अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों की वैश्विक स्तर पर चर्चा होती ही रहती है। लेकिन उनका एक बयान इन दिनों अमेरिका में खूब चर्चा बटोर रहा है। इंटरनेट मीडिया पर उसके पक्ष विपक्ष में लगातार टिप्पणियां प्रकाशित हो रही हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने एक सार्वजनिक भाषण में कम्युनिस्टों के आसन्न खतरे के बारे में बेहद कठोर बातें की हैं। उन्होंने कहा कि ‘कम्युनिस्ट एक बार फिर से क्रिश्चियन और चर्च के विरुद्ध युद्ध आरंभ करना चाहते हैं। वो सरकार और चर्च को अलग करके देखने की वकालत करते रहते हैं। आपने देखा कि किस तरह से कम्युनिस्टों ने एकजुट होकर न्यूयार्क में चुनाव जीता। वो पूरी तरह से अमेरिकी जीवन पद्धति को समाप्त करना चाहते हैं। कम्युनिज्म को फैलाना बहुत आसान है पर जो इसकी चपेट में आता है वो गंदगी में जीवन जीने को मजबूर होता है। न तो खाना मिलता है, न ही आवास की व्यवस्ता हो पाती है, न ही सेना होती है और ना ही कानून व्यवस्था बन पाती है। वहां कुछ भी नहीं होता है और तीसरी दुनिया के देशों की तरह हो जाते हैं जहां सभी पीड़ित होते हैं या मरने के लिए अभिशप्त।‘ दरअसल अमरिका में क्रिश्चियनिटी और चर्च पर लगातार हो रहे प्रहारों को ध्यान में रखते हुए ट्रंप प्रशासन ने रिलीजस लिबर्टी कमीशन बनाया था। उसके चेयरमैन ने अपने अध्ययन के आधार पर कहा कि ‘वे (कम्युनिस्ट) अमेरिका से गाड (भगवान) को हटाना चाहते हैं, चर्चों को बंद करना चाहते हैं और आस्थावान अमेरिकियों को दंडित करना चाहते हैं। अमेरिका की कट्टरपंथी ताकतें अमेरिका से गाड को मिटाना चाहती हैं, लेकिन ऐसा होने नहीं देंगे। अमेरिका फर्स्ट का अर्थ है गाड फर्स्ट।‘ उन्होंने अमेरिकी जनता का आह्वान किया कि वो देश में मौजूद कट्टरपंथी ताकतों के विरुद्ध खड़े हों और अपनी रिलीजस लिबर्टी के लिए अंतिम सांस तक लडें। रिलीजस लिबर्टी कमेटी के चेयरमैन ने राष्ट्रपति ट्रंप के सामने ही अपनी बातें कही। उनके इन निष्कर्षों के सार्वजनिक होने करने के बाद अमेरिका में क्रिश्चियनिटी पर आसन्न खतरे को लेकर बहस आरंभ हो गई है।
रिलीजस लिबर्टी और कम्युनिस्टों की प्रविधि की इस बहस में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार जीतने वाले रूसी लेखक सोल्झेत्सिन का लिखा एक वाक्य अमेरिका में इंटरनेट मीडिया पर जमकर उद्धृत किया जा रहा है। सोल्झेत्सिन ने रूस में राजनीतिक उत्पीड़न पर लिखकर पूरी दुनिया को बताया था। सोल्झेत्सिन ने लिखा था कि ‘कम्युनिस्ट सिस्टम में अपराधियों को बख्श दिया जाता है और राजनीतिक विरोधियों को अपराधी बना दिया जाता है।‘ दरअसल अमेरिकी प्रशासन इस समय क्रिश्चियनिटी के प्रति अनुरागी लोगों की संख्या कम होने को लेकर चिंतित है। एक अनुमान के मुताबिक इस समय अमेरिका के शहर न्यूयार्क में 40 प्रतिशत लोग गैर क्रिश्चियन हैं। वहां इस बात पर बहस हो रही है कि क्या प्रवासियों के कारण देश की अस्मिता और वहां का रिलीजन संकट में है। अमेरिका में जिस तरह से हैती और सीरियन समुदाय के लोगों की संख्या बढ़ रही है उसके विरुद्ध जनमानस तैयार करने का प्रयास ट्रंप और उनके सहयोगी कर रहे हैं। अब तो इसपर भी बात होने लगी है कि जिस धर्म को माननेवाले आतंकवादियों ने वर्ल्ड ट्रेड टावर पर हमला किया और अमेरिका को चुनौती दी उसी समुदाय के लोग एक बार फिर इकट्ठा होकर क्रश्चियनिटी को चुनौती देते प्रतीत हो रहे हैं। उस समुदाय को कम्युनिस्टों का प्रत्यक्ष समर्थन भी मिल रहा है। अमेरिकियों का एक पढ़ा लिखा तबका भी उनके समर्थन में दिखता है। स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह से तुष्टीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है उसको लेकर ट्रंप और उनकी पार्टी के लोग अमरिका में चिंता का माहौल बनाने का प्रयास करते दिख रहे हैं।
