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Friday, October 5, 2012

राजनीति के चर्निंग प्वाइंट्स

आजाद भारत के इतिहास में ए पी जे अब्दुल कलाम को जनता का राष्ट्रपति कहा गया । हो सकता है कलाम पर ये टिप्पणी करते वक्त विशेषज्ञों को गणतंत्र के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद का स्मरण नहीं रहा हो । लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि ए पी जे अब्दुल कलाम को सक्रिय राष्ट्रपति माना जा सकता है । उनके कार्यकाल में राष्ट्रपति भवन के बड़े बड़े लोहे के गेट आम जनता और महामहिम के बीच बाधा नहीं बने । राष्ट्रपति भवन बच्चों, युवाओं और वैज्ञानिकों के लिए हमेशा खुला रहता था । अपने कार्यकाल के दौरान कलाम ने राष्ट्रपति भवन को देश के विकास का ब्लू प्रिंट तैयार करने का केंद्र बना दिया था । एक राष्ट्रपति के रूप में कलाम का उद्देश्य जनता के दिमाग को उस स्तर पर ले जाना था ताकि एक महान भारत का निर्माण हो सके । राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने अपना एक विजन- पी यू आर ए (प्रोविज्न ऑफ अरबन एमिनिटीज इन रूरल एरियाज) देश के सामने पेश किया  जिसके मुताबिक 2020 तक भारत को एक पूर्ण विकसित राष्ट्र हो जाना है। इन वजहों से उस दौर में लोग राष्ट्रपति भवन को समाज में बदलाव की प्रयोगशाला तक कहने लगे थे ।
इनमें से कई बातों का खुलासा भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम की नई किताब- टर्निंग प्वाइंटस, ए जर्नी थ्रू चैलेंजेस में हुआ है । कलाम की इस किताब को उनकी पहले लिखी किताब विंग्स ऑफ फायर का सीक्वल बताया गया है । भारतीय प्रकाशन जगत में कलाम की आत्मकथा विंग्स ऑफ फायर एक सुखद घटना की तरह है । 1999 में कलाम की आत्कथा छपकर आई थी जिसमें कलाम ने अपनी जिंदगी के कहे ,अनकहे पहलुओं पर लिखा था और उसमें 1992 तक की उनकी जिंदगी दर्ज थी । पहले अंग्रेजी में छपी उस किताब को पाठकों ने हाथों हाथ लिया । फिर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में उसका अनुवाद किया गया । एक अनुमान के मुताबिक विंग्स ऑफ फायर की अबतक दस लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं । विंगस ऑफ फायर के प्रकाशन के तेरह साल बाद उसका सीक्वल टर्निंग प्वाइंट बाजार में आया है और उसकी भी बिक्री अच्छी हो रही है । इस बार बिक्री के पीछे प्रकाशक की रणनीति भी काम कर रही है । पुस्तक प्रकाशन के पहले प्रकाशक ने उसके चुनिंदा मगर विवादास्पद हिस्सों को जानबूझकर लीक किया ताकि किताब के प्रति पाठकों के बीच एक जिज्ञासा पैदा हो सके ।
इस किताब में 2004 में कांग्रेस को सरकार बनाने के न्योता का जिक्र है । जनता पार्टी के मैवेरिक नेता सुब्रह्म्ण्यम स्वामी ने इस बात को कई बार और कई मंचों से उठाया कि कलाम ने 17 मई 2004 को दोपहर साढे तीन बजे सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा था । उस पत्र में इस बात का संकेत दिया था कि भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने में सोनिया के विदेशी मूल का होना आड़े आ सकता है । स्वामी ने इस बात का पुरजोर प्रचार किया कि उसके बाद ही सोनिया गांधी ने मजबूरी में मनमोहन सिंह का नाम प्रधानमंत्री के तौर पर प्रस्तावित किया । लेकिन कलाम ने अपनी इस किताब में उस घटना का कुछ और ही वर्णन किया है । कलाम ने हलांकि इस पूरी घटना को अपनी किताब में कोई खास तवज्जो नहीं दी है और तकरीबन डेढ़ पन्नों में उसे निबटा दिया है । बेहद साफगोई से कलाम ने लिखा है कि सोनिया गांधी पहली बार उनसे मनमोहन सिंह के साथ 18 मई की दोपहर सवा बारह बजे मिली और सहयोगी पार्टियों के समर्थन का खत इकट्ठा करने के लिए एक दिन का वक्त मांगा । जब कलाम ने उनसे कहा कि देर नहीं होनी चाहिए तो फिर उसी दिन रात के सवा आठ बजे सोनिया गांधी और मनमोहन उनके दफ्तर पहुंचे और सहयोगी दलों के समर्थन की चिट्ठियां सौंप दी । जिसके बाद कलाम ने सोनिया को सरकार बनाने का न्योता दिया । कलाम ने सोनिया से कहा कि राष्ट्रपति भवन को उनके दिए वक्त के मुताबिक शपथ ग्रहण समारोह के लिए तैयार रहेगा। कलाम के इस न्योते के बाद सोनिया गांधी ने उनको बताया कि उन्होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के तौर पर नामित किया है । कलाम ने लिखा है कि सोनिया के उस फैसले से वो निश्चित रूप से चकित रह गए थे और राष्ट्रपति भवन को मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री नियुक्त करने और प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने के न्योते का खत फिर से बनाना पड़ा था । कलाम की इन बातों से साफ है कि सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री नियुक्त नहीं करने के बारे में जो बातें फैलाई गई थी वो तथ्यहीन थी । लेकिन टी जे  एस जॉर्ज जैसे लोग कलाम के इस खुलासे की टाइमिंग पर सवाल खड़े करने लगे हैं । जॉर्ज ने देश में के नए राष्ट्रपति के चुनाव के वक्त कलाम की किताब के छपने और उसमें सोनिया प्रसंग पर सफाई होने को एक साथ जोड़कर देखा है । जॉर्ज का तर्क है कि जब ममता और मुलायम कलाम का नाम चला रहे थे तो उस बीच इस सफाई के गहरे नितितार्थ हैं । जॉर्ज शायद ह भूल गए कि किताबें एक दिन में तैयार नहीं होती है । इसके अलावा जॉर्ज ने विवादित विकीलीक्स केबल्स का भी हवाला देते हुए कलाम के खुलासे को कठघरे में खड़ा किया है ।
इसके अलावा इस किताब में एक और विवादित प्रसंग का जिक्र है । 2002 में कलाम जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने सबसे पहले गुजरात जाने का फैसला लिया जो उस वक्त दंगों की आग में झुलस रहा था । किताब प्रकाशित होने के पहले इस बात को प्रचारित किया गया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कलाम को गुजरात नहीं जाने की सलाह दी थी । उस सलाह के हवाले से दिल्ली के सियासी गलियारे में और भी बातें-अफवाहें फैली थी । लेकिन कलाम ने अपनी नई किताब में इस विवाद को भी बेवजह का करार दिया है । कलाम ने स्थिति साफ करते हुए लिखा है कि - प्रधानमंत्री वाजपेयी ने गुजरात जाने पर आपत्ति् नहीं उठाई थी बल्कि ये जानना चाहा था कि क्या ऐसे वक्त में उनका गुजरात जाना जरूरी है । कलाम ने उस वक्त वहां जाने का फैसला लिया और अपनी किताब में आह्लादित होकर इस बात का भी जिक्र किया है कि जब वो गुजरात पहुंचे तो हवाई अड्डे पर अगवानी करने के लिए वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ मौजूद थे । कलाम ने इस बात पर भी संतोष जताया कि वो जिस भी दंगा प्रभावित इलाके में गए मोदी हमेशा साए की तरह उनके साथ रहे । कलाम ने अपने इस दौरे को दंगा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने वाला दौरा करार दिया है । कलाम के मुताबिक उनके दौरे से पीड़ितों के मन में ये विश्वास जगा कि दुख की उस घड़ी में पूरा देश उनलोगों के लिए चिंतित है ।
इसके अलावा इस किताब में कलाम ने अपनी जिंदगी के कई टर्निंग प्वाइंट्स गिनाए हैं । कलाम ने ऑफिस ऑफ प्राफिट बिल को संसद को पुनर्विचार करने के लिए लौटा दिया था । आजाद भारत के इतिहास में ये पहली बार हुआ था जब किसी राष्ट्रपति ने संसद को कोई बिल पुनर्विचार के लिए लौटा दिया हो । इसके अलावा कलाम ने इस किताब में एक प्रसंग में ये भी लिखा है कि वो खिन्न होकर इस्तीफे का मन बना चुके थे लेकिन मनमोहन सिंह के अनुरोध पर उन्होंने इस्तीफा देने का विचार त्याग दिया । प्रसंग था बिहार में 2005 के विधानसभा चुनाव के बाद बनी नीतीश सरकार को बर्खास्त करने के अध्यादेश पर दस्तखत करने के बाद का । जब बर्खास्तगी का ये मामला सुप्रीम कोर्ट में गया तो कलाम ने ये इच्छा जाहिर की थी कि सरकारी वकील के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में उनका भी पक्ष रखा जाए । सरकार ने उनकी उस इच्छा का सम्मान नहीं किया । खिन्न राष्ट्रपति ने अंतर्रआत्मा की आवाज पर इस्तीफा तैयार कर लिया था । उनका तर्क था कि राष्ट्रपति सिर्फ सरकार का रबर स्टांप नहीं हो सकता है । वो अपना इस्तीफा उस वक्त के उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत को सौंपना चाहते थे । लेकिन वो दिल्ली से बाहर थे । उसी दौर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनसे मिलने आए और कलाम ने उनको अपने इस्तीफा दिखाकर पद छोड़ने की इच्छा जताई । कलाम के मुताबिक उस वक्त माहौल इतना संवेदनशील हो गया था जिसका वर्णन नहीं हो सकता है । मनमोहन सिंह ने उनसे इस्तीफा नहीं देने की गुजारिश की और कहा कि अगर आप इस्तीफा दे देंगे तो हो सकता है सरकार गिर जाए । अगली सुबह की नमाज के बाद कलाम चिंतन में बैठे और इस्तीफा नहीं देने का फैसला हो गया ।
इस किताब में इन विवादित प्रसंगों के अलावा कलाम ने विस्तार से उन बातों को रखा है कि उस दौर में किस तरह से राष्ट्रपति भवन ने कई मामलों में सार्थक कदम उठाए थे । किस तरह से सांसदों और विधायकों के अलावा देश के नीति नियंताओं के साथ मुलाकात कर विकास की दिशा में आगे बढ़ने की योजनाएं बनाई जाती थी । कलाम ने अपने पांच साल के कार्यकाल में दस बार राष्ट्र को संबोधित किया । उनके भाषण लेखन को लेकर एक दिलचस्प प्रसंग इस किताब में है । उन्होंने बताया है कि उनका भाषण कई कई बार लिखा जाता था । दो हजार पांच के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिए गए उनके भाषण को 15 बार लिखा गया । इलके अलावा 25 अप्रैल 2007 को कलाम को यूरोपियन पार्लियामेंट में भाषण देना था । उस भाषण के 31 ड्राफ्ट हुए जिसके बाद वो फाइनल हो पाया । इससे पता लगता है कि कलाम हर मामले में परफेक्शनिस्ट थे । कलाम ने अपनी इस किताब में विकास की अनेक संभावनाओं के संकेत भी किए हैं । कलाम वैज्ञानिक सहायक के पद से देश के राष्ट्रपति के पद तक पहुंचे । अपने उन अपने जीवन के अहम मोड़ को इस किताब में रेखांकित किया है । लेकिन अगर हम इस किताब को साहित्य और आत्मकथा की कसौटी पर रखेंगे तो निराशा होगी क्योंकि यहां घटनाओं का सिर्फ सपाट वर्णन है । कलाम सार्वजनिक जीवन में उच्च सिद्धांतों और सादगी के प्रतीक हैं और उनका जीवन बहुतों के लिए प्रेरणादायी । इसलिए आश्चर्य नहीं होगा कि अगर ये किताब भी विंग्स ऑफ फायर की तर्ज पर खासी लोकप्रिय होगी ।

Sunday, September 16, 2012

सार्थक विमर्श की उम्मीद


आज से तकरीबन पचानवे साल पहले 1 जुलाई 1917 को महात्मा गांधी ने लिखा था- चौथी प्रवृत्ति हिंदी भाषा के प्रचार की है । जो स्थान इस समय अनुचित ढंग से अंग्रेजी भोग रही है वह स्थान हिंदी को मिलना चाहिए । इस विषय में मतभेद का कोई कारण ना होने पर भी मतभेद होना दुर्भाग्य की बात है । शिक्षित वर्ग को एक भाषा अवश्य चाहिए और वह हिंदी ही हो सकती है । हिंदी के द्वारा करोड़ों व्यक्तियों में आसानी के काम किया जा सकता है । इसलिए उसे उचित स्थान मिलने में जितनी देर हो रही है, उतना ही देश का नुकसान हो रहा है । (सं. गां. वा, खंड 13, पृ. 425)

