कुछ वर्ष पहले की बात है। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्तशासी संस्था राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की वेबसाइट पर क्रय की जानेवाली पुस्तकों की सूची प्रकाशित हुई थी। उसमें एक पुस्तक थी जिसका नाम था मदर आफ डेमोक्रेसी इंडिया। संस्था की वेबसाइट पर क्रय की जानेवली पुस्तकों की सूची में इस पुस्तक का मूल्य पांच हजार रुपए बताया गया था। पुस्तक प्रकाशक या विक्रेता की तरफ से छूट भी प्रस्तावित थी। उसके बाद पुस्तक का मूल्य तीन हजार (स्मरण के आधार पर) के करीब था। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन की बैठक में इस पुस्तक को लेकर प्रश्न उठा था। किसी सदस्य ने प्रश्न उठाया था कि यही पुस्तक जब बाजार में किसी अन्य प्रकाशन, संभवत: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से सात सौ रुपए मूल्य पर उपलब्ध है तो फाउंडेशन इतनी महंगी पुस्तक क्यों खरीद रहा है। ये जानकारी नहीं है कि उक्त पुस्तक की खरीद राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन में हुई या नहीं। ये इस लेख का विषय भी नहीं है। राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन और उसके क्रियाकलाप पर भी चर्चा करना उद्देश्य नहीं है। उक्त उदाहरण से एक बड़ा प्रश्न भारतीय प्रकाशन जगत के सामने खड़ा होता है कि सरकारी खरीद के लिए पुस्तकों के मूल्य बहुत ज्यादा और बाजार के लिए उसी पुस्तक का मूल्य कम क्यों रखे जाते हैं? ये तो एक उदाहरण है जबकि प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि ये तो सामान्य बात है। कवर अलग करके पुस्तकों का मूल्य कई गुणा बढ़ा दिए जाते हैं। बढ़े हुए मूल्य पर खरीद भी होने की बात की जाती है। समय आ गया है कि हिंदी के प्रकाशकों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि पुस्तकों के मूल्य का मानकीकरण होना चाहिए या नहीं।
अभी मेरे सामने एक ही प्रकाशन से प्रकाशित दो पुस्तकें रखी हैं। एक हार्ड बाउंड है और दूसरा पेपरबैक। हार्ड बाउंड पुस्तक की पृष्ठ संख्या 200 है और उसका मूल्य रु 499 है। पेपरबैक पुस्तक की पृष्ठ संख्या 191 है और मूल्य रु 299 है। अन्य प्रकाशक की एक पुस्तक में पृष्ठ है 120 और मूल्य है रु 200। एक और प्रकाशन से प्रकाशित पेपरबैक पुस्तक में पृष्ठ है 230 मूल्य है रु 500। लेख लिखने के क्रम में दर्जनों पुस्तकों की पृष्ठ संख्या और मूल्य देखा। एक ही प्रकाशन से एक ही जैसे कागज पर एक ही आकार में और लगभग समान पृष्ठ संख्या की प्रकाशित पुस्तकों के मूल्य अलग-अलग हैं। उनको देखकर कोई अनुमान नहीं लगा सकता है कि प्रकाशकों ने पुस्तकों के मूल्य निर्धारण का क्या फार्मूला तय किया है। कई प्रकाशकों से मूल्य निर्धारण को लेकर बात की तो पता चला कि आमतौर पर एक रुपए प्रति पृष्ठ की दर से पुस्तकों का मूल्य निर्धारण होता था। अब ये दर बढ़कर दो रुपए प्रति पेज तक पहुंच गया है। एक प्रकाशक ने बताया कि पुस्तक की लागत से चार से छह गुणा अधिक मूल्य रखा जाता है। उनका तर्क था कि पुस्तक विक्रेताओं को चालीस प्रतिशत तक कमीशन और करीब तीन महीने का क्रेडिट देना होता है। ई-कामर्स प्लेटफार्म अब प्रकाशकों से 50-55 प्रतिशत कमीशन की मांग करने लगे हैं। इस कारण पुस्तक का मूल्य लागत के चार से छह गुणा अधिक रखा जाता है। बड़े प्रकाशक तो फिर भी अपने प्रकाशनों के बल पर मूल्यों को नियंत्रण में रख पातें हैं लेकिन कई छोटे प्रकाशक अपनी एक अच्छी पुस्तक से ही मुनाफा कमाने के चक्कर में अधिक मूल्य रख देते हैं। इससे कई बार पाठक खिन्न भी होते हैं और खरीदने में हिचकते भी हैं।
