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Saturday, March 14, 2020

फूहड़ संवाद और दृश्यों की फिल्म ‘गिल्टी’


ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर लंबे समय से विमर्श हो रहा है। इंटरनेट के फैलते दायरे को देखते हुए इसपर विमर्श कभी तेज होता है तो कभी वो नेपथ्य में चला जाता है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय भी इस प्लेटफॉर्म पर पेश किए जानेवाले वेब सीरीज और फिल्मों की कथावस्तु से लेकर उसके संवादों और दृश्यों को लेकर नजर बनाए हुए है। मंत्रालय की पहल पर कई दौर की बातचीत भी हो चुकी है। लेकिन अबतक ये बातचीत के स्तर पर ही है। कोई ठोस फैसला नहीं लिया जा सका है। इस बीच इन प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज के अलावा फिल्में भी आ रही हैं। अभी एक फिल्म आई है नेटफ्लिक्स पर जिसका नाम है गिल्टी। इस फिल्म को करण जौहर की कंपनी धर्माटिक इंटरटेनमेंट ने पेश किया है। पिछले साल सितंबर में करण जौहर की कंपनी और नेटफ्लिक्स के बीच करार हुआ था। ये कंपनी नेटफ्लिक्स के लिए फिल्मों और वेब सीरीज का निर्माण कर रही है। गिल्टी फिल्म के प्रोड्यूसर करण जौहर हैं। इस महीने के शुरुआत में ये फिल्म नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध हुई। करण जौहर का नाम जुड़ा होने की वजह से इस फिल्म को पर्याप्त प्रचार मिला, दर्शकों के बीच एक उत्सकुकता का माहौल भी बना। करण जौहर पारिवारिक और रोमांटिक फिल्मों के निर्माता के तौर पर जाने जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वो बहुत हद तक साफ सुथरी फिल्में भी बनाते हैं। इस वजह से भी लोगों में एक उत्सुकता थी कि करण की कंपनी जब फिल्म बना रही है तो वो बेहतर फिल्म होगी। इस फिल्म का निर्देशन रुचि नारायण ने किया है जो इसके पहले कल, यस्टरडे एंड टुमारो नाम की फिल्म का निर्देशन कर चुकी हैं। हलांकि ये फिल्म कुछ खास अच्छा नहीं कर पाई थी। उनके निर्देशन में ये दूसरी फिल्म है।
हम फिल्म गिल्टी की समीक्षा नहीं कर रहे बल्कि इस फिल्म के माध्यम से उस प्रवृत्ति या ट्रेंड की तरफ इशारा करना चाह रहे हैं जिसने वेब सीरीज या ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म पर चलने वाले कंटेंट को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। ओटीटी पर पेश किए जानेवाले कंटेंट को लेकर किसी तरह का कोई नियमन नहीं है। वहां निर्माता-निर्देशकों को खुलकर कुछ भी दिखाने की छूट है और ये प्लेटफॉर्म इस छूट का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। किसी भी तरह का नियमन नहीं होने की वजह से भरपूर यौनिक दृश्य, जुगुप्साजनक और लंबे यौनिक संवाद, अश्लीलता की सीमा पार करनेवाली गालियां आम बात हो गई है। इसके अलावा इन वेब सीरीज के माध्यम से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश भी कई बार होती है,धर्म को बदनाम करने की कोशिश भी। कुछ वेब सीरीज में तो भारतीय सेना का भी आपत्तिजनक तरीके से चित्रण किया गया है। इस बारे में इस स्तंभ में समय-समय पर लिखा भी गया है। पहले के वेब सीरीज की सामग्रियों को छोड़ भी दें तो अब भी जो पेश किया जा रहा है उसपर भी यथास्थितिवादियों का ध्यान नहीं जा रहा है।
हम गिल्टी फिल्म की ही बात करें तो इसमें जिस तरह के दृश्य और संवाद हैं उसपर बहुत ही संजीदगी से ध्यान देने की जरूरत है। इस फिल्म की कहानी मी टू के इर्द गिर्द घूमती है। कॉलेज के छात्रों के बीच एक छात्रा का रेप होता है और फिर सोशल मीडिया और मीडिया पर उठे बवंडर के मध्य कहानी चलती है। कियारा आडवाणी ने बेहतरीन अभिनय करते हुए पात्र को जीवंत कर दिया है। लेकिन एक तरफ वो लड़की बेहतरीन कविताएं लिखती है, फैज अहमद की शायरी सुनती है लेकिन संवाद इतने घटिया हैं कि वो उस जीवंतता पर ग्रहण लगा देते हैं। छात्रों की आपसी बातचीत में इतनी गालियां और घटिया और अश्लील शब्द आते हैं जो निर्देशक या संवाद लेखकों की कुंठा को ही प्रदर्शित करते हैं। संवाद में जितनी गालियां आती हैं वो बिल्कुल ही ठूंसे हुए लगते हैं। यौनिक दृश्यों की बहुतायत भी कॉलेज छात्रों को अपमानित करने जैसा है। क्या ऐसी फिल्में या सीरीज बनानेवाले ये मानते हैं कि देश के युवाओं की भाषा इतनी घटिया है। फिल्म को यथार्थ के करीब ले जाने की कोशिश में निर्देशक इसको यथार्थ से बहुत दूर ले जाती है। इस पूरी फिल्म को देखने के बाद यही लगता है कि फिल्मकारों को छात्र जीवन के बारे में जानकारी नहीं है या किसी तीसरी दुनिया के छात्रों के बारे में बात हो रही है। कम से कम भारतीय समाज में अभी छात्र इतने घटिया स्तर पर संवाद नहीं करते हैं। एक बेहतरीन फिल्म को,कियारा के बेहतरीन अभिनय को संवाद के घटियापन ने सतही और फूहड़ बना कर रख दिया। भारत अभी भी भारत है, इसकी अपनी एक संस्कृति है।   
