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Saturday, December 17, 2011

संकट में हॉवर्ड की प्रतिष्ठा ?

दुनिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक हॉवर्ड युनिवर्सिटी इऩ दिनों विवादों में घिर गया है। विश्वविद्यालय के दो निर्णयों की दुनियाभर में आलोचना हो रही है । पहला निर्णय तो भारतीय राजनेता और अर्थशास्त्री सुब्रह्ण्यम स्वामी को गर्मी के दौरान चलने वाले अर्थशास्त्र के दो पाठ्यक्रम के शिक्षण से हटा देने का है । गौरतलब है कि सुब्रह्ण्यम स्वामी पिछले कई सालों से हॉवर्ड के समर स्कूल में अर्थशास्त्र पढ़ा रहे थे । स्वामी को वहां से निकालने के पीछे जो तर्क दिया गया है वह यह है कि उन्होंने एक लेख लिखा जिसकी वजह से एक खास समुदाय की प्रतिष्ठा धूमिल हुई और उस समुदाय के पवित्र स्थलों को लेकर अपमानजनक और हिंसा भड़कानेवाली टिप्पणी की गई । विश्वविद्यालय के शिक्षकों और वहां के कर्ताधर्ताओं के बीच हुई लंबी बैठक में गर्मागर्म बहस के बाद यह फैसला लिया गया कि हॉवर्ड युनिवर्सिटी का यह नैतिक दायित्व है कि वह किसी भी ऐसे व्यक्ति या संस्था के साथ नहीं जुड़े जो किसी अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाता हो । विश्वविद्यालय के शिक्षकों के बीच चली बहस में कई लोगों को इस बात पर आपत्ति थी कि स्वामी का लेख अभिवयक्ति की आजादी नहीं बल्कि घृणा की राजनीति का हिस्सा है, लिहाजा हॉवर्ड से स्वामी को हटा दिया जाना चाहिए ।
दरअसल यह पूरा विवाद सुब्रह्ण्यम सावमी के 16 जुलाई को लिखे एक लेख से शुरू हुआ जिसका शीर्षक था- हाउ टू वाइप आउट इस्लामिक टेरर । अपने उस लेख में स्वामी ने लिखा कि भारत को एक संपूर्ण हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए और वहां उन्हीं लोगों को वोट देने का अधिकार मिले जो यह ऐलान करें कि उनके पूर्वज हिंदू थे । स्वामी ने अपने लेख में यह भी लिखा कि हिंदू धर्म से किसी भी धर्म में धर्मांतरण की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। स्वामी इतने पर भी नहीं रुके और अपने लेख में उन्होंने मांग कर दी कि काशी विश्वनाथ मंदिर समेत तीन सौ अन्य स्थानों से विवादास्पद मस्जिदों को हटाया जाए । जब यह लेख प्रकाशित हुआ तो उसपर जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और पक्ष-विपक्ष में तर्क-वितर्क शुरू हो गया । हॉवर्ड ने भी पहले स्वामी के इस लेख को अभिव्यक्ति की आजादी माना और उनके ही साथ खड़ा दिखा । शुरूआत में हॉवर्ड प्रशासन को यह लेख फ्रीडम ऑफ स्पीच की कैटिगरी में दिखाई दिया । लेकिन चंद छात्रों ने स्वामी के खिलाफ विश्वविद्यालय में अभियान छेड़ दिया । उस अभियान में इस बात पर जोर दिया गया कि स्वामी ने हॉवर्ड की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया है लिहाजा विश्वविद्यालय स्वामी के साथ अपने संबंधों को खत्म करे ।
चंद छात्रों की इस मुहिम के आगे विश्व के इस प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय ने अपने सदियों पुराने सिद्धांतो से समझौता कर लिया । पहले जो लेख विश्वविद्यालय को फ्रीडम ऑफ स्पीच दिख रहा था वही लेख चंद छात्रों और दो तीन वामपंथी रुझान वाले शिक्षकों की अगुवाई वाले मुहिम के बाद घृणा फैलानेवाले लगने लगा । युनिवर्सिटी प्रशासन ने स्वामी के इस लेख को घृणा फैलानेवाले वैसा लेख माना जो हिंसा के लिए उकसाता है । यह सही है कि हॉवर्ड हमेशा से उस सिद्धांत के तहत काम करता है जहां विश्व में एक ऐसे समाज की कल्पना की जाती है जहां पूरी दुनिया के संस्कृति के लोग मिलजुलकर रह सकें । लेकिन वहीं हॉवर्ड में अभिवयक्ति की आजादी को सर्वोपरि भी माना जाता है । विश्वविद्यालय की जो फ्री स्पीच गाइडलाइंस है उसके अनुसार स्वामी के खिलाफ लिया गया निर्णय न सिर्फ अनुचित है बल्कि खुद हॉवर्ड के बनाए गए गाइडलाइंस का उल्लंघन भी है । 15 मई 1990 में हॉवर्ड में युनिवर्सिटी फ्री स्पीच गाइडलाइंस तैयार किया जो यह कहता है कि अभिव्यक्ति की आजादी विश्वविद्यालय के लिए इस वजह से बेहद अहम है क्योंकि हमारा समूह कारण और तर्कों पर आधारित डिस्कोर्स की वकालत करता है । अपने विचारों को बगैर किसी दवाब के सबके सामने रखना हमारी प्राथमिकता है । किसी भी व्यक्ति के विचारों को दबाना या फिर उसमें काट छांट करने से हमारी बौद्धिक स्वतंत्रता के विचारों को ठेस पहुंचा सकता है । यह किसी वयक्ति के उन विचारों को भी सामने आने से रोकता है जिसमें उसके विचार बेहद अलोकप्रिय हों और किसी समुदाय को पसंद नहीं आते हों । साथ ही उस खास समुदाय को भी अपनी आलोचना सुनने के अधिकार से वंचित करता है ।
