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Friday, October 9, 2009

धुंधली छवि का विशेषांक

साहित्य संस्कृति और कला का समग्र मासिक होने का दावा करनेवाली मासिक पत्रिका कथादेश ने अगस्त में मीडिया पर केंद्रित भारी भरकम विशेषांक निकाला । इस अंक का संपादन पूर्व पत्रकार और अब शिक्षक अनिल चमड़िया ने किया है । अनिल चमड़िया पिछले कई सालों से कथादेश में इलेक्ट्रानिक मीडिया पर स्तंभ लिखते रहे हैं और यदा कदा उसके संपादकों के नाम खुला पत्र लिककर इस माध्यम को लेकर अपनी चिंता प्रकट करते रहे हैं । कथादेश के मीडिया विशेषांक में भी अनिल ने मीडिया के पतन पर अपनी गहरी चिंता जताई है । मीडिया के अधोपतन पर अतिथि संपादक इतने विचलित हो गए कि आखिरकार उनकी भी चिंता की सुई टीआरपी पर आकर टिक गई । टीवी पत्रकारों पर लिखते हुए चमड़िया ने लिखा- “पूंजीवाद ने उनके बीच कई हिस्से तैयार कर दिए. एक हिस्सा वह है जो चांदी काट रहा है . मीडिया मालिकों की तरह राजसभा (संभवत : वो राज्यसभा लिखना चाह रहे हों ) में रंगरेलियां मना रहा है । इनकी रंगरेलियों का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि ये चंद वर्षों में सैकड़ों करोड़ों डालर के मालिक बन गए । चैनल चला रहे हैं और उसी तरह से चला रहे हैं जैसे रुपर्ट मर्डोक और दूसरे साम्राज्यवाद समर्थक चैनल चलते हैं । जो चैनल मालिक नहीं बन पाया वह जिस तरह चैनल चल रहे हैं उनके उसी तरह चलने की बेशर्मी से वकालत करता है । टीआरपी वो कह अपने कुकर्मों का सुरक्षा कवच बनाता है और ये नहीं बताता है कि टीआरपी क्या है । टीआरपी खास तरह की विचारों को थोपने और अपनी मौलिकता को भुला देने वाला सांगठिक हथियार है । यह सांस्कृतिक वर्चस्व को बढावा देने के उद्देश्य से तैयार हुआ है । इसमें पूंजी किसी संस्थान की नहीं बल्कि पूंजीवादी विचारधारा की लगी हुई है । इसके वर्चस्ववादी सांस्कृतिक हथियार होने का प्रमाण तब मिलेगा जब टीआरपी के ढांचे के रहस्य को खाला जाए ।“
यहां अनिल चमडिया ने टीआरपी की बेहद मनोरंजक और मौलिक व्याख्या की है - टीआरपी खास तरह की विचारों को थोपने और अपनी मौलिकता को भुला देने वाला सांगठिक हथियार है- लेकिन अपने इस फतवा के समर्थन में उन्होंने कोई उदाहरण या तर्क प्रस्तुत नहीं किया है । अपनी इस प्रस्थापना को पूंजीवाद, बाजारवाद. संकट का समय, संगठन जैसे शब्दों की चाशनी में डुबोकर पाठकों पर अपनी विद्वता का परचम लहरा दिया है । टीआरपी को बगैर जाने समझे उसे गाली देने का फैशन बन गया है और अनिल उस फैशन के शिकार हो गए हैं । ऐसा नहीं है कि अनिल चमड़िया ने सिर्फ न्यूज चैनलों की आलोचना की है । इन्होंने समानभाव से अखबारों के गिरते स्तर पर भी अपनी चिंता जताते हुए पत्रकारों को कोसा है । अनिल इस बात का खतरा भी उठाते हुए चलते हैं कि उनके आलोचक उनपर एक ऐसे संत का ठप्पा लगा सकते हैं कि जो गांधी आश्रम में बैठकर पत्रकारिता में व्याप्त भ्रष्टाचार और गंदगी को अपनी लेखनी से साफ करना चाहता है । लेकिन मैं उनके आलोचकों को ये कहना चाहता हूं कि संत तो संत होता है जो सिर्फ प्रेरित कर सकता है पहल नहीं ।
