Translate

Saturday, October 14, 2017

'मैं' और 'मेरा' के चक्रव्यूह में सृजन

आज के साहित्यक परिदृष्य पर अगर नजर डालें तो मैं, मेरा और मेरी की ध्वनियों का कोलाहल सुनाई देता हैं। ज्यादातकर लेखक अपनी किताब की प्रशंसा कर रहे होते हैं तो कोई अपनी कहानी की तारीफ कर रहा होता है तो कोई अपने कविता संग्रह को लेकर सार्वजनिक रूप से खुद ही उसको बेहतरीन बताकर प्रशंसा बटोरने में लगा है। हिंदी साहित्य में इस तरह के माहौल को देखते हुए यह बात सहज रूप से सामने आती है कि कृति का महत्व गौण होता चला जा रहा है। वयक्ति जो कि लेखक है वो ज्यादा प्रबल होता जा रहा है । रचना बोलेगी लेखक नहीं की प्रवृत्ति नेपथ्य में चली गई है। सृजन का महत्व या सृजनात्मकता की चर्चा कितनी और क्यों कम होती जा रही है इसपर बात करने और गौर करने की आवश्यकता है। समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में मैं और मेरा के साहित्यक माहौल को देखते हुए मुझे नामवर सिंह जी का एक व्याख्यान याद आ रहा है जो उन्होंने 18 अप्रैल 1982 को जबलपुर में मध्यप्रदेश साहित्य के एक आयोजन में दिया था। तब नामवर सिंह जी ने कहा था- शायद 1920 और 1930 के दौरान यह मैंसाहित्य में ज्यादा अर्थ के साथ गूंजता था। जब निराला ने तुम और मैं कविता लिखी थी तो तुम तो खैर रहा ही होगा, लेकिन मैं जितने गर्व के साथ और गर्वीले स्वर में बोलता था, उसका अंदाजा आज भी आप उस कविता को पढ़कर लगा सकते हैं। हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान एक विशेष प्रकार की कविता लिखी गई थी और वह बड़ी मैं प्रधान कविता हुआ करती थी, जिसे राजनीतिक चिन्तन के लोग व्यक्तिवाद का दौर कह सकते हैं। साहित्य में एक जमाने में मैं की बहुत प्रधानता थी और उसमें सार था, तत्व था। व्यक्ति अपनी अस्मिता को पहली बार इस रूप में महसूस कर रहा था कि उसे व्यक्त कर सके। धीरे धीरे असलियत का पता चला और मालूम हुआ कि मैं उतना बड़ा विराट हिमालय के समान नहीं है। उसके पीछे जो शक्ति थी- राष्ट्रीय शक्ति थी, सामाजिक शक्ति थी। लेकिन इस वक्त साहित्य में जो मैं और मेरा गूंज रहा है उसके पीछे सिर्फ सिर्फ आत्ममुग्धता है। पिछले दिनों एक हिंदी आलोचक से इस विषय पर ही बात हो रही थी तो उन्होंने बेहद तल्ख शब्दों में हिंदी साहित्य की मौजूदा पीढ़ी को हिंदी साहित्य की आत्ममुग्ध पीढ़ी तक करार दे दिया था। इसके पीछे उनके अपने तर्क थे जिसपर बहस तो हो सकती है पर उसको सिरे से खारिज करना मुश्किल लग रहा था।  