गांधी के इस वक्तव्य के साढे नौ दशक बाद भी हम अपनी भाषाई अस्मिता को लेकर सजग नहीं हो पा रहे हैं । वैश्वीकरण और बाजारवाद के प्रभाव में आज हिंदी पहले से ज्यादा संक्रमण काल से गुजर रही है । आज हिंदी के साथ अंग्रेजी के शब्दों का ऐसा घालमेल शुरू हो गया है जिससे हम अपनी भाषा को दूषित करने में जाने अनजाने सहयोग कर रहे हैं । हम दिल मांगे मोर कहने लगे हैं । किसी भी भाषा के शब्दों के प्रयोग में कोई बुराई नहीं है । यह भी तय है कि हिंदी इतनी कमजोर भी नहीं है कि दूसरी भाषा के शब्द उसमें समाहित होकर उसको खत्म कर दे । लेकिन जब दूसरी भाषा के शब्द हिंदी के मूल शब्दों को विस्थापित करने लगे तो खतरे की घंटी बजने लगती है । हिंदी को अगर हम वैश्विक संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं तो वो पहले से ज्यादा डरी और सहमी नजर आती है । वैश्वीकरण के प्रभाव और बाजारवाद के दबाव के बावजूद हिंदी का फैलाव तो हुआ है लेकिन उसका प्रयोग कम होने लगा है जो चिंता की बात है । यहां यह सवाल उठता है कि हिंदी के कर्ता-धर्ता या फिर जिनके मजबूत कंधों पर हिंदी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है वो उसकी दशा और दिशा को लेकर कितने संजीदा हैं । अगर हम इस सवाल से टकराते हैं तो हमें साफ तौर पर यह नजर आता है कि हमारी भाषा हिंदी को हिंदी के दिग्गजों से अपेक्षित महत्व नहीं मिलने की वजह से वो सहमी और डरी नजर आती है और दिल मांगे मोर कहने वालों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है । अंग्रेजी और अन्य भाषाओं द्वारा हिंदी की भाषाई अस्मिता पर हो रहे इस मौन हमले को लेकर हिंदी समाज का चिंतित नहीं होना ही खतरनाक है ।
हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं काम कर रही हैं । केंद्रीय हिंदी संस्थान से लेकर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय तक । सरकारी स्तर पर भी हिंदी के फैलाव को लेकर गाहे बगाहे गंभीर प्रयास होते हैं बहुधा रस्म अदायगी होती है । आज आवश्यकता राजसत्ता की भाषा में आमूलचूल बदलाव लाने की । इसके लिए सरकार के स्तर पर मजबूत इच्छाशक्ति और गंभीरता से प्रयास होना जरूरी है । हिंदी आज भारत में करीब साठ करोड़ लोगों की भाषा है, देश की राजभाषा है लेकिन अब भी वो देश के सत्ता प्रतिष्ठानों की भाषा नहीं है । आज अंग्रेजी का गुणगान करनेवाले लोग बहुधा ये तर्क देते हैं कि हिंदी में अभिव्यक्ति की वो ताकत नहीं है जो अंग्रेजी भाषा के शब्द हमें उपलब्ध करवाते हैं । ऐसे लोगों की मशहूर भाषाविज्ञानी जॉर्ज ग्रियर्सन की एक टिप्पणी को देखनी चाहिए जो उन्होंने लिगंविस्टिक सर्वे के खंड नौ के पहले भाग में कही है जिन बोलियों से हिंदी की उत्पत्ति हुई है उनमें ऐसी विलक्ष्ण शक्ति है कि वो किसी भी ऐसे विचार को पूरी सफाई के साथ अभिवयक्त कर सकती है, जो विचार मनुष्य के मस्तिष्क में समा सकते हैं और इन बोलियों में ये शक्ति आज उत्पन्न नहीं हुई वह उनके भीतर पिछले पांच सौ साल से विद्यमान है.....हिंदी के पास देशी शब्दों का अपार भंडार है और सूक्ष्म से सूक्ष्म विचारों को सम्यक रूप से अभिव्यक्त करने के उसके साधन भी अपार हैं ।  इसके बाद सारे तर्क धरे रह जाते हैं ।
इसी विषय भाषा की अस्मिता और हिंदी का वैश्विक संदर्भ- पर दक्षिण अफ्रीका में तीन दिनों तक देश विदेश के विद्वान मंथन करने जा रहे हैं । मौका है नवें विश्व हिंदी सम्मेलन का जिसे भारत का विदेश मंत्रालय करीब पांच साल बाद आयोजित कर रहा है । इसके पहले आठवां विश्व हिंदी सम्मेलन जुलाई 2007 में न्यूयॉर्क में आयोजित हुआ था । इस बार विश्व हिंदी सम्मेलन को नौ सत्रों में बांटा गया है जिसमें महात्मा गांधी की भाषा दृष्टि और वर्तमान का संदर्भ, हिंदी- फिल्म, रंगमंच और मंच की भाषा, सूचना प्रद्योगिकी-देवनागरी लिपि और हिंदी का सामर्थ्य, लोकतंत्र और मीडिया की भाषा के रूप में हिंदी, ज्ञान-विज्ञान और रोजगार की भाषा के रूप में हिंदी आदि प्रमुख हैं । इस मंथन से क्या निकलता है ये तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन हमें ये देखना होगा कि इसके पहले आयोजित आठ विश्व हिंदी सम्मेलनों में पारित प्रस्ताव पर हम कितना अमल कर पाए हैं । पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 10-12 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ ता जिसमें मुख्य रूप से तीन प्रस्ताव पारित हुए थे । पहला- संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाई जाए । दूसरा विश्व हिंदी विद्यापीठ की स्थापना वर्धा में हो और तीसरा विश्व हिंदी सम्मेलनों को स्थायित्व प्रदान करने के लिए अत्यंत विचारपूर्वक एक योजना बनाई जाए । सबसे पहले तो हमें ये देखना चाहिए कि पहले विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन के सैंतीस साल बाद भी तीसरे प्रस्ताव पर अमल नहीं हो पाया है । अभी तक विश्व हिंदी सम्मेलन की ना तो कोई तारीख तय है और ना ही उसके आयोजन की आवर्तिता । सैंतीस साल में सिर्फ नौ सम्मेलन का आयोजन इस बात को दर्शाता है कि हम अपनी भाषा को लेकर कितने गंभीर हैं , हमें उसकी कितनी चिंता है । 2007 में अमेरिका में हुए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन में सिर्फ सवा छह करोड़ रुपए खर्च हुए थे लेकिन अंतराष्ट्रीय मंच पर हिंदी की धमक को महसूस किया गया था । लेकिन उसके पांच साल बाद तक सम्मेलन का आयोजन नहीं होने से उस धमक की गूंज पहले तो हल्की हुई और फिर विश्व पटल पर कहीं गुम सी हो गई ।  पहले विश्व हिंदी सम्मेलन मे हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए प्रयत्न के प्रस्ताव के अट्ठाइस साल बाद पारामारिबो, सूरीनाम में आयोजित सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन में भी वही प्रस्ताव पारित किया गया । आजादी के पैंसठ साल बाद भी अगर हम अबतक संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को मान्यता नहीं दिलवा पाए हैं तो ये करोड़ों हिंदी भाषी लोगों की रहनुमाई करनेवालों की इच्छाशक्ति की कमी को उजागर करता है ।
इस बार जोहानिसबर्ग में आयोजित होनेवाले विश्व हिंदी सम्मेलन में सत्रों में सार्थक विमर्श की गुंजाइश नजर आ रही है । उम्मीद की जा रही है कि जिस धरती पर गांधी ने लंबा समय बिताया वहां की धरती से एक बार फिर हिंदी को मजबूत करने का संकल्प लिया जा सकेगा । राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि अंग्रेजी के विरुद्ध भारतीय भाषाओं की महिमा गांधी ने भारत आकर नहीं समझी, उसे वो दक्षिण अफ्रीका में ही समझ चुके थे । गांधी ने भी हिंद स्वराज्य में लिखा है हर एक पढ़े लिखे हिन्दुस्तानी को अपनी भाषा का, हिंदू को संस्कृत का, मुसलमान को अरबी का, पारसी को पर्शियन का और सबको हिंदी का ज्ञान होना चाहिए ।अब एक बार फिर से हिंदी के तमाम कर्ता-धर्ता गांधी की उसी धरती पर जा रहे हैं जहां पर गांधी को अपने अनुभवों से इस बात के ज्ञान की प्राप्ति हुई थी कि जनता को उसकी ही भाषा में जगाया जा सकता है । विश्व हिंदी सम्मेलन की सार्थकता इस बात में होगी कि हम गांधी के विचारों पर सिर्फ विमर्श नहीं करें बल्कि उसपर अमल में लाने के लिए हर कोई अपने स्तर पर प्रयास करे । हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए यह आवश्यक है कि सबसे पहले सरकारी और शासन की जो भाषा है उसको दुरुस्त कियया जाए । आप किसी भी सरकारी बेवसाइट की हिंदी को देख लीजिए आपको इस बात का अंदाजा हो जाएगा कि वहां किस तरह की हिंदी लिखी जा रही है । अगर जोहानिसबर्ग में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में सरकारी हिंदी को सरल बनाने के लिए प्रस्ताव पारित कर भारत सरकार को सलाह दी जा सके तो यह हिंदी पर बड़ा उपकार होगा । सरकार में बैठे लोग जिस शब्दकोश का संदर्भ लेते हैं या फिर जिस शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं उसमें तत्काल सुधार करने की आवश्यकता है । दूसरा हमें विश्व हिंदी सम्मेलनों की आवर्तिता को तय करना चाहिए कि ये हर साल होगा या हर दो साल बाद होगा । इसका एक फायदा यह होगा कि हिंदी की विश्व की मीडिया में इस पर चर्चा होगी और हिंदी भाषा के पक्ष में विश्व जनमानस में एक उत्सुकता पैदा होगी ।
अंत में रामधारी सिंह दिनकर का एक वाक्य याद आ रहा है - भाषा का प्रश्न केवल सांस्कृतिक प्रश्न नहीं है । अवस्था विशेष में वह राजनीतिक एकता से भी जुड़ जाता है, उसका असर देश की स्वाधीनता पर भी पड़ता है । - मैं सिर्फ उसमें एक शब्द जोड़ना चाहता हूं कि उसका असर हमारी संप्रभुता पर भी पड़ता है ।