अनिल चूंकि इस अंक के संपादक हैं इसलिए रचनाओं पर भी उनके विचारों की छाप साफ दिखाई देती है । कई लेखक टीआरपी को लेकर रंडी रोना करते हुए दिखाई दे रहे हैं । सिर्फ उमेश चतुर्वेदी ने अपने लेख में टीआरपी को समझने और समझाने की कोशिश की है । उमेश ने टीआरपी की तथाकथित गुत्थी को खोला है । श्रमपूर्वक लिखे गए इस लेख से टीआरपी की कई भ्रांतियां दूर होती है ।
इस अंक में लेखों की भरमार है । यहां वहां जहां तहां से लेखों को इकट्ठा कर, अनुवाद कर प्रकाशित कर दिया गया है । वरिष्ठ टीवी पत्रकार अजीत अंजुम का पिछले साल पत्रकारिता संस्थान में दिए गए एक भाषण को छाप दिया गया है । भाषण देने की शैली और लिखने की शैली बिल्कुल अलग होती है । अजीत अंजुम के भाषण को लगता है, जस का तस छाप दिया गया है । यहीं पर संपादक का दायित्व बनता है कि वो भाषण को लेख के रूप में संपादित कर दे । लेकिन ये नहीं हुआ और साल भर पुराना भाषण छपा । जब अजीत अंजुम की बात चली तो बरबस जनवरी 2007 में उनके संपादन में हंस के मीडिया विशेषांक की याद आ गई । हंस का वह अंक भी लगभग ढाई सौ पृष्ठों का था । हंस का वह अंक संपादन कौशल का बेहतरीन नमूना था । चिंताएं वहां भी थी लेकिन उन चिंताओं का जबाव भी था । राजदीप सरदेसाई, कमर वहीद नकवी, उदय शंकर के विचार इन चिंताओं से टकरा रहे थे । न्यूज चैनलों को लेकर जो कहानियां छपी थीं वो वहां काम करनेवालों पत्रकारों के दर्द और प्रेम की प्रतिनिधि कहानियां थी । मेरे जानते मीडिया पर हंस का वो अंक अबतक का सबसे अच्छा अंक है जिसका एप्रोच एकदम फोकस्ड है ।
कथादेश के इस अंक में एक गुमनाम लेख छपा है जिसमें स्टार न्यूज के संपादक शाजी जमां पर बेहद संगीन इल्जाम लगाए हैं । इस लेख के बारे में संपादक ने कहा है कि – इंटरनेट के जरिए स्टार न्यूज के न्यूजरूम में घूमता एक पत्र हमारे हाथ लगा है । और विद्वान और पत्रकारिता में शुचिता की बात करनेवाले संपादक अनिल चमड़िया ने इंटरनेट पर घूमते एक गुमनाम खत को मीडिया विशेषांक में छापकर मान्यता प्रदान कर दी । लेख के पहले अवश्य एक टिप्पणी संपादक की ओर से है लेकिन ये लेख बेहद घटिया और स्तरहीन है जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है । स्टार न्यूज के संपादक शाजी जमां पत्रकार के साथ-साथ एक संवेदनशील लेखक भी है । इनके लिखे को पढने के बाद कथादेश में छपे इस लेख को पढ़कर ये लगता है कि कोई व्यक्ति शाजी को बदनाम करने की मंशा से ऐसा कर रहा है और कथादेश जाने अनजाने बदनाम करने की उस मुहिम में उसका साथ देता नजर आ रहा है ।
कुल मिलाकर अगर कथादेश के मीडिया विशेषांक पर समग्रता में विचार करें तो ये बेहद हल्का और उथला है । ढाई सौ पृष्ठों का ये भारी भरकम विशेषांक डी फोकस्ड लगता है जिसमें से कोई साफ तस्वीर सामने नहीं आती है । इस अंक की पहली रचना पंकज श्रीवास्तव की है – मी लॉर्ड ! आप समझ रहे हैं ना । इसमें पंकज ने मुन्नाभाई औरह गांधी की शैली में अपने अनुभवों को बेहद रोचक शैली में पेश किया है । इसे इस अंक की उपलब्धि के तौर पर रेखांकित किया जा सकता है ।