मैं और मेरा का नतीजा यह है कि आज के लेखक अपने वरिष्ठ लेखकों को पढ़कर उनकी रचनाओं से आगे जाने का कोई उपक्रम करते दीख नहीं रहे हैं, वो तो बस अपनी ही पीढ़ी के लेखकों के कंधों पर पांव रखकर आगे निकल जाने की होड़ में शामिल हैं। साहित्य की जिस परंपरा की बात लगातार होती रहती है उस परंपरा को भी देखने समझने की कोशिश नहीं दिखाई देती है। परंपरा को रूढ़ि मानकर ग्रहण करने की बजाए त्यागने की प्रवृत्ति जोर मारती दिखाई देती है। त्यागने से ज्यादा नकारने की । लेकिन यह नकार लॉजिकल नहीं है बल्कि सिर्फ खुद की तारीफ में किया जाने वाला है। हिंदी कहानी में अब तक तो सिर्फ परंपरा को ही समकालीन बनाकर पेश किया जाता रहा है। अगर हम निर्मल वर्मा और फणीश्वर नाथ रेणु को छोड़ दें तो हिंदी कहानी की परंपरा को किसी ने भी झकझोरने की कोशिश नहीं की। लीक से हटकर चलने या फिर अपनी राह बनाने की बात करना तो दूर की बात है। आज के ज्यादातर लेखक अपने समकालीन को तो नहीं ही पढ़ते हैं अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों की रचनाओं को भी नहीं पढ़ते हैं । उनका तर्क यह होता है कि दूसरे लेखकों की रचनाओं को पढ़ने से उनकी रचनात्मकता प्रभावित होती है । अगर एक मिनट के लिए इस तर्क को मान भी लिया जाए तो समकालीन रचनाकारों को पढ़ने में क्या दिक्कत है ।
दूसरी जो प्रवृत्ति इस आत्ममुग्धता के पीछे है वो है पुरस्कृत होने की चाहत।ज्यादातर लेखक पुरस्कृत होना चाहता है, छोटा बड़ा, मंझोला किसी भी प्रकार का कोई पुरस्कार मिल जाए। पुरस्कार के लिए जब आकांक्षा जोर मारती है तो उसके पीछे यह मनोविज्ञान काम करता है कि वो निर्मल और रेणु या फिर निराला और दिनकर के समकक्ष हो गया है, उतना ही महान लेखन कर रहा है। पुरस्कार पाने की चाहत में सारे तरह के दंद फंद अपनाए जाने लगते हैं और रचनात्मक कहीं पीछे छूटती चली जाती है। आज की इस आत्ममुग्ध पीढ़ी के रचनाकारों में एक खास किस्म का एरोगैंस भी दिखाई देता है, बदतमीजी की हद तक । वो खुद को विद्वान ही नहीं मनाते बल्कि यह अपेक्षा भी रखते हैं कि दूसरे भी उनको ज्ञानी मानें और उसी हिसाब से उनके साथ बर्ताव किया जाए ।मन में इस तरह का भाव झूठी और प्रायोजित प्रशंसा से उपजता है। और इस भाव के पैदा होते ही लेखक की रचनात्मकता बाधित होनी शुरू हो जाती है ।बाधित रचनात्मकता को जब छद्म विद्वता बोध का साथ मिलता है तब उससे जन्मती है पुरस्कृत होने की चाहत और इस चाहत के वशीभूत होकर शुरू होता है पुरस्कार पाने की गोलबंदी । तय मानिए कि जब साहित्य में गोलबंदी या घेरेबंदी शुरू हो जाए तो उसका संक्रमण काल शुरू हो जाता है । इस संक्रमण काल को आप उस दौर की रचनाओं में आसानी से लक्षित कर सकते हैं ।
जरूरत इस बात की है कि आज की आत्ममुग्ध पीढ़ी के रचनाकार अपने समकालीनों और पूर्ववर्तियों को पढ़ें और उनको रचनात्मक स्तर पर चुनौती पेश करें । अगर ऐसा हो पाता है तो समकालीन साहित्य का परिदृश्य बदल सकता है और कुछ अच्छी रचनाएं सामने आ सकती हैं । उन्हें यह बात समझ में नहीं आती है कि साहित्य लंबे समय तक चलनेवाली एक ऐसी साधना है जिसमें फल कब मिलेगा यह तय नहीं होता है। इन दिनों जो लोग कहानी या उपन्यास लिख रहे हैं उनमें से ज्यादातर को साहित्य साधना से कोई लेना देना नहीं है वो तो तप के पहले ही वरदान के आकांक्षी हुए जा रहे हैं। कुछ नए नवेले प्रकाशकों ने हल्के और