिज्म का इतना जोर नहीं था अन्यथा नामवर सिंह के कथन पर उनकी जमकर आलोचना होती। प्रश्न ये उठता है कि साहित्य में इस तरह की टिप्पणियां शीर्ष पर माने जानेवाले साहित्यकार क्यों करते थे। दरअसल नामवर सिंह जिस कथित प्रगतिशील विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे उसमें महिलाओं को लेकर एक विचित्र भाव था। नामवर सिंह की उक्त टिप्पणी पर याद पड़ता है शायर कैफी आजमी की पत्नी शौकत कैफी से जुड़ा एक प्रसंग। शौकत कैफी ने अपनी किताब ‘यादों की रहगुजर’ में लिखा है कि शादी के बाद वो मुंबई (तब बांबे) में एक कम्यून में रहती थीं। उनको एक बेटा हुआ जो टी बी के कारण काल के गाल में समा गया। शौकत पूरी तरह से टूट गई थीं। दुख से उबरने की कोशिश में उनको पता चला कि वो फिर से मां बनने वाली हैं। अपनी इस खुशी को शौकत ने कम्यून में साझा की । तब शौकत कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी। पार्टी को जब इसका पता चला तो पार्टी ने शौकत से गर्भ गिरा देने का फरमान जारी किया। ये कैसी अमानवीय विचारधारा है। महिलाओं को लेकर कितना असंवेदनशील रवैया। हिंदी के शीर्ष आलोचक नामवर सिंह उसी विचारधारा के लंबे समय तक ध्वजवाहक रहे थे।  

हिंदी में विवादों की एक लंबी परंपरा रही है लेकिन साहित्यिक सत्ता में जब से मठाधीशी आरंभ हुई तब से व्यक्तिगत टिप्पणियां अधिक होने लगी। व्यक्ति केंद्रित कहानियां पहले से अधिक लिखी जाने लगी। हंस पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के बाद इस प्रवृत्ति को मंच मिला। उदय प्रकाश ने कई ऐसी कहानियां लिखीं जिसके केंद्र में साहित्यकार लेखक थे। अशोक वाजपेयी ने साथी लेखकों पर कई व्यक्तिगत टिप्पणियां कीं। नामवर जी को अचूक अवसरवादी कहा। आज कम से उस तरह के विवाद साहित्य जगत में नहीं हैं। अपमानित करने की मंशा से होनेवाले विवादों का धुंध झंट सा गया लगता है।              


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