2 comments:

vinod said...

IMANDAR TIPPNI.MEDIA TO AV GARIB KI LUGAI HO GAI H BHAI,USE CHHER SB DETE H KOI V US PR SMVEDANSILTA S VICHAR KRNA NHI CHAHTA,VE V JO AJ MEDIA K KANDHE PR SAVARI KR YHA TK PHUCHE H.AUR CHARITRAHANAN TO KATHADES KI PARAMPAR M H.BHUL GYE ALOK DHANVA KI DURGATI

डा.गोबिन्द said...

अनंत विजय साहब आपने शाएद इस अंक को पूरी तरह पढा नहीं है.अतिथि संपादक महोदय ने इस अंक में रद्दी के तरह के अपने कई लेख तो छापे ही हैं,साथ में अपने साथ शराब पीने वाले उन छात्रों का लेख भी छापा है जिनका ज्ञान दो कौड़ी के लाएक भी नहीं.उनके विश्वविद्यालय के सूत्रों के अनुसार-चूंकि विश्वविद्यालय में छात्रों की संख्या कम थी इसलिए उन्हें किसी तरह एम.ए.की परीक्षा में पास कर दिया गया,वे वैसे छात्रों को लेखक बनाने में जुटे हैं जिनका एम.फिल. में दाखिला भी प्रो.इलिना सेन की कृपा से हुआ.यह इलिना सेन हैं जो शायद उस विश्वविद्यालय को ढोंगी कम्युनिस्टों से भरने का जिम्मा उठाई थीं,जिन्होंने अपने ढोंगी कम्युनिस्ट छात्रों को,जो लिखित में 36 नम्बर पाए थे उन्हें 95 नम्बर देकर दाखिला दिलाया और फिर ढोंगी कम्युनिस्टों के लिय पी-एच.डी. का रास्ता भी खोल दिया. दिल्ली के हमारे मीडिया मित्रों को पता ही है कि अनिल चमड़िया जो खुद ढोंगी हैं,के ये प्रिय छात्र जिन्हें वे लेखक बनाने की कोशिश किए हैं उनका दाखिला पी-एच.डी.में कैसे हुआ ये किस्सा भी कम दिलचस्प नहीं.इसलिये इन महान लेखकों का पोल खोलने की कोशिश करें,अगर इन महान लेखकों के चरित्र को खंगालने के बाद इनके कचड़े लेखों पर प्रकाश डालना चाहें तो या आपके कोई और पाठक इन दो कौड़ी के लेखकों के बारे में और इस कथादेश के अतिथि संपादक के चरित्र के बारे में जानना चाहें तो इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं-
http://voiceofmedia.com/vom_voice
यहां अतिथि संपादक अनिल चमड़िया के प्रिय मगर नालायक और नाकाबिल छात्र,जो इस अंक में लेखक भी हैं(भले ही हाथी,घोड़े पर चार लाईन लिखने की काबिलियत भी ना रखते हों)को उस विश्वविद्यालय में बनाए रखने के लिए जहां वे किसी तरह शिक्षक बन गए हैं,किस तरह का जोड़-तोड़ किया गया और कैसे प्रतिकुलपति ने कुलपति के अनुपस्थित होने का फायदा उठा कर(कुलपति उस समय विदेश यात्रा पर थे) उस जोड़तोड़ की अगुआई की और अनिल चमड़िया के कहे अनुसार उनके प्यारे लेखक-छात्रों को हर हथकंडा अपनाते हुए पी-एच.डी.प्रवेश परीक्षा में उतीर्ण करवाया.जिसे लेकर बेवजह वहां के कुलपति महोदय की भी बदनामी हुई.विश्वविद्यालय सूत्र यह भी बताते हैं कि वैसे इसकी कोशिश पूर्व में हुए पी-एच.डी.प्रवेश परीक्षा,जिसमें चमड़ियाजी खुद विषेशज्ञ के रुप मे बैथे थे में भी चमड़ियाजी ने किया था,जिसका रिजल्ट कुलपति द्वारा कैंसिल कर दिया गया था.पर प्रतिकुलपति ने अपनी करनी से कुलपति के सारे किए-कराए पर पानी फेर दिया.मेरे ये सब लिखने का आशय इतना है कि अतिथि संपादक अनिल चमड़िया का वास्तविक चरित्र सामने आए और पता चले की कैसे-कैसों को लिखने का मौका अतिथि संपादक महोदय ने दिया है और खुद तथा लेखक-छात्रों से इसे मीडिया के हैण्डबुक के रुप में प्रचारित करवा रहे हैं.इसके सभी वे लेखक जो अतिथि संपादक के छात्र हैं मीडिया का एम तक नहीं जानते.बात इतनी तक रही होती तब भी ठीक था पर विश्ववस्त सूत्रों के अनुसार अपनी खोखली विद्वता दिखाने के लिए उन्होंने विश्वविविद्यालय में अपने पिटठूओं के माध्यम से कथादेश के इस अंक पर चर्चा का आयोजन भी करवाया.....
अब हो सके तो पुरा अंक पढकर और इन सभी चीजों की छानबीन कर इस पर पुनः प्रकाश डालने की कोशिश करें.जिससे अतिथि संपादक सहीत सभी कूपमंडूकों को अपनी असलियत का पता लग सके.