लोकप्रिय विषयों पर लिखवाकर ऐसे लेखकों की आकांक्षाओं को और बढ़ावा दिया है। कुछ दिन पहले एक साहित्यक पत्रिका में एक लेखिका ने अपने साक्षात्कर में अपनी ही रचनाओं को महान करार दिया था और अपने से वरिष्ठ और अपेक्षाकृत ज्यादा लोकप्रिय लेखक के उपन्यास को फ्लॉप तक कह डाला था। यह आत्ममुग्धता ही तो है । यही नहीं है बल्कि साहित्य में तो अब तारीफ के लिए भी यत्न प्रयत्न किए जाते हैं। पूरा का पूरा समूह साथ होकर तारीफ के पुल बांधता चलता है। कई साहित्यक पत्रिकाओं के संपादक एक पूरी पीढ़ी को आत्ममुग्ध पीढ़ी बनाने के मुजरिम भी माने जा सकते हैं।
मैं और मेरा के चक्कर मे रचनाएं काफी कमजोर हो रही हैं। पिछले दस साल की कितनी कहानियां पाठकों को याद हैं । कहानी का स्तर कितना गिरा है। दो चार कहानीकारों को छोड़ दें तो कहानी के नाम पर किस तरह की सामग्री पाठको को पेश की जा रही है, इसको लेकर चिंतित होने की जरूरत है। कहानी की दुनिया में कहानीकार धूमकेतु की तरह प्रकट होते है, एक दो कहानियों से चमकते हैं और फिर धूमकेतु की ही तरह साहित्यक परिदृश्य से बिला जाते है। आज कहानियां थोख के भाव से लिखी जा रही हैं लेकिन लगभग सभी कहानियों को पढ़ने के बाद निराशा होती है । हर युग में अच्छी कहानियां लिखी जाए यह आवश्यक नहीं है लेकिन कहानी को लेकर जो विवेक है उसका बचना जरूरी है। यही विवेक आज खतरे में है । आज के कहानीकारों के अनुभव बहुत सीमित दिखाई पड़ते हैं। चालू और तुरत-फुरत लोकप्रियता हासिल करनेवाली रचनाएं ज्यादा आ रही हैं। क्लासिक का फैसला तो खैर समय के साथ होता है लेकिन कालजयी रचना के संकेत तो मिलने ही लग जाते हैं। इस तरह के संकेतों वाली रचनाओं का नहीं होना हिंदी साहित्य के लिए चिंता का सबब है। इस चिंता को दूर करने के लिए जरूरी है कि नए लेखकों और पुराने लेखकों के बीच संवाद हो। इस तरह के संवाद के लिए साहित्यक आयोजन बेहतर मंच हो सकते हैं। संवाद से ही परंपरा को मजबूती मिलती रही है और मुझे लगता है कि अगर एक बार साहित्य में पीढ़ियों के बीच संवाद शुरू हो गया तो तमाम तरह की बाधाएं तो दूर होंगी ही, मैं और मेरा से भी साहित्य को आजादी मिलेगी क्योंकि संवाद में मैं मैं ज्यादा देर तक चल नहीं पाता है उसके लिए एकालाप की आवश्यकता होती है।  



2 comments:

lalitya lalit said...

बेहतरीन आलेख,बधाई और शुभकामनाएं

Karunesh Sinha said...

पूर्णतः सहमत हूँ । FB और Twitter के जमाने में Like की संख्या ही रचना और रचनाकार दोनों के स्तर का मापदंड बन गया है । अब रचना से अधिक रचनाकार महत्वपूर्ण हो गया है । सृजन पहले रचनाकार के अंदर सृजित होता है । रचनाकार गर्भस्थ शिशु की तरह इसे अपने विचारों और जीवन अनुभव से तब तक पुष्ट करता है जब तक उसे पर्सव पीड़ सा अनुभव न होने लगे । तब जाकर एक रचना निःसृत होती है । अधिक लिखने और परभावशाली लिखने के चक्कर में इस पीड़ा दायी रचना यात्रा को रचनाकार जी नहीं पाते हैं ।