जनवरी में देश के विभिन्न हिस्सों में कई तरह से साहित्यिक आयोजन हुए। दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला का आयोजन, छत्तीसगढ़ की राजधानी में रायपुर साहित्य उत्सव, चेन्नई में पुस्तक मेला और उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साहित्य उत्सव। साहित्यिक आयोजन इस कारण कि वहां लेखकों से संवाद के अलावा पुस्तकों की बिक्री भी हुई। दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में पुस्तकों की बिक्री के अलावा फेस्टिवल आफ फेस्टिवल्स का भी आयोजन हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश के विभिaन्न हिस्सों में आयोजित होनेवाले साहित्योत्सवों ने एक ही मंच पर अलग अलग संवाद सत्र किए। विश्व पुस्तक मेला में पुरी लिटरेचर फेस्टिवल, नालंदा लिट फेस्ट, कोलकाता लिटरेचर फेस्टिवल, भारत लिटरेचर फेस्टिवल आदि ने अपने आयोजन किए। रायपुर साहित्य उत्सव और मुरादाबाद में पुस्तक मेला भी लगा था। लग अलग प्रकाशकों के स्टाल थे। चेन्नई पुस्तक मेला में भी लेखकों से संवाद का कार्यक्रम था। इन सब आयोजनों का स्वरूप अलग था लेकिन एक बात इनमें समान रूप से लक्षित की गई कि पुस्तकों को लेकर समाज में, विशेषकर युवाओं में जबरदस्त आकर्षण देखने को मिला। साहित्य के सत्रों में भी युवाओं की भागीदारी रही। इन आयोजनों ने उस धारणा का निषेध किया कि आज के युवा रील्स देखने में व्यस्त हैं और पुस्तकों और पठन-पाठन में उनकी रुचि घट रही है। ऐसा सिर्फ गमारे देश में नहीं हो रहा है, अमेरिका और यूरोप में भी पुस्तकों की बिक्री बढ़ी है।
विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली के आयोजकों के मुताबिक इस बार मेले में पिछले वर्ष की तुलना में 20 प्रतिशत अधिक पुस्तक प्रेमी पहुंचे। पहले ही दिन से वहां प्रकाशकों के चेहरे खिले हुए थे। प्रकाशकों के चेहरे तभी खिलते हैं जब बिक्री अच्छी होती है। तीन चार प्रकाशकों से बात करने पर ये अनुमान हुआ कि पुस्तकों की बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में करीब 30 प्रतिशत अधिक रही है। इस बार विश्व पुस्तक मेला में प्रवेश में कोई टिकट नहीं रखा गया था। कई नवाचार भी किए गए थे। सैन्य इतिहास की थीम पर सजे मेले में सैनिकों की वीरता और शौर्य की कहानियों की पुस्तकें बिक रही थीं, उनपर चर्चा सत्र आयोजित किए गए थे। रेखांकित करनेवाली बात ये रही कि भारत मंडपम में आयोजित पुस्तक मेले में स्वच्छता और अनुशासन का बहुत ध्यान रखा गया था। चेन्नई पुस्तक मेला में बिक्री का आंकड़ा भी उत्साहवर्धक रहा। मुरादाबाद में चार दिनों के आयोजन में सम्मिलित होकर लौटे एक प्रकाशक ने बताया कि स्थानीय होने के बावजूद उनके स्टाल से डेढ़ लाख रुपये से अधिक की बिक्री हुई। रायपुर साहित्य उत्सव के पुस्तक मेले में भी जमकर पुस्तकों की बिक्री हुई। एक प्रकाशक ने तो बताया कि वो जितनी पुस्तकें लेकर आए थे सभी लगभग समाप्त हो गईं। वहां भी युवा खरीदारों की संख्या बहुत अधिक थी। रायपुर् साहित्य उत्सव में तमाशा नहीं था बल्कि साहित्य केंद्र में था। फिल्मों से भी वही लोग आमंत्रित थे जो गंभीर बातें कर सकते थे। इन दिनों आमतौर पर साहित्य उत्सव के नाम पर बीते जमाने के फिल्मी सितारों को आमंत्रित कर लिया जाता है ताकि उनके नाम पर भीड़ जुट सके। रायपुर साहित्य उत्सव और विश्व पुस्तक मेला ने ये साबित किया कि पाठकों को साहित्य और उसकी विधाओं पर गंभीर चर्चा चाहिए।
जो लोग हिंदी की पुस्तकों को लेकर चिंता प्रकट कर रहे थे उनको भी युवा पुस्तक प्रेमियों ने अपने पुस्तक प्रेम से चौंकाया है। युवाओं के पुस्तकों के पास पहुंचने का मुख्य कारण जो समझ में आता है वो ये कि हिंदी लेखन में विविधता आई है। हिंदी में एक ही तरह की कहानी, कविताओं और उपन्यासों ने पाठकों को दूर किया था। जब से हिंदी लेखन में विविधता आई है और जमकर कथेतर लेखन होने लगा है तो पाठक भी इस ओर आकर्षित होने लगे। अन्य भाषाओं से हिंदी में अनुदित पुस्तकें भी खूब बिक रही हैं। सिनेमा,स्थानीय कहानियां, तकनीक, विज्ञान आदि पर जिस तरह से पुस्तकें आ रही हैं उसने युवा पाठकों के बीच एक उत्सुकता जगाई है। फिक्शन में भी फार्मूलाबद्ध लेखन के चौखटे को तोड़कर कई लेखकों ने देसी कहानियों और देसी माहौल को रचा। इंटरनेट मीडिया पर पुस्तकों की जानकारियां और चर्चा होने के कारण पुस्तकों का व्यापक प्रचार प्रसार होने लगा। पाठकों के बीच पुस्तकों को लेकर उत्सुकता बनी। ई कामर्स प्लेटफार्म पर तो पुस्तकें पहले से बिक रही थीं अब क्विक कामर्स प्लेटफार्म पर भी पुस्तकें उपलब्ध होने लगी हैं। आप पुस्तक के बारे में सोचें, आर्डर करें और 10 से 15 मिनट में पुस्तक आपके हाथ में पहुंच जाती है। इसने भी समाज में एक वातावरण का निर्माण किया। ये भी प्रचार किया गया कि भारत में युवाओं की एकाग्रता अवधि (कंस्ट्रेशन स्पैन) चंद सेकेंड की रह गई है। जब ये भ्रामक प्रचार फैला तो युवाओँ ने अपनी एकाग्रता अवधि को जांचने के लिए पुस्तकों की ओर लौटना आरंभ किया। परिणाम ये हुआ वो पुस्तकों के नजदीक पहुंचे और उनको पढ़ने में आनंद आने लगा। प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि कोरोना काल के दौरान पुस्तकों के प्रति रुझान देखने को मिला था। कोरोना काल के समाप्त होने के बाद ये रुझान आकर्षण में बदला। एक और कारण जो समझ में आता है वो ये कि पुस्तकों का प्रोडक्शन भी उन्नत कोटि का हो गया है। अच्छी छपाई और अच्छी प्रिंटिंग और बाइंडिंग के कारण पाठकों को पुस्तकों ने अपनी ओर खींचा। पहले की तुलना में पुस्तकों के मूल्य भी तर्कसंगत हुए। पेपरबैक संस्करण की क्वालिटी भी अच्छी होने लगी है। कुल मिलाकर देखा जाए तो इन आयोजनों में किशोरों और युवाओं की भागीदारी पुस्तकों के प्रति आश्वस्ति देती प्रतीत होती है।

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