पुस्तकों के बाजार या बिक्री का इकोसिस्टम बहुत सारी बातों पर निर्भर करता है। अंतराष्ट्रीय स्तर पर कोई घटना घटी तो पेपर के दाम बढ़ जाते हैं। किसी दो देश के बीच संघर्ष जैसी स्थिति बनती है तो भी उसका असर पुस्तकों के बाजार पर पड़ता है। कोरोना जैसी महामारी का असर भी प्रकाशन व्यवसाय पर पड़ते देखा गया । पायरेसी भी पुस्तकों के बाजार पर नकारात्मक असर डालती है। पुस्तक चर्चित हुई नहीं कि पायरेटेड वर्जन बाजार में उपलब्ध। खुले आम चौक-चौराहों पर बिक्री आरंभ। हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में लेखकों को दी जानेवली कापीराइट राशि की दर भी मूल्य को प्रभावित करता है। ये प्रश्न उठ सकता है कि पुस्तकों के मूल्य निर्धारण की कोई नीति क्यों नहीं है? प्रकाशकों की अखिल भारतीय संस्थाएं या अन्य संस्थाएं इसमें पहल क्यों नहीं करती हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों के बौद्धिक प्रकोष्ठ की तरह काम कारनेवाले लेखक संगठनों से तो ये अपेक्षा ही व्यर्थ थी/ है। यहां सरकारी खरीद की बात नहीं हो रही है। वो एक अलग ही किस्म का खेल है। जिसमें बहुधा भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं। पारदर्शिता की कमी का उल्लेख होता ही रहता है। हिंदी के एक आलोचक जब राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष थे तो एक प्रकाशक को लाभ पहुंचाने की बात हिंदी साहित्य जगत में आम है। इसकी चर्चा फिर कभी। इस बात पर विचार करना होगा कि जो पुस्तकें ज्ञान का आधार होती हैं। प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्र निर्माण के लिए पीढ़ियों को तैयार करती हैं। राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ने के उपक्रम के तौर पर देखी जाती हैं। उसको लेकर समाज को क्या करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पहले कार्यकाल से ही पुस्तकों और पुस्तकालयों की महत्ता पर जोर दे रहे हैं। घर में देवालय और पुस्तकालय की बात भी कर चुके हैं। इंटरनेट मीडिया के दौर में भी पुस्तकों की महत्ता कम नहीं हुई है। हिंदी क्षेत्र के पुस्तक मेलों और साहित्य उत्सवों में पुस्तकों के प्रति पाठकों का प्रेम दिखता है। नई दिल्ली में आयोजित होनेवाले विश्व पुस्तक मेला ने इस वर्ष सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए थे। प्रतिवर्ष दिसंबर में आयोजित होनेवाले पुणे पुस्तक मेला का आकार और बिक्री के आंकड़े संतोषजनक ही नहीं बल्कि चौंकानेवाले हैं। मराठी में पुस्तक खरीदकर पढ़नेवाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। मलयालम, तमिल और बांगला में भी पुस्तकों की बड़ी संख्या में बिक्री होती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पुस्तकों की संस्कृति के विकास को लेकर समाज को जाग्रत होना होगा। हमें ये तय करना होगा कि पायरेटेड या चोरी से प्रकाशित की गई पुस्तकें नहीं खरीदनी है। चाहे उनका मूल्य कितना भी कम क्यों ना हो। पुस्तकालयों को दी जानेवाली पुस्तकों की सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाने की आवश्यकता है। अगर कहीं भ्रष्टाचार है तो उसको रोकने के उपाय करने होंगे। अनियमितता के कारण सरकारी पुस्तकों के खरीद रोक देने से प्रकाशन जगत पर असर पड़ता है। प्रकाशकों को भी व्यक्तिगत और सरकारी खरीद के लिए उपलब्ध पुस्तकों के मूल्य में समानता रखनी होगी। जो प्रकाशक ऐसा नहीं करते हैं उनके बारे में प्रकाशक संघों को सार्वजनिक रूप से सामने आकर कदम उठाने होंगे। लेखकों और पाठकों को भी प्रकाशकों के साथ मिलकर इस व्यवसाय को आगे बढ़ाना होगा क्योंकि इस कारोबार की प्रकृति अलग है। पूंजी लगानेवाले लाभ की इच्छा रखते हैं, रखना भी चाहिए क्योंकि ये पूंजी का स्वभाव है। पर लाभ के चक्कर में ये नहीं भूलना चाहिए कि ये कारोबार पीढ़ियों के निर्माण से भी जुड़ा है। इसका उद्देश्य पवित्र है।