पुरानी तकनीक, नया संग्रह

समकालीन हिंदी कहानी के परिदृष्य पर नजर डालें तो की युवा कथाकारों ने अपनी कहानियों में शिल्प के अलावा उसके कथ्य में भी चौंकानेवाले प्रयोग किए हैं । आज की नई पीढ़ी के कहानीकारों के पास अनुभव का एक नया संसार है जिसको वो अपनी रचनाओं में व्यक्त कर रहे हैं । पहले यह माना जाता था कि जो कहानीकार रूप और शिल्प में नयापन पेश करेगा वह पाठकों को अपनी ओर खींच लेगा और आलोचक भी उनकी कृतियों का नोटिस लेने को विवश हो जाएंगे । लेकिन नई पीढ़ी ने जिसमें वंदना राग, मनीषा कुलश्रेष्ठ, जयश्री राय और गीताश्री जैसी कई कहानीकारों ने रूप और शिल्प के अलावा विषय की नई भावभूमि से पाठकों को रूबरू कराया । विषय और अनुभव के नए प्रदेश में पाठकों को ले जाने का कहानीकारों का यह प्रयोग सफल भी हुए हैं और हिंदी जगत ने उनका नोटिस भी लिया । पर हिंदी में कुछ कहानीकार ऐसे हैं जो पुरानी पद्धति और लीक पर ही कहानियों का सृजन कर रहे हैं । अल्पना मिश्र का कहानी संग्रह - क़ब्र भी क़ैद औज़ंजीरें भी उसी तरह के संग्रहों में से एक है । नौ कहानियों के इस संग्रह में अल्पना ने गोरिल्ला तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अपने पाठकों को चौंकाने की कोशिश की है । हिंदी कहानी में यह तकनीक बेहद पुरानी हो चुकी है जहां अचानक से किसी अनपेक्षित स्थितियों पर ले जाकर कहानी खत्म कर दी जाती है । अल्पना मिश्र के संग्रह की पहली कहानी गैरहाजिरी में हाजिर- में भी कथाकार इसी तकनीक का इस्तेमाल करती है । इस कहानी में शुरू से लेकर आखिर तक समाज और अफसरशाही में गहरे तक जमे जाति व्यवस्था को उघारते हैं । फिर भटकते हुए लाल बिंदी के बहाने से समाज की एक और बुराई की तरफ इशारा करती हैं । लेकिन जब कथा अपने मुकाम पर पहुंच रही होती है तो अंत में नायिका के भाई की अनायास मौत पर कहानी खत्म होती है ।
दूसरी कहानी गुमशुदा भी अल्पना मिश्रा की सपाट बयानी का बेहतरीन नमूना है । एक बछड़े की मौत के बहाने वो नेताओं पर मीडिया पर कटाक्ष करती है लेकिन कहानी को संभाल नहीं पाती है । इस कहानी में अल्पना एक जगह बताती हैं कि एक खबरिया चैनल को एक नेता धमका कर अपने कवरेज के लिए तैयार कर लेता है । धमकी के बाद चैनल से वहां एक कर्मचारी भेजा जाता है जिसे कैमरा चलाना नहीं आता लेकिन वो वहां पहुंचकर अपनी उपस्थिति मात्र से चैनल को नेता के प्रकोप से बचा लेता है । यहां तक तो ठीक था लेकिन उसके बाद अल्पना ने कह दिया कि नेता जी चैनल पर भाषण देकर अखबारों को फोन करने लगे । स्थिति बड़ी विकट है जब रिकॉर्डिंग नहीं आती तो नेता का चैनल पर भाषण कैसे हो सकता है । कहानी में अल्पना की कल्पना को देखते हुए रूस के मशहूर समीक्षक विक्टर श्क्लोव्सकी के विचार साफ तौर पर याद आते हैं जब वो कहते हैं- प्लाट जीवन एवं मानव संबंधों के व्यवस्था क्रम के बारे लेखक की अपनी समझदारी को दर्शाता है । इस कहानी में भी खबरिया चैनल और उसके प्रसारण को लेकर लेखिका की लचर समझ एक्सपोज हो जाती है ।  अल्पना की इस कहानी में कथा कई छोरों और कोनों में भटकती हुई जब कसाईबाड़े तक पहुंचती है तो फिर से घटना शॉक देने की कोशिश के साथ कहानी खत्म होती है ।
पुलिस पर सालों से ये आरोप लगते रहे हैं कि अपराधियों के नाम पर वो निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी दिखा कर वाहवाही लूटती है । जब से देश में आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं तब से पुलिस पर आतंकवादियों के नाम पर एक खास समुदाय के लोगों को बगैर सबूत के गिरफ्तार कर लिया जाता है । इस संग्रह की एक कहानी- महबूब जमाना और जमाने में वे- भी एक ऐसी ही कहानी है । जिसमें फुटपाथ पर अपना कारोबार करनेवाले दो बेकसूर रहमत और रामसू को पुलिस ने मुठबेड़ में मार गिराया । इस कहानी और अखबार की रिपोर्ट में ज्यादा फर्क नहीं है । इस रिपोर्टनुमा कहानी में लेखिका कुछ और पात्रों के मार्फत कथारस डालना चाहती है लेकिन पात्रों से प्रभाव पैदा नहीं हो पाता है । इसके अलावा पुष्पक विमान और महबूब जमाना और जमाने में वे, का पुलिसवाला और दुकानवाला दोनों का व्यक्तित्व एक सा दिखाया गया है । कहानियों में कहीं ना कहीं से खबर, अखबार और चैनल आदि भी आ ही जाते हैं ।
इस संग्रह की एक और कहानी मेरे हमदम, मेरे दोस्त में औरतों के प्रति समाज के नजरिए को सामने लाया गया है । नायिका सुबोधिनी और उसके पति में अनबन चल रहा होता है । इस बात का पता उसके दफ्तर के सहयोगियों को चलता है तो सब उस स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं और सुबोधिनी में अपने लिए संभावना तलाशते हैं । यह भी एक साधारण कहानी है जिसको पढ़ते हुए पाठकों के मस्तिष्क में कोई तरंग उठेगी उसमें संदेह है । इस संग्रह के अंत में नामवर सिंह का दशकों पहले का एक कथन सर्वथा उपयुक्त होगा- आज भी कुछ कहानीकार नाटकीय अंतवाले कथानकों की सृष्टि करते दिखाई पड़ते हैं, परंतु ये वही लोग हैं, जिनके पास या तो कहने को कुछ नहीं है या फिर जीवन के प्रति उनका अपना कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं है । हिंदी में किताबों के ब्लर्ब हमेशा से प्रशंसात्मक ही लिखे जाते हैं और इस संग्रह में ज्ञानरंजन ने उसका निर्वाह किया है ।

Saturday, September 15, 2012

शून्य से शिखर का सफर

भारत में धर्म और जाति आधारित राजनीति करनेवालों की खूब लानत मलामत की जाती है और यह कहा जाता है कि यह समाज को बांटने की राजनीति करते हैं । सही भी है । लेकिन उनमें से कुछ विद्वान उत्साह में पश्चिमी देशों से सीख लेने की सलाह देते हुए जाति और धर्म से उपर उठकर राजनीति करने कीनसीहत देते हैं । दरअसल ऐसा करनेवाले लोग अज्ञानता में इस तरह की बयानबाजी कर देते हैं । पश्चिमी देशों में भी जाति या नस्ल और धर्म आधारित राजनीति का अब भी बोलबाला है और वहां भी इसके खिलाफ जंग जारी है । अगर देखें तो अमेरिका में तमाम सुधारों और दावों के बावजूद वहां नस्ल या रंग और धर्म के आधार पर वोटिंग होती है और गैर अमेरिकी शख्सियत को चुनाव में जाने पर तमाम तरह के आरोपों और अपमान का दंश झेलना पड़ता है । इस बात को बेहद शिद्दत के साथ नॉर्थ करोलिना की गवर्नर बनने वाली पहली भारतीय महिला निकी हेली ने अपनी आत्मकथा या संस्मरणात्मक किताब - कांट इज नॉट एन ऑप्शन, माई अमेरिकन स्टोरी- में बताया है ।
निकी हेली जब पहली बार चुनाव लड़ रही थी तो उनपर उनके धर्म को लेकर गंभीर इल्जाम लगे थे । दरअसल सिख परिवार में पैदा होनेवाली निकी ने अपनी शादी के बाद क्रिश्चियन धर्म अपना लिया था लेकिन सिख धर्म में भी अपनी आस्था कायम रखी थी । वो शादी के बाद भी गुरुद्वारे जाती रहती थी । चुनाव के दौरान उनपर दो धर्मों को मानने के आरोप लगे जो परोक्ष रूप से क्रिश्चियन धर्म में उनकी आस्था को संदिग्ध करनेवाली थे । लिहाजा निकी को इसकी सफाई देते हुए कहना पड़ा था- क्राइस्ट में मेरा अटूट विश्वास और गहरी आस्था है और मैं हर रोज अपने फैसलों के पहले उनसे गाइडेंस लेती हूं । उन्होंने सफाई देने के अंदाज में आगे लिखा- भगवान ने हमें और हमारे परिवार को बहुत कुछ दिया है और हर रोज वो हमें काम करने की शक्ति देता है । क्रिश्चियन होने के लिए हर रोज इस बात का डंका पीटना जरूरी नहीं है बल्कि जरूरी है कि क्राइस्ट को हर वक्त जिया जाए । प्रत्यक्ष रूप से निकी ने ये बयान जरूर दिया लेकिन साथ ही उसने ये संदेश भी दे दिया कि भक्ति और पंथ को चुनने का अधिकार निहायत ही व्यक्तिगत है । इससे उसने सिखों और क्रिश्चियन दोनों को एक संदेश दे दिया ।
दरअसल अगर हम इस किताब को देखें तो इसमें अमृतसर के एक सिख परिवार के भारत से निकलकर कनाडा होते हुए अमेरिका में जाकर बसने के संघर्ष से लेकर खुद को और अपने बच्चों को स्थापित की करने की दास्तान है । करीब ढाई सौ पन्नों में लिखी गई इस किताब में एक सिख परिवार की अपने और अपने बच्चों के सपने को साकार करने की प्रेरणादायक कहानी है । निकी हेली ने लिखा है कि उनके माता पिता पंजाब में पैदा हुए थे । उनके मुताबिक उनका परिवार बेहद धनी था । उनकी मां अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास एक छह मंजिला इमारत में रहती थी जहां ऐशो आराम की तमाम सहूलियतें मौजूद थी । निकी के मुताबिक उसकी नानी को किसी पर यकीन नहीं था लिहाजा वो सारे अपनी नकदी अपने बिस्तर के गद्दे में छुकार रखती थी जिसपर वो सोया करती थी । उनकी मां राज कभी भी अपना काम खुद नहीं करती थी और उसको स्कूल ले जाने के लिए भी नौकर हुआ करते थे जो उनका बस्ता तक ढोते थे । जब भारत में महिलाओं की शिक्षा को लेकर उत्साह नहीं था उस वक्त में उसकी निकी की मां ने कानून की पढ़ाई की थी । निकी ने दावा किया है कि उसकी मां को कानून की पढ़ाई करने के बाद भारत की पहली महिला न्यायाधीश बनने का प्रस्ताव भी आया था जिसे उन्होंने ठुकरा दिया ।
दरअसल इस पारिवारिक पृष्ठभूमि को बताने के पीछे मकसद ये है कि वो साबित करे कि उसके मां-बाप ने अपना मुकाम हासिल करने के लिए कितना संघर्ष किया । किस तरह से अपनी ऐशो आराम की जिंदगी छोडकर उनके मां-बाप अपने बच्चों और अपनी बेहतरी के लिए अमेरिका चले गए । निकी के पिता अजित रंधावा कहा करते थे कि अगर कोई शख्स कड़ी मेहनत करता है और खुद के प्रति ईमानदार रहता है तो उसको सफलता के शिखर को चूमने से कोई रोक नहीं सकता है । अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए निकी बताती है कि भारत के पहाड़ी शहर धर्मशाला में उनके पिता और मां ने एक दूसरे को देखा और करीब करीब पहली नजर का प्यार शादी में बदल गया । शादी के बाद बॉयोलॉजी में पीएचडी करने के लिए अजित कनाडा के वैंकुवर के ब्रिटिश कोलंबिया युनिवर्सिटी चले गए । वहां अपनी पत्नी राज को भी बुला लिया जो अपनी आंखों में एक सपना लेकर वहां पहुंचती है । लेकिन वहां की स्थितियां उनके सपने को चकनाचूर कर देती है । छह मंजिला इमारत में रहनेवाली राज एक छोटे से घर में बगैर नौकर चाकर के खुद सारा काम संभालती है । आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए तीन जगहों पर पार्ट टाइम नौकरी करके परिवार चलाने लायक खर्चा जुटाने में पति की मदद भी करनी पड़ी । राज ने पोस्ट ऑफिस में काम किया, एवन के उत्पादों की बिक्री की और साथ ही स्पेशल बच्चों की देखभाल का काम करके पैसे जुटाए ।
लेकिन रंधावा परिवार का भविष्य अमेरिका में उनका इंतजार कर रहा था । अजित को दक्षिण कैरोलिना में प्रोफेसर की नौकरी मिलती है साठ के दशक के अंत में तो वह परिवार समेत बैम्बर्ग आ जाते हैं । निकी हेली का बचपन उसी शहर में बीता जहां उसके पिता को सिखों की पगड़ी की वजह से अलग दिखते थे । उन्हें हर वक्त ताने और उलाहने झेलने पड़ते थे । उस वक्त अमेरिका में नस्लवाद अपने चरम पर था । जब भी निकी का परिवार कहीं जाता था तो उनसे पूछा जाता था कि वो ब्लैक हैं या व्हाइट । इस तरह की परिस्थितियों से जूझते हुए निकी के पिता और मां ने अपनी लगन और मेहनत से बैम्बर्ग में एक मुकाम हासिल किया । उसकी मां ने कपड़ों का कारोबार शुरु किया और जो वक्त के साथ बढ़ता चला गया । अब तो वो कारोबार करोड़ों का है । निकी हेली का बचपन भी संघर्ष में बीता और बारह साल की उम्र में स्कूल के बाद उसने भी बुककीपिंग और अकाउंटिंग का काम किया । अपने परिवार के कारोबार में आने वाली सरकारी बाधाओं और नौकरशाही द्वारा लगानेवाले अंडंगा को देखकर उसका मन दुखी हो जाता था और वो उसको दूर करने के बारे में सोचने लगती थी । यहीं से उसके मन में राजनीति में जाने की इच्छा बलवती होने लगी थी ।
इस किताब में निकी हेली ने अपनी कई व्यक्तिगत संस्मरण या घटनाओं का भी जिक्र किया है । एक दिलचस्प घटना- एक दिन अचानक निकी अपने ब्याय फ्रेंड माइकल हेली को लेकर घर पहुंच जाती है । अपने मां-बाप से मिलवाते हुए कहती है कि वो इनसे शादी करना चाहती है । एक पारंपरिक भारतीय मां-बाप की तरह राज और अजित रंधावा ने गैर भारतीय से शादी करने की बेटी की इच्छा का जमकर विरोध किया । उन्होंने इस बात की हर संभव कोशिश की उनकी दूसरी बेटी एक अमेरिकी से शादी ना करे । लेकिन ये हो न सका क्योंकि - कांट इज नॉट एन ऑप्शन । ये शादी होती है और उसके बाद शुरू होता है उसका राजनीतिक सफर । राजनीति में रंगभेद के अलावा सरकारी बाधा और नौकरशाही के बेवजह अड़ंगे के मुद्दे पर निकी चुनाव मैदान में उतरती है । चुनाव में उसने वहां लंबे समय से राजनीति कर रहे शख्स को मात दी । निकी ने तमाम विरोध को झेलते हुए मजबूती से अपने सुधारों को लागू किया । आज निकी हेली रिपब्लिकन पार्टी में अमेरिका के उपराष्ट्रपति पद के लिए बॉबी जिंदल, कोंडलिजा राइस के साथ एक मजबूत दावेदार है ।
निकी हेली पर गवर्नर रहते हुए कई संगीन इल्जाम लगे । अमेरिका में राजनैतिक विरोधियों को निबटाने के लिए विवाहेत्तर संबंधों के आरोप लगते रहे हैं । इसी तरह की साजिश निकी के खिलाफ भी हुई और उनपर अपनी पति से बेवफाई के इल्जाम लगे । इन इल्जामों पर भी निकी ने अपनी इस किताब में सफाई दी है । इस फ्रंट पर मात खाने के बाद निकी के विरोधियों ने उनपर सरकार में रहते हुए कारोबारियों के लिए लॉबिंग करने के आरोप लगाए । उन आरोपों की भी जांच की गई लेकिन वो भी निराधार निकले ।
इस किताब के शुरुआती हिस्से बेहद दिलचस्प हैं जिसमें निकी ने नक्सवाद को झलने की  पीड़ा पर लिखा है । इसमें उसने बताया है कि किस तरह से एक ब्यूटी कॉंटेस्ट में उसको उसके रंग की बिनाह पर अयोग्य करार दे दिया गया था । इस तरह के कई दिलचस्प लेकिन पीड़ा दायक प्रसंग हैं । चौदह अध्याय में विभक्त इस संस्मरणात्मक आत्मकथा में बाद में अपनी राजनैतिक हालात का वर्णन किया है जो कि अमेरिका की राजनीति में गहरी रुचि रखनेवालों के लिए पठनीय हो सकता है, आम पाठकों को उससे बोरियत होगी । अगर हम समग्रता में इस किताब पर विचार करें उसको एक भारतीय परिवार की घर से निकलकर दूसरे मुल्क में खुद को सफलता के शीर्ष पर स्थापित करने वाली प्रेरणादायक कहानी कह सकते हैं । किसी ने ठीक कहा है कि अगर निकी हेली अपने सिद्धांतो और विचारों पर मजबूती से लंबे समय तक टिकी रह सकी तो विश्व इतिहास में बैम्वर्ग को वही स्थान हासिल हो सकता है जो ग्रेट ब्रिटेन की आयरन लेडी के जन्मस्थान ग्रांथम को हासिल है ।

