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Saturday, August 15, 2026

दिमागी नक्सलियों से निपटने की चुनौती


स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किला की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही, जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नक्सलवाद, माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया। नक्सलवाद ने चार-पांच दशक तक हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से को, बहुत बड़ी आबादी को दबोच कर रखा। बंदूक की नोक पर दबोच रखा था। संविधान की धज्जियां उड़ा दी थीं। देश के समान्य नागरिकों की रक्षा में 3500 से ज्यादा सुरक्षा बल के जवान शहीद हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि उनको खुशी है कि नक्सलवादी-माओवादी हिंसा को आखिरी सांस लेने की ताकत भी नहीं बची। जहां पर कभी नक्सलियों की गोलियां चलती थी, जहां कभी धरती रक्त रंजित रहा करती थी, आज उन्हीं नक्सल क्षेत्रों में विकास, विश्वास और प्रयास का तिरंगा लहरा है। यहां तक तो प्रधानमंत्री अपनी सरकार की सफलता के बारे में बात कर रहे थे लेकिन इसके बाद प्रधानमंत्री ने जो कहा उसपर वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हथियारी नक्सल तो गए लेकिन दिमागी नक्सल बचे हैं। दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। वो हिंसा और अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव चल रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा। सुरक्षित भारत बनाना हम सबका दायित्व है। चुनौती सीमा के भीतर हो या सरहद के बाहर भारत हर परिस्थिति के लिए तैयार है।

प्रधानमंत्री की उपरोक्त बातों के आलोक में हम पिछले तीन चार महीने में घटी घटनाओं पर नजर डालते हैं। सबसे पहले अयोध्याजी के श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी के प्रकरण को देखते हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय अपराध था। इसमें लिप्त लोगों की गिरफ्तारी हुई। सभी जेल में हैं। विशेष जांच दल इसकी पड़ताल में जुटा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस केस पर नजर रखे हुए हैं। ये आपराधिक घटना कोई साधारण अपराध नहीं है इस कारण अपराधियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और उनको कठोर दंड भी मिलना चाहिए। अब इसका दूसरा हिस्सा देखते हैं जो इस अपराध से अधिक खतरनाक है। चढ़ावा चोरी की घटना को सनातन से जोड़ कर सनातन को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। संसद परिसर में एक निर्दलीय सांसद ने भगवा पहनकर सनातन के प्रतीकों के साथ सनातन को बदनाम करने के लिए एक प्रहसन किया। इस प्रहसन में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने पात्र के तौर पर हिस्सा लिया। हिंदुओं के आराध्य प्रभु श्रीराम की तस्वीर जिस तरह से जमीन पर गिराकर अपमान किया गया उसको भी याद रखा जाना चाहिए। सनातन पर आक्रमण करके भारत की आत्मा पर चोट पहुंचाने का प्रयास किया गया। भारत की सभ्यता और संस्कृति पर चोट की गई। भारत विचार पर कुठाराघात किया गया। सनातन को कठघरे में खड़े करने का विचार दिमागी नक्सलियों का हो सकता है। उन्होंने इसकी रूपरेखा तय की होगी और कुछ दलों को चुनावी लाभ का स्वप्न दिखाया होगा। दिमागी नक्सली जब किसी को अपने कब्जे में लेते हैं तो सबसे पहले उसके दिमाग पर कब्जा करते हैं। फिर उसको लाभ होने या दिलाने का आश्वासन देकर अपने जाल में फांसते हैं। इस बात की चिंता किए बगैर कि उसके इस कदम के देश कितना और किस हद तक प्रभावित होगा। चढ़ावा चोरी प्रकरण में पूरे देश ने दिमागी नक्सलियों की इन करतूतों को देखा कि कैसे एक आपराधिक घटना को सनातन से जोड़कर उसका राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास किया गया।