दरअसल भारत में बनने वाले वेब सीरीज या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर चलनेवाली फिल्मों को लेकर एक अजीब सी धारणा विकसित होती जा रही है। मानसिक रूप से विपन्न एक निर्माता और निर्देशक ने जिस तरह की शुरुआत की थी वो एक ट्रेंड के तौर पर विकसित हो रहा है। मानसिक रूप से विपन्न और कुंठित उस निर्देशक ने अपने एक वेब सीरीज में मुंबई की दुनिया दिखाने के चक्कर में जिस तरह की भाषा और दृश्य का उपयोग वेब सीरीज में किया था, वो उनके अपने जीवन का प्रतिबंब हो सकता है, समाज का तो कतई नहीं है।ये मानसिक विपन्नता और कुंठा उनकी सार्वजनिक टिप्पणियों में बहुधा दिखती भी है। वेब सीरीज के निर्माताओं को लगता है कि गालियों के बगैर दर्शक नहीं मिलेंगे। यहीं पर सरकार की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। कुछ लोगों के तर्क हैं कि ओटीटी पर दिखाए जानेवाले इस तरह के कंटेंट में छोटा सा लिखा होता है कि ये अठारह साल से अधिक उम्र के लोगों के देखने के लिए है। लेकिन क्या ये लिख भर देने से किसी माध्यम को अश्लील दृश्य या बर्बरता पूर्ण हिंसा दिखाने की अनुमति मिल जाती है। क्या कलात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर युवा पीढ़ी के सामने अश्लीलता परोसने की इजात दी जा सकती है। कलात्मक अभिव्यक्ति की भी एक सीमा तो तय करनी चाहिए।
इसके अलावा एक तर्क और दिया जाता है कि इन प्लटफॉर्म पर वही जा सकते हैं जो जाना चाहते हैं। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से प्रमाणित फिल्में दर्शक सामूहिक रूप से देखते हैं लेकिन ओटीटी पर निजी तौर पर देखते हैं। ये तर्क बचकाना है। लाख आधुनिकता के दावे किए जाएं लेकिन यहां के लोग अब भी पारिवारिक संस्कार या सामाजिक मर्यादा के बंधन में बंधे हैं। ये अमेरिका नहीं है कि जहां लोक-लाज के लिए कोई जगह नहीं है। दरअसल ये ऑनलाइन बाजार पर कब्जा और उससे मुनाफा कमाने की होड़ है। पिछले दिनों कई रिपोर्ट आईं जो यह बताती हैं कि भारत में इंटरनेट का फैलाव बहुत तेज गति से हो रहा है और इंटरनेट पर वीडियो देखनेवालों की संख्या में इजाफा हो रहा है। लोग देर तक इंटरनेट पर वीडियो देखने लगे हैं। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले दो साल में वीडियो कंटेंट देखने के समय में दोगुने से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। दो साल पहले उपभोक्ता दिनभर में ग्यारह मिनट वीडियो देखता था जो अब बढ़कर चौबीस मिनट हो गया है। जैसे जैसे स्मार्ट फोन के उपभोक्ता बढ़ेंगे वैसे वैसे ये समय और बढ़ेगा। एक और अंतराष्ट्रीय रिपोर्ट ये कहती है कि हमारे देश में अभी प्रति उपभोक्ता औसत करीब 10 जीबी डेटा की खपत है जिसके 2024 तक अठारह जीबी प्रतिमाह प्रति उपभोक्ता होने का अनुमान है। इस तरह से हम देखें तो ये एक बड़े बाजार का आकार ले रहा है। यहां पेश किए जानेवाले वीडियो कटेंट की व्याप्ति बहुत अधिक होनेवाली है। जाहिर सी बात है कि व्याप्ति का सीधा संबंध मुनाफे से है।
अब वक्त आ गया है कि सरकार इस बारे में शीघ्र कोई फैसला ले। स्वनियम की बात लंबे समय से चल रही है। इसके लिए एक ड्राफ्ट भी तैयार किया जा चुका है लेकिन कई प्लेटफॉर्म इसको मानने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसी खबरें आई हैं कि सूचना और प्रसारण मंत्री ने इन प्लेटफॉर्म्स को सौ दिन का समय दिया है ताकि वो किसी प्रकार के नियमन के बारे में अंतिम निर्णय पर पहुंच सकें। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल है कि क्या मुनाफा कमाने के लिए कलात्मक अभिव्यक्ति की आड़ को सरकार स्वीकार करेगी। स्वनियमन को एक प्रयोग के तौर पर देखा जा सकता है लेकिन जिस तरह का ट्रेंड है उसमें ओटीटी कंटेंट के प्रमाणन की व्यवस्था बनाने की दिशा में ही सरकार को सोचना होगा। आज नहीं तो कल।