Sunday, September 9, 2012

सालों बाद आरोप के तीर

बांग्लादेश की विवादास्पद और निर्वासन का दंश झेल रही विवादास्पद लेखिका तसलीमा नसरीन ने एक बार फिर से नए विवाद को जन्म दे दे दिया है । तसलीमा ने बंग्ला के मूर्धन्य लेखक और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय पर यौन शोषण का बेहद संगीन इल्जाम जड़ा है । तसलीमा ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर लिखा- सुनील गंगोपाध्याय किताबों पर पाबंदी के पक्षधर रहे हैं । उन्होंने मुझे और कई अन्य महिलाओं का यौन शोषण किया । वो साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं । शर्म, शर्म । तसलीमा नसरीन के इस ट्विट ने साहित्य जगत में तूफान खड़ा कर दिया है । तसलीमा के अलावा लोगों ने सुनील गंगोपाध्याय से इस आरोप पर सफाई मांगनी शुरू कर दी । सुनील गंगोपाध्याय का कद साहित्य में बहुत बड़ा है और उनपर इसके पहले इस तरह के आरोप लगे हों ये ज्ञात नहीं है । इतना अवश्य है कि जब दो हजार चार में तसलीमा की आत्मकथा का तीसरा खंड दि्वखंडित प्रकाशित हुआ तो साहित्यक हलके में इस तरह की चर्चा हुई थी लेकिन उस वक्त किसी का नाम साफ तौर पर उभर कर सामने नहीं आया था । अब उस पुस्तक के प्रकाशन के आठ साल बाद तसलीमा ने वरिष्ठ और बुजुर्ग साहित्यकार लेखक सुनील गंगोपाध्याय पर खुलेआम आरोप लगाया है । जहां तक तसलीमा के सेक्सुअल हैरसमेंट के आरोप की बात है तो अब एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि वो अब तक इस मसले पर चुप क्यों रहीं । जब उनका यौन शोषण हुआ था तो उस वक्त उन्होंने हल्ला क्यों नहीं मचाया । तसलीमा ने इस बात का जबाव देते हुए कहा है कि एक उनके साथ कोलकाता के एक होटल में सुनील गंगोपाध्याय ने छेड़छाड़ की । तसलीमा के मुताबित कोलकाता में सुनील अपने एक दोस्त के साथ उनके कमरे में डिनर के लिए आए थे । जब जाने लगे तो उन्होंने विदाई आलिंगन के वक्त आपत्तिजनक हरकत की थी । लेकिन उस वक्त तसलीमा सुनील गंगोपाध्याय के रसूख को देखते हुए खामोश रही थी ।  
भारत में हमेशा पुलिस के पहरे में रहनेवाली तसलीमा ने हैरसमेंट के वक्त पुलिस को इस बात की जानकारी क्यों नहीं दी । उन्होंने जरूर इस बात का जिक्र किया है कि उनकी आत्मकथा द्विखंडित को बैन करवाने के पीछे सुनील गंगोपाध्याय ही मास्टरमाइंड थे । तसलीमा इतने पर ही नहीं रुकी और गंगोपाध्याय पर उनको बंगाल से निकलवाने की साजिश रचने और झूठ बोलने का भी आरोप जड़ दिया है । दरअसल तसलीमा नसरीन चर्चा और विवादों के केंद्र में बने रहना चाहती भी हैं और जानती भी हैं । जो लोग भी तसलीमा नसरीन को ट्विटर पर फॉलो करते हैं उन्हें इस बात का अंदाजा भी है । वो लगातार धर्म, स्त्री पुरुष संबंधों और पुरुषों के खिलाफ अजीबोगरीब ट्विटरबाजी से चर्चा में आने की जुगत में लगी रहती हैं ।
दरअसल तस्लीमा और सुनील गंगोपाध्याय के बीच ये पूरा विवाद शुरू हुआ है पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी डॉक्टर नजरुल इस्लाम की किताब- मुसलमान की करनीय (मुसलमानों को क्या करना चाहिए ) से । इस किताब के छपने के बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने बगैर किसी इजाजत के प्रकाशक के गोदाम और दफ्तर पर छापा मारा और उनको जमकर धमकाया । ड़ॉक्टर इसलाम की किताबों की बिक्री नहीं करना का फरमान जारी कर दिया गया । इस किताब में ममता बनर्जी सरकार की अल्पसंख्यकों के प्रति नीति की आलोचना की गई है और तमाम तर्कों और उदाहरणों के साथ ममता की नीति को वोट बैक की राजनीति और अल्पसंख्यकों को लुभाने वाली नीति करार दिया गया है । पिछले दिनों कई घटनाओं से ये साफ हो गया है कि ममता बनर्जी अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पा रही है । पहले जब एक टेलीनिजन के कार्यक्रम में स्नातक की छात्रा तान्या भारद्वाज ने उनसे महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल पूछा तो उसको माओवादी करार देते हुए कार्यक्रम को बीच में छोड़कर चली गई थी । उसके बाद एक जगह किसानों ने जब उनसे अपनी समस्याओं की बात की तो उनको जेल भेज दिया गया । बीच में फेसबुक पर कार्टून बनाने को लेकर जो हंगामा मचा वो तो अभी तक सबके जेहन में ताजा है ।  
नजरुल इस्लाम की इस किताब पर ममता बनर्जी सरकार की अघोषित पाबंदी और पुलिस के प्रकाशक के दफ्तर पर छापा मारने के बाद से पश्चिम बंगाल के कुछ बुद्धिजीवियों ने उसकी खिलाफत शुरू कर दी । इस खिलाफत में बयान जारी करनेवालों में से एक नाम सुनील गंगोपाध्याय का भी है । उन्होंने इस पाबंदी को अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा बताते हुए तगड़ा विरोध जताया । सुनील गंगोपाध्याय के इस विरोध के बाद तसलीमा नसरीन ने ताबड़तोड़ ट्विट करके ये साबित करने की कोशिश की सुनील गंगोपाध्याय का विरोध सिर्फ दिखावा मात्र हैं और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर उनके दो चहरे हैं । तसलीमा ने पहले तो लोगों से अपील की कि वो नजरुल इस्लाम की अभिवयक्ति की आजादी के समर्थन में खड़े हों । इसी क्रम में उन्होंने कहा कि सुनील गंगोपाध्याय का विरोध छद्म है । सुनील गंगोपाध्याय को अभिव्यक्ति की आजादी से कोई लेना देना नहीं है । तसलीमा ने अपनी किताब का हवाला देते हुए कहा कि सुनील गंगोपाध्याय ने बुद्धदेव भट्टाचार्य की तत्तकालीन सरकार पर दबाव डालकर उनकी किताब द्विखंडित पर पाबंदी लगवाई थी । द्विखंडित को बुद्धदेव सरकार ने धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में बैन कर दिया था । बाद में मामला कोर्ट में गया और कलकत्ता हाईकोर्ट ने पहले तो कुछ विवादित अंशों को हटाकर किताब पर से बैन हटा दिया था । जब द्विखंडित हिंदी में छपा तो कई जगह खाली बॉक्स बनाकर यह लिख दिया गया था कि कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित पाठ्य सामग्री यहां नहीं छापी गई है । बाद में कोर्ट ने उन प्रतिबंधित अंशों को प्रतिबंध से मुक्त कर दिया था और कथित विवादास्पद अंशों को भी छापने की इजाजत दे दी थी ।
दरअसल अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ लेकर लेखक अपनी अपनी चालें चल रहे हैं । नजरुल इस्लाम की किताब पर जब पाबंदी लगी तो तसलीमा को उसमें अपना पुराना हिसाब चुकाने की संभावना नजर आई । तमाम मुद्दों पर मुखर रहनेवाली तसलीमा आमतौर पर भारत के साहित्यक मसलों पर खामोश ही रहती हैं । लेकिन नजरुल के मामले में जब सुनील गंगोपाध्याय ने विरोध जताया तो वो भी कूद पड़ीं और उनपपर सेक्सुअल हैरसमेंट का आरोप जड़ दिया । उसका नतीजा क्या हुआ पूरे देश और मीडिया का ध्यान मूल प्रश्न से हटकर यौन शोषण पर केंद्रित हो गया । सारी बहस उस दिशा में मुड़ गई और अभिव्यक्ति की आजादी का बड़ा प्रश्न आरोप प्रत्यारोप में गुम सा गया । बाद में जब तसलीमा से इस बात पर सवाल जबाव किया गया तो उन्होंने कहा कि आई हैव हर्ड दैट सुनील हैज डन इट टू मैनी वूमन । अब सुनी सुनाई बातों पर किसी का चरित्र हनन करना कहां तक जायज है । अब तसलीमा ये भी सफाई दे रही हैं कि इस यौन शोषण की अभिव्यक्ति उन्होंने एक कविता रास्तेर छेले इबोंग कोबी लिखकर की थी । उनकी ये कविता उनके संग्रह खाली खाली लगे में संग्रहीत है ।  
सवाल यह उठता है कि तसलीमा इस तरह के प्रश्न उठाकर या आरोप लगाकर क्या हासिल करना चाहती है । इस बात की पड़ताल होनी चाहिए । बांग्ला के कई लेखक इस आरोप की टाइमिंग पर सवाल खड़े कर रहे हैं । टाइमिंग पर सवाल होना लाजमी है । इस वक्त सुनील गंगोपाध्याय साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं । अकादमी का उनका कार्यकाल विवादित नहीं रहा है । क्या इसके पीछे साहित्य अकादमी की राजनीति है । क्या तसलीमा के इस बयान के निहितार्थ और भी हैं । क्या तसलीमा नसरीन नजरुल इस्लाम की किताब के बहाने से अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकाल रही हैं । क्या अभिव्यक्ति की आजादी के बड़े प्रश्न की आड़ में व्यक्तिगत झगड़ों का बदला चुकाया जा रहा है । या फिर सच में तसलीमा के साथ ऐसा हुआ था जिसपर उसने सालों बाद मुंह खोला है । लेकिन इतना तो तय है कि तसलीमा के इन आरोपों की गूंज देर तलक सुनाई देगी हो सकता है साहित्य अकादमी के चुनाव के वक्त भी इसकी अनुगूं सुनाई दे । हैरानी की बात नहीं है कि इस मामले में लेखकों की जमात से किसी तरह का कोई स्टैंड सामने नहीं रहा । लेखक संगठनों की चुप्पी भी चकित करनेवाली है । महिला अधिकारों के लिए गलाफाड़ कर चिल्लानेवाले संगठन भी खामोश क्यों हैं । क्या लेखक संगठनों को ये सवाल या आरोप बड़ा नहीं लगता । या फिर किसी पॉलिटिक्स के तहत लेखक संगठनों ने चुप्पी साध रखी है । लेखकों के इन संगठनों ने तो तसलीमा के बंगाल निष्कासन से लेकर उसकी किताब पर पाबंदी लगाने के वक्त भी चुप्पी साध ली थी । अपनी पार्टी का कर्ज चुका रहे थे । लेकिन अब वक्त आ गया है कि वो संगठन इस मसले में हस्तक्षेप करे और आरोपों के धुंध को साफ करने में एक भूमिका निभाए 