विश्वविद्यालय के इस गाइडलाइंस में और भी बातें कही गई हैं जो बहुत ही मजबूती से विचारों को अभिव्यक्त करने की इजाजत देता है । लेकिन अपने ही गाइडलाइंस को दरकिनार करते हुए स्वामी को कोर्स से हटा देना कई सवाल खड़े करता है । सवाल तो इस बात पर भी खड़े हो रहे हैं कि सुब्रह्ण्यम स्वामी से इस बाबत कोई सफाई नहीं मांगी गई न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया । दशकों से हॉवर्ड का हिस्सा रहे एक भारतीय विद्वान के साथ इस तरह का व्यवहार बेहद अफसोसनाक और हॉवर्ड के प्रतिष्ठा के खिलाफ होने के साथ साथ न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत के खिलाफ भी है । हॉवर्ड में हर तरह के विचारों को जगह मिलती रही है । वहां के कई शिक्षकों ने एशियाई देशों के खिलाफ कई आपत्तिजनक लेख लिखे, हिंदू धर्म और देवी देवताओं के बारे में टिप्पणियां की, लेकिन कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई । शोध के नाम पर लिखे गए लेखों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता की धज्जियां उड़ाई गई लेकिन उन सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आईने में देखा गया,कभी किसी लेखक के खिलाफ युनिवर्सिटी ने कोई कार्रवाई नहीं की । छात्रों और शिक्षकों के किसी समूह ने कोई विरोध नहीं किया ।
स्वामी ने भी भारत के एक अखबार में लिखकर अपने विचारों को प्रकट किया है । वो भारत को हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं इसमें क्या बुराई है । ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं और अपने विचार बनाना और उसे प्रकट करना हर व्यक्ति का हक है । भारत और विदेशों में भी कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो भारत को हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं । विवादास्पद मस्जिदों को मंदिर परिसरों से हटाने की वकालत तो भारत का प्रमुख विपक्षी दल भी करता है और भारत के एक बड़े समुदाय का यह मत भी है । तो अगर स्वामी ने अपने मत को जाहिर कर दिया तो क्या गुनाह कर दिया । तीसरी बात स्वामी ने धर्मांतरण के खिलाफ कही है वह भी उनका निजी विचार है और उसपर किसी भी तरह की पाबंदी लगाना जायज नहीं कहा जाएगा । आप उनको अपने विचारों को प्रकट करने से नहीं रोक सकते, असहमत हो सकते हैं । लेकिन असहमति का दंड लेखक को देना हॉवर्ड विश्वविद्यालय के खुद के गाइडलाइंस और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के सिद्धांत के खिलाफ है । हॉवर्ड ने तो स्वामी से बगैर कुछ पूछे, बगैर उनका पक्ष जाने उनको अपने कोर्स से हटा दिया ।
दूसरी अहम बात जो हॉवर्ड की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाता है वह यह है कि विश्वविद्यालय ने ऑक्यूपॉय मूवमेंट के आंदोलन के मद्देनजर विश्वविद्यालय के हॉवर्ड यॉर्ड को बाहरी गतिविधियों के लिए बंद कर दिया । यह एक ऐसी जगह थी जहां छात्र, पर्यटक,सामाजिक सूमह आते थे ,बैठते थे, बहस मुहाबिसे करते थे और चले जाते थे । दशकों से वहां ऐसी परंपरा चल रही थी और हॉवर्ड यार्ड कई आंदोलनों का गवाह भी रहा है । लेकिन आरोप है कि अमेरिका में जारी ऑक्यूपॉय मूवमेंट को रोकने के लिए विश्वविद्यालय ने यह कदम उठाया । इन दो कदमों से विश्वविद्यालय की अभिवयक्ति की आजाजदी के समर्थक की उस उस छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठेस पहुंची है जिसके लिए वह जाना जाता है । जरूरत इस बात कि है कि विश्वविद्यालय अपने पुरानी परंपरा की ओर लौटे और विचारों को बैखौफ होकर अभिव्यक्त करनेवालों को मंच प्रदान करे । अंतराष्ट्रीय जगत को इस बात का इंतजार भी है कि हॉवर्ड अपनी गलतियों को सुधारे और स्वामी से माफी मांगे और हॉवर्ड यॉर्ड पर लगाई गई पाबंदी को हटाए ।

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