दूसरा उदाहरण दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए युवाओं के प्रदर्शन के बाद की घटनाओं के विश्लेषण से निकलता है। अब ये बात लगभग स्पष्ट हो चुकी है कि जंतर-मंतर के आंदोलन का जिन लोगों ने नेतृत्व किया उनका सिरा आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ था। यहां तक तो ठीक था। किसी भी राजनीतिक दल को ये अधिकार है कि वो अपने दांव पेंच से अपने राजनीतिक विरोधियों को घेरे, कभी सामने से आकर और कभी परोक्ष रूप से। पर जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के दौरान वहां जिस तरह के नारे लगे। जिस तरह के भाषण दिए गए उसके पीछे की मंशा साफ थी। जंतर-मंतर पर नारे लगे कि मेरा लिंग मेरी मर्जी, मेरा जेंडर मेरी मर्जी, मेरे कपड़े मेरी मर्जी। वहीं कुछ प्रदर्शनकारियों के बयानों के निहितार्थ परिवार और शादी नाम की संस्था को चुनौती देनेवाले थे। एक तरफ एक संस्था पिछले सौ वर्षों से भारत और भारतीयता को लेकर आगे चल रही है। अपनी संस्था के सौ वर्ष पूरे होने पर परिवार नाम की संस्था को बल प्रदान करने के लिए कुंटुब प्रबोधन जैसा देशव्यापी कार्यक्रम चला रही हो, जिसमें नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, भाषा और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य बताए जाते हों ताकि राष्ट्र मजबूत हो सके। दूसरी तरफ दिमागी नक्सली परिवार नाम की संस्था को ही खारिज करते हैं। वो किशोरों और युवाओं के मन में स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता का बीज बोना चाहते हैं। ये दो तरह के विचारों की लड़ाई है। एक भारतीय विचार जो परिवार को जोड़कर राष्ट्र को मजबूत करना चाहता है और दूसरा जो परिवार को कमजोर करके देश को कमजोर करना चाहता है। कहा भी जाता है कि देश एक बड़ा परिवार है और परिवार एक छोटा देश है। तो सनातन से लेकर भारतीय मूल्यों पर हमला करना ही दिमागी नक्सलियों का ध्येय है।

अर्बन नक्सल वो होते थे जो परोक्ष रूप से माओवादी हिंसा का समर्थन करते थे। उनके पक्ष में माहौल बनाकर देश के युवाओं को गुमराह करके माओवाद के रोमांटिसिज्म की ओर ले जाते थे। दिमागी नक्सल वो हैं जो अकादमिक जगत में भारतीय ज्ञान परंपरा का विरोध करते हैं। उसको दकियानूसी और रूढ़ीवादी बताकर खारिज करते हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के 12 वर्षों में अकादमिक जगत में ये दिमागी नक्सल कमजोर अवश्य हुए हैं लेकिन अपनी उपस्थिति का एहसास समय-समय पर करवाते रहते हैं। सरकारी सिस्टम में भी इनकी जड़ें बहुत गहरी हैं। विशेषकर शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में तो ये अब भी सक्रिय ही नहीं ताकतवर भी हैं। दिमागी नक्सलियों ने कमजोर पड़ने की आशंका में रणनीति बदल ली है। अब वे तिलक लगाकर सनातनी होने का स्वांग रचकर अपनी पहचान छिपाते हैं। तमाम तरह के लाभ लेते हैं। समय आने पर राष्ट्रवादी ताकतों का परोक्ष रूप से विरोध करते हैं और उनको अपने लक्ष्य से दूर करने के लिए राह में रोड़ा भी अटकाते हैं। कई बार तो बहुत साफ दिखता है कि ये हो रहा है लेकिन सिस्टम में दिमागी नक्सलियों की मजबूककी के कारण कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए प्रधानमंत्री की चेतावनी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। देश में सक्रिय दिमागी नक्सलियों की पहचान करने और उनको आइसोलेट करने का कार्य समाज को भी करना होगा। जब तक सामाजिक रूप से ये आइसोलेट नहीं होंगे तबतक वो रूप बदल बदलकर किशोरों और युवाओं को भटकाते रहेंगे।