Sunday, September 2, 2012

उद्देश्य से भटकता पुस्तक मेला

विश्व में पुस्तक मेलों का एक लंबा इतिहास रहा है। पुस्तक मेलों की पाठकों की रुचि बढ़ाने से लेकर समाज में पुस्तक संस्कृति को बनाने और उसको विकसित करने में एक अहम योगदान रहा है ।  भारत में बड़े स्तर पर पुस्तक मेले सत्तर के दशक में लगने शुरू हुए । दिल्ली और कलकत्ता पुस्तक मेला शुरू हुआ । 1972 में भारत में पहले विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली में आयोजन हुआ । उसके बाद से हर दूसरे साल दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाता है । दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेला और लंदन बुक फेयर के बाद सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित माना जाने लगा है । इस प्रतिष्ठा की वजह भारत की समृद्ध लेखन परंपरा तो है ही लेकिन एक और अहम वजह भारत में पुस्तकों का बढ़ता बाजार है । हाल के दिनों में ये साबित हो गया है कि भारत विश्व में अंग्रेजी किताबों का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है । लिहाजा पूरी दुनिया के अंग्रेजी प्रकाशकों की नजर भारत के बाजार पर कब्जा करने या फिर वहां से मुनाफा कमाने पर लगी है । यह परिदृश्य सिर्फ अंग्रेजी को लेकर ही नहीं है । हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का भी बाजार भी लगातार बढ़ रहा है । यह अकारण नहीं है कि फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में दो बार भारत को अतिथि देश का दर्जा मिला था । एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त भारत में करीब बारह हजार प्रकाशक हैं और हर साल सभी भाषाओं को मिलाकर लगभग एक लाख नई किताबें छप रही हैं । पुस्तक मेलों की अहमियत इस बात में हैं कि वो पुस्तकों की बिक्री के अलावा सभी भाषाओं के प्रकाशकों को एक जगह इकट्ठा होकर कारोबार के आदान प्रदान का एक मंच भी मुहैया करवाता है । जैसे फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में लेखकों के अलावा उनके एजेंट और प्रकाशकों के बीच कारोबारी समझौता को ज्यादा अहमियत दी जाती है । वहां अलग अलग भाषाओं के प्रकाशकों के बीच अपनी भाषा में किताबों को छापने को लेकर कारोबारी शर्तें तय होती हैं । कॉपीराइट और लेखकों से जुड़े अन्य मसलों पर विमर्श होता है । इसका फायदा यह होता है कि हर भाषा के पाठकों को दूसरी भाषा की कृतियों को पढ़ने और उससे परिचित होने का मौका मिलता है । नतीजा यह होता है कि पुस्तक संस्कृति का निर्माण होता है और उसे मजबूती मिलती है ।
लेकिन भारत में पुस्तक मेलों का उद्देश्य और स्वरूप कुछ और ही होता चला गया है । हमारे यहां पुस्तक मेले अपने उद्देश्यों से भटककर उत्सवों में तब्दील हो गए है । इस साल दिल्ली में जो विश्व पुस्तक मेला आयोजित हुआ उसकी थीम भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष थे । लेकिन सिनेमा पर चंद सेमिनारों के आयोजन के अलावा उस आयोजन में कुछ खास देखने को नहीं मिला । विश्व पुस्तक मेले के आयोजनकर्ता नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशकों की नाराजगी दिखी थी । ये नाराजगी सुविधाओं और आयोजन की तिथि और पुस्तक मेले के प्रचार में ढिलाई को लेकर थी । लेकिन प्रकाशकों की शिकायतों से इतर नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक एम ए सिकंदर का दावा था कि उन्होंने इस बार विश्व पुस्तक मेले को छात्रों के बीच ले जाने की अनोखी पहल शुरू की थी । इन आरोपों और सफाई के बीच विश्व पुस्तक मेले में हिंदी के ह़ल में एक बात जो रेखांकित करने योग्य थी वह थी विमचनों का रेला । पुस्तक मेले के दौरान विमचनों की होड़ लगी थी । हर लेखक और प्रकाशक ये सोच रहा था कि किसी भी तरह से अगर उनकी किताब का विमोचन पुस्तक मेले में नहीं हुआ तो फिर उनका लेखन बेकार है । ताबड़तोड़ विमोचनों का असर यह हुआ कि जो आम पाठक मेले में आए थे वो बेहद क्फ्यूज हो गए । हर स्टॉल पर हर दिन हिंदी का कोई ना कोई बड़ा लेखक किसी ना किसी किताब का विमोचन करते हुए उस किताब को सदी की महानतम कृति की श्रेणी में डालने का उद्घोष कर रहा था । हिंदी के एक बड़े प्रकाशक के स्टॉल पर चो एक साथ दर्जनभर पुस्तकों का विमोचन हुआ । लग रहा था कि अगर वहां विमोचवन नहीं हुआ तो मोक्ष की प्राप्ति से वंचित रह जाएंगे ।
यह बताने का मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि पुस्क मेले अपने उद्देश्यों से भटकते जा रहे हैं । जिन मेलों पर ये दायित्व था कि वो पाठकों की रुचि का परिष्कार करेंगे और देश में एक पुस्तक संस्कृति का निर्माण करेंगे वो पुस्तक मेले अब लेखकों के प्रचार का मंच बनता जा रहा है । पुस्तक मेलों में सार्थक संवाद की गुंजाइश खत्म होने लगी है । कुछ दिनों पहले दिल्ली के प्रगति मैदान में दिल्ली पुस्तक मेला खत्म हुआ है । दिल्ली पु्स्तक मेले का आयोजन द फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स और इंडिया ट्रेड प्रमोशन ऑर्गेनाइजेशन के संयुक्त तत्वाधान में किया जाता है । एक जमाना था जब दिल्ली पु्स्तक मेले को लेकर दिल्ली के लोगों के बीच जबरदस्त उत्साह देखने को मिलता था । उस वक्त प्रकाशकों की प्रतिभागिता भी ज्यादा होती थी । लेकिन बाद में संगठन में राजनीति और प्रचारप्रियता के अलावा श्रेय लेने की होड़ ने दिल्ली पुस्तक मेले के रंग को फीका करना शुरू कर दिया । नतीजा यह हुआ कि हिंदी और अंग्रेजी के बड़े प्रकाशकों ने इस मेले से मुंह मोड़ना शुरू कर लिया । दिल्ली पुस्तक मेले को विस्तार देने की बजाए चंद लोगों ने इसको अपनी जागीर बना ली जिसकी वजह से दिल्ली पुस्तक मेला अपनी आखिरी सांसे गिनने लगा । रही सही कसर नेशनल बुक ट्रस्ट ने हर साल विश्व पुस्तक मेले के आयोजन का ऐलान कर पूरा कर दिया । नेशनल बुक ट्रस्ट के संयोजन में अब हर साल दिल्ली के प्रगति मैदान में फरवरी में विश्व पुस्तक मेले का आयोजन किया जाएगा । नेशनल बुक ट्रस्ट के इस फैसले के बाद माना जा रहा है कि दिल्ली पुस्तक मेले का ये आखिरी आयोजन था ।
उधर कोलकाता पुस्तक मेले में भी राजनीति और कंट्टरपंथ हावी होने से उसकी साख को बट्टा लगा है । साल के अंत में सर्दियों में लगनेवाला ये पुस्तक मेला आम पाठकों के लिए होता है और माना जाता है कि ये विश्व का सबसे बड़ा गैर कारोबारी पुस्तक मेला है । लोगों की उपस्थिति के लिहाज से इस पुस्तक मेले को विश्व का सबसे बड़ा पुस्तक मेला माना जा सकता है । पिछले साल एक अनुमान के मुताबिक इस कोलकाता बोई मेला को देखने और किताबें खरीदने के लिए तकरीबन बीस लाख लोग मेला स्थल पर आए थे । कोलकाता पुस्तक मेले की प्रतिष्ठा इस बात को लेकर भी ज्यादा थी कि वहां हर विचारधारा के लेखकों की किताबों को जगह मिलती थी । लेकिन इस बार जिस तरह से तस्लीमा नसरीन की किताब को लेकर सरकार और आयोजक कट्टरपंथियों के आगे झुके वो शर्मनाक है । तस्लीमा की किताब निर्बासन का लोकार्पण की इजाजत नहीं देने की चारो ओर आलोचना हुई थी । ये लोकार्पण तस्लीमा की अनुपस्थिति में किया जाना था । लेकिन कट्टरपंथियों के दबाव में झुके आयोजकों को ममता सरकार ने भी विमोचन नहीं कराने की सलाह दी । इस घटना की विश्व भर के साहित्यक हलके में जमकर आलोचना हुई । सिर्फ देश के चंद प्रगतिशील लेखकों ने चुप्पी साध ली थी ।
पुस्तक मेलों का घटता आकर्षण और जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल जैसे आयोजनों की बढ़ती लोकप्रियता से बड़े सवाल खड़े होने लगे हैं ।  अब वक्त आ गया है कि हमें इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि हमारे देश में दिल्ली ,कोलकाता, पटना जैसे विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मेलों के प्रति लोगों का आकर्षण कम क्यों होता जा रहा है । पुस्तक मेलों की बजाए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल, गोवा लिट फेस्ट, चेन्नई लिटरेचर फेस्टिवल आदि कैसे विस्तार पा रहा हैं । क्या पाठकों की रुचि का परिष्कार हो गया है और अब वो सुख शांति से अपने प्रिय लेखकों को सुनना और उनसे संवाद करना चाहते हैं । क्या इन पुस्तक मेलों में पाठक अपने लेखकों से संवाद कायम करने का सुख नहीं पा रहे हैं जो उन्हें लिटरेचर फेस्टिवलों की ओर खीच रहा है । इन बातों पर हिंदी के प्रकाशकों और लेखकों को गंभीरता से विचार करना होगा । हिंदी पट्टी में खासकर छोटे शहरों में पुस्तक मेलों की एक अहमियत है । अगर समय रहते छोटे शहरों में पुस्तक मेलों के अस्तित्व को बचाने का प्रयास नहीं किया गया तो पुस्तक संस्कृति को भारी नुकसान होगा । नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना के उद्देश्यों में पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देना भी शामिल है । इस दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट को पहल करनी होगी ताकि देशभर में नई पीढ़ी के बीच पुस्तकों से प्रेम करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जा सके । एनबीटी को महानगरों से निकलकर लगातार छोटे शहरों में पुस्तक मेलों का आयोजन करना होगा और उन मेलों में बड़े लेखकों की उपस्थिति सुनिश्चित करवानी होगी ताकि पाठकों को संवाद का मौका मिल सके । अगर ऐसा हो सके तो हम भाषा और संस्कृति के प्रति अपने दायित्वों को सही तरीके से निभा पाने में सफल हो पाएंगे ।