भारत में कम्युनिस्टों की स्थिति को देखें तो ऊपरी तौर पर ये लगता है कि चुनावों में उनकी निरंतर हार के बाद वो अपने सबसे बुरे दौर में हैं। कम्युनिस्ट भले ही कमजोर प्रतीक हो रहे हों लेकिन जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस पार्टी को समर्थन करना आरंभ किया है उसको रेखांकित करना आवश्यक है। कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी के हैदराबाद प्लेनरी सेशन में स्पष्ट रूप से ये माना था कि पार्टी की हिंदुत्व के कारण नहीं बल्कि अपनी संगठन की कमजोरी से जूझ रही है। वही राहुल गांधी कालांतर में कम्युनिस्टों के एजेंडे पर आते दिखे। आज कांग्रेस पार्टी की नीतियों में कम्युनिस्ट विचारों की छाप स्पष्ट दिखती है। हिंदुत्व पर आक्रमण अब पार्टी के केंद्र में है। इसके अलावा अकादमिक जगत में अब भी कम्युनिस्टों के प्रभाव को महसूस किया जा सकता है। विशेषकर भाषा और संस्कृति के विषयों में जिस तरह की पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं उनमें वामपंथी विचार और उसके पैरोकारों की बहुलता है। अब भी कई विश्वविद्यासयों में कल्चरल स्टडीज के पाठ्यक्रम में वाम विचार की प्रधानता है। ये वही विचार है जो भारत और भारतीयता के विषयों और सिद्धांतों का निषेध करने के लिए विदेशी और आयातित विचारों को लेकर आते हैं। विदेशी विचारों के आधार पर अकादमिक जगत में विमर्श होते हैं। अमेरिका में भी पढ़े लिखे लोगों के एक वर्ग के कम्युनिस्ट विचार को आगे बढ़ाने वाले के तौर पर पहचान की गई है। भारत में तो स्वाधीनता के बाद लंबे समय तक उनको ही पढ़ा लिखा माना जाता रहा जो कम्युनिस्ट थे या फिर मार्क्स के अनुयायी थे। कहना ना होगा कि अब भी यह प्रवृत्ति अकादमिक जगत में है कि वहां कोई पढ़ा लिखा या विद्वान तभी समझा जाता है जब उसकी आत्मा लेफ्ट की तरफ झुकी हो। सुविचारित तरीके से ये बात फैलाई गई कि दक्षिणपंथ में प्रतिभा की कमी है।
यह अनायास नहीं है कि अमेरिका अपने देश और धर्म को सांस्कृतिक मार्क्सवाद से बचाकर रखना चाहता है। वहां चिंता इस बात पर है कि संस्कृतिक मार्क्सवाद पहले परिवार नाम की संस्था को नुकसान पहुंचाता है। फिर धर्म को निशाना बनाता है और निजी संपत्ति को लेकर विरोध का माहौल बनाता है। इन सब लक्ष्यों को पूरा करके वो राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने के लक्ष्य की ओर बढ़ता है। हमारे देश में भी स्वादीनता के बाद सांस्कृतिक मार्क्सवाद के दुष्परिणामों को देखा जा सकता है। किस तरह से संयुक्त परिवार की अवधारणा को एकल परिवार की तरफ मोड़ दिया गया। धर्म की तुलना अफीम से करके नास्तिकता को बढ़ावा दिया गया। जो लोग धार्मिक प्रतीक चिन्हों को धारण करते थे उनको पोंगापंथी या दकियानूसी करार दिए जाते सबने देखा है। पिछले लोककसभा चुनाव में निजी संपत्ति के स्कैनिंग करवाने जैसे बयान भी सुने गए थे। इसके बाद राष्ट्र की अवधारणा को प्रश्नांकित कर उसको कमजोर करने के मंसूबे भी स्पष्ट ही हैं। सांस्कृतिक मार्क्सवाद की इस राह की सबसे बड़ी बाधा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके विचार हैं। सभ्यतागत मूल्यों की पुनर्स्थापना के प्रयत्नों से नरेन्द्र मोदी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जड़ें मजबूत कर रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि अमेरिका की तरह भारत में कम्युनिस्टों के विरोध में निरंतर बोला और लिखा जाना चाहिए। महत्वपूर्ण यह भी है कि अकादमिक जगत में उनके वर्चस्व को चुनौती देने का संगठित प्रयास हो।

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