7 comments:

gangatul said...

अत्यंत सटीक विश्लेषण।

Young Bharat News said...

बहुत शानदार भईया

veethika said...

आपका लेख न केवल पाठकों के लिए आँख खोलने वाला है वरन सरकार को भी प्रेरित करने वाला है। मनोरंजन के नाम पर जो-सो परोसने पर रोक लगनी ही चाहिए। कलात्मकता के रूप में अश्लीलता, फ़ूहड़पन और यौनिकता दिखाना रुकना चाहिए। कंटेंट पर नियंत्रण आवश्यक है लेकिन लगता है ऐसा होने पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई दे कर इस पर बबाल ही होगा, कुछ सार्थक की उम्मीद कम है। आपसे सहमत। आपको बधाई!

Thinkiyablogspot.in said...

Shandar

गजेन्द्र कुमार पाटीदार said...

इन्टरनेट के माध्यम से अपनी कंठा को दिखाने का एक बड़े वर्ग को अवसर मिल गया है। ऐसी चीजे घर परिवार में भी साथ बैठकर अब देखी जाने लगी है, ऐसे में सरकार को आगे आना ही चाहिए, मगर आगे आने का तात्पर्य होगा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने के आरोप लगाने के लिए उस गैंग को अवसर देना, जो डॉ आर्थो के विज्ञापक लोग झूठ फैलाने के लिए उपयोग करते रहे हैं।

विकास नैनवाल 'अंजान' said...

आपके लेख से सहमत नहीं हूँ। इन्टरनेट पर सेंसरशिप नही होनी चाहिए। आपने की गिल्टी की बात मैंने वो नहीं देखी क्योंकि मुझे इसके जैसे कंटेंट पसंद नहीं है। न मैंने सेक्रेड गेम्स ही देखी है जिसके विषय में आपने ढके छुपे लहजे लिखा है। मेरा मानना है जब मैं अपने लिए इन्हें न देखना का चुनाव कर सकता हूँ तो बाकि लोग भी इन्हें देखने का चुनाव कर सकते हैं। आपको लगता है भारतीय छात्र जीवन में इतनी गालियाँ नहीं होती है। अगर आपका ख्याल सच होगा, जो कि मुझे नहीं लगता कि है, तो छात्र इसे नकार देंगे। मुझे लगता है हमे अब खुद को ज्यादा समझदार और आम जनता को बेवकूफ समझने की आदत छोड़ देनी चाहिए। व्यक्ति को क्या देखना है क्या नहीं यह उसके विवेक पर छोड़ देना चाहिए। माफ़ी के साथ कहना चाहूँगा कि भारत के युवा इतने नासमझ नहीं हैं जितने की सेंसरशिप की हिमायत करने वाले बुजुर्ग समझते हैं।

Rahul said...

सटीक संवाद। मैंने काफी सारे वेब सीरीज देखे हैं और इन सबके बाद ये निष्कर्ष हैं की कोई भी वेब सीरीज आप अपने माता पिता और बच्चों के साथ नहीं देख सकते। आज से पहले भी अपराध और रोजमर्रा की ज़िंदगी पर आधारित बहुत सी फिल्में और टीवी सीरियल्स का निर्माण हुआ है। उनमें तो कभी भी गाली गलौज का प्रयोग नहीं हुआ और वो उतनी ही रचनात्मक प्रतीत होतीं थीं। आज भी यदि अच्छी कहानी हैं तो भाषा का स्तर गिराने की कतई आवश्यकता नहीं होगी। सच्चाई ये है कि ज्यादातर सीरीज में गाली गलौज और सेक्स सीन जबरदस्ती ठूसे हुए लगते हैं।