 

Saturday, August 25, 2012

हिंदी के युवा लेखकों से उम्मीद


हिंदी में सालों से प्रकाशक और लेखक दोनों पाठकों की कमी का रोना रोते रहते हैं । बहुत शोर मचता है कि हिंदी के पाठक कम हो रहे हैं । हिंदी के आलोचकों ने भी कई बार इस बात का ऐलान किया है कि हिंदी में गंभीर लेखन पढ़नेवालों की लगातार कमी होती जा रही है । कई उत्साही आलोचकों ने तो नए पाठकों की अपनी भाषा से विमुखता को भी रेखांकित किया । वर्षों से पाठकों की कमी के कोलाहल के बीच हिंदी अखबारों की प्रसार संख्या बढ़ती रही जो लेखकों, प्रकाशकों और आलोचकों की पाठकों की कमी की चिंता के विपरीत था । हिंदी के प्रकाशकों का कारोबार भी लगातार फैलता जा रहा है वह भी इस चिंता के उलट है । एक अनुमान के मुताबिक हिंदी में अलग अलग विधाओं की करीब पच्चीस से तीस हजार किताबें हर साल छापी जाती हैं । सवाल ये है कि अगर बिकती नहीं हैं तो इतनी किताबें छपती क्यों हैं । इन सवालों के बरक्श हम हिंदीवालों को अपने अंदर झांक कर देखने की जरूरत है । किताबें क्यों नहीं बिकती या किताबें पाठकों के बीच क्यों नहीं लोकप्रिय होती है । सामाजशास्त्रीय विश्लेषण करने से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इक्कीसवीं सदी के पाठकों की रुचि में सत्तर और अस्सी के दशक के पाठकों की रुचि में जमीन आसमान का अंतर आ चुका है । सन 1991 को हम इस रुचि का प्रस्थान बिंदु मान सकते हैं । हमारे देश में 1991 से अर्थव्वयस्था को विदेशी कंपनियों के लिए खोला गया और उससे करीब सात साल पहले देश में संचार क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी । हमारे देश के लिए ये दो बहद अहम पड़ाव थे जिसका असर देश की साहित्य संस्कृति पर बेहद गहरा पड़ा । लेकिन वो एक अवांतर प्रसंग है जिसपर चर्चा इस लेख में उपयुक्त नहीं है । संचार क्रांति और उदारीकरण का असर यह हुआ कि देश में पश्चिमी संस्कृति से देश की जनता का परिचय हुआ । जो बातें अबतक सुनी जाती थी वो प्रत्यक्ष रूप से देखी जानी लगी । बाजारवाद और नवउदारवाद के प्रभाव में भारत में आम जनता की और खासकर युवा वर्ग की रुचि में बदलाव तो साफ तौर पर रेखांकित किया जा सकता है ।
युवा वर्ग और उन दशकों में जवान होती पीढ़ी में धैर्य कम होता चला गया और एक तरह से इंस्टैंट का जमाना आ गया चाहे वो काफी हो या अफेयर । यह अधीरता कालांतर में और बढ़ी । यह लगभग वही दौर था जब हमारे देश के आकाश को निजी टेलीविजन के तरंगों के लिए खोल दिया गया । मतलब यह है कि देश में कई देशी विदेशी मनोरंजन और न्यूज चैनलों ने अपना प्रसारण शुरू किया । यह वही वक्त था जब हिंसा प्रधान फिल्मों की जगह बेहतरीन रोमांटिक फिल्मों ने ली । मार-धाड़ वाली फिल्मों की बजाय शाहरुख काजोल की रोमांटिक फिल्मों को जबरदस्त सफलता मिली । लगभग इसी वक्त राष्ट्रीय अखबारों के पन्ने रंगीन होने लगे और फिल्मों के रंगीन परिशिष्ट अखबारों का एक अहम अंग बन गया । यह सब बताने का तात्पर्य यह है कि नवें दशक में हमारे देश की लोगों की पसंद बदलने लगी । लेकिन इतने बदलाव को हिंदी के लेखक सालों तक नहीं पकड़ पाए और उनके लेखन का अंदाज बदला जरूर लेकिन वो बदलते समय के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पाए । नतीजा यह हुआ कि हिंदी का फिक्शन लेखन पाठकों की पसंद में लगातार पिछड़ता चला गया । पहले हिंदी में किसी भी उपन्यास का एक संस्करण हजार प्रतियों का होता था जो बाद में घटकर पांच सौ प्रतियों का होने लगा और अब तो प्रकाशन जगत के जानकारों का दावा है कि ये आंकड़ा तीन सौ का हो गया है । कुछ प्रकाशक तो इतना भी नहीं छाप रहे । जितनी प्रतियों का ऑर्डर मिल जाता है उसको छापकर तैयार कर लेते हैं । आधुनिक तकनीक की वजह से यह मुमकिन भी है । हिंदी के फिक्शन लेखक जब अपनी किताबें नहीं बिक पाने का रोना रोते हैं तो उसके पीछे कम से कम पाठकों की कमी, तो वजह बिल्कुल नहीं है । हिंदी में फिक्शन पढ़नेवाले पाठक हैं लेकिन लेखकों को उनकी रुचि के हिसाब से लेखन शैली बदलनी होगी । लेखकों को इस बारे में गंभीरता से विचार करना होगा कि हिंदी के प्रकाशकों की सूची से फिक्शन का अनुपात कम क्यों होता जा रहा है । आज प्रकाशकों की रुचि गैर साहित्यक किताबें छापने में ज्यादा हो गई है । प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से लुई एल हे की यू कैन हील योर लाइफ, दीपक चोपड़ा की सफलता और अध्यात्म से जुड़ी किताबें बिक रही हैं तो उसके पीछे पाठकों की बदलती रुचि है । हिंदी में इन दिनों आत्मकथा और जीवनियों की भी जमकर बिक्री हो रही है । चाहे वो सायना नेहवाल की जीवनी हो, चाहे कलाम की टर्निंग प्वाइंट्स हो । पाठकों के इस मनोविज्ञान का विश्लेषण करने से यह बात और साफ होती है कि अब हिंदी का पाठक यथार्थ के नाम पर नारेबाजी, क्रांति के नाम पर भाषणबाजी, सामाजिक बदलाव के नाम पर विचारधारा विशेष का पोषण को पसंद नहीं कर रहा है ।
अब हिंदी प्रकाशन जगत के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि पाठकों की पसंद क्या है और किस तरह की किताबें धड़ाधड़ बिक सकती हैं । अगर हम अंग्रेजी प्रकाशन जगत को देखें तो युवाओं को केंद्र में रखकर लिखे गए रोमांटिक प्लॉट वाले उपन्यास या कहानी संग्रह खूब बिक रहे हैं । इसके अलावा चिक लिट बुक्स हैं जो अपनी रोमांटिक और चमक दमक वाली जिंदगी की वजह से युवतियों के बीच खासी लोकप्रिय हो जाती हैं । अंग्रेजी में ज्यादातर बेस्ट सेलर किताबों में लव सेक्स और संघर्ष की कहानी होती है जो बीस से तीस वर्ष के युवाओं को लुभाता है और उन्हें खरीदकर पढ़ने को मजबूर करता है । अंग्रेजी में भी भारतीय लेखकों की एक नई फौज आई है जो इस तरह के प्लॉट को उठा रही हैं जिनमें कविता दासवानी, सिद्धार्थ नारायण ,प्रीति शिनॉय, निकिता सिंह, नवनील चक्रवर्ती और सचिन गर्ग जैसे लेखक प्रमुख हैं । इनका लेखन और प्लॉट अमिताभ घोष, अमिश त्रिपाठी, ताबिश खैर जैसे भारतीय लेखकों से अलग है । अंग्रेजी में लिखनेवाले इन लेखकों की सफलता का राज उनकी भाषा और उनके उपन्यासों के शीर्षक हैं जो गंभीरता के बोझ से मुक्त हैं । इन युवा लेखकों की वही भाषा है जो आज के युवाओं के बीच बोली जाती है । उनके उपन्यासों के शीर्षक भी उन्हीं बोलचाल के शब्दों से उठाए जाते हैं । जैसे ओह शिट्, नॉट अगेन, नॉटी मैन, बॉंबे गर्ल, ऑफ कोर्स आई लव यू, ओह यस आई एम सिंगल जैसे दो सवा दो सौ पन्नों के उपन्यास खासे लोकप्रिय हो रहे हैं । जाहिर तौर पर इन उपन्यासों के नायक नायिकाएं युवा होते हैं और उपन्यासों का परिवेश भी उनके आस पास का ही होता है । ऐसा नहीं है कि सारे के सारे युवा लेखक सिर्फ हल्के फुल्के प्रेम प्रसंगों पर ही लिख रहे हैं । कई लेखक तो गंभीर बीमारियों को भी अपने उपन्यास का विषय बना चुके हैं लेकिन उसमें भी कहीं ना कहीं प्रेम का तत्व डाल ही देते हैं । इन उपन्यासों की एक विशेषता और है कि ये दो सौ रुपए से कम में पाठकों को उपलब्ध है जिसकी वजह से चलते चलाते भी उसकी खरीदारी हो जाती है ।
हिंदी में इस तरह का लेखन-प्रकाशन जरा कम हुआ है । हिंदी में युवाओं के बदलते मनमिजाज और प्राथमिकताओं पर गीताश्री ने कई बेहतर कहानियां लिखी हैं लेकिन उनका कोई संग्रह या उपन्यास नहीं आया है जिससे लोकप्रियता का मूल्यांकन हो सके । अभी अभी सामयिक प्रकाशन दिल्ली ने युवा लेखक लेखिकाओं की कहानियों और उपन्यासों को पूरा सेट प्रकाशिकत किया है । जिसमें जयश्री राय, अजय नावरिया, पंकज सुबीर, कविता,रजनी गुप्त, शरद सिंह, मनीषा कुलश्रेष्ठ की किताबें एक साथ प्रकाशित की हैं । लेकिन अब हिंदी के पुराने लेखक सर्वहारा और उस तरहब की नारेबाजी से मुक्त नहीं हो पाए हैं । जयश्री राय के कहानी संग्रह के ब्लर्ब पर संजीव ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है उससे खूबसूरत कहानियां उभरती नहीं है बल्कि बौद्धिकता के बोझ से दब जाती हैं । दरअसल अब हिंदी के प्रकाशकों को भी ब्लर्ब की शास्त्रीयता से मुक्त होने की जरूरत है । रजनी गुप्त ने अपने उपन्यास कुल जमा बीस में जो विषय चुना है वो समय के साथ है । उसमें किशोर के मनस्थिति उसके संघर्ष, वर्चुअल दुनिया को लेकर उसके मन में चल रहे द्वंद के इर्द-गिर्द कथा बुनी गई है । युवाओं के बीच इस उपन्यास को पढ़े जाने की उम्मीद है । कविता का पहला उपन्यास -मेरा पता कोई और है -को भी पाठक पसंद करेंगे लेकिन यहां भी ब्लर्ब पर वही बौद्धिकता और भारी भारी शब्दों का इस्तेमाल । सामयिक प्रकाशन से जिस तरह से हिंदी के अहम युवा लेखक लेखिकाओं की किताबें एक साथ प्रकाशित हुई हैं उससे एक उम्मीद तो जगती है । हॉर्ड बाउंड में छपी इन किताबों के मूल्य ढाई सौ से चार सौ रुपए तक हैं लेकिन प्रकाशक को युवाओं तक पहुंचने के लिए उसको दो सौ के अंदर रखना होगा भले ही चाहे वो पेपर बैक में क्यों ना छपे ।

