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Sunday, June 14, 2026

महाकवि के प्रति उदासीनता


आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लेखन पर कुछ काम करते हुए कवि भूषण के बारे में उनकी राय सामने आई। आचार्य शुक्ल ने कवि भूषण को ‘हिंदू जाति का प्रतिनिधि’ कवि कहा है। जाति से आचार्य शुक्ल का आशय किसी ‘कास्ट’ से नहीं बल्कि हिंदू राष्ट्रीयता से है क्योंकि हिंदू कोई जाति तो है नहीं। आचार्य शुक्ल की ये टिप्पणी दिमाग में बैठक गई। इसके कुछ दिनों बाद दैनिक जागरण में प्रकाशित एक समाचार ने ध्यान खींचा। समाचार का शीर्षक था, साझा संस्कृति का केंद्र बनेगा महाकवि का गांव। बात कवि भूषण के पैतृक गांव की हो रही थी जो कि कानपुर का टिकवांपुर है। समाचार में विस्तार से बताया गया था कि किस तरह से कवि भूषण के पैतृक आवास में चलनेवाले प्राथमिक विद्यालय का भवन जर्जर हो चुका था। इस जर्जर भवन के कमरों में ग्रामीण भूसा भंडारण कर रहे थे और परिसर में मवेशी पालन हो रहा था। इस भवन को ठीक कराने का आदेश हुआ। कवि भूषण हिंदी के शीर्ष कवियों में माने जाते हैं। उन्होंने शिवाजी महाराज की वीरता और पराक्रम पर विस्तार से लिखा है। उनके द्वारा रचित शिवा-बावनी में शिवाजी महाराज के युद्ध कौशल, उनकी रणनीति, तेज गति से चलती उनकी तलवार आदि के बारे में विस्तार से लिखा है। कवि भूषण का कालखंड मुगल राजा औरंगजेब के समय का था। जब औरंगजेब मंदिरों को तोड़ता था तो समाचार सुनकर कवि भूषण विचलित हो जाते थे। उनकी लेखनी चलती थी और उससे राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होकर जो छंद निकलते थे उसमें औरंगजेब से पीड़ित जनता का स्वर होता था। उन्होंने शिवाजी के माध्यम से हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए जो रचनाएं की उसने भारत की जनता के मध्य राष्ट्र के प्रति एक अनुराग पैदा किया। शिवाजी महाराज की प्रशंसा में जो रचनाएं उन्होंने लिखी उसका लक्ष्य भी जनता के बीच शिवाजी को हिंदू संस्कृति के रक्षक के तौर पर स्थापित करना था। उन्होंने लिखा- ‘मीड़ि राखे मुगल मरोड़ि राखे पातसाह बैरी पीसि राखे बरदान राख्यौ कर मैं/राजन की हद्द राखी/तेग-बल सिवराज देव राखे देवल स्वधर्म राख्यो घर मैं।‘ इससे स्पष्ट है कि वो अपनी कविताओं में शिवाजी महाराज को देवतुल्य बताकर जनता को प्रेरित करते थे। अनायास नहीं था कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल उनको हिंदू जाति का प्रतिनिधि कवि मानते थे। 

हिंदू जाति के ऐसे प्रतिनिधि कवि के पैतृक आवास की ये स्थिति क्यों है ? हिंदू जाति अपने नायकों की स्मृति को क्यों नहीं सहेज सकती। इन प्रश्नों के साथ कुछ दिनों पूर्व कोलंबिया यात्रा में बोगोटा में वहां के नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्केज के बारे में जानना चाहा। वहां के लेखकों ने जानकारी दी कि कोलंबिया ने उनकी यादों को सहेजा हुआ है। बोगोटा में वो बहुत अधिक दिन नहीं रहे थे। जितने भी दिन बिताए और जहां भी उनका कार्यस्थल रहा उसको बोगोटा ने सहेजा। वहीं पता चला कि कोलंबिया के ही शहर कार्टेघाना में गैब्रियल गार्सिया मार्केज का घर अब भी सुरक्षित और जस का तस है। कोलबिंया आने वाले पर्यटक उस घर को देखने जाते हैं। लाल ईंटों से बनी उस इमारत में उनकी स्टडी, उनका लिविंग रूम को मूल स्वरूप में संभाल कर रखा गया है। ये वही स्थान है जहां मार्केज ने अपनी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की थी। इस वर्ष अप्रैल में अंतराष्ट्रीय माचार माध्यमों में इस बात की खूब चर्चा रही कि किंग्स कालेज लंदन की एक प्रोफेसर लूसी मुनरो ने विलियम शेक्सपियर के घर का सटीक स्थान खोज निकाला। श्कसपियर के घर के सटीक स्थान को लेकर इसके पहले तक भ्रम था। बताया जाता था कि वो इसी स्थान पर कहीं रहते थे। कहने का आशय ये है कि एक प्रोफेसर वर्षों तक अपने सम्मानित लेखक के घर को ढूंढने में रही। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसने ये काम कर दिया। हम अपनी भाषा के पूर्वज लेखकों, उनसे जुड़ी धरोहरों को लेकर इतने उदासीन क्यों हैं। इस पूरे प्रसंग को लिखते हुए याद आता है प्रयागराज के मालवीय नगर इलाके में पंडित बालकृष्ण भट्ट का निवास। सरस्वती पत्रिका के संपादक स्व देवीदत्त शुक्ल के पौत्र व्रतशील शर्मा के साथ भट्ट जी के घर गया था। जर्जर अवस्था में था उनका घर। उनके परिवार के लोगों ने काठ वो चौकी बचा रखी थी जिसपर बैठकर भट्ट जी ‘प्रदीप’ का संपादन किया करते थे। तब उनके घर की स्थिति को देखकर बहुत पीड़ा हुई थी। अब कवि भूषण के पैतृक घर की स्थिति के बारे में जानकार दुख बढ़ गया। कवि भूषण के जन्म स्थान पर उनका भव्य स्मारक बनाया जाना चाहिए। हिंदू जाति के इस प्रतिनिधि कवि की यादों को संजोने के लिए और आगे आनेवालि पीढ़ी को ये बताने के लिए वहां उनकी रचनाओं पर आधारित म्यूजियम बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को पहल करनी चाहिए। इस कार्य में महाराष्ट्र सरकार को भी आगे आकर उत्तर प्रदेश सरकार का सहयोग करना चाहिए। कवि भूषण का नाम भारत के गौरव शिवाजी महाराज से जुड़ता है। अगर उत्तर प्रदेश सरकार और महाराष्ट्र सरकार ठान ले तो टिकवांपुर में कवि भूषण का भव्य और दिव्य स्मारक बनने में देर नहीं लगेगी।