प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 12 वर्षों के कार्यकाल में बहुत सारे महत्वपूर्ण कार्य किए। इन कार्यों में से दो कार्य ऐसे हैं जिसको ऐतिहासिक कार्य की कोष्ठक में रखा जा सकता है। पहला है अनुच्छेद 370 की समाप्ति। दूसरा है माओवाद का सफाया। ये दोनों कार्य इतिहास में इस तरह से दर्ज हो गए जिसको कभी भी मिटाया नहीं जा सकेगा। दोनों में गृहमंत्री अमित शाह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। अनुच्छेद 370 की समाप्ति बहुत साहसिक कदम था। उसके लिए व्यापक प्रसासनिक तैयारी भी आवश्यकता थी। जो लोग कहते थे कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कश्मीर में खून की नदियां बहेंगी उन्होंने भी खामोशी के साथ इस बदलाव को स्वीकार किया। 370 के समाप्त होने के आसन्न खतरे से निबटने के लिए तैयारियां की गई थीं। माओवादी आतंक को समाप्त करने के लिए एक जिस इच्छाशक्ति की आवश्यकता थी वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दिखाई। परिणामस्वरूप गृहमंत्री को इस कार्य को करने में अपेक्षित शक्ति और भरोसा मिला। रणनीति बनाई गई। उसपर निश्चित समयावधि में कार्य हुआ। आज देश माओवादी आतंक से मुक्त है। जब माओवाद के आतंक के कारणों पर पर विचार कर रहा था तो एक्स पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषण का एक अंश दिखा। उसमें वो कह रहे हैं कि अमेरिकी संस्था यूनाइटेड स्टेटस एजेंसी फार इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) 2024 के लोकसभा चुनाव के समय करीब 200 करोड़ रुपए भारत में भेजना चाहता था ताकि नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और को प्रधानमंत्री बनाया जा सके। यूएसएआईडी दुनिया के देशों को अलग अलग कारणों से आर्थिक मदद करता रहता है। ये आर्थिक मदद शिक्षा, स्वास्थ्य, लोकतंत्र को मजबूत करने आदि के नाम पर दी जाती है। अधिकतर मामलों में इस तरह की मदद स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से ही दी जाती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इस तरह का बयान पहले भी दे चुके हैं। उन्होंने दावा किया था कि 2024 में भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए धन भेजा गया था। प्रश्न उठ सकता है कि माओवादी आतंक की समाप्ति और ट्रंप के इस बयान में क्या संबंध है। इन दोनों बातों में गहरा संबंध है। इसको समझने के लिए समय समय पर विदेशी फंडिंग के नियमों को सख्त और पारदर्शी बनाने के लिए उठाए गए कदमों और उसपर मचे बवाल पर ध्यान देना होगा। इस वर्ष भी विदेशी फंडिंग को लेकर गृह मंत्रालय ने संशोधित नोटिफिकेशन जारी किया। अभी जारी नोटिफिकेशन के अनुसार गैर सरकारी संगठनों को जिस कार्य के लिए विदेश से पैसा मिलता है उस कार्य में ही खर्च करने की व्यवस्था के लिए नियम और सख्त किए गए। गैर सरकारी संगठनों के प्रशासनिक व्यय की सीमा भी तय की गई है। विदेश से मिले धन के उपयोग का प्रमाण देने के बाद ही फिर से मदद की मंजूरी मिलेगी। पहले होता ये था कि धन किसी अन्य कार्य के लिए आता था और उसका उपयोग किसी अन्य कार्य में होता था। लोकतंत्र को या सिविल सोसाइटी को मजबूत करने के लिए आनेवाले धन का उपयोग बहुधा सरकार के विरुद्ध आंदोलन में होता था। धर्मिक कार्यों या धर्म प्रचार के लिए मिलनेवाली राशि का उपयोग मतांतरण में किया जाता था। इस वर्ष के संशोधन में ये स्पष्ट किया गया है कि धार्मिक कार्यों के लिए विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का उपयोग किसी भी हाल में मतातंरण के लिए नहीं किया जा सकेगा। संविधान का अनुच्छेद 25 देश के नागरिकों को रिलीजस स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है। अपने रिलीजन का अनुकरण करने और उसके प्रचार करने की भी अनुमति है। इसकी आड़ में ही मतांतरण के कार्य को अंजाम दिया जाता रहा है। इसमें विदेश से मिलनेवाली आर्थिक सहायता का भरपूर उपयोग होता रहा है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में किए गए संशोधन के अनुसार अब धार्मिक प्रचार के लिए मिलनेवाले विदेशी धन से मतांतरण की अनुमति नहीं है। ऐसा पाए जानेपर लाइसेंस रद करने का अधिकार सरकार के पास होगा।