Friday, August 24, 2012

राजनैतिक चेतना की कविताएं


हिंदी में एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त करीब पांच सौ कवि एक साथ सक्रिय हैं और लगातार कविकाएं लिख रहे हैं । हिंदी के कई नासमझ संपादक उन कविताओं को छाप कर अच्छी कविताओं को ओझल कर दे रहे हैं । इसको देखकर रामवृक्ष बेनीपुरी जी का वो कथन याद आता है जो उन्होंने दशकों पहले कवियों की बहुतायत पर कहा था- हम बाढ से नहीं सुखाड़ से घबराते हैं । लेकिन वह बाढ़ भी क्या घबराने की चीज नहीं है जिसका पानी फसलों को इस कदर डुबा दे कि उनकी फुनगियां मुश्किल से नजर आएं । आज हिंदी कविता की उन्हीं फुनगियों को बचाए रखने की जद्दोजहद में संजय कुंदन जैसे कवि लगे हैं । संज कुंदन का नया कविता संग्रह -योजनाओं का शहर -हिंदी कविता के पाठकों को आश्वस्त करता है । संजय कुंदन का पहला कविता संग्रह दो हजार एक में आया था कागज के प्रदेश में, उसके बाद आया चुप्पी का शोर और अब ये समीक्ष्य संग्रह । इस संग्रह में संजय की कविता में जो कथा तत्व है वो पहले संग्रह की तुलना में और बेहतर हुई है । नामवर सिंह ने हाल ही में एक गोष्ठी में फिर दोहराया कि जो कवि अच्छा गद्य नहीं लिख सकता वो अच्छा कवि नहीं हो सकता है । नामवर की इस कसौटी पर भी संजय खड़े उतरते हैं । उनके कहानी संग्रह- बॉस की पार्टी और उपन्यास - टूटने के बाद - में संजय के मोहक गद्य को महसूस किया जा सकता है ।
अपने इस संग्रह में संजय कुंदन ने  राजनैतिक व्यवस्था पर चोट और तंज करते हुए कई कविताएं लिखी है । जैसे बढ़ती महंगाई पर तंज करते हुए संजय की एक कविता है दाल- जिसमें वो कहते हैं दाल की बात करो तो कहा जाता है /निवेश तो बढ़ा है, विदेशी मुद्रा तो बढ़ी है /आप यह क्यों नहीं देखते/कि आपके पास कितने यन्त्र हैं/यही क्या कम है कि जनतंत्र है/दाल अर्थशास्त्री की तरह /बोलने लगी है /अर्थशास्त्री राजा की तरह /और राजा व्यापारी की तरह । इस एक कविता में कवि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को उघाड़कर रख दिया है । किस तरह से एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अपने जार्गन से देश की जनता को भरमा रहे हैं उसको एक्सपोज करती है यह कविता । इस संग्रह की एक और कविता है कार्यकर्ता । इस कविता में एक साथ कवि ने बाजार के आक्रमणकारी और अतिक्रमणकारी रूपों से आम जनता को आगाह किया है । इस कविता में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन की झलक भी देखी जा सकती है । संजय जहां भी अपनी कविता से आज की राजनीति पर चोट करते हैं वहां उनकी कविताएं उन्हें समकालीन कवियों की भीड़ से अलग कर देती है । कवि की राजनैतिक चेतना और उसपर तंज कसती कविता है योजनाओं का शहर । इस लंबी कविता में कवि ने वर्तमान राजनीति को तो निशाना बनाया ही है साथ ही समाज के उन लोगों को भी बेनकाब किया है जो योजनाएं बनाकर भ्रच्टाचार करते हैं और खुद को आगे बढ़ाने के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं । इस लंबी कविता में कवि एक जगह कहता है जो दुनियादार थे वे योजनाकार थे /जो समझदार थे वो योजनाकार थे /एक लड़का रोज एक लड़की को /गुलदस्ता भेंट करता था/उसकी योजना में /लड़की एक सीढ़ी थी /जिसके सहारे वह/उतर जाना चाहता था /दूसरी योजना में । इन पंक्तियों में कवि ने अपनी महात्वाकांझा की पूर्ति के लिए कुछ भी कर डालने और किसी भी रिश्ते को दांव पर लगा देने की प्रवृत्ति पर चोट की है । आगे इसी कविता में कुंदन कहते हैं -/योजनाओं में हरियाली थी/धूप खिली थी, बह रहे थे मीठे झरने /एक दिन योजनाकार को /रास्ते में प्यास से तड़पता एक आदमी मिला/योजनाकार को दया आ गयी/उसने झट उसके मुंह में एक योजना डाल दी । यहां कवि राजनीति में जारी सरकारी धन के लूट और उसके क्रियान्वयन में हो रहे घपलों को अपनी शैली में बेनकाब किया है ।
संजय कुंदन के कविताओं को पढ़ने के बाद यह तो साफ तौर पर लगता है कि सारी कविताओं में प्रगतिशीलता का एक अंडरटोन है जो अपने तरीके से हर जगह व्यवस्था का विरोध करता चलता है । लेकिन संजय कुंदन की प्रगतिशीलता रूढिमुक्त है जो एक साथ कविता में समाज और राजनीति के महत्व को स्थापित भी करती है । मुक्तिबोध ने एक बार कम्युनिस्ट पार्टी के आला नेता को एक पत्र लिखकर कहा था कि प्रगतिशील लेखन का टोन बदलने की आवश्यकता है । संजय कुंदन की कविताओं में वही प्रगतिशीलता अपने बदले हुए टोन के साथ मौजूद है । इनकी कविताएं छद्म क्रांतिकारिता और नारेबाजी से मुक्त हैं लेकिन इन कविताओं ने जनतांत्रिक मूल्यों को नहीं छोड़ा और भारतीय राजनीति में जो अवरसवाद और भ्रष्टाचार अपने चरम पर है उसकी कवि ने अपनी कविताओं के माध्यम से धज्जियां उड़ा कर रख दी हैं । दरवाजा और चोर दरवाजा -कविता में कवि ने चोर दरवाजे को मुख्य दरवाजा होने की कहानी के बहाने आज की भ्रष्ट होती सामाजिक व्यवस्था और भ्रष्टाचार के आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा बनते जाने के साथ साथ उसपर इतराने की प्रवृत्ति पर गहरी चोट की है । लिखते हैं धीरे धीरे फैलने लगी यह बात/और एक समय ऐसा आया/जब हर आदमी खुलेआम/चोर दरवाजे का इस्तेमाल करने लगा/यही चलन बन गया/अब इक्का दुक्का लोग ही/दरवाजे से होकर जदाते थे/धीरे धीरे कुत्तों ने दरवाजे पर डेरा जमा लिया । उसी कविता में आगे कहते हैं - कुछ लोग दूर से दरवाजे को दंडवत करते/और जय हो जय हो कहते हुए /चोर दरवाजे की ओर सरक जाते हैं । इसी कविता में दरवाजे का चौकीदार ही लोगों को चोर दरवाजे की ओर खिसक जाने की सलाह देता है । मतलब साफ है कि जिसपर व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी है वही उसको तोड़ने और गलत तरीके से लाभ उठाने की सलाह दे रहा है । यही तो आज का राजनैतिक चरित्र है । इन कविताओं की शैली और बिंब इतनी खास है कि कुछ लोग उसपर सपाटबयानी का आरोप जड़ सकते हैं लेकिन इनकी कविताओं में जो राजनैतिक चेतना बेहद सधे और नपे तुले रूप में आती है जो पाठकों को एक नया आस्वाद देती है ।
राजनीति चेतना से लैस कवि की काव्य भूमि पर और विषयों की कविताएं भा आकार लेती हैं । इस संग्रह की एक और लंबी कविता है अपराध कथा जिसकी पहली लाइन है कि ये साधारण लोगों के पराजय की कहानियां है । सचमुच । इस कविता में कवि ने समाज की आपराधिक प्रवृतियों को उसके बाद घटने वाले घटनाओं को विषय बनाया है । इस कविता में सूअर से लेकर बार गर्ल तक के बहाने से कवि ने अपनी बात कही है । एक जगह कवि कहता है वो पूरी धरती में /अपना वीर्य रोपना चाहते थे । यहां लड़की के लिए धरती बिंब का इस्तेमाल कर कवि ने कविता को एक नई उंचाई दी है ।
इटली के ख्याति प्राप्त आलोचक रोबेर्तो कालास्सो ने अपनी किताब लिटरेचर एंड द गॉड्स के अंतिम लेख एब्सोल्युट लिटरेचर में कहते हैं कि साहित्य विचार के भारी फर्शी पत्थरों के बीच घास की तरह उगता है । संजय कुंदन की कविताओं को देखने के बाद रोबर्तो कालास्सो से एक कदम आगे बढ़कर कहा जा सकता है कि कविता राजनीति और सामाजिक व्यवस्थाओं में आ रही गिरावट से पैदा हुए निराशा के बीच से उपजा हुआ ऐसा पेड़ है जिससे आशा और उम्मीद की किरण निकलती है । इसलिए इस संग्रह को पढ़ने के बाद यह साफ है कि पिछले दिनों प्रकाशित कविता संग्रहों के बीच बेहद विशिष्ठ है ।

Thursday, August 16, 2012

रामदेव का संघ योग



दिल्ली के रामलीला मैदान में भगवा वेश धारी बाबा रामदेव का आंदोलन खत्म हो गया और वो वापस अपने घर हरिद्वार लौट गए हैं । रामदेव इस बार के अपने आंदोलन से बेहद खुश हैं और अंबेडकर स्टेडियम से निकलने के पहले अपनी जीत की दुंदुभि बजाते हुए हरिद्वार रवाना हुए । उनके समर्थक भी ये प्रचारित कर रहे हैं कि रामदेव ने पिछले साल रामलीला मैदान से अनशन के बीच से औरत का वेश धारण कर भागने का दाग अपने दामन से छुड़ा लिया है । जयघोष और जीत के इस जश्न के बीच रामदेव और उनके समर्थक ये भूल गए कि दिल्ली में छह दिनों तक के आंदोलन का आकलन होना शेष है । पिछले साल जब जून में रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे थे तो सत्याग्रह ज्यादा दिन टिक नहीं पाया था और वो पुलिस के डर से वहां से भागते धरे गए थे । रामदेव ने उस वक्त दलील दी थी कि अगर वो वहां से भागने का प्रयास नहीं करते तो पुलिस उन्हें मार डालती । रामदेव के मैदान छोड़कर भागने और उसके बाद जान से मार डालने की दलील से उनकी जमकर फजीहत हुई थी । अपनी उस फजीहत को रामदेव भूले नहीं थे । इसलिए इस बार वो पुलिस के सामने सीना तानकर खड़े थे औऱ उनसे बहस भी कर रहे थे । उन्हें ये बात समझ में आ गई थी कि चौबीस घंटों के समाचार चैनलों के दौर में फर्जी मुठभेड़ लगभग नामुमकिन है । अब सवाल यह उठता है कि रामदेव को इस बार दिल्ली में छह दिन के आंदोलन से क्या हासिल हुआ । रामदेव पिछले दो तीन सालों से काला धन के खिलाफ देशभर में मुहिम चला रहे हैं । इस बार वो अपने आंदोलन के एक दिन पहले तक ये बताने को तैयार नहीं थे कि उनकी मांगे क्या है । वो अनशन कर रहे हैं या आंदोलन । लगातार सस्पेंस बनाए रखने और धीरे-धीरे खोलने की रणनीति पर काम रहे थे । पहले दिन रामदेव ने लगभग घंटेभर के अपने भाषण में देश दुनिया के तमाम मुददे गिनाए और सरकार से उन सभी पर त्वरित कार्रवाई की मांग की । रामदेव ने काले धन के अलावा अन्ना हजारे की मांगों मसलन लोकपाल, सिटीजन चार्टर, ज्यूडिशियल अकाउंटिबिलिटी बिल के अलावा देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट को रोकने की मांग की । उन्होंने ना केवल अन्ना की मांगों को अपनी मांगों में शामिल किया बल्कि अन्ना की टोली के अहम सदस्य अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा कि शुगर के मरीज शिकंजी पिएं । गौरतलब है कि अरविंद शुगर के मरीज हैं । इसमें कोई दो राय नहीं कि योग शिविरों में भाषण देते देते रामदेव ने जनता से बेहतरीन संवाद करने की कला मै महारात हासिल कर ली। अब अगर हम पहले दिन के भाषण को देखें तो रामदेव ने कांग्रेस समेत किसी भी दल के नेता के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया बल्कि सोनिया गांधी को तो सोनिया माता और राहुल को राहुल भाई कहकर संबोधित किया । पहले दिन तो रामलीला मैदान में ठीक ठाक भीड जुटी थी लेकिन बाद में के दो दिनों में भीड़ अपेक्षा से कम जुटने से रामदेव और उनके रणनीतिकार बौखला गए । इसी बौखलाहट में वो मीडिया पर गलत कवरेज का आरोप जड़ बैठे और कहा कि मीडिया कम भीड़ की बात को प्रचारित कर रहा है । लेकिन कम भीड़ से रामदेव और उनके सिपहसलारों के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी । रामदेव के भाषण का ओज निस्तेज होने लगा था । हताशा और निराशा उनकी बॉडी लैंग्वेज में साफ झलकने लगी थी । पिछली बार जिस सरकार के चार बड़े मंत्री रामदेव की अगवानी के लिए एयरपोर्ट गए थे वही सरकार इस बार रामदेव की उपेक्षा पर उतारू थी । तीसरे दिन तक आंदोलन के बेअसर होने के आसार बनने लगे थे ।
कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार से जब किसी तरह की कोई पहल नहीं हुई तो रामदेव ने अन्य दलों का दरवाजा खटखटाना शुरू किया । आरएसएस में रामदेव के समर्थकों ने भी दिल्ली से लेकर हरिद्वार तक में आपात बैठकें हुई। संघ की तरफ से जनता पार्टी के अध्यक्ष और आजकल बीजेपी की आंखों के तारे सुब्रहम्ण्यम स्वामी सक्रिय हो गए । फिर तय हुआ कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक शरद यादव रामदेव के मंच पर आएंगे । एक राष्ट्रीय पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष किसी आंदोलन के मंच पर जा रहा होता है तो उस पार्टी और उसके जुड़े संगठनों का दायित्व होता है कि उनको सुनने के लिए भीड़ का इंतजाम किया जाए । ना सिर्फ प्रमुख विपक्षी पार्टी का अध्यक्ष बल्कि प्रमुख विपक्षी गठबंधन का संयोजक भी जा रहा हो तो ये दायित्व और बढ़ जाता है । लिहाजा जब रामदेव के आंदोलन के चौथे दिन नितिन गडकरी और शरद यादव रामदेव के मंच पर पहुंचे तो रामलीला मैदान में ठीक ठाक भीड़ जमा कर दी गई थी । प्रत्यक्ष रूप से गडकरी और शरद यादव का साथ मिलने से बाबा बम बम करने लगे । यहां से रामदेव के बॉडी लैंग्वेज में साफ तौर पर बदलाव को लक्षित किया जा सकता था । अब जब गडकरी और शरद यादव मंच पर हों तो सोनिया गांधी को माता तो कहा नहीं जा सकता है लिहाजा रामदेव ने आक्रामक अंदाज में कांग्रेस पर जमकर हमला बोला और उसे देश की सबसे भ्रष्ट पार्टी करार देते हुए जनता से उसे हराने की अपील तक कर डाली । मनमोहन सिंह पर भी जमकर हमला बोला । मंच पर स्वामी के साथ गलबहियां करते मौजूद जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर बेहद संगीन इल्जाम मढे ।

अबतक जो कुछ पर्दे के पीछे था वो आईने की तरह साफ हो गया कि रामदेव का एक राजनैतिक एजेंडा है और वो उसी पर काम कर  रहे हैं । रामदेव का राजनैतिक एजेंडा वही है जो संघ के रणनीतिकार तय कर रहे हैं । संघ को लगता है कि बीजेपी नेताओं की साख उतनी नहीं रही कि केंद्र में सरकार बनाई जा सके । महंगाई के खिलाफ दो साल पहले बीजेपी के देशव्यापी आंदेलन का हश्र वो देख चुके थे । लिहाजा पहले अन्ना और बाद में रामदेव को साथ लेकर आगे बढ़ने की रणनीति पर काम शुरू हुआ । संघ हमेशा से दूसरों का इस्तेमाल बीजेपी को स्थापित करने में करते आया है चाहे वो जयप्रकाश नारायण हों या विश्वनाथ प्रताप सिंह । कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से आंदोलनों से जुड़कर बीजेपी को फायदा पहुंचाता है । रामदेव ने कहा कि 2014 के चुनाव में कांग्रेस को हराना है लेकिन किसे जिताना है उस बारे में चुनाव के पहले बताएंगे । रामदेव को अब जनता को बताने की जरूरत नहीं है । जनता समझ उनकी मंशा और राजनीति दोनों समझ चुकी है । मुमकिन है रामदेव खुलकर चुनावी मैदान में ना आएं लेकिन अपनी राजनैतिक महात्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वो बीजेपी से टिकटों का मोलतोल जरूर करेंगे तब शुरू होगा असली खेल । जिसके सूत्रधार ना तो रामदेव होंगे और ना ही गडकरी । सब कह रहे होंगे संघम शरण गच्छामि

Wednesday, August 1, 2012

प्रसिद्धि के बोझ से दबा आंदोलन

मोदी मानवता के हत्यारे हैं- संजय सिंह
इस कीचड़ में मुझे मत डाले- अन्ना हजारे
मोदी ना केवल सांप्रदायिक हैं बल्कि भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा देते हैं- अरविंद केजरीवाल
मोदी इस देश के निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं और कोई उनसे मिले तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए- कुमार विश्वास
कालेधन पर बाबा के जंग में हम उनके साथ हैं किरण बेदी
ये पांच बयान हैं जो दो दिनों के अंदर टीम अन्ना के अहम सदस्यों ने दिए हैं । इस बयान के केंद्र में है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बाबा रामदेव का मंच साझा करना और उसी मंच से रामदेव का नरेन्द्र मोदी की तारीफ करना । रामदेव और नरेन्द्र मोदी के एक साथ मंच पर आने से टीम अन्ना के अंदर का झगड़ा और मतभेद दोनों सामने आ गए । मोदी और रामदेव के मसले पर अन्ना हजारे, किरण बेदी और कुमार विश्वास गोलबंद हो गए हैं वहीं दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया हैं । रामदेव के मोदी के साथ मंच साझा करने और नितिन गडकरी की रामदेव के पांव छूती तस्वीर, फिछले साल दिल्ली में रामदेव के आंदोलन में हिंदूवादी साध्वी ऋतंभरा का शामिल होने  को अगर मिलाकर देखें तो एक साफ तस्वीर उभरती है । जो तस्वीर है वो धर्मनिरपेक्ष तो नहीं ही है । इन्हीं तस्वीरों के आधार पर कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह तो साफ तौर यह आरोप लगा चुके हैं कि रामदेव और अन्ना हजारे का पूरा आंदोलन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की योजना के मुताबिक चल रहा है । हम यहां याद दिला दें कि अन्ना हजारे भी एक बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ कर चुके हैं । बाद में जब अन्ना हजारे घिरे तो मीडिया पर तथ्यों को तोड़ मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाकर टीम अन्ना ने बेहद सफाई से अन्ना के उस बयान से पल्ला झाड़ लिया था । लेकिन जिस तरह से अब टीम अन्ना रामदेव के साथ कंधा से कंधा मिलाकर आंदोलन कर रही है उससे दिग्विजय सिंह के आरोप और गहराने लगे हैं । जंतर मंतर पर चल रहे अनशन के दौरान इस तरह का विवाद उठना अनशन और आंदोलन दोनों की विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा कर देती है । अन्ना हजारे बार बार पंथ निरपेक्षता की बात करते हैं लेकिन लगातार रामदेव के साथ गलबहियां भी करते नजर आते हैं । रामदेव की आस्था और प्रतिबद्धता दोनों बिल्कुल साफ है । अनशन के दौरान जंतर मंतर पर रामदेव अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के साथ हाथ खड़े कर हुंकार भरते हैं और अगले ही दिन अहमदाबाद जाकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की वंदना करने लग जाते हैं ।
मोदी-रामदेव मुलाकात पर जिस तरह से टीम अन्ना में मतभेद खुलकर सामने आया है वो आंदोलन के भविष्य और उसकी साख के लिए अच्छा नहीं है । जिस जनता की टीम अन्ना लगातार दुहाई देती है वही जनता आज टीम अन्ना से और विशेष तौर पर अन्ना हजारे से ये जानना चाहती है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी तारीफों के पुल बांधनेवाले रामदेव के बारे में उनकी राय क्या है । अन्ना हजारे को इस बारे में अपनी राय साफ करनी होगी कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर उनकी सोच क्या है । जो व्यक्ति दो हजार दो के गुजरात दंगों के लिए कठघरे में खड़ा हो, जिसके मुख्यमंत्रित्व काल में राज्य में तमाम संवैधानिक संस्थाओं की धज्जियां उड़ी हों, जिसके शासनकाल के दौरान राज्य में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हो पाई हो उसके बारे में चुप्पी साधना टीम अन्ना की विश्वसनीयता के साथ साथ उनकी मंशा पर भी शक का धुंधलका बनकर छाने लग गई है ।
ऐसा नहीं है कि रामदेव और मोदी के मुद्दे पर ही टीम अन्ना के सदस्यों के बीच मतभेद हैं । और कई अन्य मुद्दे भी हैं जिसको लेकर मतैक्य नहीं है । एक ही मुद्दे पर अलग अलग बयान से जनता के बीच भ्रम फैलता है, जिससे आंदोलन के बिखर जाने का खतरा बन गया है । मसलन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को लेकर भी अन्ना और अरविंद केजरीवाल में मतभेद खुलकर सामने आ गए । अनशन के दौरान एक दिन अरविंद केजरीवाल ने सरेआम अन्ना हजारे से असहमति जताते हुए कहा कि कुछ लोग कह रहे हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए । अरविंद केजरीवाल जिन कुछ लोगों की बात कर रहे थे वो अन्ना हजारे और बाबा रामदेव थे जिन्होंने एक दिन पहले उसी मंच से ये ऐलान किया था कि राष्ट्रपति बनने के बाद प्रणब मुखर्जी के खिलाफ आरोप लगाने बंद होने चाहिए । अन्ना की मौजूदगी में अरविंद केजरीवाल ने महामहिम पर हमले किए । अरविंद केजरीवाल बेहद ईमानदार होंगे, उनके अंदर देशप्रेम का जज्बा भी होगा, वो देश के लिए वो बलिदान देने को भी तैयार होंगे लेकिन अरविंद केजरीवाल को यह बात समझनी होगी कि देश के राष्ट्रपति पद की कोई मर्यादा होती है और पूरा देश उस पद को एक इज्जत बख्शता है । लिहाजा प्रचारप्रियता के लिए देश के प्रथम नागरिक पर आरोप जड़ने से आम जनता के मन में केजरीवाल की क्रांतिकारी छवि नहीं बल्कि एक वैसे अराजक इंसान की छवि बनती है जो हर किसी को गाली देता चलता है । इसका नतीजा यह होता है कि उसकी गंभीरता कम होती है और लोग उनकी बातों को शिद्दत से लेना बंद करने लगेंगे ।  
इस तरह की बयानबाजियों और टीम के सदस्यों के बीच मतभिन्नता से ये साफ है कि इस आंदोलन को नेतृत्व देनेवालों के बीच मुद्दों को लेकर जबरदस्त मतभेद हैं । इंडिया अगेंस्ट करप्शन में भी सबकुछ ठीक नहीं चल रहा । पिछले एक साल से जिस तरह से कई लोगों ने संगठन में पारदर्शिता के आभाव और अरविंद केजरीवाल पर मनमानी के आरोप लगाते हुए खुद को अलग किया उससे भी जनता के बीच गलत संदेश गया । सोशल मीडिया में आंदोलन की कमान संभालने वाले शिवेन्द्र सिंह ने भी खत लिखकर टीम में चल रही राजनीति और टीम के नेतृत्व के गैरलोकतांत्रिक होने का मुद्दा उठाया था । लेकिन उन मुद्दों को तवज्जो नहीं दिए जाने से शिवेन्द्र सिंह ने अपने आपको समेट लिया । पिछले साल अपना सबकुछ छोड़ छाड़कर इस आंदोलन से जुड़े कितने ऐसे शिवेन्द्र हैं जिन्होंने नेतृत्व पर संगठन को गैरलोकतांत्रिक तरीके से चलाने के आरोप लगाते हुए टीम का साथ छोड़ दिया । इसके अलावा टीम के कई लोगों को तुरंत फुरंत मिली प्रसिद्धि ने भी काम बिगाड़ा । चौबीस घंटे न्यूज चैनलों के इस दौर में बहुत जल्दी प्रसिद्धि मिलती है उससे उस शख्स से अपेक्षा भी बढ़ जाती है । बहुधा होता यह है कि प्रसिद्दि के बोझ और नशे में जिम्मेदारियों से दूर हट जाते हैं । टीम अन्ना के कुछ सदस्यों के साथ भी ऐसा हो रहा है । प्रसिद्दि के दंभ में वो धरती छोड़ने  लगे है जो ना तो आंदोलन के लिए अच्छा है और ना ही उनके खुद के लिए