विदेश से मिलनेवाली आर्थिक मदद गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) शिक्षा के प्रसार के नाम पर भी लेते रहे हैं। इस तरह की बात सामने आती रही है कि अमुक एनजीओ ने शिक्षा के प्रसार के लिए विदेश से आर्थिक सहायता ली लेकिन उसका उपयोग विचारधारा विशेष के प्रचार प्रसार में किया गया। विशेषकर इस तरह के मामले छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे आदिवासी बहुल इलाकों से आते रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए मिलनेवाले धन के दुरुपयोग की खबरें आती रही हैं। इस तरह के समाचार भी आते रहे हैं कि विदेश से मिलनेवाले धन का उपयोग पहले नक्सलियों और बाद में माओवादियों को मदद के लिए किया जाता रहा। इस तरह की गतिविधियां भारत की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बने रहे। इस कारण से जब विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में संशोधन हुआ तब केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने का प्रयास किया गया। जब भी एनजीओ को मिलनेवाले विदेशी धन को लेकर आर्थिक अनुशासन की बात गृह मंत्रालय से की जाती है तब भी विरोध के स्वर मुखर हो जाते हैं। इसका एकमात्र कारण है कि कई एनजीओ जिस कार्य के लिए धन लेते हैं उस कार्य के अलावा अन्य काम में पैसे खर्च किए जाते हैं। माओवादियों को विदेशी मदद का एक बड़ा स्त्रोत ये भी था। अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय ने इस स्त्रोत को खत्म किया जिससे माओवादियों को मिलनेवाली आर्थिक सहायता न्यून हो गई।
देश में सत्ता परिवर्तन का मंसूबा पाले बैठे विदेशी ताकतों को भी इससे कमजोर किया गया। ये बात सिर्फ ट्रंप ही नहीं कह रहे हैं। 12 सितंबर 2011 को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने कुछ दस्तावेज डिक्सालीफाई किए। उन दस्तावेजों से ये राज खुला कि किस तरह से भारत की स्वतंत्रता के बाद से सोवियत संघ ने कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (सीपीआई) की पूर्ण स्वामित्व वाले प्रकाशन गृह पीपल्स पब्लिशिंग हाउस को 65 प्रतिशत तक आर्थिक अनुदान देता था। इतना ही नहीं सीपीआई के प्रकाशनों को 1984 में करीब साठ हजार डालर तक का विज्ञापन दिया जाता था। सीपीआई और उसके अनुषांगिक संगठनों के लोगों को आर्थिक मदद और सोवियत संघ की यात्रा के लिए टिकट आदि दिए जाते थे। उसमें इस बात का भी उल्लेख है कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान करीब 40 प्रतिशत संसद सदस्यों को सोवियत रूस से पैसे मिलते थे। इसकी प्रामाणिकता ना तो कभी सिद्ध हो सकती है ना ही सच सामने आता है। लेकिन खुफिया क्लासीफाई दस्तावेजों के सामने आने से संकेत तो मिलते ही हैं। प्रश्न यही है कि जब नरेन्द्र मोदी की सरकार को बदलने के लिए आर्थिक मदद की बात अंतराष्ट्रीय मंचों पर होती है तो उसपर देश में विचार तो होना ही चाहिए। क्योंकि ये धनबल के आधार पर देश की संप्रभुता पर आक्रमण जैसा मामला है। केंद्र सरकार के संज्ञान में ये बातें हैं। वो देश की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध है, ये संतोष की बात है। बात तो उन एनजीओ और उन नेताओं पर भी होनी चाहिए जो विदेश में जाकर ऐसी ताकतों से मिलते हैं जो धनबल से देश की संप्रभुता को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।

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